89. सेवा में समन्वय के सिद्धांत

(1) दूसरों के साथ उचित व्यवहार करो। जब तक कोई व्यक्ति दुष्ट, बेतुका या एक बुरी आत्मा न हो, तुम उनके साथ समन्वय का अभ्यास कर सकते हो। दूसरों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना एक बुनियादी सिद्धांत होता है;

(2) सत्य के प्रति समर्पण करना सीखना आवश्यक है। जो कोई भी सत्य के अनुसार बोलता है उसे स्वीकार करना चाहिए और उसका अनुपालन करना चाहिए, और समस्याओं को हल करने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए, चाहे वे समस्याएँ किसी की भी हों;

(3) आत्म-चिंतन में संलग्न होना सीखना और स्वयं को जानना आवश्यक है। सबसे पहले, अपने अहंकार और अपनी आत्म-तुष्टता को, अपनी ढीठता और कामुकता को, और अपनी देहासक्त वरीयताओं को सुधारो। केवल इस प्रकार व्यक्ति दूसरों के साथ निभा सकता है;

(4) यह आवश्यक है कि परमेश्वर के घर के कार्य की सुरक्षा के सिद्धांत को बनाए रखा जाए। यदि समन्वय की कोई समस्या हो, तो दूसरे को प्रेम से मदद करो; यदि समस्या पर्याप्त रूप से इतनी गंभीर हो कि समन्वय असंभव ही हो जाए, तो समन्वय को रद्द किया जा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यदि तुम समुचित ढंग से अपने कर्तव्यों का निर्वहन और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सीखना चाहिए कि दूसरों के साथ सौहार्दपूर्वक कार्य कैसे करें। अपने भाइयों और बहनों के साथ समन्वय करते समय तुम्हें निम्न बातों पर विचार करना चाहिए : सौहार्द क्या है? मैं जिस तरह उनसे बोलता हूँ, क्या वह सौहार्दपूर्ण है? क्या मेरे विचारों से उनके साथ सौहार्द उत्पन्न होता है? मैं जिस तरह काम कर रहा हूँ, क्या वह उनके साथ सौहार्द की ओर ले जाता है? विचार करो कि सौहार्दपूर्ण कैसे बनें। कई बार सौहार्दपूर्ण होने में धैर्य और सहनशीलता भी शामिल होती है, किंतु इसमें अपने विचारों पर दृढ़ और सिद्धांतों पर अडिग रहना भी शामिल है; इसका अर्थ सिद्धांतों की परवाह किए बिना मतभेद सुलझाना, या "भला आदमी" बनने की कोशिश करना, या संयम के मार्ग से चिपके रहना नहीं है। विशेष रूप से इसका अर्थ किसी की ठकुरसुहाती करना नहीं है। ये सिद्धांत हैं। एक बार तुमने इन सिद्धांतों को अपना लिया, तो तुम अनजाने ही परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करोगे और सत्य की वास्तविकता को भी जिओगे। एक-दूसरे के साथ अपनी अंत:क्रियाओं में जब लोग जीवन-दर्शनों, अपनी धारणाओं, विचारों, इच्छाओं और स्वार्थपरता, और अपनी क्षमताओं, गुणों, विशिष्टताओं और चतुराई पर निर्भर रहते हैं, तब वे परमेश्वर के समक्ष एकात्मता प्राप्त करने में नितांत अक्षम होते हैं। चूँकि वे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के अंदर रहकर जीवन-यापन और कार्य कर रहे होते हैं, इसलिए वे एकात्म नहीं हो सकते। इसका अंतिम परिणाम क्या होता है? परमेश्वर उन पर कार्य नहीं करता। जब वह उन पर कार्य नहीं करता, और वे अपनी तुच्छ योग्यताओं, चतुराई, विशिष्टताओं पर, और उन्होंने जो बहुत थोड़ा-सा ज्ञान और कौशल प्राप्त किया है, उसी पर निर्भर बने रहते हैं, तब परमेश्ववर के घर में अपना पूर्ण उपयोग किए जाने को लेकर वे बहुत कठिन समय व्यतीत करते हैं, और उनके लिए परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना भी कठिन होता है, क्योंकि यदि परमेश्वर तुम पर कार्य नहीं कर रहा है, तो तुम सत्य को अभ्यास में लाने अथवा चीज़ों को करने के सिद्धांत कदापि नहीं समझ सकते; अर्थात् तुम जिस कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो, उसके पीछे निहित सिद्धांतों के सार या मूल को तुम कदापि नहीं समझ सकते, और न ही तुम जान सकते हो कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे कार्य करें या उसे आनंद पहुँचाने के लिए क्या करें। तुम यह भी नहीं जान सकते कि सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप कैसे कार्य करें। तुम इन सारभूत चीज़ों को नहीं समझ पाते; तुम्हें कुछ पता नहीं चलता। अपना कर्तव्य पूरा करने के तुम्हारे संभ्रमित प्रयासों का विफल होना तय है, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें ठुकराया जाना निश्चित है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सामंजस्‍यपूर्ण सहयोग के बारे में' से उद्धृत

तुम चाहे जो करो, लेकिन उसमें सत्य तलाशने और सत्य का पालन करने का प्रयास करो। यदि तुम सत्य के अनुसार कार्य कर रहे हो, तो तुम्हारी कार्यशैली सही है। अगर किसी बच्चे ने कोई बात कही है या किसी बेहद सीधे-सादे भाई-बहन ने भी कोई विचार रखा है और वह सत्य के अनुरूप है, तो तुम जो कुछ करोगे, उसका परिणाम अच्छा ही होगा और वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप भी होगा। किसी मामले का संचालन तुम्हारे सहज आवेग और उसके संचालन के तुम्हारे सिद्धांतों पर आधारित होता है। अगर तुम्हारे सिद्धांत इंसानी इच्छा से पैदा हुए हैं, यदि वे मानवीय विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं से उत्पन्न हुए हैं; या फिर वे मानवीय भावनाओं और दृष्टिकोण से जन्मे हैं, तो तुम्हारा मामले का संचालन गलत होगा, क्योंकि उसका स्रोत ही गलत होगा। जब तुम्हारे विचार सत्य के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं और जब तुम मामलों का संचालन सत्य-सिद्धांतों के अनुसार करते हो, तो फिर जो मामला तुम्हारे हाथ में है, तुम उसका संचालन यकीनन सही ढंग से करोगे। कभी-कभी लोग तुम्हारे द्वारा संचालित मामले को उस समय स्वीकार नहीं कर पाएँगे और उस समय ऐसा लग सकता है कि उनकी अपनी धारणाएँ हैं या उनका दिल बेचैन हो जाएगा। हालाँकि कुछ समय के बाद तुम सही साबित होगे। जो मामले परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होते हैं, वे कालांतर में सही लगते हैं; लेकिन जो मामले परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं होते—जो मामले मानवीय इच्छा के अनुरूप होते हैं और मानव-निर्मित होते हैं—वे कालांतर में खराब ही सिद्ध होते हैं। जब तुम कुछ करते हो, तो उस समय तुम्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए कि तुम्हारा मार्गदर्शन किस तरीके से होना चाहिए या किस तरीके से नहीं होना चाहिए और पूर्वानुमान न लगाओ। पहली बात तो यह है कि तुम्हें खोज और प्रार्थना करनी चाहिए, तब तुम्हें आगे के मार्ग पर चलना चाहिए और सबके साथ संगति करनी चाहिए। संगति का प्रयोजन क्या है? इससे तुम ठीक परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य और उसकी इच्छा के अनुरूप बर्ताव कर पाओगे। यह बात को कहने का थोड़ा भव्य अंदाज़ है; चलो इसे इस ढंग से कहते हैं कि इससे इंसान मामलों का संचालन ठीक सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कर पाता है—यह तरीका थोड़ा ज़्यादा व्यावहारिक है। यदि तुम ऐसा कर पाओ, तो इतना पर्याप्त है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करने का मार्ग' से उद्धृत

परमेश्वर ज़रूरतमंदों को धूल से उठाता है; विनम्र को उच्च बनाया जाना चाहिए। मैं विश्वव्यापी कलीसिया को नियंत्रित करने के लिए, सभी राष्ट्रों और सभी लोगों को नियंत्रित करने के लिए अपनी बुद्धिमत्ता का उसके सभी रूपों में उपयोग करूँगा, ताकि वे सभी मेरे भीतर हों, और ताकि कलीसिया में उपस्थित तुम सब मेरे सामने समर्पित हो सको। जो लोग पहले आज्ञा नहीं मानते थे, उन्हें अब मेरे सामने आज्ञाकारी होना चाहिए, एक-दूसरे के लिए समर्पित होना चाहिए, एक-दूसरे को सहन करना चाहिए; तुम्हारे जीवन आपस में जुड़े होने चाहिए, और तुम्हें एक-दूसरे से प्यार करना चाहिए, सभी को अपनी कमियों की पूर्ति करने के लिए दूसरों की शक्तियों का उपयोग करना चाहिए, समन्वय के साथ सेवा करनी चाहिए। इस तरह से कलीसिया का निर्माण होगा, और शैतान को शोषण करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। केवल तब मेरी प्रबंधन योजना विफल नहीं होगी। यहाँ मैं तुम लोगों को एक और अनुस्मारक दे दूँ। अपने भीतर इस कारण से गलतफ़हमियाँ उत्पन्न न होने देना, कि ऐसे-ऐसे व्यक्ति का एक खास तरीका है, या वह ऐसे-ऐसे तरीके से कार्य करता है, जिसका परिणाम यह होता है कि तुम अपनी आत्मिक स्थिति में पतित हो जाते हो। जैसा कि मैं देखता हूँ, यह उचित नहीं है, और यह एक बेकार बात है। क्या जिस पर तुम विश्वास करते हो, वह परमेश्वर नहीं है? यह कोई व्यक्ति नहीं है। कार्य समान नहीं हैं। एक शरीर है। प्रत्येक अपना कर्तव्य करता है, प्रत्येक अपनी जगह पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है—प्रत्येक चिंगारी के लिए प्रकाश की एक चमक है—और जीवन में परिपक्वता की तलाश करता है। इस प्रकार मैं संतुष्ट हूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 21' से उद्धृत

यदि तुम सत्य की खातिर एक अच्छी लड़ाई लड़ना चाहते हो, तो सबसे पहले, तुम्हें शैतान को काम करने का कोई मौका नहीं देना चाहिए—ऐसा करने के लिए तुम्हें एकमत होना पड़ेगा और मिलजुल कर सेवा करने में समर्थ होना होगा, अपनी सभी धारणाओं, विचारों, मतों और काम करने के तरीकों को छोड़ना होगा, मेरे भीतर अपने दिल को शांत करना होगा, पवित्र आत्मा की आवाज़ पर ध्यान देना होगा, पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति चौकस रहना होगा और परमेश्वर के वचनों का विस्तार से अनुभव करना होगा। तुम्हारी बस एक ही मंशा होनी चाहिए, और वह ये कि मेरी इच्छा पूरी हो। इसके अलावा तुम्हारी और कोई मंशा नहीं होनी चाहिए। तुम्हें अपने पूरे दिल से मेरी ओर देखना चाहिए, मेरे सारे कामों और चीजों को करने के मेरे तरीकों को बारीकी से देखना चाहिए और ज़रा-भी लापरवाह नहीं होना चाहिए। तुम्हारी आत्मा प्रखर हो और तुम्हारी आँखें खुली हों। आम तौर पर, जब उनकी बात आती है जिनके इरादे और उद्देश्य सही नहीं होते, और साथ ही उनकी जो दूसरों के द्वारा देखे जाना पसंद करते हैं, जो चीज़ों को करने के लिए उतावले होते हैं, जो बाधा डालने में उद्यत होते हैं, जो धार्मिक सिद्धांतों की झड़ी लगाने में अच्छे होते हैं, जो शैतान के अनुचर होते हैं, आदि—ऐसे लोग जब खड़े हो जाते हैं तो वे कलीसिया के लिए कठिनाइयाँ बन जाते हैं, और भाई-बहनों द्वारा परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने को व्यर्थ कर देते हैं। अगर तुम इस तरह के लोगों को ढोंग करते हुए पाओ, तो तुरंत उन पर प्रतिबंध लगा दो। यदि वे बार-बार फटकारे जाने पर भी न बदलें, तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। यदि वे लोग जो अपने तौर-तरीक़ों में जिद्दी होते हैं, वे अपना बचाव करने और अपने पापों को ढँकने की कोशिश करें, तो कलीसिया को उन्हें तुरंत बहिष्कृत कर देना चाहिए और उनकी चालबाज़ी के लिए कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए। थोड़ा-सा बचाने की कोशिश में बहुत कुछ न खो देना; अपनी निगाह मुख्य बातों पर बनाये रखो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 17' से उद्धृत

जब तुम लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दूसरों के साथ समन्वय करते हो, तो क्या तुम अलग-अलग राय स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हो? क्या तुम दूसरों की राय स्वीकार कर पाते हो? (मैं पहले अपने ही विचारों से चिपका रहता था, लेकिन जब परमेश्वर ने ऐसी स्थितियों की व्यवस्था की जिसमें मुझे दूसरों के साथ काम करने का मौका मिला, तो मैंने देखा कि जब सभी लोग मिलजुल कर चीजों पर चर्चा करते हैं, तो आम तौर पर उसका परिणाम सही होता है, और कई बार तो ऐसा हुआ कि मेरा अपना ही दृष्टिकोण गलत था या उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। तब मुझे समझ में आया कि दूसरों के साथ सद्भावपूर्ण ढंग से काम करना कितना महत्वपूर्ण होता है।) तुमने इससे क्या सीखा? क्या तुम लोगों को लगता है कि कोई भी पूर्ण है? लोग चाहे जितने शक्तिशाली हों, या चाहे जितने सक्षम और प्रतिभाशाली हों, फिर भी वे पूर्ण नहीं हैं। लोगों को यह मानना चाहिए; यह तथ्य है। यह हर उस व्यक्ति का सबसे उपयुक्त रवैया भी है, जो अपनी शक्तियों और फायदों या दोषों को सही ढंग से देखता है; यह वह तार्किकता है जो लोगों के पास होनी चाहिए। ऐसी तार्किकता के साथ तुम अपनी शक्तियों और कमज़ोरियों के साथ-साथ दूसरों की शक्तियों और कमज़ोरियों से भी उचित ढंग से निपट सकते हो, और इसके बल पर तुम उनके साथ सौहार्दपूर्वक कार्य कर पाओगे। यदि तुम सत्य के इस पहलू से सन्नद्ध हो और इसकी वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो, तो तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ सौहार्दपूर्वक रह सकते हो, एक-दूसरे की खूबियों का लाभ उठाकर अपनी किसी भी कमज़ोरी की भरपाई कर सकते हो। इस प्रकार, तुम चाहे जिस कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो या चाहे जो कार्य कर रहे हो, तुम सदैव उसमें श्रेष्ठतर होते जाओगे और परमेश्वर का आशीष प्राप्त करोगे। यदि तुम हमेशा सोचते हो कि तुम बहुत कुशल हो और दूसरे तुम्हारी तुलना में बदतर हैं, यदि तुम हमेशा अपनी राय को अंतिम राय मनवाना चाहते हो, तो इससे परेशानी होगी। हो सकता है कोई व्यक्ति सही बात कह रहा हो, लेकिन तुम्हें लगता है, "भले ही उसने जो कहा वह सही है, अगर मैं उसकी बात मान लूँ, तो दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मैं उसके जितना कुशल नहीं हूँ? मैं उससे सहमत नहीं हो सकता। मुझे कोई ऐसा रास्ता ढूँढना होगा जिससे कि दूसरों को पता न चले कि मैं उसकी सलाह मान रहा हूँ, लोगों को यही लगना चाहिए कि मैं उस काम को अपने तरीके से ही कर रहा हूँ; तब मेरे बारे में लोगों की राय अच्छी होगी।" यदि तुम हर समय लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार करोगे, तो क्या तुम इसे एक सामंजस्यपूर्ण सहयोग कह सकते हो? इसके दुष्प्रभाव क्या होंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोगों को तुम्हारी सच्चाई पता चल जाएगी। लोग कहेंगे कि तुम बहुत चालाक हो, तुम सत्य के अनुसार काम नहीं करते और तुम बेईमान हो। हर कोई तुमसे घृणा करेगा और तुम्हारी स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम्हें त्याग दिया जाएगा। परमेश्वर उस व्यक्ति को किस दृष्टि से देखता है जिसे हर कोई त्याग देता है? जिस व्यक्ति को हर कोई त्याग देता है, उसके बारे में परमेश्वर क्या सोचता है? परमेश्वर भी उससे घृणा करता है। वह ऐसे व्यक्ति से घृणा क्यों करता है? हो सकता है कि अपने कर्तव्य को पूरा करने के उसके प्रयास सच्चे हों, लेकिन यह किस तरह का दृष्टिकोण है? परमेश्वर को इससे घृणा है। ऐसे व्यक्ति ने परमेश्वर के सामने जिस तरह का स्वभाव प्रकट किया गया है, उससे परमेश्वर को उस व्यक्ति के दिल और दिमाग में जो कुछ है उससे और जो भी उसके इरादे हैं, उन सबसे घृणा हो जाती है; परमेश्वर को यह सब घिनौना और दुष्टतापूर्ण लगता है। अपने लक्ष्य को पाने और दूसरों की प्रशंसा प्राप्त करने के लिए बेहद अवांछनीय तरीकों और चालबाजियों का इस्तेमाल करने वाले व्यवहार से परमेश्वर को नफरत है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

सामंजस्यपूर्ण समन्वय क्या होता है? तुम तुम्हारा काम करते हो और मैं अपना; तुम तुम्हारा काम पूरा कर लेते हो, और मैं अपना। हम सब अपना-अपना काम करते हैं, और हमारे बीच कोई गुप्त समझ नहीं होती; कोई संचार या संगति नहीं। हम किसी भी तरह की आपसी समझ पर नहीं पहुँचे हैं। हम केवल गहराई से यही जानते हैं, "मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ और तुम अपना निभा रहे हो; तुम तुम्हारा काम पूरा करो, और मैं अपना। तुम जो भी करते हो, वह मेरी चिंता नहीं, और जो मैं करता हूँ, वह तुम्हारी चिंता नहीं। हम एक दूसरे के साथ हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं, और हम एक दूसरे को परेशान या प्रभावित नहीं कर रहे हैं।" क्या यह सामंजस्यपूर्ण समन्वय है? सतही तौर पर, ऐसा लग सकता है कि इस तरह के दो लोगों के बीच कोई संघर्ष या शिकायत नहीं है; वे एक दूसरे के साथ हस्तक्षेप करते हुए, या एक दूसरे को नियंत्रित या प्रतिबंधित करते हुए, नहीं लगते हैं। बहरहाल, आध्यात्मिक रूप से, उनके बीच कोई सामंजस्यपूर्ण समन्वय नहीं है; उनके बीच कोई अनकही समझ या एक दूसरे के लिए देखभाल नहीं है। केवल इतना ही हो रहा है कि उनमें से प्रत्येक अपने काम में कोशिश कर रहा है, और बिना किसी समन्वय के अपना व्यक्तिगत प्रयास कर रहा है। क्या यह चीज़ों को करने का एक अच्छा तरीका है? यह उन्हें करने का एक अच्छा तरीका नहीं। ऐसा लगता है कि दोनों में से कोई भी दूसरे का प्रबंधन नहीं कर रहा है, न ही दूसरे की सुन रहा और उसे मार्गदर्शन दे रहा है, और वे एक-दूसरे की मदद नहीं कर रहे हैं। वे तर्कसंगत लग सकते हैं, लेकिन एक भ्रष्ट स्वभाव उन दोनों के भीतर है। क्या तुम लोग जानते हो कि वह कौन-सा स्वभाव है? वो यह है कि वे दोनों सबसे आगे होने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, और उनके पास एक दूसरे के प्रति प्रेम, देखभाल और सहायता करने की इच्छा की कमी है। इस तरह रहने से कोई सामंजस्यपूर्ण समन्वय नहीं होता है। दूसरों के साथ समन्वय के बिना, तुम अकेले ही लड़ रहे हो, और तुम्हारे द्वारा किए गए कई काम सही या पूर्ण नहीं होंगे। यह उस प्रकार की स्थिति नहीं है जिसे परमेश्वर इंसानों में देखना चाहता है; इससे उसे खुशी नहीं मिलती।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सामंजस्‍यपूर्ण सहयोग के बारे में' से उद्धृत

दूसरों के साथ काम करते समय लोगों को उपयोगी होने के लिए क्या करना चाहिए? एक-दूसरे की कमियों को पूरा करना और उन कमियों की ओर इशारा करना, एक-दूसरे पर नज़र रखना, एक-दूसरे की तलाश करना और सलाह लेना। एक दूसरे की कमियों की ओर इंगित करना, दूसरों के साथ काम करने का एक हिस्सा होता है। कोई कह सकता है, "तुम इसे गलत कर रहे हो, तुम सत्य की तलाश नहीं कर रहे हो।" तुम जो कहते हो उसमें इतनी जल्दबाजी कैसे कर सकते हो और तुम इसे कैसे संभाल रहे हो? ” और यह सुनकर, वे कहेंगे, “ओह नहीं! यह तो सौभाग्य की बात है कि तुमने बताया—यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो इससे आपदा आ सकती थी।" और एक दूसरे पर नज़र रखने के बारे में क्या कहें? प्रत्येक व्यक्ति के लिए, गलतियाँ करने के, बेपरवाह होने के, परमेश्वर के घर के हितों पर विचार नहीं करने के, अनुपालन करने के, या अवज्ञाकारी होने के समय होते हैं। जब तुम किसी को दिखावा करते हुए पाते हो, जब वे अपनी स्थिति की रक्षा कर रहे होते हैं और परमेश्वर के घर के हितों पर विचार नहीं करते हैं, कि वे केवल अपनी प्रतिष्ठा की तलाश कर रहे होते हैं, तो ऐसे समय में तुम्हें आगे आना चाहिए, उनके साथ संगति करनी चाहिए, और इसे अपने लिए एक चेतावनी के रूप में भी लेना चाहिए। क्या एक दूसरे पर नज़र रखने का मतलब यह नहीं है? एक दूसरे पर नज़र रखने का क्या फ़ायदा होता है? यह परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना और लोगों को भटकने से रोकना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (8)' से उद्धृत

आज तुम लोगों से—सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने की अपेक्षा करना—उस सेवा के समान है जिसकी अपेक्षा यहोवा इस्राएलियों से करता था : अन्यथा, सेवा करना बंद कर दो। चूँकि तुम ऐसे लोग हो जो सीधे परमेश्वर की सेवा करते हैं, तुम्हें कम से कम अपनी सेवा में वफ़ादारी और समर्पण में सक्षम होना चाहिये। साथ ही, तुम्हें एक व्यावहारिक तरीके से सबक सीखने में भी सक्षम होना चाहिये। खास तौर पर, तुम में से उन लोगों के लिये जो कलीसिया में काम करते हैं, क्या तुम्हारे अधीन काम करने वाले भाई-बहनों में से कोई भी तुम लोगों से निपटने की हिम्मत कर पाता है? क्या कोई भी तुम्हारे सामने तुम्हारी गलतियों के बारे में तुम्हें बताने की हिम्मत कर पाता है? तुम लोग बाकी सभी लोगों के ऊपर खड़े हो; तुम राजाओं की तरह शासन करते हो! तुम लोग तो इस तरह के व्यवहारिक सबकों का अध्ययन भी नहीं करते हो, न ही इनमें प्रवेश करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर की सेवा करने की बात करते हो! वर्तमान में, तुम्हें कई कलीसियाओं की अगुवाई करने के लिए कहा जाता है, लेकिन न केवल तुम खुद का त्याग नहीं करते, बल्कि तुम अपनी ही धारणाओं और विचारों से चिपके भी रहते हो और इस तरह की बातें कहते हो, "मुझे लगता है यह काम इस तरह से किया जाना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने कहा है कि हमें दूसरों के नियंत्रण में नहीं रहना चाहिए और आजकल हमें आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करना चाहिये।" इसलिए, तुम में से हर कोई अपनी राय पर अड़ा रहता है और कोई भी एक दूसरे की बात नहीं मानता है। हालाँकि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि तुम्हारी सेवा एक विकट स्थिति में पहुँच गयी है, फिर भी तुम कहते हो, "मेरे हिसाब से, मेरा रास्ता बहुत गलत नहीं है। जो भी हो, हम में से हर एक का अपना पक्ष होता है : तुम अपनी बात करो और मैं अपनी बात करूँगा; तुम अपने दर्शनों के बारे में सहभागिता करो और मैं अपने प्रवेश की बात करूँगा।" तुम कभी भी ऐसी किसी चीज़ की जिम्मेदारी नहीं लेते हो जिनका निपटारा किया जाना चाहिये या तुम बस लापरवाही से काम करते हो, तुम में से हर कोई अपनी ही राय व्यक्त करता है और दिमाग लगाकर अपने ही रुतबे, प्रतिष्ठा और साख को बचाने में लगा रहता है। तुम में से कोई भी विनम्र बनने का इच्छुक नहीं है और कोई भी पक्ष पीछे हटने और एक दूसरे की कमियों को दूर करने की पहल नहीं करेगा, ताकि जीवन ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ सके। जब तुम लोग साथ मिलकर समन्वय करते हो, तो तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम कह सकते हो, "मुझे सत्य के इस पहलू की स्पष्ट समझ नहीं है। तुम्हें इसके साथ क्या अनुभव हुआ है?" या तुम लोग शायद कहो, "इस पहलू के संबंध में तेरा अनुभव मुझसे अधिक है; क्या तू कृपा करके मुझे कुछ मार्गदर्शन दे सकता है?" क्या यह एक अच्छा तरीका नहीं होगा? तुम लोगों ने ढेर सारे उपदेश सुने होंगे, और सेवा करने के बारे में तुम सबको कुछ अनुभव होगा। अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिये ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। इसके अलावा, तुम लोगों को किसी भी चीज़ के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले, उसके बारे में ध्यान से सहभागिता करनी चाहिये। सिर्फ़ ऐसा करके ही तुम लापरवाही से काम करने के बजाय कलीसिया की जिम्मेदारी उठा सकते हो। सभी कलीसियाओं में जाने के बाद, तुम्हें एक साथ इकट्ठा होकर उन सभी मुद्दों और समस्याओं के बारे में सहभागिता करनी चाहिये जो अपने काम के दौरान तुम्हें पता चली हैं; फिर तुम्हें उस प्रबुद्धता और रोशनी के बारे में बात करनी चाहिये जो तुम्हें प्राप्त हुई हैं—यह सेवा का एक अनिवार्य अभ्यास है। परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिये और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिये, तुम लोगों को सद्भावपूर्ण सहयोग करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिये, एक दूसरे में सुधार करके कार्य का बेहतर परिणाम हासिल करना चाहिये, ताकि परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखा जा सके। सच्चे सहयोग का यही मतलब है और जो लोग ऐसा करेंगे सिर्फ़ वही सच्चा प्रवेश हासिल कर पाएंगे। सहयोग करते समय, तुम्हारे द्वारा बोली गई कुछ बातें अनुपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इनके बारे में बाद में सहभागिता करो, और इनके बारे में अच्छी समझ हासिल करो, इन्हें अनदेखा मत करो। इस तरह की सहभागिता करने के बाद, तुम अपने भाई-बहनों की कमियों को दूर कर सकते हो। केवल इस तरह से अपने काम की अधिक गहराई में उतर कर ही तुम बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हो। तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, अपने हर काम में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये। हमेशा एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश करते हुए, अकेले काम करना अस्वीकार्य है। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के योग्य नहीं हैं! ऐसे लोगों का स्वभाव बहुत बुरा होता है; उनमें ज़रा सी भी मानवता नहीं बची है। वे सौ फीसदी शैतान हैं! वे जंगली जानवर हैं! अब भी, इस तरह की चीज़ें तुम लोगों के बीच होती हैं; तुम लोग तो सहभागिता के दौरान एक दूसरे पर हमला करने की हद तक चले जाते हो, जान-बूझकर कपट करना चाहते हो और किसी छोटी सी बात पर बहस करते हुए भी गुस्से से तमतमा उठते हो, तुम में से कोई भी पीछे हटने के लिये तैयार नहीं होता। हर व्यक्ति अपने अंदरूनी विचारों को एक दूसरे से छिपा रहा होता है, दूसरे पक्ष को गलत इरादे से देखता है और हमेशा सतर्क रहता है। क्या इस तरह का स्वभाव परमेश्वर की सेवा करने के लिये उपयुक्त है? क्या तुम्हारा इस तरह का कार्य तुम्हारे भाई-बहनों को कुछ भी दे सकता है? तुम न केवल लोगों को जीवन के सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ हो, बल्कि वास्तव में तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को अपने भाई-बहनों में डालते हो। क्या तुम दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हो? तुम्हारा ज़मीर बहुत बुरा है और यह पूरी तरह से सड़ चुका है! तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते हो, तुम सत्य का अभ्यास भी नहीं करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम बेशर्मी से दूसरों के सामने अपनी शैतानी प्रकृति को उजागर करते हो। तुम्हें कोई शर्म है ही नहीं! इन भाई-बहनों की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी गई है, फिर भी तुम उन्हें नरक की ओर ले जा रहे हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसका ज़मीर सड़ चुका है? तुम्हें बिलकुल भी शर्म नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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