89. सेवा में समन्वय के सिद्धांत

(1) दूसरों के साथ उचित व्यवहार करो। अगर कोई व्यक्ति दुष्ट, बेतुका या एक बुरी आत्मा न हो, तुम उनके साथ समन्वय का अभ्यास कर सकते हो। दूसरों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना एक बुनियादी सिद्धांत होता है।

(2) सत्य के प्रति समर्पण करना सीखना आवश्यक है। जो कोई भी सत्य के अनुसार बोलता है उसे स्वीकार करना चाहिए और उसका अनुपालन करना चाहिए, और समस्याओं को हल करने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए, चाहे वे समस्याएँ किसी की भी हों।

(3) आत्म-चिंतन में संलग्न होना सीखना और स्वयं को जानना आवश्यक है। सबसे पहले, अपने अहंकार और अपनी आत्म-तुष्टता को, अपनी ढीठता और उपद्रव को, और अपनी देहासक्त वरीयताओं को सुधारो। केवल इस प्रकार व्यक्ति दूसरों के साथ निभा सकता है।

(4) यह आवश्यक है कि परमेश्वर के घर के कार्य की सुरक्षा का सिद्धांत बनाए रखा जाए। यदि समन्वय की कोई समस्या हो, तो दूसरे की प्रेम से मदद करो; यदि समस्या पर्याप्त रूप से इतनी गंभीर हो कि समन्वय असंभव ही हो जाए, तो समन्वय को रद्द किया जा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

इन दिनों, कई लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि दूसरों के साथ समन्वय करते समय क्या सबक सीखे जाने चाहिये। मैंने देखा है कि तुम लोगों में से कई लोग दूसरों के साथ सहयोग करते समय बिलकुल सबक नहीं सीख पाते; तुममें से ज़्यादातर लोग अपने ही विचारों से चिपके रहते हैं। कलीसिया में काम करते समय, तुम अपनी बात कहते हो और दूसरे लोग उनकी बातें कहते हैं। एक की बात का दूसरे की बात से कोई संबंध नहीं होता है; दरअसल, तुम लोग बिलकुल भी सहयोग नहीं करते। तुम सभी लोग सिर्फ़ अपने परिज्ञान को बताने या उस "बोझ" को हल्का करने में लगे रहते हो जिसे तुम भीतर ढोते हो और किसी मामूली तरीके से भी जीवन नहीं खोजते हो। ऐसा लगता है कि तुम केवल लापरवाही से काम करते हो, तुम हमेशा यह मानते हो कि कोई और व्यक्ति चाहे जो भी कहता या करता हो, तुम्हें अपने ही चुने मार्ग पर चलना चाहिये। तुम सोचते हो कि चाहे दूसरे लोगों की परिस्थितियां कैसी भी हों, तुम्हें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार सहभागिता करनी चाहिये। तुम दूसरों की क्षमताओं का पता लगाने में सक्षम नहीं हो और ना ही तुम खुद की जाँच करने में सक्षम हो। तुम लोगों की चीज़ों की स्वीकृति वास्तव में गुमराह और गलत है। यह कहा जा सकता है कि अब भी तुम लोग दंभ का काफी प्रदर्शन करते हो, मानो कि तुम्हें वही पुरानी बीमारी फिर से लग गई है। तुम लोग एक दूसरे के साथ इस तरीके से बात नहीं करते हो जिसमें पूरा खुलापन हो, उदाहरण के लिये, किसी कलीसिया में काम करके तुमने किस तरह का परिणाम हासिल किया या तुम्हारी अंतरात्मा की हाल की स्थिति क्या है, वगैरह; तुम लोग ऐसी चीज़ों के बारे में कभी बात ही नहीं करते। तुम लोगों में अपनी धारणाओं को छोड़ने या खुद का त्याग करने जैसे अभ्यासों में बिलकुल भी प्रतिबद्धता नहीं है। अगुवा और कार्यकर्ता सिर्फ़ अपने भाई-बहनों को नकारात्मकता से दूर रखने और कैसे उनसे उत्साहपूर्वक अनुसरण करवाया जाए, इसके बारे में सोचते हैं। हालाँकि तुम सब लोग सोचते हो कि उत्साहपूर्वक अनुसरण करना अपने आप में काफी है और बुनियादी तौर पर तुम्हें इस बात की कोई समझ नहीं है कि स्वयं को जानने और त्यागने का क्या अर्थ है, दूसरों के साथ समन्वय में सेवा करने का क्या अर्थ है यह तो तुम और भी नहीं जानते। तुम बस स्वयं को परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने का इच्छुक बनाने की सोचते हो, पतरस की शैली में जीवन जीने का इच्छुक बनाने की सोचते हो। इन चीज़ों के अलावा, तुम और कुछ भी नहीं सोचते। तुम तो यह भी कहते हो कि दूसरे लोग चाहे जो भी करें, तुम आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करोगे और दूसरे लोग चाहे जैसे भी हों, तुम स्वयं परमेश्वर द्वारा पूर्णता की खोज करोगे, और ऐसा करना ही काफ़ी होगा। हालाँकि, सच तो यह है कि तुम्हारी इच्छाशक्ति को किसी भी तरह वास्तविकता में ठोस अभिव्यक्ति नहीं मिली है। क्या तुम लोग आजकल इसी तरह का व्यवहार नहीं करते हो? तुम लोगों में से हर कोई खुद की समझ से चिपका हुआ है और तुम सभी चाहते हो कि तुम्हें पूर्ण किया जाये। मैं देख रहा हूँ कि तुम लोगों ने काफ़ी लंबे समय से सेवा की है, लेकिन कोई प्रगति नहीं की; खास तौर पर, सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने के इस सबक में, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है! कलीसियाओं में जाते हुए तुम अपने ही तरीके से बात करते हो और दूसरे लोग उनके तरीके से बात करते हैं। सद्भावनापूर्ण सहयोग तो शायद ही कभी होता है और तुम्हारे अधीन सेवा करने वाले अनुयायियों के बारे में तो यह बात और भी सच है। कहने का मतलब है कि तुम लोगों में से शायद ही कोई इस बात को समझता है कि परमेश्वर की सेवा करना क्या है या परमेश्वर की सेवा कैसे करनी चाहिये। तुम लोग उलझन में हो और इस तरह के सबकों को छोटी-मोटी बात मानते हो। कई लोग तो ऐसे भी हैं जो न केवल सत्य के इस पहलू का अभ्यास करने में विफल रहते हैं, बल्कि जान-बूझकर गलती भी करते हैं। यहाँ तक कि जिन लोगों ने कई सालों तक सेवा की है वे भी एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते और एक दूसरे के खिलाफ़ षड्यंत्र करते हैं और ईर्ष्यालु और प्रतिस्पर्धात्मक होते हैं; हर व्यक्ति अपने से ही मतलब रखता है और वे ज़रा-भी सहयोग नहीं करते। क्या ये सारी चीज़ें तुम लोगों की वास्तविक कद-काठी को नहीं दर्शाती हैं? हर रोज़ साथ मिलकर सेवा करने वाले तुम लोग उन इस्राएलियों की तरह हो जो हर दिन मंदिर जाकर सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं की सेवा करते थे। ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हो, बिलकुल नहीं जानते कि समन्वय या सेवा कैसे करनी है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

आज तुम लोगों से—सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने की अपेक्षा करना—उस सेवा के समान है जिसकी अपेक्षा यहोवा इस्राएलियों से करता था : अन्यथा, सेवा करना बंद कर दो। चूँकि तुम ऐसे लोग हो जो सीधे परमेश्वर की सेवा करते हैं, तुम्हें कम से कम अपनी सेवा में वफ़ादारी और समर्पण में सक्षम होना चाहिये। साथ ही, तुम्हें एक व्यावहारिक तरीके से सबक सीखने में भी सक्षम होना चाहिये। खास तौर पर, तुम में से उन लोगों के लिये जो कलीसिया में काम करते हैं, क्या तुम्हारे अधीन काम करने वाले भाई-बहनों में से कोई भी तुम लोगों से निपटने की हिम्मत कर पाता है? क्या कोई भी तुम्हारे सामने तुम्हारी गलतियों के बारे में तुम्हें बताने की हिम्मत कर पाता है? तुम लोग बाकी सभी लोगों के ऊपर खड़े हो; तुम राजाओं की तरह शासन करते हो! तुम लोग तो इस तरह के व्यवहारिक सबकों का अध्ययन भी नहीं करते हो, न ही इनमें प्रवेश करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर की सेवा करने की बात करते हो! वर्तमान में, तुम्हें कई कलीसियाओं की अगुवाई करने के लिए कहा जाता है, लेकिन न केवल तुम खुद का त्याग नहीं करते, बल्कि तुम अपनी ही धारणाओं और विचारों से चिपके भी रहते हो और इस तरह की बातें कहते हो, "मुझे लगता है यह काम इस तरह से किया जाना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने कहा है कि हमें दूसरों के नियंत्रण में नहीं रहना चाहिए और आजकल हमें आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करना चाहिये।" इसलिए, तुम में से हर कोई अपनी राय पर अड़ा रहता है और कोई भी एक दूसरे की बात नहीं मानता है। हालाँकि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि तुम्हारी सेवा एक विकट स्थिति में पहुँच गयी है, फिर भी तुम कहते हो, "मेरे हिसाब से, मेरा रास्ता बहुत गलत नहीं है। जो भी हो, हम में से हर एक का अपना पक्ष होता है : तुम अपनी बात करो और मैं अपनी बात करूँगा; तुम अपने दर्शनों के बारे में सहभागिता करो और मैं अपने प्रवेश की बात करूँगा।" तुम कभी भी ऐसी किसी चीज़ की जिम्मेदारी नहीं लेते हो जिनका निपटारा किया जाना चाहिये या तुम बस लापरवाही से काम करते हो, तुम में से हर कोई अपनी ही राय व्यक्त करता है और दिमाग लगाकर अपने ही रुतबे, प्रतिष्ठा और साख को बचाने में लगा रहता है। तुम में से कोई भी विनम्र बनने का इच्छुक नहीं है और कोई भी पक्ष पीछे हटने और एक दूसरे की कमियों को दूर करने की पहल नहीं करेगा, ताकि जीवन ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ सके। जब तुम लोग साथ मिलकर समन्वय करते हो, तो तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम कह सकते हो, "मुझे सत्य के इस पहलू की स्पष्ट समझ नहीं है। तुम्हें इसके साथ क्या अनुभव हुआ है?" या तुम लोग शायद कहो, "इस पहलू के संबंध में तेरा अनुभव मुझसे अधिक है; क्या तू कृपा करके मुझे कुछ मार्गदर्शन दे सकता है?" क्या यह एक अच्छा तरीका नहीं होगा? तुम लोगों ने ढेर सारे उपदेश सुने होंगे, और सेवा करने के बारे में तुम सबको कुछ अनुभव होगा। अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिये ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। इसके अलावा, तुम लोगों को किसी भी चीज़ के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले, उसके बारे में ध्यान से सहभागिता करनी चाहिये। सिर्फ़ ऐसा करके ही तुम लापरवाही से काम करने के बजाय कलीसिया की जिम्मेदारी उठा सकते हो। सभी कलीसियाओं में जाने के बाद, तुम्हें एक साथ इकट्ठा होकर उन सभी मुद्दों और समस्याओं के बारे में सहभागिता करनी चाहिये जो अपने काम के दौरान तुम्हें पता चली हैं; फिर तुम्हें उस प्रबुद्धता और रोशनी के बारे में बात करनी चाहिये जो तुम्हें प्राप्त हुई हैं—यह सेवा का एक अनिवार्य अभ्यास है। परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिये और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिये, तुम लोगों को सद्भावपूर्ण सहयोग करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिये, एक दूसरे में सुधार करके कार्य का बेहतर परिणाम हासिल करना चाहिये, ताकि परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखा जा सके। सच्चे सहयोग का यही मतलब है और जो लोग ऐसा करेंगे सिर्फ़ वही सच्चा प्रवेश हासिल कर पाएंगे। सहयोग करते समय, तुम्हारे द्वारा बोली गई कुछ बातें अनुपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इनके बारे में बाद में सहभागिता करो, और इनके बारे में अच्छी समझ हासिल करो, इन्हें अनदेखा मत करो। इस तरह की सहभागिता करने के बाद, तुम अपने भाई-बहनों की कमियों को दूर कर सकते हो। केवल इस तरह से अपने काम की अधिक गहराई में उतर कर ही तुम बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हो। तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, अपने हर काम में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये। हमेशा एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश करते हुए, अकेले काम करना अस्वीकार्य है। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के योग्य नहीं हैं! ऐसे लोगों का स्वभाव बहुत बुरा होता है; उनमें ज़रा सी भी मानवता नहीं बची है। वे सौ फीसदी शैतान हैं! वे जंगली जानवर हैं! अब भी, इस तरह की चीज़ें तुम लोगों के बीच होती हैं; तुम लोग तो सहभागिता के दौरान एक दूसरे पर हमला करने की हद तक चले जाते हो, जान-बूझकर कपट करना चाहते हो और किसी छोटी सी बात पर बहस करते हुए भी गुस्से से तमतमा उठते हो, तुम में से कोई भी पीछे हटने के लिये तैयार नहीं होता। हर व्यक्ति अपने अंदरूनी विचारों को एक दूसरे से छिपा रहा होता है, दूसरे पक्ष को गलत इरादे से देखता है और हमेशा सतर्क रहता है। क्या इस तरह का स्वभाव परमेश्वर की सेवा करने के लिये उपयुक्त है? क्या तुम्हारा इस तरह का कार्य तुम्हारे भाई-बहनों को कुछ भी दे सकता है? तुम न केवल लोगों को जीवन के सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ हो, बल्कि वास्तव में तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को अपने भाई-बहनों में डालते हो। क्या तुम दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हो? तुम्हारा ज़मीर बहुत बुरा है और यह पूरी तरह से सड़ चुका है! तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते हो, तुम सत्य का अभ्यास भी नहीं करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम बेशर्मी से दूसरों के सामने अपनी शैतानी प्रकृति को उजागर करते हो। तुम्हें कोई शर्म है ही नहीं! इन भाई-बहनों की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी गई है, फिर भी तुम उन्हें नरक की ओर ले जा रहे हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसका ज़मीर सड़ चुका है? तुम्हें बिलकुल भी शर्म नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

यदि तुम समुचित ढंग से अपने कर्तव्यों का निर्वहन और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सीखना चाहिए कि दूसरों के साथ सौहार्दपूर्वक कार्य कैसे करें। अपने भाइयों और बहनों के साथ समन्वय करते समय तुम्हें निम्न बातों पर विचार करना चाहिए : सौहार्द क्या है? मैं जिस तरह उनसे बोलता हूँ, क्या वह सौहार्दपूर्ण है? क्या मेरे विचारों से उनके साथ सौहार्द उत्पन्न होता है? मैं जिस तरह काम कर रहा हूँ, क्या वह उनके साथ सौहार्द की ओर ले जाता है? विचार करो कि सौहार्दपूर्ण कैसे बनें। कई बार सौहार्दपूर्ण होने में धैर्य और सहनशीलता भी शामिल होती है, किंतु इसमें अपने विचारों पर दृढ़ और सिद्धांतों पर अडिग रहना भी शामिल है; इसका अर्थ सिद्धांतों की परवाह किए बिना मतभेद सुलझाना, या "भला आदमी" बनने की कोशिश करना, या संयम के मार्ग से चिपके रहना नहीं है। विशेष रूप से इसका अर्थ किसी की ठकुरसुहाती करना नहीं है। ये सिद्धांत हैं। एक बार तुमने इन सिद्धांतों को अपना लिया, तो तुम अनजाने ही परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करोगे और सत्य की वास्तविकता को भी जिओगे। एक-दूसरे के साथ अपनी अंत:क्रियाओं में जब लोग जीवन-दर्शनों, अपनी धारणाओं, विचारों, इच्छाओं और स्वार्थपरता, और अपनी क्षमताओं, गुणों, विशिष्टताओं और चतुराई पर निर्भर रहते हैं, तब वे परमेश्वर के समक्ष एकात्मता प्राप्त करने में नितांत अक्षम होते हैं। चूँकि वे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के अंदर रहकर जीवन-यापन और कार्य कर रहे होते हैं, इसलिए वे एकात्म नहीं हो सकते। इसका अंतिम परिणाम क्या होता है? परमेश्वर उन पर कार्य नहीं करता। जब वह उन पर कार्य नहीं करता, और वे अपनी तुच्छ योग्यताओं, चतुराई, विशिष्टताओं पर, और उन्होंने जो बहुत थोड़ा-सा ज्ञान और कौशल प्राप्त किया है, उसी पर निर्भर बने रहते हैं, तब परमेश्ववर के घर में अपना पूर्ण उपयोग किए जाने को लेकर वे बहुत कठिन समय व्यतीत करते हैं, और उनके लिए परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना भी कठिन होता है, क्योंकि यदि परमेश्वर तुम पर कार्य नहीं कर रहा है, तो तुम सत्य को अभ्यास में लाने अथवा चीज़ों को करने के सिद्धांत कदापि नहीं समझ सकते; अर्थात् तुम जिस कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो, उसके पीछे निहित सिद्धांतों के सार या मूल को तुम कदापि नहीं समझ सकते, और न ही तुम जान सकते हो कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे कार्य करें या उसे आनंद पहुँचाने के लिए क्या करें। तुम यह भी नहीं जान सकते कि सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप कैसे कार्य करें। तुम इन सारभूत चीज़ों को नहीं समझ पाते; तुम्हें कुछ पता नहीं चलता। अपना कर्तव्य पूरा करने के तुम्हारे संभ्रमित प्रयासों का विफल होना तय है, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें ठुकराया जाना निश्चित है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सामंजस्‍यपूर्ण सहयोग के बारे में' से उद्धृत

सामंजस्यपूर्ण समन्वय क्या होता है? तुम अपना काम करते हो और मैं अपना; तुम अपना काम पूरा करते हो और मैं अपना। हम सब अपना-अपना काम करते हैं, और हमारे बीच कोई अनकही समझ नहीं होती; कोई संवाद या संगति नहीं होती। हम किसी भी तरह की आपसी समझ पर नहीं पहुँचे होते। हम केवल अंतर्मन में जानते हैं, "मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ और तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो; तुम अपना काम करो, और मैं अपना करूँगा। तुम जो करते हो, उससे मेरा कोई सरोकार नहीं, और जो मैं करता हूँ, उससे तुम्हारा कोई सरोकार नहीं। हम एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर रहे, और हम एक-दूसरे को परेशान या प्रभावित नहीं कर रहे।" क्या यह सामंजस्यपूर्ण समन्वय है? सतही तौर पर ऐसा लग सकता है कि इस तरह के दो लोगों के बीच कोई टकराव या शिकायत नहीं है; वे एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप करते हुए या एक-दूसरे को नियंत्रित या प्रतिबंधित करते हुए नहीं लगते। किंतु आध्यात्मिक रूप से उनके बीच कोई सामंजस्यपूर्ण समन्वय नहीं है; उनके बीच कोई अनकही समझ या एक-दूसरे की परवाह नहीं है। केवल इतना ही हो रहा है कि उनमें से प्रत्येक अपने काम में मेहनत कर रहा है, और बिना किसी समन्वय के अपना व्यक्तिगत प्रयास कर रहा है। क्या यह काम करने का कोई अच्छा तरीका है? यह काम करने का अच्छा तरीका नहीं है। ऐसा लगता है कि दोनों में से कोई दूसरे का प्रबंधन नहीं कर रहा, दोनों में से कोई दूसरे की नहीं सुन रहा और उसे मार्गदर्शन नहीं दे रहा, और वे एक-दूसरे की मदद नहीं कर रहे। वे तर्कसंगत लग सकते हैं, लेकिन दोनों के भीतर एक भ्रष्ट स्वभाव है। क्या तुम लोग जानते हो कि वह कौन-सा स्वभाव है? वह यह है कि वे दोनों सबसे आगे रहने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, और उनमें एक-दूसरे के प्रति प्रेम, एक-दूसरे की परवाह और एक-दूसरे की सहायता करने की इच्छा का सर्वथा अभाव है। इस तरह रहने से कोई सामंजस्यपूर्ण समन्वय नहीं होता। दूसरों के साथ समन्वय के बिना तुम अकेले ही लड़ाई लड़ते हो, और तुम्हारे द्वारा की गई कई चीजें उतनी सही या परिपूर्ण नहीं होंगी। यह उस प्रकार की स्थिति नहीं है, जिसे परमेश्वर इंसानों में देखना चाहता है; इससे उसे खुशी नहीं मिलती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सामंजस्‍यपूर्ण सहयोग के बारे में' से उद्धृत

सहयोग में दूसरों से मदद और सुझाव माँगना, दूसरों की सलाह लेना और समस्या होने पर सत्य-सिद्धांतों की तलाश करने में सक्षम होना शामिल है। इस सब पर स्पष्ट रूप से सहभागिता की गई है; आगे क्या होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम इसका अभ्यास कैसे करते हो। अगर तुम हमेशा खुद को दूसरों से ऊपर समझते हो और अपने मिशन को एक आधिकारिक तैनाती मानते हो, और तुम हमेशा वैकल्पिक मार्ग अपनाते हो, हमेशा अपनी ही योजनाएँ बनाते हो, हमेशा अपना ही प्रबंधन करते हो—तो इससे समस्याएँ पैदा होंगी। अगर तुम हमेशा इसी तरह से कार्य करते हो, और तुम किसी और के साथ सहयोग नहीं करना चाहते, जिससे तुम्हारा अधिकार दूसरों में बिखर जाता है, तुम्हारी चमक चोरी हो जाती है, तुम्हारे सिर से प्रभामंडल छिन जाता है—अगर तुम सारी चीजें अपने तक ही रखना चाहते हो, तो तुम गलत रास्ते पर हो। लेकिन अगर तुम अकसर सत्य की तलाश करते हो और ऐसी चीजें अलग रखकर उसका अभ्यास करते हो, और अगर तुम दूसरों के साथ सहयोग करने की पहल कर सकते हो, अकसर अपना दिल खोलकर दूसरों से परामर्श करते हो और उनकी सलाह लेते हो, और अगर तुम दूसरों के सुझाव अपना सकते हो और उनके विचार और शब्द ध्यान से सुन सकते हो, तो तुम सही रास्ते पर, सही दिशा में जा रहे हो। अपने को दूसरों से बेहतर समझना बंद करो और अपना खिताब एक तरफ रख दो। इन चीजों पर ध्यान मत दो, इन्हें जरा भी महत्वपूर्ण मत समझो, और इन्हें हैसियत के निशान के रूप में, प्रतिष्ठा के रूप में मत देखो। अपने दिल में विश्वास करो कि तुम और अन्य समान हैं; अपने आप को दूसरों के साथ बराबरी पर रखना सीखो, यहाँ तक कि दूसरों से उनकी राय माँगने के लिए झुकने में भी सक्षम हो जाओ। दूसरों की बातें गंभीरता से, सावधानी से और ध्यानपूर्वक सुनने में सक्षम हो जाओ। इस तरह तुम अपने और दूसरों के बीच शांतिपूर्ण सहयोग उत्पन्न कर लोगे। तो शांतिपूर्ण सहयोग कौन-सा काम करता है? यह वास्तव में बहुत बड़ा काम करता है। इससे तुम उन चीजों से लाभ ले सकते हो, जिन्हें दूसरों ने देखा है पर तुमने अभी तक नहीं देखा, जिन्हें दूसरों ने समझा है पर तुमने अभी तक नहीं समझा, और तुम दूसरों की ताकत और गुणों का पता लगा सकते हो। और एक बात और भी है : तुम्हारी धारणाओं में मौजूद पहलू, जहाँ तुम दूसरों को मंदबुद्धि, मूर्ख, मूढ़, अपने से कमतर समझते हो—जब तुम दूसरों के सुझाव सुनते हो, या जब दूसरे तुमसे बात करने के लिए अपना दिल खोलते हैं, तो तुम अनजाने ही यह महसूस करने लगते हो कि कोई भी भोंदू नहीं है, कि हर किसी के पास, चाहे वह कोई भी हो, कुछ महत्वपूर्ण विचार होते हैं। यह तुम्हें स्वयं को चतुर समझने या श्रेष्ठ महसूस करने से रोकता है। यह तुम्हें हमेशा एक आत्म-मुग्धता, आत्म-प्रशंसा की स्थिति में रहने से रोकता है। यह तुम्हारी रक्षा करता है, है ना?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (भाग एक)' से उद्धृत

कई बार, अपना कर्तव्य पूरा करने में सहयोग करते समय, दो लोगों में सिद्धांत की बात को लेकर विवाद हो जाता है। उनके दृष्टिकोण अलग-अलग हैं और उनकी राय भी अलग-अलग हो गयी है। ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता है? क्या ऐसी स्थिति बार-बार आती है? यह सामान्य घटना है जो लोगों के विचारों, क्षमताओं, अंतर्दृष्टियों, आयु और अनुभवों में भिन्नताओं से उत्पन्न होती है। दो लोगों के मन में बिलकुल एक ही बात का होना असंभव है, इसलिए दो लोगों का अपनी राय और दृष्टिकोण में भिन्न हो सकना बहुत सामान्य घटना है और ऐसा अकसर होता है। इसे लेकर खुद को उलझाओ मत। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब ऐसी समस्या पैदा होती है, तब तुम्हें परमेश्वर के समक्ष एकता और मतैक्य प्राप्त करने के लिए सहयोग और चेष्टा कैसे करनी चाहिए। मतैक्य प्राप्त करने का लक्ष्य क्या है? इसका मकसद इस संबंध में सत्य के सिद्धांतों की खोज करना, और अपने या किसी अन्य के अभिप्रायों के अनुसार कार्य नहीं करना है, बल्कि साथ मिलकर परमेश्वर के अभिप्रायों की खोज करना है। यही सामंजस्यपूर्ण सहयोग प्राप्त करने का मार्ग है। जब तुम परमेश्वर के अभिप्रायों और उसके द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों की खोज करोगे, केवल तभी तुम एकता प्राप्त कर पाओगे। वरना, अगर यह तुम्हारे हिसाब से हुआ, तो दूसरा व्यक्ति असंतुष्ट हो जाएगा। अगर चीजें दूसरों के हिसाब से हुईं, तो तुम नाखुश और निराश महसूस करोगे। तुम इसे स्पष्ट रूप से देख नहीं सकते और तुम इसे जाने नहीं दे सकते। "चीजें इस तरह से करें तो कैसा रहेगा? क्या यह उपयुक्त है?" तुम अंदर से सहज नहीं होते, और तुम्हें लगता है कि अगर तुम इसके लिए नहीं लड़ते, तो तुम परमेश्वर के सामने चीजों का हिसाब नहीं दे पाओगे, लेकिन अगर तुम इसके लिए लड़ते हो, तो तुम महसूस करोगे, "क्या यह सिर्फ अपने लिए खुद को आगे रखना है? क्या यह अपनी प्रतिष्ठा के लिए, अपनी हैसियत के लिए संघर्ष करना है?" दोनों में से कोई भी तुम्हें उपयुक्त नहीं लगता है। न यह सही लगता है और न वह। क्या तब एकता प्राप्त की जा सकती है? इस तरह की स्थिति में तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम्हें तलाश करना चाहिए कि सिद्धांत क्या है, और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक क्या है। जब तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक पा लेते हो, तो तुम उस व्यक्ति के साथ संगति करते हो। यह सुनने के बाद वह कहता है, "हाँ, मेरी राय गलत थी।" तुम इस पर विचार करते हो और सोचते हो, "मेरी राय भी उतनी अच्छी नहीं थी। वह थोड़ी गलत थी, थोड़ी उथली थी। उसका विचार बेहतर और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक के करीब था। अगर उसमें कुछ जोड़ दिया जाए और उसे थोड़ा समायोजित कर दिया जाए, तो वह मूल रूप से अच्छा है। मैं अपनी राय एक तरफ रख दूँगा और उसे मानूँगा। हमें उसके विचार के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए, और भविष्य में मुझे उससे, उसके उस तरीके से कुछ चीजें सीखनी चाहिए।" क्या तब तुम पर कृपा नहीं हुई? उसने थोड़ा दिया, और क्या तुम्हें उससे लाभ नहीं हुआ? तुम्हें बनी-बनाई चीज मिल गई। इसे ही परमेश्वर का अनुग्रह कहा जाता है, और तुम पर कृपा की गई है। क्या तुम्हें लगता है कि कृपा तभी की जाती है, जब तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है? संगति में तुम्हारे साथ साझा करने के लिए किसी और के पास कोई राय या कुछ प्रकाश है; या उसके सिद्धांत के अनुसार कुछ अभ्यास में लाया जाता है और किया जाता है, और तुम उसे देखते हो और सोचते हो कि यह बुरा नहीं है। क्या यह कुछ हासिल करना नहीं है? यह कुछ हासिल करना ही है। भाइयों और बहनों के बीच सहयोग अपने तुम में, एक की कमज़ोरियों की भरपाई दूसरे की शक्तियों से करने की प्रक्रिया है। तुम दूसरों की कमियों की भरपाई करने के लिए अपनी खूबियों का उपयोग करते हो और दूसरे तुम्हारी कमियों की भरपाई करने के लिए अपनी खूबियों का उपयोग करते हैं। यही दूसरों की खूबियों से अपनी कमज़ोरियों की भरपाई करने और सामंजस्य के साथ सहयोग करने का यही अर्थ है। सामंजस्य में सहयोग करके ही लोग परमेश्वर के समक्ष धन्य हो सकते हैं, व्यक्ति इसका जितना अधिक अनुभव करता है, उसमें उतनी ही अधिक व्यावहारिकता आती है, मार्ग उतना ही अधिक प्रकाशवान होता जाता है, इंसान और भी अधिक सहज हो जाता है। अगर तुम दूसरों के साथ हमेशा कलह में पड़ते हो, और कभी दूसरों की बात से सहमत नहीं होते, जो खुद भी कभी तुम्हारी बात सुनना नहीं चाहते हैं; अगर तुम दूसरों की गरिमा की रक्षा करने की कोशिश करते हो, फिर भी वे तुम्हारे लिए ऐसा नहीं करते हैं, जो तुम्हें असहनीय लगता है; अगर तुम उनकी कही बात पर उन्हें मुश्किल स्थिति में डाल देते हो, और वे इसे याद रखते हैं, और अगली बार जब कोई मुद्दा उठता है, तो वे भी तुम्हारे साथ वही सुलूक करते हैं—तो तुम जो कर रहे हो क्या उसे अपनी खूबियों से एक दूसरे की कमियों कमज़ोरियों की भरपाई करना और सामंजस्य में सहयोग करना कहा जा सकता है? इसे कलह, और गुस्सैल तथा भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार चलना कहा जाता है। इससे परमेश्वर का आशीष प्राप्त नहीं होगा; इससे वह प्रसन्न नहीं होता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सामंजस्‍यपूर्ण सहयोग के बारे में' से उद्धृत

जब तुम लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दूसरों के साथ समन्वय करते हो, तो क्या तुम अलग-अलग राय स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हो? क्या तुम दूसरों की राय स्वीकार कर पाते हो? (मैं पहले अपने ही विचारों से चिपका रहता था, लेकिन जब परमेश्वर ने ऐसी स्थितियों की व्यवस्था की जिसमें मुझे दूसरों के साथ काम करने का मौका मिला, तो मैंने देखा कि जब सभी लोग मिलजुल कर चीजों पर चर्चा करते हैं, तो आम तौर पर उसका परिणाम सही होता है, और कई बार तो ऐसा हुआ कि मेरा अपना ही दृष्टिकोण गलत था या उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। तब मुझे समझ में आया कि दूसरों के साथ सद्भावपूर्ण ढंग से काम करना कितना महत्वपूर्ण होता है।) तुमने इससे क्या सीखा? क्या तुम लोगों को लगता है कि कोई भी पूर्ण है? लोग चाहे जितने शक्तिशाली हों, या चाहे जितने सक्षम और प्रतिभाशाली हों, फिर भी वे पूर्ण नहीं हैं। लोगों को यह मानना चाहिए; यह तथ्य है। यह हर उस व्यक्ति का सबसे उपयुक्त रवैया भी है, जो अपनी शक्तियों और फायदों या दोषों को सही ढंग से देखता है; यह वह तार्किकता है जो लोगों के पास होनी चाहिए। ऐसी तार्किकता के साथ तुम अपनी शक्तियों और कमज़ोरियों के साथ-साथ दूसरों की शक्तियों और कमज़ोरियों से भी उचित ढंग से निपट सकते हो, और इसके बल पर तुम उनके साथ सौहार्दपूर्वक कार्य कर पाओगे। यदि तुम सत्य के इस पहलू से सन्नद्ध हो और इसकी वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो, तो तुम अपने भाइयों और बहनों के साथ सौहार्दपूर्वक रह सकते हो, एक-दूसरे की खूबियों का लाभ उठाकर अपनी किसी भी कमज़ोरी की भरपाई कर सकते हो। इस प्रकार, तुम चाहे जिस कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो या चाहे जो कार्य कर रहे हो, तुम सदैव उसमें श्रेष्ठतर होते जाओगे और परमेश्वर का आशीष प्राप्त करोगे। यदि तुम हमेशा सोचते हो कि तुम बहुत कुशल हो और दूसरे तुम्हारी तुलना में बदतर हैं, यदि तुम हमेशा अपनी राय को अंतिम राय मनवाना चाहते हो, तो इससे परेशानी होगी। हो सकता है कोई व्यक्ति सही बात कह रहा हो, लेकिन तुम्हें लगता है, "भले ही उसने जो कहा वह सही है, अगर मैं उसकी बात मान लूँ, तो दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मैं उसके जितना कुशल नहीं हूँ? मैं उससे सहमत नहीं हो सकता। मुझे कोई ऐसा रास्ता ढूँढना होगा जिससे कि दूसरों को पता न चले कि मैं उसकी सलाह मान रहा हूँ, लोगों को यही लगना चाहिए कि मैं उस काम को अपने तरीके से ही कर रहा हूँ; तब मेरे बारे में लोगों की राय अच्छी होगी।" यदि तुम हर समय लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार करोगे, तो क्या तुम इसे एक सामंजस्यपूर्ण सहयोग कह सकते हो? इसके दुष्प्रभाव क्या होंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोगों को तुम्हारी सच्चाई पता चल जाएगी। लोग कहेंगे कि तुम बहुत चालाक हो, तुम सत्य के अनुसार काम नहीं करते और तुम बेईमान हो। हर कोई तुमसे घृणा करेगा और तुम्हारी स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम्हें त्याग दिया जाएगा। परमेश्वर उस व्यक्ति को किस दृष्टि से देखता है जिसे हर कोई त्याग देता है? जिस व्यक्ति को हर कोई त्याग देता है, उसके बारे में परमेश्वर क्या सोचता है? परमेश्वर भी उससे घृणा करता है। वह ऐसे व्यक्ति से घृणा क्यों करता है? हो सकता है कि अपने कर्तव्य को पूरा करने के उसके प्रयास सच्चे हों, लेकिन यह किस तरह का दृष्टिकोण है? परमेश्वर को इससे घृणा है। ऐसे व्यक्ति ने परमेश्वर के सामने जिस तरह का स्वभाव प्रकट किया गया है, उससे परमेश्वर को उस व्यक्ति के दिल और दिमाग में जो कुछ है उससे और जो भी उसके इरादे हैं, उन सबसे घृणा हो जाती है; परमेश्वर को यह सब घिनौना और दुष्टतापूर्ण लगता है। अपने लक्ष्य को पाने और दूसरों की प्रशंसा प्राप्त करने के लिए बेहद अवांछनीय तरीकों और चालबाजियों का इस्तेमाल करने वाले व्यवहार से परमेश्वर को नफरत है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अभ्यास करके ही कोई सामान्य मानवता से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

तुम कौन-सा कर्तव्य निभा सकते हो? यह वह सब करना है जो तुम कर सकते हो। यदि तुम में थोड़ी-बहुत क्षमता है, तो कहो कि तुम क्या सोच रहे हो। और यदि किसी पेशे में तुम क्षमतावान हो, तो उन क्षमताओं का प्रयोग करो। यदि तुममें समझने की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक है, तो अपने विचारों को व्यक्त करो। शांतिपूर्ण सहयोग का यही अर्थ है, और इस तरह, तुम अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हो। यदि तुम हमेशा सब-कुछ खुद ही करने की कोशिश करते हो, हमेशा भीड़ से अलग दिखने की कोशिश करते हो, लेकिन दूसरों को ऐसा कभी नहीं करने देते, तो यह अपने कर्तव्य का निर्वहन करना नहीं है। इसे वर्चस्व कहा जाता है, यह खुद का दिखावा करना है, और यह शैतान का व्यवहार है। भले ही किसी में कोई विशेष योग्यता हो, हुनर या विशेष कौशल हो, लेकिन वह अकेले काम का बोझ उठाकर उसे पूरा नहीं कर सकता। सभी को शांतिपूर्ण तरीके से सहयोग करना सीखना चाहिए। इसके पीछे सिद्धांत क्या है? अगर तुम अपनी पूरी ताकत लगाते हो, पूरी निष्ठा दिखाते हो और जो कुछ कर सकते हो, वह सब करते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो। अपना कर्तव्य पूरा करने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हें अधिक से अधिक जिम्मेदारी उठाने की जरूरत है, न ही इसका यह मतलब है कि तुम थककर चूर-चूर हो जाओ, इसका मतलब तुम्हें कठिन परिस्थिति में डालना तो बिल्कुल नहीं है। तुम्हें शांतिपूर्ण तरीके से सहयोग करना सीखना चाहिए, जो कुछ तुम कर सकते हो उसे करना सीखना चाहिए, अपनी जिम्मेदारी को पूरा करना और अपनी पूरी ताकत लगाना सीखना चाहिए। इसी को कर्तव्य का निर्वहन कहते हैं। अपने कर्तव्य का निर्वहन करने का अर्थ है वह करना जो तुम कर सकते हैं। तुम जो कर सकते हो, करो और जो योगदान दे सकते हो दो–इतना करना काफी है। अप्रिय व्यक्ति मत बनो, ऐसे निरंकुश इंसान मत बनो जो अपने फल में दूसरों को सहभागी नहीं बनाते। हमेशा दूसरों से आगे निकलने की कोशिश मत करो। यदि तुम हमेशा असाधारण दिखना चाहते हुए कहते हो, "तुम लोग कहते हो कि हमें इसे इस तरह करना चाहिए, लेकिन मैं कहता हूँ इसे उस तरह करना चाहिए," तो क्या तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हो? यह अशांति पैदा करता है और दूसरों को नीचा दिखाता है। क्या सामान्य मानवता वाले व्यक्ति का व्यवहार अशांति पैदा करना और दूसरों को नीचा दिखाना होता है? यह शैतान की भूमिका अदा करना है, अपने कर्तव्य का निर्वहन करना नहीं है। इसलिए, जब तुम अशांति पैदा करते हो या विनाशकारी या निरंकुश रूप से कार्य करते हो, तो तुम कितना भी प्रयास करो, उसे परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। तुम्हारे द्वारा किया गया योगदान नगण्य और तुच्छ लग सकता है, लेकिन एक समय ऐसा भी आ सकता है जब तुम कुछ ऐसा कहो जिससे सभी को लाभ हो, या तुम कुछ ऐसा करो जो सभी को शांतिपूर्वक सहयोग करने में सक्षम बनाए और सभी मिलजुलकर कार्य क, एक साथ, एक दिशा में काम करें, उनकी राय और विचार एकजुट हों। हालाँकि यह भी हो सकता है कि किसी को याद ही न रहे कि यह तुम्हारा किया हुआ कार्य है, और शायद तुम्हें भी ऐसा महसूस न हो मानो तुमने कोई बहुत अधिक प्रयास किए हों, लेकिन परमेश्वर देखेगा कि तुम वह इंसान हो जो सत्य का अभ्यास करता है, जो सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है। परमेश्वर तुम्हारे इस कार्य को याद रखेगा। इसे कर्तव्य का निर्वहन करना कहते हैं। क्या कर्तव्य का निर्वहन करने में कोई कठिनाई आती है? वास्तव में, यह आसान है—बस अशांति पैदा मत करो या निरंकुशता से कार्य न करो। तुम्हें याद रखना चाहिए : कर्तव्य-निर्वहन का मतलब यह नहीं है कि सारे प्रयास तुम करो और सारा प्रबंधन अपने सिर पर ले लो। यह परमेश्वर का कार्य है और तुम उसमें केवल अपनी उस क्षमता का योगदान करते हो जो तुम्हारे पास है। तुम परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के एक हिस्से में भाग लेते हो या तुम एक छोटे-से क्षेत्र में एक क्षुद्र भूमिका निभाते हो। तुम्हारी बस इतनी-सी जिम्मेदारी और भूमिका है। यह कोई तुम्हारा व्यक्तिगत कार्य नहीं है, इसलिए कोई भी छोटी-बड़ी समस्या आने पर, तुम्हें सभी के साथ संवाद करना चाहिए। यदि तुम्हारे साथ कोई नहीं हो, तो तुम क्या करोगे? तुम्हें खोज करनी चाहिए, परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए। यह अभ्यास का मार्ग है। अगर हर कोई तुम्हारे साथ हो और तुम चाहते हो कि हर काम हमेशा तुम्हारे तरीके से हो, तो यह किस तरह का व्यवहार है? तुम अपने तरीके से अपने काम की योजना बनाते हो, तुम दूसरों को न तो सूचित करते हो और न ही किसी से अपने विचारों पर चर्चा करते हो; तुम न तो उन्हें किसी से साझा करते हो और न ही किसी को बताते हो, बल्कि उन्हें अपने तक ही सीमित रखते हो। और जब काम करने का समय आता है, तो तुम हमेशा अपने शानदार करतब से दूसरों को विस्मित करना चाहते हो, सभी को आश्चर्यचकित कर देना चाहते हो ताकि वे तुम्हारा सम्मान करें। क्या यह अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है? यह अपना प्रबंधन खुद करना है—अपने ओहदे का प्रबंधन करना है, अपनी शक्ति और प्रभाव को बढ़ाना है। अन्यथा, तुम किसी को यह क्यों नहीं बताते कि तुम क्या कर रहे हो? चूँकि यह कार्य अकेले तुम्हारा नहीं है, तुम उसे बिना किसी से चर्चा किए क्यों करोगे और अपने आप निर्णय कैसे लोगे? तुम गुप्त रूप से सारी जानकारी छिपाकर काम क्यों करोगे, जिससे कि किसी को उसके बारे में पता न चले? तुम हमेशा ऐसी कोशिश क्यों करते हो कि सबका ध्यान सिर्फ तुम्हारी ओर ही हो? जाहिर है कि तुम इसे अपना निजी कार्य समझते हो। तुम मालिक हो और बाकी सब कार्यकर्ता हैं—वे सभी तुम्हारे लिए काम करते हैं। क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? क्या इस प्रकार का व्यक्ति शैतान के स्वभाव को प्रकट नहीं करता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'उचित कर्तव्यपालन के लिए आवश्यक है सामंजस्यपूर्ण सहयोग' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय, तुम्हें अपने भाइयों और बहनों के साथ तालमेल बिठाकर काम करने में, उनके साथ खुले तौर पर सहभागिता करने में, सब कुछ खुलकर प्रकट करने में, खुले तौर पर, सार्वजनिक रूप से और ईमानदारी से संवाद करने में, और स्पष्ट रूप से बातचीत करने में, स्वयं को प्रशिक्षित करना चाहिए। तब हर कोई काम को बाँट लेता है और सहयोग करता है, सब मिल-झुलकर काम करते हैं। अगर कुछ ऐसा हो जो फिर भी समझ में न आता हो, तो सभी को आपस में मिलकर सहभागिता करनी चाहिए। जो समझ सकते हैं, उन्हें बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी समझ पर सहभागिता करनी चाहिए, और जिस किसी को प्रबोधन की रोशनी मिली है, उसे तुरंत इस बारे में दूसरों बताना चाहिए। जब अन्य लोग अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हों, तब यदि तुम उन्हें अधिक सहायता और समर्थन देने में सक्षम हो, तो तुम्हें ऐसा करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, और कोई संकोच नहीं करना चाहिए। तुच्छ लड़कियाँ क्या सोचने लगती हैं? "मुझे यह पता तो है, लेकिन मैं तुम्हें नहीं बताऊँगी।" "यदि तुम मुझे नहीं बताओगी, तो मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगी।" तुच्छ लड़कियाँ इस तरह सोचती हैं—वे ओछी होती हैं, और बहुत डरती हैं कि दूसरे उनसे बेहतर हो जाएँगे। सामान्य मानवता वाले किसी व्यक्ति के अंदर ऐसी सोच नहीं होनी चाहिए। यह सामान्य मानवता या सकारात्मक बात नहीं है; यह एक भ्रष्ट स्वभाव है। ये सभी चीज़ें जो स्वार्थी, ओछी, धोखेबाज, अस्पष्ट, गन्दी, और शर्मनाक होती हैं, सकारात्मक चीज़ें नहीं होती हैं; वे सभी नकारात्मक चीज़ें होती हैं। इसलिए तुम लोगों को इन चीज़ों को छोड़ना सीखना चाहिए। तुम्हें इन चीज़ों को तुम्हें नियंत्रित या विवश करने, या अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए; तुम्हें उन्हें तोड़कर उनसे परे जाना होगा और एक ऐसा व्यक्ति बनने का यत्न करना होगा जिसके अंदर सत्य हो, और जो प्रकाश में जीता हो। ईमानदारी, खुलापन, निष्ठा, (रखना और) सहिष्णु, धैर्यवान, और विनम्र होने की क्षमता (रखना); दूसरों की कद्र करना सीखना, दूसरों की मदद करने में खुशी पाना सीखना, अच्छे कर्म करना और एक अच्छा दिल रखना—ये सभी सकारात्मक बातें हैं। जहाँ तक उन नकारात्मक चीज़ों की बात है, एक बार जब तुम्हें पता चले कि तुम्हारे अंदर ऐसे विचार या ख़याल हैं, या तुम ऐसी स्थितियों में हो, तो तुम्हें उन्हें छोड़ देना और त्याग देना सीखना होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो वे चीज़ें तुम्हें नियंत्रित करेंगी, और एक बार जब वे तुम्हें नियंत्रण में ले लेंगी, तो तुम ऐसे काम करने लगोगे—और फिर, तुम हमेशा के लिए एक कठपुतली बनकर रह जाओगे, अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के गुलाम और उसके द्वारा नियंत्रित होकर तुम कभी भी सत्य को हासिल नहीं कर पाओगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले यह पहचानना होगा कि उनके अंदर किस तरह के भ्रष्ट स्वभाव हैं, वे उन भ्रष्ट स्वभावों को कैसे व्यक्त करते हैं, उनके विचार क्या हैं, उनके ख़याल क्या हैं, और वे कौन-सी ऐसी स्थितियों में हैं जो सत्य से मेल नहीं खाती हैं। उन्हें इन नकारात्मक, निष्क्रिय चीजों को खुले में लाकर उन्हें पहचानना चाहिए, और फिर उन्हें एक-एक कर कैसे त्याग दें यह सीख कर उन्हें हल करना चाहिए, उन्हें तोड़ना और छोड़ना चाहिए। उन्हें दूसरों के साथ अपने व्यवहार में, कर्तव्यों और अपने जीवन में होने वाली हर एक बात के प्रति अपने दृष्टिकोण में, सत्य का उपयोग करना सीखना चाहिए, और उन्हें सत्य के अनुसार बोलना और कार्य करना सीखना चाहिए। इस तरह, थोड़ा-थोड़ा करके, लोग मानवीय सदृशता के अधिकारी होने लगेंगे; वे अपने कर्तव्यों को निभाने में बेहतर, होते जाएँगे, और हर कोई ज्यादा से ज्यादा मिल-जुलकर काम करेगा और सभी निरंतर एकजुट होते जाएँगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें' से उद्धृत

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