87. अगुवाओं के काम के साथ सहयोग करने के सिद्धांत

(1) अगर अगुवा या कार्यकर्ता उच्च से आने वाली कार्य-व्यवस्था के अनुसार काम कर सकते हैं, और समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करते हैं, तो उन्हें स्वीकार करना चाहिए और उनके प्रति आज्ञापालन किया जाना चाहिए।

(2) जब अगुवा या कार्यकर्ता अपने काम के दौरान कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन्हें मदद और समर्थन देना चाहिए, और एकजुट मन और आत्मा से परमेश्वर के घर के काम की रक्षा करनी चाहिए।

(3) कोई अगुवा या कार्यकर्ता जब काम की व्यवस्था का उल्लंघन और अपनी मनमानी कर रहा हो, तो यह पहचानने में व्यक्ति को सक्षम होना चाहिए। आँखें मूँद कर उनकी बातें न मान लो, बल्कि प्रेमपूर्ण सहभागिता से उनका मार्ग बदलो।

(4) यदि किसी अगुवा या कार्यकर्ता को बुरे लोगों द्वारा फंसाया और उस पर हमला किया जाता है, तो किसी को खड़े होकर उन लोगों का पर्दाफाश करना चाहिए, परमेश्वर के घर के काम की सुरक्षा और अगुवा या कार्यकर्ता की रक्षा करनी चाहिए।

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

परमेश्वर के घर में सभी अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कलीसिया के भीतर से ही चुना गया है। उन लोगों ने कलीसिया की अगुआई और सिंचन के साथ सुसमाचार के प्रचार का भार अपने कंधों पर उठाया है। परमेश्वर के घर में जिस कर्तव्य का वे निर्वहन करते हैं वह परमेश्वर द्वारा उनको सौंपे गए कार्य को पूरा करना भी है, ताकि परमेश्वर की इच्छा पूरी की जा सके। हर किसी को उनके कार्य में सहयोग और समर्थन देना चाहिए। अगर उनमें कुछ खामियां पाई जाती हैं या वे अपने कार्य से भटक जाते हैं, तो उनके साथ सहभागिता करके उनकी मदद की जानी चाहिए; या फिर उनकी कांट-छांट करके निपटारा किया जाना चाहिए। किसी को भी उनके प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया बिल्कुल नहीं अपनाना चाहिए। हालांकि, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ सही बर्ताव नहीं कर पाते। वे उनमें दोष ढूंढते हैं, उन्हें नीचा दिखाते हैं, बेरुखी से बातें करते हैं, उनको दरकिनार करते हैं और उन पर हमले भी करते हैं। इससे उनका अहंकारी स्वभाव उजागर होता है। कुछ ऐसे लोग हैं जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं के प्रति अपने रवैये में अस्वीकृति और शत्रुता का भाव भी रखते हैं। इस तरह की तरकीबें परमेश्वर के कार्य में रुकावट डालती हैं, ये परमेश्वर का विरोध करने और उसे धोखा देने वाले व्यवहार हैं। यह विशुद्ध रूप से दुष्टता करना है। परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को इस तरह के व्यक्ति के तौर-तरीकों को पहचानना चाहिए; वे बहुत अधिक अहंकारी होते हैं। अपना कर्तव्य निभाते हुए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा कुछ अशुद्धता या थोड़ा-बहुत भ्रष्ट स्वभाव उजागर करना अपरिहार्य है। यह एक बिल्कुल सामान्य बात है। अगर उनका कार्य कलीसिया के कार्य के लिए फायदेमंद है, अगर यह दूसरे भाई-बहनों के लिए फायदेमंद और शिक्षाप्रद है, तो जिस किसी के भी पास चेतना और समझ है, उसे उनका सहयोग और समर्थन करना चाहिए। अगर अगुआ और कार्यकर्ता ऐसे काम करते हैं जिससे परमेश्वर के घर के कार्य को कोई फायदा नहीं होता है या वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तो हमें सत्य के बारे में उनके साथ सहभागिता करनी चाहिए, ताकि वे इस तरह का बर्ताव करना छोड़ दें। यह परमेश्वर के कार्य को कायम रखना है, यह उनके प्रति स्नेहशील और मददगार दोनों होना है। यही रवैया अगुआओं और कार्यकर्ताओं के प्रति अपनाया जाना चाहिए। एक तरफ, हम सहयोग और समर्थन देते हैं, और दूसरी तरफ, हम सत्य के बारे में सहभागिता करके समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। यह सभी के लिए फायदेमंद है और सिर्फ़ इसी तरह का बर्ताव परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। सभी लोगों को अगुआओं और कार्यकर्ताओं के प्रति ईमानदार रवैया अपनाना चाहिए; परमेश्वर की इच्छा पर ध्यान देना चाहिए और उसके कार्य को कायम रखना चाहिए। पहले के किसी भी गलत रवैये या दृष्टिकोण का तुरंत समाधान और सुधार किया जाना चाहिए; परमेश्वर के कार्य में रुकावट नहीं आनी चाहिए और उसकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों को इस सिद्धांत पर अमल करना चाहिए।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को पहचानने और उनके साथ काम करने के लिए कौनसा तरीका अपनाना चाहिए? इस सवाल को समझना दरअसल बहुत आसान है। अगर वे जो कुछ करते हैं उससे सचमुच परमेश्वर के चुने हुए लोगों को आपूर्ति मिल सकती है, अगर वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य का इस्तेमाल कर सकते हैं, और परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश करने में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई कर सकते हैं, तो ऐसे अगुआ या कार्यकर्ता को परमेश्वर द्वारा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में मान्यता और स्वीकृति प्राप्त होती है जो सचमुच उसकी सेवा करता है। ऐसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास निश्चित रूप से पवित्र आत्मा का कार्य होता है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन्हें कायम रखना चाहिए, उनका सहयोग करना चाहिए और उनके साथ मिलकर काम करना चाहिए। जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन के लिए पोषण नहीं देते हैं, जो सत्य को समझने या वास्तविकता में प्रवेश करने में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई नहीं कर सकते हैं, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा सत्य के अनुसरण में रुकावट डालते रहते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धोखा देते रहते हैं, ताकि वे उनका अनुसरण करें और उनकी आज्ञा का पालन करें, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दबाते और नुकसान पहुंचाते रहते हैं, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीने या मरने की परवाह नहीं करते हैं, वे सभी झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी हैं, जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है। परमेश्वर ऐसे लोगों से नफरत और घृणा करता है, यही कारण है कि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है। यह पूरी तरह से इस बात की पुष्टि करता है कि परमेश्वर ऐसे लोगों को उसकी सेवा करने वाले लोगों के तौर पर मान्यता नहीं देता है। परमेश्वर इन कुकर्मियों को स्वीकार नहीं करता है, इसलिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उनसे नफरत करनी चाहिए, उन्हें उजागर करना चाहिए, उन्हें उनके पदों से बर्खास्त करना चाहिए और उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। ऐसा करना पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। झूठे अगुआओं, झूठे कार्यकर्ताओं और मसीह-विरोधियों की इस तरीके से पहचान करना और उनसे निपटना पूरी तरह से सत्य के अनुरूप है और बिल्कुल सही है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कलीसिया में सभी स्तरों पर अगुआ और कार्यकर्ता परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सिंचन और पोषण देने तथा सत्य वास्तविकता में उनकी अगुआई करने के लिए जिम्मेदार हैं। अगर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के काम सत्य सिद्धांत के अनुरूप हैं और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए फायदेमंद हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उन्हें कायम रखना, उनका सहयोग करना और उनके साथ मिलकर काम करना चाहिए—सिर्फ़ यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। अगर किसी व्यक्ति में निजी पूर्वाग्रह होने के कारण, वह अड़ियल बनकर दूसरे को किसी एक उल्लंघन के कारण या कोई एक भ्रष्टता उजागर होने पर ही झूठा अगुआ या झूठा कार्यकर्ता बताने लगता है, या वह तथ्यों से उलट बात करता है, निराधार आरोप लगाता है, दूसरे व्यक्ति को साजिश में फंसाने की कोशिश करता है और मनमाने ढंग से उसे तकलीफ़ देता है, तो क्या वह शैतान और राक्षसों का साथ देने वाला दुष्ट व्यक्ति नहीं है? जो लोग सत्य को समझते हैं उन्हें तथ्यों के अनुसार बात करनी चाहिए, और इससे भी बढ़कर, सत्य और परमेश्वर के वचनों के आधार पर अपना दृष्टिकोण बनाना चाहिए। अगर निजी पूर्वाग्रह के कारण, कोई व्यक्ति ऐसे अगुआ या कार्यकर्ता पर हमले करता है जो सत्य सिद्धांत के अनुसार काम करने पर जोर दे रहा है और न्याय की समझ रखता है, तो ऐसा व्यक्ति एक दुष्ट व्यक्ति है, जो परमेश्वर के घर के कार्य में रुकावट डालता है, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को तुरंत उसे रोकने के लिए कदम उठाना चाहिए और अगुआ या कार्यकर्ता की रक्षा करनी चाहिए। सिर्फ यही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना और परमेश्वर के कार्य को कायम रखना है। झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है; जबकि उन अच्छे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की रक्षा करना जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप काम करते हैं, और उन्हें शैतानी शक्तियों के जाल में फँसने से रोकना तो और भी अधिक परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाते समय, किसी अच्छे व्यक्ति के साथ कुछ भी बुरा नहीं होना चाहिए, न ही किसी दुष्ट व्यक्ति को छोड़ा जा सकता है। यही सत्य सिद्धांत के अनुसार काम करने का सही तरीका है। सिर्फ यही वास्तव में परमेश्वर के कार्य को कायम रखना है और इस तरह का व्यवहार परमेश्वर के चुने हुए लोगों के हित में है। एक अच्छा अगुआ, एक अच्छा कार्यकर्ता परमेश्वर के चुने हुए लोगों से प्रेम करेगा और उनकी रक्षा करेगा। इसलिए, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को भी अच्छे अगुआओं और अच्छे कार्यकर्ताओं से प्रेम करना चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों का बाध्यकारी कर्तव्य है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

जो भाई-बहन सत्य का अनुसरण करते हैं उन्हें परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को फैलाने में अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ एकमत होकर काम करना चाहिए, ताकि परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखने वाले ज्यादा से ज्यादा लोग उसके पास आ सकें और उसके कार्य को स्वीकार कर सकें। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करने में असमर्थ है, तो इसका मतलब है कि उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और वह कार्य करने के काबिल नहीं हैं। यह मत देखो कि कोई व्यक्ति परिपूर्ण है या नहीं, उसमें कौनसी कमजोरियां हैं या वह किस तरह की भ्रष्टता उजागर करता है। अगर वह सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है और परमेश्वर के कार्य को कायम रखता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होता है और समर्पण के साथ परमेश्वर की सेवा करता है। तुम्हें ऐसे व्यक्ति के साथ एकमत होना चाहिए, उसके साथ मिलकर काम और सेवा करनी चाहिए। लोगों को एक-दूसरे की कमियों की भरपाई करनी चाहिए; सत्य के बारे में सहभागिता करके वास्तविकता में प्रवेश करने में एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए और धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव को खत्म कर देना चाहिए। एकमत होना जरूरी है! एक लक्ष्य और एक दिशा होने और परमेश्वर की आज्ञा पूरी करने के लिए एकमत होने से, कलीसिया की गवाही को प्रमुखता मिलेगी। शैतानी शत्रु शक्तियां चाहे जैसी भी हों, जब वे ऐसे गिने-चुने लोगों को कलीसिया में देखती हैं जो इस तरह से एकमत हैं, जो परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं और गवाही दे रहे हैं, तो वे पूरी तरह से शर्मिंदा होंगी। जब कोई कलीसिया में ऐसे लोगों को देखता है जो एक जैसा सोचते हैं और वह हमेशा उनके काम में रुकावट डालना और उन्हें तोड़ना चाहता है, और खुद ही मुख्य व्यक्ति बन जाता है, तो वह किस तरह का व्यक्ति है? वह शैतान का प्यादा, बड़े लाल अजगर का सेवक और शैतान का साथी है। वास्तव में समझदार व्यक्ति सत्य का अनुसरण करने वालों के साथ खड़ा होगा, उनसे जुड़कर उनके प्रयासों में साथ देगा। अतीत में ऐसे समझदार व्यक्ति के साथ किसी ने चाहे कैसा भी बर्ताव किया हो, उसकी निजी शिकायतें जो भी रही हों या उसे कैसी भी गलतफहमी रही हो, वह अपने पूर्वाग्रह को छोड़कर एक दिल और एक दिमाग से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करेगा और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होगा। इस तरह का व्यक्ति वह व्यक्ति है जो परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखता है और उसके कार्य के प्रति आज्ञाकारी होता है। अगर किसी व्यक्ति में इस तरह का संकल्प है और वह इस तरीके से बर्ताव करने में सक्षम है, तो इससे पता चलता है कि उसमें चेतना, समझ और इंसानियत है। इसलिए, अगर किसी कलीसिया में कुछ ऐसे भाई-बहन और ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता हैं जिनका दिल और दिमाग एक जैसा है, जो एकजुट हैं, तो इससे पता चलता है कि उन भाई-बहनों में सत्य है, उनके पास आध्यात्मिक कद है और उन्होंने वास्तविकता में प्रवेश करना शुरू कर दिया है। अगर कोई व्यक्ति व्यवधान पैदा करने लगता है, तो लोगों को क्या करना चाहिए? सबसे पहले, हमें शैतान की कुटिल साजिशों को समझना चाहिए और फिर दुष्ट व्यक्ति की कांट-छांट और उसका निपटारा करना चाहिए, उसे उजागर करना चाहिए और फटकार लगानी चाहिए; इसके बाद यह देखना चाहिए कि उसमें पश्चाताप करने की कोई इच्छा है या नहीं। अगर वह पश्चाताप नहीं करता है और चाहे उसके साथ सत्य के बारे में कितनी भी सहभागिता की जाए, वह आज्ञापालन का कोई संकेत नहीं दिखाता है, तो ऐसे व्यक्ति को अस्वीकार करके हटा दिया जाना चाहिए।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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