3. परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, केवल उनके शाब्दिक अर्थ को समझने पर ध्यान न दो। व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों में निहित उसकी इच्छा और उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए;

(2) परमेश्वर के वचनों को मानवीय स्थितियों और स्वयं की समस्याओं के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के वचन मनुष्य की भ्रष्टता और कमियों से सटीक बात करते हैं;

(3) व्यक्ति के लिए अपने मानवीय स्थान पर दृढ़ रहना और सृष्टिकर्ता के प्रति पूर्ण समर्पण की एक मानसिकता के भीतर से परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करना, आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई परमेश्वर का प्रबोधन प्राप्त कर सकता है;

(4) यह विश्वास करना कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, और स्पष्ट रूप से यह देखना कि मनुष्य की सबसे बड़ी कमी सारतः यही है कि उसके पास सत्य नहीं होता है, आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई सत्य की तलाश, और उसे स्वीकार, कर सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर का वचन क्या होता है? यह सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता है, यही सत्य, मार्ग और वो जीवन है जो परमेश्वर इंसान को प्रदान करता है। परमेश्वर के वचन सिद्धांत, प्रचार-वाक्य, या तर्क नहीं होते, न ही वे किसी तरह का दर्शन या ज्ञान होते हैं। बल्कि, उनका सरोकार इंसान के जीवन और उसके अस्तित्व से, उसके आचरण और स्वभाव से, हर उस बात से जो इंसान प्रकट करता है, और उन ख़यालों और मतों से होता है जो इंसान के दिल में पैदा होते हैं और उसके दिमाग में रहते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के बारे में तुम्हारा चिंतन इन सब चीज़ों से विच्छिन्न है, और यदि तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, और उपदेशों तथा सहभागिता को सुनते समय, स्वयं उनसे विलग रहते हो, तो जो तुम समझ पाते हो, वह सतही और सीमित होगा। तुम लोगों को यह सीखना होगा कि परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कैसे करें। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने के कई तरीके हैं : तुम उन्हें मौन रहकर पढ़ सकते हो और पवित्र आत्मा से प्रबोधन और प्रकाश चाहते हुए अपने दिल में प्रार्थना कर सकते हो; जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, उनकी संगति में तुम सहभागिता भी कर सकते हो और प्रार्थनापूर्वक पढ़ सकते हो; और यकीनन तुम परमेश्वर के वचनों की अपनी समझ और सराहना को गहनतर बनाने के लिए अपने चिंतन में सहभागिताओं और उपदेशों को समाहित कर सकते हो। इसके अनेक और भिन्न-भिन्न तरीके हैं। संक्षेप में, यदि परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से कोई उन वचनों की और सत्य की समझ चाहता हो, तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर के वचनों पर चिंतन किया जाए और उन्हें प्रार्थनापूर्वक पढ़ा जाए। परमेश्वर के वचनों को प्रार्थनापूर्वक पढने का उद्देश्य उनका व्याख्यान करना नहीं, न ही उन्हें कंठस्थ करना है; बल्कि उन वचनों को प्रार्थनापूर्वक पढ़कर और उन पर चिंतन करके उनकी एक सटीक समझ हासिल करना और परमेश्वर द्वारा कथित इन वचनों के अर्थ और साथ ही उसके इरादे को जानना है। यह उन वचनों में अभ्यास का एक मार्ग पा लेना है, और स्वयं को मनमानी करने से रोकना है। साथ ही, यह परमेश्वर के वचनों में उजागर की गई सभी तरह की स्थितियों और लोगों के बीच भेद करने में सक्षम होना है, ताकि अभ्यास का एक ऐसा सटीक मार्ग पाया जा सके जिसके माध्यम से हर तरह के व्यक्ति के साथ व्यवहार किया जा सके। इसके साथ ही, यह भटकने से और उस राह पर कदम रखने से बचने के लिए है, जिससे परमेश्वर घृणा करता है। एक बार जब तुम परमेश्वर के वचनों को प्रार्थनापूर्वक पढ़ना और उन पर चिंतन करना जान लेते हो, और इसे प्रायः करते हो, केवल तभी परमेश्वर के वचन तुम्हारे दिल में जड़ें जमा सकेंगे और तुम्हारा जीवन बन सकेंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (11)' से उद्धृत

अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले सत्य को समझना होगा, और सत्य को खोजने की और ज्यादा कोशिश करनी होगी। सत्य की खोज का एक महत्वपूर्ण अंग है परमेश्वर के वचनों पर सोच-विचार करना सीखना। परमेश्वर के वचनों पर इस सोच-विचार का उद्देश्य इन वचनों के सच्चे अर्थ को समझना है; अपनी खोज के माध्यम से तुम परमेश्वर के कथनों के अर्थ को समझने लगोगे, इन वचनों में उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, उसकी क्या इच्छा है—सत्य की वास्तविकता को समझने का यही अर्थ है। एक बार सत्य की वास्तविकता को समझ लेने के बाद तुम अभ्यास के सिद्धांतों को समझने में सक्षम हो जाओगे, और इस तरह तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे। इसी तरह से, और इसका अहसास किए बिना, तुम उन मामलों में प्रबुद्धता प्राप्त कर लोगे जिन्हें तुम पहले समझते नहीं थे, तुम एक नई अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लोगे, और फिर धीरे-धीरे ये तुम्हारी वास्तविकता बन जाएंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है' से उद्धृत

यदि तुम सत्य खोजना चाहते हो, सत्य को समझना और पाना चाहते हो, तो तुम्हें सीखना होगा कि परमेश्वर के सामने शांत कैसे होना है, सत्य पर चिंतन कैसे करना है और परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कैसे करना है। क्या सत्य पर चिंतन करने की कोई औपचारिकताएँ हैं, जिनका पालन करना होता है? क्या कोई नियम हैं? क्या कोई समय-सीमाएं हैं? क्या यह किसी स्थान-विशेष पर करना होता है? नहीं—परमेश्वर के वचनों पर किसी भी समय और स्थान पर चिंतन किया जा सकता है। अगर तुम लोग अपने खोखले विचारों और काल्पनिक उड़ानों पर समय न गँवाकर, सत्य के चिंतन में लगाओ, तो दिन भर में तुम्हारा कितना समय व्यर्थ होने से बच जाएगा? जब लोग समय गँवाते हैं तो वो क्या करते हैं? वे लोग पूरा दिन बातचीत और गप्पें लगाने में खराब कर देते हैं, अपनी रुचि का काम करते हैं, व्यर्थ के कामों में लिप्त रहते हैं, जो गुज़रे ज़माने की निरर्थक बातों पर ही सोच-विचार करते रहते हैं, इन्हीं ख्यालों में डूबे रहते हैं कि कल क्या होगा, भविष्य का राज्य कहाँ होगा, नरक कहाँ है—क्या यह सब निरर्थक बातें नहीं हैं? अगर इस समय को सकारात्मक चीज़ों पर लगाया जाए—अगर तुम परमेश्वर के सामने शांत हो जाओ, परमेश्वर के वचनों पर अधिक चिंतन करो, सत्य पर संगति करो, अपने हर क्रिया-कलाप पर मंथन करो, जाँच के लिए उन्हें परमेश्वर के सामने रखो और यह देखो कि क्या कोई ऐसे बड़े मामले हैं, जिन्हें तुम सुलझा या समझ नहीं पाए, विशेषकर ऐसे गंभीर क्षेत्र जहाँ तुम परमेश्वर के प्रति सबसे ज़्यादा विद्रोही हो और उन्हें सुलझाने के लिए उनके तद्नुरूप वचन खोज रहे हो, तो तुम धीरे-धीरे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे।

परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने में क्या शामिल है? इसमें तथा-कथित आध्यात्मिक शब्दों और सिद्धांतों को, जिन्हें तुम लोग बोलते रहते हो और जिन आध्यात्मिक सिद्धांतों को तुम सही मानकर अक्सर अभ्यास करते रहते हो और प्रार्थना में पढ़ते हो, उन सबको समेटना शामिल है: “मैं इन आध्यात्मिक वाक्याँशों और पारिभाषिक शब्दावली के सिद्धांतों के बारे में स्पष्ट हूँ, मैं उनके शाब्दिक अर्थ को अच्छी तरह समझता हूँ, लेकिन उनकी वास्तविकता का क्या? उन्हें अमल में कैसे लाऊँ?” इस तरह से परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करना है; इस पहलू से शुरू करो। परमेश्वर में विश्वास रखते समय, अगर लोगों को उसके वचनों पर चिंतन करना नहीं आता, तो उन्हें सत्य में प्रवेश करने और उसे समझने में बड़ी मुश्किल होगी। अगर लोग सत्य न समझ पाएँ, तो क्या वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? अगर वे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश न कर पाएँ, तो क्या वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं? अगर लोग न तो सत्य प्राप्त कर पाएँ और न ही सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर पाएँ, तो क्या वे परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सकते हैं? ऐसा करना बहुत मुश्किल होगा। उदाहरण के लिए, अक्सर दोहराए गए इन वचनों को लो “परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो,”: तुम्हें इन वचनों पर विचार करके अपने आपसे कहना चाहिए, “परमेश्वर का भय मानना क्या है? अगर मैं कुछ गलत बोल दूँ, तो यह परमेश्वर का भय मानना है या नहीं? ऐसा बोलना बुरा काम करना है या अच्छा काम करना? क्या परमेश्वर इसे याद रखता है? क्या परमेश्वर इसकी निंदा करता है? कौन-सी चीज़ें बुरी हैं? मेरे विचार, अभिप्रेरणाएँ, सोच, दृष्टिकोण, प्रोत्साहन तथा जो बातें मैं कहता हूँ और जो काम मैं करता हूँ, उनका मूल और मेरे विभिन्न स्वभावों का प्रकटन—क्या ये सब चीज़ें बुरी मानी जाती हैं? परमेश्वर इनमें से किन बातों की अनुमति देता है? परमेश्वर को किन बातों से घृणा है? परमेश्वर किन कामों की निंदा करता है? ऐसे कौन-से मामले हैं जिनमें मैं भयंकर भूल कर सकता हूँ?” ये सब विचारणीय प्रश्न हैं। क्या तुम लोग नियमित रूप से सत्य पर चिंतन करते हो? तुम लोग कितना समय व्यर्थ गँवा चुके हो? तुम लोगों ने सत्य से जुड़े, परमेश्वर में आस्था से जुड़े, जीवन-प्रवेश से जुड़े, परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से जुड़े कितने मामलों पर विचार किया है? जब परमेश्वर के वचनों पर तुम्हारा चिंतन या परमेश्वर में आस्था से जुड़ा तुम्हारा चिंतन और सत्य फल प्रदान करने लगता है, तो तुम जीवन-प्रवेश पा लेते हो। तुम लोगों को अभी तक नहीं पता कि आज इन बातों पर चिंतन कैसे करना है और तुमने जीवन-प्रवेश भी हासिल नहीं किया है। जब कोई जीवन-प्रवेश हासिल कर लेता है और परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर पाता है और उन मामलों पर विचार करता है, तो वह सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना शुरू कर देता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है' से उद्धृत

इस पर ध्यान दिए बगैर कि तुमने सत्य की वास्तविकता के कौन से पहलू को सुना है, यदि तुम इसके विरुद्ध अपने आप को सँभालते हो, यदि तुम इन वचनों को अपने जीवन में कार्यान्वित करते हो, और उन्हें अपने स्वयं के अभ्यास में शामिल करते हो, तो तुम निश्चित रूप से कुछ हासिल करोगे, और निश्चित रूप से बदल जाओगे। यदि तुम इन वचनों को पेट में ठूँस लेते हो, और उन्हें अपने मस्तिष्क में याद कर लेते हो, तो तुम कभी भी नहीं बदलोगे। उपदेश सुनते समय, तुम्हें इस प्रकार विचार करना चाहिए : "ये वचन किस प्रकार की अवस्था का उल्लेख कर रहे हैं? ये सार के किस पहलू का उल्लेख कर रहे हैं? सत्य के इस पहलू को मुझे किन मामलों में लागू करना चाहिए? जब भी मैं सत्य के इस पहलू से संबंधित कुछ कार्य करता हूँ, तो क्या मैं सत्य के अनुसार अभ्यास कर रहा होता हूँ? और जब मैं इसका अभ्यास कर रहा होता हूँ, तो क्या मेरी अवस्था इन वचनों के अनुसार होती है? अगर नहीं है, तो क्या मुझे खोज, संगति या प्रतीक्षा करनी चाहिए?" क्या तुम अपने जीवन में इस तरीके से अभ्यास करते हो? अगर नहीं करते, तो तुम्हारा जीवन परमेश्वरविहीन और सत्य से रहित है। तुम शब्दों और सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीते हो या अपने हितों, विश्वास और उत्साह के अनुसार जीवन जीते हो। जिन लोगों में वास्तविकता के रूप में सत्य नहीं है, उनमें कोई वास्तविकता नहीं है और जिन लोगों में अपनी वास्तविकता के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं किया है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच : "मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।" यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तू उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, तो एक बार इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो जाने पर, यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इन्हें समझता है। तू चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाये, तेरी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है कि उनके भीतर से सत्य को खोजना; केवल तभी तुम सच में समझ पाओगे कि परमेश्वर क्या कहता है। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य के भीतर ऐसे विवरण होते हैं जो परमेश्वर के वचनों में निश्चित रूप से प्रकट किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किये जा सकते हैं। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसे समझा नहीं जा सकता है। जब तक लोग प्रयास करते रहेंगे, तब तक वे सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं; अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम इन्हें अनुभव कर सकते हो, शेष बचा विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाएगा जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, इस प्रकार वह तुम्हें इन ठोस अवस्थाओं की समझ देगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

तुलना करने पर, पतरस की मानवता अन्य प्रेरितों और उसके भाई-बहनों जैसी ही थी, लेकिन सत्य के अपने उत्कट अनुसरण में वह दूसरों से अलग था; उसने यीशु द्वारा कही गई हर बात पर गंभीरता से चिंतन किया। यीशु ने पूछा, "हे शमौन, योना के पुत्र, क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो?" पतरस ने ईमानदारी से उत्तर दिया, "मैं केवल उस पिता से प्रेम करता हूँ जो स्वर्ग में है, अभी तक मैंने पृथ्वी के प्रभु से प्रेम नहीं किया है।" बाद में उसने समझा, यह सोचते हुए, "यह सही नहीं है; पृथ्वी का परमेश्वर स्वर्ग का परमेश्वर है। क्या स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का परमेश्वर एक ही नहीं है? अगर मैं केवल स्वर्ग के परमेश्वर से प्रेम करता हूँ, तो मेरा प्रेम वास्तविक नहीं है; मुझे पृथ्वी के परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, तभी मेरा प्रेम वास्तविक होगा।" इस प्रकार, पतरस ने यीशु के वचनों पर चिंतन करके उसके द्वारा कही गई बात का सही अर्थ समझा। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए, और इस प्रेम के वास्तविक होने के लिए, व्यक्ति को पृथ्वी पर देहधारी परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए। किसी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर से प्रेम करना न तो यथार्थपरक है और न ही व्यावहारिक, जबकि व्यावहारिक, दृश्यमान परमेश्वर से प्रेम करना सत्य है। यीशु के वचनों से पतरस ने सत्य को हासिल किया और परमेश्वर की इच्छा की समझ प्राप्त की। स्पष्टतः, पतरस का परमेश्वर में विश्वास केवल सत्य की तलाश पर केंद्रित था; अंततः, उसने व्यावहारिक परमेश्वर का प्रेम प्राप्त किया—पृथ्वी के परमेश्वर का। सत्य की तलाश में पतरस विशेष रूप से ईमानदार था। जब भी यीशु ने उसे सलाह दी, उसने उत्साहपूर्वक यीशु के वचनों पर चिंतन किया। शायद पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रबुद्ध किए जाने और उससे परमेश्वर के वचनों का अर्थ समझ पाने से पहले उसने महीनों, एक वर्ष, यहाँ तक कि वर्षों तक चिंतन किया; इस तरह, पतरस ने सत्य में प्रवेश किया, और बाद में उसके जीवन के स्वभाव का रूपांतरण और नवीनीकरण हुआ। अगर कोई व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता, तो वह इसे कभी नहीं समझेगा। तुम शब्दों और सिद्धांतों को दस हजार बार कह सकते हो, लेकिन वे फिर भी केवल शब्द और सिद्धांत ही रहेंगे। कुछ लोग बस यही कहते हैं, "मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।" अगर तुम इन शब्दों को दस हजार बार भी दोहराते हो, तो भी यह व्यर्थ होगा; तुम्हें इसके अर्थ की कोई समझ नहीं है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या तुम इसके बारे में अनुभव से प्राप्त ज्ञान को साफ़-साफ़ बता सकते हो? क्या तुमने सत्य, मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश किया है? परमेश्वर ने अपने वचन इसलिए बोले हैं, ताकि तुम उन्हें अनुभव कर सको और ज्ञान प्राप्त कर सको; केवल शब्दों और सिद्धांतों का उच्चारण करना बेकार है। परमेश्वर के वचनों को समझने और उनमें प्रवेश करने के बाद ही तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य हो, तभी तुम जान सकते हो; सत्य के बिना तुम नहीं जान सकते। तुम किसी मुद्दे को पूरी तरह से तभी समझ सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम किसी मुद्दे को नहीं समझ सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम स्वयं को जान सकते हो; सत्य के बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम्हारा स्वभाव बदल सकता है; सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव नहीं बदल सकता। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कर सकते हो; सत्य के बिना तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा नहीं कर सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो; सत्य के बिना, तुम्हारी आराधना धार्मिक कर्म-कांडों के आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं होगी। ये सभी चीज़ें परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

अगर लोग सत्य को जानने के लिए कोई परिश्रम नहीं करते, तो देर-सवेर वे लड़खड़ाकर गिर पड़ेंगे और दृढ़ता से खड़े रहने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ेगा। इसका कारण यह है कि जब परीक्षण की घड़ी आएगी तो इसका समाधान कुछ अक्षरों या धर्म-सिद्धांतों में नहीं मिलेगा। अक्षर और धर्म-सिद्धांत वास्तविक समस्याओं को हल नहीं कर सकते! तुम्हें हर सत्य की स्पष्ट समझ होनी चाहिए, उनका नियमित रूप से मंथन करते हुए, ताकि तुम उन्हें दिल से समझ सको और उन्हें अंदर-बाहर से जान सको; सिर्फ तभी तुम्हें यह पता होगा कि तुम्हारे साथ कुछ घटने पर तुम्हें क्या करना है। पर अगर तुम इन सत्यों पर गंभीरता से विचार नहीं करते तो क्या तुम इन्हें प्राप्त कर सकते हो? अगर तुम इन पर सोच-विचार नहीं करोगे तो तुम चाहे कितने ही सत्य सुनो, या तुम इनके बारे में कितना कुछ भी कहो, वे कभी भी अपने शाब्दिक अर्थ से आगे नहीं जा पाएंगे। ये शाब्दिक अर्थ तुम्हें अक्सर यह भ्रम देंगे कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था पहले ही फलीभूत हो चुकी है, और तुम्हारी कद-काठी बहुत ऊंची है, क्योंकि तुम्हारे अंदर ललक और ऊर्जा है—पर जैसे ही तुम्हारे साथ कुछ घटेगा, तुम पाओगे कि ये शाब्दिक अर्थ यह गारंटी नहीं दे सकते कि तुम हर परीक्षण या परीक्षा से सुगमता से निकल जाओगे। जब लोगों के साथ कुछ घटता है तो वे अक्सर भ्रमित हो जाते हैं, और यह सोचने लगते हैं कि “मैं इसके बारे में क्या करूँ? मुझे जल्दी से परमेश्वर के वचन खोजने चाहिए और विभिन्न सिद्धांतों को खंगालना चाहिए। यह समस्या सत्य के किस पहलू से जुड़ी हुई है?” ऐसे अवसरों पर तुम्हें यह अहसास होगा कि तुम्हारे पास बहुत थोड़े-से सत्य हैं और तुम बहुत कम सत्य वास्तविकताओं को समझते हो। लोगों को अक्सर जरूरत के समय ही यह अहसास होता है। जब उन्हें जरूरत नहीं होती तो वे हमेशा यह सोचते रहते हैं कि उनके पास तो ढेरों सत्य हैं और वे सत्यों से लबालब छलक रहे हैं। पर वे किस बात से छलक रहे होते हैं? अक्षरों और धर्म-सिद्धांतों से, सतही ज्ञान के भंडार से। उनका यह सोचना गलत है कि वे सत्य से छलक रहे हैं; जब तुम यह सोचते हो कि तुम सत्य से लबालब भरे हुए हो तो तुम खतरे में होते हो। लेकिन जब तुम सोचते हो कि तुम कुछ नहीं हो, कि तुम बहुत कुछ नहीं समझते हो, तो तुम यह चिंतन-मनन करने में सक्षम होगे कि सत्य में प्रवेश कैसे किया जाए। अगर तुम हमेशा यह सोचते हो कि तुम्हारे पास पहले से ही सत्य है, कि तुम इससे ऊपर तक छलक रहे हो, कि तुम्हारे पास काफी है, कि तुम अपने-आपको जानते हो, कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो और उसके लिए सब कुछ कर सकते हो, तो यह खतरे का संकेत होता है। तुम जितना ज्यादा ऐसा सोचते हो, उतना ही ज्यादा यह साबित होता है कि तुम कुछ नहीं समझते हो, कि तुममें किसी सत्य वास्तविकता का पूरी तरह से अभाव है। इसके बारे में गंभीरता से सोचो। सत्य पर सोच-विचार करना सीखो; यह परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों के जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है' से उद्धृत

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