59. परमेश्‍वर के वचनों पर सहभागिता के लिए एकत्र होने के सिद्धांत

(1) दूसरे लोगों में सत्‍य की समझ पैदा करने और उनके शिक्षण के लिए परमेश्‍वर के वचन सत्‍य के वास्‍तविक अनुभव और ज्ञान के साथ सहभागिता करना आवश्‍यक है, ताकि लोगों को अभ्‍यास का मार्ग मिल सके।

(2) परमेश्‍वर के वचन सत्‍य की सहभागिता में उस वास्‍तविक अनुभव को बताना चाहिए जिसमें आत्‍म-ज्ञान प्रतिबिम्बित होता हो। बोलते हुए तुम तथ्‍यों का इस्‍तेमाल करो; शब्‍दों और धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात मत करो, और परमेश्‍वर के वचनों की व्‍याख्‍या करने की कोशिश मत करो।

(3) जब तुम एकत्र होते हो, तो पवित्र आत्‍मा के कार्य से युक्‍त और व्यावहारिक ज्ञान रखने वाले लोगों को अधिक सहभागिता करने दो, ताकि अधिकांश लोगों को शिक्षा मिल सके और वे उससे लाभान्वित हो सकें। केवल तभी वे सत्‍य-वास्‍तविकता में प्रवेश कर सकेंगे।

(4) बेहूदे व्‍यक्तियों, बुरे लोगों, और कलीसिया के जीवन में बाधा डालने वाली बुरी आत्‍माओं को उजागर किया जाना चाहिए और उनका बारीकी से विश्‍लेषण किया जाना चाहिए ताकि लोग उन्‍हें पहचान सकें। इससे उनमें सत्य की समझ को जो लाभ पहुंचेंगे उन्हें कम नहीं आँका जा सकता।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

आगे बढ़ने पर, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करना तुम्हारी बातचीत का सिद्धांत होना चाहिए। आमतौर पर, जब तुम लोग आपस में मिलते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत करनी चाहिए, उसके वचन को बातचीत का विषय बनाना चाहिए; बात करना चाहिए कि परमेश्वर के वचन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो, उसके वचन को अभ्यास में कैसे लाते हो और पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। जबतक तुम परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रकाशित करेगा। परमेश्वर के वचन के संसार को प्राप्त करने के लिए मनुष्य के सहयोग की आवश्यकता है। यदि तुम इसमें प्रवेश नहीं करते हो तो परमेश्वर अपना काम नहीं कर पाएगा। यदि तुम अपना मुँह बंद रखोगे और परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत नहीं करोगे तो वह तुम्हें रोशन नहीं कर पाएगा। जब भी तुम कोई दूसरा काम नहीं कर रहे, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करो। व्यर्थ की बातें मत करो! अपने जीवन को परमेश्वर के वचन से भर जाने दो; तभी तुम एक समर्पित विश्वासी होते हो। कोई बात नहीं यदि तुम्हारी सहभागिता सतही है। सतह के बिना कोई गहराई नहीं हो सकती। एक प्रक्रिया का होना ज़रूरी है। अपने प्रशिक्षण द्वारा तुम पवित्र आत्मा से प्राप्त रोशनी को समझ लोगे और यह भी जान लोगे कि परमेश्वर के वचन को प्रभावी तरीके से कैसे खाएँ-पिएँ। इस प्रकार खोजबीन में कुछ समय देने के बाद तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे। केवल जब तुम सहयोग करने का संकल्प करोगे तभी पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में तुम समर्थ होगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

"अनुभव साझा करने और संगति करने" का अर्थ है अपने हृदय के हर विचार, अपनी वर्तमान शारीरिक अवस्था, अपने अनुभवों और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान, और अपने भीतर के भ्रष्ट स्वभाव के बारे में बोलना, फिर अन्य लोगों को इन्हें समझने देना, सकारात्मक को स्वीकार करने और जो नकारात्मक है उसे पहचानने देना। केवल यही साझा करना है, और केवल यही वास्तव में संगति करना है। इसमें सिर्फ परमेश्वर के वचनों में या भजन के किसी हिस्से में विशेष अंतर्दृष्टि का होना शामिल नहीं है, और फिर इसे आगे न ले जाते हुए अपनी इच्छानुसार संगति करना, या अपने स्वयं के वास्तविक जीवन से संबंधित कुछ भी नहीं कहना नहीं है। हर कोई सिद्धांत संबंधी और सैद्धांतिक ज्ञान के बारे में बात करता है, लेकिन वास्तविक अनुभवों से प्राप्त ज्ञान के बारे में कोई बात नहीं करता है। तुम सभी इस तरह की बातों के बारे में, अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में—अपने भाइयों और बहनों के साथ कलीसिया में अपने जीवन के बारे में, अपनी खुद की आंतरिक दुनिया के बारे में बात करने से बचते हो। ऐसा करने से, लोगों के बीच सच्चा संवाद कैसे हो सकता है? कोई वास्तविक विश्वास कैसे हो सकता है? कोई विश्वास नहीं हो सकता है! अगर कोई पत्नी अपने हृदय की बात अपने पति से कभी न कहे, तो क्या वे हमराज़ हैं? क्या वे एक दूसरे की मन की बात जानते हैं? मान लीजिए कि पूरे दिन वे निरंतर कहते रहते हैं, "मैं तुम्हें प्रेम करता/करती हूँ!" वे केवल यही कहते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने कभी नहीं जाहिर किया है कि वे वास्तव में अपने मन की गहराई में क्या सोच रहे हैं, वे एक-दूसरे से क्या चाहते हैं, या उन्हें क्या समस्याएँ हैं। उन्होंने कभी एक-दूसरे से ऐसी बातें नहीं बताई हैं, न उन्होंने कभी भी एक-दूसरे को अपने मन की बात बताई है—तो क्या वे वास्तव में ऐसे दम्पति हैं जो एक दूसरे से प्रेम करते हैं? एक दूसरे के साथ रहते समय अगर उनके पास एक दूसरे के लिए सतही अच्छी बातों के अलावा कुछ नहीं है, फिर क्या वे वास्तविक पति और पत्नी हैं? बिल्कुल नहीं! यदि भाई-बहनों को एक-दूसरे में विश्वास करने में सक्षम होना है, एक-दूसरे की सहायता करनी है और एक-दूसरे का भरण-पोषण करना है, तो प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य अपने वास्तविक अनुभवों के बारे में बात करनी चाहिए। यदि तू अपने सच्चे अनुभवों के बारे में बात नहीं करता है, और केवल तकिया कलाम ही बोलता रहता है, और ऐसे वचन बोलता है जो सिद्धांत संबंधी और सतही हैं, तो तू एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है, और तू एक ईमानदार व्यक्ति होने में असमर्थ है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

कुछ अगुआ और कार्यकर्ता कलीसिया के भीतर की असली समस्याओं को नहीं देख पाते। किसी सभा को संबोधित करते हुए उन्हें लगता है कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे सिर्फ खानापूरी करते हैं और कुछ अक्षर और धर्म-सिद्धांत उगल देते हैं। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जो कुछ कह रहे हैं वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं, फिर भी वे बोलते चले जाते हैं। आखिर में, उन्हें खुद भी महसूस होता है कि उनके शब्द कितने नीरस हैं, और जब उनके भाई और बहनें इन्हें सुनते हैं तो वे भी सोचते हैं कि ये लोग कितने जड़बुद्धि हैं। क्या ऐसा ही नहीं होता है? अगर उन्हें यह सब बोलने के लिए खुद को मजबूर करना पड़ता है, तो एक तरफ तो पवित्र आत्मा उनके भीतर कार्य नही कर रहा है, और दूसरी तरफ़, उनके शब्दों से लोगों को कोई फायदा नहीं होता है। अगर तुमने सत्य का अनुभव नहीं किया है, लेकिन फिर भी तुम इसके बारे में बोलना चाहते हो, तो तुम चाहे जो भी कहते रहो, तुम सत्य तक नहीं पहुँच पाओगे; और तुम जो भी आगे कहोगे वे सिर्फ अक्षर और धर्म-सिद्धांत होंगे। तुम शायद यह सोचोगे कि वे काफी प्रबुद्ध बातें हैं, पर वे सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं; वे सत्य वास्तविकता नहीं हैं; और सुनने वाले कितनी ही कोशिश क्यों न करें, वे उनसे कुछ भी वास्तविक प्राप्त नहीं कर पाएंगे। हो सकता है कि सुनते समय वे ऐसा महसूस करें कि जो कुछ तुम कह रहे हो वह सही है, लेकिन बाद में वे इसे पूरी तरह से भूल जाएंगे। अगर तुम अपनी वास्तविक अवस्थाओं के बारे में बात नहीं कर रहे हो, तो तुम लोगों के दिलों को नहीं छू पाओगे; वे इसे भूल जाएंगे, भले ही वे इसे याद रखना चाहें, और तुम उनकी कोई मदद नहीं कर पाओगे। अगर तुम्हारा ऐसी किसी स्थिति से सामना होता है, जहाँ तुम बोलना चाहते हो लेकिन तुम्हें लगता है कि तुम चीजों के बारे में इस तरह से बात नहीं कर सकते कि सत्य तक पहुँच पाओ, और तुम्हारे पास सिर्फ कुछ धर्म-सिद्धांत से जुड़ी जानकारी है, जबकि तुम मूलभूत चीजों के बारे में कुछ भी नहीं जानते, और अगर दूसरों ने मूलभूत प्रकृति के प्रश्न उठा लिए तो तुम उनके उत्तर नहीं दे पाओगे, तो बेहतर यही है कि तुम कुछ भी न कहो। ऐसे अवसर भी होते हैं जब तुम एक सभा में किसी विषय पर चर्चा कर रहे होते हो, और ऐसा महसूस करते हो कि तुम इसके बारे में काफी जानकारी रखते हो, और कुछ वास्तविक चीजों के बारे में संगति कर सकते हो। लेकिन अगर तुम इसके बारे में सतही स्तर पर चर्चा करते हो और गहरे स्तर पर कुछ कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होता, तो सभी लोग यह समझ जाते हैं, क्योंकि हो सकता है कि दूसरों ने कुछ चीजों का अनुभव न किया हो, और तुम्हें भी ऐसा कोई अनुभव न हो। ऐसी स्थिति में, तुम्हें अपने-आपको बोलते रहने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए, बल्कि इस विषय पर हर किसी को संगति करने के लिए कहना चाहिए। यदि तुम्हें लगता है कि यह सिर्फ एक धर्म-सिद्धांत है, तो इसके बारे में कुछ बोलना व्यर्थ है, और यह दूसरों को सन्मार्ग पर लाने का काम नहीं करेगा; इस स्थिति में, तुम चाहे कोई बात भी कहो, पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं करेगा, और जब तुम किसी भी तरह जबर्दस्ती अपने-आपको दूसरों पर थोपते हो तो तुम बेतुकी और विकृत बातें कर सकते हो, और लोगों को भटका सकते हो। लोग अपेक्षाकृत गहन विचारों को थोड़ी-सी अवधि में पूरी तरह अपने दिमाग में नहीं बिठा पाते; अधिकांश लोगों की नींव बहुत कमजोर होती है और उनकी क्षमता भी कम होती है, इसलिए वे जो कुछ सुनते हैं उसे आसानी से अपनी स्मृति में नहीं बिठा पाते। पर वे बेतुकी बातों और नियामकों और धर्म-सिद्धांतों से जुड़ी बातों को झट से स्वीकार कर लेते हैं। कितनी विचित्र बात है! इसलिए, इस विषय में तुम्हें विशेष ध्यान देना चाहिए। लोग अहंवादी होते हैं और कई बार उनका दंभ उन पर हावी रहता है; वे अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जो कुछ कह रहे हैं वह धर्म-सिद्धांत है, फिर भी वे बोलते चले जाते हैं, यह सोचते हुए कि भाइयों और बहनों को पता नहीं चलेगा। अपना मान बचाने के लिए वे उन चीजों को अनदेखा करके सिर्फ उस वक्त की स्थिति से निपटने पर ध्यान दे सकते हैं। क्या यह लोगों को सिर्फ मूर्ख बनाना नहीं है? यह परमेश्वर के प्रति अनिष्ठा को दर्शाता है। अगर तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य को समझता है, तो तुम मन-ही-मन अपने-आपको धिक्कारोगे, और ऐसा महसूस करोगे कि तुम इस तरह अब और नहीं बोल सकते और तुम्हें विषय को बदल देना चाहिए। तुम्हें जिस चीज का अनुभव है, तुम उसके बारे में संगति कर सकते हो, या तुम सत्य के बारे में जो कुछ जानकारी रखते हो, उसके बारे में भी बात कर सकते हो; अगर तुम किसी विषय के बारे में स्पष्ट रूप से नहीं बोल सकते, तो तुम इसकी बजाय दूसरों के साथ इस विषय पर संगति कर सकते हो। एक ही व्यक्ति द्वारा बोलते रहना कभी अच्छा नहीं होता। चूंकि तुममें अनुभव की कमी है, इसलिए तुम चाहे कितनी भी अच्छी तरह से किसी चीज की कल्पना और अवधारणा कर सकते हो, पर तुम जो बात करोगे वह अंततः सिर्फ धर्म-सिद्धांत या मानवीय धारणाओं पर आधारित होगी। सत्य की श्रेणी में रखी जाने वाली चीजों का अनुभव होना जरूरी है। अनुभव के बिना कोई भी व्यक्ति सत्य के सार को पूरी तरह नहीं समझ सकता, सत्य के अनुभव की स्थितियों की स्पष्ट रूप से व्याख्या कर पाना तो दूर की बात है। कहने के लिए सचमुच कुछ होने से पहले व्यक्ति को सत्य का अनुभव होना चाहिए। कोई भी अनुभव न होना स्वीकार्य नहीं है; अगर तुम्हारे पास अनुभव हो भी, तो भी यह एक सीमित दायरे के भीतर ही होगा, और तुम कुछ सीमित स्थितियों पर ही बात कर सकोगे, उससे अधिक कुछ नही। यदि कोई सभा एक या दो ही विषयों के आसपास घूमती रहती है, तो इन विषयों पर बार-बार संगति करने के बाद, कुछ ऐसे लोग होंगे जो थोड़ा-बहुत समझने लगेंगे। दूसरी संभावना यह है कि बोलना शुरू करते ही तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम बहुत व्यवहारिक तरीके से बात कर रहे हो, पर तुम्हारे भाई और बहनें अभी भी सचमुच समझ नहीं पा रहे हैं। इसका कारण यह है कि तुम्हारी स्थिति तुम्हारी स्थिति है, और तुम्हारे भाइयों और बहनों की स्थितियाँ कोई जरूरी नहीं कि बिल्कुल तुम्हारे जैसी हों। साथ ही, तुम्हारे पास इस विषय में कुछ अनुभव है, जबकि हो सकता है कि तुम्हारे भाइयों और बहनों के पास ऐसा अनुभव न हो, इसलिए वे ऐसा सोच सकते हैं कि जो बात तुम कर रहे हो वह उन पर लागू नहीं होती। इस तरह की स्थिति से सामना होने पर तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें उनकी स्थिति को समझने के लिए उनसे कुछ प्रश्न पूछने चाहिए। उनसे पूछो कि यह विषय सामने आने पर उनके ख्याल से किसी व्यक्ति को क्या करना चाहिए, और व्यक्ति को सत्य के अनुरूप अभ्यास कैसे करना चाहिए। इस तरह से थोड़ी संगति करने से आगे का एक रास्ता खुलेगा। इस तरीके से, तुम लोगों को मूल बिंदु पर ला सकते हो, और अगर तुम आगे भी संगति करते हो, तो तुम परिणाम हासिल कर सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

तू उतना अधिक ज्ञान बोल पाता है जितनी समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम; जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करवाता है। ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों को अनमोल खजाने की तरह मत बरत; वे दुखदाई हैं और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों की बात कर पाते हैं—लेकिन इनमें वास्तविकता का लेशमात्र भी नहीं होता, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग दूसरों को सही राह पर ले जाने में अक्षम होते हैं और उन्हें केवल गुमराह ही करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे लोगों के वर्तमान कष्टों का निवारण तो करना ही चाहिए, उन्हें प्रवेश करने देना चाहिए; केवल यही समर्पण माना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्द मत बोला कर, और दूसरों को अपने आज्ञापालन में बाँधने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह केवल उनके भ्रम को ही बढ़ा सकता है। इस तरह करते रहने से बहुत वाद उत्पन्न होगा, जो लोगों को तुझसे घृणा करवाएगा। ऐसी है मनुष्य की कमी, और यह सचमुच अत्यंत लज्जाजनक है। इसलिए वास्तविक रूप में विद्यमान समस्याओं की अधिक बात कर। अन्य लोगों के अनुभवों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की तरह मत बरत और उन्हें ऊँचा थामकर रख ताकि दूसरे प्रशंसा कर पाएँ; तुझे अपना विशिष्ट मुक्ति का मार्ग खोजना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

परमेश्वर के वचनों पर संगति करने के कई सिद्धांत हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए :

पहले, परमेश्वर के वचनों पर संगति करने से पूर्व तुम्हें परमेश्वर के वचनों के सार पर चिंतन करना चाहिए, पता लगाओ कि वचनों का क्या तात्पर्य है, उनके सच्चे अर्थ को समझो, और थाह लेने की कोशिश करो कि परमेश्वर ऐसे वचन क्यों कहेगा और वे क्या परिणाम पाने की कोशिश कर रहे हैं। परमेश्वर चाहे जो कुछ भी कहे, उसके इरादे और अपेक्षाएँ उसके वचनों में निहित हैं। यह मुख्य बिंदु है, जिस पर संगति की जानी चाहिए। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सत्य की खोज करनी चाहिए और उसके प्रत्येक वचन में उसकी इच्छा समझनी चाहिए, और समझना चाहिए कि उसे लोगों से क्या अपेक्षाएँ हैं और वे सत्य कौन-से हैं, जो लोगों के पास होने चाहिए। इस तरह से संगति करना तुम्हारे लिए भी लाभदायक है और दूसरों के लिए भी। अगर तुम सिर्फ यंत्रवत् काम करते हो और प्रक्रिया को आराम से निपटाते हो, वचनों को पढ़ने के बाद सच्चाई से उन पर चिंतन नहीं करते, केवल अक्षरश: सिद्धांत बोलते हो, तो तुम्हारे परमेश्वर के वचनों को पढ़ने का अधिक अर्थ नहीं होगा, और तुम कभी भी सत्य को नहीं समझ पाओगे।

दूसरे, परमेश्वर के वचनों में कई सत्य निहित हैं। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति में सत्य के कई पहलू शामिल होते हैं, जिन्हें शाब्दिक अर्थ द्वारा पूरी तरह से नहीं समझाया जा सकता। मनुष्य परमेश्वर के वचनों को लापरवाही से नहीं ले सकता। अगर तुम्हें वे बहुत सरल लगते हैं, तो यह बहुत ही मूर्खतापूर्ण और अज्ञानता भरा होगा। परमेश्वर के वचनों की सबसे सरल पंक्ति को भी उसकी संपूर्णता में अनुभव करने के लिए पूरा जीवन काफी नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई सभी बातें सत्य हैं, वे सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता हैं। मनुष्य न तो उन्हें पूरी तरह से प्राप्त कर सकता है, न ही उनकी गहराई में प्रवेश कर सकता है। अगर लोग परमेश्वर के वचनों के प्रति ईमानदार रवैया नहीं रखते और सत्य खोजना नहीं चाहते, तो वे उन्हें कभी नहीं समझ सकते। इसलिए तुम्हें परमेश्वर का भय मानना चाहिए और उसके वचनों पर संगति करते समय श्रद्धा का भाव रखना चाहिए।

तीसरे, तुम्हें केवल परमेश्वर के उतने ही वचनों के बारे में बात करनी चाहिए, जिन्हें तुम समझते हो। न समझने पर समझने का नाटक मत करो, शब्दों और सिद्धांतों के बारे में लापरवाही से बात मत करो। सभाओं में केवल परमेश्वर के वचनों के अपने वास्तविक ज्ञान और समझ पर संगति करो; उन चीज़ों के बारे में बात मत करो जो सत्य से संबंधित नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करके तुम बस अन्य लोगों का समय बरबाद करोगे। सभी के लाभ के लिए प्रत्येक व्यक्ति का केवल पांच से दस मिनट या अधिकतम पंद्रह मिनट तक संगति करना सबसे उत्तम है। एक ही व्यक्ति को बहुत अधिक समय नहीं लेना चाहिए। अगर लोग अपनी बात एक बार में समाप्त न कर पाएँ, तो उसे दो या तीन भागों में विभाजित कर दो, ताकि सभी को बोलने का अवसर मिल सके। जो लोग विशेष रूप से बातूनी हैं, अगर वे विषय से भटकने लगें, तो तुम उन्हें रोक सकते हो, ताकि वे सीख सकें कि समझदार कैसे बनना है और दूसरों का सम्मान कैसे करना है। इस तरह अभ्यास करने से सभी को लाभ होता है।

चौथे, परमेश्वर के वचनों पर संगति करते समय, अधिकांश लोगों द्वारा साझा की गई स्थितियों के साथ-साथ कलीसिया में मौजूद समस्याओं पर बात की जा सकती है। इस प्रकार से संगति करना उचित है, लेकिन तुम्हारे इरादे दूसरों पर हमला करने या उन्हें छोटा दिखाने के नहीं होने चाहिए। तुम चाहे कोई भी हो, अगर तुम्हारी स्थितियाँ ऐसी हों, तो तुम्हें इसका ठीक से सामना करना चाहिए और विनम्रतापूर्वक इसे स्वीकार करना चाहिए। तुम्हें अभिमानी और दंभी नहीं होना चाहिए, न ही दूसरों की राय के प्रति असहिष्णु होना चाहिए। तुम्हें दूसरों पर दबाव डालने के लिए अपने पद का उपयोग नहीं करना चाहिए, न ही उन्हें बात करने से रोकना या सत्य के बारे में उनके संगति करने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। सत्य पर संगति की प्रक्रिया लोगों की भ्रष्ट प्रकृति उजागर करने की प्रक्रिया भी है। जब ऐसी चीज़ों की बात आती है, तो जो लोग वास्तव में सत्य को स्वीकारते हैं, वे खुद का सही ढंग से सामना कर पाएँगे और उन्हें कोई कठिनाई नहीं होगी। सभाओं के दौरान अगर लोग मुँह खोलने और परमेश्वर के वचनों पर संगति करने का साहस नहीं रखते, या दूसरों को नाराज़ करने या अपने अपमान के डर से अपनी संगति को वास्तविक जीवन से नहीं जोड़ पाते, तो उनके लिए सत्य को समझना और प्राप्त करना बहुत मुश्किल होगा, और इस तरह परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने से कोई उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त नहीं होगा। जो लोग ईमानदारी से सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, उन्हें अपनी स्थितियों के साथ जुड़ना चाहिए और परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान के बारे में सरल और खुले ढंग से संगति करनी चाहिए। केवल इस तरह परमेश्वर के वचनों पर संगति करने से ही सत्य को समझना और परिणाम प्राप्त करना आसान होता है। जहाँ तक कलीसिया में उभरने वाली विशेष समस्याओं की बात है, तो उन पर संगति करने और अपने विचार व्यक्त करने के लिए सभी सदस्यों का स्वागत है, लेकिन उन्हें चीज़ों को परमेश्वर के वचनों के आधार पर देखना चाहिए और सत्य के पक्ष में खड़े होना चाहिए। इस तरह की संगति का यह लाभ है कि वह समस्याओं को हल कर सकती है, शैतान को शर्मिंदा कर सकती है और वास्तविक परिणाम प्राप्त कर सकती है।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

कलीसियाई जीवन में परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के द्वारा सत्य को समझने और समस्याएँ हल करने में सक्षम होने का परिणाम पाने के लिए सभाओं के दौरान पाँच सिद्धांतों का अभ्यास किया जाना चाहिए :

1. सत्य की शुद्ध समझ रखने वाले अच्छी क्षमता के लोग थोड़ी अधिक संगति कर सकते हैं, लेकिन वह उबाऊ नहीं होनी चाहिए; उन्हें वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभव और ज्ञान के बारे में बात करनी चाहिए। केवल इस तरीके से ही सभा प्रभावी होगी। गलत समझ वाले लोगों को कम संगति करनी चाहिए, बल्कि संगति करने से बचना चाहिए। इस तरह से अभ्यास करना उन सभी के लिए फायदेमंद होगा, जो सत्य को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

2. परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हुए लोगों को विषय पर ही रहना चाहिए और अलग दिशा बिलकुल नहीं पकड़नी चाहिए; ऐसा करने से लोगों को सत्य को समझने में मदद मिलेगी। बार-बार भटकने से लोगों की एकाग्रता भंग होती है और वे उलझन में पड़ जाते हैं, और उनके लिए परमेश्वर के वचनों को समझना असंभव हो जाता है। अकसर भटक जाने वाले लोग सीमित होने चाहिए; इससे समय बच सकता है और सभा के अच्छे परिणाम निकल सकते हैं।

3. यह सबसे अच्छा होगा कि जिन लोगों की क्षमता अच्छी नहीं है और जो समझने में अक्षम हैं, वे सुनें ज्यादा और बोलें कम। उन्हें परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने और उनकी शुद्ध समझ स्वीकार करने में अधिक प्रयास लगाने चाहिए, और भीतर से परमेश्वर से अधिक प्रार्थना और संवाद करना चाहिए। ऐसा करना उनके लिए भी लाभप्रद होगा और दूसरों के लिए भी; यह आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका है।

4. सभा में परमेश्वर के वचनों पर संगति करते हुए दूसरों के दृष्टिकोण और विचार मत दोहराओ; प्रकाश और ज्ञान के कुछ नए बिंदुओं के बारे में बात करो। अगर तुम्हारे पास कोई नया ज्ञान न हो, तो बात न करो। इससे समय की बचत होगी और सभा अधिक प्रभावी हो सकेगी। दूसरों की बातों को बार-बार दोहराने के बजाय बस परमेश्वर के सामने शांति से बैठे रहना, ध्यान से सुनना और समझना, दूसरों के द्वारा सामने लाए गए प्रकाश और शुद्ध समझ के नए बिंदुओं को स्वीकारना बेहतर होगा। यह तुम्हारे लिए फायदेमंद है और यह माना जा सकता है कि तुमने भी सभा से हुए लाभ में हिस्सा बँटाया है।

5. लोग चाहे सत्य के जिस भी पहलू पर संगति करें, जब वे किसी मुद्दे के बारे में अपने विश्लेषण और विचार संप्रेषित कर रहे हों, तो अतिसंवेदनशील न हो जाओ या आँखेँ बंद करके उनकी तुलना खुद से मत करो, ताकि सभी को एक-दूसरे की आलोचना करने और आपस में लड़ने से रोका जा सके। व्यर्थ की बातों पर बहस न करो, और अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हुए हमेशा दूसरों की समस्याओं के बारे में चिंतित मत रहो। सत्य की तलाश करने और उसे समझने पर ध्यान लगाओ, ताकि तुम अपने भ्रष्टाचार की समस्याएँ हल कर सको। ऐसा करने वाले लोग बुद्धिमान होते हैं।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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