75. अपनी जगह की पुष्टि करने के सिद्धांत

(1) अपनी ताक़तों और प्रतिभाओं के अनुसार अपने कर्तव्य चुनो। जब तक अधिकांश लोग तुम्हारी पसंद को उचित मानते हैं, तब तक तुम्हें अपने कर्तव्य के रूप में इसकी पुष्टि करनी चाहिए;

(2) जो अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाता है, उसने अपनी जगह ढूँढ ली है, और जो अपना कर्तव्य अच्छी तरह से पूरा करता है, वह एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में दृढ़ है;

(3) अपने कर्तव्य को निभाते समय, व्यक्ति को परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। यदि उसे लगता है कि उसका कर्तव्य अनुपयुक्त है, तो अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद कर, उपयुक्त कर्तव्यों का चयन कर सकता है;

(4) चाहे व्यक्ति का विशेष कर्तव्य कुछ भी हो, उसे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उस पर भरोसा करना चाहिए, और, सभी मामलों में, सत्य की तलाश और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। ऐसा करने में, लोग अपने कर्तव्य को संतोषजनक ढंग से निभा सकेंगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्‍वर ने अपनी समूची प्रबन्‍धन योजना में बहुत पहले ही यह तय कर दिया था कि अन्‍त के दिनों में तुम मनुष्‍यों की दुनिया में कितनी बार जन्‍म लोगे, किस वंश और किस परिवार में तुम्‍हारा जन्‍म होगा, इस परिवार की परिस्थितियाँ कैसी होंगी, तुम मर्द होगे या औरत होगे, तुम्‍हारी सामर्थ्‍य क्‍या होगी, तुम किस स्‍तर की शिक्षा प्राप्‍त करोगे, तुम कितने स्‍पष्‍ट-वक्ता होगे, तुम्‍हारा स्‍तर क्‍या होगा, तुम कैसे दिखोगे, किस उम्र में परमेश्‍वर के घर में आओगे और अपने कर्तव्‍यों का पालन करने लगोगे, और तुम किस समय कौन-सा कर्तव्‍य पूरा करोगे—परमेश्‍वर ने बहुत पहले तुम्‍हारे प्रत्‍येक क़दम की योजना रच दी थी। तुम्‍हारे जन्‍म से पहले, जब तुम अपने कई पिछले जीवनों में मनुष्‍यों के बीच आये थे, परमेश्‍वर ने पहले ही तय कर दिया था कि इस जीवन में, कार्य के अन्तिम चरण में, तुम कौन-से कर्तव्‍य निभाओगे। यह कोई मज़ाक नहीं है! यहाँ तक कि तुम्‍हारा यहाँ इस उपदेश को सुनना भी परमेश्‍वर ने पहले से नियत कर दिया था—यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है! इसके अलावा, तुम्‍हारी शारीरिक दशा, एक ख़ास उम्र में तुम्‍हारा अनुभव, तुम किस तरह के कर्तव्‍यों का निर्वाह कर सकते हो, तुम्‍हारी योग्‍ताएँ और दक्षताएँ—तुम्‍हारे लिए ये सारी चीज़ें परमेश्‍वर द्वारा बहुत पहले नियत कर दी गयी थीं। यानी, परमेश्‍वर तुम्‍हारा उपयोग करना चाहता है, और तुम्‍हें यह दायित्‍व और लक्ष्‍य सौंपने से पहले, उसने तुम्‍हें इसके लिए पहले से तैयार कर दिया था। तब क्‍या तुम्‍हारा पलायन करना उचित है? क्‍या तुम्‍हारा हिचकिचाना उचित है? ऐसा करके तुम परमेश्‍वर को निराश करते हो! अपने कर्तव्‍य से मुँह मोड़ने से बड़ा कोई द्रोह नहीं है—यह एक जघन्‍य पाप है। परमेश्‍वर के इरादे पूरी तरह नेक हैं। असंख्‍य युगों पहले ही परमेश्‍वर ने तुम्‍हारे आज के आगमन को पूर्वनियत कर दिया था, और तुम्‍हें यह कार्य सौंप दिया था—तब क्‍या तुम इस कार्य के लिए ज़ि‍म्‍मेदार नहीं हो? क्‍या यह तुम्‍हारे जीवन-मात्र का मूल्‍य नहीं है? और अगर तुम परमेश्‍वर द्वारा सौंपा गया कार्य पूरा नहीं करते, तो क्‍या तुम्‍हारे होने का कोई अर्थ है? परमेश्‍वर ने ही तुम्‍हें इस स्थिति में रखा है, उसी ने तुम्‍हें यह क़ाबिलियत दी है, उसी ने तुम्‍हें ये क्षमताएँ और दक्षताएँ दी हैं, उसी ने तुम्‍हें इस युग में रहने की और यह काम करने की सारी परिस्थितियाँ प्रदान की हैं—लेकिन तुम यह नहीं करते, और तुम पलायन कर जाते हो। तुम सिर्फ़ एक आरामदेह जीवन जीना चाहते हो, तुम दुनिया में कामयाबी हासिल करना चाहते हो, परमेश्‍वर ने तुम्‍हें जो कुछ दिया है उसका इस्‍तेमाल शैतान की सेवा के लिए करना चाहते हो। क्‍या परमेश्‍वर इसका आनन्द उठा सकता है? क्‍या वह इससे ख़ुश हो सकता है? तुम अपना कार्य पूरा नहीं करते, तुम परमेश्‍वर द्वारा दिये गये आदेश का पालन नहीं करते, और तुम परमेश्‍वर के न्‍याय के आसन से बचकर भागते हो। ऐसे लोगों के लिए परमेश्‍वर क्‍या फै़सला करता है? वह उन्‍हें मिटा देता है! तुम कभी भी दोबारा जन्‍म लेकर इस दुनिया में नहीं आओगे। परमेश्‍वर तुम्‍हें दोबारा कभी कोई लक्ष्‍य नहीं सौंपेगा। तुमसे तुम्‍हारा लक्ष्‍य छीन लिया गया है और इसलिए तुम्‍हारे पास कोई अवसर नहीं बचा—इसका मतलब है कि तुम संकट में फँस चुके हो! जो व्‍यक्ति एक भी बार परमेश्‍वर की निगाह से बचकर भागे हैं, वे मेरे न्‍याय के आसन से भागे हैं, मेरी उपस्थिति से भागे हैं। उन्‍होंने अपना लक्ष्‍य पूरा नहीं किया है और उन्‍होंने अपनी जिम्‍मेदारी नहीं निभायी है। यह अन्‍त है, अब यह समाप्‍त हुआ, उनके जीवन यहाँ ख़त्‍म होते हैं, बस हो चुका, अब इसका ज़ि‍क्र करने की भी ज़रूरत नहीं है। कितना दुखद है यह!

आज, जब तुम परमेश्‍वर के घर में कोई कर्तव्‍य निभाते हो, वह चाहे बड़ा हो या छोटा, चाहे उसके लिए तुम्‍हें अपने शारीरिक श्रम का इस्‍तेमाल करना पड़ता हो या अपने मस्तिष्‍क का, चाहे वह कलीसिया के अन्‍दर का काम हो या बाहर का, तुम जो भी कर्तव्‍य निभाते हो, वह आकस्मिक नहीं है; वह तुम्‍हारा चुनाव नहीं है, वह परमेश्‍वर द्वारा नियन्त्रित है। यह सिर्फ़ परमेश्‍वर का आदेश ही है कि तुम प्रेरित हो, और तुम्‍हारे भीतर लक्ष्‍य और ज़ि‍म्‍मेदारी का यह बोध है, और तुम यह कर्तव्‍य निभा पा रहे हो। अविश्‍वासियों के बीच ऐसे बहुत-से लोग हैं जो आकर्षक, बुद्धिमान, या सक्षम हैं। लेकिन क्‍या परमेश्‍वर उनपर अनुग्रह करता है? नहीं। परमेश्‍वर सिर्फ़ तुम पर, इस समुदाय पर अनुग्रह करता है। वह अपने प्रबन्‍धन कार्य के तहत तुम्‍हें हर तरह की भूमिकाएँ निभाने के लिए, हर तरह के कर्तव्‍य और दायित्‍व पूरे करने के लिए तैयार करता है, और जब, अन्‍तत:, परमेश्‍वर की प्रबन्‍धन योजना सम्‍पन्‍न और पूरी हो जाएगी, तो यह क्‍या ही गौरव और सम्‍मान की बात होगी! और इसलिए जब लोगों को अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह करते समय छोटी-मोटी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जब उन्‍हें त्‍याग और उद्यम करना पड़ता है, जब उन्‍हें कोई क़ीमत चुकानी पड़ती है, जब उन्‍हें अपनी दुनियावी हैसियत, प्रसिद्धि और दौलत गँवा देनी पड़ती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो परमेश्‍वर ने उनसे वे चीज़ें छीन ली हों—लेकिन उन्‍होंने कोई बड़ी और बेहतर चीज़ हासिल कर ली होती है। उन्‍होंने परमेश्‍वर से क्‍या हासिल किया होता है? जब तुम अपने कर्तव्य का ठीक से निर्वाह कर लेते हो, जब तुम परेमश्‍वर द्वारा सौंपे गये दायित्‍व को पूरा कर लेते हो, जब तुम अपने लक्ष्‍य और दायित्‍व के लिए अपना पूरा जीवन खपा देते हो, और इस तरह जब तुम एक सार्थक जीवन जीते हो—सिर्फ़ तभी तुम एक सच्‍चे इन्‍सान होते हो! और मैं तुम्‍हें सच्‍चा इन्‍सान क्‍यों कहता हूँ? क्‍योंकि परमेश्‍वर ने तुम्‍हारा चुनाव किया है, उसी ने तुम्‍हें इस बात की गुंजाइश दी है कि तुम परमेश्‍वर द्वारा रचे गये एक प्राणी के रूप में उसके प्रबन्‍धन में अपना कर्तव्‍य निभाओ, और तुम्‍हारे जीवन का इससे बड़ा कोई मूल्‍य या अर्थ नहीं हो सकता।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के समक्ष समर्पण से संबंधित अभ्यास के सिद्धांत' से उद्धृत

चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तुम्हें अपना सर्वस्व उसे अर्पित कर देना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या माँगें नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करनी चाहिए। चूँकि तुम्हें सृजित किया गया था, इसलिए तुम्हें उस प्रभु का आज्ञापालन करना चाहिए जिसने तुम्हें सृजित किया, क्योंकि तुम्हारा स्वयं अपने ऊपर स्वाभाविक कोई प्रभुत्व नहीं है, और स्वयं अपनी नियति को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं है। चूँकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए तुम्हें पवित्रता और परिवर्तन की खोज करनी चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी हो, इसलिए तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, और अपनी स्थिति के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए, और तुम्हें अपने कर्तव्य का अतिक्रमण कदापि नहीं करना चाहिए। यह तुम्हें सिद्धांत के माध्यम से बाध्य करने, या तुम्हें दबाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके बजाय यह वह पथ है जिसके माध्यम तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते हो, और यह उन सभी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है—और प्राप्त किया जाना चाहिए—जो धार्मिकता का पालन करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

तुम लोगों के आचरण के कौन-से सिद्धांत हैं? तुम्हारा आचरण तुम्हारे पद के अनुसार होना चाहिए, अपने लिए सही पद खोजो और उस पर डटे रहो। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोग एक पेशे में अच्छे होते हैं और उसके सिद्धांतों को समझते हैं, उस संबंध में अंतिम जाँच उन्हें करनी चाहिए; कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने विचार और अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं, जिससे हर व्यक्ति उनके विचार पर आगे कार्य करने और अपने कर्तव्य का बेहतर तरीके से पालन करने में सक्षम हो पाता है—तो फिर उन्हें अपने विचार साझा करने चाहिए। यदि तुम अपने लिए सही पद खोज सकते हो और अपने भाई-बहनों के साथ सद्भाव से कार्य कर सकते हो, तो तुम अपना कर्तव्य पूरा करोगे, और तुम अपने पद के अनुसार आचरण करोगे। यदि तुम केवल अपने कुछ विचार साझा करने में ही सक्षम हो, परंतु अन्य चीजें प्रदान करना चाहते हो, और तुम ऐसा करने की बहुत कोशिश करने के बावजूद इसमें असमर्थ होते हो; और फिर, जब दूसरे लोग अन्य चीजें प्रदान करते हैं, तो तुम असहज हो जाते हो, और सुनना नहीं चाहते, तुम्हारा दिल दुखी और लाचार हो जाता है, और तुम कहते हो कि परमेश्वर अन्यायी है, तुम परमेश्वर को दोष देते हो—तो फिर यह महत्वाकांक्षा है। वह कौन सा स्वभाव है जो किसी व्यक्ति में महत्वाकांक्षा उत्पन्न करता है? व्यक्ति का अभिमानी स्वभाव ही महत्वाकांक्षा उत्पन्न करता है। निश्चित रूप से ऐसी अवस्थाएँ तुम लोगों में किसी भी समय उत्पन्न हो सकती हैं, और यदि तुम लोग इनका समाधान करने के लिए सत्य की खोज नहीं कर सकते हो, न तुम्हारे पास जीवन प्रवेश हो और इस संबंध में बदल नहीं सकते, तो जिस योग्यता और शुद्धता के साथ तुम लोग अपना कर्तव्य करते हो, वह बहुत ही निम्न होगा। यदि तुम इन चीजों को हासिल नहीं कर सकते, तो तुम लोगों के लिए परमेश्वर का यथोचित गुणगान करना भी बहुत मुश्किल होगा। कुछ लोगों के पास दो या तीन क्षेत्रों में प्रतिभाएँ होती हैं, कुछ के पास एक ही क्षेत्र में प्रतिभा होती है, और कुछ के पास कोई भी प्रतिभा नहीं होती है—यदि तुम लोग इन बातों को सही तरीके से समझ सको, तो तुम अपना पद प्राप्त कर लोगे। वे लोग जिन्होंने अपना पद प्राप्त कर लिया है, वे अपने-अपने स्थान के अनुसार आचरण कर सकते हैं और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभा सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो कभी भी अपने पद को ढूँढ़ नहीं पाते हैं, जब कटोरे में भोजन दिखे खाने को तैयार हो जाते हैं, वे सामने पड़ने वाली अपनी पसंद की हर चीज़ पर झपटते हैं, जिनकी हमेशा अपनी महत्वाकांक्षाएँ होती हैं, फिर भी उनका मानना होता है कि वे परमेश्वर के इरादों को महत्व दे रहे हैं और निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य निभा रहे हैं—यह मानना गलत है, और यह "निष्ठा" की गलत समझ है। यदि तुम निष्ठावान होना चाहते हो और अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाना चाहते हो, यदि यह तुम्हारा अनुसरण और इच्छा है तो तुमको अपने लिए सबसे पहले उपयुक्त पद ढूँढ़ना होगा, उसके बाद तुमको वह चीज करनी होगी जिसे तुम पूरे दिल और दिमाग से तथा अपनी पूरी शक्ति से कर सकते हो। यह संतोषजनक है और कर्तव्य के ऐसे प्रदर्शन में शुद्धता का अंश मौजूद होता है। यह वही चीज है जो एक सच्चे सृजित प्राणी को करना चाहिए। पहले, तुमको यह समझना जरूरी है कि सच्चा सृजित प्राणी किसे कहते हैं: सच्चा सृजित प्राणी कोई अलौकिक व्यक्ति नहीं होता है, बल्कि वह ऐसा व्यक्ति होता है जो पृथ्वी पर ईमानदारी से और नम्रतापूर्वक रहता है तथा वह बिल्कुल भी असाधारण नहीं होता है। असाधारण नहीं होने से क्या तात्पर्य है? इसका तात्पर्य यह है कि चाहे तुम कितने भी ऊँचे क्यों न हो या जितनी भी ऊँची छ्लांग लगा सकते हो, सच्चाई यह है कि तुम्हारी वास्तविक लंबाई में कोई भी परिवर्तन नहीं होगा, और तुम्हारे पास कोई भी असाधारण क्षमता नहीं होगी। यदि तुम हमेशा दूसरों से आगे निकलने की इच्छा रखते हो तथा दूसरों से श्रेष्ठ बनना चाहते हो, तो यह तुम्हारे अभिमानी और शैतानी स्वभाव से जन्मा है, और यह तुम्हारा भ्रम है। वास्तव में, तुम इसे हासिल नहीं कर सकते, और तुम्हारे लिए ऐसा करना असंभव है। परमेश्वर ने तुमको ऐसी प्रतिभा या कौशल नहीं प्रदान किया और न तो उसने तुम्हें ऐसा सार दिया। यह मत भूलो कि तुम मनुष्य जाति के एक सामान्य और साधारण सदस्य हो, तुम किसी भी तरह से दूसरों से भिन्न नहीं हो, हालांकि तुम्हारा रूप, परिवार और तुम्हारे जन्म का दशक अलग हो सकता है, और तुम्हारी प्रतिभा और गुणों में कुछ अंतर हो सकते हैं। लेकिन यह मत भूलो: चाहे तुम कितने ही भिन्न क्यों न हो, यह केवल इन छोटी-छोटी बातों तक सीमित है, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव दूसरों के ही समान है, और वे सिद्धांत, लक्ष्य एवं नीति जिनका कर्तव्य निर्वाह करते समय पालन करना जरूरी है, दूसरों के समान ही हैं। लोग केवल अपनी शक्ति और गुणों में ही दूसरों से भिन्न होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'व्यक्ति के आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत' से उद्धृत

यह समझना कि उच्च और तुच्छ क्षमता क्या होती हैं, और अपनी स्वयं की क्षमता और अपने ही प्रकृति-सार के बारे में स्पष्ट होना, स्वयं को जानने के लिए फ़ायदेमंद होता है। जब लोग अपनी स्थिति को जानते हैं, तो वे कम ग़लतियाँ करेंगे। जब लोगों के पास खुद का मूल्यांकन होगा, तो वे घमंडी होना बंद कर देंगे, और उनका व्यवहार अधिक कर्तव्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण होगा। स्वयं को न जानने से बहुत परेशानी खड़ी हो सकती है। कुछ लोग हैं जो साधारण क्षमता के होते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वे उच्च क्षमता के हैं। वे मानते हैं कि उनके पास नेतृत्व करने की प्रतिभा है; अंदर से, वे एक अगुवा बनने, टीम की अगुवाई करने के लिए छटपटाते रहते हैं, लेकिन कोई भी उन्हें नहीं चुनता है। और क्या यह उन्हें उत्तेजित नहीं करता है? जब लोग ऐसी चीज़ों से उत्तेजित होते हैं और वे खुद को अस्थिर महसूस करते हैं, तो वे अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से नहीं निभाते हैं, और वे उन मूर्खतापूर्ण चीज़ों को कर सकते हैं जो शर्मजनक होती हैं, उन अर्थहीन चीज़ों को जो परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत होती हैं। इसलिए, और कुछ भी करने से पहले, उन्हें स्वयं को जानने के द्वारा अपने भ्रष्ट स्वभावों के इन मूलभूत खुलासों को संबोधित करना चाहिए। इनमें अभिमानी, असंवेदनशील होना शामिल है, जिसमें लोग हमेशा यह सोचते हैं कि उनकी क्षमता ऊँची है, कि वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर हैं, कि उन्हें दूसरों को प्रशिक्षित करना चाहिए, इत्यादि। एक बार जब इन मुद्दों को हल कर लिया जाता है, तो तुम अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने में दृढ़ हो जाओगे, व्यवहार में अधिक उचित रहोगे, और बाहरी आक्रामकता, अभिमान, दंभ, और यह सोचना कि तुम विशेष हो, जैसे विचार और व्यवहार तुम्हें परेशान नहीं करेंगे, और तुम अधिक परिपक्व हो गए होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

सपनों और वास्तविकता के बीच अक्सर संघर्ष हुआ करता है। प्रायः, लोगों को लगता है कि उनके सपने वैध हैं। क्या वे नहीं जानते कि सपने और वास्तविकता पूरी तरह से अलग होते हैं? सपने केवल वही होते हैं जो तुम चाहते हो, वे क्षणभंगुर पूर्व-व्यस्तता होते हैं, वे अक्सर इच्छाशक्ति या कल्पना से पैदा होते हैं, और वास्तविकता के साथ बेमेल होते हैं। जब लोग अत्यधिक सपने देखते हैं तो अक्सर क्या गलतियाँ होती हैं? वे उस काम की अवहेलना कर देते हैं जो उनकी आँखों के सामने होता है—जो काम उन्हें वर्तमान पल में करना चाहिए। वे वास्तविकता को अनदेखा करते हैं, और उस कर्तव्य को जो उन्हें निभाना चाहिए, उस काम को जो उन्हें करना चाहिए, और उस समय के उनके दायित्वों और जिम्मेदारियों को, दर-किनार कर देते हैं; वे उन्हें बेपरवाही से लेते हैं, अपने स्वयं के सपनों में लिप्त हो जाते हैं, अपनी हर इच्छा पूरी करते हैं, और मनमानी करते हैं। और ऐसा होने पर, ये लोग न केवल सही मायने में अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ होते हैं, बल्कि—जो इससे भी अधिक महत्व की बात है—वे परमेश्वर के घर के काम में भी विलंब करते हैं, और परमेश्वर के घर के काम में खलल डालते हैं। कई लोग न तो सत्य को समझते हैं, और न ही सत्य का अनुसरण करते हैं। वे अपने कर्तव्य को क्या मानते हैं? वे इसे काम, या एक शौक़, या एक रुचि के रूप में मानते हैं। वे इसे परमेश्वर द्वारा दिए गए एक कार्य या मिशन के रूप में, या एक दायित्व-भार के रूप में, नहीं मानते हैं, अपने कर्तव्य को निभाने के लिए सत्य की तलाश करना और परमेश्वर की इच्छा को समझना तो वे और भी कम चाहते हैं। और इसलिए, कुछ ऐसे लोग हैं, जो अपने कर्तव्य को निभाने के दौरान थोड़ी तकलीफ़ झेलते हैं और उनका मन बदल जाता है, और वे सोचने लगते हैं कि इससे कैसे बाहर निकला जाए। जब वे एक कठिनाई या असफलता का सामना करते हैं, तो वे पीछे हट जाते हैं, और फिर से, इससे बाहर निकलने के लिए कोशिश करने लगते हैं। सत्य की तलाश करने के बजाय, वे एक बच निकलने के तरीके के बारे में सोचते हैं। वे कछुए की तरह होते हैं: जैसे ही कुछ होता है, वे अपनी खोल में छिप जाते हैं, और केवल तभी बाहर आते हैं जब यह खत्म हो जाता है। ऐसे बहुत से लोग हैं। विशेष रूप से, कुछ ऐसे लोग होते हैं कि जब उनसे किसी कर्तव्य का वहन करने के लिए कहा जाता है, तो वे इस बारे में कोई विचार नहीं करते कि इसे कैसे वफ़ादारी से किया जाए, इसे कैसे ठीक से किया जाए, या इस काम को कैसे पूरा किया जाए। इसके बजाय, वे सोचते हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी को कैसे टाला जाए, कैसे निपटे जाने से बचा जाए, अपने दायित्व-भार को कैसे त्यागा जाए, और जब कोई समस्या या असफलता आए, तो कैसे खुद को पूरी तरह से अनुपस्थित रखा जाए। पहली बात जिसके बारे में वे सोचते हैं वह उनका अपना पलायन मार्ग होता है; बाक़ी सभी बातों से पहले, वे अपनी स्वयं की वरीयताओं और पसंदों के बारे में सोचते हैं, न कि इस बारे में कि कैसे वे अपने कर्तव्य को पूरा कर सकते हैं और वफ़ादारी से कर सकते हैं। क्या ऐसे लोग सत्य को हासिल कर सकते हैं? वे सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते हैं। उनके लिए, घास हमेशा (कहीं ओर) अधिक हरी होती है: आज वे यह करना चाहते हैं, तो कल वो करना चाहते हैं। उन्हें अन्य हर किसी को मिला काम उनके अपने काम से बेहतर लगता है, और वे सभी (अन्य काम) उन्हें आसान लगते हैं। वे तो बस सत्य के लिए कोई प्रयास ही नहीं करते हैं। जब उनके पास ऐसे विचार हों, तो वे इस पर विचार नहीं करते हैं कि समस्या क्या है, और न ही वे समस्या का समाधान करते हैं। वे केवल बाहरी व्यवहारों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, यह देखते हैं कि किसने प्रसिद्धि पाई है, किसे ऊपर से सराहा गया है, किसे ऊपर तक पहुँच प्राप्त है, किसे काम करते समय निपटाए जाने की आवश्यकता नहीं होती है। ये वो चीज़ें हैं जिनके बारे में वे कभी सोचते हैं। क्या तुम लोग यह कहोगे कि जो लोग केवल इन चीज़ों के बारे में सोचते हैं, वे अपने कर्तव्य को वफ़ादारी से निभा सकते हैं? वैसा कभी नहीं होगा। तो ऐसे कौन-से लोग हैं जो अपने कर्तव्य को इस तरह से निभाते हैं? क्या वे सत्य की तलाश करते हैं? सबसे पहले, अगर कोई एक बात निश्चित हो, तो वह यह है कि इस तरह का व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता है। वे जिन चीज़ों की तलाश करते हैं वे हैं, खुद के लिए परमेश्वर के घर में अनुग्रह प्राप्त करना, कुछ आशीर्वादों का आनंद लेना, अपने लिए एक नाम कमाना, देखा जाना और निगाहों में रहना—जो समाज में होने से अलग नहीं है। सार की दृष्टि से वे किस तरह के लोग होते हैं? वे अविश्वासी होते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (8)' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए हर चीज में समर्पित होना चाहते हो, तो तुम मात्र एक कर्तव्य नहीं निभा सकते; तुम्हें परमेश्वर द्वारा सौंपे गए हर आदेश का पालन करना चाहिए। फिर चाहे वह तुम्हारी रुचि के अनुरूप हो या न हो, तुम्हारे हित सधते हों या न सधते हों, तुम्हें उसमें आनंद आता हो या न आता हो, पहले कभी किया हो या न किया हो या वह कार्य कितना भी मुश्किल हो, उसके बावजूद तुम्हें उसे स्वीकार करके उसके प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। तुम्हें उस कार्य को न केवल स्वीकार कर लेना चाहिए, बल्कि पूरी सक्रियता के साथ सहयोग करना चाहिए, उस कार्य को सीखना चाहिए और प्रवेश करना चाहिए। भले ही तुम्हें कष्ट उठाने पड़ें और तुम्हें अपनी पहचान बनाकर चमकने का अवसर न मिल रहा हो, तुम्हें उस कार्य के प्रति पूरी तरह समर्पित रहना चाहिए। तुम्हें उसे अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए; व्यक्तिगत कार्य नहीं, बल्कि अपना कर्तव्य समझना चाहिए। लोगों को अपने कर्तव्यों को कैसे समझना चाहिए? कोई कार्य कर्तव्य तब होता है जब सृष्टिकर्ता, परमेश्वर, किसी को कोई कार्य करने के लिए दे और उस मुकाम पर, उस व्यक्ति का कर्तव्य भाव जागे। परमेश्वर तुम्हें जो कार्य देता है, परमेश्वर तुम्हें कोई आदेश देता है, वही तुम्हारे लिए कर्तव्य होता है। जब तुम उस कर्तव्य को अपने लक्ष्य के रूप में अपनाते हो और तुम्हारे अंदर परमेश्वर से प्रेम करने वाला दिल होता है, तो क्या तुम फिर भी उस कार्य को नकार सकते हो? तुम्हें उस कार्य को नहीं नकारना चाहिए। तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। यह अभ्यास का मार्ग है। अभ्यास का मार्ग कौन-सा है? (हर कार्य में पूरी तरह से समर्पित होना।) परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए सभी चीजों में समर्पित रहो। यहाँ केन्द्र बिन्दु कहाँ है? यह "सभी चीजों में" है। "सभी चीजों" का मतलब यह नहीं है कि तुम उन चीजों को पसंद करते हो या तुम उन कामों में अच्छे हो, उनका अर्थ यह तो बिल्कुल भी नहीं है कि तुम उन चीजों से वाकिफ हो। कभी तुम्हें सीखना होगा, कभी तुम्हारे सामने कठिनाइयाँ आएँगी और कभी तुम्हें कष्ट उठाना पड़ेगा। लेकिन चाहे वह कोई भी कार्य हो, अगर वह परमेश्वर का आदेश है, तो तुम्हें उसे स्वीकार करना चाहिए, उसे अपना कर्तव्य समझना चाहिए, उसे पूरा करने के लिए समर्पित होना चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना चाहिए : यह अभ्यास का मार्ग है। चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी हो जाए, तुम्हें क्या करना चाहिए, तुम्हें हमेशा सत्य की खोज करनी चाहिए, और एक बार जब तुम निश्चित हो जाते हो कि किस तरह का अभ्यास परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है, तो तुम्हें उसका अभ्यास करना चाहिए। इस तरह से कार्य करना ही सत्य का अभ्यास करना है, और इस तरह से कार्य करना ही सत्य में प्रवेश करना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है' से उद्धृत

लोग ऐसे सृजित प्राणी हैं जिनके पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं है। चूँकि तुम लोग परमेश्वर के प्राणी हो, इसलिए तुम लोगों को एक प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए। तुम लोगों से अन्य कोई अपेक्षाएँ नहीं हैं। तुम लोगों को ऐसे प्रार्थना करनी चाहिए : "हे परमेश्वर, चाहे मेरी हैसियत हो या न हो, अब मैं स्वयं को समझती हूँ। यदि मेरी हैसियत ऊँची है तो यह तेरे उत्कर्ष के कारण है, और यदि यह निम्न है तो यह तेरे आदेश के कारण है। सब-कुछ तेरे हाथों में है। मेरे पास न तो कोई विकल्प हैं न ही कोई शिकायत है। तूने निश्चित किया कि मुझे इस देश में और इन लोगों के बीच पैदा होना है, और मुझे पूरी तरह से तेरे प्रभुत्व के अधीन आज्ञाकारी होना चाहिए क्योंकि सब-कुछ उसी के भीतर है जो तूने निश्चित किया है। मैं हैसियत पर ध्यान नहीं देती हूँ; आखिरकार, मैं मात्र एक प्राणी ही तो हूँ। यदि तू मुझे अथाह गड्ढे में, आग और गंधक की झील में डालता है, तो मैं एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। यदि तू मेरा उपयोग करता है, तो मैं एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण बनाता है, मैं तब भी एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण नहीं बनाता, तब भी मैं तुझ से प्यार करती हूँ क्योंकि मैं सृष्टि के एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। मैं सृष्टि के परमेश्वर द्वारा रचित एक सूक्ष्म प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ, सृजित मनुष्यों में से सिर्फ एक हूँ। तूने ही मुझे बनाया है, और अब तूने एक बार फिर मुझे अपने हाथों में अपनी दया पर रखा है। मैं तेरा उपकरण और तेरी विषमता होने के लिए तैयार हूँ क्योंकि सब-कुछ वही है जो तूने निश्चित किया है। कोई इसे बदल नहीं सकता। सभी चीजें और सभी घटनाएँ तेरे हाथों में हैं।" जब वह समय आएगा, तब तू हैसियत पर ध्यान नहीं देगी, तब तू इससे छुटकारा पा लेगी। तभी तू आत्मविश्वास से, निर्भीकता से खोज करने में सक्षम होगी, और तभी तेरा हृदय किसी भी बंधन से मुक्त हो सकता है। एक बार लोग जब इन चीज़ों से छूट जाते हैं, तो उनके पास और कोई चिंताएँ नहीं होतीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?' से उद्धृत

जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीज़ों से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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Iपूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने,हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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