75. अपनी जगह की पुष्टि करने के सिद्धांत

(1) अपनी ताकतों और प्रतिभाओं के अनुसार अपने कर्तव्य चुनो। जब तक अधिकांश लोग तुम्हारे चुनाव को उचित मानते हैं, तब तक तुम्हें अपने कर्तव्य के रूप में इसकी पुष्टि करनी चाहिए।

(2) जो अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाता है, उसने अपनी जगह ढूँढ ली है, और जो अपना कर्तव्य अच्छी तरह से पूरा करता है, वह एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में दृढ़ है।

(3) अपना कर्तव्य निभाते समय, व्यक्ति को परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। यदि उसे लगता है कि उसका कर्तव्य अनुपयुक्त है, तो वह अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद कर उपयुक्त कर्तव्यों का चयन कर सकता है।

(4) चाहे व्यक्ति का विशेष कर्तव्य कुछ भी हो, उसे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उस पर भरोसा करना चाहिए, और सभी मामलों में, सत्य की तलाश और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। ऐसा करके लोग अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभा सकेंगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्‍वर ने अपनी समूची प्रबंधन योजना में बहुत पहले ही यह तय कर दिया था कि तुम मनुष्य की दुनिया में कितनी बार जन्‍म लोगे, अंतिम दिनों के दौरान, किस वंश और किस परिवार में तुम जन्‍म लोगे, इस परिवार की परिस्थितियाँ कैसी होंगी, तुम पुरुष होगे या स्त्री, तुम्‍हारी खूबियाँ क्‍या होंगी, तुम कितनी शिक्षा प्राप्‍त करोगे, तुम कितने कुशल वक्ता होगे, तुम्हारी क्षमता क्‍या होगी, तुम कैसे दिखोगे, किस उम्र में परमेश्‍वर के घर आओगे और अपने कर्तव्य को निभाना शुरू करोगे, और तुम किस समय कौन-सा कर्तव्‍य पूरा करोगे—परमेश्‍वर ने बहुत पहले तुम्‍हारे प्रत्‍येक कदम को निर्धारित कर दिया था। अपने जन्‍म से पहले, जब तुम पिछले कई जन्मों में मनुष्य के बीच आए थे, परमेश्‍वर ने पहले ही तय कर दिया था कि कार्य के आखिरी चरण में, तुम कौन-सा कर्तव्‍य निभाओगे। यह कोई मजाक नहीं है! यहाँ तक कि तुम्‍हारा यहाँ इस उपदेश को सुनना भी परमेश्‍वर ने पहले से नियत कर दिया था—यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है! इसके अलावा, तुम्‍हारी शारीरिक दशा, एक खास उम्र में तुम्‍हारा अनुभव, तुम किस तरह के कर्तव्य का निर्वाह कर सकते हो, तुम्‍हारी क्षमताएँ और दक्षताएँ—परमेश्‍वर द्वारा तुम्‍हारे लिए ये सब बहुत पहले नियत कर दी गई थीं। यानी, परमेश्‍वर तुम्‍हारा उपयोग करना चाहता है, और यह आदेश और उद्यम सौंपने से पहले, उसने तुम्‍हेंइसके लिए पहले से तैयार कर दिया था। तब क्‍या तुम्‍हारा पलायन करना उचित है? क्‍या तुम्‍हारा हिचकिचाना उचित है? ऐसा करके तुम परमेश्‍वर को निराश करते हो! अपने कर्तव्‍य से मुँह मोड़ने से बड़ा कोई विद्रोह नहीं है—यह एक जघन्‍य पाप है। परमेश्‍वर के इरादे पूरी तरह सच्चे हैं। असंख्‍य युगों पहले ही परमेश्‍वर ने तुम्‍हारे आज के आगमन को पूर्वनियत कर दिया था, और तुम्‍हें यह लक्ष्य सौंप दिया था—तब क्‍या तुम इस लक्ष्य के लिए उत्तरदायी नहीं हो? क्‍या यह तुम्‍हारे जीवन-मात्र का मूल्‍य नहीं है? और अगर तुम परमेश्‍वर द्वारा सौंपा गया लक्ष्य पूरा नहीं करते, तो क्‍या तुम्‍हारे जीने का कोई फायदा है? परमेश्‍वर ने ही तुम्‍हें इस स्थिति में रखा है, उसी ने तुम्‍हें यह काबिलियत दी है, उसी ने तुम्‍हें ये क्षमताएँ और दक्षताएँ दी हैं, उसी ने तुम्‍हें इस युग में रहने की और यह काम करने की सारी परिस्थितियाँ प्रदान की है—लेकिन तुम यह नहीं करते, और तुम पलायन कर जाते हो। तुम सिर्फ एक आरामदेह जीवन जीना चाहते हो, तुम दुनिया में कामयाबी हासिल करना चाहते हो, परमेश्‍वर ने तुम्‍हें जो कुछ दिया है उसका इस्‍तेमाल शैतान की सेवा के लिए करना चाहते हो। क्‍या इससे परमेश्‍वर प्रसन्न हो सकता है? क्‍या यह उसे ख़ुश कर सकता है? तुम अपना लक्ष्य पूरा नहीं करते, तुम परमेश्‍वर द्वारा दिए गए आदेश को पूरा नहीं करते, और तुम परमेश्‍वर के न्‍याय के आसन से बचकर भागते हो। ऐसे लोगों के लिए परमेश्‍वर क्‍या फै़सला करता है? वह उन्‍हें मिटा देता है! तुम कभी भी दोबारा जन्‍म लेकर इस दुनिया में नहीं आओगे। परमेश्‍वर तुम्‍हें दोबारा कभी कोई लक्ष्‍य नहीं सौंपेगा। तुमसे तुम्‍हारा लक्ष्‍य छीन लिया गया है और इसलिए तुम्‍हारे पास कोई अवसर नहीं बचा—–इसका मतलब है कि तुम संकट में फँस चुके हो! परमेश्वर कहेगा, "ऐसा व्‍यक्ति एक बार मेरी दृष्टि से बचकर भाग चुका है, वह मेरे न्‍याय के आसन से भागता है, मेरी उपस्थिति से भागता है। उसने अपना लक्ष्‍य पूरा नहीं किया है और उसने अपना आदेश पूरा नहीं किया है। यह अंत है, उनका जीवन यहीं समाप्त होता है, अब इस पर और चर्चा नहीं की जाएगी, और अब इसका और उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है।" यह कितना दुखद है!

आज, जब तुम लोग परमेश्‍वर के घर में कोई कर्तव्‍य निभाते हो, वह चाहे बड़ा हो या छोटा, चाहे इसमें शारीरिक श्रम करना पड़ता हो या अपने मस्तिष्‍क का प्रयोग, चाहे वह कलीसिया के अंदर या बाहर किया गया हो, तुम जो भी कर्तव्‍य निभाते हो, वह संयोग नहीं है; वह तुम्हारी पसंद नहीं है, वह परमेश्‍वर द्वारा नियंत्रित है। परमेश्‍वर के आदेश के कारण ही तुम प्रेरित होते हो, और तुम्‍हारे भीतर लक्ष्‍य और ज़ि‍म्‍मेदारी का यह बोध है, और तुम यह कर्तव्‍य निभा पा रहे हो। अविश्‍वासियों के बीच ऐसे बहुत-से लोग हैं जो आकर्षक, बुद्धिमान, या सक्षम हैं। लेकिन क्‍या परमेश्‍वर उन पर अनुग्रह करता है? नहीं। परमेश्‍वर सिर्फ़ तुम लोगों पर, इस समुदाय के लोगों पर अनुग्रह करता है। वह अपने प्रबंधन कार्य में तुम्‍हें हर तरह की भूमिकाएँ निभाने के लिए, हर तरह के कर्तव्‍य और दायित्‍व पूरे करने के लिए तैयार करता है, और जब, अंतत:, परमेश्‍वर की प्रबंधन योजना समाप्त हो जाती है और पूरी हो जाती है, तो यह कितने गौरव और सम्‍मान की बात होगी! और इसलिए जब लोगों को अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह करते समय छोटी-मोटी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जब उन्‍हें चीज़ों को छोड़ना और परमेश्वर के लिए खुद को खपाना पड़ता है, जब उन्‍हें कोई क़ीमत चुकानी पड़ती है, जब उन्‍हें अपनी दुनिया में प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और भाग्य गँवाने पड़ते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो परमेश्‍वर ने उनसे वे चीज़ें छीन ली हों—लेकिन उन्‍होंने कोई बड़ी और बेहतर चीज हासिल कर ली है। उन्‍होंने परमेश्‍वर से क्‍या प्राप्त किया है? केवल जब तुमने अपना ने कर्तव्य ठीक से निभाया है, जब तुम परमेश्वर द्वारा सौंपे गये आदेश को पूरा कर लेते हो, जब तुम अपने लक्ष्‍य और आदेश के लिए अपना पूरा जीवन खपा देते हो, और तुम ह तुम एक सार्थक जीवन जीते हो—केवल तभी तुम एक सच्‍चे इंसान हो! और मैं क्यों कहता हूँ कि तुम एक सच्चे व्यक्ति हो? क्‍योंकि परमेश्‍वर ने तुम्हें चुना है, उसने तुम्‍हें इस बात की गुंजाइश दी है कि तुम परमेश्‍वर द्वारा रचे गये एक प्राणी के रूप में उसके प्रबंधन में अपना कर्तव्‍य निभाओ, और तुम्‍हारे जीवन का इससे बड़ा कोई मूल्‍य या अर्थ नहीं हो सकता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के समक्ष समर्पण से संबंधित अभ्यास के सिद्धांत' से उद्धृत

तुम लोगों के आचरण के कौन-से सिद्धांत हैं? तुम्हारा आचरण तुम्हारे पद के अनुसार होना चाहिए, अपने लिए सही पद खोजो और उस पर डटे रहो। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोग एक पेशे में अच्छे होते हैं और उसके सिद्धांतों को समझते हैं, उस संबंध में अंतिम जाँच उन्हें करनी चाहिए; कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने विचार और अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं, जिससे हर व्यक्ति उनके विचार पर आगे कार्य करने और अपने कर्तव्य का बेहतर तरीके से पालन करने में सक्षम हो पाता है—तो फिर उन्हें अपने विचार साझा करने चाहिए। यदि तुम अपने लिए सही पद खोज सकते हो और अपने भाई-बहनों के साथ सद्भाव से कार्य कर सकते हो, तो तुम अपना कर्तव्य पूरा करोगे, और तुम अपने पद के अनुसार आचरण करोगे। यदि तुम केवल अपने कुछ विचार साझा करने में ही सक्षम हो, परंतु अन्य चीजें प्रदान करना चाहते हो, और तुम ऐसा करने की बहुत कोशिश करने के बावजूद इसमें असमर्थ होते हो; और फिर, जब दूसरे लोग अन्य चीजें प्रदान करते हैं, तो तुम असहज हो जाते हो, और सुनना नहीं चाहते, तुम्हारा दिल दुखी और लाचार हो जाता है, और तुम कहते हो कि परमेश्वर अन्यायी है, तुम परमेश्वर को दोष देते हो—तो फिर यह महत्वाकांक्षा है। वह कौन सा स्वभाव है जो किसी व्यक्ति में महत्वाकांक्षा उत्पन्न करता है? व्यक्ति का अभिमानी स्वभाव ही महत्वाकांक्षा उत्पन्न करता है। निश्चित रूप से ऐसी अवस्थाएँ तुम लोगों में किसी भी समय उत्पन्न हो सकती हैं, और यदि तुम लोग इनका समाधान करने के लिए सत्य की खोज नहीं कर सकते हो, न तुम्हारे पास जीवन प्रवेश हो और इस संबंध में बदल नहीं सकते, तो जिस योग्यता और शुद्धता के साथ तुम लोग अपना कर्तव्य करते हो, वह बहुत ही निम्न होगा। यदि तुम इन चीजों को हासिल नहीं कर सकते, तो तुम लोगों के लिए परमेश्वर का यथोचित गुणगान करना भी बहुत मुश्किल होगा। कुछ लोगों के पास दो या तीन क्षेत्रों में प्रतिभाएँ होती हैं, कुछ के पास एक ही क्षेत्र में प्रतिभा होती है, और कुछ के पास कोई भी प्रतिभा नहीं होती है—यदि तुम लोग इन बातों को सही तरीके से समझ सको, तो तुम अपना पद प्राप्त कर लोगे। वे लोग जिन्होंने अपना पद प्राप्त कर लिया है, वे अपने-अपने स्थान के अनुसार आचरण कर सकते हैं और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभा सकते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो कभी भी अपने पद को ढूँढ़ नहीं पाते हैं, जब कटोरे में भोजन दिखे खाने को तैयार हो जाते हैं, वे सामने पड़ने वाली अपनी पसंद की हर चीज़ पर झपटते हैं, जिनकी हमेशा अपनी महत्वाकांक्षाएँ होती हैं, फिर भी उनका मानना होता है कि वे परमेश्वर के इरादों को महत्व दे रहे हैं और निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य निभा रहे हैं—यह मानना गलत है, और यह "निष्ठा" की गलत समझ है। यदि तुम निष्ठावान होना चाहते हो और अपना कर्तव्य संतोषजनक ढंग से निभाना चाहते हो, यदि यह तुम्हारा अनुसरण और इच्छा है तो तुमको अपने लिए सबसे पहले उपयुक्त पद ढूँढ़ना होगा, उसके बाद तुमको वह चीज करनी होगी जिसे तुम पूरे दिल और दिमाग से तथा अपनी पूरी शक्ति से कर सकते हो। यह संतोषजनक है और कर्तव्य के ऐसे प्रदर्शन में शुद्धता का अंश मौजूद होता है। यह वही चीज है जो एक सच्चे सृजित प्राणी को करना चाहिए। पहले, तुमको यह समझना जरूरी है कि सच्चा सृजित प्राणी किसे कहते हैं: सच्चा सृजित प्राणी कोई अलौकिक व्यक्ति नहीं होता है, बल्कि वह ऐसा व्यक्ति होता है जो पृथ्वी पर ईमानदारी से और नम्रतापूर्वक रहता है तथा वह बिल्कुल भी असाधारण नहीं होता है। असाधारण नहीं होने से क्या तात्पर्य है? इसका तात्पर्य यह है कि चाहे तुम कितने भी ऊँचे क्यों न हो या जितनी भी ऊँची छ्लांग लगा सकते हो, सच्चाई यह है कि तुम्हारी वास्तविक लंबाई में कोई भी परिवर्तन नहीं होगा, और तुम्हारे पास कोई भी असाधारण क्षमता नहीं होगी। यदि तुम हमेशा दूसरों से आगे निकलने की इच्छा रखते हो तथा दूसरों से श्रेष्ठ बनना चाहते हो, तो यह तुम्हारे अभिमानी और शैतानी स्वभाव से जन्मा है, और यह तुम्हारा भ्रम है। वास्तव में, तुम इसे हासिल नहीं कर सकते, और तुम्हारे लिए ऐसा करना असंभव है। परमेश्वर ने तुमको ऐसी प्रतिभा या कौशल नहीं प्रदान किया और न तो उसने तुम्हें ऐसा सार दिया। यह मत भूलो कि तुम मनुष्य जाति के एक सामान्य और साधारण सदस्य हो, तुम किसी भी तरह से दूसरों से भिन्न नहीं हो, हालांकि तुम्हारा रूप, परिवार और तुम्हारे जन्म का दशक अलग हो सकता है, और तुम्हारी प्रतिभा और गुणों में कुछ अंतर हो सकते हैं। लेकिन यह मत भूलो: चाहे तुम कितने ही भिन्न क्यों न हो, यह केवल इन छोटी-छोटी बातों तक सीमित है, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव दूसरों के ही समान है, और वे सिद्धांत, लक्ष्य एवं नीति जिनका कर्तव्य निर्वाह करते समय पालन करना जरूरी है, दूसरों के समान ही हैं। लोग केवल अपनी शक्ति और गुणों में ही दूसरों से भिन्न होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'व्यक्ति के आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत' से उद्धृत

कुछ लोग सोचते हैं कि उनके पास किसी क्षेत्र में प्रतिभा या विशेषता है और वे उस क्षेत्र में अपना कर्तव्य निभाने में बहुत अच्छे हैं, इसलिए वे अपनी सिफारिश करने का भरसक प्रयास करते हैं। निस्संदेह, परमेश्वर का घर ऐसे व्यक्ति को निराश नहीं करेगा; परमेश्वर का घर प्रतिभा को सँजोता है और हर प्रकार के व्यक्ति का सर्वोत्तम उपयोग करेगा। जिस भी क्षेत्र में तुम्हारे पास विशेष कौशल और प्रतिभाएँ हों या जिस भी क्षेत्र में तुम अपनी शक्तियों का पूरा उपयोग करने में सक्षम हो, परमेश्वर का घर उस क्षेत्र में तुम्हें बढ़ावा देने और तुम्हारा उपयोग करने की पूरी कोशिश करेगा, और तुम्हारी उपेक्षा नहीं करेगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को लगता है कि उनमें साहित्यिक प्रतिभा है, उन्हें साहित्य से प्रेम है, और वे थोड़ा-बहुत लिख सकते हैं—कि उनके पास इस क्षेत्र में विशेष गुण है। परमेश्वर का घर ऐसे व्यक्ति के लिए लेखन के क्षेत्र में काम करने की व्यवस्था करेगा। लेकिन अगर कुछ समय के बाद वे अच्छी तरह से काम नहीं करते, तो परमेश्वर का घर यह देखेगा कि उन्होंने जिस विशेषता और शौक का दावा किया था वह बस वही है, जो वे अपने बारे में विश्वास करना चाहते हैं, उससे ज्यादा कुछ नहीं है और उनकी प्रतिभा और क्षमता कार्य के लिए उपयुक्त नहीं है। तो क्या किया जाना चाहिए? क्या हम सिर्फ इतने को ही स्वीकार कर सकते हैं और कह सकते हैं, "तुममें जुनून है। हालाँकि तुम बहुत प्रतिभाशाली नहीं हो और औसत क्षमता के हो, लेकिन अगर तुम कड़ी मेहनत करने के लिए इच्छुक और तैयार हो, तो परमेश्वर का घर तुम्हें अपेक्षित प्रतिभा न होने के बावजूद स्वीकार कर लेगा और तुम्हें यहाँ काम करते रहने देगा। चाहे तुम इसे खराब तरह से करो—परमेश्वर का घर आँखें मूँद लेगा, और तुम्हें कोई और काम दिए जाने की आवश्यकता नहीं है"? क्या ऐसे मामलों को सँभालने में परमेश्वर के घर का यही सिद्धांत है? (नहीं।) ऐसी स्थिति आने पर क्या किया जाना चाहिए? (व्यक्ति को उसकी क्षमता और ताकत के अनुसार उसके उपयुक्त कर्तव्य सौंपना चाहिए।) क्या यह करना उचित नहीं है? लेकिन कुछ लोग इसे स्वीकार नहीं कर सकते। तो क्या उनकी इंसानियत में कोई समस्या नहीं है? वह समस्या क्या है? ऐसा व्यक्ति कहता है, "जीवन भर मैं अविश्वासियों की दुनिया में साहित्यकार बनना चाहता था, एक पत्रकार, लेखक या संपादक बनना चाहता था, लेकिन अपनी पारिवारिक परिस्थितियों और अन्य कारणों से मैं अपनी पसंद का काम नहीं कर सका। अब, परमेश्वर के घर में आने के बाद, अंतत: मुझे वह मिल सकता है जो मुझे चाहिए, लेकिन वे कहते हैं कि मैं पर्याप्त क्षमतावान नहीं हूँ, कि मैं इसे अच्छी तरह से नहीं कर सकता, और कि मैं इस कार्य के योग्य नहीं हूँ। वे मुझे यह कार्य नहीं करने देंगे। इसका मतलब है कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी इच्छा पूरी नहीं हो पाएगी। मेरा जुनून और मेरी इच्छा पूरी नहीं हो सकती। मुझे कोई और काम पसंद नहीं है; मैं अपनी रुचि का काम करना चाहता हूँ, लेकिन अब परमेश्वर का घर मुझे ऐसा नहीं करने देगा।" किसी व्यक्ति का मौजूदा कर्तव्य बदलकर उसे कोई अलग कर्तव्य सौंपा जाए, तो उसे सामान्य परिस्थितियों में क्या करना चाहिए? (उसे समर्पित होना चाहिए।) उसे समर्पित क्यों होना चाहिए? परमेश्वर का घर लोगों को उनकी पसंद के अनुसार नहीं, बल्कि कार्य के परिणामों के अनुसार कर्तव्य सौंपता है। क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के घर को लोगों के कर्तव्य उनकी व्यक्तिगत पसंद के अनुसार व्यवस्थित करने चाहिए? क्या व्यक्तियों की पसंद का ध्यान रखना परमेश्वर के घर के द्वारा उनका उपयोग किए जाने की एक पूर्व-शर्त होनी चाहिए? (नहीं।) कौन-सा दृष्टिकोण परमेश्वर के घर में लोगों का उपयोग करने के सिद्धांतों के अनुसार है? कौन-सा दृष्टिकोण सत्य-सिद्धांतों के अनुसार है? वह दृष्टिकोण, जो कार्य के परिणामों और परमेश्वर के घर के कार्य की आवश्यकताओं पर आधारित हो। तुम्हारे अपने शौक, रुचियाँ और इच्छाएँ हैं, लेकिन क्या तुम्हारी इच्छाएँ, रुचियाँ और शौक परमेश्वर के घर के कार्य से अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं? अगर तुम इस पर अड़े रहते हो और कहते हो, "मैं यह करना चाहता हूँ। अगर तुम मुझे यह नहीं करने देते, तो मैं यहाँ नहीं रहना चाहता, मैं अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहता। अगर तुम मुझे यह नहीं करने दोगे, तो जो कुछ भी तुम मुझसे करवाओगे, उसमें मेरा दिल नहीं लगेगा, और मैं उसमें अपना सब-कुछ नहीं लगाऊँगा।" क्या यह शर्मनाक बात नहीं है? क्या अपनी व्यक्तिगत इच्छाएँ, रुचियाँ और शौक पूरे करने के लिए परमेश्वर के घर के कार्य की प्रभावशीलता का त्याग करना सत्य के अनुरूप है? (ऐसा नहीं है।) लोगों को उन मामलों को कैसे लेना चाहिए, जो सत्य के अनुरूप नहीं हैं? कुछ लोग कहते हैं, "उन्हें समूह की खातिर बलिदान देने चाहिए।" क्या यह सही है? क्या यह सत्य है? (नहीं।) यह एक भ्रामक टिप्पणी है, ऐसे शब्द जो दूसरों को भ्रमित करते हैं, प्रच्छन्न शब्द। अगर तुम इन वचनों को अपने कर्तव्य के निष्पादन पर लागू करते हो, तो तुम परमेश्वर की निंदा करते हो। यह परमेश्वर की निंदा क्यों है? परमेश्वर को तुम्हारे बलिदान की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर चाहता है कि लोग सत्य का अभ्यास करें और देह-सुख का त्याग करें, और अगर तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, तो तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभा सकते। अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभाते, तो क्या परमेश्वर का घर तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने के अधिकार से वंचित करता है? क्या वह तुम्हें परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने के अधिकार से वंचित करता है? क्या वह तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने या उनका अभ्यास करने के अधिकार से वंचित करता है? वह ऐसा कुछ नहीं करता। वह तुम्हें बचाए जाने के अवसर और अधिकार से वंचित नहीं करता; वह केवल तुम्हें उस कर्तव्य और परिवेश में स्थानांतरित करता है जो तुम्हारे लिए उपयुक्त है, क्योंकि तुम किसी कर्तव्य विशेष के लिए उपयुक्त नहीं हो। बस इतना ही। यह एक बहुत ही सामान्य बात है और बहुत ही समझने योग्य बात है। इसे सही तरीके से मानना चाहिए। इसे मानने का सही तरीका क्या है? जब यह मामला तुम्हारे सामने आए, तो जो चीज तुम्हें सबसे पहले करनी है, वह है परमेश्वर के घर द्वारा अपने मूल्यांकन को स्वीकार करना। भले ही तुम इस कार्य से व्यक्तिपरक रूप से प्यार करते हो, सच्चाई यह है कि तुम इसके उपयुक्त नहीं हो या इसे अच्छे ढंग से नहीं करते, इसलिए तुम यह काम नहीं कर सकते और तुम्हें किसी अन्य कर्तव्य में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। क्या इसे मानने का यह सही तरीका है? पहले तुम्हें यह समझना चाहिए। तुम्हें कुछ समय तक प्रशिक्षित करने के बाद, जब परमेश्वर का घर देखता है कि तुम अभी भी काम नहीं कर सकते, कि तुम्हारी क्षमता अपर्याप्त है, और तुम इस कर्तव्य के लिए उपयुक्त नहीं हो, तो गधे को नाचने के लिए मजबूर न करो। परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए चीजें मुश्किल नहीं बनाता या लोगों को उनके सामर्थ्य से परे काम करने के लिए मजबूर नहीं करता। तो, क्या इस चीज का उजागर हो जाना तुम्हारे लिए अच्छी बात नहीं थी? पहली बात, यह तुम्हें तुम्हारी पसंद और इच्छाओं के बारे में विवेकशील बनाता है। साहित्य और लेखन के रूप में पहले तुम्हारा एक शौक था, लेकिन वह केवल खयाली पुलाव पर आधारित शौक था, एकतरफा शौक, व्यक्तिपरक इच्छा का प्रकटीकरण। वह तुम्हारी वास्तविक प्रतिभा और क्षमता से बहुत अलग था। परीक्षण-अवधि से गुजरने के बाद तुम, और साथ ही परमेश्वर का घर और तुम्हारे आस-पास के भाई-बहन भी, तुम्हारी सच्ची प्रतिभा और क्षमता को स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं। यह तुम्हारे लिए अच्छी बात है। कम से कम, यह तुम्हें अपनी क्षमता की सीमा का ज्ञान कराता है और तुम्हें अपने आप को सही ढंग से देखने में सक्षम बनाता है। अपने बारे में तुम्हारी समझ अब तुम्हारे शौक और इच्छाओं के बीच अटकी नहीं रहती। कम से कम, तुम्हें अपनी क्षमता की सटीक समझ हो जाती है और तुम उसका सटीक आकलन कर पाते हो। क्या तुम अब अधिक व्यावहारिक नहीं हो जाते? तुम अपनी कल्पना और अपनी इच्छाओं के बीच फँसे नहीं रहते, बल्कि अधिक व्यावहारिक, अधिक यथार्थवादी और अधिक सटीक रूप से समझ जाते हो कि तुम यह काम कर सकते हो या नहीं, या तुम क्या कर सकते हो। यह एक भाग है। स्वयं को जानने में यह सकारात्मक रूप से उपयोगी है। दूसरा, और सबसे महत्वपूर्ण भाग यह है कि चाहे तुम इन चीजों को पहचानने में किसी भी हद तक सक्षम हो, या तुम इन चीजों को बिल्कुल भी पहचानते हो या नहीं, परमेश्वर के घर की व्यवस्था के संबंध में तुम्हारा रवैया कम से कम आज्ञाकारिता का तो होना ही चाहिए। तुम्हें व्यक्तिगत योजनाएँ और विकल्प नहीं चुनने या बनाए रखने चाहिए। यही भाव तुममें सबसे अधिक होना चाहिए। अगर तुम इन चीजों को अभी नहीं पहचानते, तो कोई समस्या नहीं है। अगर तुम आज्ञाकारी हो और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं को स्वीकार करते हो, और आने वाले दिनों में निरंतर प्रगति करते हो, और अगर तुम अपने कर्तव्य को गंभीरता से लेते हो और वफादार हो, तो जैसे-जैसे तुम्हारा अनुभव क्रमश: बढ़ेगा, तुम उन समस्याओं को, जिन्हें तुम अभी नहीं पहचानते, थोड़ा-थोड़ा करके पहचान जाओगे। परमेश्वर तुम्हारे साथ अन्याय नहीं करेगा।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'जब कोई पद या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं' से उद्धृत

सपनों और वास्तविकता के बीच अकसर संघर्ष होता है। प्रायः लोगों को लगता है कि उनके सपने वैध हैं। क्या वे नहीं जानते कि सपने और वास्तविकता पूरी तरह से अलग होते हैं? सपने केवल वह होते हैं जो तुम चाहते हो, वे क्षणिक विचारमग्नता होते हैं, वे अकसर मनमानी या कल्पना से पैदा होते हैं, और वास्तविकता के विपरीत होते हैं। जब लोग अत्यधिक सपने देखते हैं, तो अकसर क्या गलतियाँ होती हैं? वे उस काम की अवहेलना कर देते हैं, जो ठीक उनकी आँखों के सामने होता है—जो काम उन्हें वर्तमान क्षण में करना चाहिए। वे वास्तविकता को अनदेखा करते हैं, और उस कर्तव्य को, जो उन्हें निभाना चाहिए, उस काम को, जो उन्हें करना चाहिए, और उस समय के अपने दायित्वों और जिम्मेदारियों को दरकिनार कर देते हैं; वे उन्हें हलकेपन से लेते हैं, और अपने ही सपनों में लिप्त हो जाते हैं, जो चाहते हैं वह करते हैं, और मनमानी करते हैं। और इसलिए, ये लोग न केवल सही मायने में अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ होते हैं, बल्कि—जो इससे भी अधिक महत्व की बात है—वे परमेश्वर के घर के काम में भी विलंब करते हैं, और परमेश्वर के घर के काम में खलल डालते हैं। कई लोग न तो सत्य को समझते हैं, और न ही सत्य का अनुसरण करते हैं। वे अपने कर्तव्य को क्या मानते हैं? वे उसे काम या एक शौक या एक रुचि मानते हैं। वे इसे परमेश्वर द्वारा दिया गया कार्य या मिशन, या उनके द्वारा उठाई जाने वाली जिम्मेदारी नहीं मानते, अपने कर्तव्य को निभाने के दौरान सत्य की तलाश करना और परमेश्वर की इच्छा को समझना तो वे बिलकुल भी नहीं चाहते। और इसलिए, कुछ ऐसे लोग हैं, जो अपने कर्तव्य को निभाने के दौरान थोड़ी तकलीफ झेलते हैं तो उनका मन बदल जाता है, और वे सोचने लगते हैं कि इससे कैसे बाहर निकला जाए। जब वे किसी कठिनाई या असफलता का सामना करते हैं, तो वे पीछे हट जाते हैं, और तब भी वे इससे बाहर निकलने की कोशिश करने लगते हैं। सत्य की तलाश करने के बजाय वे बच निकलने के तरीके के बारे में सोचते हैं। वे कछुओं की तरह होते हैं : जैसे ही कुछ होता है, वे अपने खोल में छिप जाते हैं, और केवल तभी बाहर आते हैं जब समस्या खत्म हो जाती है। ऐसे बहुत लोग हैं। विशेष रूप से, कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनसे जब कोई कर्तव्य निभाने के लिए कहा जाता है, तो वे इस बारे में कोई विचार नहीं करते कि उसे कैसे वफादारी से किया जाए, उसे कैसे ठीक से किया जाए, या उस काम को कैसे अच्छी तरह से पूरा किया जाए। इसके बजाय वे सोचते हैं कि अपनी जिम्मेदारी को कैसे टाला जाए, कैसे निपटे जाने से बचा जाए, अपनी जिम्मेदारी को कैसे उतार फेंका जाए, कोई समस्या या असफलता आने पर कैसे खुद को पूरी तरह से अनुपस्थित रखा जाए। जो पहली बात वे सोचते हैं, वह है अपने बचने का रास्ता; बाकी सभी बातों से पहले वे अपनी वरीयताओं और पसंदों के बारे में सोचते हैं, न कि इस बारे में कि कैसे वे अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं और वफादारी से कर सकते हैं। क्या ऐसे लोग सत्य हासिल कर सकते हैं? वे सत्य के लिए कोई प्रयास नहीं करते। उनके लिए हमेशा दूर के ढोल सुहावने होते हैं : आज वे यह करना चाहते हैं, तो कल वह करना चाहते हैं। उन्हें अन्य हर किसी का काम अपने काम से बेहतर लगता है, और वे सभी काम उन्हें आसान लगते हैं। वे सत्य के लिए कोई प्रयास ही नहीं करते। ऐसे विचार होने पर वे इस पर चिंतन नहीं करते कि समस्या क्या है, और न ही वे समस्या का समाधान करते हैं। वे हमेशा केवल बाहरी अभ्यासों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, यह देखते हैं कि किसने प्रसिद्धि पाई है, किसे ऊपर वाले द्वारा सराहा गया है, किसका ऊपर वाले से संपर्क होता है, किससे उसके काम करते समय निपटे जाने की आवश्यकता नहीं होती। यही वे सब चीजें हैं, जिनके बारे में वे हमेशा सोचते हैं। क्या तुम लोग यह कहोगे कि जो लोग हमेशा केवल इन्हीं चीजों के बारे में सोचते हैं, वे अपना कर्तव्य वफादारी से निभा सकते हैं? ऐसा कभी नहीं होगा। तो वे किस प्रकार के लोग हैं, जो अपना कर्तव्य इस तरह से निभाते हैं? क्या वे सत्य की तलाश करते हैं? सबसे पहले, अगर कोई एक बात निश्चित है, तो वह यह है कि इस तरह का व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता। वे जिन चीजों की तलाश करते हैं, वे हैं अपने लिए परमेश्वर के घर में अनुग्रह प्राप्त करना, कुछ आशीषों का आनंद लेना, अपने लिए नाम कमाना, लोगों द्वारा देखा जाना और उनकी निगाहों में रहना—जो समाज में होने से अलग नहीं है। सार की दृष्टि से वे किस तरह के लोग होते हैं? वे अविश्वासी होते हैं।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (भाग एक)' से उद्धृत

यह समझना कि उच्च और तुच्छ क्षमता क्या होती हैं, और अपनी स्वयं की क्षमता और अपने प्रकृति-सार के बारे में स्पष्ट होना, स्वयं को जानने के लिए फायदेमंद होता है। जब लोग अपनी स्थिति को जानते हैं, तो वे कम गलतियाँ करेंगे। जब लोगों के पास खुद का मूल्यांकन होगा, तो वे घमंडी होना बंद कर देंगे, और उनका व्यवहार अधिक नैतिक और कर्तव्यनिष्ठ होगा। स्वयं को न जानने से बहुत परेशानी खड़ी हो सकती है। कुछ लोग साधारण क्षमता के होते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वे उच्च क्षमता के हैं। वे मानते हैं कि उनके पास नेतृत्व करने की प्रतिभा है; वे अंदर-ही-अंदर, एक अगुवा बनने, टीम की अगुवाई करने के लिए छटपटाते रहते हैं, लेकिन कोई भी उन्हें नहीं चुनता है। और क्या यह उन्हें बौखलाता नहीं है? जब लोग ऐसी बातों से बौखलाते हैं और खुद को अस्थिर महसूस करते हैं, तो वे अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से नहीं निभाते हैं, और वे ऐसे मूर्खतापूर्ण काम कर सकते हैं जो लज्जाजनक होते हैं, ऐसे अर्थहीन काम जो परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत होते हैं। इसलिए, और कुछ भी करने से पहले, उन्हें स्वयं को जान कर अपने भ्रष्ट स्वभावों के इन मूलभूत खुलासों को संबोधित करना चाहिए। इनमें अहंकारी, विवेकहीन होना और यह सोचते रहना शामिल है कि उनकी क्षमता अच्छी है, कि वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर हैं, कि उन्हें दूसरों को प्रशिक्षित करना चाहिए, इत्यादि। एक बार जब इन मुद्दों को हल कर लिया जाएगा, तो तुम अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने में अडिग रहोगे, अपने व्यवहार में और ज़्यादा सही रहोगे, और ऊपरी आक्रामकता, दंभ, अकड़ और यह सोचते रहना कि तुम विशिष्ट हो, ऐसे विचार और व्यवहार तुम्हें परेशान नहीं करेंगे, और तुम कहीं अधिक परिपक्व हो चुके होगे। कम से कम, तुम्हारे पास एक संत का सम्मानजनक और ईमानदार तरीका होगा, और यही एकमात्र तरीका है जिससे तुम परमेश्वर के सामने आने में सक्षम होगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

परमेश्वर का घर लोगों का उनकी वास्तविक क्षमताओं के अनुसार इष्टतम उपयोग करता है। अगर तुम्हारी मानवता अच्छी लेकिन क्षमता खराब है, तो पूरे तन-मन से अपना कर्तव्य निभाओ। परमेश्वर का अनुमोदन पाने के लिए तुम्हें अगुआ या कार्यकर्ता होने की आवश्यकता नहीं है। अगर तुम उस बात से अपना सरोकार रखने के इच्छुक हो जिससे किसी अगुआ को अपना सरोकार रखना आवश्यक है लेकिन वैसा करने में असमर्थ हो, अगर तुममें अगुआ बनने के लिए आवश्यक गुण नहीं हैं और तुम वह कार्य करने में सक्षम नहीं हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? उस स्थिति में, उस पर अड़े रहकर चीजों को अपने लिए कठिन मत बनाओ। अगर तुम पचास किलो वजन उठा सकते हो, तो बिना दिखावे के पचास किलो वजन ही उठाओ और यह मत कहो, "पचास किलो वजन कम है—मैं इससे ज्यादा वजन उठाना चाहता हूँ! मैं सौ किलो वजन उठाऊंगा, चाहे मैं मर ही क्यों न जाऊँ!" अगुआ या कार्यकर्ता बनने में अक्षम होने से तुम निश्चित रूप से से नहीं मरोगे, लेकिन परमेश्वर के घर के काम में देरी और उसकी प्रगति और दक्षता की दर प्रभावित होगी और इससे कई लोगों के जीवन की प्रगति में भी देरी होगी, यह ऐसी जिम्मेदारी नहीं है जिसे तुम उठा सकते हो, क्योंकि तुम्हारी क्षमता पर्याप्त नहीं है। इस प्रकार, अगर तुममें आत्म-जागरूकता है, तो तुम्हें पद छोड़ने की पहल करनी चाहिए और किसी ऐसे व्यक्ति की अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सिफारिश करनी चाहिए, जिसकी क्षमता अच्छी हो, जो उचित रूप से योग्य हो, और जो तुमसे बेहतर हो। यह बुद्धिमत्तापूर्ण मार्ग है, और ऐसा करके ही व्यक्ति सच्ची मानवता और सच्ची भावना वाला होता है, जो वास्तव में सत्य समझता है और उसका अभ्यास करता है। तुम हमेशा सोचते हो, "हालाँकि मेरी क्षमता खराब है, पर मेरी मानवता अच्छी है। मैं चिंताएँ लेने, कठिनाई सहने और कीमत चुकाने के लिए तैयार हूँ। मैं दृढ़ निश्चयी हूँ और मैं तुमसे अधिक दृढ़ता के साथ काम करता हूँ। मैं सहिष्णु हूँ और निपटे जाने या काट-छाँट किए जाने, या परीक्षा लिए जाने से नहीं डरता। अगर मेरी क्षमता ज्यादा अच्छी नहीं है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है?" यह तुम्हारी निंदा करने के लिए नहीं है, बल्कि तुम्हें वर्गीकृत करने के लिए है, तुम्हें यह स्पष्ट करने के लिए है कि तुम क्या करने में सक्षम हो, तुम्हारे लिए क्या उपयुक्त है, और तुम्हारे लिए कौन-सा कर्तव्य उपयुक्त है। एक और संबंध में, अब तुम्हारे सामने सर्वाधिक व्यावहारिक समस्याओं में से एक यह है कि तुम्हारी गुणवत्ता बहुत कम है। तुम अगुआ का कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते। यह तुम्हारे उपयुक्त नहीं है, और अगर तुम अगुआई करने का प्रयास करते हो, तो तुम परमेश्वर के घर के काम में देरी करोगे। अगर तुम्हें व्यस्त होने में आनंद आता है और तुममें मानवता है, और अगर तुम चिंताएँ लेने और कीमत चुकाने के इच्छुक हो, तो एक कार्य है जो तुम्हारे उपयुक्त है, एक कर्तव्य जिसका तुम्हें पालन करना चाहिए, और परमेश्वर का घर इसकी उचित रूप से व्यवस्था करेगा। तुम्हें अगुआ न बनने देना परमेश्वर के घर के नियमों और सिद्धांतों के अनुरूप है, लेकिन तुम्हारी क्षमता के कारण परमेश्वर का घर निश्चित रूप से तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने के अधिकार से या परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण करने के अधिकार से कभी वंचित नहीं करेगा। क्या यह उचित है? क्या अभी भी इस मामले पर और अधिक विस्तृत संगति की आवश्यकता है? निम्न क्षमता के कुछ लोग यह सुनकर सोचते हैं, "बहुत हुई संगति। मैं कहीं अपना चेहरा नहीं दिखा सकता। मैं जानता हूँ कि मेरी क्षमता खराब है, इसलिए मैं अगुआ या कार्यकर्ता नहीं बनूँगा—समूह-अगुआ या निरीक्षक बनना भी ठीक है, या शायद मैं छोटे-मोटे काम करूँगा, खाना बनाऊँगा, सफाई करूँगा ... सब ठीक है। दूसरे लोग चाहे कुछ भी कहें, मैं बस वही करूँगा जो मुझे करना चाहिए, और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं और परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण करूँगा। निम्न योग्यता का होना भी परमेश्वर का अनुग्रह है। इसमें परमेश्वर की सदिच्छा है, और परमेश्वर गलत ढंग से काम नहीं करता।" अगर तुम चीजों को इस तरह से देख सको, तो ठीक है, और इस समस्या पर और अधिक संगति करने की आवश्यकता नहीं है। संक्षेप में, सत्य को यथावत प्रकट करते हुए हम केवल कम क्षमता वाले लोगों की समस्याओं का विश्लेषण करते हैं, ताकि अधिक लोग इन लोगों के प्रति सही दृष्टिकोण और विचार रख सकें, और ताकि ये लोग अपनी खराब क्षमता के प्रति सही दृष्टिकोण और विचार रख सकें। तब वे अपने आप को सही ढंग से रख सकते हैं और अपना उपयुक्त स्थान और कर्तव्य पा सकते हैं, ताकि उनके द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत और कठिनाई सहन करने के उनके संकल्प को उचित उपयोग में लाया जा सके और उनसे काम शुरू करवाया जा सके। इससे सत्य की तुम्हारी समझ या सत्य का तुम्हारा अभ्यास प्रभावित नहीं होता। और इससे परमेश्वर के घर या उसकी उपस्थिति में तुम्हारी छवि भी प्रभावित नहीं होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

सृष्टिकर्ता चाहे जो भी करे, जिस भी तरह से अभिव्यक्त करे, उसका कार्य बड़ा हो या छोटा, वह फिर भी सृष्टिकर्ता ही है; जबकि समस्त मनुष्य, जिन्हें उसने सृजित किया, चाहे उन्होंने कुछ भी किया हो, या वे कितने भी प्रतिभाशाली और अभीष्ट क्यों न हों, वे सृजित प्राणी ही रहते हैं। जहाँ तक सृजित मनुष्यों का सवाल है, चाहे जितना भी अनुग्रह और जितने भी आशीष उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्राप्त कर लिए हों, या जितनी भी दया, प्रेमपूर्ण करुणा और उदारता प्राप्त कर ली हो, उन्हें खुद को भीड़ से अलग नहीं मानना चाहिए, या यह नहीं सोचना चाहिए कि वे परमेश्वर के बराबर हो सकते हैं और सृजित प्राणियों में ऊँचा दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। परमेश्वर ने तुम्हें चाहे जितने उपहार दिए हों, या जितना भी अनुग्रह प्रदान किया हो, या जितनी भी दयालुता से उसने तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या चाहे उसने तुम्हें कोई विशेष प्रतिभा दी हो, इनमें से कुछ भी तुम्हारी संपत्ति नहीं है। तुम एक सृजित प्राणी हो, और इस तरह तुम सदा एक सृजित प्राणी ही रहोगे। तुम्हें कभी नहीं सोचना चाहिए, "मैं परमेश्वर के हाथों में उसका लाड़ला हूँ। वह मुझ पर हाथ नहीं उठाएगा। परमेश्वर का रवैया मेरे प्रति हमेशा प्रेम, देखभाल और नाज़ुक दुलार के साथ-साथ सुकून के गर्मजोशी भरे बोलों और प्रोत्साहन का होगा।" इसके विपरीत, सृष्टिकर्ता की दृष्टि में तुम अन्य सभी सृजित प्राणियों की ही तरह हो; परमेश्वर तुम्हें जिस तरह चाहे, उस तरह इस्तेमाल कर सकता है, और साथ ही तुम्हारे लिए जैसा चाहे, वैसा आयोजन कर सकता है, और तुम्हारे लिए सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीज़ों के बीच जैसी चाहे वैसी प्रत्येक भूमिका निभाने की व्यवस्था कर सकता है। लोगों को यह ज्ञान होना चाहिए और उनमें यह अच्छी समझ होनी चाहिए। अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो परमेश्वर के साथ उसका संबंध अधिक सामान्य हो जाएगा, और वह उसके साथ एक सबसे ज़्यादा वैध संबंध स्थापित कर लेगा; अगर व्यक्ति इन वचनों को समझ और स्वीकार सके, तो वह अपने स्थान को सही ढंग से उन्मुख कर पाएगा, वहाँ अपना आसन ग्रहण कर पाएगा और अपना कर्तव्य निभा पाएगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से उद्धृत

जीवधारियों में से एक होने के नाते, मनुष्य को अपनी स्थिति को बना कर रखना होगा और शुद्ध अंतःकरण से व्यवहार करना होगा। सृष्टिकर्ता के द्वारा तुम्हें जो कुछ सौंपा गया है, कर्तव्यनिष्ठा के साथ उसकी सुरक्षा करो। अनुचित ढंग से आचरण मत करो, या ऐसे काम न करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की चेष्टा मत करो, दूसरों से श्रेष्ठ होने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अद्भुत व्यक्ति बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना और भी अधिक लज्जाजनक है; यह घृणित है और नीचता भरा है। जो काम तारीफ़ के काबिल है और जिसे प्राणियों को सब चीजो से ऊपर मानना चाहिए, वह है एक सच्चा जीवधारी बनना; यही वह एकमात्र लक्ष्य है जिसे पूरा करने का निरंतर प्रयास सब लोगों को करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

पिछला: 74. कर्तव्य के प्रति दृष्टिकोण के सिद्धांत

अगला: 76. परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें