12. पवित्र आत्मा के कार्यरत होने की पुष्टि के सिद्धांत

(1) जो पवित्र आत्मा से आता है वह निश्चित रूप से परमेश्वर के वचन सत्य के अनुरूप होता है। वह कभी भी इसका खंडन नहीं करता है और यह स्पष्ट रूप से इंसान की धारणाओं और कल्पनाओं का हिस्सा नहीं होता है।

(2) जो पवित्र आत्मा से आता है वह लोगों को सत्य और परमेश्वर की इच्छा को समझने की ओर ले जाता है। यह उनके दिलों को रोशन कर सकता है और उन्हें अभ्यास करने के लिए एक मार्ग दे सकता है।

(3) जो पवित्र आत्मा से आता है वह लोगों तक प्रकाश ला सकता है और उन्हें अंधकार से मुक्ति दिला सकता है, जिससे उन्हें परमेश्वर का व्यावहारिक ज्ञान और जीवन-प्रवेश के मार्ग पर स्पष्टता दे सकता है।

(4) जो पवित्र आत्मा से आता है, वह लोगों के जीवन-प्रवेश में लाभदायक हो सकता है और उन्हें परमेश्वर पर उनके विश्वास में सही मार्ग पर कदम रखने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे वे सत्य का अभ्यास कर सकें।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

पवित्र आत्मा का कार्य सक्रिय मार्गदर्शन और सकारात्मक प्रबोधन है। यह लोगों को निष्क्रिय नहीं बनने देता। यह उनको सांत्वना देता है, उन्हें विश्वास और संकल्प देता है और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने योग्य बनाता है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सक्रिय रूप से प्रवेश कर पाते हैं; वो निष्क्रिय या बाध्य नहीं होते, बल्कि अपनी पहल पर काम करते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग प्रसन्न और सहर्ष प्रस्तुत होते हैं, आज्ञा मानने को तैयार होते हैं और स्वयं को विनम्र रखने में प्रसन्न होते हैं। यद्यपि वे भीतर से दुखी और दुर्बल होते हैं, उनमें सहयोग करने का संकल्प होता है; वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे आज्ञा मानने में सक्षम होते हैं और मानवीय इच्छा से कलंकित नहीं होते हैं, मनुष्य की सोच से कलंकित नहीं होते हैं और निश्चित रूप से वे मनुष्य की आकांक्षाओं और प्रेरणाओं से कलंकित नहीं होते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो भीतर से वे विशेष रूप से पवित्र हो जाते हैं। जो पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन हैं, वे परमेश्वर के प्रेम और अपने भाइयों और बहनों के प्रेम को जीते हैं; वे ऐसी चीज़ों से आनंदित होते हैं, जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं और उन चीज़ों से घृणा करते हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, उनमें सामान्य मानवता होती है और वे निरंतर सत्य का अनुसरण करते हैं और मानवता के अधीन होते हैं। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, उनकी स्थिति और भी बेहतर हो जाती है और उनकी मानवता और अधिक सामान्य हो जाती है और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएं सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे रुकावट बनने का प्रयास नहीं करते और उनमें दुर्भाव नहीं होता। पवित्र आत्मा का कार्य सामान्य और वास्तविक होता है, पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर मनुष्य के सामान्य जीवन के नियमों के अनुसार कार्य करता है और वह सामान्य लोगों के वास्तविक अनुसरण के अनुसार लोगों में प्रबोधन और मार्गदर्शन को कार्यान्वित करता है। जब पवित्र आत्मा लोगों में कार्य करता है, तो वह सामान्य लोगों की आवश्यकता के अनुसार उनका मार्गदर्शन करता और उन्हें प्रबुद्ध करता है। वह उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी ज़रूरतें पूरी करता है और वह सकारात्मक रूप से उनकी कमियों और अभावों के आधार पर उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें प्रबुद्ध करता है। पवित्र आत्मा का कार्य वास्तविक जीवन में लोगों को प्रबुद्ध करने और उनका मार्गदर्शन करने का है; अगर वे अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव करते हैं, तभी वे पवित्र आत्मा का कार्य देख सकते हैं। यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनका जीवन सामान्य आध्यात्मिक हो, तो वे पवित्र आत्मा के कार्य के अधीन होते हैं। ऐसी स्थिति में, जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो उनमें विश्वास आता है; जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं, जब उनके साथ कुछ घटितहोता है, तो वे निष्क्रिय नहीं होते; और घटित होती हुई चीज़ों से सबक़ लेने में समर्थ होते हैं, जो परमेश्वर चाहता है कि वो सीखें। वे निष्क्रिय या कमज़ोर नहीं होते और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, वे परमेश्वर के सभी प्रबंधनों की आज्ञा मानने के लिए तैयार रहते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

ऐसी अनेक स्थितियाँ होती हैं जिनमें तुम्हें पता नहीं चलता कि अभ्यास कैसे करें, पवित्र आत्मा के कार्य की तो तुम्हें और भी कम जानकारी होती है। कभी-कभी तुम कुछ ऐसा कर देते हो जो साफ तौर पर पवित्र आत्मा की अवज्ञा होती है। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के ज़रिए, पहले ही इस मामले में सिद्धांत पर तुम्हारी पकड़ है, इसलिए तुम्हारे अंदर शर्मिंदगी और बेचैनी की अंदरूनी भावना है; बेशक, इस तरह की भावना थोड़ा-बहुत सत्य जानने के आधार के अंतर्गत ही आएगी। अगर लोग परमेश्वर के आज के वचन से सहयोग न करें या उनके अनुरूप अभ्यास न करें, तो फिर वे पवित्र आत्मा के कार्य को बाधित कर रहे हैं और वे यकीनन अपने अंदर बेचनी महसूस करेंगे। मान लो कि तुम किसी पहलू विशेष के सिद्धांत को समझते हो लेकिन तुम उसके अनुरूप अभ्यास नहीं करते, तो फिर तुम्हारे अंदर शर्मिंदगी की भावना आएगी। अगर तुम सिद्धांत को नहीं समझते और सत्य के इस पहलू को बिल्कुल भी नहीं जानते, तो फिर ज़रूरी नहीं कि तुम इस मामले में शर्मिंदगी महसूस करो। पवित्र आत्मा की फटकार हमेशा प्रसंग के अनुसार होती है। तुम्हें लगता है कि चूँकि तुमने प्रार्थना नहीं की और पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग नहीं किया, इसलिए तुम्हारे कारण कार्य में देरी हो गयी। जबकि सच्चाई यह है कि इसमें देरी नहीं की जा सकती। पवित्र आत्मा किसी और को प्रेरित कर देगा; पवित्र आत्मा के कार्य में कोई रुकावट नहीं डाल सकता। तुम्हें लगता है कि तुमने परमेश्वर को निराश कर दिया, यह भावना तुम्हारी अंतरात्मा में आनी चाहिए। तुम सत्य हासिल कर पाते हो या नहीं, यह तुम्हारा अपना मामला है और इसका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं। कभी-कभी तुम्हारी अपनी अंतरात्मा ही अपराधी महसूस करती है, लेकिन यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन या प्रकाशन नहीं है, न ही यह पवित्र आत्मा की फटकार है। बल्कि यह इंसानी ज़मीर के अंदर की भावना है। अगर तुम ऐसे मामलों में जहाँ परमेश्वर का नाम, परमेश्वर की गवाही या परमेश्वर का कार्य जुड़ा हुआ है, स्वच्छंदता से पेश आते हो, तो परमेश्वर तुम्हें छोड़ेगा नहीं। लेकिन इसकी एक सीमा है—परमेश्वर सामान्य और छोटे मामलों में तुम्हें लेकर परेशान नहीं होगा। वो तुम्हें नजरंदाज कर देगा। अगर तुम सिद्धांतों का उल्लंघन करोगे और परमेश्वर के काम में बाधा डालोगे और परेशानी पैदा करोगे, तो फिर तुम पर उसका क्रोध फूटेगा और वह तुम्हें बिल्कुल नहीं बख्शेगा। मानवीय जीवन के दौरान तुम जो कुछ गलतियाँ करते हो, उन्हें टाला नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए, तुम अपनी रोटी सही ढंग से नहीं सेंकते और कहते हो कि यह तुम्हारे लिए परमेश्वर का अनुशासन है—ऐसा कहना पूरी तरह से विवेकहीन बात है। परमेश्वर में आस्था रखने से पहले, क्या तुम्हारे साथ ऐसा अक्सर नहीं होता था? तुम्हें यह पवित्र आत्मा का अनुशासन लगता है, जबकि सच्चाई यह है कि ऐसा नहीं है (कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर), क्योंकि यह कार्य पूरी तरह से पवित्र आत्मा से नहीं आता, बल्कि इंसानी भावनाओं से आता है। हालाँकि, आस्था रखने वालों के लिए इस तरह से सोचना एक सामान्य बात है। जब तुम परमेश्वर में आस्था न रखते थे तो इस तरह से नहीं सोचते। एक बार तुम परमेश्वर में आस्था रखने लगे, तो तुम इन बातों पर ज़्यादा विचार करने लगे और इसलिए स्वाभाविक रूप से तुम इस तरह से सोचने लगे। यह सामान्य लोगों की सोच से पैदा होती है और इसका संबंध उनकी मानसिकता से है। लेकिन मैं तुम्हें एक बात बता दूँ, ऐसी सोच पवित्र आत्मा के कार्य के दायरे में नहीं आती। यह पवित्र आत्म का लोगों को उनकी सोच के ज़रिए सामान्य प्रतिक्रिया देने का उदाहरण है; लेकिन तुम्हें यह समझना चाहिए कि यह प्रतिक्रिया पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है। इस तरह का "ज्ञान" रखने से यह साबित नहीं होता कि तुम्हारे अंदर पवित्र आत्मा का कार्य है। तुम्हारा ज्ञान पवित्र आत्मा के प्रबोधन से नहीं आता, यह पवित्र आत्मा का कार्य तो बिल्कुल भी नहीं है। यह मात्र सामान्य इंसानी सोच का नतीजा है और इसका संबंध पवित्र आत्मा के प्रबोधन या प्रकाशन से बिल्कुल भी नहीं है—ये साफ तौर पर विशिष्ट घटनाएँ हैं। ऐसी सामान्य इंसानी सोच पवित्र आत्मा से बिल्कुल उत्पन्न नहीं होती। जब पवित्र आत्मा लोगों को प्रबुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो वह आम तौर पर उन्हें परमेश्वर के कार्य का, और उनकी सच्ची प्रविष्टि और सच्ची अवस्था का ज्ञान देता है। वह उन्हें परमेश्वर के अत्यावश्यक इरादों और उसकी मनुष्य से वर्तमान अपेक्षाओं के बारे में समझने देता है, ताकि उनके पास परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ बलि कर देने का संकल्प हो, ताकि वे परमेश्वर से अवश्य प्रेम करें भले ही वे उत्पीड़न और प्रतिकूल परिस्थितियों को भुगतें, ताकि वे परमेश्वर की गवाही दें भले ही इसका अर्थ अपना खून बहाना और अपना जीवन अर्पित करना हो; उन्हें कोई अफ़सोस नहीं होगा। यदि तेरा इस तरह का संकल्प है तो इसका अर्थ है कि तुझमें पवित्र आत्मा की हरकतें है, और पवित्र आत्मा का कार्य है—लेकिन जान ले कि तू हर गुजरते पल में इस तरह की हरकतों से संपन्न नहीं है। कभी-कभी बैठकों में जब तू प्रार्थना करता है और परमेश्वर के वचनों को खाता और पीता है, तो तू बेहद द्रवित और प्रेरित महसूस कर सकता है। जब अन्य लोग परमेश्वर के वचनों के अपने अनुभव और समझ पर कुछ संगति साझा करते हैं तो यह बहुत नया और ताजा महसूस होता है, और तेरा हृदय पूरी तरह से स्पष्ट और उज्ज्वल हो जाता है। यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। यदि तू कोई अगुवा है और पवित्र आत्मा तुझे असाधारण प्रबुद्धता और रोशनी देता है, तो जब तू काम करने के लिए कलीसिया में जाता है, वह उन समस्याओं को देखने देता है जो कलीसिया के भीतर मौज़ूद हैं, और जानने देता है कि उनका समाधान करने के लिए सत्य पर संगति को कैसे साझा करें, तुझे अविश्वसनीय रूप से नेक, जिम्मेदार और अपने कार्य में गंभीर बनाता है, तो यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (1)' से उद्धृत

जब लोगों की परिस्थितियां सामान्य होती हैं, तो उनके आध्यात्मिक जीवन और दैहिक जीवन भी सामान्य होते हैं, उनका विवेक सामान्य और व्यवस्थित होता है। जब वो इस दशा में होते हैं, जो वे अपने भीतर अनुभव करते या जान पाते हैं, उसके विषय में कहा जा सकता है कि वह पवित्र आत्मा के स्पर्श से आया है (जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, तो अंतर्दृष्टि रखना या कुछ सरल ज्ञान रखना, या कुछ चीज़ों में विश्वासयोग्य बने रहना, या कुछ चीज़ों में परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य रखना—यह सब पवित्र आत्मा से आता है)। मनुष्य में पवित्र आत्मा का कार्य विशेष रूप से सामान्य है; मनुष्य इसको महसूस करने के असमर्थ है और यह स्वयं मनुष्य द्वारा ही आता प्रतीत होता है—परंतु वास्तव में यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है। दिन-प्रतिदिन के जीवन में पवित्र आत्मा प्रत्येक में बड़े और छोटे रूप में कार्य करता है और यह इस कार्य की सीमा है, जो बदलती रहती है। कुछ लोगों की काबिलियत अच्छी होती है और वे बातों को जल्दी समझ लेते हैं और उनमें पवित्र आत्मा का प्रबोधन विशेष रूप से अधिक होता है। इस बीच, कुछ लोगों की काबिलियतकम होती है और उन्हें बातों को समझने में अधिक समय लगता है, परंतु पवित्र आत्मा उन्हें भीतर से स्पर्श करता है और वे भी परमेश्वर के प्रति निष्ठा को प्राप्त कर पाते हैं—पवित्र आत्मा उन सबमें कार्य करता है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग परमेश्वर का विरोध नहीं करते या परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह नहीं करते, ऐसे कार्य नहीं करते, जो परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा डालें और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते, तो उनमें से प्रत्येक में परमेश्वर का आत्मा अधिक या कम सीमा तक काम करता है; वह उन्हें स्पर्श करता है, प्रबुद्ध करता है, उन्हें विश्वास प्रदान करता है, सामर्थ्य देता है और सक्रिय रूप से प्रवेश करने के लिए बढ़ाता है, आलसी नहीं बनने देता या देह के आनंद लेने का लालच नहीं करने देता, सत्य के अभ्यास को तैयार करता है और परमेश्वर के वचनों की चाहत रखने वाला बनाता है। यह सब ऐसा कार्य है, जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का काम लोगों की सबसे अधिक मदद इस तरह करता है, कि वह उन्हें कई सत्यों को जानने की, और परमेश्वर की इच्छा को कुछ-कुछ समझने की, अनुमति देता है, उन्हें परमेश्वर की इच्छा के खिलाफ काम करने से रोकता है, और उन्हें सही दिशा में काम करने में, और सही रास्ते से न भटकने में, सक्षम बनाता है। पवित्र आत्मा द्वारा लोगों को प्रबुद्ध करने के कार्य का उद्देश्य क्या होता है? कभी-कभी, यह लोगों का मार्गदर्शन करने की भूमिका निभाता है; कभी-कभी, यह तुम्हें याद दिलाने का काम करता है। जब तुम भटकने वाले होते हो, तो वह तुम्हें चलने की लाठी की तरह सहारा देता है, तुम्हारी सहायता करता है, तुम्हें सही राह पर आगे बढ़ाता और तुम्हारा मार्गदर्शन करता है। पवित्र आत्मा चाहे लोगों को जिस तरह भी प्रकाश और समझ के साथ प्रबुद्ध करता हो, या चाहे यह उनकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि के साथ बदलता हो, सत्य का कभी भी कोई उल्लंघन या इसके साथ कोई द्वंद्व नहीं होता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति इसी तरह से अनुभव करे, ईमानदारी से तलाश और प्रार्थना करे, सच्चाई से आज्ञा का पालन करे, यदि पवित्र आत्मा लगातार इसी तरह काम करता रहे, यदि लोग उत्सुक और सूक्ष्म बुद्धि के हों, और यदि पवित्र आत्मा का प्रबोधन उन पर व्यर्थ न जाए, तो उनका क़द बहुत जल्दी बढ़ेगा। उन्होंने अवसर का लाभ उठा लिया होगा। पवित्र आत्मा के कार्य की एक विशेषता यह होती है कि यह बहुत तेज होता है—यह एक कौंध मात्र में ही पूरा हो जाता है। यह बुरी आत्माओं के काम की तरह नहीं होता, जिसमें तुम पर हमेशा जोर डाला जाता है, और तुम किसी अन्य तरीके से काम नहीं कर सकते हो। कभी-कभी, जब तुम खतरे की कगार पर होते हो, तो पवित्र आत्मा तुम्हें एक एहसास देकर काम करता है, जिससे तुम अंदर से असहज और चिंतित महसूस करते हो। यह विशेष परिस्थितियों के तहत होता है। अधिकतर, लोगों के सामान्य अनुभव के दौरान, उन्हें एक हल्की-सी भावना या सूक्ष्म विचार या ख्याल दिया जाता है; तुम उसका अर्थ समझने के लिए प्रेरित किए जाते हो, और फिर इस अर्थ को मानव मस्तिष्क के माध्यम से मानवीय शब्दों में गढ़ा जाता है। वास्तव में, यदि लोग हमेशा इस तरह से अनुभव करें, अगर उनके पास ये सत्य आधारभूत रूप से हों, अगर उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य हो, और अगर वे हमेशा इसका लाभ उठाने में सक्षम होते हैं, तो उनके लिए सही मार्ग से विचलित होने की कोई संभावना नहीं होती है। यहाँ तक कि अगर, पूरे समय तक, कोई भी तुम्हारे साथ सहभागिता न करे, कोई भी तुम्हारा मार्गदर्शन न करे, और तुम्हें कोई भी कार्य-व्यवस्था न दी जाए, अगर तुम इसी दिशा में आगे बढ़ते हो, तो तुम निश्चित रूप से गलत मार्ग को नहीं अपनाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज को सत्य की आँखों से देखो' से उद्धृत

पवित्र आत्मा मनुष्य में जो प्रबुद्धता गढ़ता है, वह तब घटित होता है जब मनुष्य एक सामान्य स्थिति में होता है; ऐसे समय पर, मनुष्य प्रायः स्वयं को प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता को अपना वास्तविक अध्यात्मिक कद समझने की ग़लती कर बैठता है, क्योंकि जिस रूप में पवित्र आत्मा प्रबुद्ध करता है, वह अत्यंत सामान्य होता है, और वह मनुष्य के भीतर जो अंतर्निहित है, उसका उपयोग करता है। जब लोग कार्य करते और बोलते हैं, या जब वे प्रार्थना या अपनी आध्यात्मिक भक्ति कर रहे होते हैं, तो एक सत्य अचानक उन पर स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन वास्तव में, मनुष्य जो देखता है, वह केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रदान की जाने वाली प्रबुद्धता होती है (स्वाभाविक रूप से यह प्रबुद्धता मनुष्य के सहयोग से जुड़ी है) और वह मनुष्य का सच्चा आध्यात्मिक कद प्रस्तुत नहीं करती। अनुभव की एक अवधि के बाद, जिसमें मनुष्य कुछ कठिनाइयों और परीक्षणों का सामना करता है, ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद प्रत्यक्ष हो जाता है। केवल तभी मनुष्य को पता चलता है कि मनुष्य का आध्यात्मिक कद बहुत बड़ा नहीं है, और मनुष्य का स्वार्थ, व्यक्तिगत हित और लालच सब उभर आते हैं। केवल इस तरह के अनुभवों के कई चक्रों के बाद ही कई ऐसे लोग, जो अपनी आत्माओं के भीतर जाग गए होते हैं, महसूस करते हैं कि अतीत में जो उन्होंने अनुभव किया था, वह उनकी अपनी वास्तविकता नहीं थी, बल्कि पवित्र आत्मा से प्राप्त एक क्षणिक रोशनी थी, और मनुष्य को केवल यह रोशनी प्राप्त हुई थी। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को सत्य को समझने के लिए प्रबुद्ध करता है, तो ऐसा प्रायः स्पष्ट और विशिष्ट तरीके से होता है, यह समझाए बिना कि चीज़ें किस तरह घटित हुई हैं या किस ओर जा रही हैं। अर्थात्, इस प्रकाशन में मनुष्य की कठिनाइयों को शामिल करने के बजाय वह सत्य को सीधे प्रकट करता है। जब मनुष्य प्रवेश की प्रक्रिया में कठिनाइयों का सामना करता है, और फिर पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता को शामिल करता है, तो यह मनुष्य का वास्तविक अनुभव बन जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य सकारात्मक उन्नति है, जबकि शैतान का कार्य है पीछे हटना, नकारात्मकता, विद्रोह, परमेश्वर के के प्रति प्रतिरोध, परमेश्वर में विश्वास की कमी, भजनों को गाने तक की अनिच्छा और अपना कर्तव्य निभाने में बहुत कमज़ोर होना। वह सब कुछ जो पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उपजता है, वह काफ़ी स्वाभाविक होता है; यह तुम पर थोपा नहीं जाता। यदि तुम इसका अनुसरण करते हो, तो तुम्हें शांति मिलेगी; और यदि तुम ऐसा नहीं करते, फिर बाद में तुम्हें फटकारा जाएगा। पवित्र आत्मा के प्रबोधन के बाद तुम जो भी करते हो, उसमें कोई हस्तक्षेप या रोक नहीं होगी; तुम स्वतंत्र होगे, तुम्हारे कार्यों में अभ्यास का एक मार्ग होगा और तुम किन्हीं अंकुशों के अधीन नहीं होगे बल्कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करने के योग्य होगे। शैतान का कार्य तुमसे बहुत-सी बातों में व्यवधान पैदा कराता है; यह तुम्हें प्रार्थना करने से विमुख करता है, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में बहुत आलसी बनाता है, कलीसिया का जीवन जीने से विमुख करता है, और यह आध्यात्मिक जीवन से दूर कर देता है। पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारे दैनिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता और तुम्हारे सामान्य आध्यात्मिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य' से उद्धृत

पवित्र आत्मा का आन्तरिक मार्गदर्शन बिल्कुल भी लोकोत्तर नहीं है; वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है। यानी, अपने दिल की गहराई में तुम जानते हो कि कार्य करने का यही उपयुक्त और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार वास्तव में बहुत ही स्पष्ट है; यह तुम्हारी गंभीर सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि एक तरह की भावना है जो तुम्हारे भीतर से निकली है, और कभी-कभी तुम पूरी तरह से नहीं समझ पाते कि तुम इस तरह से कार्य क्यों करते हो। यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन ही होता है, अधिकांश लोगों में आम तौर पर यह ऐसे ही घटित होता है। इंसान के अपने विचार अक्सर सोच और चिंतन का परिणाम होते हैं और उनमें उनकी मनमानी और उन विचारों की मिलावट होती है जो इससे जुड़े होते हैं कि ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिनमें आत्म-लाभ ढूँढा जा सकता है, और कौन-से निजी फायदे प्राप्त किए जा सकते हैं; हर इंसानी निर्णय में इन बातों का समावेश होता है। लेकिन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी कोई मिलावट नहीं होती। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रबोधन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत आवश्यक है; विशेषकर तुम्हें मुख्य विषयों में बहुत सावधान रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो अपना दिमाग लगाना पसंद करते हैं, जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसंद करते हैं, बहुत संभव है कि वे ऐसे मार्गदर्शन और प्रबोधन में चूक जाएँ।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

किस तरह के व्यक्ति को पवित्र आत्मा प्रबुद्ध करता है? उन्हें जो कुशाग्र और सूक्ष्म बुद्धि के होते हैं। जब उन्हें एक भावना दी जाती है या एक प्रबोधन दिया जाता है, तो वे समझ सकते हैं कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है और इसे परमेश्वर कर रहा है। कभी-कभी वे तुरंत ही यह बता सकते हैं कि पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें धिक्कारा जा रहा है और इसलिए वे खुद को संयत कर लेते हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा प्रबुद्ध करता है। यदि कोई लापरवाह है और आध्यात्मिक चीज़ों को नहीं समझता है, तो उन्हें यह अहसास नहीं होगा कि कब उन्हें एक भावना दी जा रही है। वे पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति बेख़बर होते हैं और इसलिए पवित्र आत्मा उन्हें प्रबुद्ध करने की दोबारा कोशिश नहीं करेगा। यदि वे तीन या चार प्रयासों के बाद भी अग्रहणशील बने रहते हैं, तो अब पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं करेगा। ऐसा क्यों है कि कुछ लोग जितना आगे बढ़ें, वे अपने भीतर अन्धकारमय, उदास, हताश, और पवित्र आत्मा के कार्य से वंचित महसूस करते हैं? उनके भीतर बेजान चीज़ों, निष्प्राण सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं होता है, तो वे संभवतः कैसे ऊर्जावान महसूस कर सकते हैं? लोग केवल अपने उत्साह पर भरोसा करके लंबे समय तक नहीं टिकते हैं। शक्ति पाने के लिए तुम्हें सत्य को समझना होगा। इसलिए तुम्हें परमेश्वर में अपनी आस्था को लेकर सूक्ष्म बुद्धि का होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को गंभीरता से लेना चाहिए और स्वयं को जानने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। परमेश्वर की इच्छा को तुम्हें सत्य को समझने, जानने और अनुभव करने के माध्यम से समझना होगा; केवल तभी तुम पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करोगे। पवित्र आत्मा का कार्य असाधारण रूप से व्यावहारिक होता है। कुछ लोगों में सत्य को समझने की क्षमता तो होती है, फिर भी उन्हें पवित्र आत्मा के कार्य का कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं होता। आगे बढ़ते हुए, तुम लोगों को सूक्ष्मतम भावनाओं और सूक्ष्मतम प्रकाश पर ध्यान देना होगा। हर बार जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो तुम्हें सत्य के दृष्टिकोण से इसका निरीक्षण करना और पेश आना चाहिए और ऐसा करके तुम धीरे-धीरे सही राह पर कदम रखोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'हर चीज को सत्य की आँखों से देखो' से उद्धृत

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