6. परमेश्वर के साथ संवाद करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर से उसके वचनों में प्रार्थना करो, सत्य की तलाश करो और उसकी इच्छा को समझने का प्रयास करो और पवित्र आत्मा के प्रबोधन को हासिल करने में सक्षम बनो। यह परमेश्वर के साथ सच्चा संवाद करना है।

(2) परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने के लिए व्यक्ति को सत्य की तलाश करते हुए उन्हें प्रार्थनापूर्वक पढ़ना सीखना चाहिए। इस तरह प्रार्थना करने से, पवित्र आत्मा का प्रबोधन और रोशनी आसानी से प्राप्त किया जाता है।

(3) परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं। केवल परमेश्वर से अक्सर उसके वचनों में प्रार्थना करने से कोई व्यक्ति उसकी इच्छा की समझ और अभ्यास का एक मार्ग प्राप्त कर सकता है।

(4) परमेश्वर से प्रार्थना कर तथा परीक्षण और शोधन के बीच उसकी इच्छा को समझ कर, और उसके साथ वास्तविक संवाद कर, व्यक्ति आसानी से परमेश्वर को जान सकता है और उसके साथ जुड़ते समय उसके प्रति समर्पित हो सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

लोग परमेश्वर के साथ संबंध कैसे बनाए रख सकते हैं? और ऐसा करने के लिए उन्हें किस पर भरोसा करना चाहिए? उन्हें परमेश्वर से याचना करने, परमेश्वर से प्रार्थना करने और अपने हृदय में परमेश्वर के साथ संवाद करने पर भरोसा करना चाहिए। इस तरह के संबंध के साथ लोग हमेशा परमेश्वर के सामने रहते हैं और ऐसे लोग बहुत शांत होते हैं। कुछ लोग स्वयं को बाहरी कार्यों में व्यस्त रखते हुए अपना पूरा समय बाहरी कार्यों में ही बिता देते हैं। आत्मिक जीवन के बिना एक या दो दिनों के बाद वे कुछ महसूस नहीं करते; तीन या पाँच दिनों या एक या दो महीनों के बाद भी वे कुछ महसूस नहीं करते; उन्होंने प्रार्थना नहीं की, याचना नहीं की या आध्यात्मिक समागम नहीं किया। याचना वह होती है, जब अपने साथ कुछ घटित होने पर तुम परमेश्वर से अपनी सहायता करने, अपना मार्गदर्शन करने, अपने लिए पोषण प्रदान करने, अपने को प्रबुद्ध करने, उसकी इच्छा समझने देने और यह जानने के लिए कहते हो कि सत्य के अनुरूप क्या करना चाहिए। प्रार्थना का दायरा व्यापक है : कभी-कभी तुम परमेश्वर से अपनी कठिनाइयों या नकारात्मकता और कमजोरी के बारे में बात करते हुए वचनों को अपने हृदय में बोलते हो; जब तुम विद्रोही होते हो, तब भी तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो या फिर तुम उससे अपने साथ हर दिन होने वाली चीज़ों के बारे में बात करते हो, चाहे वे तुम्हें स्पष्ट हों या नहीं। यही प्रार्थना है। प्रार्थना का दायरा मूल रूप से परमेश्वर से बात करना और उसके सामने खुलना है। कभी-कभी यह नियमित समय पर किया जाता है, कभी-कभी नहीं; तुम जब चाहे और जहाँ चाहे प्रार्थना कर सकते हो। आध्यात्मिक समागम अधिक औपचारिक नहीं होता। कभी-कभी वह इसलिए होता है क्योंकि तुम्हें कोई समस्या होती है, कभी-कभी इसलिए कि तुम्हें कोई समस्या नहीं होती। कभी-कभी इसमें वचन शामिल होते हैं, कभी-कभी नहीं। जब तुम्हें कोई समस्या होती है, तो तुम उसके बारे में परमेश्वर से बात करते हो और प्रार्थना करते हो; जब तुम्हें कोई समस्या नहीं होती, तो तुम सोचते हो कि परमेश्वर लोगों से कैसे प्यार करता है, वह लोगों के बारे में कैसे चिंतित रहता है, वह लोगों को कैसे डाँटता है। तुम किसी भी समय या स्थान पर परमेश्वर के साथ समागम कर सकते हो। यही आध्यात्मिक समागम है। कभी-कभी, जब तुम रोज़मर्रा के कामों में संलग्न होते हो और ऐसी किसी चीज़ के बारे में सोचते हो जो तुम्हें परेशान करती है, तो तुम्हें अपने घुटनों के बल बैठने या आँखें बंद करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बस अपने हृदय में परमेश्वर से कहना है : "हे परमेश्वर, कृपया इसमें मेरा मार्गदर्शन करो। मैं कमजोर हूँ, मैं इस पर काबू नहीं पा सकता।" तुम्हारा हृदय द्रवित है; तुम कुछ सरल शब्द ही बोलते हो और परमेश्वर जान लेता है। कभी-कभी तुम्हें घर की याद सताती है और तुम कहते हो, "हे परमेश्वर! मुझे वास्तव में घर की याद आती है..." तुम यह नहीं कहते कि तुम विशेष रूप से किसे याद करते हो। तुम बस महसूस करते हो और परमेश्वर से इस बारे में बात करते हो। समस्याएँ तभी हल हो सकती हैं, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और अपने हृदय की बात कहते हो। क्या अन्य लोगों से बात करने से समस्याएँ हल हो सकती हैं? यदि तुम्हारा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो सत्य को समझता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि वह सच्चाई को नहीं समझता—यदि तुम्हारा सामना किसी नकारात्मक और कमजोर व्यक्ति से होता है—तो तुम उस पर प्रभाव डाल सकते हो। यदि तुम परमेश्वर से बात करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें दिलासा देगा और तुम्हें प्रेरित करेगा। यदि तुम परमेश्वर के सामने उसके वचनों को चुपचाप पढ़ने में सक्षम हो, तो तुम सत्य को समझने और समस्या को हल करने में सक्षम होगे। परमेश्वर के वचन तुम्हें इस छोटी-सी बाधा से पार पाने के लिए मार्ग खोजने देंगे। बाधा से तुम लड़खड़ाओगे नहीं, वह तुम्हें रोक नहीं पाएगी और न ही वह तुम्हारे कर्तव्य के निष्पादन को प्रभावित करेगी। कई बार ऐसा होता है, जब तुम अचानक अपने भीतर थोड़ा उदास या असहज महसूस करते हो। ऐसे समय में, परमेश्वर से प्रार्थना करने में संकोच न करो। हो सकता है, तुम परमेश्वर से कोई याचना न करो, ऐसा कुछ भी न हो जिसे तुम परमेश्वर से करवाना चाहो या उसके द्वारा प्रबुद्ध किया जाना चाहो—तुम बस किसी भी समय, जहाँ भी तुम हो, परमेश्वर से बात करते हो और उसके प्रति खुल जाते हो। तुम्हें हर समय क्या महसूस करना चाहिए? यह कि "परमेश्वर हमेशा मेरे साथ है, उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है, मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। मैं चाहे कहीं भी हूँ या कुछ भी कर रहा हूँ—हो सकता है, आराम कर रहा हूँ या हो सकता है या किसी सभा में हूँ या अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा हूँ—अपने हृदय में मैं जानता हूँ कि परमेश्वर मेरा हाथ पकड़कर मेरी अगुआई कर रहा है, कि उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है।" कभी-कभी यह याद करते हुए कि तुमने पिछले कुछ वर्षों में प्रत्येक दिन कैसे गुज़ारा है, तुम्हें लगता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बड़ा हो गया है, कि परमेश्वर द्वारा तुम्हारा मार्गदर्शन किया गया है, कि परमेश्वर के प्रेम ने हमेशा तुम्हारी रक्षा की है। इन बातों को सोचकर, तुम परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए अपने हृदय में प्रार्थना करते हो : "हे परमेश्वर, मैं तुम्हें धन्यवाद देता हूँ! मैं बहुत कमजोर और निर्बल हूँ, बहुत ज्यादा भ्रष्ट हूँ। तुम मेरा इस तरह मार्गदर्शन न करते, तो मैं आज खुद पर भरोसा करने लायक न हो पाता।" क्या यह आध्यात्मिक समागम नहीं है? यदि लोग अकसर इस तरह से समागम कर सकते हों, तो क्या उनके पास परमेश्वर से कहने के लिए बहुत-कुछ नहीं होगा? वे बहुत दिनों तक परमेश्वर से कुछ कहे बिना नहीं रह पाएँगे। जब तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने के लिए कुछ नहीं होता, तो परमेश्वर तुम्हारे हृदय से अनुपस्थित हो जाता है। यदि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है और तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा है, तो तुम अपने हृदय की हर बात उससे कह सकोगे, जिनमें वे बातें भी शामिल हैं, जो तुम अपने विश्वासपात्रों से ही कहते हो। वास्तव में, परमेश्वर तुम्हारा सबसे करीबी विश्वासपात्र है। यदि तुम परमेश्वर को अपना सबसे करीबी विश्वासपात्र मानते हो, अपना परिवार, जिस पर तुम सबसे ज्यादा निर्भर करते हो, सबसे ज्यादा भरोसा करते हो, सबसे ज्यादा विश्वास करते हो, सबसे ज्यादा यकीन करते हो, जिसके तुम सबसे करीब हो, तो यह असंभव होगा कि परमेश्वर से कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ न हो। यदि तुम्हारे पास हमेशा परमेश्वर से कहने के लिए कुछ है, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के सामने नहीं रहोगे? यदि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने रह सकते हो, तो तुम हर पल यह महसूस करोगे कि परमेश्वर किस तरह तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, किस तरह वह तुम्हारी देखभाल और सुरक्षा करता है, किस तरह वह तुम्हारे लिए शांति और आनंद लाता है, किस तरह वह तुम्हें आशीष प्रदान करता है, किस तरह वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और किस तरह वह तुम्हें डाँटता, अनुशासित करता और ताड़ना देता है और किस तरह वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है; यह सब तुम्हारे हृदय में स्पष्ट और प्रत्यक्ष होगा। तुम प्रतिदिन कुछ भी न जानते हुए, केवल यह कहते हुए कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, केवल अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए और केवल उपस्थित मात्र होने के लिए सभाओं में भाग लेते हुए, केवल दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते और प्रार्थना करते हुए और बस बेमन से सब-कुछ करते हुए भ्रमित नहीं रहोगे—तुम्हारा केवल इस तरह का बाहरी धार्मिक आयोजन नहीं होगा। इसके बजाय, तुम हर क्षण अपने हृदय में परमेश्वर का ध्यान करोगे और उससे प्रार्थना करोगे, तुम हर समय परमेश्वर के साथ संवाद करोगे और तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के सामने रह पाने में सक्षम होगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगर तुम हमेशा परमेश्‍वर के समक्ष नहीं रह सकते तो तुम अविश्‍वासी हो' से उद्धृत

लोग प्रार्थना का अभ्यास करने और प्रार्थना के महत्व को समझने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन प्रार्थना का प्रभावी होना कोई सरल बात नहीं है। प्रार्थना केवल यन्त्रवत् ढंग से करना, प्रक्रिया का पालन करना, या परमेश्वर के वचनों का पाठ करना नहीं है। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना कुछ वचनों को रटना नहीं है और यह दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में व्यक्ति को उस स्थिति तक पहुँचना चाहिए, जहाँ अपना हृदय परमेश्वर को दिया जा सके, जहाँ वह अपना हृदय खोलकर रख सके, ताकि वह परमेश्वर द्वारा प्रेरित हो सके। यदि प्रार्थना को प्रभावी होना है, तो उसे परमेश्वर के वचन पढ़ने पर आधारित होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों के भीतर से प्रार्थना करने से ही व्यक्ति अधिक प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर सकता है। सच्ची प्रार्थना की अभिव्यक्तियाँ हैं : एक ऐसा हृदय होना, जो उस सबके लिए तरसता है जो परमेश्वर चाहता है, और यही नहीं, जो वह माँगता है उसे पूरा करने की इच्छा रखता है; उससे घृणा करना जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और फिर इस आधार पर इसकी कुछ समझ प्राप्त करना, और परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित सत्यों के बारे में कुछ ज्ञान और स्पष्टता हासिल करना। प्रार्थना के बाद यदि संकल्प, विश्वास, ज्ञान और अभ्यास का मार्ग हो, केवल तभी उसे सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है, और केवल इस प्रकार की प्रार्थना ही प्रभावी हो सकती है। फिर भी प्रार्थना को परमेश्वर के वचनों के आनंद पर निर्मित किया जाना चाहिए, उसे परमेश्वर के साथ उसके वचनों में, संवाद करने की नींव पर स्थापित होना चाहिए, और हृदय को परमेश्वर की खोज करने और उसके समक्ष शांत होने में सक्षम होना चाहिए। इस तरह की प्रार्थना पहले ही परमेश्वर के साथ सच्चे संवाद के चरण में प्रवेश कर चुकी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर की ओर देखते हो, तो यह संभव है कि वह तुम्हें कोई भी बोध या कोई स्पष्ट विचार न दे, किसी स्पष्ट मार्गदर्शन की तो बात ही दूर है, लेकिन वह तुम्हें कुछ समझने की अनुमति देता है। या हो सकता है कि इस बार तुम्हें कुछ भी समझ न आए, परन्तु फिर भी यह उचित है कि तुम परमेश्वर की ओर देखो। लोगों द्वारा इस तरह से अभ्यास करना नियमों का पालन करने के लिए नहीं है, बल्कि यह उनके दिलों की ज़रूरत होती है और यही वो तरीक़ा है जिससे कि मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि हर बार जब तुम परमेश्वर की ओर देखो और परमेश्वर को पुकारो, तो तुम प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हो; मनुष्य के जीवन में यह आध्यात्मिक स्थिति सामान्य और स्वाभाविक होती है, और परमेश्वर की ओर देखना लोगों के लिए अपने दिलों में परमेश्वर के साथ सामान्य बातचीत करना है।

कभी-कभी, परमेश्वर पर निर्भर होने का मतलब विशिष्ट वचनों का उपयोग करके परमेश्वर से कुछ करने को कहना, या उससे विशिष्ट मार्गदर्शन या सुरक्षा माँगना नहीं होता है। बल्कि, इसका मतलब है किसी समस्या का सामना करने पर, लोगों का उसे ईमानदारी से पुकारने में सक्षम होना। तो, जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं तो वह क्या कर रहा होता है? जब किसी के हृदय में हलचल होती है और वह सोचता है: "हे परमेश्वर, मैं यह खुद नहीं कर सकता, मुझे नहीं पता कि यह कैसे करना है, और मैं कमज़ोर और नकारात्मक महसूस करता हूँ...," जब उनके मन में ये विचार आते हैं, तो क्या परमेश्वर इसके बारे में जानता है? जब ये विचार लोगों के मन में उठते हैं, तो क्या उनके हृदय ईमानदार होते हैं? जब वे इस तरह से ईमानदारी से परमेश्वर को पुकारते हैं, तो क्या परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है? इस तथ्य के बावजूद कि हो सकता है कि उन्होंने एक वचन भी नहीं बोला हो, वे ईमानदारी दिखाते हैं, और इसलिए परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है। जब कोई विशेष रूप से कष्टमय कठिनाई का सामना करता है, जब ऐसा कोई नहीं होता जिससे वो सहायता मांग सके, और जब वह विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, तो वह परमेश्वर में अपनी एकमात्र आशा रखता है। ऐसे लोगों की प्रार्थनाएँ किस तरह की होती हैं? उनकी मन:स्थिति क्या होती है? क्या वे ईमानदार होते हैं? क्या उस समय कोई मिलावट होती है? केवल तभी तेरा हृदय ईमानदार होता है, जब तू परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करता है मानो कि वह अंतिम तिनका है जिसे तू अपने जीवन को बचाने के लिए पकड़ता है और यह उम्मीद करता है कि वह तेरी मदद करेगा। यद्यपि तूने ज्यादा कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन तेरा हृदय पहले से ही द्रवित है। अर्थात्, तू परमेश्वर को अपना ईमानदार हृदय देता है, और परमेश्वर सुनता है। जब परमेश्वर सुनता है, वह तेरी कठिनाइयों को देखेगा, तो वह तुझे प्रबुद्ध करेगा, तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तेरी सहायता करेगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

जैसे ही लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करने में जल्दबाजी हो जाते हैं, वे यह नहीं जान पाते कि कैसे इसका अनुभव किया जाए। जैसे ही वे मामलों में व्यस्त हो जाते हैं, उनकी आध्यात्मिक अवस्थाएँ भंग हो जाती हैं; और वे एक सामान्य स्थिति को बनए रखने की क्षमता खो बैठते हैं। ऐसा क्यों होता है? यदि तुम्हें थोड़ा कार्य करने को दिया जाए, तो तुम बेलगाम और स्वच्छंद हो जाते हो, परमेश्वर के निकट आने के इच्छुक होने की बजाय उससे दूर होते जाते हो। इससे पता चलता है कि लोग यह नहीं जानते कि अनुभव कैसे प्राप्त किया जाता है। चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सभी मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहिए; सिद्धान्त के साथ कार्य करने में समर्थ होने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यदि तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हो, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मुझे किस तरह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न कर रहा हूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास करने के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और इस बात को खोजना है कि परमेश्वर को संतुष्ट कैसे करना है। इसी तरह तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के करीब आया जाता है। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप करना शामिल नहीं है। यह परमेश्वर की इच्छा को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम हमेशा ऐसा कहते हो कि "परमेश्वर का धन्यवाद," जबकि तुमने कुछ भी नहीं किया होता है, लेकिन तब जब तुम कुछ कर रहे होते हो, तो तुम जिस तरीके से चाहते हो वैसा करते रहते हो, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कृत्य है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी चीज़ पर कार्य करते समय, तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा क्या है? जो भी तुम करते हो उसके द्वारा परमेश्वर के करीब जाना तुम पर है; और ऐसा करते हुए अपने कृत्यों और साथ ही परमेश्वर की इच्छा के पीछे के सिद्धान्तों और सत्य की खोज करना, और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर से नहीं भटकना तुम पर है। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है। इन दिनों, जब लोगों के सामने चीज़ें आती हैं, तो चाहे वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, उन्हें लगता है कि वे बहुत-कुछ कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते, और वे अपनी इच्छा के अनुसार उसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का तरीका उपयुक्त हो या नहीं, या वह सत्य के अनुरूप हो या नहीं, वे बस जिद पर अड़े रहते हैं और अपने व्यक्तिगत इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। आम तौर पर ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं हो सकता। अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठान करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आने की कोशिश की, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ। मैं उसके पास नहीं जा सका।" ऐसे लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं होता; वे स्वयं ही अपने दिल में होते हैं, और अपने किसी भी काम में सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। सत्य के अनुसार काम न करने का अर्थ है अपनी इच्छा के अनुसार काम करना, और अपनी इच्छा के अनुसार काम करने का अर्थ है परमेश्वर को छोड़ देना; अर्थात, उनके दिल में परमेश्वर नहीं हैं। मानवीय अभिप्राय आमतौर पर लोगों को अच्छे और सही लगते हैं, और वे ऐसे दिखते हैं मानो कि वे सत्य का बहुत अधिक उल्लंघन नहीं करते हैं। लोगों को लगता है कि चीज़ों को इस तरह से करना सत्य को अभ्यास में लाना है; उन्हें लगता है कि चीज़ों को उस तरह से करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। दरअसल, वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश नहीं कर रहे हैं, और वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार, उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, इसे अच्छी तरह से करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उनके पास यह सच्ची अवस्था नहीं है, न ही उनकी ऐसी अभिलाषा है। यही वह सबसे बड़ी ग़लती है, जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं। तुम परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हो। यह पाप कैसे नहीं है? क्या तुम अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हो? यदि तुम इसी तरीके से विश्वास करते रहो तो तुम किस प्रकार के प्रभावों को पाओगे? इसके अलावा, विश्वास के महत्व को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

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