6. परमेश्वर के साथ समागम के सिद्धांत

(1) परमेश्वर से उसके वचनों में प्रार्थना करो, सत्य की तलाश करो और उसकी इच्छा को समझने का प्रयास करो, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन को हासिल करने में सक्षम बनो। यह परमेश्वर के साथ सच्चा समागम है;

(2) परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने के लिए, व्यक्ति को सच्चाई की तलाश करते हुए उन्हें प्रार्थनापूर्वक पढ़ना सीखना चाहिए। इस तरह प्रार्थना करने से, पवित्र आत्मा के प्रबोधन और प्रकाश को आसानी प्राप्त किया जाता है;

(3) परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं। केवल परमेश्वर से अक्सर उसके वचनों में प्रार्थना करने से कोई व्यक्ति उसकी इच्छा की समझ और अभ्यास के एक मार्ग को प्राप्त कर सकता है;

(4) परमेश्वर से प्रार्थना कर तथा परीक्षण और परिशोधन के बीच उसकी इच्छा को समझ कर, और उसके साथ वास्तविक समागम प्राप्त कर, व्यक्ति आसानी से परमेश्वर को जान सकता है और उसके साथ संवाद करते समय उसके प्रति समर्पित हो सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

लोग परमेश्वर के साथ संबंध कैसे बनाए रख सकते हैं? और ऐसा करने के लिए उन्हें किस पर भरोसा करना चाहिए? उन्हें परमेश्वर से याचना करने, परमेश्वर से प्रार्थना करने और अपने हृदय में परमेश्वर के साथ संवाद करने पर भरोसा करना चाहिए। इस तरह के संबंध के साथ लोग हमेशा परमेश्वर के सामने रहते हैं और ऐसे लोग बहुत शांत होते हैं। कुछ लोग स्वयं को बाहरी कार्यों में व्यस्त रखते हुए अपना पूरा समय बाहरी कार्यों में ही बिता देते हैं। आत्मिक जीवन के बिना एक या दो दिनों के बाद वे कुछ महसूस नहीं करते; तीन या पाँच दिनों या एक या दो महीनों के बाद भी वे कुछ महसूस नहीं करते; उन्होंने प्रार्थना नहीं की, याचना नहीं की या आध्यात्मिक समागम नहीं किया। याचना वह होती है, जब अपने साथ कुछ घटित होने पर तुम परमेश्वर से अपनी सहायता करने, अपना मार्गदर्शन करने, अपने लिए पोषण प्रदान करने, अपने को प्रबुद्ध करने, उसकी इच्छा समझने देने और यह जानने के लिए कहते हो कि सत्य के अनुरूप क्या करना चाहिए। प्रार्थना का दायरा व्यापक है : कभी-कभी तुम परमेश्वर से अपनी कठिनाइयों या नकारात्मकता और कमजोरी के बारे में बात करते हुए वचनों को अपने हृदय में बोलते हो; जब तुम विद्रोही होते हो, तब भी तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो या फिर तुम उससे अपने साथ हर दिन होने वाली चीज़ों के बारे में बात करते हो, चाहे वे तुम्हें स्पष्ट हों या नहीं। यही प्रार्थना है। प्रार्थना का दायरा मूल रूप से परमेश्वर से बात करना और उसके सामने खुलना है। कभी-कभी यह नियमित समय पर किया जाता है, कभी-कभी नहीं; तुम जब चाहे और जहाँ चाहे प्रार्थना कर सकते हो। आध्यात्मिक समागम अधिक औपचारिक नहीं होता। कभी-कभी वह इसलिए होता है क्योंकि तुम्हें कोई समस्या होती है, कभी-कभी इसलिए कि तुम्हें कोई समस्या नहीं होती। कभी-कभी इसमें वचन शामिल होते हैं, कभी-कभी नहीं। जब तुम्हें कोई समस्या होती है, तो तुम उसके बारे में परमेश्वर से बात करते हो और प्रार्थना करते हो; जब तुम्हें कोई समस्या नहीं होती, तो तुम सोचते हो कि परमेश्वर लोगों से कैसे प्यार करता है, वह लोगों के बारे में कैसे चिंतित रहता है, वह लोगों को कैसे डाँटता है। तुम किसी भी समय या स्थान पर परमेश्वर के साथ समागम कर सकते हो। यही आध्यात्मिक समागम है। कभी-कभी, जब तुम रोज़मर्रा के कामों में संलग्न होते हो और ऐसी किसी चीज़ के बारे में सोचते हो जो तुम्हें परेशान करती है, तो तुम्हें अपने घुटनों के बल बैठने या आँखें बंद करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बस अपने हृदय में परमेश्वर से कहना है : "हे परमेश्वर, कृपया इसमें मेरा मार्गदर्शन करो। मैं कमजोर हूँ, मैं इस पर काबू नहीं पा सकता।" तुम्हारा हृदय द्रवित है; तुम कुछ सरल शब्द ही बोलते हो और परमेश्वर जान लेता है। कभी-कभी तुम्हें घर की याद सताती है और तुम कहते हो, "हे परमेश्वर! मुझे वास्तव में घर की याद आती है..." तुम यह नहीं कहते कि तुम विशेष रूप से किसे याद करते हो। तुम बस महसूस करते हो और परमेश्वर से इस बारे में बात करते हो। समस्याएँ तभी हल हो सकती हैं, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और अपने हृदय की बात कहते हो। क्या अन्य लोगों से बात करने से समस्याएँ हल हो सकती हैं? यदि तुम्हारा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो सत्य को समझता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि वह सच्चाई को नहीं समझता—यदि तुम्हारा सामना किसी नकारात्मक और कमजोर व्यक्ति से होता है—तो तुम उस पर प्रभाव डाल सकते हो। यदि तुम परमेश्वर से बात करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें दिलासा देगा और तुम्हें प्रेरित करेगा। यदि तुम परमेश्वर के सामने उसके वचनों को चुपचाप पढ़ने में सक्षम हो, तो तुम सत्य को समझने और समस्या को हल करने में सक्षम होगे। परमेश्वर के वचन तुम्हें इस छोटी-सी बाधा से पार पाने के लिए मार्ग खोजने देंगे। बाधा से तुम लड़खड़ाओगे नहीं, वह तुम्हें रोक नहीं पाएगी और न ही वह तुम्हारे कर्तव्य के निष्पादन को प्रभावित करेगी। कई बार ऐसा होता है, जब तुम अचानक अपने भीतर थोड़ा उदास या असहज महसूस करते हो। ऐसे समय में, परमेश्वर से प्रार्थना करने में संकोच न करो। हो सकता है, तुम परमेश्वर से कोई याचना न करो, ऐसा कुछ भी न हो जिसे तुम परमेश्वर से करवाना चाहो या उसके द्वारा प्रबुद्ध किया जाना चाहो—तुम बस किसी भी समय, जहाँ भी तुम हो, परमेश्वर से बात करते हो और उसके प्रति खुल जाते हो। तुम्हें हर समय क्या महसूस करना चाहिए? यह कि "परमेश्वर हमेशा मेरे साथ है, उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है, मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। मैं चाहे कहीं भी हूँ या कुछ भी कर रहा हूँ—हो सकता है, आराम कर रहा हूँ या हो सकता है या किसी सभा में हूँ या अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा हूँ—अपने हृदय में मैं जानता हूँ कि परमेश्वर मेरा हाथ पकड़कर मेरी अगुआई कर रहा है, कि उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है।" कभी-कभी यह याद करते हुए कि तुमने पिछले कुछ वर्षों में प्रत्येक दिन कैसे गुज़ारा है, तुम्हें लगता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बड़ा हो गया है, कि परमेश्वर द्वारा तुम्हारा मार्गदर्शन किया गया है, कि परमेश्वर के प्रेम ने हमेशा तुम्हारी रक्षा की है। इन बातों को सोचकर, तुम परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए अपने हृदय में प्रार्थना करते हो : "हे परमेश्वर, मैं तुम्हें धन्यवाद देता हूँ! मैं बहुत कमजोर और निर्बल हूँ, बहुत ज्यादा भ्रष्ट हूँ। तुम मेरा इस तरह मार्गदर्शन न करते, तो मैं आज खुद पर भरोसा करने लायक न हो पाता।" क्या यह आध्यात्मिक समागम नहीं है? यदि लोग अकसर इस तरह से समागम कर सकते हों, तो क्या उनके पास परमेश्वर से कहने के लिए बहुत-कुछ नहीं होगा? वे बहुत दिनों तक परमेश्वर से कुछ कहे बिना नहीं रह पाएँगे। जब तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने के लिए कुछ नहीं होता, तो परमेश्वर तुम्हारे हृदय से अनुपस्थित हो जाता है। यदि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है और तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा है, तो तुम अपने हृदय की हर बात उससे कह सकोगे, जिनमें वे बातें भी शामिल हैं, जो तुम अपने विश्वासपात्रों से ही कहते हो। वास्तव में, परमेश्वर तुम्हारा सबसे करीबी विश्वासपात्र है। यदि तुम परमेश्वर को अपना सबसे करीबी विश्वासपात्र मानते हो, अपना परिवार, जिस पर तुम सबसे ज्यादा निर्भर करते हो, सबसे ज्यादा भरोसा करते हो, सबसे ज्यादा विश्वास करते हो, सबसे ज्यादा यकीन करते हो, जिसके तुम सबसे करीब हो, तो यह असंभव होगा कि परमेश्वर से कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ न हो। यदि तुम्हारे पास हमेशा परमेश्वर से कहने के लिए कुछ है, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के सामने नहीं रहोगे? यदि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने रह सकते हो, तो तुम हर पल यह महसूस करोगे कि परमेश्वर किस तरह तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, किस तरह वह तुम्हारी देखभाल और सुरक्षा करता है, किस तरह वह तुम्हारे लिए शांति और आनंद लाता है, किस तरह वह तुम्हें आशीष प्रदान करता है, किस तरह वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और किस तरह वह तुम्हें डाँटता, अनुशासित करता और ताड़ना देता है और किस तरह वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है; यह सब तुम्हारे हृदय में स्पष्ट और प्रत्यक्ष होगा। तुम प्रतिदिन कुछ भी न जानते हुए, केवल यह कहते हुए कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, केवल अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए और केवल उपस्थित मात्र होने के लिए सभाओं में भाग लेते हुए, केवल दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते और प्रार्थना करते हुए और बस बेमन से सब-कुछ करते हुए भ्रमित नहीं रहोगे—तुम्हारा केवल इस तरह का बाहरी धार्मिक आयोजन नहीं होगा। इसके बजाय, तुम हर क्षण अपने हृदय में परमेश्वर का ध्यान करोगे और उससे प्रार्थना करोगे, तुम हर समय परमेश्वर के साथ संवाद करोगे और तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के सामने रह पाने में सक्षम होगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगर तुम हमेशा परमेश्‍वर के समक्ष नहीं रह सकते तो तुम अविश्‍वासी हो' से उद्धृत

लोग प्रार्थना का अभ्यास करने और प्रार्थना के महत्व को समझने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन प्रार्थना का प्रभावी होना कोई सरल बात नहीं है। प्रार्थना केवल यन्त्रवत् ढंग से करना, प्रक्रिया का पालन करना, या परमेश्वर के वचनों का पाठ करना नहीं है। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना कुछ वचनों को रटना नहीं है और यह दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में व्यक्ति को उस स्थिति तक पहुँचना चाहिए, जहाँ अपना हृदय परमेश्वर को दिया जा सके, जहाँ वह अपना हृदय खोलकर रख सके, ताकि वह परमेश्वर द्वारा प्रेरित हो सके। यदि प्रार्थना को प्रभावी होना है, तो उसे परमेश्वर के वचन पढ़ने पर आधारित होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों के भीतर से प्रार्थना करने से ही व्यक्ति अधिक प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर सकता है। सच्ची प्रार्थना की अभिव्यक्तियाँ हैं : एक ऐसा हृदय होना, जो उस सबके लिए तरसता है जो परमेश्वर चाहता है, और यही नहीं, जो वह माँगता है उसे पूरा करने की इच्छा रखता है; उससे घृणा करना जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और फिर इस आधार पर इसकी कुछ समझ प्राप्त करना, और परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित सत्यों के बारे में कुछ ज्ञान और स्पष्टता हासिल करना। प्रार्थना के बाद यदि संकल्प, विश्वास, ज्ञान और अभ्यास का मार्ग हो, केवल तभी उसे सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है, और केवल इस प्रकार की प्रार्थना ही प्रभावी हो सकती है। फिर भी प्रार्थना को परमेश्वर के वचनों के आनंद पर निर्मित किया जाना चाहिए, उसे परमेश्वर के साथ उसके वचनों में, संवाद करने की नींव पर स्थापित होना चाहिए, और हृदय को परमेश्वर की खोज करने और उसके समक्ष शांत होने में सक्षम होना चाहिए। इस तरह की प्रार्थना पहले ही परमेश्वर के साथ सच्चे संवाद के चरण में प्रवेश कर चुकी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

तुम लोगों को अपने आध्यात्मिक समर्पणों के दौरान और अधिक सहभागिता करनी चाहिए, वचनों को स्वतंत्र रूप से खाने और पीने में सक्षम होना चाहिए, और प्रमुख सत्यों को समझकर उन्हें तत्काल अभ्यास में लाना चाहिए। तुझे मेरे वचन की वास्तविकता का अभ्यस्त हो जाना चाहिए: इसके मर्म और सिद्धांतों को समझ; और अपनी पकड़ को ढीला मत पड़ने दे। सदैव मनन कर और सदैव मेरे साथ संगति कर, और उत्तरोत्तर चीज़ें प्रकट होती जाएँगी। ऐसा नहीं हो सकता कि तू कुछ देर के लिए परमेश्वर के समक्ष आए, और फिर उसके समक्ष अपने हृदय के शांत होने की प्रतीक्षा किए बिना अपने साथ होने वाली किसी और घटना से परेशान हो जाए। तू चीज़ों के बारे में सदैव उलझन में और अस्पष्ट रहता है और मेरा चेहरा नहीं देख पाता; इस तरह तो तू मेरे हृदय की स्पष्ट समझ प्राप्त नहीं कर सकता और यदि तू इसे थोड़ा-सा समझ भी ले, तब भी तू अनिश्चित और संदेह में रहता है। जब तक तेरा हृदय पूर्णतः मेरा नहीं हो जाता, और तेरा मन किसी भी सांसारिक चीज़ से अब और विचलित नहीं होता, और जब तू स्पष्ट और शांत मन से प्रतीक्षा कर सकता है, तभी मैं अपने इरादों के अनुसार, तुम लोगों के समक्ष एक-एक कर प्रकाशन करूँगा। तुम लोगों को मेरे प्रति निकटता के इस मार्ग को समझना चाहिए। जो भी तुझ पर प्रहार करता और तुझे श्राप देता है, या लोगों द्वारा तुझे दी गई चीज़ें चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हों, यदि वे तुझे परमेश्वर के निकट रहने से रोकती हैं तो यह अस्वीकार्य है। अपने हृदय को मेरी पकड़ में रहने दे और मेरी बगल से कभी न जा। इस तरह की निकटता और सहभागिता के साथ, तेरे माता-पिता, पति, बच्चे, अन्य रिश्ते-नाते, या सांसारिक उलझनें सभी दूर बह जाएँगे। तू अपने हृदय में लगभग अवर्णनीय मिठास का आनंद लेगा, और तू एक सुगंधित और रुचिकर स्वाद का अनुभव करेगा; इतना ही नहीं, तू सचमुच मेरा अभिन्न बन जाएगा। यदि तू इसी तरह बना रहता है, तो तुम लोग समझोगे कि मेरे हृदय में क्या है। जीवन में आगे बढ़ते हुए तू अपने मार्ग से कभी न भटकेगा, क्योंकि मैं तुम लोगों का मार्ग हूँ, और सब कुछ मेरे कारण विद्यमान है। तेरा जीवन कितना परिपक्व है, जब तू सांसारिकता से संबंध तोड़ पाएगा, जब तू अपनी भावनाओं को निकाल फेंक पाएगा, कब तू अपने पति और बच्चों को पीछे छोड़ पाएगी, तब तेरा जीवन कितना परिपक्व होगा, जब तेरा जीवन परिपक्व होगा ... ये सभी चीजें मेरे समय के अनुसार घटित होंगी। उद्विग्न होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

तुझे सकारात्मक की तरफ़ से प्रवेश प्राप्त करना चाहिए। यदि तू हाथ पर हाथ धरे प्रतीक्षा करता है, तो तू अब भी नकारात्मक हो रहा है। तुझे आगे बढ़कर मेरे साथ सहयोग करना चाहिए; मेहनती बन, और आलसी कभी न बन। सदैव मेरी संगति में रह और मेरे साथ कहीं अधिक गहरी अंतरंगता प्राप्त कर। यदि तेरी समझ में नहीं आता है, तो त्वरित परिणामों के लिए अधीर मत बन। ऐसा नहीं है कि मैं तुझे नहीं बताऊँगा; बात यह है कि मैं देखना चाहता हूँ कि जब तू मेरी उपस्थिति में होता है क्या केवल तभी तू मुझ पर भरोसा करता है; और मुझ पर अपनी निर्भरता में तू आत्मविश्वास से पूर्ण है या नहीं। तुझे सदैव मेरे निकट रहना चाहिए और सभी विषय मेरे हाथों में रख देने चाहिए। खाली हाथ वापस मत जा। जब तू कुछ समयावधि के लिए बिना जाने-बूझे मेरे निकट रह लिया होगा, उसके पश्चात मेरे इरादे तुझ पर प्रकट होंगे। यदि तू उन्हें समझ लेता है, तो तू वास्तव में मेरे आमने-सामने होगा, और तूने वास्तव में मेरा चेहरे पा लिया होगा। तेरे भीतर अधिक स्पष्टता और दृढ़ता होगी, और तेरे पास भरोसा करने के लिए कुछ होगा। तब तेरे पास सामर्थ्य के साथ-साथ आत्मविश्वास भी होगा, तेरे पास आगे का मार्ग भी होगा। हर चीज़ तेरे लिए आसान हो जाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 9' से उद्धृत

अपने दैनिक जीवन में, जब तुम लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो और उससे प्रार्थना करते हो, तो तुम लोग इसे बड़ी लापरवाही से करते हो—तुम लोग काम करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। क्या इसे परमेश्वर को अपना हृदय देना कहा जा सकता है? तुम लोग परिवार के मामलों के बारे में या देह-सुख की सोच में डूबे रहते हो; तुम लोग हमेशा दुविधा में रहते हो। क्या इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करना समझा जा सकता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारा हृदय हमेशा बाहरी विषयों से ग्रस्त रहता है, और यह परमेश्वर की ओर लौट नहीं पाता है। यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें समझदारी के साथ सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपने धार्मिक कार्यों के लिए समय निकालना होगा, ऐसा समय जब तुम लोगों, घटनाओं, और वस्तुओं को खुद किनारे कर देते हो, जब तुम अपने हृदय को शांत कर परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करते हो। हर किसी को अपने व्यक्तिगत धार्मिक कार्यों के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार उसकी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। सभी को समझ-बूझके साथ परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध अनुभव करेगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें और अधिक आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य समझ-बूझ के साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह नियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच्चाई के साथ परमेश्वर के सांमजस्य में कार्य करना और अपनी देह को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जितना बेहतर तुम्हारा सहयोग होगा और जितना अधिक तुम प्रयास करोगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर लौट पाएगा, और उतना ही अधिक तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने शांत कर पाओगे। एक निश्चित बिन्दु पर परमेश्वर तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा। कोई भी तुम्हारे हृदय को हिला या जकड़ नहीं पाएगा। और तुम पूरी तरह से परमेश्वर के हो जाओगे। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो परमेश्वर का वचन हर समय अपने आपको तुम पर प्रकट करेगा, और उन सभी चीज़ों के बारे में तुम्हें प्रबुद्ध करेगा जो तुम नहीं समझते—यह सब तुम्हारे सहयोग के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसीलिए परमेश्वर सदैव कहता है, "वे सब लोग जो मेरे साथ सांमजस्य में होकर कार्य करते हैं, मैं उन्हें दुगुना प्रतिफल दूंगा।" तुम लोगों को यह मार्ग स्पष्टता के साथ देखना चाहिए। यदि तुम सही मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए वह सब करना होगा जो तुम कर सकते हो। तुम्हें आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए वह सब कुछ करना होगा जो तुम कर सकते हो। आरंभ में, तुम शायद इस कोशिश में ज्यादा अच्छे परिणाम प्राप्त न कर पाओ, परंतु तुम्हें अपने आपको नकारात्मकता में पीछे हटने या लड़खड़ाने नहीं देना है—तुम्हें कठिन परिश्रम करते रहना है! जितना अधिक आध्यात्मिक जीवन तुम जीओगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचनों से भरा रहेगा, इन बातों के प्रति हमेशा चिंतनशील रहेगा और हमेशा इस बोझ को उठाएगा। उसके बाद, तुम अपने आध्यात्मिक जीवन के द्वारा अपने अंतरतम के सत्यों को परमेश्वर के सामने प्रकट करो, उसे बताओ कि तुम क्या करना चाहते हो, तुम किस विषय में सोच रहे हो, परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी समझ और उनके बारे में अपने दृष्टिकोण बताओ। कुछ भी न छुपाओ, थोडा-सा भी नहीं! अपने मन में परमेश्वर से वचनों को कहने का प्रयास करो, अपनी सच्ची भावनाएँ परमेश्वर के सामने व्यक्त करो; अगर कोई बात तुम्हारे मन में है तो वह बोलने से बिलकुल न हिचको। जितना अधिक तुम इस तरह बोलते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करोगे, और तुम्हारा हृदय भी परमेश्वर की ओर उतना ही अधिक आकर्षित होगा। जब ऐसा होता है, तो तुम अनुभव करोगे कि किसी और की अपेक्षा परमेश्वर तुम्हें अधिक प्रिय है। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, तुम कभी भी परमेश्वर का साथ नहीं छोड़ोगे। यदि प्रतिदिन तुम इस प्रकार का आध्यात्मिक भक्तिमय समय बिताओ और इसे अपने मन से ओझल न होने दो, बल्कि इसे अपने जीवन की बड़ी महत्ता की वस्तु मानो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे हृदय को भर देगा। पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने का अर्थ यही है। यह ऐसा होगा मानो कि तुम्हारा हृदय हमेशा से परमेश्वर के पास हो, जैसे कि तुम जिससे प्रेम करते हो वह सदैव तुम्हारे हृदय में हो। कोई भी तुमसे उसे छीन नहीं सकता। जब ऐसा होता है, तो परमेश्वर सचमुच तुम्हारे भीतर वास करेगा और तुम्हारे हृदय में उसका एक स्थान होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है' से उद्धृत

जब तुम परमेश्वर की ओर देखते हो, तो यह संभव है कि वह तुम्हें कोई भी बोध या कोई स्पष्ट विचार न दे, किसी स्पष्ट मार्गदर्शन की तो बात ही दूर है, लेकिन वह तुम्हें कुछ समझने की अनुमति देता है। या हो सकता है कि इस बार तुम्हें कुछ भी समझ न आए, परन्तु फिर भी यह उचित है कि तुम परमेश्वर की ओर देखो। लोगों द्वारा इस तरह से अभ्यास करना नियमों का पालन करने के लिए नहीं है, बल्कि यह उनके दिलों की ज़रूरत होती है और यही वो तरीक़ा है जिससे कि मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि हर बार जब तुम परमेश्वर की ओर देखो और परमेश्वर को पुकारो, तो तुम प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हो; मनुष्य के जीवन में यह आध्यात्मिक स्थिति सामान्य और स्वाभाविक होती है, और परमेश्वर की ओर देखना लोगों के लिए अपने दिलों में परमेश्वर के साथ सामान्य बातचीत करना है।

कभी-कभी, परमेश्वर पर निर्भर होने का मतलब विशिष्ट वचनों का उपयोग करके परमेश्वर से कुछ करने को कहना, या उससे विशिष्ट मार्गदर्शन या सुरक्षा माँगना नहीं होता है। बल्कि, इसका मतलब है किसी समस्या का सामना करने पर, लोगों का उसे ईमानदारी से पुकारने में सक्षम होना। तो, जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं तो वह क्या कर रहा होता है? जब किसी के हृदय में हलचल होती है और वह सोचता है: "हे परमेश्वर, मैं यह खुद नहीं कर सकता, मुझे नहीं पता कि यह कैसे करना है, और मैं कमज़ोर और नकारात्मक महसूस करता हूँ...," जब उनके मन में ये विचार आते हैं, तो क्या परमेश्वर इसके बारे में जानता है? जब ये विचार लोगों के मन में उठते हैं, तो क्या उनके हृदय ईमानदार होते हैं? जब वे इस तरह से ईमानदारी से परमेश्वर को पुकारते हैं, तो क्या परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है? इस तथ्य के बावजूद कि हो सकता है कि उन्होंने एक वचन भी नहीं बोला हो, वे ईमानदारी दिखाते हैं, और इसलिए परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है। जब कोई विशेष रूप से कष्टमय कठिनाई का सामना करता है, जब ऐसा कोई नहीं होता जिससे वो सहायता मांग सके, और जब वह विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, तो वह परमेश्वर में अपनी एकमात्र आशा रखता है। ऐसे लोगों की प्रार्थनाएँ किस तरह की होती हैं? उनकी मन:स्थिति क्या होती है? क्या वे ईमानदार होते हैं? क्या उस समय कोई मिलावट होती है? केवल तभी तेरा हृदय ईमानदार होता है, जब तू परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करता है मानो कि वह अंतिम तिनका है जिसे तू अपने जीवन को बचाने के लिए पकड़ता है और यह उम्मीद करता है कि वह तेरी मदद करेगा। यद्यपि तूने ज्यादा कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन तेरा हृदय पहले से ही द्रवित है। अर्थात्, तू परमेश्वर को अपना ईमानदार हृदय देता है, और परमेश्वर सुनता है। जब परमेश्वर सुनता है, वह तेरी कठिनाइयों को देखेगा, तो वह तुझे प्रबुद्ध करेगा, तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तेरी सहायता करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से उद्धृत

चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सभी मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहिए; सिद्धान्त के साथ कार्य करने में समर्थ होने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यदि तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हो, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मुझे किस तरह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न कर रहा हूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास करने के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और इस बात को खोजना है कि परमेश्वर को संतुष्ट कैसे करना है। इसी तरह तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के करीब आया जाता है। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप करना शामिल नहीं है। यह परमेश्वर की इच्छा को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम हमेशा ऐसा कहते हो कि "परमेश्वर का धन्यवाद," जबकि तुमने कुछ भी नहीं किया होता है, लेकिन तब जब तुम कुछ कर रहे होते हो, तो तुम जिस तरीके से चाहते हो वैसा करते रहते हो, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कृत्य है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी चीज़ पर कार्य करते समय, तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा क्या है? जो भी तुम करते हो उसके द्वारा परमेश्वर के करीब जाना तुम पर है; और ऐसा करते हुए अपने कृत्यों और साथ ही परमेश्वर की इच्छा के पीछे के सिद्धान्तों और सत्य की खोज करना, और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर से नहीं भटकना तुम पर है। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है। इन दिनों, जब लोगों के सामने चीज़ें आती हैं, तो चाहे वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, उन्हें लगता है कि वे बहुत-कुछ कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते, और वे अपनी इच्छा के अनुसार उसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का तरीका उपयुक्त हो या नहीं, या वह सत्य के अनुरूप हो या नहीं, वे बस जिद पर अड़े रहते हैं और अपने व्यक्तिगत इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। आम तौर पर ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं हो सकता। अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठान करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आने की कोशिश की, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ। मैं उसके पास नहीं जा सका।" ऐसे लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं होता; वे स्वयं ही अपने दिल में होते हैं, और अपने किसी भी काम में सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। सत्य के अनुसार काम न करने का अर्थ है अपनी इच्छा के अनुसार काम करना, और अपनी इच्छा के अनुसार काम करने का अर्थ है परमेश्वर को छोड़ देना; अर्थात, उनके दिल में परमेश्वर नहीं हैं। मानवीय अभिप्राय आमतौर पर लोगों को अच्छे और सही लगते हैं, और वे ऐसे दिखते हैं मानो कि वे सत्य का बहुत अधिक उल्लंघन नहीं करते हैं। लोगों को लगता है कि चीज़ों को इस तरह से करना सत्य को अभ्यास में लाना है; उन्हें लगता है कि चीज़ों को उस तरह से करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। दरअसल, वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश नहीं कर रहे हैं, और वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार, उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, इसे अच्छी तरह से करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उनके पास यह सच्ची अवस्था नहीं है, न ही उनकी ऐसी अभिलाषा है। यही वह सबसे बड़ी ग़लती है, जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं। तुम परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हो। यह पाप कैसे नहीं है? क्या तुम अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हो? यदि तुम इसी तरीके से विश्वास करते रहो तो तुम किस प्रकार के प्रभावों को पाओगे? इसके अलावा, विश्वास के महत्व को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर के साथ सच्चा संवाद करने का मुख्य रूप से अर्थ है, उसके प्रति अपने हृदय को समर्पित करना, सारे मामलों में परमेश्वर के सामने अपना हृदय खोल देना और जो भी मन में है, उसे बताना, और हर वह चीज़ जिससे उनका सामना होता है और सारे कर्तव्य जो वे निभाते हैं, उन सभी में प्रार्थना के द्वारा हमेशा उसकी इच्छा को समझना, और उसके प्रति समर्पित होने और उसे संतुष्ट करने के लिए कीमत चुकाना। वैसे तो, जीवन में लोग जिस मार्ग पर चलते हैं वह परमेश्वर की सेवा करने का मार्ग है। जो उस पर विश्वास करते हैं और इस प्रकार के परिणाम हासिल कर सकते हैं और जिनके पास इस प्रकार की वास्तविकता है, केवल वही लोग परमेश्वर के साथ सच्चा संवाद करते हैं। जो लोग उसके साथ संवाद करते हैं, वे सचमुच में उसे पाना चाहते हैं; एक तरफ, उनके पास उसकी सेवा करने का संकल्प है, और दूसरी ओर, वे ऐसे लोग हैं जो उसके प्रति समर्पित हैं। परमेश्वर का ऐसे लोगों के हृदय में स्थान है, और वे उसका भय मानते हैं; इसलिए, सभी मामलों में, वे परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, सत्य की तलाश कर सकते हैं, और उसे संतुष्ट करने के लिए चीज़ें कर सकते हैं। जो लोग इस तरह परमेश्वर के समक्ष जीते हैं, उन लोगों का उसके साथ सच्चा संवाद होता है। अगर किसी व्यक्ति ने, सभी चीज़ों में, पूरी सच्चाई से परमेश्वर के सामने प्रार्थना में अपने हृदय को नहीं खोला है और वह सत्य की तलाश करने की प्रक्रिया में नहीं है, और अगर उस व्यक्ति की प्रार्थनाएँ और याचनाएँ केवल देह की ज़रूरतों के लिए और अपनी स्वयं की इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए की जाती हैं, या अगर वह कठिनाई या आपदा का सामना होने पर परमेश्वर की सुरक्षा पाने और उद्धार के लिए याचना करता है, तो इस तरह के व्यक्ति ने वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद नहीं किया है। परमेश्वर के साथ संवाद करने का अर्थ है उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य की खोज करना। इसका मतलब यह है कि तुम्हारे साथ चाहे कुछ भी हो, तुम पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करते हो और उसकी इच्छा का अनुसरण करते हो, और जहाँ तुम उसके साथ संगत हो, वहाँ पहुँचते हो। चलो अब हम एक नज़र इस पर डालते हैं कि हमने अतीत में कैसे प्रार्थना की है : वे प्रार्थनाएँ जिनमें हमने वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद किया है, वे बहुत थोड़ी-सी हैं, वैसे ही वे भी बहुत थोड़ी-सी हैं, जिनमें हमने उसकी इच्छा को समझने की कोशिश की है, सत्य की तलाश की है, यह तलाश की है कि उसे कैसे संतुष्ट किया जाए। बार-बार हमने परमेश्वर से याचना की है, उससे माँगें की हैं, और उससे सुरक्षा माँगी है। यह इस तथ्य का पर्याप्त प्रमाण है कि हमारी अतीत में की गई प्रार्थनाएँ परमेश्वर के साथ सच्चे संवाद की उदाहरण नहीं हैं; बल्कि, वे देह को संतुष्ट करने के उद्देश्य से की गईं एकतरफा याचनाएँ थीं। परमेश्वर के साथ सही मायने में संवाद करना एक ऐसा सबक है जिसमें हमें अपने उद्धार की खोज में अवश्य ही प्रवेश करना चाहिए और सत्य में प्रवेश करना और उसकी इच्छा का अनुसरण करने के लिए उसकी सेवा करनी चाहिए। यदि तुम बचना और पूर्ण होना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले परमेश्वर के साथ सच्चा संपर्क करने में सफल होना चाहिए। प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर के साथ सच्चा संवाद प्राप्त करने के लिए प्राथमिक अभ्यास क्या है? इसका एक पहलू यह है कि अपना हृदय उसे देते हुए, तुम्हें इसे सरल ढंग से और खुलकर करना चाहिए; इसके अलावा, तुम्हें सत्य की तलाश और परमेश्वर की इच्छा को भी अवश्य समझना चाहिए। अगर तुम इन दो चीज़ों को करने में कामयाब हो जाते हो, केवल तभी तुम सचमुच में, उससे संवाद कर पाओगे। अगर तुम सत्य की तलाश नहीं करते हो या जिन चीज़ों से तुम्हारा सामना होता है, उनमें परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश नहीं करते हो और अपनी स्वयं की कल्पनाओं और पसंद के साथ चलते हो, जैसा चाहते हो वैसा करते हो, तब क्या यह सत्य का अभ्यास करना होगा? अगर तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो, तो यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो; अगर तुम सत्य की तलाश नहीं कर रहे हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारे कार्य उसे संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, वरन स्वयं को और अपनी देह को संतुष्ट करने के लिए किए गए हैं। सचमुच में, परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए, तुम्हें प्रार्थना के द्वारा सत्य की तलाश करनी चाहिए और उसकी इच्छा को प्रार्थना के द्वारा समझना चाहिए, और फिर उसे समर्पित करने में कामयाब होना चाहिए। जिनका परमेश्वर के साथ इस तरह का संपर्क और संबंध है, केवल वही सचमुच में परमेश्वर से संवाद कर पाते हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

परमेश्वर के साथ वास्तविक संवाद करने में अनेक अलग-अलग अभ्यास शामिल हैं : व्यक्ति को स्वयं के भ्रष्ट सार को परमेश्वर के वचनों के द्वारा जानने के बारे में सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए; स्वयं की भ्रष्टता का समाधान करने और अपने कर्तव्य में परमेश्वर को संतुष्ट करने के बारे में व्यक्ति को सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए; व्यक्ति को इस तरह से सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए जो बड़े लाल अजगर के प्रकृति-सार को और दुष्ट शैतान को पहचान सके और उनके विष को पहचान सके; परमेश्वर के परीक्षण को स्वीकार करने में सक्षम होने और सत्य से संबंधित सारे मामलों में परमेश्वर को संतुष्ट करने के बारे में व्यक्ति को सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए; सत्य की तलाश और सारी चीज़ों में परमेश्वर की इच्छा को समझने के बारे में, व्यक्ति को सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए; परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने की खोज करने के बारे में और जीवन के अनुभवों में परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जीने के बारे में, व्यक्ति को सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए; परमेश्वर के पास जो है और जो वह स्वयं है, इसके बारे में सही समझ होने के लिए, व्यक्ति को सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए; दैहिक इच्छाओं का त्याग करने पर ध्यान केंद्रित करने और उद्धार पाने और पूर्ण किए जाने के लिए परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने के बारे में, व्यक्ति को सहभागिता और प्रार्थना करनी चाहिए; परमेश्वर की इच्छा को खोजने, परमेश्वर के वचनों को जीने, और हर प्रकार के परीक्षणों में गवाही देने के लिए व्यक्ति को सच्ची प्रार्थना में शामिल होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति प्रार्थना के इन समस्त पहलुओं में प्रवेश कर चुका है तो ये लोग वे हैं जो वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद करते हैं; लेकिन अगर, किसी ने प्रार्थना के इनमें से किसी भी पहलू में प्रवेश नहीं किया है, तो इससे यह सिद्ध होता है कि वे बिना सच्ची प्रार्थना के हैं और उन्होंने परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए सही मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के साथ वास्तव में संवाद करने से ही व्यक्ति पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकता है और अंततः परमेश्वर को जान सकता और पूर्ण हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति प्रार्थना के द्वारा वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद करने में असमर्थ रहता है, तब यह कहा जा सकता है कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के बाहर रहता है। जब कोई परमेश्वर के वचनों के बाहर रहता है, फिर चाहे वह कितनी ही प्रार्थना करे, या कितने वर्षों के लिए प्रार्थना करे, वह सब व्यर्थ है, और अंततः वह परमेश्वर का उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएगा—इस बात के बारे में लोगों को स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए। इसलिए, अगर हम अब सत्य का अनुसरण करना चाहते हैं और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें प्रार्थना के सही मार्ग में प्रवेश करना होगा और परमेश्वर के साथ सच्चा संवाद करना होगा। जब परमेश्वर के साथ सच्चा संवाद करने की बात आती है तो सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है परमेश्वर के वचनों के द्वारा परमेश्वर के साथ सच्ची सहभागिता और प्रार्थना करना। हम परमेश्वर से अपनी प्रार्थनाओं में जिन वचनों का प्रयोग करते हैं वे परमेश्वर के वचनों को हमारे खाने और पीने पर आधारित हैं, और परमेश्वर के वचनों में हमें जिनकी तलाश करनी चाहिए, उन सभी चीजों को हमें उसके समक्ष प्रार्थना करने के लिए लाना चाहिए, और इस तरह से, हम अपनी प्रार्थनाओं में सही मार्ग पर कदम रखेंगे। परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए सही मार्ग पर प्रवेश करने के लिए चार प्राथमिक अभ्यास हैं : सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण है कि हमें प्रार्थनापूर्ण हृदय से परमेश्वर के वचनों को पढ़ना चाहिए; दूसरा, हमें प्रार्थनापूर्ण हृदय से सत्य के बारे में सहभागिता करनी चाहिए; तीसरा, हमें प्रार्थनापूर्ण हृदय से अपने कर्तव्य निभाने चाहिए; और चौथा, हमें प्रार्थनापूर्ण हृदय से परमेश्वर के सामने जीना चाहिए। हम प्रतिदिन चाहे जो भी करें, हमें अपने हृदय में लगातार परमेश्वर के साथ सहभागिता करने में समर्थ होना चाहिए, अकसर परमेश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए, प्रार्थनापूर्ण हृदय से परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करना चाहिए, प्रार्थनापूर्ण हृदय से अपने कार्यों और व्यवहार पर विचार करना चाहिए और प्रार्थनापूर्ण हृदय से परमेश्वर से सहभागिता करनी चाहिए; ये सब चीज़ें सुनिश्चित करेंगी कि हम परमेश्वर के समक्ष रहेंगे। जो परमेश्वर के साथ संवाद करते हैं, उन्हें इन चार अभ्यासों को अवश्य करना चाहिए। अगर ये चारों अभ्यास सफल होते हैं, तब व्यक्ति की प्रार्थना सही मार्ग में प्रवेश करेगी और वह परमेश्वर के साथ सच्चा संवाद कर पाएगा।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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