168. परमेश्वर के हृदय को आश्वासन देने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने, सत्य को समझने, और इसे आचरण में लाने पर ध्यान दो। सत्य की वास्तविकता में प्रवेश हासिल करो, और एक सच्ची मानवीय सदृशता को जिओ।

(2) परमेश्वर के प्रेम को लौटाने के लिए, किसी को अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए, अपनी सर्वोच्च क्षमता के अनुसार परमेश्वर के कार्य की रक्षा करनी चाहिए, और अपनी भक्ति को बनाए रखना चाहिए।

(3) परीक्षणों और शोधन में, चाहे तुम्हारी पीड़ा कितनी भी बड़ी क्यों न हो, केवल परमेश्वर को गौरवान्वित और संतुष्ट करने हेतु, उसकी इच्छा को समझने और अपनी गवाही में दृढ़ रहने में सक्षम होने की कोशिश करो।

(4) सत्य की तलाश करो और एक ईमानदार व्यक्ति बनो, खुद को नेकी के साथ परमेश्वर के लिए खपाओ, अपने जीवन को उसका अनुसरण करने और उसके लिए गवाही देने के प्रति समर्पित करो, और ऐसे व्यक्ति बनो जो वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करता हो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मैं केवल यह उम्मीद करता हूँ कि मेरे कार्य के अंतिम चरण में तुम लोग अपनेसर्वोत्कृष्ट निष्पादन में सक्षमहोंगे, और कि तुम स्वयंको पूरे मन से समर्पित करोगे, अधूरे मन से नहीं। बेशक, मैं यह उम्मीद भी करता हूँ कि तुम लोगों को सर्वोत्तम गंतव्य प्राप्त हो सके। फिर भी, मेरे पास अभी भी मेरी अपनी आवश्यकता है, और वह यह कि तुम लोग मुझे अपनी आत्मा और अंतिम भक्ति समर्पित करने में सर्वोत्तम निर्णय करो। अगर किसी की भक्ति एकनिष्ठ नहीं है, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से शैतान की सँजोई हुई संपत्ति है, और मैं आगे उसे इस्तेमाल करने के लिए नहीं रखूँगा, बल्कि उसे उसके माता-पिता द्वारा देखे-भाले जाने के लिए घर भेज दूँगा। मेरा कार्य तुम लोगों के लिए एक बड़ी मदद है; मैं तुम लोगों से केवल एक ईमानदार और ऊपर उठने का आकांक्षी हृदय पाने की उम्मीद करता हूँ, लेकिन मेरे हाथ अभी तक खाली हैं। इस बारे में सोचो : अगर मैं किसी दिन इतना दुखी हुआकि उसे शब्दों में बयान न कर सकूँ, तो फिर तुम लोगों के प्रति मेरा रवैया क्या होगा? क्या मैं तब भी तुम्हारे प्रति वैसा ही सौम्य रहूँगा, जैसा अब हूँ? क्या मेरा हृदय तब भी उतना ही शांत होगा, जितना अब है? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की भावनाएँ समझते हो, जिसने कड़ी मेहनत से खेत जोता हो और उसे फसल की कटाई में अन्न का एक दाना भी नसीब न हुआ हो? क्या तुम लोग यह समझते हो कि आदमी को बड़ा आघात लगने पर उसके दिल को कितनी भारी चोट पहुँचती है? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की कड़वाहटका अंदाज़ालगा सकते हो, जो कभी आशा से भरा हो, पर जिसे ख़राब शर्तों पर विदा होना पड़ा हो? क्या तुम लोगों ने उस व्यक्ति का क्रोध निकलते देखा है, जिसे उत्तेजित किया गया हो? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की बदला लेने की आतुरता जान सकते हो, जिसके साथ शत्रुता और धोखे का व्यवहार किया गया हो? अगर तुम इन लोगों की मानसिकता समझ सकते हो, तो मैं सोचता हूँ, तुम्हारे लिए यह कल्पना करना कठिन नहीं होना चाहिए कि अपने प्रतिशोध के समय परमेश्वर का रवैया क्या होगा! अंत में, मुझे उम्मीद है कि तुम सब अपने गंतव्य के लिए गंभीर प्रयास करोगे; हालाँकि, अच्छा होगा कि तुम अपने प्रयासों में कपटपूर्ण साधन न अपनाओ, अन्यथा मैं अपने दिल में तुमसे निराश बना रहूँगा। और यह निराशा कहाँ ले जाती है? क्या तुम लोग स्वयं को ही बेवकूफ नहीं बना रहे हो? जो लोग अपने गंतव्य के विषय में सोचते हैं, पर फिर भी उसे बरबाद कर देते हैं, वे बचाए जाने के बहुत कम योग्य होते हैं। यहाँ तक कि अगर वहउत्तेजित और क्रोधित भी हो जाए, तो ऐसे व्यक्ति पर कौन दया करेगा? संक्षेप में, मैं अभी भी तुम लोगों के लिए ऐसे गंतव्य की कामना करता हूँ, जो उपयुक्त और अच्छा दोनों हो, और उससे भी बढ़कर, मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम लोगों में से कोई भी विपत्ति में नहीं फँसेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर हर इंसान के लिए बहुत श्रमसाध्य कीमत चुकाता है। वह सभी के लिए अपेक्षाओं और उम्मीद के साथ, हर व्यक्ति को अपनी इच्छा का दायित्व सौंपता है। वह इन लोगों के लिए बेझिझक यह श्रमसाध्य कीमत चुकाता है, और वह ऐसा करके बहुत ही आनंदित होता है; वह खुशी से हर व्यक्ति को अपना जीवन और सत्य प्रदान करता है। इस प्रकार, अगर कोई इंसान उसके इस लक्ष्य को समझने में सक्षम होता है तो परमेश्वर आभारी महसूस करता है। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए चाहे जो भी परिवेश बनाए हों, अगर वह जो चीजें करता है, तुम उसे स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पित होने में सक्षम हो, और अगर तुम सब कुछ परमेश्वर से प्राप्त करने में सक्षम हो, तब उसे यह महसूस होगा कि यह श्रमसाध्य कीमत व्यर्थ में नहीं चुकाई गई है। अर्थात, परमेश्वर ने तुम्हारी जो देखभाल की है और तुम्हारे लिए जितना विचार किया है, उन सबकी अपेक्षाओं पर खरे उतरने में तुम विफल नहीं हुए हो; तुमने हर परिवेश में अच्छे नतीजे पाए होंगे, और तुमसे रही परमेश्वर की उम्मीदों को तुमने निराश नहीं किया होगा। अगर तुम पर परमेश्वर ने जो काम किया है उसका अपेक्षित असर पड़ा है और इसने अपेक्षित उद्देश्य पा लिया है, तो परमेश्वर संतुष्ट होगा। अगर तुम परमेश्वर द्वारा तुम पर किए गए काम को कभी भी स्वीकार नहीं करते हो, बल्कि हमेशा इसे नकारते हो और इसका प्रतिरोध करते हो, तो वह परेशान होगा या नहीं होगा? वह चिंतित और परेशान हो जाएगा और वह कहेगा, "मैंने ये परिवेश तुम्हारे लिए व्यवस्थित किए हैं और इतना श्रमसाध्य मूल्य चुकाया है, तो कोई परिणाम क्यों नहीं मिला? इनमें से किसी ने भी तुम्हारे हृदय को क्यों नहीं छुआ?" अगर परमेश्वर को अपने द्वारा किए गए कार्य का तुम पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता तो वह आहत महसूस करेगा। वह आहत क्यों महसूस करता है? इसका कारण यह है कि तुम संज्ञाशून्य, अज्ञानी, मंदबुद्धि और हठधर्मी हो; तुम उसकी इच्छा नहीं समझते हो, न ही तुम सत्य स्वीकार करते हो। परमेश्वर तुम्हारे जीवन की जिम्मेदारी लेता है और वह इसकी खातिर चिंतित और व्याकुल महसूस करता है। इसी कारण परमेश्वर की भावनाओं को चोट पहुँचती है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर अपने प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता को विशेष रूप से सहेजकर रखता है, और अपने बारे में मनुष्य की समझ और अपने प्रति मनुष्य की शुद्ध हृदयता उसे अच्छी लगती है। यह शुद्ध हृदयता परमेश्वर को कितनी अच्छी लगती है? तुम लोग शायद समझ न सको कि उसे यह कितनी अच्छी लगती है, और शायद ऐसा कोई भी न हो जिसे इसका अहसास हो। परमेश्वर ने अब्राहम को पुत्र दिया, और जब वह पुत्र बड़ा हो गया, तो परमेश्वर ने अब्राहम से अपना पुत्र परमेश्वर को भेंट चढ़ाने के लिए कहा। अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया, उसने परमेश्वर के वचन का पालन किया, और उसकी शुद्ध हृदयता ने परमेश्वर को द्रवित कर दिया और परमेश्वर ने उसे सहेजकर रखा। परमेश्वर ने इसे कितना सहेजकर रखा? और उसने इसे क्यों सहेजकर रखा? ऐसे समय जब किसी ने भी परमेश्वर के वचनों को बूझा या उसके हृदय को समझा नहीं था, अब्राहम ने कुछ ऐसा किया जिसने स्वर्ग को हिला दिया और पृथ्वी को कँपा दिया, तथा इसने परमेश्वर को अभूतपूर्व संतुष्टि का भाव महसूस कराया, और यह परमेश्वर के लिए ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने का आनंद लाया जो उसके वचनों का पालन करने में समर्थ था। यह संतुष्टि और आनंद परमेश्वर द्वारा अपने हाथ से सृजित किए गए प्राणी से आया, और जब से मनुष्य का सृजन किया गया था, तब से यह पहला "बलिदान" था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर को चढ़ाया था और जिसे परमेश्वर ने सर्वाधिक सहेजकर रखा था। इस बलिदान की प्रतीक्षा करते हुए परमेश्वर ने बहुत कठिन समय गुज़ारा था, और उसने इसे उस मनुष्य की ओर से दिए गए पहले सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपहार के रूप में लिया जिसे उसने सृजित किया था। इसने परमेश्वर को उसके प्रयासों और उसकी चुकाई क़ीमत का पहला फल दिखाया, और उसे मनुष्यजाति में आशा देखने की गुंजाइश दी। इसके बाद, परमेश्वर को ऐसे लोगों के समूह की और अधिक लालसा हुई जो उसका साथ दें, उसके साथ शुद्ध हृदयता से व्यवहार करें, और शुद्ध हृदयता के साथ उसकी परवाह करें। परमेश्वर ने यह तक आशा की कि अब्राहम निरंतर जीवित रहेगा, क्योंकि वह चाहता था कि जब वह अपने प्रबंधन को आगे बढ़ाए तब अब्राहम जैसा एक हृदय उसका साथ दे और उसके साथ रहे। परमेश्वर चाहे जो भी चाहता था, यह मात्र एक इच्छा, मात्र एक विचार था—क्योंकि अब्राहम मात्र एक मनुष्य था जो उसका आज्ञापालन करने में समर्थ था और उसे परमेश्वर की थोड़ी-सी भी समझ या ज्ञान नहीं था। अब्राहम ऐसा व्यक्ति था जो मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से बहुत कम पड़ता था, जो ये हैं : परमेश्वर को जानना, परमेश्वर की गवाही दे पाना, और परमेश्वर के साथ एक मन होना। इसलिए, अब्राहम परमेश्वर के साथ नहीं चल सकता था। अब्राहम द्वारा इसहाक की भेंट चढ़ाने में, परमेश्वर ने अब्राहम की शुद्ध हृदयता और आज्ञाकारिता देखी, और देखा कि उसने परमेश्वर द्वारा ली गई अपनी परीक्षा का सामना किया था। परमेश्वर ने उसकी आज्ञाकारिता और शुद्ध हृदयता को भले ही स्वीकार कर लिया था, किंतु वह अब भी परमेश्वर का विश्वासपात्र बनने, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर को जानता और समझता हो, और ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के स्वभाव के बारे में जानकार हो बनने के अयोग्य था; वह परमेश्वर के साथ एक मन होने और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने से बहुत दूर था। इसलिए, परमेश्वर अपने हृदय में अब भी एकाकी और उद्विग्न था। परमेश्वर जितना अधिक एकाकी और उद्विग्न होता गया, उतना ही अधिक उसे अपने प्रबंधन को यथाशीघ्र आगे बढ़ाने की, और अपनी प्रबंधन योजना संपन्न करने और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए यथाशीघ्र लोगों का एक समूह चुनने और प्राप्त करने की आवश्यकता थी। यह परमेश्वर की उत्कट अभिलाषा थी, और यह बिल्कुल आरंभ से लेकर आज तक अपरिवर्ती बनी रही है। आरंभ में जब से उसने मनुष्य का सृजन किया, तभी से परमेश्वर विजय पाने वालों के एक समूह के लिए तरसा है, ऐसा समूह जो उसके साथ चलेगा और जो उसका स्वभाव समझने, जानने और बूझने में समर्थ होगा। परमेश्वर की यह इच्छा कभी नहीं बदली है। उसे अब भी चाहे जितना लंबा इंतज़ार करना पड़े, आगे का रास्ता चाहे जितना कठिन हो, जिन उद्देश्यों के लिए वह तरसा है वे चाहे जितने दूर हों, परमेश्वर ने मनुष्य के प्रति अपनी अपेक्षाओं को कभी बदला या त्यागा नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

जल्द ही, मेरा कार्य पूरा हो जाएगा। कई वर्ष जो हमने एक साथ बिताए हैं वे असहनीय यादें बन गए हैं। मैंने अनवरत अपने वचनों को दोहराया है और हमेशा अपने नये कार्य को प्रसारित किया है। निस्संदेह, मैं जो कार्य करता हूँ उसके प्रत्येक अंश में मेरी सलाह एक आवश्यक घटक है। मेरी सलाह के बिना, तुम सभी लोग भटक जाओगे, यहाँ तक कि पूरी तरह उलझन में पड़ जाओगे। मेरा कार्य अब समाप्त होने ही वाला है और अपने अंतिम चरण में है। मैं अभी भी सलाह प्रदान करने का कार्य करना चाहता हूँ, अर्थात्, तुम लोगों के सुनने के लिए सलाह के वचन पेश करना चाहता हूँ। मैं केवल यह आशा करता हूँ कि तुम लोग मेरे श्रमसाध्य प्रयासों को बर्बाद नहीं करोगे और इसके अलावा, तुम लोग मेरी सहृदय परवाह को समझोगे, और मेरे वचनों को एक इंसान के रूप में अपने व्यवहार का आधार बनाओगे। चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें तुम लोग सुनना चाहो या न चाहो, चाहे ये वचन ऐसे हों जिन्हें स्वीकार कर तुम लोगों को आनंद हो या तुम इसे बस असहजता के साथ ही स्वीकार कर सको, तुम लोगों को उन्हें गंभीरता से अवश्य लेना चाहिए। अन्यथा, तुम लोगों के लापरवाह और निश्चिंत स्वभाव और व्यवहार मुझे गंभीर रूप से परेशान कर देंगे और, निश्चय ही, मुझे घृणा से भर देंगे। मुझे बहुत आशा है कि तुम सभी लोग मेरे वचनों को बार-बार—हजारों बार—पढ़ सकते हो और यहाँ तक कि उन्हें याद भी कर सकते हो। केवल इसी तरीके से तुम लोग से मेरी अपेक्षाओं पर सफल हो सकोगे। हालाँकि, अभी तुम लोगों में से कोई भी इस तरह से नहीं जी रहा है। इसके विपरीत, तुम सभी एक ऐयाश जीवन में डूबे हुए हो, जी-भर कर खाने-पीने का जीवन, और तुम लोगों में से कोई भी अपने हृदय और आत्मा को समृद्ध करने के लिए मेरे वचनों का उपयोग नहीं करता है। यही कारण है कि मैंने मनुष्‍य जाति के असली चेहरे के बारे में यह निष्कर्ष निकाला है : मनुष्‍य कभी भी मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है और कोई भी मेरे वचनों के प्रति पूर्णतः निष्ठावान नहीं हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)' से उद्धृत

तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना कर्तव्य अपनी पूरी क्षमता से, खुले और ईमानदार दिलों के साथ पूरा करना चाहिए, और जो भी कीमत ज़रूरी हो, उसे चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, जब दिन आएगा, तो परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति के प्रति लापरवाह नहीं रहेगा, जिसने उसके लिए कष्ट उठाए होंगे या कीमत चुकाई होगी। इस प्रकार का दृढ़ विश्वास बनाए रखने लायक है, और यह सही है कि तुम लोगों को इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। केवल इसी तरह से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूँ। वरना तुम लोगों के बारे में मैं कभी निश्चिंत नहीं हो पाऊँगा, और तुम हमेशा मेरी घृणा के पात्र रहोगे। अगर तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिए कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिए अपनी जीवन भर की ऊर्जा अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिए अक्सरहर्ष से नहीं उछलेगा? इस तरह से मैं तुम लोगों के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत हो सकूँगा, या नहीं? यह शर्म की बात है कि तुम लोग जो कर सकते हो, वह मेरी अपेक्षाओं का दयनीय रूप से एक बहुत छोटा-सा भाग है। ऐसे में, तुम लोग मुझसे वे चीज़ें पाने की धृष्टता कैसे कर सकते हो, जिनकी तुम आशा करते हो?

तुम्हारा गंतव्य और तुम्हारी नियति तुम लोगों के लिए बहुत अहम हैं—वे गंभीर चिंता के विषय हैं। तुम मानते हो कि अगर तुम अत्यंत सावधानी से कार्य नहीं करते, तो इसका अर्थ यह होगा कि तुम्हारा कोई गंतव्य नहीं होगा, कि तुमने अपना भाग्य बिगाड़ लिया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि अगर कोई मात्र अपने गंतव्य के लिए प्रयास करता है, तो वह व्यर्थ ही परिश्रम करता है? ऐसे प्रयास सच्चे नहीं हैं—वे नकली और कपटपूर्ण हैं। यदि ऐसा है, तो जो लोग केवल अपने गंतव्य के लिए कार्य करते हैं, वे अपनी अंतिम पराजय की दहलीज पर हैं, क्योंकि परमेश्वर में व्यक्ति के विश्वास की विफलता धोखे के कारण होती है। मैं पहले कह चुका हूँ कि मुझे चाटुकारिता या खुशामद या अपने साथ उत्साह के साथ व्यवहार किया जाना पसंद नहीं है। मुझे ऐसे ईमानदार लोग पसंद हैं, जो मेरे सत्य और अपेक्षाओं का सामना कर सकें। इससे भी अधिक मुझे तब अच्छा लगता है, जब लोग मेरे हृदय के प्रति अत्यधिक चिंता या आदर का भाव दिखाते हैं, और जब वे मेरी खातिर सब-कुछ छोड़ देने में सक्षम होते हैं। केवल इसी तरह से मेरे हृदय को सुकून मिल सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर तुमसे चाहे कुछ भी माँगे, तुम्हें अपनी पूरी ताकत के साथ केवल इस ओर काम करने की आवश्यकता है, और मुझे आशा है कि अंत में तुम परमेश्वर के समक्ष आने और उसे अपनी परम भक्ति प्रदान करने में सक्षम होगे। अगर तुम सिंहासन पर बैठे परमेश्वर की संतुष्ट मुसकराहट देख सकते हो, तो भले ही यह तुम्हारी मृत्यु का नियत समय ही क्यों न हो, आँखें बंद करते समय भी तुम्हें हँसने और मुसकराने में सक्षम होना चाहिए। पृथ्वी पर अपने समय के दौरान तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपना अंतिम कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए। अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उलटा लटका दिया गया था; परंतु तुम्हें अंत में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देनी चाहिए। एक सृजित प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? इसलिए तुम्हें जल्दी से अपने आपको परमेश्वर को सौंप देना चाहिए, ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार तुम्हारा निपटारा कर सके। अगर इससे परमेश्वर खुश और प्रसन्न होता हो, तो उसे अपने साथ जो चाहे करने दो। मनुष्यों को शिकायत के शब्द बोलने का क्या अधिकार है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 41' से उद्धृत

क्या अय्यूब ने मूल्यवान जीवन जिया? वह मूल्य कहाँ था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि उसने मूल्यवान जीवन जिया? मनुष्य के लिए उसका मूल्य क्या था? मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसने शैतान और संसार के लोगों के सामने गूँजती हुई गवाही में उस मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व किया जिसे परमेश्वर बचाना चाहता था। उसने वह कर्तव्य निभाया जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को निभाना ही चाहिए था, उन सभी लोगों के लिए जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है, एक प्रतिमान स्थापित किया, और एक आदर्श के रूप में कार्य किया, लोगों को देखने दिया कि परमेश्वर पर भरोसा रखकर शैतान पर विजय प्राप्त करना पूरी तरह संभव है। परमेश्वर के लिए उसका मूल्य क्या था? परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर की आराधना करने, परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने, और परमेश्वर के कर्मों की स्तुति करने, परमेश्वर को आराम देने और उसके आनंद लेने के लिए कुछ करने की उसकी क्षमता में निहित था; परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य इसमें भी निहित था कि कैसे, उसकी मृत्यु से पहले, अय्यूब ने परीक्षाओं का अनुभव किया और शैतान पर विजय प्राप्त की, और शैतान के समक्ष परमेश्वर की गूँजती हुई गवाही दी, जिससे परमेश्वर ने मनुष्यजाति के बीच महिमा प्राप्त की, उसके हृदय को आराम मिला और इसने उसके आतुर हृदय को एक परिणाम देखने दिया और आशा देखने दी। उसकी गवाही ने मनुष्यजाति के प्रबंधन के परमेश्वर के कार्य में, परमेश्वर की अपनी गवाही में डटे रहने की क्षमता का, और परमेश्वर की ओर से शैतान को लज्जित करने में सक्षम होने का दृष्टांत स्थापित किया। क्या यह अय्यूब के जीवन का मूल्य नहीं है? अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय को आराम पहुँचाया, उसने परमेश्वर को महिमा प्राप्त करने की खुशी का पूर्वस्वाद चखाया, और परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए अद्भुत आरंभ प्रदान किया था। इस बिंदु से आगे, अय्यूब का नाम परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने का प्रतीक, और शैतान पर मनुष्यजाति की विजय का चिह्न बन गया। अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब ने जो जिया, वह और साथ ही शैतान के ऊपर उसकी उल्लेखनीय विजय परमेश्वर द्वारा हमेशा हृदय में सँजोकर रखी जाएगी, और आने वाली पीढ़ियों द्वारा उसकी पूर्णता, खरेपन, और परमेश्वर के भय का सम्मान और अनुकरण किया जाएगा। परमेश्वर द्वारा उसे दोषरहित, चमकदार मोती के समान हमेशा सँजोया जाएगा, और इसलिए वह मनुष्य के द्वारा भी सहेजकर रखे जाने योग्य है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

आरंभ से लेकर आज तक, केवल मनुष्य ही परमेश्वर के साथ बातचीत करने में समर्थ रहा है। अर्थात्, परमेश्वर के सभी जीवित जीव-जंतुओं और प्राणियों में, मनुष्य के अलावा कोई भी परमेश्वर से बातचीत करने में समर्थ नहीं रहा है। मनुष्य के पास कान हैं जो उसे सुनने में समर्थ बनाते हैं, और उसके पास आँखें हैं जो उसे देखने देती हैं; उसके पास भाषा, अपने स्वयं के विचार, और स्वतंत्र इच्छा है। वह उस सबसे युक्त है जो परमेश्वर को बोलते हुए सुनने, और परमेश्वर की इच्छा को समझने, और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए आवश्यक है, और इसलिए परमेश्वर अपनी सारी इच्छाएँ मनुष्य को प्रदान करता है, मनुष्य को ऐसा साथी बनाना चाहता है जो उसके साथ एक मन हो और जो उसके साथ चल सके। जब से परमेश्वर ने प्रबंधन करना प्रारंभ किया है, तभी से वह प्रतीक्षा करता रहा है कि मनुष्य अपना हृदय उसे दे, परमेश्वर को उसे शुद्ध और सुसज्जित करने दे, उसे परमेश्वर के लिए संतोषप्रद और परमेश्वर द्वारा प्रेममय बनाने दे, उसे परमेश्वर का आदर करने और बुराई से दूर रहने वाला बनाने दे। परमेश्वर ने सदा ही इस परिणाम की प्रत्याशा और प्रतीक्षा की है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

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