72. कलीसिया से हटाए जाने के सिद्धांत

(1) सभी तरह के बुरे, बेहूदा, मंदबुद्धि, और अनैतिक लोगों को, जिन्‍हें इस रूप में बहुमत द्वारा प्रमाणित किया जा चुका हो, हटा देना चाहिए।

(2) क्षमता के लिहाज से अत्यंत हीन ऐसे संभ्रमित लोगों को, जो सत्‍य को जरा-भी नहीं समझ सकते या जो कलीसिया के लिए व्यवधान पैदा करते हैं, हटा दिया जाना चाहिए।

(3) छल-कपट और मक्कारी में लिप्त लोगों को, जो वैमनस्‍य के बीज बोते हैं, गुटबाजी करते हैं, या जो कलीसिया के जीवन में व्यवधान डालने के लिए षडयंत्र रचते हैं, हटा दिया जाना चाहिए।

(4) किन्‍हीं भी ऐसे लोगों को निकाल देना चाहिए जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर बार-बार फै़सले सुनाते रहते हैं और उन पर आरोप मढ़ते रहते हैं, जिनके निराधार आक्षेपों का उद्देश्‍य विशुद्ध रूप से भड़काना और उकसाना होता है।

(5) अगर किसी व्‍यक्ति को हटाया जाना है, तो कलीसिया के पास इसकी समुचित वजहें होनी चाहिए, वह कार्य-व्‍यवस्‍था के अनुरूप होना चाहिए, और उस पर सदस्‍यों के बहुमत की सहमति होनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर का उद्धार देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं और जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो परमेश्वर के देहधारण में और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो पाते हैं, कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका स्वभाव बचाया जा सकता है या नहीं। बहुत से लोगों ने परमेश्वर के अनेक वचन सुने हैं परंतु वे उसकी इच्छा को नहीं समझते, वे अब भी उन्हें अपने आचरण में ला पाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग सत्य को जीने में असमर्थ होते हैं और जानबूझकर परमेश्वर के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। वे परमेश्वर के लिए कोई भी कार्य नहीं कर सकते, वे उसे कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते, वे लोग गुप्त रूप से कलीसिया के पैसे भी खर्च करते और मुफ्त में परमेश्वर के घर में खाते हैं। ये लोग मरे हुए लोग हैं और बचाए नहीं जाएंगे। परमेश्वर उन लोगों को बचाता है जो उसके लिए कार्यरत हैं, परंतु उनमें से कुछ लोग परमेश्वर का उद्धार ग्रहण नहीं कर सकते; कुछ ही लोग उसका उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। क्योंकि ज़्यादातर लोगों को बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर दिया गया है और वे मृत हो चुके हैं, उनका उद्धार नहीं हो सकता; वे पूर्णतः शैतान द्वारा शोषित हो चुके हैं और स्वभाव से बहुत दुर्भावनापूर्ण हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

जब परमेश्वर के वचनों द्वारा मनुष्य पर प्राप्त विजय उस बिंदु तक पहुँच जाती है जहाँ यह अभी है, तो लोगों की ताकत एक निश्चित सीमा तक पहुँच चुकी होती है, और इसीलिए परमेश्वर चेतावनी के और अधिक वचनों का इस्तेमाल करता है—उस विधान के रूप में जिसे वह परमेश्वर की प्रजा के सामने पेश करता है: "यद्यपि पृथ्वी पर बसे इंसान तारों की तरह अनगिनत हैं, फिर भी मैं उन्हें उतनी ही अच्छी तरह से जानता हूँ जितनी अपने हाथ की लकीरों को। हालाँकि मुझसे 'प्रेम' करने वाले इंसान भी समुद्र की रेत के कणों की तरह अनगिनत हैं, फिर भी मैं कुछ ही लोगों को चुनता हूँ: केवल उन्हें जो चमकते हुए प्रकाश का अनुसरण करते हैं, और जो उनसे अलग हैं जो मुझसे 'प्रेम' करते हैं।" दरअसल, ऐसे कई लोग हैं जो कहते हैं कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, लेकिन कुछ ही ऐसे हैं जो उसे दिल से प्रेम करते हैं। ऐसा प्रतीत होगा कि इसे बंद आँखों से भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह उन सभी लोगों की दुनिया की वास्तविक स्थिति है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। इसमें, हम देखते हैं कि अब परमेश्वर "लोगों को छाँटने" का कार्य कर रहा है, जो यह दर्शाता है कि परमेश्वर जो चाहता है, और जो परमेश्वर को संतुष्ट करता है, वह आज की कलीसिया नहीं है, बल्कि छाँटने के बाद का राज्य है। इस समय वह सभी "खतरनाक चीज़ों" को एक चेतावनी देता है: जब तक परमेश्वर कार्य न करे, लेकिन जैसे ही परमेश्वर कार्य करना शुरू करेगा, इन लोगों को राज्य से मिटा दिया जाएगा। परमेश्वर कभी कोई कार्य लापरवाही से नहीं करता, वह हमेशा "दूध का दूध और पानी का पानी" के सिद्धांत के अनुसार कार्य करता है, और यदि ऐसे लोग हैं जिनकी ओर वह नज़र नहीं डालना चाहता, तो वह उन्हें मिटाने के लिए हर संभव कार्य करता है, ताकि उन्हें भविष्य में परेशानी पैदा करने से रोका जा सके। इसे "कचरा निकालना और पूरी तरह से सफाई करना" कहा जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 12' से उद्धृत

भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के परिवार में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या यहां मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या यहां प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

लोगों के विद्रोह की भयावहता या उनके भ्रष्ट स्वभाव की गहनता पर ध्यान न देते हुए, जब परमेश्वर उन्हें बचाता है तो परमेश्वर उनके लिए क्या आधार-रेखा तय करता है? कहने का तात्पर्य यह है कि किन परिस्थितियों में परमेश्वर तुम्हें छोड़ देगा, और तुम्हें नहीं चाहेगा? प्रभु तुम्हें चाहे, तुम्हें रखना चाहे, इसके लिए कम से कम तुम्हें क्या प्राप्त करना चाहिए? सबसे महत्वपूर्ण है परमेश्वर को न नकारना। यह मूलभूत बात है। परमेश्वर को न नकारने में असल विषयवस्तु है; यह मात्र स्वर्ग के बूढ़े को स्वीकारना नहीं है, और यह स्वीकारना कि प्रभु देह बन गया है, और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। मनुष्य के लिए यह परमेश्वर की आधार-रेखा है : पहला है परमेश्वर के नाम को न नकारना, परमेश्वर को स्वीकार करना, परमेश्वर पर विश्वास करना, और परमेश्वर का अनुसरण करना; दूसरा है, कम से कम मनुष्य के कर्तव्य को न छोड़ना। ऐसा प्रतीत होता है कुछ लोगों ने अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा है, फिर भी, उनके कार्य पहले ही रुकावटें और बाधाएं पैदा कर चुके हैं, परमेश्वर के घर के कार्य बिगाड़ चुके हैं, और अन्य लोगों को प्रभावित कर चुके हैं। क्या वे अभी भी बचे रह सकते हैं? उन्होंने परमेश्वर की आधार-रेखा का उल्लंघन किया है। और इसलिए, अपने कर्तव्य का पालन करने की आधार-रेखा है, रुकावट या बाधा न पैदा करना। मसीह-विरोधी भी, अपना कर्तव्य निभाते हैं—पर उनके कार्य हस्तक्षेप करने वाले, रुकावटें पैदा करने वाले, हानिकारक और भ्रष्ट होते हैं। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को चाह सकता है? क्या यह उनके कर्तव्य का निष्पादन है? परमेश्वर की दृष्टि में, उन्होंने आधार-रेखा का उल्लंघन किया है, वे उचित ढंग से अपना कर्तव्य निभाने में अक्षम हैं, उनके कर्तव्य के निर्वहन से फायदा कम और परेशानी ज्यादा होती है, और उन्हें कलीसिया से हटा दिया जाना चाहिए। क्या यह लोगों से परमेश्वर के घर के व्यवहार का सिद्धांत है? क्या कोई कहता है, "क्या मुझे इसलिए परिष्कृत किया गया है, क्योंकि मैं गलत अवस्था में था, और हमेशा नकारात्मक था?" या "मैंने केवल कभी-कभी अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया, मैं केवल थोड़ा लापरवाह और बेमन से करता था—तुम मुझे कर्तव्य निभाने से निलंबित कैसे कर सकते हो?" या "मैंने अपना कर्तव्य बहुत अच्छी तरह से नहीं निभाया, इसलिए मुझे परिष्कृत किया गया" या "कभी-कभी मेरे मन में बुरे विचार आते थे, दुष्ट विचार आते थे, और मुझे भी परिष्कृत कर दिया गया?" क्या ऐसे लोग हैं जिनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है? (नहीं।) कुछ लोगों में, कभी-कभी अविश्वास की धारणाएँ दिखाई देती हैं : "क्या वास्तव में परमेश्वर है? हवा, बारिश, गर्जन, बर्फ—क्या ये सब स्वर्ग के उस बूढ़े द्वारा बनाए गए हैं? क्या परमेश्वर देह बन गया है? ऐसा सोचना गलत है, मुझे सही ढंग से अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए।" यह जानने के बाद, कुछ लोग कहते हैं, "यह व्यक्ति हमेशा परमेश्वर पर संदेह करता है। इसे परिष्कृत करो—उसे कर्तव्य मत निभाने दो।" क्या ऐसे लोग है जिन्हें इस तरह से परिष्कृत किया गया है? (नहीं।) तो किस सिद्धांत से परमेश्वर का घर लोगों को परिष्कृत करता है? किन लोगों को परिष्कृत किया जाता है और कर्तव्यों से निलंबित किया जाता है? (वे जिनकी सेवाओं से परेशानी ज्यादा होती है, जो बाधाएं और रुकावटें पैदा करते हैं।) ऐसे लोगों को कर्तव्य का पालन नहीं करना चाहिए। ऐसा उनके बारे में किसी की राय के कारण नहीं है, न ही यह किसी व्यक्तिगत शिकायत की वजह से उन्हें नियंत्रण में रखने की कोशिश से उपजा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके कर्तव्य का निर्वहन घटिया और अत्यधिक दोषयुक्त है; वे पूरी तरह से अपना कर्तव्य निभाने में अक्षम हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के समक्ष समर्पण से संबंधित अभ्यास के सिद्धांत' से उद्धृत

इस प्रकार के लोग होते हैं जो किसी के साथ प्रेम, सहयोग की भावना और धैर्य के साथ पेश आते हैं, लेकिन वे केवल परमेश्वर के ही कट्टर विरोधी, और पक्के दुश्मन होते हैं। जब उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो सत्य का स्पर्श करती है, जो बताती है कि परमेश्वर क्या कहता और चाहता है, वे कठिनाइयाँ उत्पन्न करते हुए, इसे निरंतर संदेह की दृष्टि से देखते हुए और अवधारणाएँ फैलाते हुए, न केवल इसे स्वीकार करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि बहुत सारी ऐसी हरकतें भी करते हैं जो परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान पहुंचाती हैं, यहां तक कि कोई बात जब उनके अपने हितों को प्रभावित करती है तो वे परमेश्वर के विरोध में उठ खड़े होने और उसके विरुद्ध चीखने-चिल्लाने में भी समर्थ होते हैं। किस तरह के लोग हैं ये? (वे जो परमेश्वर से घृणा करते हैं।) परमेश्वर के प्रति घृणा सभी लोगों की प्रकृति का एक पहलू है, और सभी में यह सार मौजूद होता है; फिर भी, कुछ लोगों में यह उतना गंभीर नहीं होता। तो, क्यों इस तरह के लोग परमेश्वर से इतनी घृणा करते हैं? वे परमेश्वर के दुश्मन हैं; स्पष्ट शब्दों में—वे दानव हैं, जीवित दानव। क्या लोगों के बीच ऐसे जीवित दानव हैं जिन्हें परमेश्वर बचाता है? (नहीं।) इसलिए, अगर तुम कलीसिया में इस तरह के कुछ जीवित दानव की सही पहचान कर लेते हो, तो तुम्हें अविलंब उन्हें उस जगह से हटा देना होगा। अगर कोई व्यक्ति सामान्यतः बिल्कुल अच्छा व्यवहार करता है, लेकिन उसकी अवस्था में बस एक क्षणिक चूक है, या उसका कद इतना छोटा है कि वह सत्य को नहीं समझ सकता, और वह एक हलका व्यवधान या बाधा उत्पन्न करता हो, लेकिन यह व्यवहार सुसंगत न हो, और वह प्रकृति से ऐसा व्यक्ति न हो, तो उसे रहने दिया जा सकता है। कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो अपनी कमजोर मानवता के बावजूद एक लिहाज से कुशल होते हैं : वे सेवा करने के इच्छुक होते हैं, यहाँ तक कि पीड़ा सहने के लिए भी तैयार रहते हैं, बस वे कोई अपराध बरदाश्त नहीं करते और जो कोई भी उन्हें ठेस पहुंचाता है, उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं, लेकिन जब उन्हें ठेस नहीं पहुंचाई जाती, तो वे काफी सामान्य होते हैं। उन्होंने दूसरों से लाभ भी नहीं उठाया होता है। ऐसे लोगों को भी रहने दिया जा सकता है, और हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उन्हें बचा ही लिया जाएगा, वे कम-से-कम सेवा प्रदान कर सकते हैं, और वे अंत तक सेवा कर सकते हैं या नहीं, यह उनकी व्यक्तिगत खोज पर निर्भर करता है। लेकिन, यदि ऐसा व्यक्ति जीवित दानव या परमेश्वर का शत्रु है, तो उसे कभी बचाया नहीं जा सकेगा। यह निश्चित है, और उसे कलीसिया से हटा दिया जाना चाहिए। कुछ लोगों को पश्चात्ताप का एक अवसर प्रदान करने, एक सबक सिखाने के लिए हटाया जाता है; दूसरे इसलिए हटाए जाते हैं क्योंकि उनकी असली प्रकृति देख ली गई होती है, और उन्हें बचाया नहीं जा सकता। हर व्यक्ति अलग होता है। हटाए गए कुछ लोगों ने अपनी अवसादग्रस्त और स्याह अवस्था के बावजूद अपने कर्त्तव्य का त्याग नहीं किया है, और वे उसका पालन कर रहे हैं—उनकी अवस्था उन लोगों जैसी नहीं है जो अपने कर्त्तव्य का पालन बिलकुल नहीं करते, और जो मार्ग वे अपनाते हैं वह अलग होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर के प्रति जो प्रवृत्ति होनी चाहिए मनुष्य की' से उद्धृत

परमेश्वर का घर विभिन्न प्रकार के लोगों को कैसे सँभालता है : कुछ को कर्तव्य निभाने वालों के पद से हटा दिया जाता है; कुछ को पूर्णकालिक कलीसिया से एक अंशकालिक कलीसिया में पदावनत कर दिया जाता है; कुछ को अंशकालिक कलीसिया से एक साधारण कलीसिया में पदावनत कर दिया जाता है; कुछ को इन विभिन्न प्रकार की कलीसियायों से घटाकर समूह ख में डाल दिया जाता है; और कुछ को बस निष्कासित कर दिया जाता है। परमेश्वर का घर बार-बार कलीसिया की सफाई के काम की व्यवस्था करता है; इसी प्रकार, साफ किए जाने के मानदंड को पूरा करने वाले तमाम लोगों के लिए भी विशिष्ट कार्य-व्यवस्थाएँ हैं। अपना कर्तव्य निभाने के प्रति लोगों के दृष्टिकोण, और अपना कर्तव्य निभाते समय उनके द्वारा किए जाने वाले अपराधों, और साथ ही इन विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा प्रदर्शित मानवता और स्वभाव के आधार पर परमेश्वर का घर उन्हें सँभालने के लिए मामला-दर-मामला नीतियों का निर्माण करता है; परमेश्वर के घर में इस सबके लिए कार्य-व्यवस्थाएँ हैं। कार्य-व्यवस्थाएँ लिखित रूप से भी संप्रेषित की जाती हैं और संगति के माध्यम से भी। संक्षेप में, यह कार्य सतत चलता है, रुक-रुक कर नहीं। ऐसा नहीं कि पहले उच्च कोई कार्य-व्यवस्था जारी करता है, फिर कलीसिया कुछ समय तक सफाई का कार्य करती है और जब वह समाप्त हो जाता है—और अगर उच्च ने इस आशय का कोई और आदेश न दिया हो—तो कलीसिया अगली बार किसी ऐसे व्यक्ति का पता चलने पर कुछ नहीं करती, जिसकी सफाई किए जाने की जरूरत है। ऐसी बात नहीं है। कलीसिया का सफाई-कार्य निरंतर और व्यवस्थित रूप से चलना चाहिए। जहाँ परिष्करण आवश्यक और उपयुक्त हो, वहाँ उसे कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार किया जाना चाहिए; निष्क्रिय होकर उच्च के निर्देशों या वरिष्ठ अगुआओं के आदेशों का इंतजार न करो, और निष्क्रिय होकर और अधिक भाई-बहनों द्वारा सूचना दिए जाने की प्रतीक्षा मत करो। जब भाई-बहनों के एक हिस्से से रिपोर्ट आ जाए, या अगर स्वयं अगुआ द्वारा पहले ही खोज की जा चुकी हो, या फिर अगर कलीसिया के निरीक्षक एक-दूसरे के साथ संगति करें और आम सहमति पर पहुँच जाएँ, और ज्यादातर भाई-बहन एक मूल्यांकन लिखें जिसमें कहा गया हो कि उस व्यक्ति को परिष्कृत किया जाना चाहिए, तो उसे तुरंत परिष्कृत किया जाना चाहिए। यह ऐसे कार्य के लिए कार्य-व्यवस्थाओं का विशिष्ट प्रावधान है। और सफाई का कार्य किस उद्देश्य से किया जाता है? कलीसिया की सफाई करने के लिए, ताकि परमेश्वर के घर में कर्तव्य निभाने वालों के लिए काम का माहौल शांतिपूर्ण और दुष्टों के हस्तक्षेप से मुक्त हो; ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि परमेश्वर का घर आवारा लोगों और आलसी कामचोरों का समर्थन नहीं करता। जो लोग परमेश्वर के घर में सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ होते हैं, जिन्हें हमेशा किसी के द्वारा देखे और विनियमित किए जाने की आवश्यकता होती है, जो कर्तव्य निभाने के अयोग्य हैं—उनकी भी सफाई की जानी चाहिए। ऐसा कार्य एक सरल, स्वचालित कार्य होना चाहिए, जिसकी जिम्मेदारी अगुआओं और कार्यकर्ताओं को लेनी चाहिए, और जिसे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को लागू और पूरा करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (9)' से उद्धृत

पिछला: 71. कलीसिया में लोगों को अलग-थलग रखे जाने के सिद्धांत

अगला: 73. कलीसिया से निष्‍कासन के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

610 प्रभु यीशु का अनुकरण करो

1पूरा किया परमेश्वर के आदेश को यीशु ने, हर इंसान के छुटकारे के काम को,क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा की परवाह की,इसमें न उसका स्वार्थ था, न...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें