95. परमेश्वर के सामने दूसरों को लाने के सिद्धांत

(1) सभी मामलों में, परमेश्वर को समर्पित होना और उसे महान मानकर ऊँचा उठाना आवश्यक है। ऐसे व्यक्ति बनो जो परमेश्वर का भय मानता हो और बुराई से दूर रहता हो, और अपना कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर जैसा चाहे, वैसे उसकी सेवा करो।

(2) यह आवश्यक है परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाही देना सीखो, दूसरों को यह दिखाओ कि लोगों को शैतान कैसे भ्रष्ट करता है और परमेश्वर उन्हें कैसे बचाता है, ताकि वे वास्तव में परमेश्वर के पास लौट सकें।

(3) समस्याओं के समाधान के लिए सत्य के उपयोग का अभ्यास करना आवश्यक है, यह व्यक्ति को सत्य की समझ और सच्चे पश्चाताप की ओर ले जाता है, ताकि सभी लोग परमेश्वर के सामने समर्पण और उसकी आराधना कर सकें।

(4) परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिए और परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव करने के लिए दूसरों की अगुआई करना आवश्यक है, ताकि वे परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को जानें और अनंतकाल तक उसकी प्रशंसा करें।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में बस गया। इस प्रकार, परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसने मानवता के सृजन के पीछे का अर्थ खो दिया। इसलिए मानवता के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवता को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंत में, अपने राज्य को बहाल कर सकता है। अवज्ञा करने वाले उन पुत्रों का अंतिम तौर पर विनाश भी क्रियान्वित किया जाएगा, ताकि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं के विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है, वह है, जो उसकी आराधना करेगी, जो उसे पूरी तरह समर्पण करेगी और उसकी महिमा का प्रदर्शन करेगी। यदि परमेश्वर भ्रष्ट मानवता को नहीं बचाता, तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर उन शत्रुओं का नाश नहीं करता, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना भी नहीं कर पाएगा। ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के प्रतीक होंगे : मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा, और जब वे अपने-अपने कर्तव्य निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं को समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीज़ों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर सभी चीज़ों पर और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और मनुष्यों और स्वयं के साथ एक अनंत जीवन का आरंभ करेगा। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

अब तुम्हें किसका अनुसरण करना चाहिए? क्या तुम परमेश्वर के कार्य के लिए गवाही देने में समर्थ हो, क्या तुम परमेश्वर की गवाही और एक अभिव्यंजना बन सकते हो, और क्या तुम उसके द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य हो—ये वो बातें हैं जिन्हें तुम्हें खोजना चाहिए। परमेश्वर ने तुम में वास्तव में कितना काम किया है? तुमने कितना देखा है, तुमने कितना स्पर्श किया है? तुमने कितना अनुभव किया है और चखा है? चाहे परमेश्वर ने तुम्हारी परीक्षा ली हो, तुम्हारे साथ व्यवहार किया हो, या तुम्हें अनुशासित किया हो, उसके व्यवहार और उसके कार्य तुम में किए गए हैं। परन्तु परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर के द्वारा परिपूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करने का उत्सुक है, क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के आधार पर परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ हो? क्या तुम अपने व्यवहारिक अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के वचन को जी सकते हो? क्या तुम अपने स्वयं के व्यवहारिक अनुभव के माध्यम से दूसरों का भरण पोषण करने, और परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के वास्ते अपना पूरा जीवन खपाने में सक्षम हो? परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाही देने हेतु तुम्हें अपने अनुभव, ज्ञान और तुम्हारे द्वारा चुकाई गयी कीमत पर निर्भर होना होगा। केवल इसी तरह तुम उसकी इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के कार्यों की गवाही देता है? क्या तुम्हारी यह अभिलाषा है? यदि तुम उसके नाम, और इससे भी अधिक, उसके कार्यों की गवाही देने में समर्थ हो, और साथ ही उस छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपने लोगों से अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाह हो। तुम वास्तव में, परमेश्वर के लिए किस प्रकार गवाही देते हो? परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास और लालसा करते हुए तुम ऐसा करते हो, अपने शब्दों के माध्यम से गवाही देने, लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानने और देखने देने और उसके क्रियाकलापों को देखने देने के द्वारा ऐसा करते हो—यदि तुम वास्तव में यह सब कुछ खोजोगे, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। यदि तुम बस परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाना और अंत में धन्य किए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें खोज करनी चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, उसे कैसे संतुष्ट करें जब वह अपनी इच्छा को तुम्हारे सामने प्रकट करता है, और तलाश करनी चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की गवाही तुम्हें कैसे देनी चाहिए, और वह कैसे तुम्हें अनुशासित करता और तुमसे निपटता है, इसके लिए कैसे गवाही देनी है। अब तुम्हें इन सभी बातों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार सिर्फ इसलिए है कि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद उसकी महिमा को साझा कर सको, तो यह फिर भी अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता है। तुम्हें परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने में समर्थ होने, उसकी माँगों को संतुष्ट करने और एक व्यावहारिक तरीके से उसके द्वारा लोगों पर किए गए कार्य का अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे वो कष्ट सहना हो या रोना और दुखित होना, तुम्हें अपने अभ्यास में इन सभी चीज़ों को अनुभव अवश्य करना चाहिए। ये तुम्हें परमेश्वर के गवाह के रूप में पूर्ण करने के लिए हैं। वास्तव में अभी वह क्या है जो तुम्हें कष्ट सहने और पूर्णता तलाशने के लिए मजबूर करता है? क्या तुम्हारा वर्तमान कष्ट सच में परमेश्वर को प्रेम करने और उसके लिए गवाही देने के वास्ते है? या यह देह के आशीषों के लिए, भविष्य की तुम्हारी संभावनाओं और नियति के लिए है? खोज करने के तुम्हारे सभी इरादे, प्रेरणाएँ और तुम्हारे द्वारा अनुगमन किए जाने वाले लक्ष्य अवश्य सही किए जाने चाहिए और यह तुम्हारी स्वयं की इच्छा से मार्गदर्शित नहीं किए जा सकते। यदि एक व्यक्ति आशीषें प्राप्त करने और सामर्थ्य में शासन करने के लिए पूर्णता की तलाश करता है, जबकि दूसरा परमेश्वर को संतुष्ट करने, परमेश्वर के कार्य की व्यवहारिक गवाही देने के लिए पूर्ण बनाए जाने की खातिर प्रयास करता है, प्रयास के इन दोनों माध्यमों में से तुम किसे चुनोगे? यदि तुम पहले वाले को चुनते हो, तो तुम अभी भी परमेश्वर के मानकों से बहुत दूर होगे। मैंने पहले कहा है कि मेरे कार्य ब्रह्माण्ड भर में मुक्त रूप से जाने जाएंगे और मैं ब्रह्माण्ड पर एक सम्राट के रूप में शासन करूँगा। दूसरी ओर, जो तुम लोगों को सौंपा गया है वह है परमेश्वर के कार्यों के लिए गवाह बनना, न कि राजा बनना और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में दिखाई देना। परमेश्वर के कर्मों को समस्त ब्रह्माण्ड को और आकाश को भर देने दो। हर एक को उन्हें देखने दो और उन्हें स्वीकार करने दो। ये वचन परमेश्वर स्वयं के सम्बन्ध में कहे जाते हैं और मानवजाति को जो करना चाहिए वह है परमेश्वर के लिए गवाही देना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

तुम लोगों में में से प्रत्येक अब जिस कर्तव्य का पालन कर रहा है, चाहे वह किसी फिल्म का फिल्मांकन करना हो या परमेश्वर की गवाही देने के लिए भजन गाना, क्या इंसान के लिए उनका कोई मूल्य है? उनका मूल्य कहाँ होता है? उनका मूल्य लोगों को परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और सही रास्ते पर चलने के लिए लाने में है, ताकि वे सभी समझ सकें कि वे सृजित प्राणियों में गिने जाते हैं और सभी सृष्टिकर्ता के सामने आते हैं। क्या उन्हें कई ऐसी समस्याएँ नहीं हैं, जो उन्हें समझ में नहीं आतीं? क्या वे असहाय महसूस नहीं करते? क्या उन्हें खोखलापन महसूस नहीं होता? क्या उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वे बिना आध्यात्मिक सहारे के जी रहे हैं? क्या उन्हें जीवन उबाऊ नहीं लगता? इस सब की जड़ क्या है? इसका उत्तर परमेश्वर के वचनों में है। तुम लोग इस आशय से इन कर्तव्यों का पालन करते हो : अपनी सोच को दिशा देने के लिए, परमेश्वर की खोज में मार्गदर्शन पाने के लिए, सही मार्ग खोजने के लिए, सृष्टिकर्ता को खोजने और उसकी संप्रभुता और आयोजनों को स्वीकारने, उनका पालन करने, उन्हें समझने और जानने के लिए। केवल इसी तरह वे समझ पाएँगे कि वे किसलिए जी रहे हैं, उनके जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है, और उन्हें कैसे जीना चाहिए। इसलिए, जब तुम लोग अपने कर्तव्यों का पालन करो, तो तुम्हें अपनी प्रार्थना दोगुनी कर देनी चाहिए और खूब मेहनत करनी चाहिए; मेहनती बनो, आलसी नहीं; और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हुए ज्यादा बार संगति करो। जब परमेश्वर ने इस मानवजाति का सृजन किया, तो उसकी एक प्रबंधन-योजना थी। पिछले कई हजार वर्षों में मानवजाति ने सृष्टिकर्ता की गवाही देने के लिए कोई बड़ी जिम्मेदारी या कर्तव्य नहीं निभाया, और परमेश्वर ने मानवजाति के बीच जो काम किया, वह अपेक्षाकृत विवेकपूर्ण और सरल था। लेकिन अंत के दिनों में चीजें अलग हैं—तुम लोग बड़ी जिम्मेदारी निभाते हो! वह किस रूप में बड़ी है? परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने से भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम हर सृजित मनुष्य के सामने परमेश्वर की गवाही दो। इसके अलावा, तुम्हें हर उस सृजित इंसान को सृष्टिकर्ता के सामने लाना भी चाहिए, जिसने परमेश्वर का सुसमाचार सुना है, ताकि वे लोग समझ सकें कि उसने मानवजाति को क्यों बनाया है और एक सृजित मनुष्य के रूप में उन्हें सृष्टिकर्ता के समक्ष वापस आकर उसकी संप्रभुता, व्यवस्थाएँ और आयोजन स्वीकार करने चाहिए। क्या तुम इसे केवल नाचकर या भजन गाकर प्राप्त कर सकते हो? किसी काम के केवल एक पहलू को संपन्न करना पर्याप्त नहीं होगा। तुम्हें सृष्टिकर्ता के कर्मों, संप्रभुता और व्यवस्थाओं की गवाही देने के लिए विविध तरीके अपनाने चाहिए। इस तरह, तब तुम सृष्टिकर्ता के सामने और ज्यादा लोगों को लाने में सक्षम हो पाओगे, ताकि वे उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं को स्वीकार कर सकें।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्‍यों का भलीभाँति निर्वहन करके ही व्‍यक्ति अपने जीवन को सार्थक बनाता है' से उद्धृत

कुछ समय के लिए परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का अनुभव करने के बाद (सेवा करने वालों की परीक्षा और ताड़ना का समय), अंततः कुछ लोगों ने कहा : "परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में कठिन है!" यह तथ्य कि वे "वास्तव में कठिन" इन शब्दों का प्रयोग करते हैं दर्शाता है कि परमेश्वर के कर्म अथाह हैं, परमेश्वर का कार्य अत्यधिक महत्व और मूल्य से सम्पन्न है, और मनुष्य के द्वारा संजोकर रखे जाने के बहुत ही योग्य है। यदि, मेरे इतना अधिक काम करने के बाद, तुम्हें थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, तो क्या तब भी मेरे कार्य का कोई मूल्य हो सकता है? इस कारण तुम कहोगे : "परमेश्वर की सेवा करना वास्तव में कठिन है, परमेश्वर के कर्म बहुत अद्भुत हैं, परमेश्वर सचमुच में विवेकी है! वह बहुत प्यारा है!" यदि, अनुभव की एक अवधि से गुज़रने के बाद, तुम ऐसे शब्दों को कहने में समर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुमने स्वयं में परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर लिया है। एक दिन, जब तुम सुसमाचार का प्रचार करने के लिए विदेश में होते हो और कोई तुमसे पूछता है : "परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास कैसा चल रहा है?" तो तुम यह कहने में सक्षम होगे : "परमेश्वर के कार्य बहुत ही अद्भुत हैं!" वे महसूस करेंगे कि तुम्हारे वचन वास्तविक अनुभवों के बारे में बोलते हैं। यही वास्तव में गवाही देना है। तुम कहोगे कि परमेश्वर का कार्य बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण है, और तुममें उसके कार्य ने वास्तव में तुम्हें आश्वस्त कर दिया है और तुम्हारे हृदय को जीत लिया है। तुम हमेशा उससे प्रेम करोगे क्योंकि वह मानवजाति के प्रेम के लिए कहीं अधिक योग्य है! यदि तुम इन चीज़ों से बातचीत कर सकते हो, तो तुम मनुष्यों के हृदयों को द्रवित कर सकते हो। यह सब कुछ गवाही देना है। यदि तुम एक ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम हो, लोगों को द्रवित कर उनकी आँखों में आँसू लाने में सक्षम हो, तो यह दर्शाता है कि तुम वास्तव में ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर से प्रेम करता है क्योंकि तुम परमेश्वर को प्रेम करने की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे माध्यम से, परमेश्वर के कार्यों की गवाही दी जा सकती है। तुम्हारी गवाही के कारण, अन्य लोग परमेश्वर के कार्यों की खोज करते हैं, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, और वे जिस भी माहौल का अनुभव करें, उसमें वे दृढ़ रहने में समर्थ होंगे। केवल इस प्रकार से गवाही देना ही वास्तविक रूप से गवाही देना है, और बिलकुल यही अभी तुम से अपेक्षित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता होने के नाते, अगर तुम लोग परमेश्वर के चुने लोगों का नेतृत्व वास्तविकता में करना चाहते हो और परमेश्वर के गवाहों के रूप में सेवा करना चाहते हैं, तो सबसे ज़रूरी है कि लोगों को बचाने में परमेश्वर के उद्देश्य और उसके कार्य के उद्देश्य की समझ तुम में होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और लोगों से उनकी विभिन्न अपेक्षाओं को समझना चाहिए। तुम्हें अपने प्रयासों में व्यावहारिक होना चाहिए; केवल उतना ही अभ्यास करना चाहिए जितना तुम समझते हो और केवल उस पर ही बात करनी चाहिए जो तुम जानते हो। डींगें न मारें, बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोलें, और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ न करें। अगर तुम बढ़ा चढ़ा कर बोलोगे, तो लोग तुमसे घृणा करेंगे और तुम बाद में अपमानित महसूस करोगे; यह बहुत अधिक अनुचित होगा। जब तुम दूसरों को सत्य प्रदान करते हो, तो उनके सत्य प्राप्त कर लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि तुम उनसे निपटो या उन्हें फटकारो। अगर खुद तुम्हारे पास सत्य नहीं है, और तुम बस दूसरों से निपटते और फटकारते हो, तो वे तुमसे डरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सत्य को समझ जाते हैं। कुछ प्रशासनिक कार्यों में, दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना और उन्हें एक हद तक अनुशासित करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर तुम सत्य प्रदान नहीं कर सकते हो और केवल यह जानते हो कि रोबदार कैसे बनें और दूसरों का तिरस्कार कैसे करें, तो तुम्हारा भ्रष्टाचार और भद्दापन प्रकट हो जाएगा। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे लोग तुमसे जीवन या व्यावहारिक चीजों का पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हो जाएंगे, वे तुमसे नफ़रत करने लगेंगे, तुमसे घृणा महसूस करने लगेंगे। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है वे तुम से नकारात्मक चीजें सीखेंगे; वे दूसरों से निपटना, उन्हें काँटना-छाँटना, गुस्सा होना और अपना आपा खोना सीखेंगे। क्या यह दूसरों को पौलुस के मार्ग, विनाश की तरफ जाने वाले मार्ग पर ले जाने के समान नहीं है? क्या यह शैतान वाला काम नहीं है? तुम्हारा कार्य सत्य के प्रसार और दूसरों को जीवन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर तुम आँख बंद करके दूसरों से निपटते हो और उन्हें उपदेश देते हो, तो वे कभी भी सत्य को कैसे समझ पाएंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोग देखेंगे कि तुम वास्तव में क्या हो, और वे तुम्हारा साथ छोड़ देंगे। तुम इस तरह से दूसरों को परमेश्वर के समक्ष लाने की आशा कैसे कर सकते हो? यह कार्य करना कैसे हुआ? अगर तुम इसी तरह से कार्य करते हो तो तुम सभी लोगों को खो दोगे। तुम आखिर किस काम को पूरा करने की आशा करते हो? कुछ अगुवे समस्याओं के समाधान के लिए सत्य का संचार करने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। इसके बजाय, वे बस आँख मूंदकर दूसरों को निपटारा करते हैं और अपनी शक्ति का दिखावा करते है जिससे दूसरे उनसे डरने लगें और उनका कहा मानें—ऐसे लोग झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव नहीं बदले हैं, वे कलीसिया का काम करने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य वास्तविकता है' से उद्धृत

तुम सब सत्य का सार निकालने में भटक गए हो; जब तुम ये सभी सार निकाल लेते हो, तो इससे केवल नियम ही प्राप्त होते हैं। तुम्हारा "सत्य का सार प्रस्तुत करना" लोगों को जीवन प्राप्त करने या अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने देने के लिए नहीं है। इसके बजाय, इसके कारण लोग सत्य के भीतर से कुछ ज्ञान और सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त करते हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो कि वे परमेश्वर के कार्य के पीछे के प्रयोजन को समझते हैं, जबकि वास्तव में उन्होंने केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों में निपुणता हासिल की है। वे सत्य के मर्म को नहीं समझते हैं, और यह धर्मशास्त्र का अध्ययन करने या बाइबल पढ़ने से भिन्न नहीं है। तुम हमेशा इन पुस्तकों या उन सामग्रियों को संकलित करते रहते हो, और इसलिए सिद्धांत के इस पहलू या ज्ञान के उस पहलू को धारण करने वाले बन जाते हो। तुम सिद्धांतों के प्रथम श्रेणी के वक्ता हो—लेकिन जब तुम बोल लेते हो तो क्या होता है? तब लोग अनुभव करने में असमर्थ होते हैं, उन्हें परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं होती है और स्वयं की भी समझ नहीं होती है। अंत में, उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया होगा वे बस सूत्र और नियम ही होंगे। तुम उन चीजों के बारे में बात कर सकते हो लेकिन और कुछ नहीं। यदि परमेश्वर ने कुछ नया किया, तो क्या तुम लोगों को ज्ञात सभी सिद्धांत उस काम से मेल खाने वाले हो सकते हैं जो परमेश्वर करता है? तुम्हारी ये बातें केवल नियम हैं और तुम लोगों से केवल धर्मशास्त्र का अध्ययन करवा रहे हो: तुम उन्हें परमेश्वर के वचन या सत्य का अनुभव करने की अनुमति नहीं दे रहे हो। इसलिए वे पुस्तकें जिन्हें तुम संकलित करते हो, वे लोगों को केवल धर्मशास्त्र और ज्ञान में, नए सूत्रों, नियमों और प्रथाओं में ही ला सकती हैं। वे लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकती हैं, या लोगों को सत्य को समझने या परमेश्वर की इच्छा को समझने में मदद नहीं कर सकती हैं। तुम सोच रहे हो कि प्रश्न पर प्रश्न पूछने से, जिनके तब तुम उत्तर देते हो, और जिनके लिए तुम एक रूपरेखा या सारांश लिखते हो, इस तरह के व्यवहार से तुम्हारे भाई-बहन आसानी से समझ जाएंगे। याद रखने में आसान होने के अलावा, एक नज़र में ये इन प्रश्नों के बारे में स्पष्ट हैं, और तुमको लगता है कि इस तरह से कार्य करना बहुत अच्छा है। लेकिन वे जो समझ रहे हैं वह वास्तविक मर्म नहीं है; यह वास्तविकता से भिन्न है और सिर्फ शब्द और सिद्धांत हैं। तो यह बेहतर होगा कि तुम इन चीजों को बिल्कुल भी नहीं करो। तुम लोगों को ज्ञान को समझने और ज्ञान में निपुणता प्राप्त करने की ओर ले जाने के लिए ये कार्य करते हो। तुम अन्य लोगों को सिद्धान्तों में, धर्म में लाते हो, और उनसे परमेश्वर का अनुसरण और धार्मिक सिद्धांतों के भीतर परमेश्वर में विश्वास करवाते हो। क्या तब तुम बस पौलुस के समान नहीं हो? तुम सबको लगता है कि सत्य के ज्ञान में निपुणता प्राप्त करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, और उसी तरह परमेश्वर के वचनों के कई अंशों को कंठस्थ करना भी महत्वपूर्ण है। लेकिन लोग परमेश्वर के वचन को कैसे समझते हैं, यह बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। तुम सबको लगता है कि लोगों के लिए ये बहुत आवश्यक है कि वे परमेश्वर के कई वचनों को कंठस्थ करें, कई सिद्धांतों को बोलने में सक्षम हों और परमेश्वर के वचनों के भीतर कई सूत्रों को खोजने में सफल हों। इसलिए, तुम सब हमेशा इन चीजों को व्यवस्थित करना चाहते हो ताकि हर कोई एक से भजन पत्र से गा रहा हो और एक सी बात कह रहा हो, हर कोई वही सिद्धांत बोलता हो, ताकि हर किसी के पास एक सा ज्ञान हो और हर कोई एक से नियम रखता हो—यही तुम सब लोगों का उद्देश्य है। तुम लोग ऐसा करते हो मानो कि लोगों को बेहतर समझाते हो, जबकि इसके विपरीत तुम सबको कोई अंदाज़ा नहीं है कि ऐसा करके तुम लोगों को उन नियमों के बीच ला रहे हो जो परमेश्वर के वचनों के सत्य के बाहर हैं। लोगों को सत्य की वास्तविक समझ प्राप्त करवाने के लिए, तुमको वास्तविकता के साथ जुड़ना चाहिए, कार्य के साथ जुड़ना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार व्यावहारिक समस्याओं को हल करना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग सत्य को समझ सकते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। केवल इस तरह का परिणाम हासिल करना ही लोगों को परमेश्वर के सामने लाना है। अगर तुम सिर्फ आध्यात्मिक सिद्धांतों, मतों और नियमों के बारे में बात करते हो, यदि तुम्हारे प्रयास केवल लिखित शब्दों पर केन्द्रित होते हैं, तो तुम लोगों को सत्य की समझ तक नहीं पहुँचा पाओगे, तुम लोगों से वही बातें कहने और नियमों का पालन करने के लिए निर्देशित करोगे। तुम विशेष रूप से लोगों को अपने आपको बेहतर समझने में सक्षम नहीं बना पाओगे, तुम उन्हें पश्चाताप और परिवर्तन की ओर नहीं ले जा पाओगे। यदि आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर पाना लोगों के लिए सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने का विकल्प बन पाता, तो कलीसियाओं की अगुवायी करने के लिए तुम लोगों की आवश्यकता न होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

तुम जितने ज्यादा सत्य समझते हो, उतना ही ज्यादा तुम यह समझ पाते हो कि अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे निभाना है और कैसे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना है। जैसे-जैसे तुम्हारी समझ बढ़ती है, वैसे-वैसे तुम्हारा जीवन भी विकसित होता है, और जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन जीवन विकसित होता है, तुम्हारे भीतर की अवस्था अधिकाधिक सामान्य होती जाती है, और वे लोग और चीजें, जो तुम्हें परेशान, नियंत्रित और बाधित करती थीं, अब तुम्हारे लिए कोई समस्या नहीं रह जातीं। इस तरह, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध धीरे-धीरे अधिकाधिक सामान्य होता चला जाता है। तुम यह जान जाते हो कि परमेश्वर पर कैसे निर्भर रहना है, उसकी इच्छा कैसे जाननी है, तुम्हारा स्थान कहाँ है, तुम्हें क्या करना है और क्या नहीं करना, तुम्हें किस चीज का ध्यान रखना है और किसका नहीं, और इसके परिणामस्वरूप क्या तुम्हारी अवस्था अधिकाधिक सामान्य नहीं हो रही है? और क्या इस तरह से जीना ज्यादा आसान नहीं है? आसान जीवन जीने से क्या तुम्हारा दिल उज्ज्वल और विशाल नहीं हो जाता, और तब क्या तुम ज्यादातर समय खुश नहीं रहते? जब तुम ज्यादातर समय खुश रहते हो, तो लोग तुम्हारे पूरे मानसिक दृष्टिकोण का आनंद लेते हैं; तुम अदृश्य रूप से लोगों को सीख देने में सक्षम हो जाते हो। ऐसे अवसरों पर तुम्हारे शब्द और कृत्य बहुत नपे-तुले और सैद्धांतिक होते हैं, और जब तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हो जो नकारात्मक और दुर्बल है, तो तुम उसे कुछ जरूरी मदद प्रदान करने में सक्षम होते हो। तुम लोगों को भाषण नहीं देते या उन्हें रोकते नहीं, बल्कि अपने वास्तविक अनुभवों का प्रयोग करके उनकी मदद करते हो और उन्हें लाभ पहुँचाते हो। और इसलिए अब तुम परमेश्वर के घर में सिर्फ मेहनत करने वाले व्यक्ति नहीं रहते, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति बन जाते हो, जो उपयोगी होता है, जो कोई जिम्मेदारी उठा सकता है, जो परमेश्वर के घर में कुछ ज्यादा सार्थक कर सकता है। क्या ऐसे लोग दूसरों के द्वारा पसंद नहीं किए जाते और उनका स्वागत नहीं किया जाता? और परमेश्वर ऐसे लोगों को किस तरह देखता है? (वह उन्हें देखकर आनंदित होता है।) वह उन्हें देखकर आनंदित क्यों होता है? अगर तुम जीवन-प्रवेश हासिल कर चुके हो, अगर तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो अक्सर परमेश्वर और सत्य के सम्मुख जीता है, और ऐसा करते हुए जो दूसरों का भी मार्गदर्शन करता है, तो क्या तुम उन्हें परमेश्वर के सम्मुख नहीं लाते हो? अगर तुममें ये सत्य, ऐसे अनुभव न हों, तो क्या तुम दूसरों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकते हो? अगर तुम खुद परमेश्वर के समुख जीने में असमर्थ हो, तो तुम दूसरों को उसके सम्मुख नहीं ला सकोगे। अगर तुम सिर्फ मेहनत करते हो, ज्यादातर समय सिर्फ मेहनत के लिए मेहनत करते हो, तो तुम परमेश्वर के सम्मुख जीने वाले व्यक्ति नहीं हो। जो लोग परमेश्वर के सम्मुख नहीं जीते, क्या वे परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार कर सकते हैं? क्या वे उसकी परीक्षाओं का सामना कर सकते हैं? क्या वे उसके परीक्षण झेल सकते हैं? (नहीं।) तो क्या ऐसे लोग परमेश्वर की ओर से गवाह हो सकते हैं? क्या वे परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं? (नहीं।) क्या वे लोग, जो परमेश्वर को गवाही नहीं दे सकते, सचमुच परमेश्वर में विश्वास करते हैं? कम-से-कम उन्होंने अभी तक परमेश्वर के घर के द्वार में प्रवेश नहीं किया है! इसका कारण यह है कि उन्होंने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास तो किया है, लेकिन उन्होंने जीवन-प्रवेश हासिल नहीं किया है; न तो वे परमेश्वर को गवाही दे सकते हैं, न वे दूसरे लोगों को परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के गवाह नहीं हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

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