34. शैतान के प्रभाव से बच निकलने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना, सत्य और अपनी भ्रष्टता के सार का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना और शैतान से तहेदिल से घृणा करना और उसे त्याग देना आवश्यक है।

(2) परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान देना, सभी मामलों में सत्य की खोज करना, भ्रष्टता की अपनी अभिव्यक्तियों पर चिंतन करना, तथा सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम बनना आवश्यक है।

(3) बड़े लाल अजगर, मसीह-विरोधियों, झूठे अगुवाओं, बुरी आत्माओं और दुष्ट लोगों को समझने के लिए सच्चाई से लैस होना और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि व्यक्ति कहीं शैतान के धोखे का शिकार न बन जाए।

(4) संपूर्ण सत्य को स्वीकार करना, और, परमेश्वर को वास्तव में जानने के द्वारा, जीवन और मूल्यों पर एक नया दृष्टिकोण विकसित करना, और इनके माध्यम से परमेश्वर से प्रेम और उसके प्रति समर्पण करने वाला व्यक्ति बनना आवश्यक है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यदि तुम परमेश्वर की प्रशंसा पाना चाहते हो, तो सबसे पहले तुम्हें शैतान के अंधकारमय प्रभाव से निकलना चाहिए, अपना हृदय परमेश्वर के लिए खोलना चाहिए, और इसे पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ देना चाहिए। क्या जिन कामों को तुम अब कर रहे हो उनकी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा की जाएगी? क्या तुमने अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया है? तुमने जो काम किये हैं, क्या वे वही हैं जिनकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है? क्या वे सत्य के अनुरूप हैं? तुम्हें हमेशा अपनी जाँच करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान देना चाहिए; अपना हृदय परमेश्वर के सामने रख देना चाहिए, ईमानदारी से परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और निष्ठा के साथ परमेश्वर के लिए खुद को खपाना चाहिए। ऐसे लोगों को निश्चित रूप से परमेश्वर की प्रशंसा मिलेगी।

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे शैतान के प्रभाव से किसी भी तरह नहीं बच सकते। जो लोग ईमानदारी से अपना जीवन नहीं जीते, जो लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से व्यवहार करते हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि मूलत: उनका सार कपटी और धूर्त होता है और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं होती, ऐसे लोग अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं; वे सर्प के किस्म के लोग हैं। जो लोग हमेशा अपने ही लाभ के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, जो अभिमानी और घमंडी हैं, जो दिखावा करते हैं, और जो हमेशा अपनी हैसियत की रक्षा करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं। वे लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के होते हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति सजग नहीं हैं, जो पूरे दिल से परमेश्वर की सेवा नहीं करते, जो हमेशा अपने और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित रहते हैं, जो खुद को परमेश्वर की खातिर खपाने के लिए हर चीज़ का परित्याग करने में सक्षम नहीं हैं, और जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी ज़िंदगी नहीं जीते, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं हो सकती।

जब परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तो उसका उद्देश्य था कि मनुष्य परमेश्वर की समृद्धि का आनंद ले और मनुष्य वास्तव में उससे प्यार करे; इस तरह, मनुष्य उसके प्रकाश में रहेगा। आज, जो लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, वे परमेश्वर के भार के प्रति सजग नहीं हैं, वे पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे पाते, परमेश्वर के हृदय को अपने हृदय की तरह नहीं मान पाते, परमेश्वर के बोझ को अपना मानकर उसे अपने ऊपर नहीं ले पाते, ऐसे लोगों पर परमेश्वर का प्रकाश नहीं चमकता, इसलिए ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे रास्ते पर हैं जो ठीक परमेश्वर की इच्छा के विपरीत जाता है, उनके किसी भी काम में लेशमात्र भी सत्य नहीं होता। वे शैतान के साथ दलदल में लोट रहे हैं और अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। यदि तुम अक्सर परमेश्वर के वचनों को खा और पी सको, साथ ही परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति सजग रह सको और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सको, तो तुम परमेश्वर के हो, तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों में जी रहा है। क्या तुम शैतान के कब्ज़े से निकलने और परमेश्वर के प्रकाश में रहने के लिए तैयार हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो, तो पवित्र आत्मा को अपना काम करने का अवसर मिलेगा; यदि तुम शैतान के प्रभाव में रहते हो, तो तुम पवित्र आत्मा को काम करने का ऐसा कोई अवसर नहीं दोगे। पवित्र आत्मा मनुष्यों पर जो काम करता है, वह जो प्रकाश उन पर डालता है, और वह जो विश्वास उन्हें देता है, वह केवल एक ही पल तक रहता है; यदि लोग सावधान न रहें और ध्यान न दें, तो पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य उन्हें छुए बिना ही निकल जाएगा। यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों में रहता है, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों में नहीं रहता, तो वह शैतान के बंधन में रहता है। यदि इंसान भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीता है, तो उसमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति या पवित्र आत्मा का काम नहीं होता। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की सीमाओं में रह रहे हो, यदि तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिस्थिति में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर के हो, और उसका काम तुम पर किया जाएगा; अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे में नहीं जी रहे, बल्कि शैतान के अधीन रह रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान के भ्रष्टाचार के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों में रहकर अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करके, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो; तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने जीवन की वास्तविकता बनाना चाहिए; तभी तुम परमेश्वर के होगे। यदि तुम सचमुच परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ईमानदारी से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम में काम करेगा, और फिर तुम उसके आशीष में रहोगे, उसके मुखमंडल की रोशनी में रहोगे; तुम पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य को समझोगे, और तुम परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोग मृत्यु के साए में रहते हैं, वे शैतान के कब्ज़े में होते हैं। परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और उसके द्वारा न्याय व ताड़ना पाए बगैर लोग मृत्यु के प्रभाव से नहीं बच सकते; वे जीवित नहीं बन सकते। ये "मृत मनुष्य" परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते, ना ही वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं, वे परमेश्वर के राज्य में तो प्रवेश कर ही नहीं सकते। परमेश्वर को जीवित लोगों की गवाही चाहिए, मृतकों की नहीं, वो जीवितों से अपने लिए कार्य करने को कहता है, न कि मृतकों से। "मृतक" वे हैं जो परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह करते हैं, ये वे लोग हैं जिनकी आत्मा संवेदन-शून्य हो चुकी है और जो परमेश्वर के वचन नहीं समझते; ये वे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते और परमेश्वर के प्रति ज़रा भी निष्ठा नहीं रखते, ये वे लोग हैं जो शैतान के अधिकार-क्षेत्र में रहते हैं और शैतान द्वारा शोषित हैं। मृतक सत्य के विरुद्ध खड़े होकर, परमेश्वर का विरोध और नीचता करते हैं, घिनौना, दुर्भावनापूर्ण, पाशविक, धोखेबाजी और कपट का व्यवहार कर स्वयं को प्रदर्शित करते हैं। अगर ऐसे लोग परमेश्वर का वचन खाते और पीते भी हैं, तो भी वे परमेश्वर के वचनों को जीने में समर्थ नहीं होते; वे जीवित तो हैं, परंतु वे चलती-फिरती, सांस लेने वाली लाशें भर हैं। मृतक परमेश्वर को संतुष्ट करने में पूर्णतः असमर्थ होते हैं, पूर्ण रूप से उसके प्रति आज्ञाकारी होने की तो बात ही दूर है। वे केवल उसे धोखा दे सकते हैं, उसकी निंदा कर सकते हैं, उससे कपट कर सकते हैं और जैसा जीवन वे जीते हैं उससे उनकी शैतानी प्रकृति प्रकट होती है। अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करना चाहिए; उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना चाहिए, आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करना चाहिए। तभी वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, तभी वे परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे। जो जीवित हैं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं; वे परमेश्वर द्वारा न्याय व ताड़ना का सामना कर चुके होते हैं, वे स्वयं को समर्पित करने और आनंदपूर्वक अपने प्राण परमेश्वर के लिए न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं और वे प्रसन्नता से अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को अर्पित कर देते हैं। जब जीवित जन परमेश्वर की गवाही देते हैं, तभी शैतान शर्मिन्दा हो सकता है। केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के हृदय के अनुसार होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक जन हैं। पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के साए में रहता है, शैतान के प्रभाव में रहता है और इसलिए जो लोग आत्मा मृत हो चुके हैं जिनमें आत्मा नहीं है, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित मनुष्यों की रचना की थी, वे मृत लोग बन गए हैं, इसलिए परमेश्वर ने अपने गवाह खो दिये हैं और जिस मानवजाति को उसने बनाया था, एकमात्र चीज़ जिसमें उसकी सांसे थीं, उसने उसे खो दिया है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन्हें वापस लाना होगा ताकि वे उसके प्रकाश में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न होकर परमेश्वर-विरोधी हो गए हैं। मुख्यतः, सबसे आगे वही लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों का परमेश्वर की आज्ञा मानने का ज़रा-भी इरादा नहीं होता, वे केवल उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं, इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती। जीवित वे लोग हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर की आज्ञा मानना जानते हैं और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं। इनमें सत्य और गवाही होती है, और यही लोग परमेश्वर को अपने घर में अच्छे लगते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध का अंतिम चरण है, और यह शैतान के अधिकार-क्षेत्र से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृजनकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान को छोड़ देगा और पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के वास्ते परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरूप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। आदिम मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबधंन-कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य वह पूँजी है जिसे परमेश्वर संपूर्ण प्रबंधन पूरा करने के लिए इस्तेमाल करता है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए, ऐसे बदलाव, जो मनुष्य की मूल विवेक-बुद्धि को बहाल करते हैं। और इस तरह से मनुष्य को, जिसे बंदी बना लिया गया था, शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

अंधकार का प्रभाव क्या है? यह तथाकथित "अंधकार का प्रभाव", शैतान के लोगों को धोखा देने, भ्रष्ट करने, बांधने और नियंत्रित करने का प्रभाव है; शैतान का प्रभाव एक ऐसा प्रभाव है जिसमें मृत्यु का साया है। शैतान के कब्ज़े में रहने वाले सभी लोग नष्ट हो जाने के लिए अभिशप्त हैं।

परमेश्वर में आस्था पाने के बाद, तुम अंधकार के प्रभाव से कैसे बच सकते हो? एक बार जब तुम ईमानदारी से परमेश्वर से प्रार्थना कर लेते हो तो, तुम अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ देते हो, और उस समय परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे हृदय को प्रेरित करता है। तुम पूरी तरह से उसे समर्पित होने को तैयार हो जाते हो, और उस समय, तुम अंधकार के प्रभाव से निकल चुके होगे। यदि इंसान के सारे काम परमेश्वर को प्रसन्न करें और उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप हुआ करें, तो वह परमेश्वर के वचनों में और उसकी निगरानी एवं सुरक्षा में रहने वाला बन जाता है। यदि लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास न कर पाते, अगर वे हमेशा परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं, उसके प्रति लापरवाह तरीके से काम करते हैं और उसके अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, तो ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जिन लोगों ने परमेश्वर द्वारा उद्धार प्राप्त नहीं किया है, वे सभी शैतान के अधिकार-क्षेत्र में जी रहे हैं; अर्थात्, वे सभी अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, वे शैतान के अधिकार-क्षेत्र में रह रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, जरूरी नहीं कि वे परमेश्वर के प्रकाश में रह रहे हों, क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, जरूरी नहीं कि परमेश्वर के वचनों में जी रहे हों, और यह भी जरूरी नहीं कि वे परमेश्वर के प्रति समर्पित करने में समर्थ हों। मनुष्य केवल परमेश्वर में विश्वास रखने तक सीमित है, और चूँकि उसे परमेश्वर का ज्ञान नहीं है, इसलिए वह अभी भी पुराने नियमों और निर्जीव वचनों के बीच जीवनयापन कर रहा है, वो एक ऐसा जीवन जी रहा है जो अंधकारमय और अनिश्चित है, जिसे न तो परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से शुद्ध किया गया है, न ही पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, कहने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, वे अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं, जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे भी शायद अभी तक अंधकार के प्रभाव में ही हैं, क्योंकि उनमें पवित्र आत्मा का काम नहीं है। जिन लोगों ने परमेश्वर का अनुग्रह या दया नहीं प्राप्त की है, जो पवित्र आत्मा द्वारा किए गये कार्य को नहीं देख सकते, वे सभी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं; और अधिकांशत:, ऐसे ही लोग होते हैं जो महज़ परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं फिर भी परमेश्वर को नहीं जानते हैं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करता है मगर अपना अधिकांश जीवन अंधकार के प्रभाव में जीते हुए बिताता है, तो उस व्यक्ति का अस्तित्व अपना अर्थ खो चुका होता है, उन लोगों का उल्लेख करने की क्या आवश्यकता है जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास ही नहीं रखते?

जो लोग परमेश्वर के काम को स्वीकार नहीं कर सकते हैं या जो परमेश्वर के कार्य को स्वीकार तो करते हैं लेकिन परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते, वे लोग अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हैं, वे ही परमेश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे, और वही लोग अंधकार के प्रभाव से बच पाएँगे। जो लोग मुक्त नहीं किए गए हैं, जो हमेशा किसी वस्तु-विशेष के द्वारा नियंत्रित होते हैं, और जो अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे पाते, वे लोग शैतान के बंधन में हैं और वे मौत के साये में जी रहे हैं। जो लोग अपने कर्तव्यों के प्रति वफादार नहीं हैं, जो परमेश्वर के आदेश के प्रति वफादार नहीं हैं, जो कलीसिया में अपना कार्य नहीं कर रहे हैं, वे ऐसे लोग हैं जो अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो जानबूझकर कलीसिया के जीवन में बाधा डालते हैं, जो जानबूझकर अपने भाई-बहनों के बीच झगड़े के बीज बो रहे हैं, या अपने गुट बना रहे हैं, वे अभी भी गहरे अंधकार के प्रभाव में रहते हैं, शैतान के बंधन में रहते हैं। जिनका परमेश्वर के साथ एक असामान्य रिश्ता है, जिनकी हमेशा अनावश्यक अभिलाषाएं होती हैं, जो हमेशा लाभ लेना चाहते हैं, जो कभी अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं लाना चाहते, वे ऐसे लोग होते हैं जो अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग हमेशा लापरवाह होते हैं, सत्य के अपने अभ्यास में गंभीर नहीं होते, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के इच्छुक नहीं होते, जो केवल अपने ही शरीर को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं, ऐसे लोग भी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं, और मृत्यु से घिरे हुए हैं। जो लोग परमेश्वर के लिए काम करते समय चालबाजी और धोखा करते हैं, परमेश्वर के साथ लापरवाही से व्यवहार करते हैं, जो परमेश्वर को धोखा देते हैं, हमेशा स्वयं के लिए सोचते रहते हैं, ऐसे लोग अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग ईमानदारी से परमेश्वर से प्यार नहीं कर सकते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, और जो अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान नहीं देते, वे लोग अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

अंधकार के प्रभाव से बचने के लिए, पहले तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और तुम्हारे अंदर सत्य का अनुसरण करने की उत्सुकता होनी चाहिए, तभी तुम्हारी अवस्था सही हो सकती है। अंधकार के प्रभाव से बचने के लिए सही अवस्था में रहना पहली जरूरत है। सही अवस्था के न होने का मतलब है कि तुम परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हो और तुममें सत्य की खोज करने की उत्सुकता नहीं है; और अंधकार के प्रभाव से बचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मेरे वचन इंसान के अंधकार के प्रभावों से बचने का आधार हैं, और जो लोग मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास नहीं कर सकते, वे अंधकार के प्रभाव के बंधन से बच नहीं सकते। सही अवस्था में जीने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में जीना, परमेश्वर के प्रति वफादार होने की अवस्था में जीना, सत्य खोजने की अवस्था में जीना, ईमानदारी से परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की वास्तविकता में जीना, और वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने की अवस्था में जीना। जो लोग इन अवस्थाओं में और इस वास्तविकता में जीते हैं, वे जैसे-जैसे सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करेंगे, वैसे-वैसे वे रूपांतरित होते जाएँगे, और जैसे-जैसे काम गहन होता जाएगा, वे रूपांतरित हो जाएँगे; और अंत में, वे ऐसे इंसान बन जाएँगे जो यकीनन परमेश्वर को प्राप्त हो जाएँगे और उससे प्रेम करेंगे। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकले हैं, वे धीरे-धीरे परमेश्वर की इच्छा को सुनिश्चित कर सकते हैं, इसे समझ सकते हैं, और अंततः परमेश्वर के विश्वासपात्र बन जाते हैं। उनके अंदर न केवल परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं होती, वे लोग परमेश्वर के खिलाफ कोई विद्रोह भी नहीं करते, बल्कि वे लोग उन धारणाओं और विद्रोह से और भी अधिक घृणा करने लगते हैं जो उनमें पहले थे, और उनके हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार पैदा हो जाता है। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकलने में असमर्थ हैं, वे अपनी देह में लिप्त रहते हैं, और विद्रोह से भरे होते हैं; जीवनयापन के लिए उनका हृदय मानव धारणाओं और जीवन-दर्शन से, और साथ ही अपने इरादों और विचार-विमर्शों से भरा रहता है। परमेश्वर मनुष्य से एकनिष्ठ प्रेम की अपेक्षा करता है; परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके वचनों से भरा रहे और उसके लिए प्यार से भरे हृदय से परिपूर्ण रहे। परमेश्वर के वचनों में रहना, उसके वचनों में ढूँढना जो उन्हें खोजना चाहिए, परमेश्वर को उसके वचनों के लिए प्यार करना, उसके वचनों के लिए भागना, उसके वचनों के लिए जीना—ये ऐसे लक्ष्य हैं जिन्हें पाने के लिए इंसान को प्रयास करने चाहिए। सबकुछ परमेश्वर के वचनों पर निर्मित किया जाना चाहिए; इंसान तभी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो पाएगा। यदि मनुष्य में परमेश्वर के वचन नहीं होंगे, तो इंसान शैतान के चंगुल में फँसे भुनगे से ज़्यादा कुछ नहीं है! इसका आकलन करो : परमेश्वर के कितने वचनों ने तुम्हारे अंदर जड़ें जमाई हैं? किन चीज़ों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीते रहे हो? किन चीज़ों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन नहीं जीते रहे हो? यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के प्रभाव में नहीं हो, तो तुम्हारे दिल पर किसने कब्ज़ा कर रखा है? अपने रोजमर्रा के जीवन में, क्या तुम शैतान द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हो, या परमेश्वर के वचनों ने तुम पर अधिकार कर रखा है? क्या तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचनों की बुनियाद पर आधारित हैं? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन से अपनी नकारात्मक अवस्था से बाहर आ गए हो? परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव की तरह लेना—यही वो है जिसमें सबको प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के वचन विद्यमान नहीं हैं, तो तुम अंधकार के प्रभाव में जी रहे हो, तुम परमेश्वर से विद्रोह कर रहे हो, तुम उसका विरोध कर रहे हो, और तुम परमेश्वर के नाम का अपमान कर रहे हो। इस तरह के मनुष्यों का परमेश्वर में विश्वास पूरी तरह से बदमाशी है, एक विघ्न है। तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार रहा है? तुम्हारा कितना जीवन परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं रहा है? परमेश्वर के वचनों को तुमसे जो अपेक्षाएँ थीं, उनमें से तुमने कितनी पूरी की हैं? कितनी तुममें खो गई हैं? क्या तुमने ऐसी चीज़ों को बारीकी से देखा है?

अंधकार के प्रभाव से निकलने के लिए, पवित्र आत्मा का कार्य और इंसान का समर्पित सहयोग, दोनों की आवश्यकता होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि इंसान सही रास्ते पर नहीं है? जो लोग सही रास्ते पर हैं, वे सबसे पहले, अपना हृदय ईश्वर को समर्पित कर सकते हैं। इस कार्य में प्रवेश करने में लंबा समय लगता है, क्योंकि मानवजाति हमेशा से अंधकार के प्रभाव में रहती आई है, हजारों सालों से शैतान की दासता में रह रही है, इसलिए यह प्रवेश एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज मैंने यह मुद्दा इसलिए उठाया है ताकि इंसान अपनी स्थिति को समझ सकें; एक बार जब इंसान इस बात को समझ जाएगा कि अंधकार का प्रभाव क्या होता है और प्रकाश में रहना क्या होता है, तो प्रवेश आसान हो जाता है। क्योंकि इससे पहले कि तुम शैतान के प्रभाव से निकलो, तुम्हें पता होना चाहिए कि ये क्या होता है; तभी तुम्हें इससे छुटकारा पाने का मार्ग मिल सकता है। जहाँ तक यह बात है कि उसके बाद क्या करना है, यह तो इंसान का खुद का मामला है। हर चीज़ में एक सकारात्मक पहलू से प्रवेश करो, और कभी निष्क्रिय होकर इंतजार मत करो। मात्र यही तरीका है जिससे तुम्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

यदि तुम उद्धार प्राप्त करना चाहते हो, तो पहली परीक्षा जो तुम्हें पास करनी होगी वह यह सीखना है कि शैतान को कैसे पराजित किया जाए और प्रतिरोधी शक्तियों तथा बाहरी दुनिया के हस्तक्षेप पर कैसे विजय प्राप्त की जाए। यदि तुम शैतान की शक्तियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में अंत तक टिके रहने का कद और पर्याप्त सत्य प्राप्त कर लेते हो, और उन्हें पराजित कर देते हो, तब—और केवल तब—तुम अनवरत सत्य का अनुसरण कर सकते हो, और केवल तब तुम सत्य का अनुसरण और उद्धार के रास्ते पर दृढ़तापूर्वक और बिना किसी दुर्घटना के चल सकते हो। यदि तुम यह परीक्षा पास नहीं कर सकते, तब यह कहा जा सकता है कि तुम एक बड़े ख़तरे में हो, और तुम मसीह-विरोधी के कब्जे में आ सकते हो और तुम्हें शैतान के प्रभाव में जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है। वर्तमान में तुम लोगों के बीच कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जो सत्य का अनुसरण करने वालों को रोकें या ठोकर मारें, और ये उन लोगों के शत्रु हैं। क्या तुम इसे स्वीकार करते हो? कुछ ऐसे लोग हैं जो इस तथ्य का सामना करने की हिम्मत नहीं रखते, न ही वे इसे तथ्य के रूप में स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं। हक़ीक़त में, ये चीज़ें कलीसिया में मौजूद हैं; बात केवल इतनी है कि लोग पहचान नहीं पाते। यदि तुम इस परीक्षा को पास नहीं कर सकते—मसीह-विरोधियों की परीक्षा, तब तुम या तो मसीह-विरोधियों के हाथों धोखा खा चुके हो और उन्हीं के द्वारा नियंत्रित हो या उन्होंने तुम्हें कष्ट दिया है, पीड़ा पहुँचायी है, बाहर धकेला है और प्रताड़ित किया है। अंततः, तुम्हारा यह छोटा-सा तुच्छ जीवन लंबे समय तक नहीं टिकेगा, और मुरझा जाएगा; तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं रख पाओगे, और तुम उसे छोड़ दोगे, यह कहते हुए, "परमेश्वर तो धार्मिक भी नहीं है; परमेश्वर कहाँ है? इस दुनिया में कोई धार्मिकता या प्रकाश नहीं है, और परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार जैसी कोई चीज़ नहीं है। हम काम करते हुए और पैसा कमाते हुए भी अपने दिन गुज़ार सकते हैं!" तुम परमेश्वर को नकारते हो और अब विश्वास नहीं करते कि वह मौजूद है; ऐसी कोई भी उम्मीद कि तुम्हारा उद्धार होगा, पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। इसलिए, यदि तुम उस जगह पहुँचना चाहते हो जहाँ पर तुम्हें उद्धार प्राप्त हो सके, तो पहली परीक्षा जो तुम्हें पास करनी होगी वह है शैतान की पहचान करने में सक्षम होना, और तुम्हारे अंदर शैतान के विरुद्ध खड़ा होने, उसे बेनकाब करने और उसे छोड़ देने का साहस भी होना चाहिए। फिर, शैतान कहाँ है? शैतान तुम्हारे बाजू में और तुम्हारे चारों तरफ़ है; हो सकता है कि वह तुम्हारे हृदय के भीतर भी रह रहा हो। यदि तुम शैतान के स्वभाव के अधीन रह रहे हो, तो यह कहा जा सकता है कि तुम शैतान के हो। तुम आध्यात्मिक क्षेत्र के शैतान को देख या छू नहीं सकते, लेकिन जो शैतान व्यावहारिक जीवन में मौजूद है, वह हर जगह है। कोई भी व्यक्ति जो सत्य से नफरत करता है वह बुरा है, और कोई भी अगुआ या कार्यकर्ता जो सत्य को स्वीकार नहीं करता वह मसीह-विरोधी और बुरा व्यक्ति है। क्या ऐसे लोग जीवित शैतान नहीं हैं? हो सकता है कि ये लोग वही हों, जिनकी तुम आराधना करते हो और जिनका सम्मान करते हो; ये वही लोग हो सकते हैं जो तुम्हारी अगुवाई कर रहे हैं या वे लोग जिनके प्रति तुम लंबे समय से अपने हृदय में आशा, श्रद्धा, निष्ठा और भरोसा बनाए हुए हो। जबकि वास्तव में, वे तुम्हारे रास्ते में खड़ी बाधाएँ हैं और तुम्हें उद्धार प्राप्त करने से रोक रहे हैं; वे मसीह-विरोधी हैं। वे तुम्हारे जीवन और तुम्हारे मार्ग पर नियंत्रण कर सकते हैं, और वे तुम्हारे उद्धार के अवसर को बर्बाद कर सकते हैं। यदि तुम उन्हें पहचानने और उनकी वास्तविकता को समझने में विफल रहते हो, तो किसी भी क्षण, तुम उनके जाल में फँस सकते हो या उनके द्वारा पकड़े और दूर ले जाए जा सकते हो। इस प्रकार, तुम बहुत बड़े ख़तरे में हो।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'सत्य का अनुसरण करने वालों को वे निकाल देते हैं और उन पर आक्रमण करते हैं' से उद्धृत

मनुष्य की देह शैतान की है, यह विद्रोही स्वभावों से परिपूर्ण है, यह दुखद रूप से गंदी है, और यह कुछ ऐसी है जो अस्वच्छ है। लोग देह के आनंद के लिए बहुत अधिक ललचाते हैं और देह की कई सारी अभिव्यंजनाएँ हैं; यही कारण है कि परमेश्वर मनुष्य की देह से एक निश्चित सीमा तक घृणा करता है। जब लोग शैतान की गंदी, भ्रष्ट चीज़ों को निकाल फेंकते हैं, तब वे परमेश्वर से उद्धार प्राप्त करते हैं। परंतु यदि वे गंदगी और भ्रष्टता से स्वयं को अब भी नहीं छुड़ाते हैं, तो वे अभी भी शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रह रहे हैं। लोगों की धूर्तता, छल-कपट, और कुटिलता सब शैतान की चीज़ें हैं। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार तुम्हें शैतान की इन चीज़ों से छुड़ाने के लिए है। परमेश्वर का कार्य ग़लत नहीं हो सकता है; यह सब लोगों को अंधकार से बचाने के लिए किया जाता है। जब तुमने एक निश्चित बिंदु तक विश्वास कर लिया है और देह की भ्रष्टता से अपने को छुड़ा सकते हो, और इस भ्रष्टता की बेड़ियों में अब और जकड़े नहीं हो, तो क्या तुम बचाए गए नहीं होगे? जब तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहते हो, तब तुम परमेश्वर को प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करने में असमर्थ होते हो, तुम कोई गंदी चीज़ होते हो, और परमेश्वर की विरासत प्राप्त नहीं कर सकते हो। एक बार जब तुम्हें स्वच्छ कर दिया और पूर्ण बना दिया गया, तो तुम पवित्र हो जाओगे, तुम सामान्य व्यक्ति हो जाओगे, और तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाओगे और परमेश्वर के प्रति आनंद से परिपूरित होओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (2)' से उद्धृत

मनुष्य शरीर के बीच रहता है, जिसका मतलब है कि वह मानवीय नरक में रहता है, और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के बगैर, मनुष्य शैतान के समान ही अशुद्ध है। मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है? पतरस मानता था कि परमेश्वर की ताड़ना और उसका न्याय मनुष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा और महान अनुग्रह है। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से ही मनुष्य जाग सकता है, और शरीर और शैतान से घृणा कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, उसे उसके खुद के छोटे-से संसार से मुक्त करता है, और उसे परमेश्वर की उपस्थिति के प्रकाश में जीवन बिताने का अवसर देता है। ताड़ना और न्याय से बेहतर कोई उद्धार नहीं है! पतरस ने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! जब तक तू मुझे ताड़ना देता और मेरा न्याय करता रहेगा, मुझे पता होगा कि तूने मुझे नहीं छोड़ा है। भले ही तू मुझे आनंद या शांति न दे, और मुझे कष्ट में रहने दे, और मुझे अनगिनत ताड़नाओं से प्रताड़ित करे, किंतु जब तक तू मुझे छोड़ेगा नहीं, तब तक मेरा हृदय सुकून में रहेगा। आज, तेरी ताड़ना और न्याय मेरी बेहतरीन सुरक्षा और महानतम आशीष बन गए हैं। जो अनुग्रह तू मुझे देता है वह मेरी सुरक्षा करता है। जो अनुग्रह आज तू मुझे देता है वह तेरे धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति है, और ताड़ना और न्याय है; इसके अतिरिक्त, यह एक परीक्षा है, और इससे भी बढ़कर, यह एक कष्टों भरा जीवनयापन है।" पतरस ने दैहिक सुख को एक तरफ रखकर, एक ज्यादा गहरे प्रेम और ज्यादा बड़ी सुरक्षा की खोज की, क्योंकि उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से बहुत सारा अनुग्रह हासिल कर लिया था। अपने जीवन में, यदि मनुष्य शुद्ध होकर अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन बिताना चाहता है, और एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, और उसे परमेश्वर के अनुशासन और प्रहार को अपने-आपसे दूर नहीं होने देना चाहिए, ताकि वह खुद को शैतान की चालाकी और प्रभाव से मुक्त कर सके, और परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिता सके। यह जान लो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रकाश है, मनुष्य के उद्धार का प्रकाश है, और मनुष्य के लिए इससे बेहतर कोई आशीष, अनुग्रह या सुरक्षा नहीं है। मनुष्य शैतान के प्रभाव में रहता है, और देह में जीता है; यदि उसे शुद्ध न किया जाए और उसे परमेश्वर की सुरक्षा प्राप्त न हो, तो वह और भी ज्यादा भ्रष्ट हो जाएगा। यदि वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे शुद्ध होना और उद्धार पाना होगा। पतरस ने प्रार्थना की, "परमेश्वर, जब तू मुझ पर दया दिखाता है तो मैं प्रसन्न हो जाता हूँ, और मुझे सुकून मिलता है; जब तू मुझे ताड़ना देता है, तब मुझे और भी ज्यादा सुकून और आनंद मिलता है। यद्यपि मैं कमजोर हूँ, और अकथनीय कष्ट सहता हूँ, यद्यपि मेरे जीवन में आँसू और उदासी है, लेकिन तू जानता है कि यह उदासी मेरी अवज्ञा और कमजोरी के कारण है। मैं रोता हूँ क्योंकि मैं तेरी इच्छाओं को संतुष्ट नहीं कर पाता, मुझे दुख और पछतावा है, क्योंकि मैं तेरी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा हूँ, लेकिन मैं इस आयाम को हासिल करने के लिए तैयार हूँ, मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए सब कुछ करने को तैयार हूँ। तेरी ताड़ना ने मुझे सुरक्षा दी है, और मेरा श्रेष्ठतम उद्धार किया है; तेरा न्याय तेरी सहनशीलता और धीरज को ढँक देता है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर, मैं तेरी दया और करूणा का आनंद नहीं ले पाऊँगा। आज, मैं और भी अधिक देख रहा हूँ कि तेरा प्रेम स्वर्ग से भी ऊँचा उठकर अन्य सभी चीजों पर छा गया है। तेरा प्रेम मात्र दया और करूणा नहीं है; बल्कि उससे भी बढ़कर, यह ताड़ना और न्याय है। तेरी ताड़ना और न्याय ने मुझे बहुत कुछ दिया है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर, एक भी व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, और एक भी व्यक्ति सृष्टिकर्ता के प्रेम को अनुभव नहीं कर सकता। यद्यपि मैंने सैकड़ों परीक्षण और क्लेश सहे हैं, यहाँ तक कि मौत को भी करीब से देखा है, फिर भी मुझे इन्हीं के कारण तुझे जानने और सर्वोच्च उद्धार प्राप्त करने का अवसर मिला है। यदि तेरी ताड़ना, न्याय और अनुशासन मुझसे दूर हो गए होते, तो मैं अंधकार में शैतान के अधीन जीवन बिता रहा होता। मनुष्य की देह का क्या लाभ है? यदि तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़कर चले गए होते, तो ऐसा लगता मानो तेरे आत्मा ने मुझे छोड़ दिया है, मानो अब से तू मेरे साथ नहीं है। यदि ऐसा हो जाता, तो मैं कैसे जी पाता? यदि तू मुझे बीमारी देकर मेरी स्वतंत्रता छीन लेता है, तो भी मैं जीवित रह सकता हूँ, परंतु अगर तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़ दें, तो मेरे पास जीने का कोई रास्ता न होगा। यदि मेरे पास तेरी ताड़ना और न्याय न होता, तो मैंने तेरे प्रेम को खो दिया होता, एक ऐसा प्रेम जो इतना गहरा है कि मैं इसे शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता। तेरे प्रेम के बिना, मैं शैतान के कब्जे में जी रहा होता, और तेरे महिमामय मुखड़े को न देख पाता। मैं कैसे जीवित रह पाता? मैं ऐसा अंधकार, ऐसा जीवन सहन नहीं कर पाता। मेरे साथ तेरे होने का अर्थ है कि मैं तुझे देख रहा हूँ, तो मैं तुझे कैसे छोड़ सकता हूँ? मैं तुझसे विनती करता हूँ, याचना करता हूँ, तू मेरे सबसे बड़े सुख को मत छीन, भले ही ये आश्वासन के मात्र थोड़े से शब्द ही क्यों न हों। मैंने तेरे प्रेम का आनंद लिया है, और आज मैं तुझसे दूर नहीं रह सकता; मैं तुझसे कैसे प्रेम न करूँ? मैंने तेरे प्रेम के कारण दुख में बहुत आँसू बहाए हैं, फिर भी हमेशा यही लगा है कि इस तरह का जीवन अधिक अर्थपूर्ण है, मुझे समृद्ध बनाने में अधिक सक्षम है, मुझे बदलने में अधिक सक्षम है, और वह सत्य हासिल करने में अधिक सक्षम है जो सभी प्राणियों के पास होना चाहिए।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

मनुष्य का सारा जीवन शैतान के अधीन बीतता है, और ऐसा एक भी इंसान नहीं है जो अपने बलबूते पर खुद को शैतान के प्रभाव से आजाद कर सके। सभी लोग भ्रष्टता और खोखलेपन में, बिना किसी अर्थ या मूल्य के, एक अशुद्ध संसार में रहते हैं; वे शरीर के लिए, वासना के लिए और शैतान के लिए बहुत लापरवाही भरा जीवन बिताते हैं। उनके अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य उस सत्य को खोज पाने में असमर्थ है जो उसे शैतान के प्रभाव से मुक्त कर दे। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर पर विश्वास करता है, बाइबल पढ़ता है, फिर भी वह यह नहीं समझ पाता कि अपने-आपको शैतान के नियंत्रण से कैसे मुक्त करे। विभिन्न युगों में, बहुत ही कम लोगों ने इस रहस्य को जाना है, बहुत ही कम लोगों ने इसे समझा है। वैसे तो, मनुष्य शैतान से और देह से घृणा करता है, फिर भी वह नहीं जानता कि अपने-आपको शैतान के लुभावने प्रभाव से कैसे बचाए। क्या आज भी तुम लोग शैतान के अधीन नहीं हो? तुम लोग अपने अवज्ञाकारी कार्यों पर पछताते नहीं हो, और यह तो बिलकुल भी महसूस नहीं करते कि तुम अशुद्ध और अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर का विरोध करके भी तुम लोगों को मन की शांति मिलती है और तुम्हें शांतचित्तता का एहसास होता है। क्या तुम्हारी यह शांतचित्तता इसलिए नहीं है क्योंकि तुम भ्रष्ट हो? क्या यह मन की शांति तुम्हारी अवज्ञा से नहीं उपजती है? मनुष्य एक मानवीय नरक में रहता है, वह शैतान के अंधेरे प्रभाव में रहता है; पूरी धरती पर, प्रेत मनुष्य के साथ-साथ जीते हैं, और मनुष्य की देह का अतिक्रमण करते हैं। पृथ्वी पर तुम किसी सुंदर स्वर्गलोक में नहीं रहते। जहाँ तुम रहते हो वह दुष्ट आत्मा का संसार है, एक मानवीय नरक है, अधोलोक है। यदि मनुष्य को शुद्ध न किया जाए, तो वह मलिन ही रहता है; यदि परमेश्वर उसकी सुरक्षा और देखभाल न करे, तो वह शैतान का बंदी ही बना रहता है; यदि उसका न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की जाए, तो उसके पास शैतान के बुरे प्रभाव के दमन से बचने का कोई उपाय नहीं होगा। जो भ्रष्ट स्वभाव तुम दिखाते हो और जो अवज्ञाकारी व्यवहार तुम करते हो, वह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि तुम अभी भी शैतान के अधीन जी रहे हो। यदि तुम्हारे मस्तिष्क और विचारों को शुद्ध न किया गया, और तुम्हारे स्वभाव का न्याय न हुआ और उसे ताड़ना न दी गई, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व को अभी भी शैतान के द्वारा ही नियंत्रित किया जा रहा है, तुम्हारा मस्तिष्क शैतान के द्वारा ही नियंत्रित किया जा रहा है, तुम्हारे विचार कपटपूर्ण तरीके से शैतान के द्वारा ही इस्तेमाल किए जा रहे हैं, और तुम्हारा पूरा अस्तित्व शैतान के हाथों नियंत्रित हो रहा है। क्या तुम जानते हो, तुम फिलहाल पतरस के स्तर से कितनी दूर हो? क्या तुममें वह योग्यता है? तुम आज की ताड़ना और न्याय के विषय में कितना जानते हो? जितना पतरस जान पाया उसमें से तुम कितना जान पाए हो? यदि तुम आज जानने में असमर्थ हो, तो क्या तुम इस ज्ञान को भविष्य में जानने योग्य हो पाओगे? तुम जैसा आलसी और डरपोक व्यक्ति परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को जानने में असमर्थ होता है। यदि तुम दैहिक शांति और दैहिक सुख की खोज करते हो, तो तुम्हारे पास शुद्ध होने का कोई उपाय नहीं होगा, और अंत में तुम शैतान के पास ही लौट जाओगे, क्योंकि जिस प्रकार का जीवन तुम जीते हो, वह शैतानी और दैहिक है। आज स्थिति यह है कि बहुत से लोग जीवन के विकास की खोज नहीं करते, जिसका मतलब है कि वे शुद्ध होने या जीवन के अधिक गहरे अनुभव में प्रवेश करने की परवाह नहीं करते। इस प्रकार कैसे उन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है? जो लोग जीवन के विकास की खोज नहीं करते, उनके पास पूर्ण किए जाने का कोई अवसर नहीं होता, और जो लोग परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते, और अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयास नहीं करते, वे शैतान के बुरे प्रभाव से बच पाने में असमर्थ होते हैं। वे लोग परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान और अपने स्वभाव में परिवर्तन के प्रति गंभीर नहीं होते, ठीक उनकी तरह जो सिर्फ धर्म में विश्वास करते हैं, जो मात्र धार्मिक रस्में निभाते हैं और नियमित सेवाओं में हाजिरी देते हैं। क्या यह समय की बर्बादी नहीं है? परमेश्वर पर अपने विश्वास के सन्दर्भ में, यदि मनुष्य, जीवन-विकास के मामलों के प्रति गंभीर नहीं है, वह सत्य में प्रवेश करने की कोशिश नहीं करता, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश नहीं करता, और परमेश्वर के कार्य के ज्ञान की खोज तो और भी कम करता है, तो उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। यदि तुम पूर्ण बनना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य को समझना होगा। खासतौर से, तुम्हें उसकी ताड़ना और उसके न्याय के अर्थ को समझना होगा, और यह समझना होगा कि इस कार्य को मनुष्य पर क्यों किया जाता है। क्या तुम यह स्वीकार कर सकते हो? इस प्रकार की ताड़ना के दौरान, क्या तुम पतरस की तरह ही अनुभव और ज्ञान प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम परमेश्वर के ज्ञान और पवित्र आत्मा के कार्य को खोजोगे, और अपने स्वभाव में परिवर्तनों की कोशिश करोगे, तो तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होगा।

जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है, उनके लिए जीत लिए जाने के कार्य का यह कदम अति आवश्यक है; जब मनुष्य पर विजय पा ली जाती है, तो उसके बाद ही मनुष्य पूर्ण बनाए जाने के कार्य का अनुभव कर सकता है। केवल जीत लिए जाने की भूमिका को निभाने का कोई बड़ा महत्व नहीं है, जो तुम्हें परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य नहीं बनाएगा। सुसमाचार फैलाने की अपनी भूमिका को निभाने के लिए तुम्हारे पास कोई साधन नहीं होगा, क्योंकि तुम जीवन-विकास की खोज नहीं कर रहे, अपने अंदर परिवर्तन लाने और नवीनीकरण का प्रयास नहीं कर रहे, और इसलिए तुम्हारे पास जीवन-विकास का कोई वास्तविक अनुभव नहीं होता। इस कदम दर कदम कार्य के दौरान, तुम जब एक बार एक सेवाकर्मी और एक विषम के तौर पर कार्य कर लेते हो, लेकिन अगर अंततः तुम पतरस की तरह बनने का प्रयास नहीं करते, और यदि तुम्हारी खोज उस मार्ग के अनुसार नहीं है जिसके द्वारा पतरस को पूर्ण बनाया गया था, तो स्वाभाविक रूप से, तुम अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव नहीं कर पाओगे। यदि तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हो, तो तुम गवाही दे चुके होगे, और तुम कहोगे: "परमेश्वर के इस कदम दर कदम कार्य में, मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य को स्वीकार कर लिया है, और हालाँकि मैंने बड़ा कष्ट सहा है, फिर भी मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण कैसे बनाता है, मैंने परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को प्राप्त कर लिया है, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, और उसकी ताड़ना ने मुझे बचा लिया है। उसका धार्मिक स्वभाव मुझ पर अपना प्रभाव दिखा रहा है, और मेरे लिए आशीष और अनुग्रह लेकर आया है; उसके न्याय और ताड़ना ने ही मुझे बचाया है और मुझे शुद्ध किया है। यदि परमेश्वर ने मुझे ताड़ना न दी होती और मेरा न्याय न किया होता, और यदि परमेश्वर ने मुझे कठोर वचन न कहे होते, तो मैं परमेश्वर को नहीं जान पाता, और न ही मुझे बचाया जा सका होता। आज मैं देखता हूँ : एक प्राणी के रूप में, न केवल व्यक्ति परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों का आनंद उठाता है, बल्कि, महत्वपूर्ण यह है कि सभी प्राणी परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाएँ, और उसके धार्मिक न्याय का आनन्द उठाएँ, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के आनंद के योग्य है। एक ऐसे प्राणी के रूप में जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इंसान को परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाना चाहिए। उसके धार्मिक स्वभाव में उसकी ताड़ना और न्याय है, इससे भी बढ़कर, उसमें महान प्रेम है। हालाँकि आज मैं परमेश्वर के प्रेम को पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ हूँ, फिर भी मुझे उसे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और इससे मैं धन्य हो गया हूँ।" यह वह पथ है जिस पर वे लोग चले हैं जो पूर्ण बनाए जाने का अनुभव करते हैं और इस ज्ञान के बारे में बोलते हैं। ऐसे लोग पतरस के समान हैं; उनके अनुभव भी पतरस के समान ही होते हैं। ऐसे लोग वे लोग भी हैं जो जीवन-विकास प्राप्त कर चुके होते हैं, जिनके अंदर सत्य है। जब उनका अनुभव अंत तक बना रहता है, तो परमेश्वर के न्याय के दौरान वे अपने-आपको पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से छुड़ा लेते हैं और परमेश्वर को प्राप्त हो जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

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