10. परमेश्वर के सामने मौन रहने के सिद्धांत

(1) व्यक्ति को प्रतिदिन परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना चाहिए। परमेश्वर से प्रार्थना भी करनी चाहिए, उसके वचनों पर चिंतन करना चाहिए, और उसकी इच्छा को समझने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि उस व्यक्ति का दिल परमेश्वर के सामने आसानी से मौन रह सके।

(2) सभी बातों में सत्य की तलाश करना सीखो। चीजों में भेद करना सीखो, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार सही कार्य करने में सक्षम बनो। इस प्रकार एक व्यक्ति यह सुनिश्चित कर सकता है कि वह सभी चीजों में परमेश्वर के सामने जीता है।

(3) व्यक्ति को प्रत्येक दिन आत्म-चिंतन में संलग्न होना चाहिए, और यदि किसी की भ्रष्टता उजागर की जाती है या किसी के साथ काट-छाँट की जाती है और निपटा जाता है, तो उन्हें परमेश्वर के वचनों के आधार पर समस्या का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग करना चाहिए।

(4) जब किसी के पास करने के लिए कुछ भी न हो, तो उसे परमेश्वर की प्रशंसा में स्तुति-गान करना सीखना चाहिए ताकि उनके दिलों को छुआ जा सके और उनके विचार परमेश्वर के प्रेम के हों। परमेश्वर स्वाभाविक रूप से उनके साथ रहने के लिए आएगा।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करने हेतु उसके समक्ष आने के लिए तुम्हें पहले उसके समक्ष शांत होना होगा। जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होगे, केवल तभी वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हें ज्ञान देगा। लोग परमेश्वर के समक्ष जितना अधिक शांत होते हैं, उतना अधिक वे प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर पाते हैं। इस सबके लिए आवश्यक है कि लोगों में भक्ति और विश्वास हो; केवल इसी प्रकार वे सिद्ध बनाए जा सकते हैं। आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने का बुनियादी सबक परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहना है। यदि तुम परमेश्वर की उपस्थिति में शांत होगे, तो केवल तभी तुम्हारा समस्त आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्रभावी होगा। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ है, तो तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत है, तो चाहे तुम जो कुछ भी करो, तब तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर की उपस्थिति में जीता है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत है और उसके समीप जाता है, तो चाहे तुम कुछ भी करो, इससे साबित होता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है। यदि तुम लोगों से वार्तालाप करते समय, चलते-फिरते समय यह कह पाते हो, "मेरा हृदय परमेश्वर के समीप जा रहा है और बाहरी चीज़ों पर केंद्रित नहीं है, और मैं परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता हूँ," तो तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है। ऐसी किसी चीज़ में, जो तुम्हारे हृदय को बाहरी मामलों की तरफ खींचती हो, या ऐसे लोगों के साथ, जो तुम्हारे हृदय को परमेश्वर से अलग करते हों, संलग्न मत हो। जो कुछ भी तुम्हारे हृदय को परमेश्वर के निकट आने से विचलित करता हो, उसे अलग रख दो, या उससे दूर रहो। यह तुम्हारे जीवन के लिए कहीं अधिक लाभदायक है। अभी निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के महान कार्य का समय है, वह समय, जब परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से लोगों को सिद्ध बना रहा है। यदि, इस क्षण, तुम परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकते हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो, जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटेगा। यदि तुम परमेश्वर के अलावा अन्य चीजों का अनुसरण करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जाने का कोई मार्ग नहीं होगा। जो लोग परमेश्वर से ऐसे कथनों को सुन सकते हैं और फिर भी आज उसके समक्ष शांत रहने में असफल रहते हैं, वे ऐसे लोग हैं, जो सत्य और परमेश्वर से प्रेम नहीं करते। यदि इस क्षण तुम अपने आपको समर्पित नहीं करोगे, तो तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो? अपने आपको समर्पित करना परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना है। यही एक वास्तविक बलि होगी। जो कोई भी अब सचमुच अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करता है, वह परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए आश्वस्त किया जाता है। कोई भी चीज़, चाहे वह कुछ भी क्यों न हो, तुम्हें विक्षुब्ध नहीं कर सकती है; चाहे वह तुम्हारी काट-छाँट करना हो या तुमसे निपटना हो, या चाहे तुम्हें कुंठा या असफलता का सामना करना पड़े, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए। चाहे लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार करें, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत होना चाहिए। चाहे तुम्हें कैसी भी परिस्थिति का सामना करना पड़े—चाहे तुम विपत्ति, पीड़ा, उत्पीड़न या विभिन्न परीक्षणों से घिर जाओ—तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए; सिद्ध किए जाने के ऐसे ही मार्ग हैं। जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होते हो, केवल तभी परमेश्वर के वर्तमान वचन तुम्हें स्पष्ट होंगे। तब तुम अधिक सही तरीके से और बिना विचलन के पवित्र आत्मा की रोशनी और प्रबुद्धता का अभ्यास कर सकते हो, परमेश्वर के इरादों को और अधिक स्पष्टता से समझ सकते हो, जो तुम्हारी सेवा को एक स्पष्ट दिशा प्रदान करेंगे, और तुम अधिक परिशुद्धता से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रेरणा को समझ सकते हो, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन रहने के बारे में आश्वस्त हो सकते हो। परमेश्वर के समक्ष सचमुच शांत रहने के ऐसे ही परिणाम प्राप्त होते हैं। जब लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में स्पष्ट नहीं होते, उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं होता, वे परमेश्वर के इरादों को समझने में असफल रहते हैं, या उनमें अभ्यास के सिद्धांतों का अभाव होता है, तो ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि परमेश्वर के समक्ष उनका हृदय शांत नहीं होता। परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का उद्देश्य ईमानदार और व्यावहारिक होना, परमेश्वर के वचनों में यथार्थता और पारदर्शिता ढूँढ़ना, और अंततः सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की स्थिति में पहुँचना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने से अधिक महत्वपूर्ण कदम कोई नहीं है। यह वह सबक है, जिसमें वर्तमान में सभी लोगों को प्रवेश करने की तत्काल आवश्यकता है। परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने में प्रवेश करने के निम्नलिखित मार्ग हैं :

1. अपने हृदय को बाहरी मामलों से हटा लो, परमेश्वर के समक्ष शांत रहो और अपना एकचित्त ध्यान परमेश्वर से प्रार्थना करने में लगाओ।

2. परमेश्वर के समक्ष शांत हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओ, पीओ और उनका आनंद लो।

3. अपने हृदय में परमेश्वर के प्रेम पर ध्यान लगाओ और उस पर चिंतन करो और परमेश्वर के कार्य पर मनन करो।

सर्वप्रथम प्रार्थना के पहलू से आरंभ करो। एकचित्त होकर तथा नियत समय पर प्रार्थना करो। तुम्हारे पास समय की चाहे कितनी भी कमी हो, तुम कार्य में कितने भी व्यस्त हो, या तुम पर कुछ भी क्यों ना बीते, हर दिन सामान्य रूप से प्रार्थना करो, सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते रहोगे, तब तक चाहे तुम्हारा परिवेश कैसा भी क्यों ना हो, तुम्हें बहुत आत्मिक आनंद मिलेगा, और तुम लोगों, घटनाओं या अपने आसपास की चीज़ों से प्रभावित नहीं होगे। जब तुम अपने हृदय में साधारण रूप से परमेश्वर का मनन करते हो, तो बाहर जो कुछ भी होता है, वह तुम्हें परेशान नहीं कर सकता। आध्यात्मिक कद काठी प्राप्त करने का यही अर्थ है। प्रार्थना से आरंभ करो : परमेश्वर के सामने शांति के साथ प्रार्थना करना बहुत फलदायक है। इसके पश्चात्, परमेश्वर के वचनों को खाओ और पीओ, उसके वचनों पर मनन करके उनसे प्रकाश पाने का प्रयास करो, अभ्यास करने का मार्ग ढूँढ़ो, परमेश्वर के वचनों को कहने में उसके उद्देश्य को जानो, और उन्हें बिना भटके समझो। साधारणतया, बाहरी चीज़ों से विक्षुब्ध हुए बिना तुम्हारे लिए अपने हृदय में परमेश्वर के निकट आने, परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और उसके वचनों पर चिंतन करने में समर्थ होना सामान्य होना चाहिए। जब तुम्हारा हृदय एक हद तक शांत हो जाएगा, तो चाहे जैसा भी तुम्हारा परिवेश हो, तुम चुपचाप ध्यान लगाने और अपने भीतर परमेश्वर के प्रेम पर मनन करने और वास्तव में परमेश्वर के निकट आने में सक्षम हो जाओगे, जब तक कि अंतत: तुम ऐसी स्थिति में नहीं पहुँच जाओगे जहाँ तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रशंसा उमड़ने लगे, और यह प्रार्थना करने से भी बेहतर है। तब तुम एक निश्चित आध्यात्मिक कद काठी के हो जाओगे। यदि तुम ऊपर वर्णित अवस्थाओं में होने की स्थिति प्राप्त कर पाते हो, तो यह इस बात का प्रमाण होगा कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष सच में शांत है। यह पहला बुनियादी सबक है। जब लोग परमेश्वर के सामने शांत होने में सक्षम होते हैं, केवल तभी वे पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श, प्रबुद्ध और रोशन किए जा सकते हैं, और केवल तभी वे परमेश्वर के साथ सच्ची सहभागिता कर पाते हैं और साथ ही परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को समझ पाते हैं। तब वे अपने आध्यात्मिक जीवन में सही राह पर प्रवेश कर चुके होंगे। परमेश्वर के सामने रहने का उनका प्रशिक्षण जब एक निश्चित गहराई तक पहुँच जाता है, और वे अपने आपको त्यागने, अपना तिरस्कार करने और परमेश्वर के वचनों में जीने में समर्थ हो जाते हैं, तब उनके हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं। स्वयं का तिरस्कार करने, स्वयं को कोसने और स्वयं का त्याग करने में समर्थ होना, वह प्रभाव है जो परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त होता है, और लोगों के द्वारा अपने दम पर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करने का अभ्यास वह सबक है, जिसमें लोगों को तत्काल प्रवेश करना चाहिए। कुछ लोगों के लिए, न केवल वे साधारण तौर पर परमेश्वर के समक्ष शांत होने में असमर्थ होते हैं, बल्कि वे प्रार्थना करते समय भी अपने हृदय को शांत नहीं रख सकते। यह परमेश्वर के मानकों से बहुत कम है! यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकता, तो क्या तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जा सकते हो? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकता, तो किसी के आने से या दूसरों के बात करने पर तुम्हारा ध्यान भंग हो सकता है, और जब दूसरे लोग कार्य करते हैं तो तुम्हारा हृदय दूर खिंच सकता है, ऐसे मामले में तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं जीते हो। यदि तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है, तो बाहरी दुनिया में होने वाली किसी भी बात से तुम अशांत नहीं होगे, या तुम पर किसी भी व्यक्ति, घटना या वस्तु द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकेगा। यदि तुम्हारा इसमें प्रवेश है, तो वे नकारात्मक अवस्थाएँ और समस्त नकारात्मक चीज़ें—मानवीय धारणाएँ, जीवन-दर्शन, लोगों के बीच असामान्य संबंध तथा मत और विचार, इत्यादि—स्वाभाविक रूप से गायब हो जाएँगी। चूँकि तुम सदा परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर रहे हो, और तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर के निकट आ रहा है और हमेशा परमेश्वर के वर्तमान वचनों से घिरा रहता है, इसलिए वे नकारात्मक चीज़ें अनजाने ही तुमसे दूर हो जाएँगी। जब नई और सकारात्मक चीज़ें तुम पर कब्जा करेंगी, तब पुरानी नकारात्मक चीज़ों के लिए कोई जगह नहीं रहेगी, इसलिए उन नकारात्मक चीज़ों पर ध्यान न दो। तुम्हें उन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष शांत रहने, परमेश्वर के वचनों को अधिक से अधिक खाने, पीने और उनका आनंद लेने, परमेश्वर की स्तुति में अधिकाधिक भजन गाने, और परमेश्वर को अपने ऊपर कार्य करने का अवसर देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर इस समय मानव-जाति को व्यक्तिगत रूप से सिद्ध बनाना चाहता है, और वह तुम्हारे हृदय को हासिल करना चाहता है; उसका आत्मा तुम्हारे हृदय को प्रेरित करता है, और यदि पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करके तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आ जाते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करोगे। यदि तुम परमेश्वर के वचनों में जीने पर ध्यान देते हो, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने के लिए सत्य के बारे में संगति करने में अधिक संलग्न होते हो, तो वे धार्मिक धारणाएँ और तुम्हारा दंभ और अहम्मन्यता, सब गायब हो जाएँगे, और तुम जान जाओगे कि किस प्रकार अपने आपको परमेश्वर के लिए व्यय करना है, किस प्रकार परमेश्वर से प्रेम करना है, और किस प्रकार उसे संतुष्ट करना है। और बिना तुम्हारे जाने परमेश्वर के लिए असंगत चीज़ें तुम्हारी चेतना में से गायब हो जाएँगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के वर्तमान वचनों को खाते और पीते हुए उसके वचनों पर चिंतन और प्रार्थना करना परमेश्वर के समक्ष शांत होने की ओर पहला कदम है। यदि तुम सच में परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हो, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी तुम्हारे साथ होगी। समस्त आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने से प्राप्त किया जाता है। प्रार्थना करने में तुम्हें परमेश्वर के समक्ष शांत अवश्य होना चाहिए, केवल तभी तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जा सकते हो। परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हुए जब तुम परमेश्वर के समक्ष शांत होते हो, तो तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है, और तुम परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ प्राप्त कर सकते हो। ध्यान और संगति की अपनी सामान्य गतिविधियों में और अपने हृदय में परमेश्वर के निकट होने में जब तुम परमेश्वर की उपस्थिति में शांत हो जाओगे, तो तुम परमेश्वर के साथ वास्तविक निकटता का आनंद ले पाओगे, परमेश्वर के प्रेम और उसके कार्य की वास्तविक समझ रख पाओगे, और परमेश्वर के इरादों के संबंध में सच्चा चिंतन और देखभाल दर्शा पाओगे। जितना अधिक तुम साधारणतः परमेश्वर के सामने शांत रहने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक तुम रोशन होगे और उतना ही अधिक तुम अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को समझ पाओगे, और समझ पाओगे कि तुममें किस चीज़ की कमी है, तुम्हें किसमें प्रवेश करना है, कौन-से कार्य में तुम्हें सेवा करनी चाहिए, और किसमें तुम्हारे दोष निहित हैं। यह सब परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने से प्राप्त होता है। यदि तुम परमेश्वर के समक्ष अपनी शांति में सच में गहराई प्राप्त कर लेते हो, तो तुम आत्मा के कुछ रहस्यों को स्पर्श कर पाओगे, यह समझ पाओगे कि वर्तमान में परमेश्वर तुममें क्या कार्य करना चाहता है, परमेश्वर के वचनों को अधिक गहराई से समझ पाओगे, परमेश्वर के वचनों के मर्म, सार और अस्तित्व को समझ पाओगे, और तुम अभ्यास के मार्ग को अधिक स्पष्टता और परिशुद्धता से देख पाओगे। यदि तुम अपनी आत्मा में शांत रहने में पर्याप्त गहराई प्राप्त करने में असफल रहते हो, तो तुम पवित्र आत्मा द्वारा केवल थोड़ा-सा ही प्रेरित किए जाओगे; तुम अंदर से मज़बूत महसूस करोगे और एक निश्चित मात्रा में आनंद और शांति अनुभव करोगे, लेकिन तुम कुछ भी गहराई से नहीं समझोगे। मैंने पहले कहा है : यदि लोग अपना पूरा सामर्थ्य नहीं लगाते हैं, तो उनके लिए मेरी वाणी को सुनना या मेरा चेहरा देखना कठिन होगा। यह परमेश्वर के समक्ष शांति में गहराई प्राप्त करने का इशारा करता है, न कि सतही प्रयास करने का। जो व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर के समक्ष सच में शांत रह सकता है, वह खुद को समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त कर पाता है, और परमेश्वर द्वारा कब्जा किए जाने में समर्थ होता है। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत होने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से लंपट और स्वछंद हैं। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में समर्थ हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर के समक्ष पवित्र हैं, और जो परमेश्वर के लिए लालायित रहते हैं। केवल परमेश्वर के आगे शांत रहने वाले लोग ही जीवन को महत्व देते हैं, आत्मा में संगति को महत्व देते हैं, परमेश्वर के वचनों के प्यासे होते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं। जो कोई भी परमेश्वर के आगे शांत रहने को महत्व नहीं देता है और परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अभ्यास नहीं करता वह अहंकारी और अल्पज्ञ है, संसार से जुड़ा है और जीवन-रहित है; भले ही वे कहें कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे केवल दिखावटी बात करते हैं। जिन्हें परमेश्वर अंततः सिद्ध बनाता है और पूर्णता देता है, वे लोग हैं जो परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रह सकते हैं। इसलिए जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं, वे बड़े आशीषों का अनुग्रह प्राप्त करते हैं। जो लोग दिन भर में परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिए शायद ही समय निकालते हैं, जो पूरी तरह से बाहरी मामलों में लीन रहते हैं और जीवन में प्रवेश को थोड़ा ही महत्व देते हैं—वे सब ढोंगी हैं, जिनके भविष्य में विकास के कोई आसार नहीं हैं। जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हैं और जो वास्तव में परमेश्वर से संगति कर सकते हैं, वे ही परमेश्वर के लोग होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें समझदारी के साथ सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपने धार्मिक कार्यों के लिए समय निकालना होगा, ऐसा समय जब तुम लोगों, घटनाओं, और वस्तुओं को खुद किनारे कर देते हो, जब तुम अपने हृदय को शांत कर परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करते हो। हर किसी को अपने व्यक्तिगत धार्मिक कार्यों के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार उसकी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। सभी को समझ-बूझके साथ परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध अनुभव करेगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें और अधिक आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य समझ-बूझ के साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह नियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच्चाई के साथ परमेश्वर के सांमजस्य में कार्य करना और अपनी देह को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। जितना बेहतर तुम्हारा सहयोग होगा और जितना अधिक तुम प्रयास करोगे, उतना ही अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर लौट पाएगा, और उतना ही अधिक तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने शांत कर पाओगे। एक निश्चित बिन्दु पर परमेश्वर तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा। कोई भी तुम्हारे हृदय को हिला या जकड़ नहीं पाएगा। और तुम पूरी तरह से परमेश्वर के हो जाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है' से उद्धृत

परमेश्वर किस तरह के लोगों को पसंद करता है? उन्हें, जिनके दिल शांत हो सकते हैं। जब ये लोग शांत होते हैं, तो क्या कर रहे होते हैं? क्या वे कठपुतली की तरह होते हैं, जो कुछ नहीं सोचते? ऐसा नहीं है। वे परमेश्वर के सामने शांत होते हैं और उससे प्रार्थना करते हुए उसकी इच्छा का पता लगाते हैं, और उसकी सुरक्षा और प्रबुद्धता माँगते हैं। इसके अतिरिक्त, जब सत्य का कोई ऐसा पहलू होता है जिसे वे नहीं समझते, तो वे सत्य के उस पहलू में प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, ताकि वे स्पष्ट समझ प्राप्त कर सकें; वैकल्पिक रूप से, वे कार्य के किसी क्षेत्र विशेष की कठिन समस्याओं के लिए परमेश्वर के समाधान और मार्गदर्शन की तलाश करते हैं। जब तुम परमेश्वर के सामने शांत होते हो, तो करने के लिए बहुत सारे काम होते हैं, बहुत-सी चीजें होती हैं जिन्हें करने की जरूरत होती है। यह करने के लिए और कुछ न होने की स्थिति में परमेश्वर के सामने हाजिरी लगाने का मामला नहीं है, "हे परमेश्वर! मैं यहाँ हूँ, तुम मेरे दिल में हो, तुम मेरे साथ हो, मुझे प्रलोभन में मत पड़ने देना।" यह यंत्रवत् प्रार्थना करना है, यह परमेश्वर के प्रति बकवादी होना है; यह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करता है, और परमेश्वर ऐसे लोगों को सत्य प्रदान नहीं करता। परमेश्वर जिन्हें सत्य प्रदान करता है, उनके द्वारा कौन-सी चीज पहले पूरी की जानी चाहिए? उनके पास एक ऐसा दिल होना चाहिए, जो धार्मिकता का भूखा हो, एक ऐसा दिल, जो ईमानदार हो। तुम्हारे दिल के ईमानदार होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम वास्तव में सत्य से प्रेम करते हो। जब तुम परमेश्वर के प्रति हमेशा बकवादी होते हो, जब तुम्हारा दिल ईमानदार नहीं होता, जब तुम्हारा इरादा परमेश्वर के सामने केवल हाजिरी लगाने और नमस्तेकहने के लिए आने का होता है, और फिर उसके बाद, तुम्हारा कहा अंतिम होता है, तुम जाकर अपने आप काम करते हो, और परमेश्वर का कार्य तुम्हें सौंपे जाने के बाद, अंतत: तुम्हारा परमेश्वर या सत्य से कोई लेना-देना नहीं रहता, तो इसे क्या कहते हैं? इसे कहते हैं परमेश्वर का विरोध करना और अपना कारोबार चलाना। ऐसी स्थिति में, क्या परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा? नहीं। क्या तुम लोगों ने सत्य के लिए प्रयास करने और सत्य को समझने का मार्ग खोज लिया है? तुम्हें अपने शांत हृदय के साथ सत्य की खोज करने और परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए अकसर परमेश्वर के सामने आना चाहिए। तुम्हें शांत रहना सीखना चाहिए। शांत रहने का मतलब अपने दिमाग को खाली करना नहीं है, बल्कि अपने मन में वे चीजें रखना जिन्हें तुम माँगते हो, विचार रखना, और एक दायित्व रखना है, इसका मतलब एक ईमानदार और सच्चे हृदय के साथ परमेश्वर के सामने आना, जो सत्य तथा परमेश्वर की इच्छा के लिए भूखा हो, और इसका मतलब अपने कर्तव्य और काम का दायित्व उठाना है। जब तुम परमेश्वर के सामने आते हो और शांत होते हो, तो तुममें यही सब पाया जाना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपने व्यक्तिगत यश के बदले उन हितों के साथ धोखा तक कर देते हैं (भाग एक)' से उद्धृत

यदि तुम्हारा हृदय प्रायः परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रहता, तो परमेश्वर के पास तुम्हें सिद्ध करने का कोई साधन नहीं है। संकल्पहीन होना हृदयहीन होने के बराबर है, और हृदयहीन व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकता; ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि परमेश्वर कितना कार्य करता है, या वह कितना कुछ बोलता है, न ही वह यह जानता है कि अभ्यास कैसे किया जाए। क्या यह व्यक्ति हृदयहीन नहीं है? क्या हृदयहीन व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता है? हृदयहीन लोगों को सिद्ध बनाने का परमेश्वर के पास कोई साधन नहीं है—और वे बोझ ढोने वाले जानवरों से भिन्न नहीं हैं। परमेश्वर इतने स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से बोला है, फिर भी तुम्हारा हृदय प्रेरित नहीं होता और तुम परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ रहते हो। क्या तुम एक गूँगे जानवर नहीं हो? कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने के अभ्यास में भटक जाते हैं। जब भोजन पकाने का समय होता है, तो वे भोजन नहीं पकाते, जब दैनिक काम-काज का समय होता है, तो वे उन्हें नहीं करते, बल्कि केवल प्रार्थना और ध्यान ही करते रहते हैं। परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अर्थ यह नहीं है कि भोजन मत पकाओ या दैनिक काम-काज मत करो, या अपना जीवन मत जीओ; बल्कि, यह सभी सामान्य अवस्थाओं में परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना, और अपने हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान रखना है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो प्रार्थना करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के आगे ठीक तरह से घुटने टेककर झुकना चाहिए; जब तुम दैनिक काम-काज करते हो या भोजन पकाते हो, तो परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करो, परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करो, या भजन गाओ। तुम चाहे अपने आपको किसी भी परिस्थिति में पाओ, तुम्हारे पास अभ्यास करने का अपना तरीका होना चाहिए, परमेश्वर के निकट आने के लिए तुम जो कुछ कर सकते हो, तुम्हें करना चाहिए, और परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के लिए तुम्हें अपनी पूरी ताक़त से कोशिश करनी चाहिए। जब परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो एकचित्त होकर प्रार्थना करो; और जब परिस्थितियाँ अनुमति न दें, तो अपने हाथों के काम को करते हुए अपने हृदय में परमेश्वर के निकट जाओ। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकते हो, तो उसके वचनों को खाओ और पीओ; जब तुम प्रार्थना कर सकते हो, तो प्रार्थना करो; जब तुम परमेश्वर का मनन कर सकते हो, तब उसका मनन करो। दूसरे शब्दों में, अपने परिवेश के अनुसार प्रवेश के लिए अपने आपको प्रशिक्षित करने हेतु अपनी पूरी कोशिश करो। कुछ लोग परमेश्वर के समक्ष तभी शांत हो पाते हैं, जब कोई समस्या नहीं होती, लेकिन जैसे ही कुछ होता है, उनके मन भटक जाते हैं। यह परमेश्वर के समक्ष शांत होना नहीं है। इसे अनुभव करने का सही तरीका है : किसी भी परिस्थिति में हमारा हृदय परमेश्वर से दूर न जाए, या बाहरी लोगों, घटनाओं या चीज़ों से विक्षुब्ध महसूस न करे, और केवल तभी कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जो परमेश्वर के समक्ष सचमुच शांत होता है। कुछ लोग कहते हैं कि जब वे सभाओं में प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर के सामने उनका हृदय शांत रह सकता है, किंतु दूसरों के साथ संगति में वे परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में असमर्थ रहते हैं, उनके विचार भटक जाते हैं। यह परमेश्वर के समक्ष शांत रहना नहीं है। आज अधिकांश लोग इसी अवस्था में हैं, उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत रहने में असमर्थ हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस क्षेत्र में अपने परिश्रम में अधिक प्रयास अवश्य लगाने चाहिए, जीवन-अनुभव के सही पथ पर कदम-दर-कदम प्रवेश करना चाहिए, और परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर चलने की शुरुआत करनी चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

अनुभव से यह देखा जा सकता है कि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक, परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जो लोगों के आध्यात्मिक जीवन से, और उनके जीवन में उनके विकास से संबंधित है। जब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहेगा, केवल तभी सत्य की तुम्हारी खोज और तुम्हारे स्वभाव में आए परिवर्तन सफल होंगे। चूँकि तुम परमेश्वर के सामने बोझ से दबे हुए आते हो, और चूँकि तुम हमेशा महसूस करते हो कि तुममें कई तरह की कमियाँ हैं, कि ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें जानना तुम्हारे लिए जरूरी है, तुम्हें बहुत सारी वास्तविकता का अनुभव करने की आवश्यकता है, और कि तुम्हें परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखना चाहिए—ये बातें हमेशा तुम्हारे दिमाग़ में रहती हैं। ऐसा लगता है, मानो वे तुम पर इतना ज़ोर से दबाव डाल रही हों कि तुम्हारे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया हो, और इस प्रकार तुम्हारा हृदय भारी-भारी महसूस करता हो (हालाँकि तुम नकारात्मक स्थिति में नहीं होते)। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता स्वीकार करने और परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने के योग्य हैं। यह उनके बोझ के कारण है, क्योंकि उनका हृदय भारी-भारी महसूस करता है, और, यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने जो कीमत वे अदा कर चुके हैं और जो पीड़ा उन्होंने झेली है, उसके कारण वे उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं, क्योंकि परमेश्वर किसी के साथ विशेष व्यवहार नहीं करता। लोगों के प्रति अपने व्यवहार में वह हमेशा निष्पक्ष रहता है, लेकिन वह लोगों को मनमाने ढंग से और बिना किसी शर्त के भी नहीं देता। यह उसके धर्मी स्वभाव का एक पहलू है। वास्तविक जीवन में, अधिकांश लोगों को अभी इस क्षेत्र को हासिल करना बाक़ी है। कम से कम, उनका हृदय अभी भी पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ना बाक़ी है, और इसलिए उनके जीवन-स्वभाव में अभी भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। इसका कारण यह है कि वे केवल परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं और उन्हें अभी भी पवित्र आत्मा का कार्य हासिल करना शेष है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लिए लोगों को जो मानदंड पूरे करने चाहिए, वे इस प्रकार हैं : उनका हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, वे परमेश्वर के वचनों का दायित्व उठाते हैं, उनके पास तड़पता हुआ हृदय और सत्य को तलाशने का संकल्प होता है। केवल ऐसे लोग ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं और वे अकसर प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर इस्तेमाल करता है, वे बाहर से तर्कहीन प्रतीत होते हैं और दूसरों के साथ उनके सामान्य संबंध नहीं होते, हालाँकि वे औचित्य के साथ बोलते हैं, लापरवाही से नहीं बोलते, और परमेश्वर के सामने हमेशा शांत हृदय रख पाते हैं। यह ठीक उसी तरह का व्यक्ति है, जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए पर्याप्त है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे "तर्कहीन" व्यक्तियों के, जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है, दूसरों के साथ सामान्य संबंध नहीं होते, और वे बाहरी प्रेम या व्यवहारों को उचित सम्मान नहीं देते, लेकिन जब वे आध्यात्मिक चीज़ों पर संवाद करते हैं, तो वे अपना हृदय पूरी तरह खोल पाने में सक्षम होते हैं और निस्स्वार्थ भाव से दूसरों को वह रोशनी और प्रबुद्धता प्रदान करते हैं, जो उन्होंने परमेश्वर के सामने अपने वास्तविक अनुभव से हासिल की होती है। इसी प्रकार से वे परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं और उसकी इच्छा पूरी करते हैं। जब दूसरे सभी लोग उनकी निंदा और उपहास कर रहे होते हैं, तो वे बाहर के लोगों, घटनाओं या चीज़ों द्वारा नियंत्रित होने से बचने में सक्षम होते हैं, और फिर भी परमेश्वर के सामने शांत रह पाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के पास अपनी स्वयं की अनूठी अंतर्दृष्टियाँ होती हैं। दूसरे लोग चाहे कुछ भी करें, उनका हृदय कभी भी परमेश्वर से दूर नहीं जाता। जब दूसरे लोग प्रसन्नतापूर्वक और मज़ाकिया ढंग से बातें कर रहे होते हैं, उनका हृदय तब भी परमेश्वर के समक्ष रहता है, और वे परमेश्वर के वचनों पर विचार करते रहते हैं या उसकी मंशा जानने की कोशिश करते हुए अपने हृदय में परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना करते रहते है। वे दूसरों के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने को महत्व नहीं देते। लगता है, ऐसे व्यक्ति का जीने के लिए कोई दर्शन नहीं होता। बाहर से ऐसा व्यक्ति जीवंत, प्रिय और मासूम होता है, लेकिन उसमें शांति की भावना भी रहती है। परमेश्वर इसी प्रकार के व्यक्ति का उपयोग करता है। जीवन-दर्शन या "सामान्य तर्क" जैसी चीज़ें इस प्रकार के व्यक्ति में काम ही नहीं करतीं; इस प्रकार के व्यक्ति ने अपना पूरा हृदय परमेश्वर के वचनों को समर्पित कर दिया होता है, और लगता है, उसके हृदय में सिर्फ़ परमेश्वर होता है। यह उस प्रकार का व्यक्ति है, जिसे परमेश्वर "तर्कहीन" व्यक्ति के रूप में देखता है, और ठीक इसी प्रकार के व्यक्ति का परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाता है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की पहचान इस प्रकार है : चाहे कोई भी समय या जगह हो, उसका हृदय हमेशा परमेश्वर के समक्ष रहता है, और दूसरे चाहे जितने भी अनैतिक हों, जितने भी वे वासना और देह में लिप्त हों, इस व्यक्ति का हृदय कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ता, और वह भीड़ के पीछे नहीं जाता। केवल इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर द्वारा उपयोग के लिए अनुकूल है, और केवल इसी प्रकार का व्यक्ति पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण किया जाता है। यदि तुम ये चीज़ें प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने और पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य नहीं हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

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