79. परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करना, सत्य को समझना और स्वयं को जानना और अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पाना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार कोई मसीह के प्रति समर्पित हो सकता है।

(2) यह जानना आवश्यक है कि गिनने के लिए मसीह के बहुत से प्रेम योग्य पहलू हैं; केवल इस प्रकार कोई परमेश्वर के वचन सत्य को अपने दिल में संजो सकता है और उसे सचमुच प्रेम कर सकता है, उसे ऊँचा उठा सकता है, और उसकी गवाही दे सकता है।

(3) यह जानना आवश्यक है कि मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है, और केवल उसके माध्यम से ही उद्धार मिल सकता है। केवल इसी प्रकार कोई स्वेच्छा से मसीह के लिए खुद को खपा सकता है और उसके प्रति वफादार हो सकता है।

(4) मसीह के लिए एक सच्चे और शुद्ध प्रेम का होना, और ऐसी स्थिति में पहुँचना आवश्यक है जहाँ तुम उसके प्रति मृत्युपर्यंत समर्पित रह सको। केवल इस प्रकार कोई अंत तक परमेश्वर के प्रति निष्ठावान रह सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अब मैं तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, तुम्हारा प्रेम और गवाही चाहता हूँ। यहाँ तक कि अगर तुम इस समय नहीं जानते कि गवाही क्या होती है या प्रेम क्या होता है, तो तुम्हें अपना सब-कुछ मेरे पास ले आना चाहिए और जो एकमात्र खजाना तुम्हारे पास है : तुम्हारी निष्ठा और आज्ञाकारिता, उसे मुझे सौंप देना चाहिए। तुम्हें जानना चाहिए कि मेरे द्वारा शैतान को हराए जाने की गवाही मनुष्य की निष्ठा और आज्ञाकारिता में निहित है, साथ ही मनुष्य के ऊपर मेरी संपूर्ण विजय की गवाही भी। मुझ पर तुम्हारे विश्वास का कर्तव्य है मेरी गवाही देना, मेरे प्रति वफादार होना, और किसी और के प्रति नहीं, और अंत तक आज्ञाकारी बने रहना। इससे पहले कि मैं अपने कार्य का अगला चरण आरंभ करूँ, तुम मेरी गवाही कैसे दोगे? तुम मेरे प्रति वफादार और आज्ञाकारी कैसे बने रहोगे? तुम अपने कार्य के प्रति अपनी सारी निष्ठा समर्पित करते हो या उसे ऐसे ही छोड़ देते हो? इसके बजाय तुम मेरे प्रत्येक आयोजन (चाहे वह मृत्यु हो या विनाश) के प्रति समर्पित हो जाओगे या मेरी ताड़ना से बचने के लिए बीच रास्ते से ही भाग जाओगे? मैं तुम्हारी ताड़ना करता हूँ ताकि तुम मेरी गवाही दो, और मेरे प्रति निष्ठावान और आज्ञाकारी बनो। इतना ही नहीं, ताड़ना वर्तमान में मेरे कार्य के अगले चरण को प्रकट करने के लिए और उस कार्य को निर्बाध आगे बढ़ने देने के लिए है। अतः मैं तुम्हें समझाता हूँ कि तुम बुद्धिमान हो जाओ और अपने जीवन या अस्तित्व के महत्व को बेकार रेतकी तरह मत समझो। क्या तुम सही-सही जान सकते हो कि मेरा आने वाला काम क्या होगा? क्या तुम जानते हो कि आने वाले दिनों में मैं किस तरह काम करूँगा और मेरा कार्य किस तरह प्रकट होगा? तुम्हें मेरे कार्य के अपने अनुभव का महत्व और साथ ही मुझ पर अपने विश्वास का महत्व जानना चाहिए। मैंने इतना कुछ किया है; मैं उसे बीच में कैसे छोड़ सकता हूँ, जैसा कि तुम सोचते हो? मैंने ऐसा व्यापक काम किया है; मैं उसे नष्ट कैसे कर सकता हूँ? निस्संदेह, मैं इस युग को समाप्त करने आया हूँ। यह सही है, लेकिन इससे भी बढ़कर तुम्हें जानना चाहिए कि मैं एक नए युग का आरंभ करने वाला हूँ, एक नया कार्य आरंभ करने के लिए, और, सबसे बढ़कर, राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए। अतः तुम्हें जानना चाहिए कि वर्तमान कार्य केवल एक युग का आरंभ करने और आने वाले समय में सुसमाचार को फैलाने की नींव डालने तथा भविष्य में इस युग को समाप्त करने के लिए है। मेरा कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम समझते हो, और न ही वैसा बेकार और निरर्थक है, जैसा तुम्हें लग सकता है। इसलिए, मैं अब भी तुमसे कहूँगा : तुम्हें मेरे कार्य के लिए अपना जीवन देना ही होगा, और इतना ही नहीं, तुम्हें मेरी महिमा के लिए अपने आपको समर्पित करना हगा। लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम मेरी गवाही दो, और इससे भी बढ़कर, लंबे समय से मैं उत्सुक हूँ कि तुम सुसमाचार फैलाओ। तुम्हें समझना ही होगा कि मेरे हृदय में क्या है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

प्राणियों के रूप में लोगों को वे कर्तव्य पूरे करने चाहिए, जो उनसे अपेक्षित हैं, और शुद्धिकरण के बीच परमेश्वर के लिए गवाह बनना चाहिए। हर परीक्षण में उन्हें उस गवाही पर कायम रहना चाहिए, जो कि उन्हें देनी चाहिए, और परमेश्वर के लिए उन्हें ऐसा ज़बरदस्त तरीके से करना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति विजेता होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हें शुद्ध करे, तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो और परमेश्वर पर से कभी विश्वास नहीं खोते। तुम वह करते हो, जो मनुष्य को करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से इसी की अपेक्षा करता है, और मनुष्य का दिल पूरी तरह से उसकी ओर लौटने तथा हर पल उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होना चाहिए। ऐसा होता है विजेता। जिन लोगों का उल्लेख परमेश्वर "विजेताओं" के रूप में करता है, वे लोग वे होते हैं, जो तब भी गवाह बनने और परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास और भक्ति बनाए रखने में सक्षम होते हैं, जब वे शैतान के प्रभाव और उसकी घेरेबंदी में होते हैं, अर्थात् जब वे स्वयं को अंधकार की शक्तियों के बीच पाते हैं। यदि तुम, चाहे कुछ भी हो जाए, फिर भी परमेश्वर के समक्ष पवित्र दिल और उसके लिए अपना वास्तविक प्यार बनाए रखने में सक्षम रहते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और इसी को परमेश्वर "विजेता" होने के रूप में संदर्भित करता है। यदि परमेश्वर द्वारा तुम्हें आशीष दिए जाने पर तुम्हारा अनुसरण उत्कृष्ट होता है, लेकिन उसके आशीष न मिलने पर तुम पीछे हट जाते हो, तो क्या यह पवित्रता है? चूँकि तुम निश्चित हो कि यह रास्ता सही है, इसलिए तुम्हें अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखनी चाहिए। चूँकि तुमने देख लिया है कि स्वयं परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए पृथ्वी पर आया है, इसलिए तुम्हें पूरी तरह से अपना दिल उसे समर्पित कर देना चाहिए। भले ही वह कुछ भी करे, यहाँ तक कि बिलकुल अंत में तुम्हारे लिए एक प्रतिकूल परिणाम ही क्यों न निर्धारित कर दे, अगर तुम फिर भी उसका अनुसरण कर सकते हो, तो यह परमेश्वर के सामने अपनी पवित्रता बनाए रखना है। परमेश्वर को एक पवित्र आध्यात्मिक देह और एक शुद्ध कुँवारापन अर्पित करने का अर्थ है परमेश्वर के सामने ईमानदार दिल बनाए रखना। मनुष्य के लिए ईमानदारी ही पवित्रता है, और परमेश्वर के प्रति ईमानदार होने में सक्षम होना ही पवित्रता बनाए रखना है। यही वह चीज़ है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, तब तुम प्रार्थना करो; जब तुम्हें संगति में एक-साथ इकट्ठे होना चाहिए, तो तुम इकट्ठे हो जाओ; जब तुम्हें भजन गाने चाहिए, तो तुम भजन गाओ; और जब तुम्हें शरीर को त्यागना चाहिए, तो तुम शरीर को त्याग दो। जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तो तुम उसमें गड़बड़ नहीं करते; जब तुम्हें परीक्षणों का सामना करना पड़ता है, तो तुम मजबूती से खड़े रहते हो। यह परमेश्वर के प्रति भक्ति है। लोगों को जो करना चाहिए, यदि तुम वह बनाए नहीं रखते, तो तुम्हारी पिछली सभी पीड़ाएँ और संकल्प व्यर्थ रहे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे तुम निजी कार्य करो या सार्वजनिक, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर का आनंद प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और चाहे अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम हमेशा उसी मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी की तरह लेने में समर्थ हैं, और वे अपने भविष्य की संभावना पर कोई विचार नहीं करते : यहाँ तक कि जब उनके पास कोई संभावना नहीं होती, और उन्हें कुछ भी मिलने वाला नहीं होता, तब भी वे हमेशा एक प्रेमपूर्ण हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमज़ोर होती, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दर्द सहन कर सकते हैं और उसे छोड़ सकते हैं, जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ मिलकर शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ मिलकर शासन करते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

एक मनुष्य के तौर पर परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए व्यक्ति को समर्पित होना चाहिए। उसे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए और वह अनमना नहीं हो सकता, ज़िम्मेदारी लेने में चूक नहीं कर सकता या अपनी रुचि या मनोदशा के आधार पर काम नहीं कर सकता, यह समर्पित होना नहीं है। समर्पित होने से क्या आशय है? इसका आशय यह है कि अपने कर्तव्य पूरे करते समय, तुम मनोदशा, वातावरण, लोगों, मुद्दों और चीज़ों से प्रभावित और विवश नहीं होते हो। "मुझे यह आदेश परमेश्वर से प्राप्त हुआ है; उसने यह मुझे दिया है। मुझसे यही अपेक्षित है। अतः मैं इसे अपना मामला मानकर जिस भी तरीके से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं उस तरह इस काम को करूंगा, परमेश्वर को संतु्ष्ट करने पर ज़ोर दूँगा।" जब तुम इस स्थिति में होते हो, तो तुम न केवल अपने अंत:करण से नियंत्रित होते हो, बल्कि इसमें श्रद्धा भी शामिल होती है। यदि तुम काम में दक्षता या परिणाम पाने की आशा किए बिना इसे बस यों ही कर देने में संतुष्ट हो और ऐसा महसूस करते हो कि कुछ प्रयास कर लेना ही पर्याप्त है, तो यह केवल अंत:करण का ही मानक है और इसे समर्पण नहीं माना जा सकता है। जब तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो तो यह मानक स्तर अंत:करण के मानक स्तर से थोड़ा ज़्यादा ऊँचा होता है। तब यह केवल कुछ प्रयास करने का विषय ही नहीं होता; तुम्हें इसमें अपना सम्पूर्ण हृदय भी लगाना चाहिए। तुम्हें अपने कर्तव्य को हमेशा अपना ही काम मानना चाहिए, इस काम के लिए भार उठाना चाहिए, कोई छोटी-सी ग़लती करने पर या थोड़ा-सा भी असावधान होने पर फटकार सहना चाहिए, ऐसा महसूस करना चाहिए कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो सकते क्योंकि यह तुम्हें परमेश्वर का ऋणी बनाता है। वे लोग जिनके पास सच्चे अर्थों में अपने कर्तव्यों को इस तरह पूरा करने का बोध होता है मानो वे उनके अपने ही काम हों, और बिना इस बात की परवाह किए कि कोई निगरानी कर रहा है या नहीं, चाहे परमेश्वर उनसे प्रसन्न हो या नहीं या चाहे वो उनके साथ जैसा भी व्यवहार करे, वे स्वयं से कर्तव्यों का पालन करने की और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए आदेश को पूरा करने की कठोर अपेक्षा करते हैं। इसे समर्पण कहते हैं। क्या यह अंत:करण के मानक स्तर से अधिक ऊँचा स्तर नहीं है? अधिकांश समय, अंत:करण का मानक स्तर बाहरी चीज़ों से प्रभावित होता है, या कोई अपनी समस्त शक्ति का उपयोग करता है; शुद्धता का मानक उतना ऊँचा नहीं होता है। "समर्पण" और "अपने कर्तव्य के निर्वाह में निष्ठापूर्ण होने में सक्षम होना" के विषय में शुचिता का स्तर ऊपर उठता जाता है और बस कुछ प्रयास करना ही पर्याप्त नहीं होता है। इसके लिए ख़ुद को अपने कर्तव्य में पूरे हृदय, मस्तिष्क, शरीर और आत्मा से झोंक देने की आवश्यकता होती है। कभी-कभी तुम्हारे शरीर को कुछ कष्ट भोगना होता है; तुम्हें पूरी तरह से इस पर विचार करना ही चाहिए। जब कई परिवेश तुम पर असर डालें तो तुम उनसे प्रभावित या मजबूर नहीं हो सकते और तुम्हें उनके बंधनों के कष्टों को नहीं भोगना चाहिए। तुम्हें अपने व्यक्तिगत मामलों को दूसरे स्थान पर रखना चाहिए, तुम्हें कई क़ीमतें चुकानी होगी, अपने निजी स्वार्थ, अपना गौरव, अपनी भावनाएँ, शारीरिक सुख और आराम त्यागने होंगे, और तुम्हें अपनी जवानी, शादी और अपनी संभावनाओं का त्याग करना होगा। इस तरह तुम समर्पण को प्राप्त करोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार बनकर ही लोग वास्तव में खुश हो सकते हैं' से उद्धृत

इन सब वर्षों में तुम लोगों ने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी तुमने मुझे कभी वफादारी का एक कण भी नहीं दिया है। इसकी बजाय, तुम उन लोगों के इर्दगिर्द घूमते रहे हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो और जो चीज़ें तुम्हें प्रसन्न करती हैं—इतना कि हर समय, और हर जगह जहाँ तुम जाते हो, उन्हें अपने हृदय के करीब रखते हो और तुमने कभी भी उन्हें छोड़ा नहीं है। जब भी तुम लोग किसी एक चीज के बारे में, जिससे तुम प्रेम करते हो, उत्सुकता और चाहत से भर जाते हो, तो ऐसा तब होता है जब तुम मेरा अनुसरण कर रहे होते हो, या तब भी जब तुम मेरे वचनों को सुन रहे होते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस वफादारी की माँग मैं तुमसे करता हूँ, उसे तुम अपने "पालतुओं" के प्रति वफादार होने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो। हालाँकि तुम लोग मेरे लिए एक-दो चीजों का त्याग करते हो, पर वह तुम्हारे सर्वस्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और यह नहीं दर्शाता कि वह मैं हूँ, जिसके प्रति तुम सचमुच वफादार हो। तुम लोग खुद को उन उपक्रमों में संलग्न कर देते हो, जिनके प्रति तुम बहुत गहरा चाव रखते हो : कुछ लोग अपने बेटे-बेटियों के प्रति वफादार हैं, तो अन्य अपने पतियों, पत्नियों, धन-संपत्ति, व्यवसाय, वरिष्ठ अधिकारियों, हैसियत या स्त्रियों के प्रति वफादार हैं। जिन चीजों के प्रति तुम लोग वफादार होते हो, उनसे तुम कभी ऊबते या नाराज नहीं होते; उलटे तुम उन चीजों को ज्यादा बड़ी मात्रा और बेहतर गुणवत्ता में पाने के लिए और अधिक लालायित हो जाते हो, और तुम कभी भी ऐसा करना छोडते नहीं हो। मैं और मेरे वचन हमेशा उन चीजों के पीछे धकेल दिए जाते हैं, जिनके प्रति तुम गहरा चाव रखते हो। और तुम्हारे पास उन्हें आखिरी स्थान पर रखने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसे लोग भी हैं जो इस आखिरी स्थान को भी अपनी वफादारी की उन चीजों के लिए छोड़ देते हैं, जिन्हें अभी खोजना बाकी है। उनके दिलों में कभी भी मेरा मामूली-सा भी निशान नहीं रहा है। तुम लोग सोच सकते हो कि मैं तुमसे बहुत ज्यादा अपेक्षा रखता हूँ या तुम पर गलत आरोप लगा रहा हूँ—लेकिन क्या तुमने कभी इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि जब तुम खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ समय बिता रहे होते हो, तो तुम कभी भी मेरे प्रति वफादार नहीं रहते? ऐसे समय में, क्या तुम्हें इससे तकलीफ नहीं होती? जब तुम्हारा दिल खुशी से भरा होता है, और तुम्हें अपनी मेहनत का फल मिलता है, तब क्या तुम खुद को पर्याप्त सत्य से लैस न करने के कारण निराश महसूस नहीं करते? मेरा अनुमोदन प्राप्त न करने पर तुम लोग कब रोए हो? तुम लोग अपने बेटे-बेटियों के लिए अपना दिमाग खपाते हो और बहुत तकलीफ उठाते हो, फिर भी तुम संतुष्ट नहीं होते; फिर भी तुम यह मानते हो कि तुमने उनके लिए ज्यादा मेहनत नहीं की है, कि तुमने उनके लिए वह सब कुछ नहीं किया है जो तुम कर सकते थे, जबकि मेरे लिए तुम हमेशा से असावधान और लापरवाह रहे हो; मैं केवल तुम्हारी यादों में रहता हूँ, तुम्हारे दिलों में नहीं। मेरा प्रेम और कोशिशें लोगों के द्वारा कभी महसूस नहीं की जातीं और तुमने उनकी कभी कोई कद्र नहीं की। तुम सिर्फ मामूली संक्षिप्त सोच-विचार करते हो, और समझते हो कि यह काफी होगा। यह "वफादारी" वह नहीं है, जिसकी मैंने लंबे समय से कामना की है, बल्कि वह है जो लंबे समय से मेरे लिए घृणास्पद रही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम किसके प्रति वफादार हो?' से उद्धृत

मैंने मनुष्य के लिए आरंभ से ही बहुत कठोर मानक रखा है। यदि तुम्हारी वफ़ादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों के साथ मुझसे ज़बरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्यों से सिर्फ़ यही चाहता हूँ कि वे मेरे प्रति पूरे वफादार हों और सब चीज़े एक शब्द : विश्वास के वास्ते—और उसे साबित करने के लिए करें। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद का तिरस्कार करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम सबके साथ ईमानदारी से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम सब से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्चे विश्वास के साथ कार्य करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

मेरी चिंता तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति के कार्य करने और अपने आप को व्यक्त करने के तरीके को लेकर बनी रहती है, जिसके आधार पर मैं तुम लोगों का अंत निर्धारित करूँगा। हालाँकि, मुझे यह स्पष्ट अवश्य कर देना चाहिए कि मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। चाहे व्यक्ति जो भी हो, मेरा स्वभाव यही है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बता देना चाहिए कि जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

आज तुम लोगों से जो कुछ हासिल करने की अपेक्षा की जाती है, वे अतिरिक्त माँगें नहीं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे सभी लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपना कर्तव्य तक निभाने में या उसे भली-भाँति करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु को आमंत्रित नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग अभी भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए किया जाता है, और मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के लिए दिया जाता है। जब परमेश्वर वह सब कर लेता है जो उसे करना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी प्रदान करनी चाहिए, और अनगिनत धारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर को अपनी वफादारी प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा-सा सहयोग प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मानवजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए अपना कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, पर तुम लोग अभी भी देखते ही हो किंतु करते नहीं, सुनते ही हो किंतु हिलते नहीं। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर चुका है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए उसका कार्य उसकी पहली प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

यदि तुम अपने हर काम में परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए समर्पित रहना चाहते हो, तो केवल एक ही कर्तव्य करना काफी नहीं है; तुम्हें परमेश्वर द्वारा दिये गए हर आदेश को स्वीकार करना चाहिए। चाहे यह तुम्हारी पसंदों के अनुसार हो या न हो, और चाहे यह तुम्हारी रूचियों में से एक हो या न हो, या चाहे यह कुछ ऐसा काम हो जो तुम्हें करना अच्छा नहीं लगता हो या तुमने पहले कभी न किया हो, या कुछ मुश्किल काम हो, तुम्हें इसे फिर भी स्वीकार कर इसके प्रति समर्पित होना होगा। न तुम्हें केवल इसे स्वीकार करना होगा, बल्कि अग्रसक्रिय रूप से अपना सहयोग देना होगा, और इसे सीखना होगा, इसमें प्रवेश पाना होगा। यदि तुम कष्ट उठाते हो, यदि तुम इसके लिए वाहवाही तक नहीं पा सके हो, तुम्हें फिर भी समर्पण के लिए प्रतिबद्ध रहना होगा। तुम्हें इसे अपना व्यक्तिगत कामकाज नहीं बल्कि कर्तव्य मानना चाहिए; कर्तव्य जिसे पूरा करना ही है। लोगों को अपने कर्तव्यों को कैसे समझना चाहिए। जब सृष्टिकर्ता—परमेश्वर—किसी को कोई कार्य सौंपता है, तब उस समय, वह उस व्यक्ति का कर्तव्य बन जाता है। जिन कार्यों और आदेशों को परमेश्वर तुम्हें देता है—वे तुम्हारे कर्तव्य हैं। जब तुम उन्हें अपने लक्ष्य बनाकर उनके पीछे जाते हो, और जब तुम्हारा दिल वास्तव में परमेश्वर-प्रेमी होता है, तब भी क्या तुम इनकार कर सकोगे? तुम्हें इसे इनकार नहीं करना चाहिए। तुम्हें इसे स्वीकार करना चाहिए। यही अभ्यास का पथ है। अभ्यास का मार्ग कौन-सा है? (हर कार्य में पूरी तरह से समर्पित होना।) परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए सभी चीजों में समर्पित रहो। यहाँ केन्द्र बिन्दु कहाँ है? यह "सभी चीजों में" है। "सभी चीजों" का मतलब वे चीजें नहीं हैं जिन्हें तुम पसंद करते हो या जिन कामों में तुम अच्छे हो, वे वह चीजें तो बिल्कुल भी नहीं हैं जिनसे तुम वाकिफ हो। कभी तुम्हें सीखना होगा, कभी तुम्हारे सामने कठिनाइयाँ आएँगी और कभी तुम्हें कष्ट उठाना पड़ेगा। लेकिन चाहे वह कोई भी कार्य हो, अगर वह परमेश्वर का आदेश है, तो तुम्हें उसे स्वीकार करना चाहिए, उसे अपना कर्तव्य समझना चाहिए, उसे पूरा करने के लिए समर्पित होना चाहिए और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना चाहिए : यह अभ्यास का मार्ग है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार बनकर ही लोग वास्तव में खुश हो सकते हैं' से उद्धृत

जब तुम किसी समस्या का सामना करते हो और तुम्हें समझ में आए कि कोई समस्या है, लेकिन फिलहाल यह निश्चित रूप से नहीं कह पा रहे हो कि समस्या कहाँ है, फिर भी लोग तुम्हें बात मानने के लिए मजबूर कर रहे हों, तो ऐसे में तुम्हें क्या करना चाहिए? तब तुम या तो तद्नुरूप सिद्धांत की खोज करो या फिर उच्च से उत्तर खोजो। तुम उनके साथ संगति भी कर सकते हो। जो लोग सत्य समझते हैं वे आपस में इस पर चर्चा और संगति भी कर सकते हैं। कभी-कभी पवित्र आत्मा कार्य करता है और मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिससे तुम यह समझ पाते कि मसीह-विरोधियों या लोग मसीह-विरोधी मार्ग पर चलने वालों द्वारा मुहैया कराए गये समाधान या सिद्धांत में समस्या कहाँ है और उनकी कपटपूर्ण योजनाएँ क्या है। यदि तुम लोग इस पर संगति करोगे, तो हो सकता है कि तुम इसे समझ जाओ—लेकिन यदि तुम इस पर संगति न करो और सोचो, "यह कोई बड़ी समस्या नहीं है, वे जो करना चाहें करें—वैसे भी हम तो इसके मुख्य प्रभारी हैं नहीं, इससे हमें क्या लेना-देना। समय आने पर हमें कोई जिम्मेदारी नहीं लेनी पड़ेगी; अगर कुछ होता भी है, तो उन्हें ही अपने सिर दोष लेना होगा", यह किस तरह का व्यवहार है? यह अपने कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता का न होना है। और अपने कर्तव्य के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं होना क्या परमेश्वर के घर के हितों के साथ धोखा करना नहीं है? यही यहूदा होना है! जब कोई मनमानी कर रहा हो, तो बहुत से लोगों का दृष्टिकोण यह रहता है कि वे हालात से समझौता कर लेते हैं और उसी के अनुसार ढल जाते हैं, इससे अपने कर्तव्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में कमी जाहिर होती है। तुम्हारा सामना किसी मसीह-विरोधी से होता है या किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो स्वच्छंदता से पेश आता है और तुम्हें गलत दृष्टिकोण का पालन करने के लिए मजबूर करने की कोशिश करता है, तो तुम्हें क्या करना चाहिए और कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए? तुम्हें ऐसा सिद्धांत चुनना चाहिए जहाँ तुम निरंतर उत्तर की खोज जारी रख सको। यदि तुम्हें लगता है कि तुम जो कर रहे हो उसमें और परमेश्वर के वचनों व कार्य व्यवस्थाओं के बीच न तो कोई टकराव है, न ही यह उनसे भटक रहा है, तो तुम्हें डटे रहना चाहिए। सत्य में दृढ़ता सही होती है; शैतान, बुरी ताकतों और दुष्ट लोगों के आगे हार मानकर समझौता कर लेना यहूदा का व्यवहार है, यह कुकर्म है और परमेश्वर के प्रति समर्पण की कमी को इंगित करता है। शैतान के साथ समझौता करना गंभीर मामला काम है!

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अजीब और रहस्यमय तरीके से व्यवहार करते हैं, वे स्वेच्छाचारी और तानाशाह होते हैं, वे कभी दूसरों के साथ संगति नहीं करते, और वे दूसरों को अपने आज्ञापालन के लिए मजबूर करते हैं' से उद्धृत

शुरू में लोग सत्य पर अमल करने को तैयार नहीं होते। उदाहरण के तौर पर, पूरे समर्पण भाव से कर्तव्यों के निर्वहन को ही लो। तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्यों को पूरा करने और परमेश्वर के प्रति वफादार होने की कुछ समझ है, और तुम उससे जुड़े सत्यों को समझते भी हो, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित कब होगे? नाम और कर्म में तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कब करोगे? इसमें प्रक्रिया की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम्हें कई कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है; शायद कुछ लोग तुम्हारे साथ निपटें, कुछ तुम्हारी आलोचना करें। सबकी आँखें तुम पर टिकी होंगी, तब तुम्हें एहसास होगा कि तुम गलत हो, तुम्हीं ने अच्छा काम नहीं किया, कर्तव्यों के निर्वहन में समर्पण की कमी को बर्दाश्त नहीं किया जाता, तुम लापरवाह या अन्यमनस्क नहीं हो सकते। पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता है और जब तुम भूल करते हो, तो वह तुम्हें फटकारता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम अपने बारे में कुछ बातें समझोगे और जानोगे कि तुम बहुत अपवित्र हो, तुम्हारे अंदर निजी इरादे भरे पड़े हैं, और अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय तुम्हारे अंदर बहुत सारी अनियंत्रित इच्छाएँ हैं। जब तुम इन चीज़ों के सार को समझ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के समक्ष आकर, उससे प्रार्थना करके सच्चा प्रायश्चित कर सकते हो; इस तरह तुम अशुद्धियों से मुक्त हो सकते हो। यदि इस तरह अपनी व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने के लिए तुम अक्सर सत्य की खोज करोगे, तो तुम आस्था के सही मार्ग पर कदम बढ़ा सकोगे। किसी इंसान का भ्रष्ट स्वभाव जितना शुद्ध किया जाएगा, उसका जीवन स्वभाव उतना ही रूपांतरित होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर तुमसे चाहे कुछ भी माँगे, तुम्हें अपनी पूरी ताकत के साथ केवल इस ओर काम करने की आवश्यकता है, और मुझे आशा है कि अंत में तुम परमेश्वर के समक्ष आने और उसे अपनी परम भक्ति प्रदान करने में सक्षम होगे। अगर तुम सिंहासन पर बैठे परमेश्वर की संतुष्ट मुसकराहट देख सकते हो, तो भले ही यह तुम्हारी मृत्यु का नियत समय ही क्यों न हो, आँखें बंद करते समय भी तुम्हें हँसने और मुसकराने में सक्षम होना चाहिए। पृथ्वी पर अपने समय के दौरान तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपना अंतिम कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए। अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उलटा लटका दिया गया था; परंतु तुम्हें अंत में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देनी चाहिए। एक सृजित प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? इसलिए तुम्हें जल्दी से अपने आपको परमेश्वर को सौंप देना चाहिए, ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार तुम्हारा निपटारा कर सके। अगर इससे परमेश्वर खुश और प्रसन्न होता हो, तो उसे अपने साथ जो चाहे करने दो। मनुष्यों को शिकायत के शब्द बोलने का क्या अधिकार है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 41' से उद्धृत

बरसों बीत जाने के बाद, शुद्धिकरण और ताड़ना की कठिनाइयाँ सहकर मनुष्य वैसा मजबूत हो गया है, जैसा मौसम की मार से हो जाता है। हालाँकि मनुष्य ने अतीत की "महिमा" और "रोमांस" खो दिया है, पर उसने अनजाने ही मानवीय आचरण के सिद्धांतों को समझ लिया है, और वह मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के वर्षों के समर्पण को समझ गया है। मनुष्य धीरे-धीरे अपनी बर्बरता से घृणा करने लगता है। वह अपनी असभ्यता से, परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की गलतफहमियों से और परमेश्वर से की गई अपनी सभी अनुचित माँगों से घृणा करने लगता है। समय को वापस नहीं लाया जा सकता। अतीत की घटनाएँ मनुष्य की खेदजनक स्मृतियाँ बन जाती हैं, और परमेश्वर के वचन और उसके प्रति प्रेम मनुष्य के नए जीवन में प्रेरक शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन-प्रतिदिन भरने लगते हैं, उसकी सामर्थ्य लौट आती है, और वह उठ खड़ा होता है और सर्वशक्तिमान के चेहरे की ओर देखने लगता है ... और यही पाता है कि परमेश्वर हमेशा मेरे साथ रहा है, और उसकी मुस्कान और उसका सुंदर चेहरा अभी भी भावोद्दीपक हैं। उसके हृदय में अभी भी अपने द्वारा सृजित मानवजाति के लिए चिंता रहती है, और उसके हाथ अभी भी उतने ही गर्मजोशी से भरे और सशक्त हैं, जैसे वे आरंभ में थे। यह ऐसा है, मानो मनुष्य अदन के बाग में लौट आया हो, लेकिन इस बार मनुष्य साँप के प्रलोभन नहीं सुनता और अब वह यहोवा के चेहरे से विमुख नहीं होता। मनुष्य परमेश्वर के सामने घुटने टेकता है, परमेश्वर के मुस्कुराते हुए चेहरे को देखता है, और उसे अपनी सबसे कीमती भेंट चढ़ाता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है' से उद्धृत

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