90. कलीसिया का एक अगुवा होने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के चुने हुए लोग जब परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना सीखें, तो उनकी अगुवाई करना, सत्य पर सहभागिता करना, समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करना, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना आवश्यक है;

(2) परमेश्वर के कार्य की सुरक्षा करना आवश्यक है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को मसीह-विरोधियों, दुष्ट लोगों, बुरी आत्माओं और शैतानी ताक़त के हर तौर-तरीके से होने वाले धोखे और उपद्रव से बचाओ;

(3) अपने सहकर्मियों के साथ सामंजस्य बैठाना आवश्यक है। हर समय, परमेश्वर के आदेश के प्रति वफ़ादार रहो, देह की रुचियों को एक तरफ़ कर देने में सक्षम बनो, और अपना निजी काम न करते रहो;

(4) नेतृत्व के सारभूत कार्य को समझना आवश्यक है। व्यक्ति को कभी भी उन कामों को नहीं करना चाहिए जिनका सत्य से कोई संबंध ही न हो, उससे भी कम उन्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों के मामलों में कोई हस्तक्षेप करना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

कलीसिया के अगुआ और कार्यकर्ता होने के नाते, अगर तुम लोग परमेश्वर के चुने लोगों का नेतृत्व वास्तविकता में करना चाहते हो और परमेश्वर के गवाहों के रूप में सेवा करना चाहते हैं, तो सबसे ज़रूरी है कि लोगों को बचाने में परमेश्वर के उद्देश्य और उसके कार्य के उद्देश्य की समझ तुम में होनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और लोगों से उनकी विभिन्न अपेक्षाओं को समझना चाहिए। तुम्हें अपने प्रयासों में व्यावहारिक होना चाहिए; केवल उतना ही अभ्यास करना चाहिए जितना तुम समझते हो और केवल उस पर ही बात करनी चाहिए जो तुम जानते हो। डींगें न मारें, बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोलें, और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ न करें। अगर तुम बढ़ा चढ़ा कर बोलोगे, तो लोग तुमसे घृणा करेंगे और तुम बाद में अपमानित महसूस करोगे; यह बहुत अधिक अनुचित होगा। जब तुम दूसरों को सत्य प्रदान करते हो, तो उनके सत्य प्राप्त कर लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि तुम उनसे निपटो या उन्हें फटकारो। अगर खुद तुम्हारे पास सत्य नहीं है, और तुम बस दूसरों से निपटते और फटकारते हो, तो वे तुमसे डरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सत्य को समझ जाते हैं। कुछ प्रशासनिक कार्यों में, दूसरों से निपटना और उन्हें काँटना-छाँटना और उन्हें एक हद तक अनुशासित करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर तुम सत्य प्रदान नहीं कर सकते हो और केवल यह जानते हो कि रोबदार कैसे बनें और दूसरों का तिरस्कार कैसे करें, तो तुम्हारा भ्रष्टाचार और भद्दापन प्रकट हो जाएगा। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे लोग तुमसे जीवन या व्यावहारिक चीजों का पोषण प्राप्त करने में असमर्थ हो जाएंगे, वे तुमसे नफ़रत करने लगेंगे, तुमसे घृणा महसूस करने लगेंगे। जिन लोगों में विवेक की कमी होती है वे तुम से नकारात्मक चीजें सीखेंगे; वे दूसरों से निपटना, उन्हें काँटना-छाँटना, गुस्सा होना और अपना आपा खोना सीखेंगे। क्या यह दूसरों को पौलुस के मार्ग, विनाश की तरफ जाने वाले मार्ग पर ले जाने के समान नहीं है? क्या यह शैतान वाला काम नहीं है? तुम्हारा कार्य सत्य के प्रसार और दूसरों को जीवन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अगर तुम आँख बंद करके दूसरों से निपटते हो और उन्हें उपदेश देते हो, तो वे कभी भी सत्य को कैसे समझ पाएंगे? जैसे-जैसे समय बीतेगा, लोग देखेंगे कि तुम वास्तव में क्या हो, और वे तुम्हारा साथ छोड़ देंगे। तुम इस तरह से दूसरों को परमेश्वर के समक्ष लाने की आशा कैसे कर सकते हो? यह कार्य करना कैसे हुआ? अगर तुम इसी तरह से कार्य करते हो तो तुम सभी लोगों को खो दोगे। तुम आखिर किस काम को पूरा करने की आशा करते हो? कुछ अगुवे समस्याओं के समाधान के लिए सत्य का संचार करने में बिलकुल असमर्थ होते हैं। इसके बजाय, वे बस आँख मूंदकर दूसरों को निपटारा करते हैं और अपनी शक्ति का दिखावा करते है जिससे दूसरे उनसे डरने लगें और उनका कहा मानें—ऐसे लोग झूठे अगुवाओं और मसीह-विरोधियों के होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव नहीं बदले हैं, वे कलीसिया का काम करने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है' से उद्धृत

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे। तुम सभी जिनका अनुभव इस क्षेत्र में अभी तक सीमित है, तुम्हारे विचार तुम्हारे कार्य को और अधिक दूषित करेंगे। कभी-कभी, हो सकता है कि तुम पवित्र आत्मा से आए, अपने भीतर के प्रबोधन और मार्गदर्शन को न समझ पाओ; और कभी, ऐसा लगता है कि तुम इसे समझ गये हो परन्तु संभव है कि तुम इसकी अनदेखी कर दो। तुम हमेशा मानवीय रीति से सोचते या निष्कर्ष निकालते हो, जैसा तुम्हें उचित लगता है वैसा करते हो और पवित्र आत्मा के इरादों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हो। तुम अपने विचारों के अनुसार अपना कार्य करते हो, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन को एक किनारे कर देते हो। ऐसी स्थितियां अक्सर होती हैं। पवित्र आत्मा का आन्तरिक मार्गदर्शन बिल्कुल भी लोकोत्तर नहीं है; वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है। यानी, अपने दिल की गहराई में तुम जानते हो कि कार्य करने का यही उपयुक्त और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार वास्तव में बहुत ही स्पष्ट है; यह तुम्हारी गंभीर सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि एक तरह की भावना है जो तुम्हारे भीतर से निकली है, और कभी-कभी तुम पूरी तरह से नहीं समझ पाते कि तुम इस तरह से कार्य क्यों करते हो। यह पवित्र आत्मा का प्रबोधन ही होता है, अधिकांश लोगों में आम तौर पर यह ऐसे ही घटित होता है। इंसान के अपने विचार अक्सर सोच और चिंतन का परिणाम होते हैं और उनमें उनकी मनमानी और उन विचारों की मिलावट होती है जो इससे जुड़े होते हैं कि ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिनमें आत्म-लाभ ढूँढा जा सकता है, और कौन-से निजी फायदे प्राप्त किए जा सकते हैं; हर इंसानी निर्णय में इन बातों का समावेश होता है। लेकिन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी कोई मिलावट नहीं होती। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रबोधन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत आवश्यक है; विशेषकर तुम्हें मुख्य विषयों में बहुत सावधान रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो अपना दिमाग लगाना पसंद करते हैं, जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसंद करते हैं, बहुत संभव है कि वे ऐसे मार्गदर्शन और प्रबोधन में चूक जाएँ। उपयुक्त अगुआ और कर्मी पवित्र आत्मा के कार्य पर ध्यान देते हैं। ऐसे लोग जो लोग पवित्र आत्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बिना थके सत्य खोजते हैं। परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिये और सही ढंग से उसकी गवाही देने के लिये व्यक्ति को अपने कार्य में मिलावटी तत्वों व इरादों की जाँच करनी चाहिये, और फिर यह देखने का प्रयास करना चाहिये कि कार्य इंसानी विचारों से कितना प्रेरित है, और कितना पवित्र आत्मा के प्रबोधन से उत्पन्न हुआ है, और कितना परमेश्वर के वचन के अनुसार है। तुम्हें निरन्तर और सभी परिस्थितियों में अपनी कथनी और करनी की जाँच करते रहना चाहिये। अक्सर इस तरह का अभ्यास करना तुम्हें परमेश्वर की सेवा के लिये सही रास्ते पर ले जाएगा। परमेश्वर के इरादों के अनुरूप उसकी सेवा करने के लिए, अनेक सत्यों का होना आवश्यक है। सत्य को समझकर ही लोग भेद करने के काबिल बनते हैं और वे यह पहचानने के योग्य होते हैं कि उनके अपने विचारों से क्या उत्पन्न होता है और उन चीज़ों को भी पहचान पाते हैं जो उनकी प्रेरणा की ओर संकेत करती हैं। वे मानवीय अशुद्धता को पहचानने के योग्य हो जाते हैं, और यह भी पहचान पाते हैं कि सत्य के अनुसार कार्य करना क्या होता है। तभी वे जान पाएंगे कि और अधिक शुद्धता से समर्पण कैसे करें। सत्य के बिना लोगों के लिए भेद कर पाना असंभव है। एक नासमझ व्यक्ति शायद आजीवन परमेश्वर पर विश्वास करे, लेकिन यह नहीं समझ पाता कि अपनी भ्रष्टता को प्रकट करने का क्या अर्थ होता है या परमेश्वर का विरोध करने का क्या अर्थ होता है, क्योंकि वह सत्य नहीं समझता; उसके मन में वह विचार ही मौजूद नहीं है। सत्य बेहद निम्न क्षमता के लोगों की पहुँच से बाहर होता है; तुम उनके साथ किसी भी प्रकार से संगति करो, फिर भी वे नहीं समझते। ऐसे लोग संभ्रमित होते हैं। इस प्रकार के संभ्रमित लोग परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते; वो छोटी-मोटी सेवा ही कर सकते हैं। परमेश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को करने के लिए, इन दो सिद्धांतों को समझना आवश्यक है। ऊपर से दिए गये कार्य के प्रबंधनों का पालन कड़ाई से करना होगा, और पवित्र आत्मा के किसी भी मार्गदर्शन का पालन करने पर ध्यान देना होगा। जब इन दोनों सिद्धांतों को समझ लिया जाएगा, तभी कार्य प्रभावशाली होगा और परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्टि मिलेगीl

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

मनुष्य की परमेश्वर की सेवा में सबसे बड़ी वर्जना क्या है? क्या तुम लोग जानते हो? जो अगुवाओं के रूप में सेवा करते हैं वे हमेशा अधिक चतुरता प्राप्त करना चाहते हैं, बाकी सब से श्रेष्ठ बनना चाहते हैं, नई तरकीबें पाना चाहते हैं ताकि परमेश्वर देख सके कि वे वास्तव में कितने सक्षम हैं। हालाँकि, वे सत्य को समझने और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं। वे हमेशा दिखावा करना चाहते हैं; क्या यह निश्चित रूप से एक अहंकारी प्रकृति का प्रकटन नहीं है? कुछ तो यह भी कहते हैं: "ऐसा करके मुझे विश्वास है कि परमेश्वर बहुत प्रसन्न होगा; वह वास्तव में इसे पसंद करेगा। इस बार मैं परमेश्वर को देखने दूँगा, उसे एक अच्छा आश्चर्य दूँगा।" इस आश्चर्य के परिणामस्वरूप, वे पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हैं और परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाते हैं। जो कुछ भी तुम्हारे मन में आता है उसे उतावलेपन में न करें। यदि तुम कृत्यों के परिणामों पर विचार नहीं करते हो तो यह ठीक कैसे हो सकता है? जब तुम परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करते हो और उसके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करते हो, और तब हटा दिए जाते हो, तो तुम्हारे पास कहने के लिये कुछ नहीं बचा होगा। तुम्हारे अभिप्राय पर ध्यान दिए बिना, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तुम जानबूझकर ऐसा करते हो या नहीं, यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते हो या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो, तो तुम आसानी से परमेश्वर को अपमानित करोगे और आसानी से उसके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे: इस चीज़ को लेकर प्रत्येक को सतर्क रहना चाहिए। एक बार जब तुम ईश्वर के प्रशासनिक आदेशों का गंभीरता से अपमान करते हो या परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करते हो, तो परमेश्वर यह विचार नहीं करेगा कि तुमने इसे जानबूझकर किया या अनजाने में; इस चीज़ को तुम्हें स्पष्ट रूप से अवश्य देखना चाहिए। यदि तुम इस मुद्दे को समझ नहीं कर सकते हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से समस्या होनी ही है। परमेश्वर की सेवा करने में, लोग महान प्रगति करना, महान कार्यों को करना, महान वचनों को बोलना, महान कार्य निष्पादित करना, बड़ी-बड़ी पुस्तकें मुद्रित करना, महान बैठकें आयोजित करना और महान अगुवा बनना चाहते हैं। यदि तुम हमेशा उच्च महत्वाकांक्षाएँ रखते हो, तो तुम परमेश्वर के महान प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे; इस तरह के लोग शीघ्र ही मर जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर की सेवा में ईमानदार, खरे, धर्मनिष्ठ या विवेकशील नहीं हो, तो तुम कभी न कभी परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो वह निष्कासन की वस्तु बन जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

अगुवाओं और कार्यकर्ताओं की श्रेणी के लोगों के उद्भव के पीछे क्या कारण है और उनका उद्भव कैसे हुआ? एक विराट स्तर पर वे परमेश्वर के कार्य के लिए आवश्यक हैं, जबकि अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर वे भाइयों और बहनों के लिए आवश्यक हैं, और वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए आवश्यक हैं, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। उनकी कद-काठी और पहचान चाहे कुछ भी हो, और चाहे वे कोई भी भूमिका निभा रहे हों, पर लोगों की इस श्रेणी में ऐसी कौनसी बात है जो सभी लोगों से मिलती-जुलती है? परमेश्वर के सामने उनकी पहचान और उनकी कद-काठी बिल्कुल वही है जो अन्य सभी लोगों की है। हालांकि लोगों के बीच वे "अगुआ" और "कार्यकर्ता" के नाम से जाने जाते हैं, और हालांकि उनके कर्तव्य अन्य भाइयों और बहनों से भिन्न हैं, पर परमेश्वर के सामने वे सृजित प्राणी ही हैं और उनकी यह पहचान कभी नहीं बदलेगी। उनके और अन्य लोगों के कर्तव्यों में जो अंतर है, वह उनके एक विशिष्ट गुण से जुड़ा हुआ मामला है। यह विशिष्ट गुण क्या है? इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है "अगुआई"। उदाहरण के लिए, मान लो कि लोगों का एक समूह है जिसकी अगुआई एक व्‍यक्ति कर रहा है; अगर इस व्‍यक्ति को "अगुआ" या "कार्यकर्ता" कहा जाता है, तो समूह के अंदर इनका कार्य क्‍या है? (अगुआई का कार्य।) इस व्‍यक्ति की अगुआई का उन लोगों पर जिनकी वह अगुआई कर रहा है और कुल मिलाकर पूरे समूह पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? वह समूह की दिशा और उसके मार्ग को प्रभावित करता है। इसका निहितार्थ यह है कि अगर अगुआ के पद पर आसीन यह व्‍यक्ति गलत मार्ग पर चलता है, तो इसके कारण, बिल्कुल कम-से-कम, उसके नीचे के लोग और पूरा समूह सही मार्ग से हट जाएगा; इससे भी अधिक, यह आगे बढ़ते हुए उस पूरे समूह की दिशा, साथ ही उसकी गति और चाल को बाधित कर सकता है या पूरी तरह रोक सकता है। इसलिए जब लोगों के इस समूह की बात आती है, तब उनके द्वारा चुने गए मार्ग की दिशा, सत्‍य की उनकी समझ की सीमा और साथ ही परमेश्‍वर में उनका विश्‍वास न सिर्फ़ स्वयं उनको, बल्कि उनकी अगुआई के दायरे के भीतर सभी भाइयों और बहनों को प्रभावित करता है। अगर अगुआ सही व्‍यक्ति है, ऐसा व्‍यक्ति जो सही मार्ग पर चल रहा है और सत्‍य का अनुसरण और अभ्‍यास करता है, तो उसकी अगुआई में चल रहे लोग अच्छी तरह खाएँगे और पिएँगे और अच्छी तरह तलाश करेंगे, और, साथ ही साथ, अगुआ की व्यक्तिगत प्रगति दूसरों को निरंतर दिखाई देगी। तो, वह सही मार्ग क्‍या है जिस पर अगुआ को चलना चाहिए? यह है दूसरों को सत्‍य की समझ और सत्‍य में प्रवेश की ओर ले जाने, और दूसरों को परमेश्‍वर के समक्ष ले जाने में समर्थ होना। गलत मार्ग क्‍या है? यह है बार-बार स्वयं अपने को ऊँचा उठाना और स्वयं अपनी गवाही देना, प्रतिष्‍ठा, प्रसिद्धि तथा लाभ के पीछे भागना, और कभी भी परमेश्‍वर की गवाही न देना। इसका उनके नीचे के लोगों पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? (यह उन लोगों को उनके समक्ष ले आता है।) लोग भटककर परमेश्‍वर से दूर चले जाएँगे और इस अगुआ के नियंत्रण में आ जाएँगे। क्‍या यह ज़ाहिर-सी बात नहीं है कि अपने अगुआ के समक्ष लाए गए लोग उस अगुआ से ही नियंत्रित होंगे? और, निस्संदेह, यह उन्‍हें परमेश्वर से दूर ले जाता है। अगर तुम लोगों को अपने समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करते हो, तो तुम उन्‍हें भ्रष्‍ट मनुष्यजाति के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई कर रहे हो, और तुम उन्‍हें परमेश्‍वर के समक्ष नहीं, शैतान के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई कर रहे हो। लोगों को सत्‍य के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करना ही उन्‍हें परमेश्‍वर के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करना है। यही वे प्रभाव हैं जो उन दो प्रकार के लोगों—वे जो सही मार्ग पर चलते हैं और वे जो गलत मार्ग पर चलते हैं—पर पड़ते हैं, जिनकी अगुआई की जाती है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (1)' से उद्धृत

उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें कलीसिया के अगुआ के रूप में चुना गया है, तो अगुआई करना तुम्हारा कर्तव्य है—अगर तुम इसे अपना कर्तव्य मानते हो तो तुम्हें इसे कैसे करना चाहिए? (परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप।) परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार काम करना इसे कहने का एक आम तरीका है। इसका खास ब्यौरा क्या है? सबसे पहले, तुम्हें यह मालूम होना चाहिए कि यह एक कर्तव्य है, यह कोई ओहदा नहीं है। अगर तुम सोचोगे कि तुम्हें एक ओहदा मिल गया है तो इससे समस्याएँ पैदा हो जाएँगी। लेकिन अगर तुम लोग कहते हो, "मुझे कलीसिया के अगुआ के रूप में चुना गया है, इसलिए मुझे दूसरों से एक दर्जा नीचे रहने की जरूरत; तुम सब मुझसे ऊपर हो और मुझसे बड़े हो," तो यह भी एक गलत रवैया है; अगर तुम सत्य को नहीं समझते हो तो कितना भी दिखावा करने से तुम्हारा कोई भला नहीं होगा। तुम्हें सत्य की सही समझ होनी चाहिए। सबसे पहले, तुम लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि यह कर्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है। किसी कलीसिया के दर्जनों सदस्य होते हैं, और तुम्हें यह सोचना होगा कि इन लोगों को परमेश्वर के सामने कैसे लाया जाए और इनमें से बहुसंख्यक लोगों को सत्य को समझने और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने के योग्य कैसे बनाया जाए। इसके साथ ही, कमजोर और ढीले लोगों के मामले में तुम्हें उन्हें उनकी कमजोरी और ढीलेपन से मुक्ति दिलाने का प्रयास करना होगा, ताकि वे सक्रिय रूप से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें, और जो लोग अपने कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम हैं, तुम्हें उन्हें पूरे मनोयोग से इनका पालन करने में सक्षम बनाना होगा। उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने से जुड़े सत्यों को समझाओ, ताकि वे उनका पालन करने में कोई ढील न बरतें और उन्हें अच्छी तरह से संपन्न करें, और परमेश्वर के साथ एक सामान्य सम्बंध बना सकें। ऐसे लोग भी होते हैं जो विघ्न और व्यवधान डालते हैं, या जो वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं पर एक दुष्ट मानवता रखते हैं; इन लोगों मे से जिनका निपटारा होना है उनका निपटारा होगा, और जिनका शुद्धिकरण होना है उनका शुद्धिकरण होगा। हर व्यक्ति के लिए उसकी किस्म के अनुसार उपयुक्त व्यवस्थाएँ की जाएँगी। यह भी महत्वपूर्ण है कि जो थोड़े-से अपेक्षाकृत भली मानवता वाले लोग कलीसिया में आते हैं, जिनमें कुछ क्षमता होती है, जो किसी काम के एक पहलू की जिम्मेदारी ले सकते हैं, उन सबको भी विकसित करने की जरूरत है। ये काम अगुआई के कर्तव्य पूरे करने के लिए किए जाने चाहिए, है न? जब तुमने इस कर्तव्य को स्वीकार कर लिया है, तो क्या तुम अपने दिल में इन चीजों के बिना उसे ठीक से पूरा कर सकते हो? (नहीं।) एक बार जब तुम इस कर्तव्य को स्वीकार कर लेते हो, तो तुम्हें एक-एक करके इन मामलों को स्पष्ट करना चाहिए : पहला, प्रतिभा का संवर्धन करना; दूसरा, अपने सभी भाई-बहनों के जीवन में प्रवेश को सामान्य बनाना एवं सत्य और धर्मोपदेशों को सुनकर बनी तुम्हारी समझ के आधार पर, इन सभी को इन सत्य-वास्तविकताओं में प्रवेश करने में सक्षम बनाना-यह जीवन में प्रवेश का पहलू है; तीसरा, उन लोगों में से अधिकांश जो अपने कर्तव्य पूरा करने में सक्षम हैं, उनसे वास्तव में ऐसा कराना और सुनिश्चित करना कि उनके कर्तव्यों का निर्वहन फूहड़ ढंग से न हो बल्कि परिणाम उत्पन्न करे; चौथा, व्यवधान और गड़बड़ी पैदा करने वालों का समयबद्ध प्रबंधन और उनकी सीमाएँ तय करना; और पांचवां, सभी प्रकार के लोगों को समझने में सक्षम होना, जो आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों की नकारात्मकता और कमजोरी अस्थायी होती हैं; तुम उनके मामलों का निपटारा और उनके साथ उसी तरह का व्यवहार एवं उनका प्रबंधन नहीं कर सकते, जिस प्रकार तुम पुरानी नकारात्मकता और कमजोरी का करते हो। तुम्हें हर व्यक्ति का अधिकतम उपयोग करना होगा, उनकी व्यक्तिगत क्षमताओं का पूरा-पूरा लाभ उठाना होगा और उनकी योग्यता के अनुसार उनके लिए उपयुक्त जिम्मेदारियाँ तय करनी होंगी, उनकी क्षमता का स्तर क्या है, उनकी उम्र क्या है, वे कितने समय से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं। तुम्हें हर किस्म के व्यक्ति के लिए उसके अनुकूल एक साँचे में ढली योजना बनानी होगी, जो हर व्यक्ति के अनुसार बदलती रहेगी, ताकि वे परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकें और अपने कार्यों को अधिकतम ऊंचाई तक ले जा सकें। यदि तुम्हारे दिल में ये बातें हैं, तो तुम्हारा दायित्व बढ़ गया है, इसलिए तुम्हें हमेशा ध्यान देना चाहिए और चौकस रहना चाहिए। चौकसी किस बात की? इसका अर्थ यह देखना नहीं है कि कौन सुंदर है और फिर उस व्यक्ति के साथ बातचीत में अधिक समय व्यतीत करना, न ही इसका अर्थ यह देखना है कि कौन बदसूरत है और फिर उस व्यक्ति को अस्वीकार कर देना, इसका अर्थ यह देखना तो बिल्कुल नहीं है कि कौन तुम्हारी अवहेलना करता है और फिर उसे दंडित करना। दरअसल, इसका अर्थ यह देखना है कि प्रत्येक व्यक्ति से परमेश्वर की क्या अपेक्षाएँ हैं, फिर उनमें से प्रत्येक को उसका उचित स्थान दिलाना। पहले तो, अपने मन में सोचो कि कलीसिया में इन लोगों को कैसे व्यवस्थित करना है; अच्छी काबिलियत के लोगों को एक क्रम में व्यवस्थित करो और खराब काबिलियत वालों को दूसरे में। ऐसे लोगों के लिए अलग-अलग श्रेणियां बनाओ, जो स्वयं को अपने कर्तव्यों के लिए पूरे समय, अंशकालिक या बिल्कुल भी समर्पित नहीं कर सकते और उन लोगों की एक अलग श्रेणी बनाओ जो निरंतर रुकावट डालते हैं, हमेशा निराश रहते हैं और जो निरंतर अफवाहें फैलाते रहते हैं। उसके बाद तुम्हें बार-बार चिंतन और प्रार्थना करनी चाहिए और फिर इन लोगों से बातचीत करनी चाहिए। कुछ समय बाद, तुम्हें प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के आध्यात्मिक कद की विभिन्न दशाओं और स्तर के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त हो जाएगी। यह एक दायित्व से उत्पन्न होता है, है न? क्या यह तुम्हारे कर्तव्य के प्रति सही रवैया नहीं है? एक बार जब तुम ऐसा उचित दृष्टिकोण बना लेते हो और तुम्हारा दायित्व स्पष्ट हो जाता है, तो तुम अपना कार्य अच्छे से कर पाओगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

कलीसिया के अगुवाओं को इस बारे में सभी भाई-बहनों की अगुवाई करने में सक्षम होना चाहिए कि वे परमेश्वर के वचन को कैसे खाएँ-पिएँ। यह सभी कलीसिया के अगुवाओं की जिम्मेवारी है। वे चाहे युवा हों या वृद्ध, सभी को परमेश्वर के वचन को खाने-पीने को महत्व देना चाहिए और उन वचनों को अपने हृदय में रखना चाहिए। यदि तुम इस वास्तविकता में प्रवेश कर लेते हो तो तुम राज्य के युग में प्रवेश कर लोगे। आजकल बहुत से लोग हैं जो महसूस करते हैं कि वे परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना नहीं रह सकते, और महसूस करते हैं कि समय के निरपेक्ष परमेश्वर का वचन नया है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य सही मार्ग पर चलना आरंभ कर रहा है। परमेश्वर मनुष्यों में काम करने और उनकी आपूर्ति करने के लिए वचन का उपयोग करता है। जब सभी लोग परमेश्वर के वचन की लालसा और प्यास रखते हैं तो मानवजाति परमेश्वर के वचन के संसार में प्रवेश करती है।

परमेश्वर बहुत सारी बातें कह चुका है। तुम कितना जान पाए हो? तुम उनमें कितना प्रवेश कर पाए हो? यदि कलीसिया के अगुवाओं ने भाइयों और बहनों को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में अगुवाई नहीं की है तो वे अपने कर्तव्य-पालन में चूक गए हैं और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल हुए हैं! चाहे तुम्हारी समझ गहन हो या सतही, तुम्हारी समझ के स्तर की परवाह किए बिना, तुम्हें अवश्य ज्ञात होना चाहिए कि उसके वचनों को कैसे खाया और पिया जाए, तुम्हें उसके वचनों की ओर बहुत ध्यान अवश्य देना चाहिए और उन्हें खाने-पीने के महत्व और उसकी आवश्यकता को समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग ईश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें उन अनेक स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य से पैदा होती हैं। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज़्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य के सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या "भैंस के आगे बीन बजाने" की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाइयाँ हल करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, और तुम्हें समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर की सेवा में समन्वय करने योग्य है।

तुम प्रमुख मुद्दों को समझने और बहुत-सी चीजों को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो पाते हो या नहीं, यह तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों पर निर्भर करता है। जिस तरीके से तुम अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम अन्य लोगों की अगुआई भी करते हो। यदि तुम शब्द और सिद्धांत ही समझते हो, तो तुम दूसरों को भी शब्द और सिद्धांत समझने के लिए ही प्रेरित करोगे। तुम जिस तरीके से परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता का अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम दूसरों को परमेश्वर के कथनों की वास्तविकता में प्रवेश कराने के लिए उनकी अगुआई करोगे। यदि तुम बहुत-से सत्यों को समझते हो और परमेश्वर के वचनों से कई चीज़ों में स्पष्ट रूप से अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लेते हो, तो तुम दूसरों को भी बहुत-से सत्य समझाने के लिए उनका नेतृत्व कर पाने में सक्षम हो, और जिन लोगों का तुम नेतृत्व कर रहे हो, उन्हें दर्शनों की स्पष्ट समझ होगी। यदि तुम अलौकिक भावनाओं को समझने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम जिन लोगों का नेतृत्व करते हो, वे भी वैसा ही करेंगे। यदि तुम अभ्यास की उपेक्षा करते हो और उसके बजाय चर्चा पर ज़ोर देते हो, तो जिन लोगों का तुम नेतृत्व करते हो, वे भी बिना कोई अभ्यास किए, या बिना अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन लाए, चर्चा पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे; वे बिना किसी सत्य का अभ्यास किए, केवल सतही तौर पर उत्साहित होंगे। सभी लोग दूसरों को वही देते हैं, जो उनके पास होता है। व्यक्ति जिस प्रकार का होता है, उसी से वह मार्ग निर्धारित होता है, जिस पर वह दूसरों का मार्गदर्शन करता है, और साथ ही उन लोगों का प्रकार भी, जिनका वह नेतृत्व करता है। परमेश्वर के उपयोग हेतु वास्तव में उपयुक्त होने के लिए, तुम्हारे भीतर न केवल आकांक्षा होनी चाहिए, बल्कि तुम्हें बड़ी मात्रा में परमेश्वर की प्रबुद्धता, परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन, परमेश्वर द्वारा निपटाए जाने का अनुभव, और उसके वचनों के शुद्धिकरण की भी आवश्यकता है। एक नींव के रूप में इसके साथ, साधारण समय में, तुम लोगों को अपने अवलोकनों, विचारों, चिंतनों और निष्कर्षों पर ध्यान देना चाहिए, और तदनुसार आत्मसात या उन्मूलन करने में संलग्न होना चाहिए। ये सभी तुम लोगों के वास्तविकता में प्रवेश करने के रास्ते हैं, और इनमें से प्रत्येक अनिवार्य है। परमेश्वर इसी तरह काम करता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य करने की पद्धति में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे पास हर दिन उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर हो सकते हैं। और किसी भी समय, चाहे तुम्हारा वातावरण कठोर हो या अनुकूल, चाहे तुम्हारी परीक्षा ली जा रही हो या तुम्हें प्रलोभन दिया जा रहा हो, चाहे तुम काम कर रहे हो या नहीं कर रहे हो, चाहे तुम एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हो या किसी समूह के अंग के रूप में, तुम्हें हमेशा परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर मिलेंगे और तुम उनमें से किसी एक को भी कभी नहीं चूकोगे। तुम उन सभी को खोज पाने में सक्षम होगे—और इस तरह तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का रहस्य पा लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक योग्य चरवाहे को किन चीज़ों से लैस होना चाहिए' से

आज तुम लोगों से—सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने की अपेक्षा करना—उस सेवा के समान है जिसकी अपेक्षा यहोवा इस्राएलियों से करता था : अन्यथा, सेवा करना बंद कर दो। चूँकि तुम ऐसे लोग हो जो सीधे परमेश्वर की सेवा करते हैं, तुम्हें कम से कम अपनी सेवा में वफ़ादारी और समर्पण में सक्षम होना चाहिये। साथ ही, तुम्हें एक व्यावहारिक तरीके से सबक सीखने में भी सक्षम होना चाहिये। खास तौर पर, तुम में से उन लोगों के लिये जो कलीसिया में काम करते हैं, क्या तुम्हारे अधीन काम करने वाले भाई-बहनों में से कोई भी तुम लोगों से निपटने की हिम्मत कर पाता है? क्या कोई भी तुम्हारे सामने तुम्हारी गलतियों के बारे में तुम्हें बताने की हिम्मत कर पाता है? तुम लोग बाकी सभी लोगों के ऊपर खड़े हो; तुम राजाओं की तरह शासन करते हो! तुम लोग तो इस तरह के व्यवहारिक सबकों का अध्ययन भी नहीं करते हो, न ही इनमें प्रवेश करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर की सेवा करने की बात करते हो! वर्तमान में, तुम्हें कई कलीसियाओं की अगुवाई करने के लिए कहा जाता है, लेकिन न केवल तुम खुद का त्याग नहीं करते, बल्कि तुम अपनी ही धारणाओं और विचारों से चिपके भी रहते हो और इस तरह की बातें कहते हो, "मुझे लगता है यह काम इस तरह से किया जाना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने कहा है कि हमें दूसरों के नियंत्रण में नहीं रहना चाहिए और आजकल हमें आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करना चाहिये।" इसलिए, तुम में से हर कोई अपनी राय पर अड़ा रहता है और कोई भी एक दूसरे की बात नहीं मानता है। हालाँकि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि तुम्हारी सेवा एक विकट स्थिति में पहुँच गयी है, फिर भी तुम कहते हो, "मेरे हिसाब से, मेरा रास्ता बहुत गलत नहीं है। जो भी हो, हम में से हर एक का अपना पक्ष होता है : तुम अपनी बात करो और मैं अपनी बात करूँगा; तुम अपने दर्शनों के बारे में सहभागिता करो और मैं अपने प्रवेश की बात करूँगा।" तुम कभी भी ऐसी किसी चीज़ की जिम्मेदारी नहीं लेते हो जिनका निपटारा किया जाना चाहिये या तुम बस लापरवाही से काम करते हो, तुम में से हर कोई अपनी ही राय व्यक्त करता है और दिमाग लगाकर अपने ही रुतबे, प्रतिष्ठा और साख को बचाने में लगा रहता है। तुम में से कोई भी विनम्र बनने का इच्छुक नहीं है और कोई भी पक्ष पीछे हटने और एक दूसरे की कमियों को दूर करने की पहल नहीं करेगा, ताकि जीवन ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ सके। जब तुम लोग साथ मिलकर समन्वय करते हो, तो तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम कह सकते हो, "मुझे सत्य के इस पहलू की स्पष्ट समझ नहीं है। तुम्हें इसके साथ क्या अनुभव हुआ है?" या तुम लोग शायद कहो, "इस पहलू के संबंध में तेरा अनुभव मुझसे अधिक है; क्या तू कृपा करके मुझे कुछ मार्गदर्शन दे सकता है?" क्या यह एक अच्छा तरीका नहीं होगा? तुम लोगों ने ढेर सारे उपदेश सुने होंगे, और सेवा करने के बारे में तुम सबको कुछ अनुभव होगा। अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिये ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। इसके अलावा, तुम लोगों को किसी भी चीज़ के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले, उसके बारे में ध्यान से सहभागिता करनी चाहिये। सिर्फ़ ऐसा करके ही तुम लापरवाही से काम करने के बजाय कलीसिया की जिम्मेदारी उठा सकते हो। सभी कलीसियाओं में जाने के बाद, तुम्हें एक साथ इकट्ठा होकर उन सभी मुद्दों और समस्याओं के बारे में सहभागिता करनी चाहिये जो अपने काम के दौरान तुम्हें पता चली हैं; फिर तुम्हें उस प्रबुद्धता और रोशनी के बारे में बात करनी चाहिये जो तुम्हें प्राप्त हुई हैं—यह सेवा का एक अनिवार्य अभ्यास है। परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिये और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिये, तुम लोगों को सद्भावपूर्ण सहयोग करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिये, एक दूसरे में सुधार करके कार्य का बेहतर परिणाम हासिल करना चाहिये, ताकि परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखा जा सके। सच्चे सहयोग का यही मतलब है और जो लोग ऐसा करेंगे सिर्फ़ वही सच्चा प्रवेश हासिल कर पाएंगे। सहयोग करते समय, तुम्हारे द्वारा बोली गई कुछ बातें अनुपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इनके बारे में बाद में सहभागिता करो, और इनके बारे में अच्छी समझ हासिल करो, इन्हें अनदेखा मत करो। इस तरह की सहभागिता करने के बाद, तुम अपने भाई-बहनों की कमियों को दूर कर सकते हो। केवल इस तरह से अपने काम की अधिक गहराई में उतर कर ही तुम बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हो। तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, अपने हर काम में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये। हमेशा एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश करते हुए, अकेले काम करना अस्वीकार्य है। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के योग्य नहीं हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

कलीसिया के दो अगुवाओं की कार्य-संबंधी जिम्मेदारियाँ

1. कलीसिया के अगुवाओं को परमेश्वर के चुने हुए लोगों का मार्गदर्शन करना चाहिए कि कैसे वे परमेश्वर के वचनों को खाएँ और पीएँ, सत्य पर सहभागिता करें, स्वयं को जानें, और अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभावों का विश्लेषण करें, ताकि वे स्वयं अपनी ही भ्रष्टता के सच्चे चेहरे को देख सकें, और सच्चा पश्चाताप कर सकें।

2. कलीसिया के अगुवाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोग कलीसियाई जीवन जीते हुए सामान्य रूप से परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में और सत्य पर सहभागिता करने में सक्षम हैं, और वे अविश्वासियों या दुष्टों से धोखा न खाएँ या उनसे परेशान न हों, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग क्रमशः सत्य को समझ सकें और कलीसिया का जीवन जीते हुए अपने जीवन में प्रगति कर सकें।

3. कलीसिया के अगुवाओं को उन लोगों को चुनने, सँवारने और प्रशिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो अच्छी मानवता और योग्यता वाले हैं और जो सत्य से प्रेम करते हैं, ताकि वे क्रमशः सत्य को समझ सकें, परमेश्वर की इच्छा के प्रति जागरूक रहें, अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें, और जल्द परमेश्वर द्वारा सौंपे गए आदेश का भार उठा सकें।

4. कलीसिया के अगुवाओं को कलीसिया में उन लोगों को विवेकपूर्ण ढंग से जानने और पहचानने में सक्षम होना चाहिए जो सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, वे लोग जो केवल परमेश्वर का आशीर्वाद पाने के लिए उस पर विश्वास करते हैं, जो केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने की परवाह करते हैं, और जो सत्य से घृणा करते हैं, सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे जो केवल प्रसिद्धि, लाभ और पद की तलाश करते हैं, जो पद के सौभाग्य की कामना तो करते हैं परन्तु जो परमेश्वर की इच्छा के प्रति जागरूक नहीं हैं, और जो वास्तव में परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन नहीं करते हैं। कलीसिया के अगुवाओं को विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ अपने व्यवहार में बुद्धिमान होना चाहिए। उन्हें उन लोगों को सिंचित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं। उन्हें यह भी सीखना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिभा और शक्तियों का अधिकतम लाभ उठाने के लिए लोगों की योग्यता और शक्तियों के आधार पर उपयुक्त कर्तव्यों को कैसे सौंपा जाए, ताकि वे अपना कर्तव्य निभाने के लिए और प्रभावी होने के लिए अपनी पूरी कोशिश कर सकें।

5. कलीसिया के अगुवाओं को परमेश्वर के कार्य को बनाए रखना चाहिए और इसमें गड़बड़ी पैदा होने और इसे बाधित होने नहीं देना चाहिए। यदि कलीसिया में ऐसे दुष्ट लोगों या गैर-विश्वासियों का पता चलता है जो गुटबंदी कर रहे हैं और धारणाएँ और नकारात्मकता फैला रहे हैं, जिससे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धोखा दिया जा रहा है और नियंत्रण में लिया जा रहा है, तो यह कलीसिया के अगुवाओं की जिम्मेदारी बन जाती है कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सत्य पर सहभागिता की व्यवस्था करें और इन दुष्ट लोगों के काम और आचरण को समझने का अभ्यास करें। अगर, कभी-कभार अपराध करने के बजाय, कोई अगर एक बुरे व्यक्ति के सार से ही युक्त हो, और वह सभी तरह के दुष्ट कर्म करता हो, और इसके असंदिग्ध प्रमाण मौजूद हों, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को हाथ उठाकर वोट देना चाहिए; यदि आधे से अधिक लोग इसके पक्ष में हों, तो इस व्यक्ति को परिशुद्ध या निष्कासित कर दिया जाना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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