122. एक ईमानदार व्यक्ति बनने के सिद्धांत

(1) अपने आप को एक ईमानदार व्यक्ति बनने में प्रशिक्षित करने के लिए, परमेश्वर पर निर्भर होना आवश्यक है। अपना दिल उसे दे दो, और उसकी जाँच को स्वीकार करो। केवल इसी तरह से, समय के साथ, व्यक्ति अपने झूठ और कपट को त्याग सकता है;

(2) सत्य को स्वीकार करना और अपने प्रत्येक शब्द और कर्म पर चिंतन करना आवश्यक है। अपने में प्रकट की गई भ्रष्टता के मूल को और उसके सार को विश्लेषित करो, और वास्तव में खुद को जान लो;

(3) यह जाँच करना आवश्यक है कि किन मामलों में किसी को झूठ बोलने का आवेग होता है और वह धोखेबाज़ी को आश्रय देता है। खुद को विश्लेषित करने और खुद को उघाड़ देने का साहस करो, और दूसरों से माफ़ी माँगो और सुधार करो;

(4) व्यक्ति की कथनी और करनी परमेश्वर के वचनों पर आधारित होनी चाहिए। परमेश्वर से प्रार्थना करो, अपनी शारीरिक वरीयताओं और इरादों का त्याग करो, और सत्य के सिद्धांत के अनुसार बोलो और कार्य करो;

(5) परमेश्वर के आदेशों के प्रति सच्चा होना आवश्यक है; उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाओ, और न तो असावधान और लापरवाह और न ही झूठे और धोखेबाज़ बनो, बल्कि कथनी और करनी दोनों में ईमानदार और विश्वसनीय बनो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर ईमानदार इंसान को पसंद करता है। मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए दुगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की बजाय नरक में दंडित होना पसंद करेंगे। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भंडार में अन्य उपचार भी है। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ तुम्हारे लिए ईमानदार इंसान बनना कितना मुश्किल काम है। चूँकि तुम लोग बहुत चतुर हो, अपने तुच्छ पैमाने से लोगों का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूंकि तुम में से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में भेज दूँगा ताकि अग्नि तुम्हें सबक सिखा सके, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाओ। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर एक निष्ठावान परमेश्वर है" शब्द निकलवा लूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है इंसान का हृदय!" उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? मुझे लगता है कि तुम उतने खुश नहीं होगे जितने अभी हो। तुम लोग इतने "गहन और गूढ़" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जितने कि तुम अब हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे "शिष्ट व्यवहार” के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने जहरीले दाँत और पँजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसान को ईमानदार लोगों की श्रेणी में रखोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो "व्यक्तिगत संबंधों" में कुशल है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को हल्के में लेने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है, तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से काम करते हो, हमेशा देने का भाव रखते हो, लेने का नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निष्ठावान संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी फल की अपेक्षा नहीं है, तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

मैं उन लोगों में प्रसन्नता अनुभव करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सच को तत्परता से स्वीकार कर लेते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे, और इस प्रकार मुझमें तुम्हारा विश्वास संदेह की नींव पर निर्मित होगा। मैं इस तरह के विश्वास को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर इच्छानुसार संदेह करने और उसके बारे में अनुमान लगाने के आदी हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र चरित्र का, निष्पक्षता और विवेक से विहीन, न्याय की भावना से रहित, शातिर चालबाज़ियों में प्रवृत्त, विश्वासघाती और चालाक, बुराई और अँधेरे से प्रसन्न रहने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि जो लोग मुझे खुश करते हैं, वे बिल्कुल ऐसे लोग हैं जो चापलूसी और खुशामद करते हैं, और जिनमें ऐसे हुनर नहीं होंगे, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसा विश्वास तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगा और मेरे खिलाफ बड़े विरोध में खड़ा कर देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

लोग ईमानदार होकर ही जान सकते हैं कि वे कितनी बुरी तरह से भ्रष्ट हैं और उनमें इंसानियत बची है या नहीं; ईमानदारी पर अमल करने पर ही वे जान सकते हैं कि वे कितने झूठ बोलते हैं और कपट और बे‌ईमानी उनके अंदर कितनी गहराई में छिपे हैं। ईमानदारी पर अमल करने का अनुभव होने पर ही वे धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को जान सकते हैं और अपने प्रकृति सार को पहचान सकते हैं और तभी उनका भ्रष्ट स्वभाव निरंतर शुद्ध हो सकता है। अपने भ्रष्ट स्वभाव की निरंतर शुद्धि के दौरान ही लोग सत्य पा सकते हैं। इन वचनों का अनुभव करने के लिए समय लो। परमेश्वर उन लोगों को सिद्ध नहीं बनाता है जो धोखेबाज हैं। यदि तुम लोगों का हृदय ईमानदार नहीं है, यदि तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, तो परमेश्वर कभी भी तुम्हें प्राप्त नहीं करेगा। इसी तरह, तुम भी कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे, और परमेश्वर को पाने में भी असमर्थ रहोगे। यदि तुम परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते हो और सत्य को नहीं समझते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर से शत्रुता रखते हो, तुम परमेश्वर से असंगत हो और वह तुम्हारा परमेश्वर नहीं है। यदि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते। यदि तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम हमेशा परमेश्वर के कट्टर शत्रु बनकर रहोगे और तुम्हारा परिणाम निर्धारित होगा। इस प्रकार, यदि लोग चाहते हैं कि उन्हें बचाया जाए, तो उन्हें ईमानदार बनना शुरू करना होगा। ऐसा एक संकेत है जो उन लोगों को चिह्नित करता है, जिन्हें अंतत: परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाएगा। क्या तुम लोग जानते हो कि वह क्या है? बाइबल में, प्रकाशित-वाक्य में लिखा है: "और उनके मुँह में कोई झूठ नहीं था; उन पर कोई कलंक नहीं है।" कौन हैं "वे"? ये वो लोग हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण और प्राप्त किया जाता है और बचाया जाता है। परमेश्वर उनका वर्णन कैसे करता है? उनके क्रियाकलापों की विशिष्टताएँ और अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? (उन पर कोई कलंक नहीं है। वे झूठ नहीं बोलते।‌) तुम सबको इस बात को समझना और ग्रहण करना चाहिए कि झूठ न बोलने का क्या अर्थ है: इसका अर्थ ईमानदार होना है। उन पर कोई कलंक नहीं है का क्या अर्थ है? जो व्यक्ति कलंकित नहीं है, उसे परमेश्वर कैसे परिभाषित करता है? जो लोग कलंकित नहीं हैं वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं; ऐसे ही लोग परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की दृष्टि में पूर्ण होते हैं; ऐसे लोग कलंकित नहीं हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक' से उद्धृत

ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? इस विषय की मूल बात है सब चीज़ों में सत्य का पालन करना। यदि तुम यह कहते हो कि तुम ईमानदार हो, लेकिन तुम परमेश्वर के उपदेशों को हमेशा अपने दिमाग़ के कोने में रखते हो और वही करते हो जो तुम चाहते हो, तो क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? तुम कहते हो, "मेरी क्षमता कम है, लेकिन दिल से ईमानदार हूँ।" लेकिन, जब तुम्हें कोई कर्तव्य पूरा करने के लिए दिया जाता है, तो तुम पीड़ा सहने से या इस बात से डरते हो कि अगर तुमने इसे अच्छी तरह से पूरा नहीं किया तो तुम्हें इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी, इसलिये तुम इससे बचने के लिये बहाने बनाते हो। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? बिल्कुल भी ऐसा नहीं है। तो फिर, एक ईमानदार व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिये? उन्हें अपने कर्तव्यों को स्वीकार करना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये, और फिर अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार उसे पूरा करने में पूरी तरह से समर्पित होना चाहिये, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना चाहिये। यह कई तरीकों से व्यक्त क्या जाता है। एक तरीका यह है कि तुम्हें अपने कर्तव्य को ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिये, तुम्हें किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिये, और अधूरे मन से इसके लिए तैयार नहीं होना चाहिये। अपने खुद लाभ के लिये जाल न बिछाओ। यह ईमानदारी की अभिव्यक्ति है। दूसरा तरीका है इसमें पूरी जी-जान लगा देना। तुम कहते हो, "यह वो सब कुछ है जो मैं कर सकता हूँ; मैं सब लगा दूंगा, और सब पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित कर दूंगा।" क्या यह ईमानदारी की अभिव्यक्ति नहीं है? तुम अपना सब कुछ और जो कुछ भी तुम कर सकते हो, उसे समर्पित कर देते हो—यह ईमानदारी की एक अभिव्यक्ति है। यदि तुम अपना सब कुछ समर्पित करने को इच्छुक नहीं हो, यदि तुम इसे छिपा कर, बचा कर रखते हो, तो तुम अपने कामों में फिसड्डी हो, अपने कर्तव्यों से बचते हो और उन्हें किसी और से इसलिए करवाते हो क्योंकि तुम अच्छा काम न कर पाने के परिणामों को भुगतने से डरते हो, तो क्या यह ईमानदार होना है? नहीं, यह नहीं है। इसलिए, ईमानदार व्यक्ति होना केवल एक ईमानदार दिल रखना ही नहीं है। यदि तुम इसे तब अभ्यास में नहीं लाते, जब तुम्हारे साथ कोई बात हो जाये तो फिर तुम एक ईमानदार व्यक्ति नहीं हो। जब तुम्हारे सामने समस्याएं आएं तो तुम्हें सत्य का पालन करना चाहिए और व्यावहारिक अभिव्यक्ति रखनी चाहिए। यह ईमानदार व्यक्ति होने का एकमात्र तरीका है, और यही एक ईमानदार हृदय की अभिव्यक्तियां हैं। कुछ लोग ऐसा महसूस करते हैं कि एक ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए, यह पर्याप्त है कि हम केवल सत्य बोलें और झूठ न बोलें। क्या ईमानदार होने की परिभाषा इतनी सीमित है? तुम्हें अपना हृदय प्रकट करना होगा और इसे परमेश्वर को सौंपना होगा, यही वह अभिवृत्ति है जो एक ईमानदार व्यक्ति में होनी चाहिए। इसलिए ईमानदारी इतनी क़ीमती है। यहाँ पर निहितार्थ क्या है? यहाँ निहितार्थ यह है कि यह हृदय तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित करने में सक्षम है और तुम्हारी अवस्थाओं को नियंत्रित करने में सक्षम है। यदि तुम्हारे अंदर इस तरह की ईमानदारी है, तो तुम्हें इसी तरह की अवस्था में जीना चाहिए, इसी तरह का व्यवहार दिखाना चाहिए, इसी तरह खुद को खपाना चाहिए।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है' से उद्धृत

कर्तव्य और परमेश्वर दोनों के प्रति लोगों को ईमानदार हृदय रखना चाहिए—यह सर्वोच्च ज्ञान है। एक ईमानदार हृदय से परमेश्वर के साथ व्यवहार करने में लोगों का रवैया क्या होना चाहिए? लोगों को यह प्रश्न किए बिना कि इससे उन पर आपदा आएगी या आशीष मिलेगी, बिना किसी शर्त के और परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होकर, अपने कर्तव्य में परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाना चाहिए; ऐसा व्यक्ति ईमानदार हृदय का होता है। जो हमेशा संदेह करते हैं, जो हमेशा शर्तें रखते हैं और जो निरंतर शोध में लगे रहते हैं, क्या उनका हृदय ईमानदार होता है? ऐसे व्यक्ति के हृदय में क्या निहित होता है? उनके हृदय में धोखेबाजी और बुराई होती है और वे हमेशा शोध में लगे रहते हैं। जब कुछ ऐसा होता है जो उनके निजी हितों को प्रभावित करता है, तो वे सोचते हैं : “जब परमेश्वर ने मेरे साथ यह किया और जब उसने मेरे लिए इस स्थिति का प्रबंध किया, तो परमेश्वर क्या सोच रहा था? क्या यह कुछ ऐसा है, जो अन्य लोगों के साथ हुआ है? जब मैं इस परीक्षा से बाहर आ जाऊँगा, तो इसके बाद परिणाम क्या होंगे? वे इन सवालों पर शोध करते हैं; वे शोध करते हैं कि वे क्या प्राप्त कर सकते हैं या खो सकते हैं, क्या मौजूदा प्रसंग उनके लिए आपदा लाएगा या आशीष। एक बार जब वे इन सवालों पर शोध करना आरंभ कर देते हैं, तो क्या वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं? क्या वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में सक्षम हैं? (नहीं।) जब वे एक कर्तव्य शुरू करते हैं, तो वे इस पर शोध करते हैं और पूछते हैं : “यदि मैं इस कर्तव्य को अभ्यास में लाता हूँ तो क्या मुझे पीड़ा होगी? क्या मुझे बहुत समय बिताने की आवश्यकता होगी और क्या मैं नियमित भोजन और आराम कर पाऊँगा? मैं किस तरह के लोगों के संपर्क में आऊँगा?” हालाँकि दिखावे के लिए वे इस कर्तव्य को स्वीकार करते हैं, मगर अपने दिल में वे कपट रखते हैं और निरंतर ऐसी चीजों पर शोध करते रहते हैं। वास्तव में, ये सभी चीजें जिन पर वे शोध करते हैं, उनके निजी हितों से संबंधित हैं; वे परमेश्वर के घर के हितों पर नहीं, सिर्फ अपने हितों पर विचार करते हैं। यदि लोग केवल अपने हितों पर विचार करते हैं, तो उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान नहीं होता और उनमें परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता नहीं होती। जो इस प्रकार के शोध में लगे हैं, उनमें से कई के साथ अंत में क्या होता है? कुछ परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं; अर्थात, वे नकारात्मक भावनाओं से भरी चीजें करते हैं, काम करते समय सावधान रहते हैं। यह किस तरह का स्वभाव है, जो ऐसी भावनाएँ लाता है? यह धोखा और बुराई है; बुराई की इस हद तक जाने के बाद, ये लोग स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं! जब लोग लगातार शोध करते हैं, तो उनका ध्यान बँट जाता है, तो क्या वे इस दशा में अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकते हैं? वे ईमानदारी और अपने प्राण-पण के साथ परमेश्वर की आराधना नहीं करते, उनके पास ईमानदार हृदय नहीं हैं और अपने कर्तव्य को करने के दौरान वे हमेशा निगरानी रखते हैं और संकोच करते हैं। इससे क्या अर्थ निकलता है? परमेश्वर उन पर कार्य नहीं करता, वे चाहे जो भी करें, वे सिद्धांतों को नहीं पा सकते और वे जो भी करते हैं, वह हमेशा गलत होता है। चीजें हमेशा गलत क्यों हो जाती हैं? कभी-कभी, ऐसा नहीं होता कि परमेश्वर उन्हें उजागर करता है, बल्कि वे स्वयं को बर्बाद कर लेते हैं। वे परमेश्वर के घर के कार्य या परमेश्वर के घर के हितों पर कोई ध्यान नहीं देते; वे हमेशा अपनी ओर से षड्यंत्र कर रहे होते हैं, अपनी प्रतिष्ठा और ओहदे के लिए योजनाएं बना रहे होते हैं। वे ऐसा करते रहते हैं और फिर वे भटकने लगते हैं। अपने स्वयं के हितों और भविष्य की संभावनाओं की योजनाएँ बनाना और परमेश्वर के घर के कार्य और परमेश्वर के घर के हितों के बारे में विचार करना, क्या इनके बीच उनके कार्यों का परिणाम एक समान है? नहीं, परिणाम निश्चित रूप से समान नहीं है। वे उजागर हो चुके हैं और इस व्यवहार से किसी का कर्तव्य निर्मित नहीं होता; इस व्यक्ति के कार्यों का सार और प्रकृति बदल गई है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

लोग ऐसी मक्कारी क्यों करते हैं? अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, अपने लक्ष्यों को और उन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए, जिन्हें वे पाना चाहते हैं। और इसलिए वे लोग कुछ ख़ास पद्धतियाँ अपनाते हैं, जो दर्शाता है कि वे सच्चे नहीं हैं और यह कि वे ईमानदार नहीं हैं। ऐसे समय में, लोगों की धूर्तता और कुटिलता प्रकट होती है, या फिर उनकी दुर्भावना और नीचता प्रकट होती है। इन चीज़ों के साथ, तुम महसूस करते हो कि ईमानदार होना ख़ास तौर पर बहुत कठिन है; उनके बिना, तुम महसूस करोगे कि ईमानदार होना आसान है। ईमानदार होने में सबसे बड़ी बाधाएँ लोगों की धूर्तता है, उनके छल-कपट हैं, उनकी दुर्भावना है, और उनके नीच प्रयोजन हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

जो लोग ईमानदारी से अपना जीवन नहीं जीते, जो लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से व्यवहार करते हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि मूलत: उनका सार कपटी और धूर्त होता है और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं होती, ऐसे लोग अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं; वे सर्प के किस्म के लोग हैं। जो लोग हमेशा अपने ही लाभ के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, जो अभिमानी और घमंडी हैं, जो दिखावा करते हैं, और जो हमेशा अपनी हैसियत की रक्षा करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं। वे लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के होते हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति सजग नहीं हैं, जो पूरे दिल से परमेश्वर की सेवा नहीं करते, जो हमेशा अपने और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित रहते हैं, जो खुद को परमेश्वर की खातिर खपाने के लिए हर चीज़ का परित्याग करने में सक्षम नहीं हैं, और जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी ज़िंदगी नहीं जीते, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं हो सकती।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

यह कि परमेश्वर लोगों से ईमानदार बनने का आग्रह करता है यह साबित करता है कि वो वास्तव में उन लोगों से घृणा करता है जो बेईमान हैं और परमेश्वर बेईमान लोगों को पसंद नहीं करताI परमेश्वर कपटी लोगों को पसंद नहीं करता है, इस तथ्य का अर्थ है कि वो उनके कार्यों, स्वभाव, और मंशाओं से नफ़रत करता है; अर्थात, परमेश्वर उनके कार्य करने के तरीके को पसंद नहीं करता। इसलिए, अगर हमें परमेश्वर को प्रसन्न करना है, तो हमें सबसे पहले अपने कार्यों और अपने मौजूदा अस्तित्व को बदलना होगा। इससे पहले, हमने लोगों के बीच रहने के लिए झूठ, दिखावे, और बेईमानी को अपनी पूँजी के रूप में और अस्तित्व संबंधी आधार, जीवन, और बुनियाद जिसके अनुसार हम आचरण करते थे, के रूप में उपयोग करते हुए इन पर पर भरोसा किया। यह कुछ ऐसा है जिससे परमेश्वर घृणा करता था। संसार के अविश्वासियों में यदि तू चालाकी या बेईमानी करना नहीं जानता तो तेरे लिए दृढ़ रहना कठिन हो सकता है। एक बेहतर जीवन पाने के लिए, तू केवल झूठ बोल पाएगा, धोखाधड़ी कर पाएगा, स्वयं को बचाने और छिपाने के लिए कपटी और धूर्त तरीकों का उपयोग करने में सक्षम होगा। परमेश्वर के घर में, ठीक इसका उल्टा होता है: तू जितना अधिक बेईमान होगा, उतना ही अधिक तू दिखावा करने और स्वयं को आकर्षक बनाने के लिए परिष्कृत हेरफेर का उपयोग करेगा, तब तू दृढ़ रहने में उतना ही असमर्थ होगा, परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक खारिज करता और उनसे नफ़रत करता है। परमेश्वर ने पहले से तय किया है कि स्वर्ग के राज्य में केवल ईमानदार व्यक्ति ही भूमिका निभाएंगे। अगर तू ईमानदार नहीं है और अगर, तेरे जीवन में, तेरा व्यवहार ईमानदार बनने की दिशा में नहीं है और तू अपना वास्तविक चेहरा उजागर नहीं करता है, तब तुझे परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने या परमेश्वर की प्रशंसा हासिल करने का मौका कभी भी नहीं मिलेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

एक ईमानदार व्यक्ति होने के नाते तुम्हें अपना दिल खोलना चाहिए, ताकि हर कोई उसके अंदर देख सके, तुम्हारे विचारों को समझ सके, और तुम्हारा असली चेहरा देख सके; अच्छा दिखने के लिए तुम्हें तुम खुद भेष धारण करने या खुद को आकर्षक बनाने का प्रयास न करो। लोग तभी तुम पर विश्वास करेंगे और तुमको ईमानदार मानेंगे। यह ईमानदार होने का सबसे मूल अभ्यास और ईमानदार व्यक्ति होने की शर्त है। तू हमेशा पवित्रता, सदाचार, महानता का दिखावा करता है, नाटक करता है, और उच्च नैतिक गुणों के होने का नाटक करता है। तू लोगों को अपनी भ्रष्टता और विफलताओं को नहीं देखने देता है। तू लोगों के सामने एक झूठी छवि पेश करता है, ताकि वे मानें कि तू सच्चा, महान, आत्म-त्यागी, निष्पक्ष और निस्वार्थी है। यह धोखा है। भेष धारण मत कर और खुद को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत मत कर; इसके बजाय, अपने आप को स्पष्ट कर और दूसरों के देखने के लिए खुद को और अपने हृदय को पूरी तरह उजागर कर दे। यदि तू दूसरों के देखने के लिए अपने हृदय को उजागर कर सकता है और अपने विचारों और योजनाओं को—चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक—स्पष्ट कर सकता है तो क्या तू ईमानदार नहीं बन रहा है? यदि तू दूसरों के समक्ष अपने आप को उजागर कर सकता है, तो परमेश्वर भी तुझे देखेगा और कहेगा: "तूने दूसरों के देखने के लिए स्वयं को खोल दिया है, और इसलिए मेरे सामने भी तू निश्चित रूप से ईमानदार है।" यदि तू दूसरे लोगों की नज़र से दूर केवल परमेश्वर के सामने अपने आप को उजागर करता है, और उनके साथ रहते हुए हमेशा महान और गुणी या न्यायी और निःस्वार्थ होने का दिखावा करता है, तो परमेश्वर क्या सोचेगा और परमेश्वर क्या कहेगा? वह कहेगा: "तू वास्तव में धोखेबाज़ है; तू विशुद्ध रूप से पाखंडी और क्षुद्र है; और तू ईमानदार व्यक्ति नहीं है।" परमेश्वर इस प्रकार से तेरी निंदा करेगा। यदि तू ईमानदार व्यक्ति होना चाहता है, तो तू परमेश्वर या दूसरों के सामने जो कुछ भी करता है उसकी परवाह किए बिना, तुझे अपने आप को उजागर करने में सक्षम होना चाहिए। क्या यह हासिल करना आसान है? इसके लिए समय की आवश्यकता होती है, इसमें आंतरिक संघर्ष की आवश्यकता होती है और हमें लगातार अभ्यास करना पड़ता है। धीरे-धीरे हमारा हृदय खुल जाता है और हम खुद को उजागर कर पाते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करते हुए यह ज़रूरी है कि पहले व्यक्ति अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष खोलना सीखना चाहिए और अपने दिल की बात परमेश्वर को बताते हुए प्रतिदिन प्रार्थना करनी चाहिए। मान लो कि आज तुमने झूठ बोला है; किसी को यह बात पता नहीं चली है, और तुम अबतक यह बात सभी को साफ-साफ बताने का साहस नहीं जुटा पाए हो। तो कम से कम आज अपने आचरण की जांच में तुम्हें जो गलतियां और झूठ मिली हैं उन्हें तुरंत परमेश्वर के समक्ष जरूर लाना चाहिए, और अपने पापों की स्वीकारोक्ति में कहना चाहिए : "हे परमेश्वर, मैंने पुनः झूठ बोला है। मैंने फलां कारण से ऐसा किया है। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अनुशाषित करो।" अगर तुम्हारी सोच ऐसी है, परमेश्वर तुम्हें स्वीकार करेगा, और इसे याद रखेगा। शायद तुम्हारे लिए इस दोष या झूठ बोलने की भ्रष्ट प्रवृत्ति का समाधान करना काफी तनावपूर्ण और श्रमसाध्य हो, लेकिन डरो नहीं, परमेश्वर तुम्हारे साथ है, वह तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और बार-बार उभरने वाली इस कठिनाई से उबरने में तुम्हारी मदद करेगा। वह तुम्हें झूठ नहीं बोलने या झूठ को स्वीकारने का साहस देगा; तुम्हें यह स्वीकारने का साहस देगा कि कौन से झूठ तुमने बोले, क्यों बोले, तुम्हारे इरादे और उद्देश्य क्या थे; तुम्हें यह भी स्वीकार करने का साहस देगा कि तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, बेईमान हो; और वह तुम्हें इस अवरोध को दूर करने, और शैतान की कैद और नियंत्रण से बाहर निकल आने का साहस देगा। इस तरह, तुम परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष पा कर धीरे-धीरे प्रकाश में रहने लगोगे। जब तुम दैहिक सीमाओं के इस अवरोध को पार कर लेते हो और सत्य के प्रति समर्पित होने में समर्थ हो जाते हो, तो तुम स्वतंत्र और मुक्त हो जाओगे। जब तुम इस तरह से रहते हो, तो न केवल लोग, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। हालांकि कभी-कभार तुम अब भी गलत कर्म कर सकते हो, झूठ बोल सकते हो, और अब भी कभी-कभी तुम्हारे मन में अपने इरादे, स्वार्थ, स्वार्थी व घृणास्पद कर्म और विचार तुम्हारे पास होंगे, लेकिन तुम परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार कर सकते हो; अपना हृदय, अपनी वास्तविक स्थिति, अपनी भ्रष्ट स्वाभाविक प्रवृत्ति परमेश्वर को दिखा सकते हो, और इस तरह तुम्हारे पास अभ्यास का सही मार्ग होगा। अगर तुम्हारे अभ्यास का मार्ग और आगे की दिशा सही है, तो तुम्हारा भविष्य सुंदर और उज्ज्वल होगा। इस तरह, तुम सुकून भरे दिल के साथ जियोगे; तुम्हारी आत्मा संपोषित होगी, और तुम समृद्ध और आनंदित महसूस करोगे। अगर तुम दैहिक सीमाओं की इस अड़चन को पार नहीं कर पाते हो और अपनी भावनाओं व शैतानी दर्शनों की चपेट में रहते हो, और तुम्हारे कथन व कर्म हमेशा गुपचुप और गुप्त रहते हैं, कभी खुले दिन के उजाले में नहीं होते तो तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में जीते हो। जब तुम सत्य को समझते हो और दैहिक सीमाओं की अड़चन को पार कर लेते हो, तो तुम धीरे-धीरे मानवीय सादृश्य प्राप्त कर लेते हो। तुम साफगोई और सहजता के साथ बोलते और कार्य करते हो। अपने दिल की कोई भी बात या विचार, या अपनी गलतियों को दूसरों के साथ साझा करते हो, जिससे कि सभी लोग इन्हें स्पष्ट देख सकें, और अंततः वे कहेंगे कि तुम एक पारदर्शी व्यक्ति हो। पारदर्शी व्यक्ति क्या होता है? ऐसा व्यक्ति जो झूठ नहीं बोलता, अपने कथन में बेहद ईमानदार होता है, और जिसकी बातों को सभी सत्य मानते हैं। अगर ऐसे लोग अनजाने में कोई झूठ या गलत बात बोलते भी हैं, तो यह जानते हुए कि वे ऐसा अनजाने में कर रहे हैं, सभी लोग उन्हें माफ करने के लिए तैयार रहते हैं। जैसे ही उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है वे क्षमायाचना करने तथा इसे सही करने के लिए लौट आएंगे। पारदर्शी व्यक्ति ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्ति को सभी पसंद करते हैं और उसपर विश्वास कर सकते हैं। अगर तुम इस स्तर पर पहुंचते हो तथा परमेश्वर और लोगों का विश्वास प्राप्त करते हो तो तुमने कोई साधारण काम नहीं किया है—यह किसी व्यक्ति के लिए सर्वोच्च प्रतिष्ठा है, और केवल ऐसे व्यक्ति के पास ही आत्म-सम्मान होता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से बहुत डरते हैं; जबकि तू परमेश्वर की देह को धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को धोखा नहीं दे सकता है। कोई भी बात, जो परमेश्वर की छानबीन का सामना नहीं कर सकती, वह सत्य के अनुरूप नहीं है, और उसे अलग कर देना चाहिए; ऐसा न करना परमेश्वर के विरूद्ध पाप करना है। इसलिए, तुझे हर समय, जब तू प्रार्थना करता है, जब तू अपने भाई-बहनों के साथ बातचीत और संगति करता है, और जब तू अपना कर्तव्य करता है और अपने काम में लगा रहता है, तो तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख अवश्य रखना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; इसलिए तुझे अपने कार्य को पूरा करने के लिए अपने आपको ईमानदारी से समर्पित कर देना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, यदि तेरे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम है, और यदि तू परमेश्वर की देखभाल, संरक्षण और छानबीन की तलाश करता है, यदि ये चीज़ें तेरे इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली होंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोल कर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और बिना झूठ बोले परमेश्वर से बोल देता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावशाली होंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

आज, जो कोई भी परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और समझ कि जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक दुष्ट कर्म करने वाला है। क्या दुष्कर्मी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहाँ तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थनाएँ, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का तेरा ढंग, भाई-बहनों के साथ तेरी सहभागिता, और कलीसिया के भीतर तेरा जीवन—और साझेदारी में तेरी सेवा परमेश्वर के सम्मुख उसके द्वारा छानबीन के लिए लाई जा सकती है। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में विकास हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, जिससे तू व्यभिचार की ओर आकर्षित नहीं होगा और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसकी छानबीन को ग्रहण करता है, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना अधिक तू देहसुख को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करना अभ्यास का वो मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तू जो भी करे, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करते हुए भी, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है और उसकी छानबीन को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, इस तरह जिसका तू अभ्यास करता है वह और भी सही हो जाएगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज़ से सामना हो—नकारात्मकता और कमज़ोरी, या निपटान के बाद बुरी मन:स्थिति में होना—तुम्हें कर्तव्य के साथ ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मन:स्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम्हें चाहे जितनी निराशा या कमज़ोरी महसूस हो रही हो, तुम्हें अपने हर काम में पूरी सख्ती के साथ सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो न सिर्फ दूसरे लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो ज़िम्मेदार है और दायित्व का निर्वहन करता है; तुम सचमुच में एक अच्छे व्यक्ति होगे, जो अपने कर्तव्य को सही स्तर पर निभाता है और जो पूरी तरह से एक सच्चे इंसान की तरह जीता है। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपना कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार कहा जा सकता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं और सिद्धांत के साथ कर्म करने में सफल हो सकते हैं, और मानक स्तर के अनुसार कर्तव्य निभा सकते हैं। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मन:स्थिति में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे सतही ढंग से कार्य नहीं करते, वे अहंकारी नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊंचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मन:स्थिति में होने पर भी वे अपने रोज़मर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से पूरा करते हैं और उनके कर्तव्य निर्वाह के लिए नुकसानदेह या उन पर दबाव डालने वाली या उनके काम में बाधा पहुँचाने वाली किसी चीज़ से सामना होने पर भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, "मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक परमेश्वर मुझे जीने देगा, अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करने का मैं दृढ़ संकल्प लेता हूँ। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन होगा जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये गये इस कर्तव्य, और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस सांस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूंगा क्योंकि कर्तव्य निर्वाह करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!" जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज़ या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मन:स्थिति या बाहरी हालात से नियंत्रित नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन-प्रवेश हासिल किया है और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे व्यावहारिक और सच्ची अभिव्यक्तियों में से एक है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

जब लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं तो वे दरअसल वही करते हैं जो उन्हें करना चाहिए। पर अगर तुम इसे परमेश्वर के सामने करते हो, अगर तुम अपना कर्तव्य दिल से और ईमानदारी की भावना से निभाते हो, तो क्या यह रवैया कहीं ज्यादा सही नहीं होगा? तो तुम इस रवैये को अपने दैनिक जीवन में कैसे व्यवहार में ला सकते हो? तुम्हें "दिल से और ईमानदारी से परमेश्वर की आराधना" को अपनी वास्तविकता बनाना होगा। जब कभी भी तुम शिथिल पड़ना चाहते हो और बस बिना रुचि के काम करना चाहते हो, जब कभी भी तुम आलसी बनना चाहते हो, और जब कभी भी तुम अपना ध्यान बँटने देते हो और बस मौज-मस्ती करना चाहते हो, तो तुम्हें इन बातों पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए: इस तरह व्यवहार करने में, क्या मैं अविश्वास के लायक बन रहा हूँ? क्या यह कर्तव्य के निर्वहन में अपना मन लगाना है? क्या मैं ऐसा करके विश्वासघाती बन रहा हूँ? ऐसा करने में, क्या मैं उस विश्वास के अनुरूप रहने में विफल हो रहा हूँ, जो परमेश्वर ने मुझ पर दिखाया है? तुम्हें इसी तरह आत्म-मंथन करना चाहिए। तुम्हें सोचना चाहिये, "मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। उस समय, मैंने महसूस किया कि कुछ समस्या थी, लेकिन मैंने उस समस्या को गंभीर नहीं समझा; मैंने बस लापरवाही से उस पर लीपा-पोती कर दी। इस समस्या का अब तक कोई समाधान नहीं हुआ है। मैं किस तरह का व्यक्ति हूँ?" अब तुमने समस्या को पहचान लिया होगा और खुद को कुछ हद तक जान लिया होगा। थोड़ा ज्ञान हो जाने पर, क्या तुम्हें रुक जाना चाहिए? क्या अपने पापों को स्वीकार कर लेने से तुम्हारा काम पूरा हो गया है? तुम्हें पश्चाताप करना होगा और खुद में पूरी तरह बदलाव लाना होगा! और तुम अपने-आपमें बदलाव कैसे ला सकते हो? पहले अपने कर्तव्य को लेकर तुम्हारा रवैया और मानसिकता गलत थे, तुम्हारा दिल इसमें नहीं रहता था, और तुम कभी भी सही चीजों पर ध्यान नहीं देते थे। आज, तुम्हें अपने कर्तव्य को लेकर अपना रवैया ठीक करना है, तुम्हें परमेश्वर के आगे प्रार्थना करनी है, और जब भी तुम्हारे पिछले विचार और रवैये फिर से उभरें तो तुम्हें परमेश्वर से विनती करनी है कि वह तुम्हें अनुशासित करे और तुम्हें ताड़ना दे। जल्दी से उन क्षेत्रों की पहचान करो जहां तुम ढीलेपन और बेमन से अपने कर्तव्य निभाते थे। यह सोचो कि तुम इन्हें कैसे ठीक कर सकते हो, और उन्हें ठीक करने के बाद, फिर से खोजो और प्रार्थना करो, और फिर अपने भाई-बहनों से पूछो कि क्या उनके कुछ सुझाव और सिफारिशें हैं, जब तक कि हर कोई यह न कहे कि तुमने सही किया है। सिर्फ तभी तुम्हें वैधता मिलेगी। तुम ऐसा महसूस करोगे कि तुमने मापदंडों के अनुरूप अपना कर्तव्य निभाया है, और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है, पूरे दिल से किया है, और अपना सब कुछ अर्पित किया है; तुम महसूस करोगे कि तुमने अपना सर्वस्व झोंक दिया है, और तुम्हारे दिल में कोई पछतावा नहीं है। परमेश्वर के सामने अपना हिसाब देते समय तुम्हारी चेतना निर्मल और शुद्ध होगी, और तुम कहोगे, "भले ही परमेश्वर मुझे अपना कर्तव्य निभाने के 60% अंक दे, पर मैंने अपने शरीर की शक्ति का हर कतरा इसमें झोंक दिया है, मैंने इसे पूरे दिल से किया है, मैंने न कोई सुस्ती दिखाई न ढीलापन बरता, और मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है।" क्या यह अपने पूरे दिल, अपने पूरे दिमाग और अपनी पूरी ताकत को अपने कर्तव्य में लगाने की वास्तविकताओं को व्यवहार में लाना और उन्हें अपने दैनिक जीवन में लागू करना नहीं हुआ? क्या यह सत्य की इन वास्तविकताओं को जीना नहीं है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है' से उद्धृत

तुम्हें पता होना चाहिए कि क्या तुम्हारे भीतर सच्चा विश्वास और सच्ची वफादारी है, क्या परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई इतिहास है, और क्या तुमने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण किया है। यदि तुममें इन बातों का अभाव है, तो तुम्हारे भीतर अवज्ञा, धोखा, लालच और शिकायत अभी शेष हैं। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुमने कभी भी परमेश्वर से सकारात्मक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है और प्रकाश में जीवन नहीं बिताया है। अंत में किसी व्यक्ति की नियति कैसे काम करती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसके अंदर एक ईमानदार और भावुक हृदय है, और क्या उसके पास एक शुद्ध आत्मा है। यदि तुम ऐसे इंसान हो जो बहुत बेईमान है, जिसका हृदय दुर्भावना से भरा है, जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह जाओगे जहाँ इंसान को दंड दिया जाता है, जैसाकि तुम्हारी नियति में लिखा है। यदि तुम बहुत ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर तुमने कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं किया है या सत्य का एक शब्द भी नहीं बोला है, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँख का तारा समझे? क्या यह सोचने का बेहूदा तरीका नहीं है? तुम हर बात में परमेश्वर को धोखा देते हो; तो परमेश्वर का घर तुम जैसे इंसान को, जिसके हाथ अशुद्ध हैं, जगह कैसे दे सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

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