92. उपदेशक होने के सिद्धांत

(1) उपदेशक के लिए यह आवश्यक है कि वह परमेश्वर के वचनों को अक्सर खाए-पिए, और खुद को सत्य से लैस करे। कमियों का पता लगाने और उन्हें समय पर हल करने में, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य पर सहभागिता के द्वारा सभी प्रकार की समस्याओं को हल करने में सक्षम बनो।

(2) कलीसिया के प्रत्येक अगुवा और उपयाजक की वास्तविक स्थिति को समझना आवश्यक है। यदि उनके बीच एक झूठे अगुवा या झूठे कार्यकर्ता के होने का पता लगता है, तो समस्या की फौरन रिपोर्ट की जानी चाहिए और उसे हल किया जाना चाहिए।

(3) किसी जिले के कार्य के प्रत्येक पहलू में उस जिले के अगुवाओं के साथ सहयोग करना आवश्यक होता है। एक ताल-मेल वाला समन्वय होना चाहिए, साथ ही प्रतिभा की खोज और उसका विकास करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

(4) जिले के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं के काम की निगरानी करना सीखना आवश्यक है। यदि उनमें से किसी को व्यावहारिक कार्य नहीं करते हुए पाया जाता है, तो उन्हें निर्देश देना जाना चाहिए और इसकी रिपोर्ट की जानी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो वह निष्कासन की वस्तु बन जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग ईश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें उन अनेक स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य से पैदा होती हैं। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज़्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य के सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या "भैंस के आगे बीन बजाने" की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाइयाँ हल करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, और तुम्हें समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर की सेवा में समन्वय करने योग्य है।

तुम प्रमुख मुद्दों को समझने और बहुत-सी चीजों को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम हो पाते हो या नहीं, यह तुम्हारे व्यक्तिगत अनुभवों पर निर्भर करता है। जिस तरीके से तुम अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम अन्य लोगों की अगुआई भी करते हो। यदि तुम शब्द और सिद्धांत ही समझते हो, तो तुम दूसरों को भी शब्द और सिद्धांत समझने के लिए ही प्रेरित करोगे। तुम जिस तरीके से परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता का अनुभव करते हो, उसी तरीके से तुम दूसरों को परमेश्वर के कथनों की वास्तविकता में प्रवेश कराने के लिए उनकी अगुआई करोगे। यदि तुम बहुत-से सत्यों को समझते हो और परमेश्वर के वचनों से कई चीज़ों में स्पष्ट रूप से अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लेते हो, तो तुम दूसरों को भी बहुत-से सत्य समझाने के लिए उनका नेतृत्व कर पाने में सक्षम हो, और जिन लोगों का तुम नेतृत्व कर रहे हो, उन्हें दर्शनों की स्पष्ट समझ होगी। यदि तुम अलौकिक भावनाओं को समझने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम जिन लोगों का नेतृत्व करते हो, वे भी वैसा ही करेंगे। यदि तुम अभ्यास की उपेक्षा करते हो और उसके बजाय चर्चा पर ज़ोर देते हो, तो जिन लोगों का तुम नेतृत्व करते हो, वे भी बिना कोई अभ्यास किए, या बिना अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन लाए, चर्चा पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे; वे बिना किसी सत्य का अभ्यास किए, केवल सतही तौर पर उत्साहित होंगे। सभी लोग दूसरों को वही देते हैं, जो उनके पास होता है। व्यक्ति जिस प्रकार का होता है, उसी से वह मार्ग निर्धारित होता है, जिस पर वह दूसरों का मार्गदर्शन करता है, और साथ ही उन लोगों का प्रकार भी, जिनका वह नेतृत्व करता है। परमेश्वर के उपयोग हेतु वास्तव में उपयुक्त होने के लिए, तुम्हारे भीतर न केवल आकांक्षा होनी चाहिए, बल्कि तुम्हें बड़ी मात्रा में परमेश्वर की प्रबुद्धता, परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन, परमेश्वर द्वारा निपटाए जाने का अनुभव, और उसके वचनों के शुद्धिकरण की भी आवश्यकता है। एक नींव के रूप में इसके साथ, साधारण समय में, तुम लोगों को अपने अवलोकनों, विचारों, चिंतनों और निष्कर्षों पर ध्यान देना चाहिए, और तदनुसार आत्मसात या उन्मूलन करने में संलग्न होना चाहिए। ये सभी तुम लोगों के वास्तविकता में प्रवेश करने के रास्ते हैं, और इनमें से प्रत्येक अनिवार्य है। परमेश्वर इसी तरह काम करता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य करने की पद्धति में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे पास हर दिन उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर हो सकते हैं। और किसी भी समय, चाहे तुम्हारा वातावरण कठोर हो या अनुकूल, चाहे तुम्हारी परीक्षा ली जा रही हो या तुम्हें प्रलोभन दिया जा रहा हो, चाहे तुम काम कर रहे हो या नहीं कर रहे हो, चाहे तुम एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हो या किसी समूह के अंग के रूप में, तुम्हें हमेशा परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर मिलेंगे और तुम उनमें से किसी एक को भी कभी नहीं चूकोगे। तुम उन सभी को खोज पाने में सक्षम होगे—और इस तरह तुम परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का रहस्य पा लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक योग्य चरवाहे को किन चीज़ों से लैस होना चाहिए' से

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

कार्य परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने को संदर्भित नहीं करता, बल्कि इस बात को संदर्भित करता है कि मनुष्य का जीवन और जिसे वह जीता है, वे परमेश्वर को आनंद देने में सक्षम हैं या नहीं। कार्य परमेश्वर के प्रति गवाही देने और साथ ही मनुष्य के प्रति सेवकाई के लिए मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा और परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान के उपयोग को संदर्भित करता है। यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है और इसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। कहा जा सकता है कि तुम लोगों का प्रवेश ही तुम लोगों का कार्य है, और तुम लोग परमेश्वर के लिए कार्य करने के दौरान प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हो। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का अर्थ मात्र यह नहीं है कि तुम जानते हो कि उसके वचन को कैसे खाएँ और पीएँ; बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की गवाही कैसे दें और परमेश्वर की सेवा करने तथा मनुष्य की सेवकाई और आपूर्ति करने में सक्षम कैसे हों। यही कार्य है, और यही तुम लोगों का प्रवेश भी है; इसे ही हर व्यक्ति को संपन्न करना चाहिए। कई लोग हैं, जो केवल परमेश्वर के लिए इधर-उधर दौड़ने, और हर जगह उपदेश देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, किंतु अपने व्यक्तिगत अनुभव को अनदेखा करते हैं और आध्यात्मिक जीवन में अपने प्रवेश की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर की सेवा करने वाले लोग परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (2)' से उद्धृत

परमेश्वर की इच्छा को तुम जितना अधिक ध्यान में रखोगे, तुम्हारा बोझ उतना अधिक होगा और तुम जितना ज्यादा बोझ वहन करोगे, तुम्हारा अनुभव भी उतना ही ज्यादा समृद्ध होगा। जब तुम परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखोगे, तो परमेश्वर तुम पर एक दायित्व डाल देगा, और उसने तुम्हें जो काम सौंपें हैं, उनके बारे में वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जब परमेश्वर द्वारा तुम्हें यह बोझ दिया जाएगा, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय सभी संबंधित सत्य पर ध्यान दोगे। यदि तुम्हारे ऊपर भाई-बहनों की स्थिति से जुड़ा बोझ है तो यह बोझ परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है, और तुम प्रतिदिन की प्रार्थना में इस बोझ को हमेशा अपने साथ रखोगे। परमेश्वर जो करता है वही तुम्हें सौंपा गया है, और तुम वो करने के लिए तैयार हो जिसे परमेश्वर करना चाहता है; परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ समझने का यही अर्थ है। इस बिंदु पर, परमेश्वर के वचन को खाते और पीते समय, तुम इस तरह के मामलों पर ध्यान केन्द्रित करोगे, और तुम सोचोगे कि मैं इन समस्याओं को कैसे सुलझा पाऊँगा? मैं अपने भाइयों और बहनों को मुक्ति और आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करने के योग्य कैसे बना सकता हूँ? तुम संगति करते और परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते समय भी इन मुद्दों को हल करने पर ध्यान दोगे, तुम इन मुद्दों से संबंधित वचनों को खाने-पीने पर भी ध्यान दोगे। तुम उसके वचनों को खाते-पीते समय भी बोझ उठाओगे। एक बार जब तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ लोगे, तो तुम्हारे मन में तुम स्पष्ट हो जाओगे कि तुम्हें किस मार्ग पर चलना है। यह पवित्र आत्मा की वह प्रबुद्धता और रोशनी है जो तुम्हारे बोझ का परिणाम है, और यह परमेश्वर का मार्गदर्शन भी है जो तुम्हें प्रदान किया गया है। मैं ऐसा क्यों कहता हूं? यदि तुम्हारे ऊपर कोई बोझ नहीं है, तब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय इस पर ध्यान नहीं दोगे; बोझ उठाने के दौरान जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों का सार समझ सकते हो, अपना मार्ग खोज सकते हो, और परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रख सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा, तुम्हारे अंदर नया प्रवेश और नयी उच्चतर अंतर्दृष्टि होनी होनी चाहिए, जो हर कदम के साथ और गहरा होता जाता है। इसी में हर इंसान को प्रवेश करना चाहिए। संवाद करने, उपदेश सुनने, परमेश्वर का वचन पढ़ने, या किसी मसले को सँभालकर तुम्हें नयी अंतर्दृष्टि और नई प्रबुद्धता प्राप्त होगी, और तुम पुराने नियमों और पुराने समय में नहीं जियोगे; तुम हमेशा नई ज्योति में जियोगे, और परमेश्वर के वचन से भटकोगे नहीं। इसी को सही पथ पर आना कहते हैं। सतही तौर पर कीमत चुकाने से काम नहीं चलेगा; परमेश्वर का वचन दिन-प्रतिदिन एक उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करता है, और हर दिन नई चीज़ें दिखाई देती हैं, इंसान को भी हर दिन नया प्रवेश करना चाहिए। जब परमेश्वर बोलता है, तो वह उस सबको साकार करता है जो उसने बोला है, और यदि तुम ताल मिलाकर नहीं चलोगे, तो पीछे रह जाओगे। अपनी प्रार्थनाओं में और गहराई लाओ; रुक-रुक कर परमेश्वर के वचनों को खाया-पिया नहीं जा सकता। प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता एवं प्रकाशन को और गहरा करो, इससे तुम्हारी धारणाएं और कल्पनाएं धीरे-धीरे कम होती जाएँगी। अपने आकलन को और मज़बूत करो, और जो भी समस्याएँ आएँ, उनके बारे में तुम्हारे अपने विचार और अपना दृष्टिकोण होना चाहिए। अपनी आत्मा में कुछ चीज़ों को समझ कर, तुम्हें बाहरी चीज़ों में परिज्ञान प्राप्त करना और समस्या के मूल को समझने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुममें ये चीज़ें न हों, तो तुम कलीसिया की अगुवाई कैसे कर पाओगे? यदि तुम किसी वास्तविकता और अभ्यास के मार्ग के बिना, केवल शब्दों और सिद्धांतों की बात करोगे, तो तुम केवल थोड़े समय के लिए ही काम चला पाओगे। नए विश्वासी इसे थोड़ा-बहुत ही स्वीकार कर पाएँगे, लेकिन कुछ समय बाद, जब नए विश्वासी कुछ वास्तविक अनुभव प्राप्त कर लेंगे, तो तुम उन्हें पोषण नहीं दे पाओगे। फिर तुम परमेश्वर के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त कैसे हुए? नई प्रबुद्धता के बिना तुम कार्य नहीं कर सकते। जो लोग नई प्रबुद्धता से रहित हैं, वे नहीं जानते कि अनुभव कैसे करना है, और ऐसे लोग कभी भी नया ज्ञान या नया अनुभव प्राप्त नहीं कर पाते। जीवन आपूर्ति करने के मामले में, वे न तो कभी अपना कार्य कर सकते हैं, न ही परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल के लिए उपयुक्त हो सकते हैं। ऐसा व्यक्ति एकदम बेकार होता है, बस रद्दी माल होता है। दरअसल, ऐसे लोग अपने काम में पूरी तरह से अयोग्य होते हैं, और एकदम अनुपयोगी होते हैं। वे लोग अपना काम तो करते ही नहीं, ऊपर से कलीसिया पर अनावश्यक दबाव भी डालते हैं। मैं इन "आदरणीय वृद्ध जनों" को जल्दी से जल्दी कलीसिया छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ ताकि फिर लोग तुम्हें न देखें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

जिला प्रचारकों के कार्य संबंधी कर्तव्य

जिला प्रचारकों का मुख्य काम जिले में हर जगह मौजूद कलीसियाओं के अगुआओं और उपयाजकों (सामान्य मामलों से संबंधित अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे कार्यकर्ताओं सहित) का सही तरीके से सिंचन करना है। उनके विशिष्ट कार्य इस प्रकार हैं :

1. उन्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार और जीवन-प्रवेश से जुड़े उपदेशों और सहभागिता के अनुसार सभी कलीसिया-अगुआओं और कार्यकर्ताओं का सिंचन और पोषण करना चाहिए, और उनके जीवन-प्रवेश के संबंध में आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं का समाधान करना चाहिए।

2. उन्हें लोगों द्वारा भ्रष्टता के प्रकाशनों और अपने कर्तव्य-पालन में उनकी गलतियों और भटकावों के साथ सत्य पर सहभागिता करनी चाहिए और इस प्रकार वास्तव में मौजूद समस्याएँ हल करनी चाहिए।

3. उन्हें संपर्कों और हृदयस्पर्शी संवादों के माध्यम से सभी कलीसिया-अगुआओं और उपयाजकों की वास्तविक स्थितियों और उनके वास्तविक आध्यात्मिक कद की अच्छी समझ हासिल करनी चाहिए। अगर यह पता चले कि सात तरह के लोगों में से कोई अगुआ और कार्यकर्ता की भूमिका निभा रहा है, तो ऐसी स्थितियों के बारे में जिला-अगुआओं को सूचित किया जाना चाहिए और उन लोगों को जल्द से जल्द बदल दिया जाना चाहिए।

4. अगर ऐसे लोगों का पता चले, जिनमें विकसित किए जाने की संभावना है, तो जिला प्रचारकों को उनका पोषण और सिंचन करना चाहिए और इस बारे में वरिष्ठ अगुआओं को सूचित करना चाहिए। यह सब बिना देरी के किया जाना चाहिए।

5. उन्हें हर कलीसिया में मौजूद समस्याओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए, उनकी अच्छी समझ रखनी चाहिए और सही समय पर उन समस्याओं का समाधान करना चाहिए। जिन समस्याओं का समाधान न किया जा सकता हो, उनके संबंध में तथ्यों को छिपाए बिना और चीजों को हलकेपन से लिए बिना जिला अगुआओं या क्षेत्रीय समन्वयकों को सूचित किया जाना चाहिए।

6. उन्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सुरक्षा करनी चाहिए, उन्हें झूठे मसीहों, मसीह-विरोधियों और सभी तरह की बुरी आत्माओं के धोखे और नियंत्रण से बचाकर रखना चाहिए। यह कलीसिया में सभी स्तरों के अगुआओं और कार्यकर्ताओं की बाध्यकारी जिम्मेदारी है। अगर अगुआ के रूप में सेवारत कोई व्यक्ति परमेश्वर के चुने हुए लोगों की जिम्मेदारी नहीं लेता या उनकी रक्षा नहीं कर सकता, तो यह परमेश्वर के खिलाफ बहुत बड़ा प्रतिरोध और उसे धोखा देना है, और परमेश्वर के घर को ऐसे लोगों को जवाबदेह ठहराना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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