91. कलीसिया का उपयाजक होने के सिद्धांत

(1) कलीसिया के उपयाजक को कलीसिया के अगुवाओं के साथ तालमेल से सहयोग करना चाहिए, सत्य को समर्पित होना सीखना चाहिए, किसी कठिनाई का सामना करने पर अगुवा को समय पर रिपोर्ट देनी चाहिए, और उन्हें सत्य की तलाश करने के माध्यम से हल करना चाहिए।

(2) कलीसिया के सभी कार्यों की सुरक्षा करना आवश्यक है। जब मसीह-विरोधी और बुरी आत्माएँ परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गुमराह करें, तो कलीसिया के उपयाजक को उनकी अच्छी तरह से रक्षा करनी चाहिए ताकि वे धोखा न खा जाएँ।

(3) कलीसिया के उपयाजक को अपने स्वयं के जीवन-प्रवेश पर, सत्य के अभ्यास और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने पर, अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने पर, और परमेश्वर के आदेश के प्रति एकनिष्ठ बने रहने पर, ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

(4) काम की व्यवस्थाओं के परिप्रेक्ष्य में, कलीसिया के अगुवाओं के काम की निगरानी करना आवश्यक होता है। यदि वे व्यावहारिक कार्य नहीं करते हुए पाए जाते हैं, तो कलीसिया के उपयाजक को उनकी मदद के लिए दिशा-ज्ञान कराना चाहिए, या अपने वरिष्ठों से इसकी रिपोर्ट करनी चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुवाओं और कार्यकर्ताओं को दो चीज़ों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें ठीक कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का कभी भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और अपने कार्य को अपने विचारों या ऐसी किसी भी चीज़ के आधार पर नहीं करना चाहिए जिसकी वे कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी वे करें, उन्हें परमेश्वर के घर के कार्य के लिए परवाह दिखानी चाहिए, और हमेशा इसके हित को सबसे पहले रखना चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान अवश्य केन्द्रित करना चाहिए, और हर काम परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए करना चाहिए। यदि तुम तब भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हो, या तुम जिद्दी बनकर अपने विचारों का पालन करते हो और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हो, तो तुम्हारे कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। प्रबुद्धता और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से निरंतर मुँह फेरना तुम्हें केवल बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हो, तो तुम कार्य नहीं कर पाओगे, और यदि तुम कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हो, तो तुम कुछ संपूर्ण नहीं कर पाओगे। कार्य करते समय पालन करने के दो मुख्य सिद्धांत यह हैं : एक है कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार सटीकता से करना, और साथ ही ऊपर से तय किये गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, पवित्र आत्मा द्वारा अंतर में दिये गए मार्गदर्शन का पालन करना। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लोगे, तो तुम आसानी से गलतियाँ नहीं करोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगुआओं और कार्यकर्ताओं के कार्य के मुख्य सिद्धांत' से उद्धृत

तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग ईश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें उन अनेक स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य से पैदा होती हैं। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज़्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य के सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या "भैंस के आगे बीन बजाने" की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाइयाँ हल करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, और तुम्हें समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर की सेवा में समन्वय करने योग्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक योग्य चरवाहे को किन चीज़ों से लैस होना चाहिए' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

कलीसिया में सिंचन करने वाले उपयाजकों की कार्य-संबंधी जिम्मेदारियाँ

1. कलीसिया के जीवन में, सिंचन करने वाले उपयाजकों को परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में अगुवाई करनी चाहिए, सभी चीजों में अपने स्वयं के अनुभव और ज्ञान के बारे में बातचीत करनी चाहिए, अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभावों को जानना और विश्लेषित करना चाहिए, और अपने स्वयं की ग़लत प्रेरणाओं और विभिन्न शैतानी विषों को उजागर करना चाहिए, ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना सीख जाएँ, और खुद को जान जाएँ, ताकि वे सत्य समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने में समर्थ हो सकें।

2. सिंचन करने वाले उपयाजकों को नवागंतुकों के सिंचन का काम ठीक से पूरा करना चाहिए। कुछ और करने से पहले, उन्हें अपनी ही ग़लत धारणाओं और समझ को हल करना चाहिए। उन्हें दर्शन से संबंधित सत्यों की वास्तविक समझ प्राप्त करनी चाहिए। उन्हें नवागंतुकों का प्रेम और धैर्य के साथ सिंचन करने में समर्थ होना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नवागंतुक छह महीनों के भीतर इन सत्यों को समझें, ताकि वे खुद की सही मार्ग पर बुनियाद बना सकें।

3. सिंचन करने वाले एक उपयाजक को बारी-बारी से सभी समूहों की सभाओं में जाना चाहिए। किसी समस्या का पता लगने पर, उन्हें तुरंत सत्य की तलाश करके इसका समाधान करना चाहिए; बड़ी समस्याओं को कलीसिया के अगुवाओं के साथ सहभागिता करके हल किया जाना चाहिए। सच्चे तथ्यों का कोई छिपाव नहीं होना चाहिए।

4. सिंचन करने वाले उपयाजकों को, कलीसिया के कामों को पूरा करने के लिए, कलीसिया के अगुवाओं के साथ तालमेल स्थापित करना चाहिए। कलीसिया में मौजूद मुद्दों और कठिनाइयों के बारे में उन्हें नियमित रूप से कलीसिया के अगुवाओं के साथ संवाद करना चाहिए, और इन समस्याओं का हल करने के लिए संयुक्त रूप से सत्य सिद्धांत की तलाश करनी चाहिए। सिंचन करने वाले उपयाजकों को कलीसिया के अगुवाओं के काम की निगरानी भी करनी चाहिए और कोई विचलन या कमी का पता लगने पर उन्हें तुरंत सहभागिता करनी चाहिए, चेतावनी देनी चाहिए। अगर किसी गंभीर समस्या का पता लगे, तो उन्हें अपने वरिष्ठों को तुरंत रिपोर्ट करनी चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

सुसमाचार के उपयाजकों की कार्य-संबंधी जिम्मेदारियाँ

1. सुसमाचार के उपयाजकों को कलीसिया में उन लोगों को प्रबंधित करना चाहिए जो सुसमाचार फैलाने में माहिर हैं या सुसमाचार का प्रचार करने में प्रशिक्षित होने के इच्छुक हैं। सुसमाचार के उपयाजकों को ऐसे लोगों के साथ अक्सर सत्य, बुद्धि, और सुसमाचार फैलाने के विभिन्न प्रभावी साधनों पर सहभागिता करनी चाहिए, ताकि सुसमाचार फैलाने वाले लोग सत्य को समझ सकें और सिद्धांतों को धारण कर सकें।

2. सुसमाचार के उपयाजकों को "प्रचार करने की पाँच बातों" और "कभी प्रचार न करने की आठ बातों" के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सुसमाचार के प्राप्तकर्ता अपेक्षाकृत अच्छी मानवता वाले हैं, सत्य के लिए तरसते हैं, और सत्य को समझने में सक्षम हैं। सुसमाचार का प्रचार उन लोगों के लिए नहीं किया जाना चाहिए जो बुरी मानवता के हैं, जिन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है, और जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं।

3. सुसमाचार के उपयाजकों को परमेश्वर के चुने हुए लोगों को अलग-अलग संप्रदायों में भेजना होगा ताकि पता चल सके कि उनके कौन-से सदस्य परमेश्वर के प्रकटन के लिए तरस रहे हैं और सत्य से प्रेम करते हैं, साथ ही इसके बारे में अधिक जानने के लिए कि वे कितने समय से परमेश्वर पर विश्वास करते आये हैं, उनकी नैतिक गुणवत्ता और उनकी योग्यता कैसी है; जहाँ कहीं सुसमाचार फैलाने के लिए एक व्यावहारिक योजना को निश्चित किया जा सकता है, वहाँ टीम के एक उपयुक्त सदस्य को सुसमाचार फैलाने के लिए भेजा जाना चाहिए। इसके अलावा, रिश्तेदारों, दोस्तों और परिचितों के बीच सुसमाचार के संभावित नवधर्मियों का पता लगाने के लिए परमेश्वर के चुने हुए लोगों को भेजना चाहिए, ताकि उन लोगों के बीच सुसमाचार को फैलाने के लिए किसी की व्यवस्था की जा सके।

4. लोगों को टटोलने और सुसमाचार को फैलाने के लिए संभावितों का पता लगाने के लिए, सुसमाचार के उपयाजकों को परमेश्वर के चुने हुए लोगों को भेजना चाहिए, जिससे विभिन्न उपयुक्त और प्रभावी साधनों को नियोजित कर संभावित नवधर्मियों को खोजा जा सके। जब ऐसे लोगों का पता चलता है, तो उनके बारे में कलीसिया को सूचित किया जाना चाहिए, जिसके बाद एक उपयुक्त विधि की खोज और पहचान की जा सकती है, जिसके द्वारा उनके बीच प्रचार किया जा सके।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

सामान्य मामलों के उपयाजकों की कार्य-संबंधी जिम्मेदारियाँ

1. सामान्य मामलों के उपयाजक परमेश्वर के वचनों, नवीनतम उपदेशों और सहभागिताओं, और कार्य व्यवस्थाओं की पुस्तकों को परमेश्वर के चुने हुए लोगों को वितरित करने के लिए जिम्मेदार हैं। उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई देर या चूक न हो जाए।

2. सामान्य मामलों के उपयाजकों को परमेश्वर के उन चुने हुए लोगों को जानना चाहिए और उनकी व्यावहारिक कठिनाइयों की समझ होनी चाहिए जो पूरे समय अपना कर्तव्य निभाते हैं, और उनकी चिंताओं को दूर करने में उनकी मदद करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।

3. कलीसिया की सारी संपत्ति की अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए सामान्य मामलों के उपयाजकों को नियमित रूप से कलीसिया की संपत्ति, उसके साहित्य और उसकी जायदाद की संरक्षण स्थिति की जाँच करनी चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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