167. परमेश्वर की इच्छा के प्रति सतर्क होने के सिद्धांत

(1) मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं को और अपने कर्तव्य को निभाने के सिद्धांतों को समझना, और परमेश्वर के वचनों को एक आधार के रूप में लेना, आवश्यक होता है। केवल इसी प्रकार कोई परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील हो सकता है;

(2) केवल न्याय और ताड़ना से, निपटने और काट-छाँट से गुज़र कर ही, कोई भ्रष्टता को दूर कर सकता है और दैहिक इच्छाओं को त्याग सकता है, और केवल इसी प्रकार कोई परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचमुच सतर्क हो सकता है;

(3) केवल परमेश्वर के प्रति प्रेम का हृदय रखकर ही कोई व्यक्ति देहासक्ति को त्यागने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तत्पर होता है, और केवल इसी प्रकार वह उस बात के लिए आग्रह रख सकता है जो परमेश्वर को ज़रूरी लगता है, उसे सोच सकता है जो परमेश्वर सोचता है, और वास्तव में परमेश्वर के लिए खुद को खपा सकता है।

(4) यदि कोई व्यक्ति जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करता हो, किसी झूठे नेता या मसीह-विरोधी को परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धोखा देते हुए पाता है, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा के लिए उसे तुरंत इसकी रिपोर्ट करनी चाहिए और उन्हें उघाड़ देना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तुम लोगों ने आज के दिन जो विरासत पाई है वह युगों-युगों तक परमेश्वर के प्रेरितों और नबियों की विरासत से भी बढ़कर है और यहाँ तक कि मूसा और पतरस की विरासत से भी अधिक है। आशीष एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं; वे बड़े त्याग के माध्यम से ही कमाए जाने चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है, तुम लोगों को उस प्रेम से युक्त होना ही चाहिए जो शुद्धिकरण से गुज़र चुका है, तुममें अत्यधिक आस्था होनी ही चाहिए, और तुम्हारे पास कई सत्य होने ही चाहिए जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि तुम प्राप्त करो; इससे भी बढ़कर, भयभीत हुए या टाल-मटोल किए बिना, तुम्हें न्याय की ओर जाना चाहिए, और परमेश्वर के प्रति निरंतर और अटूट प्रेम रखना चाहिए। तुममें संकल्प होना ही चाहिए, तुम लोगों के जीवन स्वभाव में बदलाव आने ही चाहिए; तुम लोगों की भ्रष्टता का निदान होना ही चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे आयोजन बिना शिकायत स्वीकार करने ही चाहिए, और तुम्हें मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी होना ही चाहिए। यह वह है जो तुम्हें प्राप्त करना ही है, यह परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य है, और यह वह है जो परमेश्वर लोगों के इस समूह से चाहता है। चूँकि वह तुम लोगों को देता है, इसलिए वह बदले में तुम लोगों से निश्चिय ही माँगेगा भी, और तुम लोगों से निश्चिय ही उपयुक्त माँगें ही करेगा। इसलिए, परमेश्वर जो भी कार्य करता है उस सबका कारण होता है, जो दिखलाता है कि परमेश्वर बार-बार ऐसा कार्य क्यों करता है जो इतना कठोर और श्रमसाध्य होता है। यही कारण है कि परमेश्वर के प्रति विश्वास तुममें समाया होना चाहिए। संक्षेप में, परमेश्वर का समूचा कार्य तुम लोगों के लिए किया जाता है, ताकि तुम लोग उसकी विरासत पाने के योग्य बन सको। यह सब परमेश्वर की अपनी महिमा के वास्ते उतना नहीं है बल्कि तुम लोगों के उद्धार के लिए और इस देश में अत्यधिक सताए गए लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए है। तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिए। और इसलिए, मैं बहुत-से अज्ञानी लोगों को, जो किसी भी अंतर्दृष्टि या समझ से रहित हैं, उपदेश देता हूँ : परमेश्वर की परीक्षा मत लो, तथा अब और प्रतिरोध मत करो। परमेश्वर पहले ही उस पीड़ा से गुज़र चुका है जो कभी किसी मनुष्य ने नहीं सही, और यहाँ तक कि बहुत पहले मनुष्य के स्थान पर इससे भी अधिक अपमान सह चुका है। ऐसा और क्या है जो तुम लोग नहीं छोड़ सकते? परमेश्वर की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? परमेश्वर के लिए इस अशुद्ध देश में कार्य करना वैसे ही काफी कठिन है; उस पर यदि मनुष्य जानबूझकर और मनमाने ढंग से उल्लंघन करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा खींचना पड़ेगा। संक्षेप में, यह किसी के हित में नहीं है, और इसमें किसी का लाभ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?' से उद्धृत

परमेश्वर की इच्छा को तुम जितना अधिक ध्यान में रखोगे, तुम्हारा बोझ उतना अधिक होगा और तुम जितना ज्यादा बोझ वहन करोगे, तुम्हारा अनुभव भी उतना ही ज्यादा समृद्ध होगा। जब तुम परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखोगे, तो परमेश्वर तुम पर एक दायित्व डाल देगा, और उसने तुम्हें जो काम सौंपें हैं, उनके बारे में वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जब परमेश्वर द्वारा तुम्हें यह बोझ दिया जाएगा, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय सभी संबंधित सत्य पर ध्यान दोगे। यदि तुम्हारे ऊपर भाई-बहनों की स्थिति से जुड़ा बोझ है तो यह बोझ परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है, और तुम प्रतिदिन की प्रार्थना में इस बोझ को हमेशा अपने साथ रखोगे। परमेश्वर जो करता है वही तुम्हें सौंपा गया है, और तुम वो करने के लिए तैयार हो जिसे परमेश्वर करना चाहता है; परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ समझने का यही अर्थ है। इस बिंदु पर, परमेश्वर के वचन को खाते और पीते समय, तुम इस तरह के मामलों पर ध्यान केन्द्रित करोगे, और तुम सोचोगे कि मैं इन समस्याओं को कैसे सुलझा पाऊँगा? मैं अपने भाइयों और बहनों को मुक्ति और आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करने के योग्य कैसे बना सकता हूँ? तुम संगति करते और परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते समय भी इन मुद्दों को हल करने पर ध्यान दोगे, तुम इन मुद्दों से संबंधित वचनों को खाने-पीने पर भी ध्यान दोगे। तुम उसके वचनों को खाते-पीते समय भी बोझ उठाओगे। एक बार जब तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ लोगे, तो तुम्हारे मन में तुम स्पष्ट हो जाओगे कि तुम्हें किस मार्ग पर चलना है। यह पवित्र आत्मा की वह प्रबुद्धता और रोशनी है जो तुम्हारे बोझ का परिणाम है, और यह परमेश्वर का मार्गदर्शन भी है जो तुम्हें प्रदान किया गया है। मैं ऐसा क्यों कहता हूं? यदि तुम्हारे ऊपर कोई बोझ नहीं है, तब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय इस पर ध्यान नहीं दोगे; बोझ उठाने के दौरान जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों का सार समझ सकते हो, अपना मार्ग खोज सकते हो, और परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रख सकते हो। इसलिए, परमेश्वर से प्रार्थना करते समय तुम्हें अधिक बोझ माँगना चाहिए, और अधिक बड़े काम सौंपे जाने की कामना करनी चाहिए, ताकि तुम्हारे आगे अभ्यास करने के लिए और अधिक मार्ग हों, ताकि तुम्हारे परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का और ज्यादा प्रभाव हो; ताकि तुम उसके वचनों के सार को प्राप्त करने में सक्षम हो जाओ; और तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने के लिए और भी सक्षम हो जाओ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रार्थना का अभ्यास करना, परमेश्वर के बोझ को स्वीकार करना, और उसे स्वीकार करना जो उसने तुम्हें सौंपा है—ये सब मार्ग को प्राप्त करने के उद्देश्य से हैं। परमेश्वर द्वारा सौंपा गया जितना अधिक बोझ तुम्हारे ऊपर होगा, तुम्हारे लिए उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना उतना ही आसान होगा। कुछ लोग परमेश्वर की सेवा में दूसरों के साथ समन्वय करने के इच्छुक नहीं होते, तब भी नहीं जबकि वे बुलाए जाते हैं; ये आलसी लोग केवल आराम का सुख उठाने के इच्छुक होते हैं। तुमसे जितना अधिक दूसरों के साथ समन्वय करने का आग्रह किया जाएगा, तुम उतना ही अधिक अनुभव प्राप्त करोगे। तुम्हारे पास अधिक बोझ होने के कारण, तुम अधिक अनुभव करोगे, तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने का अधिक मौका होगा। इसलिए, यदि तुम सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा कर सको, तो तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहोगे; और इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाये जाने का अधिक अवसर होगा। ऐसे ही मनुष्यों के एक समूह को इस समय पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा जितना अधिक तुम्हें स्पर्श करेगा, तुम उतने ही अधिक परमेश्वर के बोझ के लिए विचारशील रहने के प्रति समर्पित होओगे, तुम्हें परमेश्वर द्वारा उतना अधिक पूर्ण बनाया जाएगा, तुम्हें उसके द्वारा उतना अधिक प्राप्त किया जाएगा, और अंत में, तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जिसे परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान में, कुछ ऐसे लोग हैं जो कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं उठाते। ये लोग सुस्त और ढीले-ढाले हैं, और वे केवल अपने शरीर की चिंता करते हैं। ऐसे लोग बहुत स्वार्थी होते हैं और अंधे भी होते हैं। यदि तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम नहीं होते हो, तो तुम कोई बोझ नहीं उठा पाओगे। तुम जितना अधिक परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखोगे, तुम्हें परमेश्वर उतना ही अधिक बोझ सौंपेगा। स्वार्थी लोग ऐसी चीज़ें सहना नहीं चाहते; वे कीमत नहीं चुकाना चाहते, परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर से चूक जाते हैं। क्या वे अपना नुकसान नहीं कर रहे हैं? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखता है, तो तुम कलीसिया के लिए वास्तविक बोझ विकसित करोगे। वास्तव में, इसे कलीसिया के लिए बोझ उठाना कहने की बजाय, यह कहना चाहिए कि तुम खुद अपने जीवन के लिए बोझ उठा रहे हो, क्योंकि कलीसिया के प्रति बोझ तुम इसलिए पैदा करते हो, ताकि तुम ऐसे अनुभवों का इस्तेमाल परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए कर सको। इसलिए, जो भी कलीसिया के लिए सबसे भारी बोझ उठाता है, जो भी जीवन में प्रवेश के लिए बोझ उठाता है, उसे ही परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है। क्या तुमने इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लिया है? जिस कलीसिया के साथ तुम हो, यदि वह रेत की तरह बिखरी हुई है, लेकिन तुम न तो चिंतित हो और न ही व्याकुल, यहाँ तक कि जब तुम्हारे भाई-बहन परमेश्वर के वचनों को सामान्य ढंग से खाते-पीते नहीं हैं, तब भी तुम आँख मूंद लेते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम कोई जिम्मेदारी वहन नहीं कर रहे। ऐसे मनुष्य से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। परमेश्वर जिनसे प्रसन्न होता है वे लोग धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं और वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशील होते हैं। इसलिए, तुम्हें परमेश्वर के बोझ के लिए अभी तुरंत विचारशील हो जाना चाहिए; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने से पहले तुम्हें इंतजार नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर सभी लोगों के सामने अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करे। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए अभी अच्छा अवसर है। यदि तुम अपने हाथ से इस अवसर को निकल जाने दोगे, तो तुम जीवन भर पछताओगे, जैसे मूसा कनान की अच्छी भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया और जीवन भर पछताता रहा, पछतावे के साथ ही मरा। एक बार जब परमेश्वर अपना धार्मिक स्वभाव सभी लोगों पर प्रकट कर देगा, तो तुम पछतावे से भर जाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें ताड़ना नहीं भी देता है, तो भी तुम स्वयं ही अपने आपको अपने पछतावे के कारण ताड़ना दोगे। कुछ लोग इस बात से आश्वस्त नहीं हैं, यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इन्तजार करो और देखो। कुछ लोगों का उद्देश्य एकमात्र इन वचनों को साकार करना है। क्या तुम इन वचनों के लिए खुद को बलिदान करने को तैयार हो?

यदि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर को नहीं ढूँढते हो, और यदि तुम पूर्णता की अपनी खोज में बाकियों से आगे रहने का प्रयास नहीं करोगे, तो तुम अंततः पछताओगे। यह समय ही पूर्ण बनाए जाने का श्रेष्ठ अवसर है; यह बहुत ही अच्छा समय है। यदि तुम गंभीरतापूर्वक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश नहीं करोगे, तो उसका काम पूरा हो जाने पर, बहुत देर हो जाएगी—तुम अवसर से चूक जाओगे। तुम्हारी अभिलाषा कितनी भी बड़ी हो, यदि परमेश्वर ने काम करना बंद कर दिया है तो फिर तुम चाहे कितने भी प्रयास कर लो, तुम कभी भी पूर्णता हासिल नहीं कर पाओगे। जब पवित्र आत्मा अपना महान कार्य कर रहा हो तो तुम्हें इस अवसर को हथिया लेना चाहिए और सहयोग करना चाहिए। यदि तुम इस अवसर को गँवा दोगे, तो फिर चाहे कितने भी प्रयास कर लो, तुम्हें दूसरा अवसर नहीं दिया जाएगा। तुम में से कुछ लोग चिल्लाते हैं, "परमेश्वर, मैं तुम्हारे बोझ के प्रति विचारशील होने का इच्छुक हूँ, और मैं तुम्हारी इच्छा को संतुष्ट करने का इच्छुक हूँ!" लेकिन तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं है, इसलिए तुम्हारा बोझ अंत तक टिकेगा नहीं। यदि तुम्हारे सामने एक मार्ग है, तो तुम धीरे-धीरे अनुभव प्राप्त करोगे और तुम्हारा अनुभव संरचित और संयोजित होगा। एक बोझ पूरा हो जाने के बाद, तुम्हें दूसरा दिया जाएगा। जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन अनुभव गहरा होगा, तुम्हारा बोझ भी गहन होता जाएगा। कुछ लोग तभी बोझ उठाते हैं जब वे पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाते हैं; कुछ समय के बाद, जब उनके पास अभ्यास के लिए कोई मार्ग नहीं होता, तो वे कोई भी बोझ उठाना बंद कर देते हैं। मात्र परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से तुम बोझ का विकास नहीं कर सकते। बहुत सारे सत्य को समझ कर, तुम विवेक हासिल कर पाओगे और तुम सत्य के उपयोग से समस्याओं को हल करने में सक्षम बन जाओगे, और तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन और इच्छा की और भी सटीक समझ होगी। इन बातों के साथ, तुम बोझ विकसित करोगे, और तुम तभी सही ढंग से काम कर पाओगे। यदि तुम्हारे पास बोझ है, लेकिन तुम्हारे पास सत्य की स्पष्ट समझ नहीं है, तो यह भी काम नहीं करेगा; तुम्हें व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए, और तुम्हें यह पता होना चाहिए कि उनका अभ्यास कैसे करना है। जब तुम वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे, तभी तुम दूसरों को पोषण दे सकोगे, उनकी अगुवाई कर सकोगे, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे तुम निजी कार्य करो या सार्वजनिक, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर का आनंद प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और चाहे अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम हमेशा उसी मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी की तरह लेने में समर्थ हैं, और वे अपने भविष्य की संभावना पर कोई विचार नहीं करते : यहाँ तक कि जब उनके पास कोई संभावना नहीं होती, और उन्हें कुछ भी मिलने वाला नहीं होता, तब भी वे हमेशा एक प्रेमपूर्ण हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमज़ोर होती, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए दर्द सहन कर सकते हैं और उसे छोड़ सकते हैं, जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ मिलकर शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ मिलकर शासन करते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

यीशु परमेश्वर का आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य—पूरा करने में समर्थ था, क्योंकि उसने अपने लिए कोई योजना या व्यवस्था किए बिना परमेश्वर की इच्छा का पूरा ध्यान रखा। इसलिए वह परमेश्वर का अंतरंग—स्वयं परमेश्वर भी था, एक ऐसी बात, जिसे तुम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हो। (वास्तव में, वह स्वयं परमेश्वर था, जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी। मैंने इसका उल्लेख मुद्दे को उदहारण के साथ समझाने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए किया है।) वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को बिलकुल केंद्र में रखने में समर्थ था, और हमेशा स्वर्गिक पिता से प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा जानने का प्रयास करता था। उसने प्रार्थना की और कहा : "परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा हो, उसे पूरा कर, और मेरी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी योजना के अनुसार कार्य कर। मनुष्य कमज़ोर हो सकता है, किंतु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य, जो कि तेरे हाथों में एक चींटी के समान है, तेरी चिंता के योग्य कैसे हो सकता है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके, जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझमें करना चाहता है।" यरूशलम जाने के मार्ग पर यीशु बहुत संतप्त था, मानो उसके हृदय में कोई चाकू भोंक दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने की जरा-सी भी इच्छा नहीं थी; एक सामर्थ्यवान ताक़त उसे लगातार उस ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी, जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाना था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा करते हुए पापमय देह के सदृश बन गया। वह मृत्यु एवं अधोलोक की बेड़ियों से मुक्त हो गया। उसके सामने नैतिकता, नरक एवं अधोलोक ने अपना सामर्थ्य खो दिया और उससे परास्त हो गए। वह तेंतीस वर्षों तक जीवित रहा, और इस पूरे समय उसने परमेश्वर के उस वक्त के कार्य के अनुसार परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए, कभी अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में विचार किए बिना और हमेशा परमपिता परमेश्वर की इच्छा के बारे में सोचते हुए, हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया। अत:, उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद, परमेश्वर ने कहा : "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप थी, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे की भारी ज़िम्मेदारी डाल दी और उसे पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ा दिया, और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के योग्य और उसका पात्र बन गया। जीवन भर उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान द्वारा अनगिनत बार प्रलोभन दिया गया, किंतु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे इतना बड़ा कार्य इसलिए दिया, क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था और उससे प्रेम करता था, और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहा : "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" उस समय, केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था, और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए गए समस्त लोगों के छुटकारे के उसके कार्य का एक भाग था।

यदि, यीशु के समान, तुम लोग परमेश्वर की ज़िम्मेदारी पर पूरा ध्यान देने में समर्थ हो, और अपनी देह की इच्छाओं से मुँह मोड़ सकते हो, तो परमेश्वर अपने महत्वपूर्ण कार्य तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तें पूरी कर सको। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम परमेश्वर की इच्छा और आदेश पूरे कर रहे हो, और केवल तभी तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकोगे कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

परमेश्वर से प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीज़ों में उसकी इच्छा को खोजना, और जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करो, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करो, और यह देखने की कोशिश करो कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह तुमसे क्या हासिल करने के लिए कहता है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। उदाहरण के लिए : जब ऐसा कुछ होता है, जिसमें तुम्हें कठिनाई झेलने की आवश्यकता होती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को एक तरफ़ रख दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज़ नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए, और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुम पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, तो सबसे पहले तुम्हें अपने आपको एक तरफ़ रखना और देह को सभी चीज़ों में सबसे अधम समझना चाहिए। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करोगे, यह उतनी ही अधिक स्वतंत्रता लेता है; यदि तुम इस समय इसे संतुष्ट करते हो, तो अगली बार यह तुमसे और अधिक की माँग करेगा। जब यह जारी रहता है, लोग देह को और अधिक प्रेम करने लग जाते हैं। देह की हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा चाहता है कि तुम इसे संतुष्ट और भीतर से प्रसन्न करो, चाहे यह उन चीज़ों में हो जिन्हें तुम खाते हो, जो तुम पहनते हो, या जिनमें आपा खो देते हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देते हो...। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उसकी कामनाएँ उतनी ही बड़ी हो जाती हैं, और उतना ही अधिक वह ऐयाश बन जाता है, जब तक कि वह उस स्थिति तक नहीं पहुँच जाता, जहाँ लोगों का देह और अधिक गहरी धारणाओं को आश्रय देता है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है और स्वयं को महिमामंडित करता है, और परमेश्वर के कार्य के बारे में संशयात्मक हो जाता है। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उतनी ही बड़ी देह की कमज़ोरियाँ होती हैं; तुम हमेशा महसूस करोगे कि कोई भी तुम्हारी कमज़ोरियों के साथ सहानुभूति नहीं रखता, तुम हमेशा विश्वास करोगे कि परमेश्वर बहुत दूर चला गया है, और तुम कहोगे : "परमेश्वर इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? वह लोगों का पीछा क्यों नहीं छोड़ देता?" जब लोग देह को संतुष्ट करते हैं, और उससे बहुत अधिक प्यार करते हैं, तो वे अपने आपको बरबाद कर बैठते हैं। यदि तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हो, और देह को संतुष्ट नहीं करते, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह बहुत सही और बहुत अच्छा होता है, और यह कि तुम्हारे विद्रोह के लिए उसका शाप और तुम्हारी अधार्मिकता के बारे में उसका न्याय तर्कसंगत है। कई बार ऐसा होगा, जब परमेश्वर तुम्हें अपने सामने आने के लिए बाध्य करते हुए ताड़ना देगा और अनुशासित करेगा, और तुम्हें तैयार करने के लिए माहौल बनाएगा—और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि जो कुछ परमेश्वर कर रहा है, वह अद्भुत है। इस प्रकार तुम ऐसा महसूस करोगे, मानो कोई ज्यादा पीड़ा नहीं है, और यह कि परमेश्वर बहुत प्यारा है। यदि तुम देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देते हो, और कहते हो कि परमेश्वर अति कर देता है, तो तुम हमेशा पीड़ा का अनुभव करोगे और हमेशा उदास रहोगे, और तुम परमेश्वर के समस्त कार्य के बारे में अस्पष्ट रहोगे, और ऐसा प्रतीत होगा मानो परमेश्वर मनुष्यों की कमज़ोरियों के प्रति बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं रखता, और वह मनुष्यों की कठिनाइयों से अनजान है। और इस प्रकार से तुम हमेशा दुःखी और अकेला महसूस करोगे, मानो तुमने बड़ा अन्याय सहा है, और उस समय तुम शिकायत करना आरंभ कर दोगे। जितना अधिक तुम इस प्रकार से देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा दोगे, उतना ही अधिक तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर बहुत अति कर देता है, जब तक कि यह इतना बुरा नहीं हो जाता कि तुम परमेश्वर के कार्य को नकार देते हो, और परमेश्वर का विरोध करने लगते हो, और अवज्ञा से भर जाते हो। इसलिए तुम्हें देह से विद्रोह करना चाहिए और उसे बढ़ावा नहीं देना चाहिए : "मेरा पति (मेरी पत्नी), बच्चे, सम्भावनाएँ, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता! मेरे हृदय में केवल परमेश्वर है, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए भरसक प्रयास करना चाहिए और देह को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।" तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए। यदि तुममें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, और अपने आप को एक ओर करोगे, तो तुम ऐसा बहुत ही कम प्रयास के द्वारा कर पाओगे। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने एक साँप देखा, जो सड़क पर बर्फ में जम कर कड़ा हो गया था। किसान ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया, और साँप ने जीवित होने के पश्चात् उसे डस लिया, जिससे उस किसान की मृत्यु हो गई। मनुष्य की देह साँप के समान है : इसका सार उसके जीवन को हानि पहुँचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है, तो तुम जीवन पर से अपना अधिकार खो बैठते हो। देह शैतान से संबंधित है। इसके भीतर असंयमित इच्छाएँ हैं, यह केवल अपने बारे में सोचता है, यह आरामतलब है और फुरसत में रंगरलियाँ मनाता है, सुस्ती और आलस्य में धँसा रहता है, और इसे एक निश्चित बिंदु तक संतुष्ट करने के बाद तुम अंततः इसके द्वारा खा लिए जाओगे। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम इसे इस बार संतुष्ट करोगे, तो अगली बार यह और अधिक की माँग करने आ जाएगा। इसकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ और नई माँगें रहती हैं, और अपने आपको और अधिक पोषित करवाने और उसके सुख के बीच रहने के लिए तुम्हारे द्वारा अपने को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाता है—और यदि तुम इस पर विजय नहीं पाओगे, तो तुम अंततः स्वयं को बरबाद कर लोगे। तुम परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकते हो या नहीं, और तुम्हारा परम अंत क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे कार्यान्वित करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है, और तुम्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के लिए तैयार नहीं हो, तुम सत्य को अभ्यास में लाने के लिए तैयार नहीं हो, तुम अपनी देह के विरुद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने के लिए तैयार नहीं हो, जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता हो, तो अंततः तुम अपने आप को बरबाद कर लोगे, और इस प्रकार चरम पीड़ा सहोगे। यदि तुम हमेशा अपनी देह को खुश करते हो, तो शैतान तुम्हें धीरे-धीरे निगल लेगा, और तुम्हें जीवन या पवित्रात्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय नहीं हो जाते। जब तुम अंधकार में रहोगे, तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में अब परमेश्वर नहीं होगा, और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दोगे और उसे छोड़ दोगे। इसलिए, यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें पीड़ा की क़ीमत चुकानी चाहिए और कठिनाई सहनी चाहिए। बाहरी जोश और कठिनाई, अधिक पढ़ने तथा अधिक भाग-दौड़ करने की कोई आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय, उन्हें अपने भीतर की चीज़ों को एक तरफ रख देना चाहिए : असंयमित विचार, व्यक्तिगत हित, और उनके स्वयं के विचार, धारणाएँ और प्रेरणाएँ। परमेश्वर की यही इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना कर्तव्य अपनी पूरी क्षमता से, खुले और ईमानदार दिलों के साथ पूरा करना चाहिए, और जो भी कीमत ज़रूरी हो, उसे चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, जब दिन आएगा, तो परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति के प्रति लापरवाह नहीं रहेगा, जिसने उसके लिए कष्ट उठाए होंगे या कीमत चुकाई होगी। इस प्रकार का दृढ़ विश्वास बनाए रखने लायक है, और यह सही है कि तुम लोगों को इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। केवल इसी तरह से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूँ। वरना तुम लोगों के बारे में मैं कभी निश्चिंत नहीं हो पाऊँगा, और तुम हमेशा मेरी घृणा के पात्र रहोगे। अगर तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिए कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिए अपनी जीवन भर की ऊर्जा अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिए अक्सरहर्ष से नहीं उछलेगा? इस तरह से मैं तुम लोगों के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत हो सकूँगा, या नहीं? यह शर्म की बात है कि तुम लोग जो कर सकते हो, वह मेरी अपेक्षाओं का दयनीय रूप से एक बहुत छोटा-सा भाग है। ऐसे में, तुम लोग मुझसे वे चीज़ें पाने की धृष्टता कैसे कर सकते हो, जिनकी तुम आशा करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

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