41. परमेश्वर के साथ संगतता प्राप्त करने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना, और अपने भ्रष्ट स्वभाव का परिशुद्ध होना आवश्यक है। केवल इसी से यह निश्चित हो सकता है कि अब परमेश्वर की अवज्ञा या विरोध नहीं होगा;

(2) सत्य की तलाश करना और इसके विभिन्न पहलुओं को समझ लेना आवश्यक है। केवल इसी से यह निश्चित हो सकता है कि चीज़ों पर किसी के अपने विचार मसीह के अनुरूप हैं और उसका विरोध नहीं करते;

(3) परमेश्वर के सभी वचनों के प्रति समर्पण करना आवश्यक है। यदि कोई उन्हें समझ नहीं भी पाता हो, तो भी उसे सत्य के प्रति समर्पण करना सीखना चाहिए, ताकि यह निश्चित हो सके कि वह परमेश्वर की अवज्ञा या विरोध नहीं कर रहा है;

(4) मसीह के द्वारा परिपूर्ण किए जाने और अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने को स्वीकार करना आवश्यक है। केवल इसी प्रकार व्यक्ति मसीह को पूर्ण रूप से समर्पित हो सकता है और वो बन सकता है जो उसकी गवाही देता हो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए

(परमेश्वर के वचनों का चुनिंदा अध्याय)

मैं मनुष्यों के मध्य बहुत कार्य कर चुका हूँ और इस दौरान मैंने कई वचन भी व्यक्त किए हैं। ये समस्त वचन मनुष्य के उद्धार के लिए हैं, और इसलिए व्यक्त किए गए थे, ताकि मनुष्य मेरे अनुकूल बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने थोड़े ही लोग पाए हैं, जो मेरे अनुकूल हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों कोनहीं सँजोता—ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है। इस तरह, मैं जो कार्य करता हूँ, वह सिर्फ़ इसलिए नहीं किया जाता कि मनुष्य मेरी आराधना कर सके; बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से वह इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य मेरे अनुकूल बन सके। मनुष्य भ्रष्ट हो चुका है और शैतान के फंदे में जी रहा है। सभी लोग देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं, और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं, जो मेरे अनुकूल हो। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि वे मेरे अनुकूल हैं, परंतु वे सब अस्पष्ट मूर्तियों की आराधना करते हैं। हालाँकि वे मेरे नाम को पवित्र मानते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मूलत: वे सब मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही "उपयुक्त" अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका वाचनपवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुकूल कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्रों को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे बाइबल के भीतर एक ऐसे अज्ञात परमेश्वर को कैद कर देते हैं, जिसे उन्होंने स्वयं भी कभी नहीं देखा है, और जिसे देखने में वे अक्षम हैं, और जिसे वे फ़ुरसत के समय में ही निगाह डालने के लिए बाहर निकालते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाकलापोंपर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। बहुत सेलोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। कहा जा सकता है कि वे वचनों और उक्तियों को बहुत महत्वपूर्ण समझते हैं, इस हद कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुकूलता का मार्ग या सत्य के साथ अनुकूलता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के वचनों के साथ अनुकूलता का मार्ग खोजते हैं, औरविश्वास करते हैं कि कोई भी चीज़ जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के साथ अनुकूल होने की कोशिश नहीं की, बल्कि कर्मठतापूर्वक व्यवस्था का इस हद तक अक्षरशः पालन किया कि—यीशु पर पुराने विधान की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए—निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुकूलता के मार्ग की खोज नहीं की? उनके दिमाग़ में पवित्रशास्त्र का एक-एक वचन घर कर गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि सख्तीसे पवित्रशास्त्र के वचनों से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। दरअसल वे बाइबल की रखवाली करने वाले कुत्ते थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने अपना भविष्य त्यागने और यीशु की निंदा करने के लिए उसकी मृत्यु के रूप में पापबलि देने को प्राथमिकता दी, क्योंकि यीशु पवित्रशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक वचन के नौकर नहीं थे?

और आज के लोगों के बारे में क्या कहूँ? मसीह सत्य बताने के लिए आया है, फिर भी वे निश्चित ही उसे इस दुनिया से निष्कासित कर देंगे, ताकि वे स्वर्ग में प्रवेश हासिल कर सकें और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। वे बाइबल के हितों की रक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को पूरी तरह से नकार देंगे और बाइबल का चिरस्थायी अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए देह में लौटे मसीह को फिर से सूली पर चढ़ा देंगे। मनुष्य मेरा उद्धार कैसे प्राप्त कर सकता है, जब उसका हृदय इतना अधिक द्वेष से भरा है और उसकी प्रकृति मेरेइतनी विरोधी है? मैं मनुष्य के मध्य रहता हूँ, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे नहीं जानता। जब मैं मनुष्य पर अपना प्रकाश डालता हूँ, तब भी वह मेरे अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है। जब मैं लोगों पर क्रोधित होता हूँ, तो वे मेरे अस्तित्व को और अधिक प्रबलता से नकारते हैं। मनुष्य वचनों और बाइबल के साथ अनुकूलता की खोज करता है, लेकिन सत्य के साथ अनुकूलता का मार्ग खोजने के लिए एक भी व्यक्ति मेरे समक्ष नहीं आता। मनुष्य मुझे स्वर्ग में खोजता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो देह में उन्हीं के बीच रहता हूँ, बहुत मामूली हूँ। जो लोग सिर्फ़ बाइबल के वचनों के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ़ एक अज्ञात परमेश्वर के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं, वे मेरे लिए एक घृणित दृश्य हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं, और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अनकहा खज़ाना देने में सक्षम है; जिस परमेश्वर की वे आराधना करते हैं, वह एक ऐसा परमेश्वर है, जो अपने आपको मनुष्य के नियंत्रण मेंछोड़ देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य बस वचनों के लिए बहुत नीच है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मेरे सामने असीमित माँगें रखते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

जो लोग मेरे विरुद्ध हैं, वे मेरे अनुकूल नहीं हैं। ऐसा ही मामला उनका है, जो सत्य से प्रेम नहीं करते। जो मेरे प्रति विद्रोह करते हैं, वे मेरे और भी अधिक विरुद्ध हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं। जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, मैं उन सभी को बुराई के हाथों में छोड़ देता हूँ, जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, मैं उन सभी को बुराई द्वारा भ्रष्ट किए जाने के लिए त्याग देता हूँ, उन्हें अपने दुष्कर्म प्रकट करने के लिए असीमित स्वतंत्रता दे देता हूँ, और अंत में उन्हें बुराई को सौंप देता हूँ कि वह उन्हें निगल जाए। मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मेरी आराधना करते हैं, अर्थात्, मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मुझ पर विश्वास करते हैं। मुझे सिर्फ इस बात की फिक्र है कि कितने लोग मेरे अनुकूल हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सब जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, वे ऐसे दुष्ट हैं जो मुझे धोखा देते हैं; वे मेरे शत्रु हैं, और मैं अपने शत्रुओं को अपने घर में "प्रतिष्ठापित" नहीं करूँगा। जो मेरे अनुकूल हैं, वे हमेशा मेरे घर में मेरी सेवा करेंगे, और जो मेरे विरुद्ध जाते हैं, वे हमेशा मेरी सज़ा भुगतेंगे। जो सिर्फ़ बाइबल के वचनों पर ही ध्यान देते हैं और न तो सत्य में दिलचस्पी रखते हैं और न मेरे पदचिह्न खोजने में—वे मेरे विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मुझे बाइबल के अनुसार सीमित कर देते हैं, मुझे बाइबल में ही कैद कर देते हैं, और इसलिए वे मेरे परम निंदक हैं। ऐसे लोग मेरे सामने कैसे आ सकते हैं? वे मेरे कर्मों या मेरी इच्छा या सत्य पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि वचनों से ग्रस्त हो जाते हैं—वचन जो मार देते हैं। ऐसे लोग मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

मैंने बहुत सारे वचन कहे हैं, और अपनी इच्छा और अपने स्वभाव को भी व्यक्त किया है, फिर भी लोग अभी भी मुझे जानने और मुझ पर विश्वास करने में अक्षम हैं। या यह कहा जा सकता है कि लोग अभी भी मेरी आज्ञा का पालन करने में अक्षम हैं। जो बाइबल में जीते हैं, जो व्यवस्था में जीते हैं, जो सलीब पर जीते हैं, जो सिद्धांत के अनुसार जीते हैं, जो उस कार्य के मध्य जीते हैं जिसे मैं आज करता हूँ—उनमें से कौन मेरे अनुकूल है? तुम लोग सिर्फ़ आशीष और पुरस्कार पाने के बारे में ही सोचते हो, पर कभी यह नहीं सोचा कि मेरे अनुकूल वास्तव में कैसे बनो, या अपने को मेरे विरुद्ध होने से कैसे रोको। मैं तुम लोगों से बहुत निराश हूँ, क्योंकि मैंने तुम लोगों को बहुत अधिक दिया है, जबकि मैंने तुम लोगों से बहुत कम हासिल किया है। तुम लोगों का छल, तुम लोगों का घमंड, तुम लोगों का लालच, तुम लोगों की फालतू इच्छाएँ, तुम लोगों का धोखा, तुम लोगों की अवज्ञा—इनमें से कौन-सी चीज़ मेरी नज़र से बच सकती है? तुम लोग मेरे प्रति असावधान हो, मुझे मूर्ख बनाते हो, मेरा अपमान करते हो, मुझे फुसलाते हो, मुझसे ज़बरन वसूली करते हो, बलिदानों के लिए मुझसे ज़बरदस्ती करते हो—ऐसे दुष्कर्म मेरी सज़ा से कैसे बचकर निकल सकते हैं? ये सब दुष्कर्म मेरे साथ तुम लोगों की शत्रुता का प्रमाण हैं, और तुम लोगों की मेरे साथ अनुकूलता न होने का प्रमाण हैं। तुम लोगों में से प्रत्येक अपने को मेरे साथ बहुत अनुकूल समझता है, परंतु यदि ऐसा होता, तो फिर यह अकाट्य प्रमाण किस पर लागू होगा? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति बहुत ईमानदारी और निष्ठा है। तुम लोग सोचते हो कि तुम बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो और तुमने मेरे प्रति बहुत समर्पण किया है। तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त से अधिक किया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी इसे अपने कामों से मिलाकर देखा है? मैं कहता हूँ, तुम लोग बहुत हीघमंडी, बहुत ही लालची, बहुत ही लापरवाह हो; और जिन चालबाज़ियों से तुम मुझे मूर्ख बनाते हो, वे बहुत शातिर हैं, और तुम्हारे इरादे और तरीके बहुत घृणित हैं। तुम लोगों की वफ़ादारी बहुत ही थोड़ी है, तुम्हारी ईमानदारी बहुत ही कम है, और तुम्हारी अंतरात्मा तो और अधिक क्षुद्र है। तुम लोगों के हृदय में बहुत ही अधिक द्वेष है, और तुम्हारे द्वेष से कोई नहीं बचा है, यहाँ तक कि मैं भी नहीं। तुम लोग अपने बच्चों या अपने पति या आत्म-रक्षा के लिए मुझे बाहर निकाल देते हो। मेरी चिंता करने के बजाय तुम लोग अपने परिवार, अपने बच्चों, अपनी हैसियत, अपने भविष्य और अपनी संतुष्टि की चिंता करते हो। तुम लोगों ने बातचीत या कार्य करते समय कभी मेरे बारे में सोचा है? ठंड के दिनों में तुम लोगों के विचार अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी या अपने माता-पिता की तरफ मुड़ जाते हैं। गर्मी के दिनों में भी तुम सबके विचारों में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, तब तुम अपने हितों, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कब मेरे लिए क्या किया है? तुमने कब मेरे बारे में सोचा है? तुमने कब अपने आप को, हर कीमत पर, मेरे लिए और मेरे कार्य के लिए समर्पित किया है? मेरे साथ तुम्हारी अनुकूलता का प्रमाण कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी वफ़ादारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी आज्ञाकारिता की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे केवल मेरे आशीष पाने के लिए नहीं रहे हैं? तुम लोग मुझे मूर्ख बनाते और धोखा देते हो, तुम लोग सत्य के साथ खेलते हो, तुम सत्य के अस्तित्व को छिपाते हो, और सत्य के सार को धोखा देते हो। इस तरह मेरे ख़िलाफ़ जाने से भविष्य में क्या चीज़ तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रही है? तुम लोग केवल एक अज्ञात परमेश्वर के साथ अनुकूलता की खोज करते हो, और मात्र एक अज्ञात विश्वास की खोज करते हो, लेकिन तुम मसीह के साथ अनुकूल नहीं हो। क्या तुम्हारी दुष्टता के लिए भी वही प्रतिफल नहीं मिलेगा, जो दुष्ट को मिलता है? उस समय तुम लोगों को एहसास होगा कि जो कोई मसीह के अनुकूल नहीं होता, वह कोप के दिन से बच नहीं सकता, और तुम लोगों को पता चलेगा कि जो मसीह के शत्रु हैं, उन्हें कैसा प्रतिफल दिया जाएगा। जब वह दिन आएगा, तो परमेश्वर में विश्वास के कारण धन्य होने और स्वर्ग में प्रवेश पाने के तुम लोगों के सभी सपने चूर-चूर हो जाएँगे। परंतु यह उनके लिए नहीं है, जो मसीह के अनुकूल हैं। यद्यपि उन्होंने बहुत-कुछ खोया है, यद्यपि उन्होंने बहुत कठिनाइयों का सामना किया है, तथापि वे उस सब उत्तराधिकार को प्राप्त करेंगे, जो मैं मानवजाति को वसीयत के रूप में दूँगा। अंततः तुम लोग समझ जाओगे कि सिर्फ़ मैं ही धार्मिक परमेश्वर हूँ, और केवल मैं ही मानवजाति को उसकी खूबसूरत मंज़िल तक ले जाने में सक्षम हूँ।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से

मसीह के संपर्क में आने से पहले, तुम लोगों को शायद यह विश्वास हो कि तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह से बदल चुका है, और तुम मसीह के निष्ठावान अनुयायी हो, और यह भी विश्वास हो कि तुम मसीह के आशीष पाने के सबसे ज़्यादा योग्य हो। क्योंकि तुम कई मार्गों की यात्रा कर चुके हो, बहुत सारा काम करके बहुत-सा फल प्राप्त कर चुके हो, इसलिए अंत में तुम्हें ही मुकुट मिलेगा। फिर भी, एक सच्चाई ऐसी है जिसे शायद तुम नहीं जानते: जब मनुष्य मसीह को देखता है तो मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसका विद्रोह और प्रतिरोध उजागर हो जाता है। किसी अन्य अवसर की तुलना में इस अवसर पर उसका विद्रोही स्वभाव और प्रतिरोध कहीं ज्यादा पूर्ण और निश्चित रूप से उजागर होता है। मसीह मनुष्य का पुत्र है—मनुष्य का ऐसा पुत्र जिसमें सामान्य मानवता है—इसलिए मनुष्य न तो उसका सम्मान करता है और न ही उसका आदर करता है। चूँकि परमेश्वर देह में रहता है, इसलिए मनुष्य का विद्रोह पूरी तरह से और स्पष्ट विवरण के साथ प्रकाश में आ जाता है। अतः मैं कहता हूँ कि मसीह के आगमन ने मानवजाति के सारे विद्रोह को खोद निकाला है और मानवजाति के स्वभाव को बहुत ही स्पष्ट रूप से प्रकाश में ला दिया है। इसे कहते हैं "लालच देकर एक बाघ को पहाड़ के नीचे ले आना" और "लालच देकर एक भेड़िए को उसकी गुफा से बाहर ले आना।" क्या तुम लोग कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो? क्या तुम लोग कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति संपूर्ण आज्ञाकारिता दिखाते हो? क्या तुम लोग कह सकते हो कि तुम विद्रोही नहीं हो? कुछ लोग कहेंगेः जब भी परमेश्वर मुझे नई परिस्थिति में डालता है, तो मैं इसे स्वीकार कर लेता हूँ और कभी कोई शिकायत नहीं करता। साथ ही, मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाता। कुछ कहेंगेः परमेश्वर मुझे जो भी काम सौंपता है, मैं उसे अपनी पूरी योग्यता के साथ करता हूँ और कभी भी लापरवाही नहीं करता। तब मैं तुम लोगों से यह पूछता हूँ: क्या तुम सब मसीह के साथ रहते हुए उसके अनुरूप हो सकते हो? और कितने समय तक तुम सब उसके अनुरूप रहोगे? एक दिन? दो दिन? एक घंटा? दो घंटे? हो सकता है तुम्हारी आस्था प्रशंसा के योग्य हो, परन्तु तुम लोगों में कोई खास दृढ़ता नहीं है। जब तुम सचमुच में मसीह के साथ रहोगे, तो तुम्हारा दंभ और अहंकार धीरे-धीरे तुम्हारे शब्दों और कार्यों के द्वारा प्रकट होने लगेगा, और इसी प्रकार तुम्हारी अत्यधिक इच्छाएँ, अवज्ञाकारी मानसिकता और असंतुष्टि स्वतः ही उजागर हो जाएँगी। आखिरकार, तुम्हारा अहंकार बहुत ज़्यादा बड़ा हो जाएगा, जब तक कि तुम मसीह के साथ वैसे ही बेमेल नहीं हो जाते जैसे पानी और आग, और तब तुम लोगों का स्वभाव पूरी तरह से उजागर हो जायेगा। उस समय, तुम्हारी धारणाएँ पर्दे में नहीं रह सकेंगी। तुम्हारी शिकायतें भी अनायास ही बाहर आ जाएँगी, और तुम्हारी नीच मानवता पूरी तरह से उजागर हो जाएगी। फिर भी, तुम अपने विद्रोहीपन को स्वीकार करने से लगातार इनकार करते रहते हो। बल्कि तुम यह विश्वास करते रहते हो कि ऐसे मसीह को स्वीकार करना मनुष्य के लिए आसान नहीं है, वह मनुष्य के प्रति बहुत अधिक कठोर है, अगर वह कोई अधिक दयालु मसीह होता तो तुम पूरी तरह से उसे समर्पित हो जाते। तुम लोग यह विश्वास करते हो कि तुम्हारे विद्रोह का एक जायज़ कारण है, तुम केवल तभी मसीह के विरूद्ध विद्रोह करते हो जब वह तुम लोगों को हद से ज़्यादा मजबूर कर देता है। तुमने कभी यह एहसास नहीं किया कि तुम मसीह को परमेश्वर नहीं मानते, न ही तुम्हारा इरादा उसकी आज्ञा का पालन करने का है। बल्कि, तुम ढिठाई से यह आग्रह करते हो कि मसीह तुम्हारे मन के अनुसार काम करे, और यदि वह एक भी कार्य ऐसा करे जो तुम्हारे मन के अनुकूल नहीं हो तो तुम लोग मान लेते हो कि वह परमेश्वर नहीं, मनुष्य है। क्या तुम लोगों में से बहुत से लोग ऐसे ही नहीं हैं जिन्होंने उसके साथ इस तरह से विवाद किया है? आख़िरकार तुम लोग किसमें विश्वास करते हो? और तुम लोग उसे किस तरह से खोजते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

तुम सब हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं तुम सबसे विनती करता हूँ कि तुम अपने आपको इतना ऊँचा न समझो; हर कोई मसीह को देख सकता है, परन्तु मैं कहता हूँ कि कोई भी मसीह को देखने के लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बुराई, अहंकार और विद्रोह से भरा हुआ है, इस समय तुम मसीह को देखोगे तो तुम्हारा स्वभाव तुम्हें बर्बाद कर देगा और बेहद तिरस्कृत करेगा। किसी भाई (या बहन) के साथ तुम्हारी संगति शायद तुम्हारे बारे में बहुत कुछ न दिखाए, परन्तु जब तुम मसीह के साथ संगति करते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय, तुम्हारी धारणा जड़ पकड़ सकती है, तुम्हारा अहंकार फूटना शुरू कर सकता है, और तुम्हारा विद्रोह फलना-फूलना शुरू कर सकता है। ऐसी मानवता के साथ तुम लोग कैसे मसीह की संगति के काबिल हो सकते हो? क्या तुम उसके साथ प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में परमेश्वर जैसा बर्ताव कर सकते हो? क्या तुममें सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता होगी? तुम सब अपने हृदय में यहोवा के रूप में एक ऊँचे परमेश्वर की आराधना करते हो, लेकिन दृश्यमान मसीह को मनुष्य समझते हो। तुम लोगों की समझ बहुत ही हीन है और तुम्हारी मानवता अत्यंत नीची है! तुम सब सदैव के लिए मसीह को परमेश्वर के रूप में मानने में असमर्थ हो; कभी-कभार ही, जब तुम्हारा मन होता है, तुम उसकी ओर लपकते हो और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करने लगते हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, बल्कि उन लोगों का सहभागी जत्था हो जो मसीह के विरूद्ध लड़ते हैं। ऐसे मनुष्यों को भी जो दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाते हैं, इसका प्रतिफल दिया जाता है। फिर भी मसीह को, जिसने तुम्हारे मध्य ऐसा कार्य किया है, न तो मनुष्य का प्रेम मिला है और न ही मनुष्य की तरफ से उसे कोई प्रतिफल या समर्पण मिला है। क्या यह दिल दुखाने वाली बात नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

हो सकता है कि परमेश्वर में अपने इतने वर्षों के विश्वास के कारण तुमने कभी किसी को कोसा न हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी अगर मसीह के साथ अपनी संगति में तुम सच नहीं बोल सकते, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और कपटी व्यक्ति। हो सकता है तुम अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति अत्यंत स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाते हो, लेकिन अगर तुम मसीह के अनुरूप नहीं पाते हो और उसके साथ समरसता के साथ व्यवहार नहीं कर पाते हो, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब कुछ खपा दो या अपने माता-पिता और घरवालों की अच्छी देखभाल करो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। सिर्फ इसलिए कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छे काम कर लेते हो, तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम लोग सोचते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीष बटोर सकती है? क्या तुम सोचते हो कि थोड़े-से अच्छे काम कर लेना तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकता है? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और काट-छांट स्वीकार नहीं कर पाता, और तुम सभी को मसीह की सरल मानवता को अंगीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का निरंतर ढोल पीटते रहते हो। तुम्हारी इस तरह की आस्था का तुम पर उचित प्रतिकार फूटेगा। काल्पनिक भ्रमों में लिप्त होना और मसीह को देखने की इच्छा करना छोड़ दो, क्योंकि तुम सब आध्यात्मिक कद में बहुत छोटे हो, इतने कि तुम लोग उसे देखने के योग्य भी नहीं हो। जब तुम अपने विद्रोह से पूरी तरह से मुक्त हो जाओगे, और मसीह के साथ समरसता स्थापित कर लोगे, तभी परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने प्रकट होगा। यदि तुम काट-छांट या न्याय से गुज़रे बिना परमेश्वर को देखने जाते हो, तो तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर के विरोधी बन जाओगे और विनाश तुम्हारी नियति बन जाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परमेश्वर के प्रति बैर-भाव अंतर्निहित है, क्योंकि सभी मनुष्यों को शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। यदि कोई मनुष्य भ्रष्ट होते हुए परमेश्वर से संगति करने का प्रयास करे, तो यह निश्चित है कि इसका कोई अच्छा परिणाम नहीं हो सकता; मनुष्य के सारे कर्म और शब्द निश्चित तौर पर हर मोड़ पर उसकी भ्रष्टता को उजागर करेंगे; और जब वह परमेश्वर के साथ जुड़ेगा, तो उसका विद्रोह अपने सभी पहलुओं के साथ प्रकट हो जाएगा। मनुष्य अनजाने में मसीह का विरोध करता है, मसीह को धोखा देता है, और मसीह को अस्वीकार करता है; जब यह होता है तो मनुष्य और भी ज़्यादा संकट की स्थिति में आ जाता है, और यदि यह जारी रहता है, तो वह दंड का भागी बनता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

फ़िलहाल, ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें इंसान नहीं समझता है. इसका क्या अर्थ है कि इंसान नहीं समझता है? इसका अर्थ है कि मानवजाति, जो कि भ्रष्ट है, ऐसे विचार और ख़्यालात रखती है जो, कई सन्दर्भों में, देहधारी परमेश्वर के विचारों और ख़्यालों से मेल नहीं खाते; इसका अर्थ है कि वे सिद्धांत और आधार जिनके अनुसार इंसान कई चीज़ों के साथ व्यवहार करता है, देहधारी परमेश्वर के सिद्धांत और आधार के साथ मेल नहीं खाते. और इस समस्या की जड़ कहाँ है? परमेश्वर और मानवजाति के बीच के संबंधों को कौन-सा घटक प्रभावित कर रहा है? यह है मानवजाति का भ्रष्ट स्वभाव. अर्थात्, मानवजाति अभी भी शैतान के साथ खड़ी है; इंसान शैतान के ज़हर के भरोसे जीता है, और अपने जीने के तौर-तरीक़ों में इंसान शैतान के स्वभाव को प्रकट करता है. परमेश्वर का सार सत्य है; यह अचल है. तो, परमेश्वर के साथ समन्वय बनाने के लिए किसे बदलना होगा? (मानवजाति को.) यकीनन, यह मानवजाति ही है; इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती. तो फिर, मानवजाति को कैसे बदलना होगा? उन्हें परमेश्वर के सामने आना और सत्य को स्वीकार करना होगा; इंसान के लिए सत्य को स्वीकार करना चीज़ों के बारे में परमेश्वर के नज़रिए से, और उन सिद्धांतों से जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, समस्वर होने का एक मात्र तरीक़ा है. उस मार्ग पर एक बार कदम रखते ही, तुम्हारा रवैया और जिस तरह से तुम चीज़ों को देखते हो, वे सिद्धांत जिनके अनुसार तुम काम करते हो, और अन्य सब कुछ क्रमशः परमेश्वर के साथ समस्वर होना प्रारंभ कर देगा. इस तरह, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच रही वे ग़लतफ़हमियाँ लगातार कम होती जाएँगी, अब कोई विरोधाभास नहीं रहेंगे, और परमेश्वर को परखने की तुम्हारी कोशिशें लगातार कम होती जाएँगी.

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य और परमेश्वर के बीच संबंध सुधारना अत्यंत आवश्यक है' से उद्धृत

अपने स्वभाव में बदलाव की खोज में, तुम्हें स्वयं की समझ में एक निश्चित अवस्था तक पहुँचना चाहिए, जहाँ तुम उन शैतानी विषों का पता लगा सको जो तुम्हारी प्रकृति के भीतर बसी हैं। तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर की अवहेलना करने का क्या मतलब है, साथ ही साथ परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने का क्या अर्थ है, और तुम्हें यह सीखना चाहिए कि सभी मामलों में सत्य के अनुरूप आचरण कैसे करना है। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं के बारे में भी कुछ समझ प्राप्त करनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष ज़मीर और विवेक से युक्त होना चाहिए, तुम्हें डींगे नहीं हांकनी चाहिए और परमेश्वर से धोखा नहीं करना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर का विरोध करने वाली बातें अब नहीं करनी चाहिए। इस तरह, तुमने अपना स्वभाव बदल लिया होगा। जिनके स्वभाव बदल गए हैं वे मन की गहराई में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा का अनुभव करते हैं, और परमेश्वर के प्रति उनका विद्रोह धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसके अलावा, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में, उन्हें अब आवश्यकता नहीं होती कि दूसरे उनकी चिंता करें, और न ही पवित्र आत्मा को हमेशा उन पर अनुशासनात्मक कार्य करने की आवश्यकता होती है। वे मूलत: परमेश्वर को समर्पित हो सकते हैं, और चीज़ों पर उनके विचारों में सत्य मौजूद होता है। यह सब परमेश्वर के साथ संगत होने के बराबर है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

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