40. परमेश्वर के उद्धार की प्राप्ति के सिद्धांत

(1) परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को, उसकी काट-छाँट और उसके निपटारे को, उसके परीक्षणों और शोधन को स्वीकार करना, और उसके धर्मी स्वभाव को जान लेना आवश्यक है, जिससे तुम्हारे दिल में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो।

(2) परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय सत्य को स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होना आवश्यक है, जिससे पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त किया जा सके, सत्य को समझा जा सके और वास्तविकता में प्रवेश किया जा सके।

(3) परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना आवश्यक है। उसके वचनों में उससे प्रार्थना और उसके साथ संवाद करने में सक्षम बनो, और उसे अपने दिल में सर्वोपरि रखो, जहाँ वह राजा के रूप में राज्य करे।

(4) झूठे अगुवाओं, मसीह-विरोधियों और हर प्रकार के पाखंड और भ्रान्ति को समझने में सक्षम बनो और मसीह के प्रति समर्पण करने और गवाही देने में सक्षम हो। केवल ऐसा करने से ही किसी को बचाया जा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो चिह्न और चमत्कार स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक इस बात का संबंध था कि मनुष्य को उसके भीतर के शैतानी स्वभावों से कैसे मुक्त किया जाए, तो यह कार्य अभी किया जाना बाकी था। मनुष्य को उसके विश्वास के कारण केवल बचाया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु उसका पापी स्वभाव उसमें से नहीं निकाला गया था और वह अभी भी उसके अंदर बना हुआ था। मनुष्य के पाप देहधारी परमेश्वर के माध्यम से क्षमा किए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं रह गया था। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए जा सकते हैं, परंतु मनुष्य इस समस्या को हल करने में पूरी तरह असमर्थ रहा है कि वह आगे कैसे पाप न करे और कैसे उसका भ्रष्ट पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया और रूपांतरित किया जा सकता है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए थे और ऐसा परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से हुआ था, परंतु मनुष्य अपने पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीता रहा। इसलिए मनुष्य को उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना आवश्यक है, ताकि उसका पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया जा सके और वह फिर कभी विकसित न हो पाए, जिससे मनुष्य का स्वभाव रूपांतरित होने में सक्षम हो सके। इसके लिए मनुष्य को जीवन में उन्नति के मार्ग को समझना होगा, जीवन के मार्ग को समझना होगा, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझना होगा। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता होगी, ताकि उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल सके और वह प्रकाश की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वह अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और इसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अनिश्चित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का पुत्र माना, और उसके एक महान नबी और उदार प्रभु होने की घोषणा की, जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपने विश्वास के बल पर केवल उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सकते थे, यहाँ तक कि मृतक भी जिलाए जा सकते थे। कितु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए भ्रष्ट शैतानी स्वभाव का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार को आशीष, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के भले कर्म और उसकी ईश्वर के अनुरूप दिखावट थी; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था, तो उसे एक स्वीकार्य विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें बचा लिया गया है। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिलकुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाने और उसके परिणामस्वरूप उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापपूर्ण प्रकृति को दूर करने में असफल रहता और मनुष्य केवल अपने पापों की क्षमा पर आकर रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना रहने के कारण वह अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है, और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और उससे सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का पूर्णतः समापन किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर में आस्था का अर्थ बचाया जाना है, तो बचाये जाने के क्या मायने हैं? "बचाया जाना," "शैतान के अंधकारपूर्ण प्रभाव से मुक्त होना"—लोग अक्सर इन विषयों के बारे में बात करते हैं, लेकिन वे बचाये जाने का अर्थ नहीं जानते। बचाए जाने का क्या अर्थ है? इसका संबंध परमेश्वर की इच्छा से है। सीधे-सादे ढंग से कहें, तो बचाए जाने का अर्थ है कि तू जीता रह सकता है, और तुझे जीवन में वापस लाया गया है। तो इससे पहले, क्या तू मरा हुआ है? तू बोल सकता है, और तू साँस ले सकता है, तो तुझे मरा हुआ कैसे कहा जा सकता है? (प्राण मर चुका है।) ऐसा क्यों कहा जाता है कि यदि लोगों के प्राण मर गए हैं तो वे मर गए हैं? इस कहावत का आधार क्या है? उद्धार प्राप्त कर लेने से पहले लोग किसके अधिकार क्षेत्र में जीते हैं? (शैतान के अधिकार क्षेत्र में।) और शैतान के अधिकार क्षेत्र में जीने के लिए वे किस पर निर्भर करते हैं? वे जीने के लिए अपनी शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभावों का सहारा लेते हैं। जब कोई व्यक्ति इन चीज़ों के अनुसार जीता है, तो उनका संपूर्ण अस्तित्व—उनकी देह, और उनके प्राण और उनके विचार जैसे सभी अन्य पहलू—जीवित है या मृत? परमेश्वर के दृष्टिकोण से वे मृत हैं। ऊपर से तू साँस लेते हुए और सोचते हुए दिखाई देता है, लेकिन हर चीज़ जिसके बारे में तू लगातार सोचता है वह दुष्टता है; तू उन चीज़ों के बारे में सोचता है जो परमेश्वर की अवहेलना करती हैं और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करती हैं, ऐसी चीजें जिनसे परमेश्वर नफ़रत करता है, घृणा करता है और जिनकी निंदा करता है। परमेश्वर की नजर में, ये सभी चीज़ें न केवल देह से संबंधित हैं, बल्कि वे पूरी तरह शैतान और दुष्टात्माओं से संबंधित हैं। तो परमेश्वर की नज़र में लोग क्या हैं? क्या वे इंसान हैं? नहीं, वे नहीं हैं। परमेश्वर उन्हें हैवानों के रूप में, जानवरों के रूप में, और शैतानों, जीवित शैतानों के रूप में देखता है! लोग शैतान की चीज़ों और उसके सार के अनुसार जीते हैं, और परमेश्वर की नज़र में, वे स्वयं मानव देह धारण किए हुए जीवित शैतान हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को चलती-फिरती लाशों के रूप में; मरे हुए लोगों के रूप में परिभाषित करता है। परमेश्वर ऐसे लोगों को—इन चलती-फिरती लाशों को जो अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभावों और अपने भ्रष्ट शैतानी सार के अनुसार जीती हैं—ऐसे कथित मृत लोगों को ले कर उन्हें जीवित में बदल देने के लिए अपना उद्धार का वर्तमान कार्य करता है। बचाए जाने का यही अर्थ है।

परमेश्वर पर विश्वास करने का मकसद उद्धार प्राप्त करना है। बचाए जाने का अर्थ है कि तू मृत व्यक्ति से जीवित व्यक्ति में बदल जाता है। इससे तात्पर्य है कि तेरी साँस पुनर्जीवित हो जाती है, और तू जीवित हो जाता है; तू परमेश्‍वर को पहचान पाता है, और तू उसकी आराधना करने के लिए सिर झुकाने में सक्षम है। तेरे हृदय में परमेश्वर के विरुद्ध कोई और प्रतिरोध नहीं होता है; तू अब और उसकी अवहेलना नहीं करता है, उस पर हमला नहीं करता है, या उसके विरुद्ध विद्रोह नहीं करता है। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर की नज़र में असलियत में जीवित हैं। यदि कोई केवल कहता है कि वह परमेश्वर को स्वीकार करता है, तो क्या वे जीवितों में से हैं? (नहीं, वे जीवित नहीं हैं।) तो किस प्रकार के लोग जीवित हैं? जीवित प्राणी किस प्रकार की वास्तविकता को धारण करता है? कम से कम, जीवित प्राणी मानव भाषा बोल सकते हैं। वह क्या होती है? इसका अर्थ है कि जिन शब्दों को वे बोलते हैं उसमें मत, विचार, और विवेक शामिल होते हैं। जीवित प्राणी किन चीज़ों के बारे में बार-बार सोचता है। वे मानवीय गतिविधियों में संलग्न होने, और अपने कर्तव्यों को पूरा करने में सक्षम होते हैं। उनकी कथनी और करनी की प्रकृति क्या है? वह वो सब कुछ है जो वे प्रकट करते हैं, सोचते हैं, और करते हैं, वो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की प्रकृति के साथ किया जाता है। इसे अधिक उपयुक्त रूप से कहें, तो जीवित प्राणियों में से एक होने के नाते, तेरे हर कर्म और हर विचार की परमेश्वर द्वारा निंदा नहीं की जाती है या उनसे नफ़रत नहीं की जाती है या उन्हें अस्वीकार नहीं किया जाता है; बल्कि, उनका परमेश्वर द्वारा अनुमोदन और प्रशंसा की जाती है। यही जीवित व्यक्ति करता है, और यही वह है जो जीवित व्यक्ति को करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल अगर व्यक्ति आज्ञाकारी है तभी उसमें सच्चा विश्वास हो सकता है' से उद्धृत

अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करना चाहिए; उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना चाहिए, आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करना चाहिए। तभी वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, तभी वे परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे। जो जीवित हैं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं; वे परमेश्वर द्वारा न्याय व ताड़ना का सामना कर चुके होते हैं, वे स्वयं को समर्पित करने और आनंदपूर्वक अपने प्राण परमेश्वर के लिए न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं और वे प्रसन्नता से अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को अर्पित कर देते हैं। जब जीवित जन परमेश्वर की गवाही देते हैं, तभी शैतान शर्मिन्दा हो सकता है। केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के हृदय के अनुसार होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक जन हैं। पहले परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु के साए में रहता है, शैतान के प्रभाव में रहता है और इसलिए जो लोग आत्मा मृत हो चुके हैं जिनमें आत्मा नहीं है, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के हथियार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित मनुष्यों की रचना की थी, वे मृत लोग बन गए हैं, इसलिए परमेश्वर ने अपने गवाह खो दिये हैं और जिस मानवजाति को उसने बनाया था, एकमात्र चीज़ जिसमें उसकी सांसे थीं, उसने उसे खो दिया है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही और उन्हें जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, जो अब शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, वापस लेना है तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन्हें वापस लाना होगा ताकि वे उसके प्रकाश में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न होकर परमेश्वर-विरोधी हो गए हैं। मुख्यतः, सबसे आगे वही लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों का परमेश्वर की आज्ञा मानने का ज़रा-भी इरादा नहीं होता, वे केवल उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं, इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती। जीवित वे लोग हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर की आज्ञा मानना जानते हैं और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं। इनमें सत्य और गवाही होती है, और यही लोग परमेश्वर को अपने घर में अच्छे लगते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

लोग अपने विश्वास में, अगर उद्धार पाना चाहते हैं, तो यह जानना ज़रूरी है कि वे परमेश्वर से डरते हैं या नहीं, और क्या उनके दिलों में परमेश्वर के लिये जगह है। अगर तुम्हारा दिल उसके सामने रहने के काबिल नहीं है, अगर तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई सामान्य रिश्ता नहीं है, तो तुम कभी बचाये नहीं जाओगे। तुम्हारे उद्धार का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा; आगे जाने को कोई रास्ता नहीं होगा। परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास अगर बस नाम के लिए है तो यह विश्वास बेकार हो जाएगा, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा कि तुम कितने सिद्धांत बोल सकते हो या तुमने कितना कष्ट उठाया है, या तुम्हारे कुदरती वरदान कितने महान हैं। परमेश्वर यही कहेंगे, "मुझसे दूर हो जाओ, तुम कुकर्मी हो।" तुम्हें एक कुकर्मी के दर्जे में रखा जाएगा। तुम्हारा परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है; वह तुम्हारा शासक नहीं है, वह तुम्हारा सृष्टिकर्ता नहीं है, वह तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तुम उसकी आराधना नहीं करते, न ही उसका अनुसरण करते हो। तुम शैतान और राक्षसों का अनुसरण करते हो। तुम स्वयं अपने प्रभु हो। अंत में, परमेश्वर तुम्हारे जैसे लोगों को हटा देगा, उनसे घृणा करेगा, अस्वीकार करेगा और उन्हें दंडित करेगा। वह ऐसे लोगों को नहीं बचाता। जब लोग यह स्वीकार कर लेते हैं कि परमेश्वर ही उनका प्रभु और शासक है, जब वे यह स्वीकार करते हैं कि वह ही सत्य है, वही मनुष्य के मार्ग और जीवन का स्रोत है, केवल जब उनके सारे काम और जिस मार्ग पर वे चलते हैं, वह सत्य से, परमेश्वर से, उसके समक्ष समर्पण से, और उसके मार्ग का अनुसरण करने से जुड़ा होता है—तभी उन्हें बचाया जाएगा। अन्यथा, परमेश्वर उन्हें दंडित करेगा। क्या यह सही है कि लोग यह आशा लगाए बैठे रहें कि भाग्य उनका साथ देगा? क्या उनका हमेशा अपनी धारणाओं से चिपके रहना सही है? क्या उनका अस्पष्ट और अमूर्त कल्पनाओं से निरंतर चिपके रहना सही है? (नहीं।) यह मत सोचो कि भाग्य तुम्हारा साथ दे देगा; परमेश्वर में अपने विश्वास में यदि तुम उद्धार पाना चाहते हो, तो और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। ...

इन उपदेशों को सुनकर तुम लोगों के मन में जो भी उत्तेजना पैदा होती है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता; सब कुछ कहने-सुनने के बाद, एकमात्र सही मार्ग वह मार्ग है, जिसके कारण तुम परमेश्वर का भय मानते हो और बुराई से दूर रहते हो। यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो मगर तुम्हारी आस्था का परमेश्वर से कोई लेना-देना न हो, यदि वह तुम्हारा प्रभु और सृष्टिकर्ता नहीं है, यदि तुम उसे अपनी नियति का शासक नहीं मानते, यदि तुम उस सबके प्रति समर्पित नहीं होते, जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है, यदि तुम उस तथ्य को नहीं मानते कि वह सत्य है, तो तुम्हारा उद्धार पाने का सपना बिखर गया। यदि तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो तुम विनाश के पथ पर हो। मान लो, प्रतिदिन जिस पर तुम ध्यान देते हो, जिसे खोजते हो, जिससे प्रार्थना और अनुनय करते हो, उससे तुम्हें लगातार इस बात बोध हो रहा है कि तुम्हें सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए, परमेश्वर तुम्हारा प्रभु है। और मान लो तुम उसकी प्रभुसत्ता और अपने लिए उसके आयोजनों को सहर्ष स्वीकार कर लेते हो, परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो व्यवस्था की है, तुम उसके प्रति और भी प्रसन्नता से समर्पित हो जाते हो, तो तुम्हारी दशा लगातार सामान्य हो रही है, परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध और भी निकटता के बन रहे हैं, उसके लिए तुम्हारा प्रेम और भी शुद्ध हो रहा है और तब तुम्हारी निरर्थक इच्छाएँ कम होती हैं, परमेश्वर से शिकायतें कम होती हैं, उसके प्रति तुम्हारी गलतफहमियाँ कम होती हैं, तुम कम से कम बुरे कार्य करते हो, लगातार उन बुराइयों से दूर होते जाते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा भय और भी अधिक वास्तविक हो जाता है। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि तुमने उद्धार के मार्ग पर कदम रख दिया है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'निरंतर परमेश्वर के सामने रहकर ही तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

मनुष्य की देह शैतान की है, यह विद्रोही स्वभावों से परिपूर्ण है, यह दुखद रूप से गंदी है, और यह कुछ ऐसी है जो अस्वच्छ है। लोग देह के आनंद के लिए बहुत अधिक ललचाते हैं और देह की कई सारी अभिव्यंजनाएँ हैं; यही कारण है कि परमेश्वर मनुष्य की देह से एक निश्चित सीमा तक घृणा करता है। जब लोग शैतान की गंदी, भ्रष्ट चीज़ों को निकाल फेंकते हैं, तब वे परमेश्वर से उद्धार प्राप्त करते हैं। परंतु यदि वे गंदगी और भ्रष्टता से स्वयं को अब भी नहीं छुड़ाते हैं, तो वे अभी भी शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रह रहे हैं। लोगों की धूर्तता, छल-कपट, और कुटिलता सब शैतान की चीज़ें हैं। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार तुम्हें शैतान की इन चीज़ों से छुड़ाने के लिए है। परमेश्वर का कार्य ग़लत नहीं हो सकता है; यह सब लोगों को अंधकार से बचाने के लिए किया जाता है। जब तुमने एक निश्चित बिंदु तक विश्वास कर लिया है और देह की भ्रष्टता से अपने को छुड़ा सकते हो, और इस भ्रष्टता की बेड़ियों में अब और जकड़े नहीं हो, तो क्या तुम बचाए गए नहीं होगे? जब तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहते हो, तब तुम परमेश्वर को प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करने में असमर्थ होते हो, तुम कोई गंदी चीज़ होते हो, और परमेश्वर की विरासत प्राप्त नहीं कर सकते हो। एक बार जब तुम्हें स्वच्छ कर दिया और पूर्ण बना दिया गया, तो तुम पवित्र हो जाओगे, तुम सामान्य व्यक्ति हो जाओगे, और तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाओगे और परमेश्वर के प्रति आनंद से परिपूरित होओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (2)' से उद्धृत

मनुष्य शरीर के बीच रहता है, जिसका मतलब है कि वह मानवीय नरक में रहता है, और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के बगैर, मनुष्य शैतान के समान ही अशुद्ध है। मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है? पतरस मानता था कि परमेश्वर की ताड़ना और उसका न्याय मनुष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा और महान अनुग्रह है। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से ही मनुष्य जाग सकता है, और शरीर और शैतान से घृणा कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, उसे उसके खुद के छोटे-से संसार से मुक्त करता है, और उसे परमेश्वर की उपस्थिति के प्रकाश में जीवन बिताने का अवसर देता है। ताड़ना और न्याय से बेहतर कोई उद्धार नहीं है! पतरस ने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! जब तक तू मुझे ताड़ना देता और मेरा न्याय करता रहेगा, मुझे पता होगा कि तूने मुझे नहीं छोड़ा है। भले ही तू मुझे आनंद या शांति न दे, और मुझे कष्ट में रहने दे, और मुझे अनगिनत ताड़नाओं से प्रताड़ित करे, किंतु जब तक तू मुझे छोड़ेगा नहीं, तब तक मेरा हृदय सुकून में रहेगा। आज, तेरी ताड़ना और न्याय मेरी बेहतरीन सुरक्षा और महानतम आशीष बन गए हैं। जो अनुग्रह तू मुझे देता है वह मेरी सुरक्षा करता है। जो अनुग्रह आज तू मुझे देता है वह तेरे धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति है, और ताड़ना और न्याय है; इसके अतिरिक्त, यह एक परीक्षा है, और इससे भी बढ़कर, यह एक कष्टों भरा जीवनयापन है।" पतरस ने दैहिक सुख को एक तरफ रखकर, एक ज्यादा गहरे प्रेम और ज्यादा बड़ी सुरक्षा की खोज की, क्योंकि उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से बहुत सारा अनुग्रह हासिल कर लिया था। अपने जीवन में, यदि मनुष्य शुद्ध होकर अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन बिताना चाहता है, और एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, और उसे परमेश्वर के अनुशासन और प्रहार को अपने-आपसे दूर नहीं होने देना चाहिए, ताकि वह खुद को शैतान की चालाकी और प्रभाव से मुक्त कर सके, और परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिता सके। यह जान लो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रकाश है, मनुष्य के उद्धार का प्रकाश है, और मनुष्य के लिए इससे बेहतर कोई आशीष, अनुग्रह या सुरक्षा नहीं है। मनुष्य शैतान के प्रभाव में रहता है, और देह में जीता है; यदि उसे शुद्ध न किया जाए और उसे परमेश्वर की सुरक्षा प्राप्त न हो, तो वह और भी ज्यादा भ्रष्ट हो जाएगा। यदि वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे शुद्ध होना और उद्धार पाना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

वह सब जो परमेश्वर करता है आवश्यक है और असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि वह मनुष्य में जो कुछ करता है उसका सरोकार उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने अय्यूब में जो कार्य किया वह भी कोई भिन्न नहीं है, फिर भले ही परमेश्वर की नज़रों में अय्यूब पूर्ण और खरा था। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर चाहे जो करता हो या वह जो करता है उसे चाहे जिन उपायों से करता हो, क़ीमत चाहे जो हो, उसका ध्येय चाहे जो हो, किंतु उसके कार्यकलापों का उद्देश्य नहीं बदलता है। उसका उद्देश्य है मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, और साथ ही मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसके लिए परमेश्वर की इच्छा को आकार देना; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर उस सबको आकार देना है जिसे परमेश्वर अपने सोपानों के अनुसार सकारात्मक मानता है, जो मनुष्य को परमेश्वर का हृदय समझने और परमेश्वर का सार बूझने में समर्थ बनाता है, और मनुष्य को परमेश्वर की संप्रभुता को मानने और व्यवस्थाओं का पालन करने देता है, इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना प्राप्त करने देता है—यह सब परमेश्वर जो करता है उसमें निहित उसके उद्देश्य का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि चूँकि शैतान परमेश्वर के कार्य में विषमता और सेवा की वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दिया जाता है; यह वह साधन है जिसका उपयोग परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों में शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घृणास्पदता को देखने देने के लिए करता है, इस प्रकार लोगों में शैतान के प्रति घृणा उपजाता है और उन्हें वह जानने और पहचानने में समर्थ बनाता जो नकारात्मक है। यह प्रक्रिया उन्हें शैतान के नियंत्रण से और आरोपों, हस्तक्षेप और हमलों से धीरे-धीरे स्वयं को स्वतंत्र करने देती है—जब तक कि परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान और आज्ञाकारिता, और परमेश्वर में उनके विश्वास और भय के कारण, वे शैतान के हमलों और आरोपों के ऊपर विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे शैतान के अधिकार क्षेत्र से पूर्णतः मुक्त कर दिए गए होंगे। लोगों की मुक्ति का अर्थ है कि शैतान को हरा दिया गया है; इसका अर्थ है कि वे अब और शैतान के मुँह का भोजन नहीं हैं—उन्हें निगलने के बजाय, शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग खरे हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के प्रति आस्था, आज्ञाकारिता और भय है, और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को कायर बना देते हैं, और वे शैतान को पूरी तरह हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनका दृढ़विश्वास, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और उसका भय शैतान को हरा देता है, और उन्हें पूरी तरह छोड़ देने के लिए शैतान को विवश कर देता है। केवल इस जैसे लोग ही परमेश्वर द्वारा सच में प्राप्त किए गए हैं, और यही मनुष्य को बचाने में परमेश्वर का चरम उद्देश्य है। यदि वे बचाए जाना चाहते हैं, और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह प्राप्त किए जाना चाहते हैं, तो उन सभी को जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं शैतान के बड़े और छोटे दोनों प्रलोभनों और हमलों का सामना करना ही चाहिए। जो लोग इन प्रलोभनों और हमलों से उभरकर निकलते हैं और शैतान को पूरी तरह परास्त कर पाते हैं ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचा लिया गया है। कहने का तात्पर्य यह, वे लोग जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की परीक्षाओं से गुज़र चुके हैं, और अनगिनत बार शैतान द्वारा लुभाए और हमला किए जा चुके हैं। वे जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं को समझते हैं, और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार कर पाते हैं, और वे शैतान के प्रलोभनों के बीच परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं छोड़ते हैं। वे जिन्हें परमेश्वर पर्यंत बचा लिया गया है वे ईमानदारी से युक्त हैं, वे उदार हृदय हैं, वे प्रेम और घृणा के बीच अंतर करते हैं, उनमें न्याय की समझ है और वे तर्कसंगत हैं, और वे परमेश्वर की परवाह कर पाते और वह सब जो परमेश्वर का है सँजोकर रख पाते हैं। ऐसे लोग शैतान की बाध्यता, जासूसी, दोषारोपण या दुर्व्यवहार के अधीन नहीं होते हैं, वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं, उन्हें पूरी तरह मुक्त और रिहा कर दिया गया है। अय्यूब बिल्कुल ऐसा ही स्वतंत्र मनुष्य था, और ठीक यही परमेश्वर द्वारा उसे शैतान को सौंपे जाने का महत्व था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

अय्यूब की आस्था, आज्ञाकारिता, और शैतान पर विजय पाने की उसकी गवाही लोगों के लिए अत्यधिक सहायता और प्रोत्साहन का स्रोत रहे हैं। वे अय्यूब में अपने स्वयं के उद्धार की आशा देखते हैं, और देखते हैं कि परमेश्वर के प्रति आस्था, और आज्ञाकारिता और उसके भय के माध्यम से, शैतान को हराना, और शैतान के ऊपर हावी होना पूरी तरह संभव है। वे देखते हैं कि जब तक वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार करते हैं, और जब तक सब कुछ खो देने के बाद भी परमेश्वर को न छोड़ने का दृढ़संकल्प और विश्वास उनमें है, तब तक वे शैतान को लज्जित और पराजित कर सकते हैं, और वे देखते हैं कि शैतान को भयभीत करने और हड़बड़ी में पीछे हटने को मजबूर करने के लिए, उन्हें केवल अपनी गवाही पर डटे रहने की धुन और लगन की आवश्यकता है—भले ही इसका अर्थ अपने प्राण गँवाना हो। अय्यूब की गवाही बाद की पीढ़ियों के लिए चेतावनी है, और यह चेतावनी उन्हें बताती है कि यदि वे शैतान को नहीं हराते हैं, तो वे शैतान के दोषारोपणों और छेड़छाड़ से कभी अपना पीछा नहीं छुड़ा पाएँगे, न ही वे कभी शैतान के दुर्व्यवहार और हमलों से बचकर निकल पाएँगे। अय्यूब की गवाही ने बाद की पीढ़ियों को प्रबुद्ध किया है। यह प्रबुद्धता लोगों को सिखाती है कि यदि वे पूर्ण और खरे हैं, केवल तभी वे परमेश्वर का भय मान पाएँगे और बुराई से दूर रह पाएँगे; यह उन्हें सिखाती है कि यदि वे परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, केवल तभी वे परमेश्वर के लिए ज़ोरदार और गूँजती हुई गवाही दे सकते हैं; यदि वे परमेश्वर के लिए ज़ोरदार और गूँजती हुई गवाही देते हैं, केवल तभी वे शैतान द्वारा कभी नियंत्रित नहीं किए जा सकते हैं और परमेश्वर के मार्गदर्शन तथा सुरक्षा में रहते हैं—केवल तभी उन्हें सचमुच बचा लिया गया होगा। अय्यूब के व्यक्तित्व और जीवन के उसके अनुसरण की बराबरी हर उस व्यक्ति को करनी चाहिए जो उद्धार का अनुसरण करता है। अपने संपूर्ण जीवन के दौरान उसने जो जिया और अपनी परीक्षाओं के दौरान उसका आचरण उन सब लोगों के लिए अनमोल ख़ज़ाना है जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

अभी जब लोगों को बचाया नहीं गया है, तब शैतान के द्वारा उनके जीवन में प्रायः हस्तक्षेप, और यहाँ तक कि उन्हें नियंत्रित भी किया जाता है। दूसरे शब्दों में, वे लोग जिन्हें बचाया नहीं गया है शैतान के क़ैदी होते हैं, उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं होती, उन्हें शैतान द्वारा छोड़ा नहीं गया है, वे परमेश्वर की आराधना करने के योग्य या पात्र नहीं हैं, शैतान द्वारा उनका क़रीब से पीछा और उन पर क्रूरतापूर्वक आक्रमण किया जाता है। ऐसे लोगों के पास कहने को भी कोई खुशी नहीं होती है, उनके पास कहने को भी सामान्य अस्तित्व का अधिकार नहीं होता, और इतना ही नहीं, उनके पास कहने को भी कोई गरिमा नहीं होती है। यदि तुम डटकर खड़े हो जाते हो और शैतान के साथ संग्राम करते हो, शैतान के साथ जीवन और मरण की लड़ाई लड़ने के लिए शस्त्रास्त्र के रूप में परमेश्वर में अपने विश्वास और अपनी आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय का उपयोग करते हो, ऐसे कि तुम शैतान को पूरी तरह परास्त कर देते हो और उसे तुम्हें देखते ही दुम दबाने और भीतकातर बन जाने को मज़बूर कर देते हो, ताकि वह तुम्हारे विरुद्ध अपने आक्रमणों और आरोपों को पूरी तरह छोड़ दे—केवल तभी तुम बचाए जाओगे और स्वतंत्र हो पाओगे। यदि तुमने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ने का ठान लिया है, किंतु यदि तुम शैतान को पराजित करने में तुम्हारी सहायता करने वाले शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित नहीं हो, तो तुम अब भी खतरे में होगे; समय बीतने के साथ, जब तुम शैतान द्वारा इतना प्रताड़ित कर दिए जाते हो कि तुममें रत्ती भर भी ताक़त नहीं बची है, तब भी तुम गवाही देने में असमर्थ हो, तुमने अब भी स्वयं को अपने विरुद्ध शैतान के आरोपों और हमलों से पूरी तरह मुक्त नहीं किया है, तो तुम्हारे उद्धार की कम ही कोई आशा होगी। अंत में, जब परमेश्वर के कार्य के समापन की घोषणा की जाती है, तब भी तुम शैतान के शिकंजे में होगे, अपने आपको मुक्त करने में असमर्थ, और इस प्रकार तुम्हारे पास कभी कोई अवसर या आशा नहीं होगी। तो, निहितार्थ यह है कि ऐसे लोग पूरी तरह शैतान की दासता में होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

अपने उद्धार के लिए व्यक्ति को कौन सी शर्तें पूरी करनी ज़रूरी हैं? सबसे पहले, उसके अंदर शैतानी मसीह-विरोधी को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए; उसके अंदर सत्य का यह दृष्टिकोण ज़रूर होना चाहिए। केवल सत्य के इस दृष्टिकोण से ही वह वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकता है और मनुष्य की आराधना करने या उसका अनुसरण करने से बच सकता है; केवल वही लोग मसीह विरोधी की पहचान कर सकते हैं जिनके अंदर वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करने और उसकी गवाही देने की क्षमता है। मसीह-विरोधियों की पहचान करने के लिए, लोगों को सबसे पहले पूरी स्पष्टता और समझ के साथ लोगों और चीज़ों को देखना सीखना चाहिए; उन्हें मसीह-विरोधियों के सार को महसूस करने में सक्षम होना चाहिए, और उनके तमाम षड्यंत्रों, चालबाजियों, अंतःप्रेरणाओं, और उद्देश्यों को समझना चाहिए। यदि तुम ऐसा कर सकते हो, तो तुम दृढ़ रह सकते हो। यदि तुम उद्धार प्राप्त करना चाहते हो, तो पहली परीक्षा जो तुम्हें पास करनी होगी वह यह सीखना है कि शैतान को कैसे पराजित किया जाए और प्रतिरोधी शक्तियों तथा बाहरी दुनिया के हस्तक्षेप पर कैसे विजय प्राप्त की जाए। यदि तुम शैतान की शक्तियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में अंत तक टिके रहने का कद और पर्याप्त सत्य प्राप्त कर लेते हो, और उन्हें पराजित कर देते हो, तब—और केवल तब—तुम अनवरत सत्य का अनुसरण कर सकते हो, और केवल तब तुम सत्य का अनुसरण और उद्धार के रास्ते पर दृढ़तापूर्वक और बिना किसी दुर्घटना के चल सकते हो। यदि तुम यह परीक्षा पास नहीं कर सकते, तब यह कहा जा सकता है कि तुम एक बड़े ख़तरे में हो, और तुम मसीह-विरोधी के कब्जे में आ सकते हो और तुम्हें शैतान के प्रभाव में जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है। वर्तमान में तुम लोगों के बीच कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जो सत्य का अनुसरण करने वालों को रोकें या ठोकर मारें, और ये उन लोगों के शत्रु हैं। क्या तुम इसे स्वीकार करते हो? कुछ ऐसे लोग हैं जो इस तथ्य का सामना करने की हिम्मत नहीं रखते, न ही वे इसे तथ्य के रूप में स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं। हक़ीक़त में, ये चीज़ें कलीसिया में मौजूद हैं; बात केवल इतनी है कि लोग पहचान नहीं पाते। यदि तुम इस परीक्षा को पास नहीं कर सकते—मसीह-विरोधियों की परीक्षा, तब तुम या तो मसीह-विरोधियों के हाथों धोखा खा चुके हो और उन्हीं के द्वारा नियंत्रित हो या उन्होंने तुम्हें कष्ट दिया है, पीड़ा पहुँचायी है, बाहर धकेला है और प्रताड़ित किया है। अंततः, तुम्हारा यह छोटा-सा तुच्छ जीवन लंबे समय तक नहीं टिकेगा, और मुरझा जाएगा; तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं रख पाओगे, और तुम उसे छोड़ दोगे, यह कहते हुए, "परमेश्वर तो धार्मिक भी नहीं है; परमेश्वर कहाँ है? इस दुनिया में कोई धार्मिकता या प्रकाश नहीं है, और परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार जैसी कोई चीज़ नहीं है। हम काम करते हुए और पैसा कमाते हुए भी अपने दिन गुज़ार सकते हैं!" तुम परमेश्वर को नकारते हो और अब विश्वास नहीं करते कि वह मौजूद है; ऐसी कोई भी उम्मीद कि तुम्हारा उद्धार होगा, पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। इसलिए, यदि तुम उस जगह पहुँचना चाहते हो जहाँ पर तुम्हें उद्धार प्राप्त हो सके, तो पहली परीक्षा जो तुम्हें पास करनी होगी वह है शैतान की पहचान करने में सक्षम होना, और तुम्हारे अंदर शैतान के विरुद्ध खड़ा होने, उसे बेनकाब करने और उसे छोड़ देने का साहस भी होना चाहिए। फिर, शैतान कहाँ है? शैतान तुम्हारे बाजू में और तुम्हारे चारों तरफ़ है; हो सकता है कि वह तुम्हारे हृदय के भीतर भी रह रहा हो। यदि तुम शैतान के स्वभाव के अधीन रह रहे हो, तो यह कहा जा सकता है कि तुम शैतान के हो। तुम आध्यात्मिक क्षेत्र के शैतान को देख या छू नहीं सकते, लेकिन जो शैतान व्यावहारिक जीवन में मौजूद है, वह हर जगह है। कोई भी व्यक्ति जो सत्य से नफरत करता है वह बुरा है, और कोई भी अगुआ या कार्यकर्ता जो सत्य को स्वीकार नहीं करता वह मसीह-विरोधी और बुरा व्यक्ति है। क्या ऐसे लोग जीवित शैतान नहीं हैं? हो सकता है कि ये लोग वही हों, जिनकी तुम आराधना करते हो और जिनका सम्मान करते हो; ये वही लोग हो सकते हैं जो तुम्हारी अगुवाई कर रहे हैं या वे लोग जिनके प्रति तुम लंबे समय से अपने हृदय में आशा, श्रद्धा, निष्ठा और भरोसा बनाए हुए हो। जबकि वास्तव में, वे तुम्हारे रास्ते में खड़ी बाधाएँ हैं और तुम्हें उद्धार प्राप्त करने से रोक रहे हैं; वे मसीह-विरोधी हैं। वे तुम्हारे जीवन और तुम्हारे मार्ग पर नियंत्रण कर सकते हैं, और वे तुम्हारे उद्धार के अवसर को बर्बाद कर सकते हैं। यदि तुम उन्हें पहचानने और उनकी वास्तविकता को समझने में विफल रहते हो, तो किसी भी क्षण, तुम उनके जाल में फँस सकते हो या उनके द्वारा पकड़े और दूर ले जाए जा सकते हो। इस प्रकार, तुम बहुत बड़े ख़तरे में हो।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'सत्य का अनुसरण करने वालों को वे निकाल देते हैं और उन पर आक्रमण करते हैं' से उद्धृत

शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य पशु बन गया। उसके विचार बुराई और मलिनता से भर गए, और उसमें कोई अच्छाई और पवित्रता नहीं रही। क्या यह शैतान नहीं है? तुमने परमेश्वर के बहुत से कार्यों का अनुभव किया है, फिर भी न तो तुम बदले हो, न ही तुम शुद्ध हुए हो। तुम अभी भी शैतान के अधीन जी रहे हो, और परमेश्वर को समर्पित नहीं हो। तुम ऐसे व्यक्ति हो जिस पर विजय पाई जा चुकी है लेकिन जिसे पूर्ण नहीं बनाया गया है। और ऐसा क्यों कहा जाता है कि ऐसे व्यक्ति को पूर्ण नहीं बनाया गया है? इसका कारण यह है कि क्योंकि ऐसा व्यक्ति जीवन-विकास या परमेश्वर के कार्य के ज्ञान की खोज नहीं करता, और दैहिक आनंद और क्षणिक सुख से अधिक और कुछ नहीं चाहता। इसके परिणामस्वरूप, उसके जीवन-स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता, और वह मनुष्य के उस मूल रूप को फिर से प्राप्त नहीं कर पाता जिसे परमेश्वर द्वारा बनाया गया था। ऐसे लोग चलती-फिरती लाश होते हैं, वे मरे हुए लोग होते हैं जिनमें कोई आत्मा नहीं होती! जो लोग आत्मा के मामलों से जुड़े ज्ञान की खोज नहीं करते, जो पवित्रता की खोज नहीं करते, जो सत्य को जीने का प्रयास नहीं करते, जो केवल नकारात्मक पाले में स्वयं पर परमेश्वर द्वारा विजय पा लिए जाने से ही संतुष्ट हो जाते हैं, और जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी कर पवित्र मनुष्य नहीं बन पाते—वे ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है। क्योंकि, अगर मनुष्य में सत्य नहीं है, तो वह परमेश्वर के परीक्षणों में टिक नहीं पाता; जो लोग परमेश्वर के परीक्षणों के दौरान टिक पाते हैं, केवल उन्हीं लोगों को बचाया गया है। मुझे पतरस जैसे लोग चाहिए, ऐसे लोग जो पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं। आज का सत्य उन्हें दिया जाता है जो उसकी कामना और खोज करते हैं। यह उद्धार उन्हें दिया जाता है जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाने की कामना करते हैं, यह सिर्फ तुम लोगों द्वारा प्राप्त करने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य यह है कि तुम लोग परमेश्वर द्वारा ग्रहण किए जाओ; तुम लोग परमेश्वर को ग्रहण करते हो ताकि परमेश्वर तुम्हें ग्रहण कर सके। आज मैंने ये वचन तुम लोगों से कहे हैं, और तुमने इन्हें सुना है, तुम्हें इन वचनों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। अंत में, जब तुम लोग इन वचनों को व्यवहार में लाओगे, तो उस समय मैं इन वचनों द्वारा तुम्हें ग्रहण कर लूँगा; उसी समय, तुम भी इन वचनों को ग्रहण कर लोगे, यानी तुम लोग यह सर्वोच्च उद्धार पा लोगे। एक बार शुद्ध हो जाने के बाद तुम सच्चे मानव बन जाओगे। यदि तुम सत्य को जीने में असमर्थ हो, या उस व्यक्ति के समान जीवन बिताने में असमर्थ हो, जिसे पूर्ण बना दिया गया है, तो यह कहा जा सकता है कि तुम एक मानव नहीं, एक चलती-फिरती लाश हो, पशु हो, क्योंकि तुममें सत्य नहीं है, दूसरे शब्दों में, तुममें यहोवा की श्वास नहीं है, और इस प्रकार तुम एक मरे हुए इंसान हो जिसमें कोई आत्मा नहीं है! यद्यपि जीत लिए जाने के बाद गवाही देना संभव है, लेकिन इससे तुम्हें थोड़ा-सा ही उद्धार प्राप्त होता है, और तुम ऐसे जीवित प्राणी नहीं बन पाते जिसमें आत्मा है। हालाँकि तुमने ताड़ना और न्याय का अनुभव कर लिया होता है, फिर भी तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलता या नवीनीकृत नहीं हुआ होता; तुम अभी भी पुराने बने रहते हो, तुम अभी भी शैतान के अधिकार में होते हो, और तुम एक शुद्ध किए गए इंसान नहीं होते। केवल उन्हीं का मूल्य है जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है, और केवल ऐसे ही लोगों ने एक सच्चा जीवन प्राप्त किया होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

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