65. जिम्‍मेदारी स्‍वीकार करने और त्‍यागपत्र देने के सिद्धांत

(1) अगर कोई झूठा अगुआ या कार्यकर्ता सत्‍य को स्‍वीकार नहीं करता, व्‍यावहारिक कार्य नहीं कर सकता, और लंबे समय तक पवित्र आत्‍मा के कार्य से वंचित रहा है, तो उसे जिम्मेदारी स्‍वीकार करनी चाहिए और त्‍यागपत्र दे देना चाहिए।

(2) जो कोई भी कार्य-व्‍यवस्‍थाओं या उपदेशों और सहभागिता को जारी रखने या अमल में लाने से इनकार करके उस मार्ग में बाधा बनता है जिस पर परमेश्‍वर के चुने हुए लोगों को ले जाया जा रहा है और जिन्हें उच्च द्वारा मार्गदर्शन दिया जा रहा है, उसे जिम्‍मेदारी स्‍वीकार करके त्‍यागपत्र दे देना चाहिए।

(3) जो कोई भी कार्य-व्‍यवस्‍थाओं का उल्‍लंघन करके और मनमाने ढंग से परमेश्‍वर के घर के कार्य और उसके चुने लोगों को कोई बड़ी क्षति पहुँचाता है और उनकी तबाही का कारण बनाता है, उसे जि‍म्‍मेदारी स्‍वीकार करके त्‍यागपत्र दे देना चाहिए।

(4) अगर किसी अगुआ या कार्यकर्ता की, उसके द्वारा किए गए किसी अपराध या बुरे कृत्‍य के लिए काट-छाँट की जाती है और उससे निपटा जाता है, और वह सच्‍चा पश्‍चाताप करके भविष्‍य में अच्‍छे कार्य का आश्‍वासन देता है, तो ऐसे लोगों को कुछ समय के लिए उनके पदों पर बने रहने देना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर का घर लोगों का उनकी वास्तविक क्षमताओं के अनुसार इष्टतम उपयोग करता है। अगर तुम्हारी मानवता अच्छी लेकिन क्षमता खराब है, तो पूरे तन-मन से अपना कर्तव्य निभाओ। परमेश्वर का अनुमोदन पाने के लिए तुम्हें अगुआ या कार्यकर्ता होने की आवश्यकता नहीं है। अगर तुम उस बात से अपना सरोकार रखने के इच्छुक हो जिससे किसी अगुआ को अपना सरोकार रखना आवश्यक है लेकिन वैसा करने में असमर्थ हो, अगर तुममें अगुआ बनने के लिए आवश्यक गुण नहीं हैं और तुम वह कार्य करने में सक्षम नहीं हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? उस स्थिति में, उस पर अड़े रहकर चीजों को अपने लिए कठिन मत बनाओ। अगर तुम पचास किलो वजन उठा सकते हो, तो बिना दिखावे के पचास किलो वजन ही उठाओ और यह मत कहो, "पचास किलो वजन कम है—मैं इससे ज्यादा वजन उठाना चाहता हूँ! मैं सौ किलो वजन उठाऊंगा, चाहे मैं मर ही क्यों न जाऊँ!" अगुआ या कार्यकर्ता बनने में अक्षम होने से तुम निश्चित रूप से से नहीं मरोगे, लेकिन परमेश्वर के घर के काम में देरी और उसकी प्रगति और दक्षता की दर प्रभावित होगी और इससे कई लोगों के जीवन की प्रगति में भी देरी होगी, यह ऐसी जिम्मेदारी नहीं है जिसे तुम उठा सकते हो, क्योंकि तुम्हारी क्षमता पर्याप्त नहीं है। इस प्रकार, अगर तुममें आत्म-जागरूकता है, तो तुम्हें पद छोड़ने की पहल करनी चाहिए और किसी ऐसे व्यक्ति की अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सिफारिश करनी चाहिए, जिसकी क्षमता अच्छी हो, जो उचित रूप से योग्य हो, और जो तुमसे बेहतर हो। यह बुद्धिमत्तापूर्ण मार्ग है, और ऐसा करके ही व्यक्ति सच्ची मानवता और सच्ची भावना वाला होता है, जो वास्तव में सत्य समझता है और उसका अभ्यास करता है। तुम हमेशा सोचते हो, "हालाँकि मेरी क्षमता खराब है, पर मेरी मानवता अच्छी है। मैं चिंताएँ लेने, कठिनाई सहने और कीमत चुकाने के लिए तैयार हूँ। मैं दृढ़ निश्चयी हूँ और मैं तुमसे अधिक दृढ़ता के साथ काम करता हूँ। मैं सहिष्णु हूँ और निपटे जाने या काट-छाँट किए जाने, या परीक्षा लिए जाने से नहीं डरता। अगर मेरी क्षमता ज्यादा अच्छी नहीं है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है?" यह तुम्हारी निंदा करने के लिए नहीं है, बल्कि तुम्हें वर्गीकृत करने के लिए है, तुम्हें यह स्पष्ट करने के लिए है कि तुम क्या करने में सक्षम हो, तुम्हारे लिए क्या उपयुक्त है, और तुम्हारे लिए कौन-सा कर्तव्य उपयुक्त है। एक और संबंध में, अब तुम्हारे सामने सर्वाधिक व्यावहारिक समस्याओं में से एक यह है कि तुम्हारी गुणवत्ता बहुत कम है। तुम अगुआ का कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते। यह तुम्हारे उपयुक्त नहीं है, और अगर तुम अगुआई करने का प्रयास करते हो, तो तुम परमेश्वर के घर के काम में देरी करोगे। अगर तुम्हें व्यस्त होने में आनंद आता है और तुममें मानवता है, और अगर तुम चिंताएँ लेने और कीमत चुकाने के इच्छुक हो, तो एक कार्य है जो तुम्हारे उपयुक्त है, एक कर्तव्य जिसका तुम्हें पालन करना चाहिए, और परमेश्वर का घर इसकी उचित रूप से व्यवस्था करेगा। तुम्हें अगुआ न बनने देना परमेश्वर के घर के नियमों और सिद्धांतों के अनुरूप है, लेकिन तुम्हारी क्षमता के कारण परमेश्वर का घर निश्चित रूप से तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने के अधिकार से या परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण करने के अधिकार से कभी वंचित नहीं करेगा। क्या यह उचित है? क्या अभी भी इस मामले पर और अधिक विस्तृत संगति की आवश्यकता है? निम्न क्षमता के कुछ लोग यह सुनकर सोचते हैं, "बहुत हुई संगति। मैं कहीं अपना चेहरा नहीं दिखा सकता। मैं जानता हूँ कि मेरी क्षमता खराब है, इसलिए मैं अगुआ या कार्यकर्ता नहीं बनूँगा—समूह-अगुआ या निरीक्षक बनना भी ठीक है, या शायद मैं छोटे-मोटे काम करूँगा, खाना बनाऊँगा, सफाई करूँगा ... सब ठीक है। दूसरे लोग चाहे कुछ भी कहें, मैं बस वही करूँगा जो मुझे करना चाहिए, और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं और परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण करूँगा। निम्न योग्यता का होना भी परमेश्वर का अनुग्रह है। इसमें परमेश्वर की सदिच्छा है, और परमेश्वर गलत ढंग से काम नहीं करता।" अगर तुम चीजों को इस तरह से देख सको, तो ठीक है, और इस समस्या पर और अधिक संगति करने की आवश्यकता नहीं है। संक्षेप में, सत्य को यथावत प्रकट करते हुए हम केवल कम क्षमता वाले लोगों की समस्याओं का विश्लेषण करते हैं, ताकि अधिक लोग इन लोगों के प्रति सही दृष्टिकोण और विचार रख सकें, और ताकि ये लोग अपनी खराब क्षमता के प्रति सही दृष्टिकोण और विचार रख सकें। तब वे अपने आप को सही ढंग से रख सकते हैं और अपना उपयुक्त स्थान और कर्तव्य पा सकते हैं, ताकि उनके द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत और कठिनाई सहन करने के उनके संकल्प को उचित उपयोग में लाया जा सके और उनसे काम शुरू करवाया जा सके। इससे सत्य की तुम्हारी समझ या सत्य का तुम्हारा अभ्यास प्रभावित नहीं होता। और इससे परमेश्वर के घर या उसकी उपस्थिति में तुम्हारी छवि भी प्रभावित नहीं होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

तुम लोग नकली अगुआ बनना चाहते हो या साधारण अनुयायी? (साधारण अनुयायी।) अगर भाई-बहन तुम्हें चुनते हैं, तो इसे आजमाओ; हो सकता है कि वे तुमसे अधिक स्पष्ट रूप से चीजों को देखते हों। अगर भाई-बहनों को लगता है कि तुम ऐसा कर सकते हो, तो तुम्हें अपना सब-कुछ देना चाहिए। अगर तुम वास्तव में प्रयास करते हो, लेकिन फिर भी काम में असफल होते हो, और तुम्हारा दिल चिंता से जलता हो, तुम सो न पाते हो, और तुम्हें नहीं पता कि इसे ठीक से कैसे करना है, तो रुक जाओ; यह तुम्हारे लिए बहुत कठिन है। अगर तुम जारी रखोगे, तो तुम एक नकली अगुआ बन जाओगे, इस हालत में तुम्हें यह घोषणा करते हुए त्यागपत्र दे देना चाहिए, "मैं तुरंत प्रभाव से त्यागपत्र देना चाहता हूँ, क्योंकि मैं खराब क्षमता का हूँ, और मेरे नकली अगुआ होने की संभावना है; कृपया किसी और को चुन लें।" यह सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य है। यह करना सबसे उपयुक्त बात है : यह युक्तिसंगत है, पद पर बने रहने और नकली अगुआ होने से बेहतर है। अगर तुम अच्छी तरह से जानते हो कि तुम खराब क्षमता वाले हो और अगुआ बनने में असमर्थ हो, लेकिन भूमिका छोड़ना सहन नहीं कर सकते, और अपने आप से कहते हो, "मैं यह क्यों नहीं कर सकता? कौन मेरी थोड़ी-बहुत मदद कर सकता है? कितना अच्छा होगा, अगर मैं इस भूमिका में रहूँ और योजना कोई और बनाए! लेकिन कोई भी इसके उपयुक्त नहीं है, इसलिए मैं जैसे-तैसे काम चला लूँगा; भले ही मैं काम न कर सकूँ, फिर भी मैं अगुआ तो हूँ और अगुआ होना ही मुझे भाई-बहनों से बेहतर बनाता है। अगर परमेश्वर का घर मुझे नहीं बदलता और भाई-बहनों द्वारा मुझे नहीं हटाया जाता, तो मैं त्यागपत्र नहीं दूँगा," क्या यह उचित है? (नहीं।) इस प्रकार कार्य करने से परमेश्वर के घर के कार्य में देरी होती है—यह दूसरों को पीड़ा पहुँचाता है, और यह तुम्हें भी पीड़ा पहुँचाता है। अगुआ होने का मतलब जानते हो? इसका मतलब है कि तुम्हारा कई लोगों के जीवन में प्रवेश के साथ सीधा संबंध है, और तुम्हारा इस बात से सीधा संबंध है कि वे अपने सामने मौजूद रास्ते पर कैसे चलते हैं। अगर तुम अच्छी तरह से अगुआई करते हो, तो वे इस रास्ते पर अच्छी तरह चलेंगे; अगर तुम उन्हें सही रास्ते पर ले जाते हो, तो वे सही रास्ते पर कदम रखेंगे। अगर तुम खराब तरीके से उनकी अगुआई करते हो, उन्हें गंदे नाले में ले जाते हो, और वे तुम जैसे फरीसी बन जाएँगे तो तुम्हारा पाप बड़ा होगा। क्या बड़ा पाप होना ही इसका अंत है? परमेश्वर इसे नोट कर लेगा। तुम अच्छी तरह से जानते हो कि तुम्हारी क्षमता खराब है, तुम एक नकली अगुआ हो और वास्तविक कार्य करने में असमर्थ हो, फिर भी तुम त्यागपत्र नहीं देते, बल्कि बेशर्मी से अपने पद से चिपके रहते हो, और किसी और को वह स्थान नहीं लेने देते। यह पाप है, परमेश्वर इसका हिसाब रखेगा। और उसका हिसाब रखना भविष्य में तुम्हारे लिए अच्छा होगा या बुरा? तुम मुसीबत में हो! मैं तुम्हें एकदम सत्य बताऊँगा : परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के ऐसे कामों का हिसाब रखता है, और उसमें हर चीज स्पष्ट रूप से लिखी जाती है। अगर तुम्हारे उद्धार के मार्ग पर कुछ बहुत बड़ा हो जाता है, तो तुम पर उसका प्रभाव बहुत बड़ा होगा। तुम कुछ भी करो, मगर इस रास्ते पर मत चलना और इस तरह के व्यक्ति मत बनना।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (5)' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं, "पहले मैं अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों के बारे में बहुत स्पष्ट नहीं था, और यह सोचकर इस तरह की स्थिति के बारे में उलझन में रहता था कि अगर मुझमें जोश है, और मैं पीड़ा सहने के लिए तैयार हूँ, तो मैं कार्य के लिए उपयुक्त हूँ। लेकिन जब तुमने इस पर संगति की, तो मैं अवाक रह गया—पता चला कि मैं एक नकली अगुआ हूँ, कि मुझमें वह नहीं है जो इसके लिए अपेक्षित है, कि मैं परमेश्वर के घर की एक विशिष्ट कार्य-व्यवस्था भी कार्यान्वित नहीं कर सकता। मैं सोचता था कि कार्य-व्यवस्थाओं को कुछेक बार पढ़ना, यह सुनिश्चित करना कि सभी के पास उनकी एक प्रति हो, फिर अपने नीचे के सभी लोगों को इसे करते हुए देखना ही पर्याप्त है—मुझे केवल निगरानी करनी और नजर रखनी है, बस। कुछ समय बाद मैंने देखा कि काम ठीक से नहीं किया जा रहा, और कई विशिष्ट अभ्यासों की अनदेखी की जा रही है। केवल तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं क्या हूँ, कि मेरी क्षमता बेहद खराब है।" तो, क्या करना चाहिए? क्या "बोझ कम करना" ठीक है? क्या इसे हल करने का कोई तरीका है? क्या ऐसा है कि इस समस्या का कोई समाधान न हो? (नहीं। परमेश्वर की अपेक्षा के आधार पर, उन्हें बेहतर करने का प्रयास करना चाहिए।) यह एक बहुत ही सकारात्मक दृष्टिकोण है—यह इसे देखने का बहुत अच्छा तरीका है : परमेश्वर जो कहता है, उसके आधार पर बेहतर करने का प्रयास करना, यह विश्वास न करना कि तुम उसे नहीं कर सकते, नकारात्मक न होना, हार न मानना। यह एक उत्तर है, और यह अच्छा है। क्या यह एकमात्र उत्तर है? (नहीं। अगर उनकी क्षमता बहुत खराब है, और वे वास्तव में काम नहीं कर सकते, तो वे पद भी छोड़ सकते हैं।) यह दूसरा उत्तर है। अगर तुम पहले ही कोशिश कर चुके हो, और सोचते हो कि तुम उसे नहीं कर सकते, अगर वह तुम्हारे लिए वास्तव में कष्टप्रद, बहुत कठिन और बड़ी चिंता का स्रोत है और तुम्हारी नींद उड़ाए हुए है, अगर तुम्हें लगता है कि तुम रोजाना पहाड़ों से कुचले जा रहे हो—अगर तुम अपना सिर नहीं उठा सकते या साँस नहीं ले सकते, अगर तुम्हारे पैर चलते समय भारी लगते हैं—और ये विशिष्ट अपेक्षाएँ सुनने के बाद तुम्हें और भी अधिक महसूस होता है कि तुम्हारी क्षमता खराब है और तुम काम नहीं कर सकते, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? एक समाधान है : आगे बढ़ो और इस्तीफा दे दो। अगर तुम काम नहीं कर सकते, तो तुम्हें यह स्वीकार कर लेना चाहिए। स्वीकार कर लेने का क्या मतलब है? तुम्हें अपने बारे में एक सटीक समझ और बोध होना चाहिए, अपनी योग्यताओं और क्षमता के बारे में स्पष्ट रूप से अवगत होना चाहिए। अगर तुम उसे नहीं कर सकते, तो तुम नहीं कर सकते। तो, ऐसी जागरूकता कैसे हासिल की जाती है? कल्पना से नहीं, बल्कि इसलिए कि यह पहले ही परखा जा चुका है; तुम्हारे पास यह क्षमता और योग्यता नहीं है। इस तरह के व्यक्ति की क्षमता के लिए ऐसे मामले बहुत जटिल होते हैं, कठिनाई बहुत बड़ी होती है; वे वास्तव में उसे करने में असमर्थ होते हैं, वे आसानी से हार नहीं मान रहे होते। तो, अगर वे कोशिश करें और खुद को बेहतर कर लें, तो क्या विकास की कोई गुंजाइश है? क्या वे अपनी क्षमता में सुधार कर सकते हैं? अगर वे पहले ही कोशिश कर चुके हैं, और देख चुके हैं कि वास्तव में उनकी क्षमता यह है, तो फिर से कोशिश करने का कोई मतलब नहीं, बात को फिर से साबित करने का कोई फायदा नहीं। उन्हें आगे बढ़कर इस्तीफा दे देना चाहिए। इस भूमिका में मत बने रहो; अगर तुम विशिष्ट कार्य नहीं कर सकते, तो तुम दूसरों पर बुरा प्रभाव डालोगे और उन्हें देर करवाओगे। क्या यह एक रास्ता है? ये दोनों ही रास्ते इकलौते नहीं हैं; तुम चुन सकते हो, अपने बारे में अपनी समझ और अपने आस-पास के भाई-बहनों की तुम्हारे बारे में समझ के आधार पर एक वास्तविक और सटीक निर्णय ले सकते हो, और फिर तुम सही चुनाव कर सकते हो, जिसके लिए परमेश्वर का घर तुम पर कठोर नहीं होगा। कुछ लोग कहते हैं, "मैं अभी भी कोशिश करना चाहता हूँ, खुद को बेहतर बनाना चाहता हूँ। मुझे नहीं लगता कि मैं इतना बुरा हूँ। बात बस इतनी-सी है कि उन वर्षों के दौरान मैंने सत्य का अनुसरण करने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, मैं अगुआ होने के बारे में उलझन में था, और नहीं जानता था कि क्या करना है। शुरू में मुझे लगा कि परमेश्वर के घर का कार्य सरल है : यह केवल सत्य की संगति करना है, और अगर मैं परमेश्वर के वचनों के लिए और अधिक प्रयास करूँगा, तो मैं काम अच्छी तरह से कर पाऊँगा। लेकिन जैसे ही असली काम मेरे सामने आया, मैंने देखा कि परमेश्वर के घर का काम इतना आसान नहीं है।" अब वे जानते हैं कि परमेश्वर के घर का कोई विशिष्ट कार्य करना इतना आसान नहीं है। अंशत:, लोगों में क्षमता होनी चाहिए; अंशत:, उनके पास दायित्व होना चाहिए; और अंशत:, उन्हें सत्य को समझना चाहिए। ये सभी अपरिहार्य हैं। सत्य का अनुसरण न करना अस्वीकार्य है; खराब क्षमता होना अस्वीकार्य है; खराब मानवता और कोई बोझ न होना अस्वीकार्य है; और विशिष्ट कार्य को विशिष्ट रूप से लिया जाना चाहिए। यह इतना आसान नहीं है। कुछ लोग आश्वस्त नहीं होते, और अभी भी चाहते हैं कि एक और मौका दिया जाए, एक और अवसर दिया जाए। क्या ऐसे लोगों को अवसर दिया जाना चाहिए? अगर वे कुछ विशिष्ट कार्य करने में सक्षम हैं, और केवल औसत योग्यता और क्षमता के हैं लेकिन काम करते समय आलसी या लापरवाह नहीं रहते, और सुनने और आज्ञापालन करने में सक्षम हैं, मूलत: कार्य-व्यवस्थाओं और परमेश्वर के घर की अपेक्षाओं और सिद्धांतों के अनुसार काम कर पाते हैं, तो भले ही पहले ऐसे लोग ठीक से काम करने में विफल रहे क्योंकि वे भोले, युवा थे और उनकी नींव उथली थी, और बहुत-सी चीजों के बारे में उनका विचार गलत था, फिर भी वे सही व्यक्ति हैं, और उन्हें एक अवसर दिया जाना चाहिए; आँख मूँदकर उन्हें न बदलो या आँख मूँदकर उन्हें पद छोड़ने के लिए न कहो। अगुआ या कार्यकर्ता बनना इतना आसान नहीं है, न ही अगुआ या कार्यकर्ता चुनना इतना आसान है। लोग अब अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों के बारे में कुछ समझते हैं, और अगली बार जब वे काम करेंगे, तो वे उसे पहले से बेहतर करेंगे, जब वे ऐसी चीजें नहीं समझते थे। यह तथ्य है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (9)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

सभी झूठे नेताओं, झूठे कार्यकर्ताओं और मसीह-विरोधियों की छँटनी करने और उन्हें हटाने के लिए सर्वोच्च सत्ता द्वारा निम्नलिखित सूचना जारी की जाती है:

जिन भी कुकर्मियों ने निम्नलिखित सात कार्यों में से कोई भी कार्य किया है, उन्हें उसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, इस्तीफ़ा देना चाहिए और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति अपने पापों को ज़रूर कबूल करना चाहिए ताकि लोगों के गुस्से को ठंडा किया जा सके और परमेश्वर को सुकून दिया जा सके।

1. जिनके पास भी पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, जिनकी संगति में सत्य-वास्तविकता का अभाव है, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए जीवन में प्रवेश की व्यावहारिक समस्याओं को नहीं सुलझा सकते और जो कोई व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकते, उन्हें ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इस्तीफ़ा देना चाहिए।

2. जिन्होंने भी सर्वोच्च सत्ता की कार्य व्यवस्था की निंदा की है, जो कार्य व्यवस्था, उपदेशों और संगति के वितरण से पीछे हटे हैं या जिन्होंने इन्हें करने से इनकार किया है, जिन्होंने दूसरों द्वारा वितरित कार्य व्यवस्था, उपदेशों और संगति को ग्रहण करने की परमेश्वर के चुने हुए लोगों की क्षमता को सीमित किया है और जिन्होंने कलीसिया में प्रवेश अवरुद्ध किया है, उन्हें ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इस्तीफ़ा देना चाहिए।

3. जो भी कार्य व्यवस्थाओं को कार्यान्वित करने से इनकार करते हैं और कलीसिया के नेताओं और उपयाजकों के चुनाव को प्रतिबंधित करते हैं—जिसमें नाममात्र की अनुमति वाले चुनाव भी शामिल हैं—बल्कि जो उम्मीदवारों को बलपूर्वक या गुप्त रूप से नियुक्त करने की कोशिश भी करते हैं, उन्हें ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इस्तीफ़ा देना चाहिए।

4. जिन्होंने कलीसिया से सलाह-मशविरा किए बिना ही, गलती से, परमेश्वर के बहुत-से चुने हुए लोगों को निष्कासित या अलग-थलग कर दिया है, जिन्होंने उन्हें कलीसियाई जीवन में फिर से बहाल करने से मना कर दिया है, जिनमें परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति ज़रा भी प्रेम नहीं है और जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों की समस्याएँ नहीं पूछते या उनकी परवाह नहीं करते, उन्हें ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इस्तीफ़ा देना चाहिए।

5. जिन्होंने परमेश्वर के चुने हुए लोगों की, कार्य व्यवस्था पर संगति करने और झूठे नेताओं और मसीह-विरोधियों को पहचानने की क्षमता को सीमित किया है, जिन्होंने परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कार्य व्यवस्था के अनुसार अपने कर्तव्य पूरे करने और सत्य का अभ्यास करने से रोका है और बेतुके सिद्धांत फैलाए हैं ताकि लोग कलीसिया और नेताओं की आज्ञा मानें, उन्हें ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इस्तीफ़ा देना चाहिए।

6. जो भी परमेश्वर की भेंटों को अपना मानते हुए उनका दुरुपयोग करते हैं या जो कार्य व्यवस्था के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए भेंटों का दुरुपयोग करते हैं, उन्हें ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इस्तीफ़ा देना चाहिए और साथ ही, अपने अपराधों के तथ्यों को पूरी तरह कबूल करना चाहिए और हड़पा गया पूरा धन चुकाना चाहिए।

7. जिन्होंने भी परमेश्वर के चुने हुए ऐसे लोगों से बदला लिया है या उनकी निंदा की है जो झूठे नेताओं और मसीह-विरोधियों को बेनकाब करने की हिम्मत करते हैं और सही के लिए खड़े होते हैं या जिन्होंने उन्हें दबाया है या चोट पहुँचाई है, वे वास्तव में अत्यधिक दुष्ट शैतान हैं और उन्हें ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और इस्तीफ़ा देना चाहिए।

जिस भी कुकर्मी ने उपर्युक्त सात कार्यों में से कोई भी कार्य किया है, परमेश्वर का घर अब उसे नेतृत्व या किसी भी स्तर के कार्यकर्ता पदों पर बने रहने की और अनुमति नहीं देगा क्योंकि इन लोगों ने परमेश्वर के कार्य को गंभीर रूप से बाधित किया है और उसमें व्यवधान डाला है, उनमें परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति ज़रा भी प्रेम नहीं है, उन्होंने क्रूरतापूर्वक परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाया है, उन्होंने परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा सत्य को समझने या उन्हें परमेश्वर के कार्य का पालन करने से रोकने की भरसक कोशिश की है और यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के उन चुने हुए लोगों की निंदा की है और उन्हें फँसाया है जो कार्य व्यवस्था का पालन करते हैं और धार्मिकता को बनाए रखते हैं। यह एक अप्रमेय बुराई, एक अतुलनीय पाप है। परमेश्वर के चुने हुए लोग नेतृत्व और कार्यकर्ता पदों पर ऐसे कुकर्मियों को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते और उद्धार के लिए परमेश्वर को पुकारते हैं। यह स्पष्ट है कि इन झूठे नेताओं, कार्यकर्ताओं और मसीह-विरोधियों ने लोगों के गुस्से को भड़काया है और परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया है, इसलिए उन्हें ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा देना चाहिए। यह पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा और लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप है। यदि आज वे ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफ़ा दे देते हैं और यह दिखा देते हैं कि वे पश्चाताप के लायक हैं, तो परमेश्वर का घर उन्हें दूसरा मौका देगा; उन्हें अपने कलीसियाई जीवन और सौंपे गए समुचित कर्तव्यों को बनाए रखने की अनुमति दे दी जाएगी—और यदि वे सत्य का अनुसरण कर सकते हैं और वास्तव में पश्चाताप करते हैं, तो भी उनके पास बचाए जाने का अवसर होगा। लेकिन यदि वे ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं करते और इस्तीफ़ा नहीं देते और परमेश्वर के घर का विरोध जारी रखते हैं, तो उन्हें मसीह-विरोधी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है और तब उन्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा निष्कासित और हमेशा के लिए अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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