56. धारणाओं और कल्‍पनाओं से निपटने के सिद्धांत

(1) इसे स्‍थापित करना आवश्‍यक है कि एकमात्र परमेश्‍वर ही सत्‍य है, सत्‍य का उद्गम उसके वचनों में है, और मनुष्‍य की धारणाएँ और कल्‍पनाएँ कितनी ही अच्‍छी क्‍यों न हों, वे खोखले मतों के सिवा कुछ भी नहीं होतीं।

(2) मानवीय धारणाएँ और कल्‍पनाएँ परमेश्‍वर के वचनों के अनुरूप कतई नहीं होती हैं, और वे सत्‍य के सार से असंगत होती हैं। जो व्‍यक्ति उनके मुताबिक जीवन जीता है उसे बचाया नहीं जा सकता।

(3) सत्‍य धारणाओं का अकेला प्रतिशोध है। व्‍यक्ति को परमेश्‍वर के वचनों को अधिक-से-अधिक पढ़ना चाहिए और सत्‍य की तलाश करनी चाहिए; केवल इसी तरह व्‍यक्ति मानवीय धारणाओं और कल्‍पनाओं से पूरी तरह उबर सकता है।

(4) परमेश्‍वर के वचनों का अभ्‍यास करना और उन्‍हें अनुभव करना, और सत्‍य की समझ विकसित करना तथा परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान हासिल करना आवश्‍यक है। केवल इसी तरह व्‍यक्ति मानवीय धारणाओं और कल्‍पना से पूरी तरह छुटकारा पा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध इसलिए करते हो, या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का इसलिए उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति लापरवाही बरतते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से अत्यंत अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेमतलब बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; न कि अपनी सनक में उसकी आलोचना करने के द्वारा मनुष्य पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान पाया है। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सही होता जाता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का विरोध करने की संभावना रहती है। तुम लोगों की धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह पूँजी है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और जितना अधिक तुम्हारी नैतिकता जितनी भ्रष्ट होगी, तुम्हारे गुण जितने तुच्छ और तुम्हारी मानवता जितनी निम्न होगी, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार न किया जाए, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं होगे, और सदैव उससे दूर रहोगे।

अपनी पुरानी धारणाओं को एक तरफ रखकर ही तुम नए ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो, फिर भी पुराना ज्ञान आवश्यक नहीं कि पुरानी धारणाएँ हो। मनुष्य द्वारा कल्पना की गई बातों को "धारणाएँ" कहते हैं जो वास्तविकताओं के साथ मेल नहीं खाती हैं। यदि पुराना ज्ञान पुराने युग में पहले से ही पुराना हो गया हो, और मनुष्य को नए कार्य में प्रवेश करने से रोक देता हो, तो इस प्रकार का ज्ञान भी एक धारणा है। यदि मनुष्य इस प्रकार के ज्ञान के संबंध में सही दृष्टिकोण अपनाने में समर्थ हो, और, पुरानी और नई बातों को जोड़कर विभिन्न पहलुओं से परमेश्वर को जान सकता हो, तो पुराना ज्ञान मनुष्य के लिए सहायक बन जाता है और वह आधार बन जाता है जिसके द्वारा मनुष्य नए युग में प्रवेश करता है। ... मनुष्य अपने मन में कल्पित परमेश्वर को ही मानने लगता है और वास्तविकता के परमेश्वर को नहीं खोजता है। यदि एक व्यक्ति का एक प्रकार का विश्वास है, तो सौ लोगों के बीच सौ प्रकार के विश्वास होंगे। मनुष्य के पास इसी प्रकार के विश्वास हैं क्योंकि उसने परमेश्वर के कार्य की वास्तविकता को नहीं देखा है, क्योंकि उसने इसे सिर्फ अपने कानों से सुना है और अपनी आँखों से नहीं देखा है। मनुष्य ने उपाख्यानों और कहानियों को सुना है, परंतु उसने परमेश्वर के कार्य के तथ्यों के ज्ञान के बारे में शायद ही सुना है। इस प्रकार, वे जो केवल एक वर्ष से विश्वासी रहे हैं, परमेश्वर पर अपनी खुद की धारणाओं के माध्यम से विश्वास करते हैं। यही उन सभी के बारे में भी सत्य है जिन्होंने परमेश्वर पर जीवन भर विश्वास किया है। जो लोग तथ्यों को नहीं देख सकते वे ऐसे विश्वास से बच नहीं सकते जिसमें परमेश्वर के बारे में उनकी अपनी धारणाएँ हैं। मनुष्य यह मानता है कि उसने स्वयं को अपनी सभी पुरानी धारणाओं के बंधनों से मुक्त कर लिया है और एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। क्या मनुष्य यह नहीं जानता कि उन लोगों का ज्ञान जो परमेश्वर का असली चेहरा नहीं देख सकते, केवल धारणाएँ और अफ़वाहें हैं? मनुष्य सोचता है कि उसकी धारणाएँ सही हैं और बिना गलतियों की हैं, और सोचता है कि ये धारणाएँ परमेश्वर की ओर से आती हैं। आज, जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य देखता है, वह उन धारणाओं को खुला छोड़ देता है जो कई सालों से बनती रही हैं। अतीत की कल्पनाएँ और विचार इस चरण के कार्य में अवरोध बन गए हैं और मनुष्य के लिए इस प्रकार की धारणाओं को छोड़ना और इस प्रकार के विचारों का खंडन करना कठिन हो गया है। इस कदम-दर-कदम कार्य को लेकर ऐसे बहुत-से लोगों की धारणाएँ, जिन्होंने आज तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, अत्यंत हानिकारक हो गई हैं और इन लोगों ने देहधारी परमेश्वर के प्रति धीरे-धीरे एक हठी शत्रुता विकसित कर ली है। इस घृणा का स्रोत मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं में निहित है। मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ आज के कार्य की शत्रु बन गई हैं, वह कार्य जो मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता। ऐसा इसीलिए हुआ है क्योंकि तथ्य मनुष्य को उसकी कल्पनाशीलता को खुली छूट देने की अनुमति नहीं देते, और इसके साथ ही, वे मनुष्य द्वारा आसानी से खंडित नहीं किए जा सकते, और मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ तथ्यों के अस्तित्व को मिटा नहीं सकतीं, और साथ ही, क्योंकि मनुष्य तथ्यों की सटीकता और सच्चाई पर विचार नहीं करता है, और केवल एक ही तरह सोचते हुए अपनी धारणाओं को खुला छोड़ देता है, और अपनी खुद की कल्पनाओं को काम में लाता है। इसे केवल मनुष्यों की धारणाओं का दोष ही कहा जा सकता है, इसे परमेश्वर के कार्य का दोष नहीं कहा जा सकता। मनुष्य जो चाहे कल्पना कर सकता है, परंतु वह परमेश्वर के कार्य के किसी भी चरण या इसके छोटे से भी अंश के बारे में मुक्त भाव से विवाद नहीं कर सकता है; परमेश्वर के कार्य का तथ्य मनुष्य द्वारा अनुल्लंघनीय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के मापन और परिसीमन के लिए अपनी धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो परमेश्वर कोई मिट्टी की अचल मूर्ति हो, और अगर तुम लोग परमेश्वर को बाइबल के मापदंडों के भीतर सीमांकित करते हो और उसे कार्य के एक सीमित दायरे में समाविष्ट करते हो, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर की निंदा की है। चूँकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने परमेश्वर को एक अचल प्रतिमा के रूप में लिया था, जिसे वे अपने हृदयों में रखते थे, मानो परमेश्वर को मात्र मसीह ही कहा जा सकता था, और मात्र वही, जिसे मसीह कहा जाता था, परमेश्वर हो सकता हो, और चूँकि मानवजाति परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करती थी, मानो वह मिट्टी की एक (निर्जीव) मूर्ति हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए सलीब पर चढ़ा दिया—निर्दोष यीशु को इस तरह मौत की सजा दे दी गई। परमेश्वर ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी मनुष्य ने उसे छोड़ने से इनकार कर दिया, और उसे मृत्युदंड देने पर जोर दिया, और इसलिए यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर स्थिर है, और वह उसे एक अकेली पुस्तक बाइबल के आधार पर परिभाषित करता है, मानो मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण समझ हो, मानो मनुष्य वह सब अपनी हथेली पर रखता हो, जो परमेश्वर करता है। लोग बेहद बेतुके, बेहद अहंकारी और स्वभाव से बड़बोले हैं। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना भी महान क्यों न हो, मैं फिर भी यही कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, कि तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है, और कि तुमने परमेश्वर की निंदा की है, कि तुम परमेश्वर के कार्य का पालन करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी संतुष्ट नहीं होता? क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि उसकी अनेक धारणाएँ है, क्योंकि उसका परमेश्वर का ज्ञान वास्तविकता से किसी भी तरह मेल नहीं खाता, इसके बजाय वह नीरस ढंग से एक ही विषय को बिना बदलाव के दोहराता रहता है और हर स्थिति के लिए एक ही दृष्टिकोण इस्तेमाल करता है। और इसलिए, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा' से उद्धृत

क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई प्रगति होती रहती है, कुछ ऐसा कार्य है जो नए कार्य के सामने आने पर अप्रचलित और पुराना हो जाता है। ये विभिन्न प्रकार के नए और पुराने कार्य परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं; हर अगला कदम पिछले कदम का अनुसरण करता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें निस्संदेह समाप्त कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, लंबे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभवों और शिक्षाओं के साथ मिलकर, मनुष्य के दिमाग में अनेक तरह और रूपों की धारणाएं बना दी हैं। मनुष्य द्वारा इस प्रकार की धारणाएं बनाए जाने में और भी अधिक सकारात्मक भूमिका इस बात की रही है कि प्राचीन समय के पारंपरिक सिद्धांतों का वर्षों से विस्तार हुआ है, जबकि परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास में, विभिन्न धारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण लोगों में परमेश्वर के बारे में सभी प्रकार की धारणात्मक समझ निरंतर उत्पन्न और विकसित होती रही है, जिससे कई ऐसे धार्मिक लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, उसके शत्रु बन गए हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक धारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और वह कभी भी सिद्धांत नहीं बनता है, बल्कि निरंतर बदलता रहता है और उसका कम या ज्यादा नवीकरण होता रहता है। इस तरह कार्य करना स्वयं परमेश्वर के निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर के कार्य का निहित नियम भी है, और उन उपायों में से एक है जिनके माध्यम से परमेश्वर अपना प्रबंधन निष्पादित करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य बदल नहीं पाएगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा, और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परंतु वास्तव में ये निश्चित अवधियों में होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर में विश्वास करता है, वह बिल्कुल भिन्न है। वह पुराने, परिचित धर्म सिद्धांतों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और वे जितने पुराने होते हैं, उसे उतने ही प्रिय लगते हैं। मनुष्य का मूर्ख दिमाग, जो पत्थर के समान अपरिवर्तनशील है, परमेश्वर के इतने सारे अकल्पनीय नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? हमेशा नया बने रहने वाले और कभी पुराना न पड़ने वाले परमेश्वर से मनुष्य घृणा करता है; वह हमेशा ही केवल उस पुराने परमेश्वर को पसंद करता है जिसके दाँत लंबे और बाल सफेद हैं, और जो अपनी जगह से चिपका रहता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी पसंद है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, एक ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छह हजार सालों से नया कार्य करता आ रहा है। तो वे किसी भी इलाज से परे हैं। हो सकता है कि यह मनुष्य के हठ के कारण या किसी भी मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों की अनुल्लंघनीयता के कारण हो—परंतु वे पुरुष और महिला पादरी अभी भी फटी-पुरानी किताबों और दस्तावेजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को पूरा करने में इस तरह लगा रहता है मानो उसके साथ कोई हो ही नहीं। भले ही ये विरोधाभास परमेश्वर और मनुष्य को शत्रु बनाते हैं, और इनका कोई समाधान भी नहीं है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, मानो वे होकर भी नहीं हैं। हालांकि मनुष्य तब भी अपनी आस्थाओं और धारणाओं से चिपका रहता है, और उन्हें कभी छोड़ता नहीं है। फिर भी, एक बात स्वतःस्पष्ट है : भले ही मनुष्य अपने रुख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर के कदम हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं और वह अपना रुख परिवेश के अनुसार हमेशा बदलता रहता है। अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने पराजित दुश्मनों का सबसे बड़ा शत्रु है, और वह पूरी मानवजाति का हिमायती भी है, समान रूप से पराजित और अपराजित दोनों का। परमेश्वर के साथ कौन प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की धारणाएं परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं, क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्य के दौरान ही उत्पन्न हुई हैं। जो भी हो, परमेश्वर इस कारण से मनुष्य को क्षमा नहीं कर देता, इसके साथ ही, वह अपने कार्य के बाहर के कार्य के खेप-दर-खेप "परमेश्वर के लिए" जैसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह मनुष्य की धारणाओं और पुरानी, धार्मिक आस्थाओं से बेहद नाराज है, और उसका इरादा उस तिथि को स्वीकार तक करने का नहीं है जब ये धारणाएं सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये धारणाएं उसके कार्य के कारण पैदा हुई हैं, क्योंकि मनुष्य की धारणाएं मनुष्यों द्वारा ही फैलाई जाती हैं; उनका स्रोत मनुष्य की सोच और दिमाग है—परमेश्वर नहीं, बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा यही रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिन बातों को वह मनुष्य को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वे युगों और कालों में विभाजित हैं, न कि अनंत और स्थिर हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह परमेश्वर ही है जो मनुष्य को जीवित और नया बनने के योग्य बनाता है, न कि शैतान जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम लोग अभी भी यह नहीं समझते हो? तुममें परमेश्वर के बारे में धारणाएं हैं और तुम उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नही हो, क्योंकि तुम संकीर्ण दिमाग के हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य के भीतर अत्यंत कम समझने योग्य है, और न ही इसलिए कि परमेश्वर का कार्य मानवीय इच्छाओं के अनुरूप नहीं है; ऐसा इसलिए भी नहीं है कि परमेश्वर अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा बेपरवाह रहता है। तुम अपनी धारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ पाते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की अत्यधिक कमी है, और क्योंकि तुममें परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी की थोड़ी सी भी समानता नहीं है; ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है; सारे कष्ट और दुर्भाग्य मनुष्य ने ही पैदा किए हैं। परमेश्वर की सोच हमेशा अच्छी होती है : वह तुम्हें धारणाएँ बनाने देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी बदल जाओ और नए होते जाओ। फिर भी तुम नहीं जानते कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, और तुम हमेशा परख या विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजें मुश्किल बना रहा है, बल्कि तुममें परमेश्वर के लिए आदर नहीं है, और तुम्हारी अवज्ञा बहुत ज्यादा है। एक अदना-सा सृजित प्राणी पूर्व में परमेश्वर द्वारा प्रदत्त किसी चीज के एक महत्त्वहीन-से हिस्से को लेकर और पलटकर उसी से परमेश्वर पर प्रहार करने का साहस करता है—क्या यह मनुष्य द्वारा अवज्ञा नहीं है? यह कहना उचित होगा कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और वह अपनी व्यर्थ की, बदबूदार, सड़ी-गली, अलंकृत भाषा के साथ, अपनी इच्छानुसार प्रदर्शन करने में तो और भी अयोग्य है—उन घिसी-पिटी धारणाओं का तो कहना ही क्या। क्या वे और भी बेकार नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर के आज के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर जब देहधारण कर इंसानों के बीच काम करने आता है, तो सभी उसे देखते और उसके वचनों को सुनते हैं, और सभी लोग उन कर्मों को देखते हैं जो परमेश्वर देह रूप में करता है। उस क्षण, इंसान की तमाम धारणाएँ साबुन के झाग बन जाती हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखा है, यदि वे अपनी इच्छा से उसका आज्ञापालन करेंगे, तो उनका तिरस्कार नहीं किया जाएगा, जबकि जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग मसीह-विरोधी और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं, मगर खुशी से उसकी आज्ञा मानते हैं, वे निंदित नहीं किए जाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की नीयत और क्रियाकलापों के आधार पर उसे दंडित करता है, उसके विचारों और मत के आधार पर कभी नहीं। यदि वह विचारों और मत के आधार इंसान को दंडित करता, तो कोई भी परमेश्वर के रोषपूर्ण हाथों से बच कर भाग नहीं पाता। जो लोग जानबूझकर देहधारी परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, वे उसकी अवज्ञा करने के कारण दण्ड पाएँगे। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, उनका विरोध परमेश्वर के प्रति उनकी धारणाओं से उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के कार्य में व्यवधान पैदा करते हैं। ये लोग जानते-बूझते परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं और उसे नष्ट करते हैं। परमेश्वर के बारे में न केवल उनकी धारणाएँ होती हैं, बल्कि वे उन कामों में भी लिप्त रहते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं, और यही कारण है कि इस तरह के लोगों की निंदा की जाएगी। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालने में लिप्त नहीं होते, उनकी पापियों के समान निंदा नहीं की जाएगी, क्योंकि वे अपनी इच्छा से आज्ञापालन कर पाते हैं और विघ्न एवं व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त नहीं होते। ऐसे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जाएगी। लेकिन, जब कोई कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद भी परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ मन में रखता है और देहधारी परमेश्वर के कार्य को समझने में असमर्थ रहता है, और अनेक वर्षों के अनुभव के बावजूद, वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और उसे जान नहीं पाता, और अगर कितने भी सालों तक उसके कार्य का अनुभव करने के बाद भी वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और फिर भो उसे जान नहीं पाता तब वह भले ही व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त न हो, लेकिन उसका हृदय परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है, और अगर ये धारणाएँ स्पष्ट न भी हों तो, ऐसे लोग किसी भी प्रकार से परमेश्वर के कार्य के उपयोग लायक नहीं होते। वे सुसमाचार का उपदेश देने या परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग किसी काम के नहीं होते और मंदबुद्धि होते हैं। क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते और परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं का परित्याग करने में एकदम अक्षम होते हैं, इसलिए वे निंदित किए जाते हैं। ऐसा कहा जा सकता है : नौसिखिए विश्वासियों के लिये परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखना या परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना सामान्य बात है, परंतु जिसने वर्षों परमेश्वर में विश्वास किया है और परमेश्वर के कार्य का बहुत अनुभव किया है, उसका ऐसी धारणाएँ रखे रहना, सामान्य बात नहीं है, और उसे परमेश्वर का ज्ञान न होना तो बिल्कुल भी सामान्य नहीं है। ऐसे लोगों की निंदा करना सामान्य स्थिति नहीं है। ऐसे असामान्य लोग एकदम कचरा हैं; ये ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और जिन्होंने व्यर्थ में ही परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाया होता है। ऐसे सभी लोग अंत में मिटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

तुम लोगों ने इतने वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, हालाँकि तुम थोड़े-बहुत सत्य समझते हो, तुम सबके अंदर तुम्हारी अपनी व्याख्याएं, विश्वास और कल्पनाएं हैं—वे सभी परमेश्वर के इरादों और सत्य का उल्लंघन करते हैं और विरोधाभासी हैं। ये चीज़ें लोगों की अवधारणाएँ हैं। कुछ जो सत्य के विपरीत है, वह मनुष्य की अवधारणाओं और कल्पनाओं से जुड़ा है। तो मनुष्य की अवधारणाएँ कैसे बनती हैं? इसके कई अलग-अलग कारण हैं। आंशिक रूप से यह ज्ञान का प्रसार और शिक्षा है; इसी तरह, पारंपरिक संस्कृति, सामाजिक रुझानों और कुछ पारिवारिक शिक्षा का भी प्रभाव है। कुल मिलाकर, शैतान के दुष्ट समाज से आदमी प्रभावित और प्रेरित हो गया है; यही उसकी अवधारणाओं का मूल कारण है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

शायद लोगों की अवधारणाओं का उनके खाने-सोने पर, उनके सामान्य जीवन पर कोई प्रभाव न पड़ता हो, लेकिन ये चीज़ें लोगों के दिमाग और विचारों में मौजूद रहती हैं, ये छाया की तरह लोगों से चिपककर हर समय उनका पीछा करती हैं। अगर तुम इन्हें निरंतर न हटाते रहो, तो ये तुम्हारे व्यवहार और सोच को लगातार नियंत्रित करेंगी, तुम्हारे निर्णय को नियंत्रित करेंगी, तुम्हारे परमेश्वर-संबंधी ज्ञान को नियंत्रित करेंगी और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंधों को नियंत्रित करती रहेंगी। अवधारणा एक बड़ी समस्या है। परमेश्वर के बारे में लोगों की अवधारणाओं का होना उनके और परमेश्वर के बीच में दीवार होने जैसा है, जो उन्हें परमेश्वर का वास्तविक चेहरा देखने से रोकती है, जो उन्हें परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और सच्चे सार को देखने से रोकती है—क्योंकि लोग अपनी अवधारणाओं में और कल्पनाओं में रहते हैं, वे अपनी अवधारणाओं का उपयोग यह निर्धारित करने के लिए करते हैं कि परमेश्वर सही है या गलत और परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसे मापने, उसकी निंदा करने और परमेश्वर के हर कार्य को जाँचने के लिए करते हैं। ऐसा करके लोग किस तरह की अवस्था में डूब जाते हैं? क्या लोग अपनी अवधारणाओं में रहकर परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते हैं? क्या वे परमेश्वर में सच्चा विश्वास रख सकते हैं? नहीं रख सकते। यदि वे थोड़ा-बहुत समर्पण करते भी हैं, तो वह भी उनकी अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार ही होता है। जैसे ही कोई अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार समर्पण करता है, तो वह समर्पण उनकी निजी चीजों से दूषित हो जाता है जो शैतान और बाहरी दुनिया का अंग होती हैं और जो सत्य के विपरीत होती हैं। परमेश्वर को लेकर लोगों की अवधारणाएँ एक गंभीर समस्या है; मनुष्य और परमेश्वर के बीच के इस प्रमुख मुद्दे को तत्काल सुलझाने की आवश्यकता है। हर कोई परमेश्वर के सामने अवधारणाएँ लेकर आता है, परमेश्वर के बारे में हर तरह के संदेह लेकर आता है। तो यह भी कहा जा सकता है कि परमेश्वर लोगों को इतना कुछ प्रदान करता है, उनके लिए व्यवस्था और आयोजन करता है, उसके बावजूद लोग उसके सामने अनगिनत गलतफहमियाँ लेकर आते हैं। और फिर परमेश्वर के साथ उनका किस तरह का रिश्ता बनता है? लोग लगातार परमेश्वर को गलत समझते हैं, उस पर संदेह करते हैं और उसके वचनों एवं कार्य को मापने के लिए अपने मानकों से तय करते हैं कि परमेश्वर सही है या गलत। यह कैसा व्यवहार है? वे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं, उसका विरोध कर रहे हैं, तिरस्कार कर रहे हैं, उसकी निंदा कर रहे हैं, आलोचना कर रहे हैं, स्पर्धा कर रहे हैं—और अधिक गंभीर मामलों में, परमेश्वर से "द्वंद्व युद्ध" कर रहे हैं। सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि लोग अपनी अवधारणाओं के कारण सच्चे स्वयं परमेश्वर को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, सत्य का पालन नहीं कर पा रहे हैं, लोग परमेश्वर के अस्तित्व को ही नकार रहे हैं और जिस परमेश्वर का वे अनुसरण करते हैं, उसको त्याग रहे हैं। यह एक भयावह समस्या है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

जब लोग परमेश्वर के बारे में गलतफहमियों और अवधारणाओं को जन्म देते हैं, तो उन्हें पहले यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि परमेश्वर सत्य है तथा लोगों में सत्य नहीं है और निश्चित रूप से गलत वही लोग हैं। क्या यह एक तरह की औपचारिकता है? यदि तुम इस अभ्यास को केवल एक औपचारिकता समझोगे, सतही तौर पर लोगे, तो क्या तुम अपनी गलतियों को जान सकते हो? कभी नहीं। इसमें कई कदम होते हैं। पहले तो यह तय करो कि तुम्हारे क्रियाकलाप सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं। पहले अपने इरादों को मत देखो; कभी-कभी ऐसा भी होता है कि तुम्हारे इरादे तो सही होते हैं लेकिन तुम जिन सिद्धांतों पर अमल करते हो, वे गलत होते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूं कि तुम जिन सिद्धांतों पर अमल करते हो, वे गलत होते हैं? तुमने खोज की होगी, लेकिन शायद तुम्हें सिद्धांतों की कोई समझ ही न हो; शायद तुमने खोज ही न की हो और तुम्हारे क्रियाकलाप मात्र नेक इरादों और उत्साह पर ही आधारित हों, तुम्हारी कल्पना और अनुभव पर आधारित हों और तुमने गलती कर दी हो। क्या तुम इसकी कल्पना कर सकते हो? जब तुम किसी चीज का अनुमान नहीं लगा पाते हो, तो तुमसे गलती हो जाती है—और तब क्या तुम उजागर नहीं हो जाते हो? एक बार जब तुम उजागर हो जाते हो, अगर तुम परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा करते रहते हो, तो तुम्हारी गलती क्या रही? तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह नहीं थी कि तुमने कुछ गलत किया और सिद्धांतों का उल्लंघन किया, जिसके कारण नुकसान हुआ या उसके कुछ और परिणाम हुए, बल्कि कुछ गलत करके भी तुम अड़े रहे और तुमने अपनी गलती को स्वीकारा नहीं; तुम फिर भी अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं को लेकर परमेश्वर का विरोध करते रहे और उसके सही कार्य को नकारते रहे। यही तुम्हारी सबसे बड़ी और सबसे भयंकर भूल थी। किसी व्यक्ति में ऐसी अवस्था परमेश्वर का प्रतिरोध क्यों होगी? लोग इस बात को मानें या न मानें कि सबकुछ परमेश्वर करता है और उसकी संप्रभुता उचित है और उनकी क्या महत्ता है, अगर वे पहले यही न समझ पाएँ कि वे गलत हैं, तो उनकी अवस्था परमेश्वर के प्रतिरोध की है। इस अवस्था को सुधारने के लिए क्या किया जाना चाहिए? परमेश्वर की इच्छा को खोजना, जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है, यह लोगों के लिए इतना व्यावहारिक नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, "यदि खोजना इतना व्यावहारिक नहीं है, तो क्या इसका मतलब यह है कि यह आवश्यक नहीं है और जिसे खोजा और समझा जा सकता है, वह ज़रूरी नहीं है? मैं इस कदम को छोड़ सकता हूं।" क्या ऐसे चलेगा? जो ऐसा करता है, क्या वह बचाए जाने की स्थिति से बाहर नहीं हो जाता? ऐसे लोग अपनी व्याख्याओं को लेकर सच में टेढ़े और गलत होते हैं। लोगों के लिए परमेश्वर की इच्छा की खोज करना कुछ हद तक एक घुमावदार काम है; यदि वे अधिक यथार्थवादी शॉर्टकट लेना चाहते हैं, तो उन्हें खुद को नकार कर, खुद को अलग रखकर, यह जानना चाहिए कि उनके कार्य गलत हैं और सत्य के अनुरूप नहीं हैं, तब उन्हें सत्य-सिद्धांत की खोज करनी चाहिए। ये हैं वे कदम। ये देखने में सरल लग सकते हैं, लेकिन इन्हें व्यवहार में लाने में बहुत-सी कठिनाइयाँ हैं, क्योंकि मनुष्यों का स्वभाव भ्रष्ट होने के साथ-साथ उनके अंदर तरह-तरह की कल्पनाएं हैं, तरह-तरह की अपेक्षाएँ हैं, इच्छाएं हैं, जो उन्हें अपने दैहिक-सुखों को नकारने से रोकती हैं और उनमें ठहराव नहीं आने देतीं। ये सब करना इतना आसान नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से उद्धृत

सत्य के उपयोग से लोगों की अवधारणाओं को दूर किया जाना चाहिए; उन्हें केवल एक मानव-निर्मित समाधान से अलग नहीं रख सकते-यह इतना आसान नहीं है। लोगों में धार्मिक मामलों के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि वे अवधारणाओं या विधर्मी और बेतुकी चीजों से चिपके हुए हैं, जिन्हें दर-किनार नहीं कर पाते। इसका कारण क्या है? इसका कारण है उनका शैतानी भ्रष्ट स्वभाव। लोगों की अवधारणाएँ बड़ी हों या छोटी, गंभीर हों या न हों, यदि उनका स्वभाव भ्रष्ट नहीं है, तो इन अवधारणाओं को दूर करना आसान है। आखिर, अवधारणा केवल सोचने का एक तरीका ही तो है। लेकिन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों के कारण, जैसे कठोरता, दुष्टता और अहंकार, अवधारणाएं एक जोड़ बन जाती हैं जो लोगों को परमेश्वर का विरोध करने, गलत व्याख्या करने, यहां तक कि परमेश्वर की आलोचना करने का कारण बनती हैं। वे ऐसा कह नहीं सकते, लेकिन उनके व्यवहार से पता चलता है कि वे विरोध करते हैं और तुम्हारे दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करते। भ्रष्ट स्वभाव के अधीन होने से, वे अपनी अवधारणाओं से चिपके रहते हैं—ऐसा उनके स्वभाव के कारण होता है। इसलिए, जैसे-जैसे अवधारणाएँ दूर होती जाती हैं, वैसे-वैसे लोगों का भ्रष्ट स्वभाव भी दूर होता जाता है। यदि लोगों का भ्रष्ट स्वभाव दूर हो जाता है, तो उनके कई अपरिपक्व, बचकाने विचार—यहां तक कि जो अवधारणाएँ पहले ही आकार ले चुकी हैं—उनके लिए कोई मुद्दा नहीं रहतीं; वे केवल विचार होती हैं, उनका तुम्हारे कर्तव्य या परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अवधारणाएँ और भ्रष्ट स्वभाव आपस में जुड़े हुए होते हैं। कभी-कभी कोई अवधारणा तुम्हारे दिल में होती है, लेकिन यह तुम्हारे क्रियाकलापों को निर्देशित नहीं करती। जब यह तुम्हारे तात्कालिक हितों में बाधा पैदा नहीं करती, तो तुम इसे अनदेखा कर देते हो। हालांकि, इसे अनदेखा करने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी अवधारणा में कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, जब कुछ ऐसा होता है जो तुम्हारी अवधारणाओं से टकराता है, तो तुम एक खास रवैये से चिपक रहते हो, एक ऐसा रवैया जिस पर तुम्हारा स्वभाव हावी रहता है। यह स्वभाव कठोरता हो सकता है, अहंकार हो सकता है और क्रूरता हो सकता है; तुम तुरंत परमेश्वर से कहते हो, "मेरे नज़रिए की कई बार अकादमिक रूप से अभिपुष्टि की जा चुकी है। हजारों वर्षों से लोगों ने ऐसे ही विचार रखे हैं, तो मैं क्यों न रखूँ? यदि तुम सही नहीं हो, तो अभी भी कैसे कह सकते हो कि यह सत्य है और सबसे ऊपर है? मेरा दृष्टिकोण पूरी मानवजाति में सर्वोच्च है!" एक अवधारणा के कारण तुम ऐसे बड़बोलेपन का व्यवहार कर सकते हो। इसका क्या कारण है? ऐसा भ्रष्ट स्वभाव के कारण होता है। अवधारणाओं और लोगों के भ्रष्ट स्वभावों के बीच बहुत गहरा संबंध है और उनकी अवधारणाओं को दूर करना ज़रूरी है। एक बार जब लोगों की परमेश्वर में विश्वास की अवधारणाओं को दूर कर दिया जाता है, तो उनके लिए परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना आसान हो जाता है और वे अपने कर्तव्य को अधिक सुचारू रूप से निभाते हैं, वे दर-किनार नहीं किए जाते, वे कोई गड़बड़ी या बाधा उत्पन्न नहीं करते, वे ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे परमेश्वर को शर्मिंदगी उठानी पड़े। यदि लोगों की अवधारणाओं और कल्पनाओं पर ध्यान न दिया जाए, तो वे ऐसे काम करने लगते हैं जो रुकावट और हस्तक्षेप का कारण बनते हैं। अधिक गंभीर मामलों में, लोगों की अवधारणाएं उनमें परमेश्वर के देहधारण के प्रति हर तरह का विरोध पैदा कर सकती हैं, जिससे तुम मसीह पर सवाल उठाते हो और उसे स्वीकार नहीं कर पाते, इससे तुम्हारा सत्य को स्वीकारना और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना भी प्रभावित होता है। इससे भी अधिक गंभीर मामलों में, परमेश्वर के काम के बारे में लोग विभिन्न अवधारणाओं के कारण परमेश्वर के काम को नकार देते हैं, परमेश्वर के काम करने के तरीके, परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को भी नकार देते हैं—ऐसी स्थिति में उन्हें उद्धार की किसी भी तरह की कोई उम्मीद नहीं रहती। लोगों में चाहे परमेश्वर के किसी भी पहलू के बारे में अवधारणाएं हों, इन अवधारणाओं के पीछे भ्रष्ट स्वभाव ही होते हैं, जो इन भ्रष्ट स्वभावों को बदतर बना सकते हैं, लोगों को परमेश्वर के कार्य, स्वयं परमेश्वर और परमेश्वर के स्वभाव को अपने भ्रष्ट स्वभाव से देखने का और भी बड़ा बहाना दे देते हैं। क्या इससे उन्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव से परमेश्वर का विरोध करने का हौसला नहीं मिल जाता? यह मनुष्य के लिए अवधारणाओं का परिणाम है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा मनुष्य का उद्धार केवल खोखली बातें नहीं हैं। वह ये सत्य इसलिए व्यक्त करता है ताकि भ्रष्ट इंसान की उन चीज़ों को दूर किया जा सके जो सत्य के विपरीत हैं—उसकी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, फलसफे, पारंपरिक संस्कृति, इत्यादि—और इन चीजों का विश्लेषण करके, मनुष्य को समझाया जा सके कि सकारात्मक चीजें कौन-सी हैं और नकारात्मक चीजें कौन-सी हैं, कौन सी चीजें परमेश्वर से आती हैं, कौन सी चीजें शैतान से आती हैं, सत्य क्या है, शैतान के फलसफे और तर्क क्या हैं। जब लोग इन चीजों को साफ तौर पर देख पाएँगे, तो वे सहज ही जीवन का सही मार्ग चुनेंगे, वे सत्य का अभ्यास कर पाएँगे, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार चल पाएँगे और नकारात्मक चीजों को पहचान पाएँगे। यही इंसान से परमेश्वर अपेक्षा रखता है और इसी मानक से वह लोगों को पूर्ण करता है और बचाता है। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर मनुष्य की अवधारणाओं का विश्लेषण करता है, लेकिन मेरे अंदर तो कोई अवधारणा नहीं है। जिन लोगों में अवधारणा होती है, वे आमतौर पर बहुत धूर्त और शातिर होते हैं, या फिर धर्मशास्त्री और पाखंडी फरीसी होते हैं। मैं वैसा नहीं हूँ।" यहां समस्या क्या है? वे खुद ही अपने आपको नहीं जानते। उनके साथ कैसी भी संगति करो, वे उसे खुद पर लागू नहीं कर पाते, उन्हें लगता है कि वे ऐसे हैं ही नहीं। यह अज्ञानता है, उन्हें आध्यात्मिक चीजों की कोई समझ नहीं है। क्या तुम लोग इस तरह सोच पाते हो? आज ज्यादातर लोग ऐसा नहीं सोचते। उन्होंने अनेक उपदेश सुने हैं, वे समझते हैं कि हर किसी के अंदर ऐसी भ्रष्टता और अवधारणाएं हैं जो निष्क्रिय और नकारात्मक हैं, उनका विश्लेषण करने में कुछ भी शर्मनाक नहीं है; इसके अलावा, उनका विश्लेषण करने पर, वे मानते हैं कि इससे दूसरों को विवेक विकसित करने में मदद मिलेगी और वे स्वयं भी विकसित होकर सत्य को अधिक तेज़ी से समझने में सक्षम होंगे। यही कारण है कि वे सभी लोग खुलकर अपना विश्लेषण कर पाते हैं। खैर, उस मामले में, अवधारणाओं का विश्लेषण करने का उद्देश्य क्या है? इनका उद्देश्य है अवधारणाओं को दर-किनार करना, मनुष्य और परमेश्वर के बीच की गलतफहमियों को दूर करना और फिर लोगों को इस योग्य बनाना कि वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर ध्यान केंद्रित कर सकें, उन्हें उद्धार के मार्ग पर कैसे प्रवेश करने का ज्ञान हो सके और वे जान सकें कि सत्य का अभ्यास करने के लिए क्या करना चाहिए। अंतत:, इस तरह लगातार अभ्यास करने से, इच्छित प्रभाव प्राप्त होता है : एक तरफ तो लोग परमेश्वर की इच्छा को समझकर उसके प्रति समर्पित हो पाएँगे और दूसरी ओर, उन्हें दुष्ट अवधारणाओं, कल्पनाओं और ज्ञान से उत्पन्न होने वाली नकारात्मक चीजों को नकारने तथा उनका विरोध करने की छूट होगी। जब कभी किसी धार्मिक बुद्धिजीवी, धर्मशास्त्री या किसी धार्मिक पादरी या एल्डर से तुम्हारा सामना होगा, तो तुम बातचीत शुरू होते ही उन्हें पहचान जाओगे और सत्य के ज़रिए तुम उनकी असंख्य अवधारणाओं, कल्पनाओं, पाखंड और भ्रांतियों का खंडन कर पाओगे। इससे पता चलता है कि तुम नकारात्मक चीजों की पहचान कर सकते हो, तुम थोड़ा-बहुत सत्य समझ गए हो, तुम्हारा एक विशिष्ट आध्यात्मिक कद है और तुम इन धार्मिक अगुआओं और हस्तियों से सामना होने पर घबराते नहीं हो। वे जिस ज्ञान, विद्वत्ता और फलसफे की बातें करते हैं, यहां तक कि उनकी सारी विचारधारा और सिद्धांत—अपुष्ट होते है, क्योंकि तुम धर्म के शब्दों और सिद्धांतों, अवधारणाओं और कल्पनाओं को पहचान चुके हो। अब तुम्हें धर्म की चीज़ें धोखा नहीं दे सकतीं। लेकिन तुम लोग अभी तक वहां नहीं पहुँचे हो। जब तुम्हारा सामना इन धार्मिक धोखेबाजों, फरीसियों या किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो थोड़ी-बहुत हैसियत पा चुका है, तो तुम लोग भयभीत हो जाते हो; यह जानते हुए भी कि वे जो कह रहे हैं वह गलत है, उनकी बातें अवधारणाओं और कल्पनाओं से निर्मित हैं, ज्ञान से पैदा हुई हैं, पर तुम लोगों को पता नहीं होता कि उसका खंडन कैसे करना है, उसका विश्लेषण कहाँ से शुरू करना है या उन लोगों को किन शब्दों से उजागर करना है। क्या इससे साबित नहीं होता कि तुमने अभी भी सत्य को समझा नहीं है? इसलिए तुम लोगों को सत्य से युक्त होकर अपना विश्लेषण करना सीखना चाहिए। जब सत्य समझ लोगे, तो तुम लोगों को पहचान पाओगे, लेकिन यदि तुम सत्य नहीं समझोगे, तो लोगों को नहीं पहचान पाओगे। लोगों और चीजों को समझने के लिए, तुम्हें सत्य की समझ होनी चाहिए; सत्य को आधारशिला बनाए बिना, अपना जीवन बनाए बिना, तुम किसी भी चीज़ की गहराई में नहीं जा पाओगे।

जब लोग विभिन्न अवधारणाओं और कल्पनाओं के मसले को सुलझा लेते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के वचनों का ज्ञान और अनुभव प्राप्त हो जाता है, साथ ही वे परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में भी प्रवेश कर चुके होते हैं। परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने की प्रक्रिया में, एक-एक करके, लोगों में उत्पन्न होने वाली विभिन्न अवधारणाएँ और कल्पनाएँ दूर हो जाती हैं, और परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के सार के बारे में लोगों के परमेश्वर-संबंधी ज्ञान में और लोगों के प्रति परमेश्वर की जो विभिन्न प्रवृत्तियाँ हैं, उनमें परिवर्तन आ जाता है। यह परिवर्तन कैसे लाया जाता है? यह तब लाया जाता है जब लोग अपनी विभिन्न अवधारणाओं और कल्पनाओं को एक तरफ रख देते हैं, जब वे ज्ञान, फलसफों, पारंपरिक संस्कृति या बाहरी दुनिया से आए विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को एक तरफ रखकर, परमेश्वर से आए और सत्य से जुड़े विभिन्न दृष्टिकोणों को स्वीकार करते हैं। इसलिए, जब लोग परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में भी प्रवेश कर लेते हैं और सत्य का उपयोग करके प्रश्नों को समझने और उनके बारे में सोचने लगते हैं एवं सत्य के उपयोग से समस्याओं को हल कर पाते हैं; अवधारणाओं को दूर कर लेने से लोगों के जीवन और उनके अस्तित्व में यही परिवर्तन आते हैं। जब लोगों में इस तरह के बदलाव आ जाते हैं, तो परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता एक सृजित प्राणी और स्रष्टा का बन जाता है। इस स्तर पर संबंधों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, कोई प्रलोभन नहीं होता और विद्रोह भी बहुत कम होता है; लोग परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक आज्ञाकारी, समझदार, श्रद्धावान, निष्ठावान एवं ईमानदार हो जाते हैं और वास्तव में परमेश्वर का भय मानने लगते हैं। लेकिन लोगों की अवधारणाओं को दूर करना एक बहुत ही पीड़ादायक प्रक्रिया है। लोगों को अपने दैहिक-सुखों को नकारना होता है, उन्हें अपनी अवधारणाओं को एक तरफ रखना होता है, उन चीजों को दरकिनार करना होता है जिन्हें वे सही मानते हैं, उन चीजों को दरकिनार करना होता है जिनसे वे चिपके रहते हैं, उन चीजों को अलग रखना होता है जिन्हें वे सही मानते हैं, जिनका उन्होंने आजीवन अनुसरण किया है और जिन चीजों के लिए वे आजीवन तरसते रहे हैं। इसका मतलब यह है कि लोगों को अपने सुखों का त्याग कर देना चाहिए, ज्ञान, फलसफों को दर-किनार कर देना चाहिए—यहां तक कि शैतान की दुनिया से सीखी गयी जीवन-शैली को भी छोड़ देना चाहिए और उसके स्थान पर एक ऐसी जीवन-शैली अपनानी चाहिए जिसके आधार और अस्तित्व का मूल सत्य हो। इस तरह, लोगों को बहुत से कष्ट सहने चाहिए। ज़रूरी नहीं कि इस तरह के कष्ट कोई शारीरिक रोग या दैनिक जीवन की कठिनाइयाँ ही हों, बल्कि ये तुम्हारे दिल में विभिन्न चीजों और इंसानों के बारे में हर तरह के दृष्टिकोण में हुए परिवर्तन से आ सकते हैं, या ये परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के विभिन्न पहलुओं में हुए बदलाव से भी आ सकते हैं, जो दुनिया, मानव-अस्तित्व, मानवजाति और परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान और दृष्टिकोण तक को उलटकर रख देते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

जब कोई धारणा प्रकट होती है, चाहे वह कोई भी धारणा हो, तो पहले कुछ समय अपने मन में उस पर चिंतन करने और उसका विश्लेषण करने में लगाओ। अध्ययन करो कि क्या यह सोचना सही है। अगर तुम्हारे पास स्पष्ट समझ है कि ऐसी बातें सोचना भ्रामक और गलत है, कि यह परमेश्वर की निंदा है, तो परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसकी प्रबुद्धता और मार्गदर्शन माँगने में समय बरबाद न करो। उस मामले को अपने मन में रखो, और फिर भक्ति, सभा और अपने कर्तव्य-पालन के दौरान धीरे-धीरे अन्य संबंधित मामलों को जानो और अनुभव करो—और ऐसे मामलों को जानते और अनुभव करते समय अपनी धारणाओं को हल करने पर ध्यान दो। बेशक, तुम अन्य लोगों के साथ उचित संगति भी कर सकते हो, जिसमें उनसे इस क्षेत्र के विषयों पर चर्चा कर सकते हो, उनसे सहायता प्राप्त करने का प्रयास कर सकते हो और परमेश्वर के वचनों में समाधान ढूँढ़ सकते हो। परमेश्वर के वचनों और अपने अनुभवों के बीच, तुम धीरे-धीरे प्रमाणित करोगे कि परमेश्वर ने ऐसा बोलकर सही किया था, जो धारणाओं के मुद्दे को हल करने के लिए तुम्हारी मदद करने में अत्यधिक प्रभावी होगा। और, चूँकि तुम परमेश्वर के ऐसे वचनों और कार्य को स्वीकार और अनुभव करते हो, और अंततः परमेश्वर की इच्छा समझ जाते हो और परमेश्वर के स्वभावों का ज्ञान प्राप्त कर लेते हो, इसलिए तुम अपनी धारणाएँ सुलझा लेते हो और उन्हें एक तरफ रख देते हो, और परमेश्वर को गलत नहीं समझते और परमेश्वर से चौकन्ने नहीं रहते, और परमेश्वर से अनुचित माँगें नहीं करते। यह एक तरह की धारणा है, जिसे हल किया जा सकता है।

एक और तरह की धारणा है, जिसे ठीक करना मुश्किल होता है, और जिसे लोग हल नहीं कर सकते। जिन धारणाओं को हल करना मुश्किल होता है, उनके संबंध में एक सिद्धांत है, जिसका लोगों को पालन करना चाहिए। अगर तुम ऐसी धारणाएँ खुलकर व्यक्त करते हो, तो तथ्य यह है कि इसे तब धारणाएँ फैलाना कहा जाएगा। धारणाएँ फैलाने के परिणामों और प्रकृति के बारे में मैं पहले ही संगति कर चुका हूँ, और तुम्हें इस मुद्दे के सार को समझना चाहिए, इसलिए यह सबसे अच्छा है कि तुम इस तरह की चीजों को खुद तौलो, बजाय इसके कि तुम उच्च स्वर में अविवेकपूर्ण टिप्पणियाँ करो। अगर तुम कहते हो, "इन चीजों को अपने तक रखना मेरे लिए कठिन है, मैं इसे सहन नहीं कर सकता," तो अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर से उनके बारे में बात करो। तुम्हें परमेश्वर से क्या कहना चाहिए? आगे बढ़ो और कहो, "हे परमेश्वर! इस प्रकार के विचार मेरे मन में आ रहे हैं। मैं इन्हें एक तरफ रखना चाहता हूँ, लेकिन नहीं रख पाता। मुझे पता है कि ये चीजें तुम्हारे लिए निंदात्मक हैं, मैं तुम्हारी मदद और मार्गदर्शन के लिए विनती करता हूँ, और चाहता हूँ कि तुम मुझे अनुशासित करो, और मुझे बेनकाब करने के लिए उपयुक्त साधनों का उपयोग करो, जिससे मुझे एहसास हो जाए कि मेरी धारणाएँ गलत हैं। तुम्हारे द्वारा अपनाए गए किसी भी तरीके को मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।" लोगों को परेशान और गुमराह कर सकने वाली ऐसी धारणाओं को खुलकर व्यक्त करने के बजाय अपने तक ही रखो। अगर तुम्हें उन्हें अपने तक ही रखना मुश्किल लगता हो, तो चुपचाप अपने मन में बड़बड़ाओ। अगर इससे बात न बने, तो तुम्हें उनके बारे में प्रार्थना में बोलना चाहिए और परमेश्वर का मार्गदर्शन और उसके वचनों की प्रबुद्धता माँगनी चाहिए, ताकि तुम इन धारणाओं को एक तरफ रख सको। कुछ लोग कहते हैं, "अगर सभा के दौरान भाई-बहनों के सामने इन धारणाओं को खुलकर व्यक्त करना धारणा फैलाना है, तो जब मुझे उन्हें अपने तक ही रखने में मुश्किल हो रही हो, तब क्या उनके बारे में परिवार के सदस्यों के साथ बात करना ठीक है?" अगर तुम्हारे परिवार के सभी सदस्य भाई-बहन हैं, और इन धारणाओं को खुलकर व्यक्त करने से वे परेशान होंगे, तो क्या ऐसा करना सही है? तुम जो कहते हो, अगर उसका लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, अगर वह उनके लिए नुकसानदायक, हानिकारक और गुमराह करने वाला है, तो तुम जो चाहे करो लेकिन उसे मत कहो। तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर से इसे हल करने के लिए कहना चाहिए। अगर तुम्हारा हृदय पवित्र और धार्मिकता का भूखा है, तो तुम्हारी धारणाओं का समाधान किया जा सकता है। ऐसा कुछ नहीं जिसे परमेश्वर के वचन ठीक नहीं कर सकते, ऐसी कोई समस्या नहीं जिसे वे हल नहीं कर सकते; महत्त्व यह रखता है कि क्या तुम उन्हें स्वीकार करने में सक्षम हो, और क्या तुम उन्हें व्यवहार में लाने के इच्छुक हो, और क्या तुम अपनी धारणाओं को एक तरफ रखने में सक्षम हो। अगर तुम ऐसा मानते हो, तो तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में इस बारे में परमेश्वर से अनुरोध करना चाहिए। अगर, तुम्हारी तमाम याचनाओं के बावजूद परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करता, तुम्हें कुछ भी स्पष्ट रूप से समझने नहीं देता, फिर भी अपने दिल और अवचेतन में तुम अनजाने ही यह मानने लगते हो कि इस धारणा का कोई मतलब नहीं है, और वह तुम्हें परेशान करना बंद कर देती है, और यद्यपि तुम यह नहीं समझते कि परमेश्वर ने ऐसा क्यों किया है, और परमेश्वर ने तुम्हें यह बताने के लिए स्पष्ट वचनों या स्पष्ट सत्य का उपयोग नहीं किया है कि उसने ऐसा क्यों किया है, उसने तुम्हें अपने इरादे स्पष्ट नहीं किए हैं, और तुम्हें अपनी धारणा हल करने दी है, वह धारणा तुम्हारे भीतर आकार नहीं ले पाई है, वह तुम्हारे जीवन को, तुम्हारे आगे मौजूद मार्ग और तुम्हारे सामान्य आध्यात्मिक जीवन को अस्त-व्यस्त नहीं करती—परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध को तो वह बिलकुल भी खराब नहीं करती, और स्वाभाविक रूप से तुम्हारे कर्तव्य को भी प्रभावित नहीं करती—तो क्या यह धारणा मूल रूप से हल हो गई है? यह अभ्यास का मार्ग है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (16)' से उद्धृत

चाहे परमेश्वर कुछ भी करे, चाहे वह तुम्हारे लिए स्वीकार करना आसान हो या मुश्किल, और चाहे वह तुम्हारे अंदर धारणाएँ पैदा कर सकता हो, कुल मिलाकर, उसके परिणामस्वरूप परमेश्वर की पहचान नहीं बदलती; वह हमेशा सृष्टिकर्ता रहेगा, और तुम हमेशा परमेश्वर के प्राणी रहोगे। अगर तुम किसी भी धारणा के प्रतिबंध को तोड़ सकते हो, और अभी भी परमेश्वर के साथ एक प्राणी और सृष्टिकर्ता का संबंध बनाए रख सकते हो, तो तुम परमेश्वर के सच्चे प्राणी हो। अगर तुम किसी भी धारणा से प्रभावित या परेशान न होने में सक्षम हो, और अपने दिल की गहराइयों से सच्ची आज्ञाकारिता में सक्षम हो, और सत्य की तुम्हारी समझ गहरी हो या उथली, अगर तुम धारणाएँ एक तरफ रखने में सक्षम हो, और उनके द्वारा लाचार नहीं होते, केवल यह विश्वास करते हो कि परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है, कि परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और वह गलतियाँ नहीं करता, तो तुम बचाए जा सकते हो। वास्तव में, सभी का आध्यात्मिक कद सीमित है। लोगों के दिमाग में कितनी चीजें भरी जा सकती हैं? क्या वे परमेश्वर को जानने में सक्षम हैं? क्या वे परमेश्वर की थाह ले सकते हैं? ये ख्याली बातें हैं! मत भूलो : लोग हमेशा परमेश्वर के सामने शिशु ही रहेंगे। अगर तुम हमेशा सोचते हो कि तुम चतुर हो, अगर तुम हमेशा दिखावा करते हो, और यह कहते हुए हर चीज का पता लगाने की कोशिश करते हो, "अगर मैं इसे नहीं समझ सकता, तो मैं यह नहीं मान सकता कि तुम मेरे परमेश्वर हो, मैं स्वीकार नहीं कर सकता कि तुम मेरे परमेश्वर हो, मैं यह नहीं मान सकता कि तुम सृष्टिकर्ता हो। अगर तुम मेरी धारणाओं का समाधान नहीं करते, और फिर भी अगर तुम्हें लगता है कि मैं यह स्वीकार करूँगा कि तुम परमेश्वर हो, कि मैं तुम्हारी संप्रभुता को स्वीकार करूँगा, और तुम्हारा आज्ञापालन करूँगा, तो तुम सपना देख रहे हो," तो चीजें गड़बड़ हो गई हैं। वे गड़बड़ कैसे हो गई हैं? परमेश्वर तुमसे ऐसी बातों पर चर्चा नहीं करता। मनुष्य के प्रति वह हमेशा इस प्रकार रहेगा : अगर तुम यह स्वीकार नहीं करते कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है, तो वह यह स्वीकार नहीं करेगा कि तुम उसके प्राणियों में से एक हो। जब परमेश्वर यह स्वीकार नहीं करता कि तुम उसके प्राणियों में से एक हो, तो परमेश्वर के प्रति तुम्हारे रवैये के परिणामस्वरूप परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में परिवर्तन होता है। अगर तुम आज्ञापालन करने, और परमेश्वर की पहचान और सार और वह सब-कुछ जो परमेश्वर करता है, स्वीकार करने में असमर्थ हो, तो तुम्हारी पहचान में बदलाव होगा। क्या तुम अभी भी परमेश्वर के प्राणी हो? अगर परमेश्वर तुम्हें स्वीकार नहीं करता, तो अन्यथा आग्रह करने का कोई मतलब नहीं है। और अगर तुम परमेश्वर के प्राणी नहीं हो, और परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहता, तो क्या तुम्हें अभी भी उद्धार की आशा है? अगर तुम वे जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य निभाने में असमर्थ हो जो परमेश्वर के किसी प्राणी को निभानी चाहिए, अगर तुम सृष्टिकर्ता के साथ परमेश्वर के प्राणी की हैसियत से व्यवहार नहीं करते, तो परमेश्वर तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करेगा? वह तुम्हें कैसे देखेगा? परमेश्वर भी तुम्हें अपने प्राणियों में से एक नहीं मानेगा, बल्कि दुष्ट शैतान मानेगा। क्या तुम्हें नहीं लगता था कि तुम चतुर हो? यह कैसे हुआ कि तुमने अपने आपको दुष्ट शैतान बना लिया? यह चतुराई नहीं, बेवकूफी है। ये वचन लोगों को क्या सिखाते हैं? वे सिखाते हैं कि उन्हें परमेश्वर के सामने उचित व्यवहार करना चाहिए। यहाँ तक कि अगर तुम्हारे पास अपनी धारणाओं का कारण भी हो, तो भी यह मत सोचो कि तुम्हारे पास सत्य है, और तुम परमेश्वर के विरुद्ध चिल्लाने और उसके बारे में दावा करने के योग्य हो। तुम कुछ भी करो, पर वैसे मत बनो। जब तुम परमेश्वर के प्राणी के रूप में अपनी पहचान खो देते हो, तो तुम नष्ट हो जाते हो—यह कोई मजाक नहीं है। ऐसा ठीक इसलिए है, क्योंकि जब लोग धारणाएँ रखते हैं, तो वे एक अलग रास्ता लेते हैं, और एक अलग समाधान अपनाते हैं, इसलिए परिणाम पूरी तरह से अलग होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (16)' से उद्धृत

जब तुम सिद्धांतों को समझ लेते हो, तो धारणाएँ हल करना आसान हो जाता है। अपने आपको धारणाओं के जाल में न फँसने दो; अगर तुम उन्हें हल कर सकते हो, तो उन्हें हल करने का भरसक प्रयास करो, और अगर हल नहीं कर सकते, तो उन्हें अपने कर्तव्य और परमेश्वर के साथ संबंध को प्रभावित न करने दो। इसलिए भी तुम्हें ये धारणाएँ नहीं फैलानी चाहिए; दुष्टों में से एक मत बनो, अशांति और व्यवधान पैदा करने वाले मत बनो, शैतान के दूत मत बनो, शैतान का निर्गम मत बनो। अगर बहुत कोशिश करने पर भी तुम केवल ऊपरी बातें समझ पाते हो, और धारणा को पूरी तरह से हल करने में असमर्थ रहते हो, तो बस उसे अनदेखा करो; उसे अपनी सत्य की खोज और जीवन-प्रवेश की खोज को प्रभावित न करने दो। सिद्धांतों के इन विभिन्न पहलुओं को समझ लेने के बाद अधिकांश परिस्थितियों में लोगों की रक्षा की जा सकती है। अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य स्वीकार करता है, जो सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है, जो दुष्ट नहीं है, जो बाधित या परेशान करने का इच्छुक नहीं है, और न ही जानबूझकर ऐसा करता है, तो स्वयं में धारणाएँ प्रकट होने पर तुम आम तौर पर बचा लिए जाओगे। इसका मूल सिद्धांत यह है : जब तुम्हारे पास धारणाएँ हों, अगर उन्हें हल करना मुश्किल हो, तो उनके बारे में कुछ भी करने से पहले समय लो; पहले प्रतीक्षा करो, परमेश्वर गलती नहीं करता। इस सिद्धांत को याद रखो। इसके अलावा, तुम्हें अपना कर्तव्य नहीं छोड़ना चाहिए—वह धारणाओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए। जैसे ही तुम्हारे मन में धारणाएँ बनें, यह न सोचो, "अगर मैं उल्टा-सीधा काम करूँ तो क्या फर्क पड़ता है? मेरी मन:स्थिति खराब है, किसी भी तरह मैं अच्छा काम नहीं कर सकता।" अगर तुम ऐसा सोचोगे, तो चीजें गड़बड़ हो जाएँगी; जैसे ही तुम्हारा रवैया नकारात्मकता, लापरवाही और बेमन से कार्य करने में बदलता है, तो यह समस्या बन जाता है, यह धारणाओं द्वारा तुम्हारे भीतर चीजों को उद्वेलित करने का मामला है। जब धारणाएँ तुम्हारे भीतर समस्या पैदा करती हैं और तुम्हारे कर्तव्य-पालन को प्रभावित करती हैं, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पहले ही बदल चुका होता है। जब तुम्हारे भीतर की धारणाओं का समाधान नहीं हुआ होता, तो उनमें से कुछ तुम्हारे कर्तव्य-पालन को प्रभावित नहीं करतीं, और कुछ करती हैं। तुम्हारे कर्तव्य पर उनका प्रभाव यह होता है कि ये धारणाएँ तुम्हारे परमेश्वर पर संदेह करने का कारण बनती हैं; तुम अपना कर्तव्य ठीक से नहीं करते, और यह महसूस नहीं करते कि तुम्हारे कर्तव्य-पालन न करने का कोई परिणाम होता है, तुम डरते नहीं, तुम्हें परमेश्वर का कोई भय नहीं होता—और यह खतरनाक है, यह तुम्हारा प्रलोभन में पड़ना और शैतान द्वारा मूर्ख बनाया जाना और छीन लिया जाना है। तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले चुनाव और अपनी धारणाओं के प्रति तुम्हारा रवैया महत्वपूर्ण है; चाहे धारणाएँ हल की जा सकें या नहीं, और चाहे वे किसी भी मात्रा में हल की जा सकें, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच सामान्य संबंध नहीं बदलना चाहिए। अंशत:, तुम्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित सभी बातों का पालन करने में सक्षम होना चाहिए : परमेश्वर गलतियाँ नहीं करता, और इसका ज्ञान और इससे संबंधित सत्य कभी नहीं बदलने चाहिए। अंशत:, तुम्हें उस कर्तव्य को नहीं छोड़ना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है, तुम्हें उससे खुद को भारमुक्त नहीं करना चाहिए। अगर, आंतरिक या बाह्य रूप से, तुममें परमेश्वर के प्रति कोई प्रतिरोध, अनिच्छा, विद्रोह या अवज्ञा नहीं है, तो परमेश्वर केवल तुम्हारी आज्ञाकारिता देखेगा, और यह कि तुम प्रतीक्षा कर रहे हो। तुममें अभी भी धारणाएँ हो सकती हैं, लेकिन परमेश्वर तुम्हारी अवज्ञा नहीं देखता, क्योंकि तुममें अवज्ञा और प्रतिरोध नहीं हैं; परमेश्वर अभी भी तुम्हें अपने प्राणियों में से एक मानता है। इसके विपरीत, अगर तुम्हारा दिल शिकायतों और असंतोष से भरा है, और तुम प्रतिशोध के अवसर की तलाश में हो, और अपने कर्तव्य का पालन नहीं करना चाहते, अगर तुम्हारे कर्तव्य का निष्पादन प्रभावित होता है, यहाँ तक कि तुम अपने आपको उससे भारमुक्त करने का प्रयास भी करते हो, और अगर तुम्हारे दिल में परमेश्वर के बारे में सभी तरह की अनुचित शिकायतें हैं, और अपना कर्तव्य निभाने के दौरान असंतोष प्रस्फुटित होता है, तो इस समय परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में एक बड़ा बदलाव आ चुका है। तुम्हारी स्थिति अब परमेश्वर के प्राणी की नहीं रही, तुम अब परमेश्वर के प्राणी नहीं हो, बल्कि दुष्ट शैतान के लिए एक निर्गम बन गए हो—और इसलिए परमेश्वर तुम्हारे प्रति उतना विनम्र नहीं होगा। जब लोग इस मुकाम पर पहुँचते हैं, तो वे खतरनाक क्षेत्र में होते हैं। अगर परमेश्वर कुछ न भी करे, तो भी कलीसिया में भी तुम्हारी स्थिति मजबूत नहीं होगी। और इसलिए, लोगों को अपने हर काम में—विशेष रूप से जब उसमें धारणाएँ हल करने जैसे मुद्दे शामिल हों—ऐसे काम करने से बचने का ध्यान रखना चाहिए, जो परमेश्वर को ठेस पहुँचाते हो, या जिनकी परमेश्वर द्वारा निंदा की जाती हो, या जो दूसरों को चोट या नुकसान पहुँचाते हों। यह सिद्धांत है।

परमेश्वर के बारे में धारणा होना बहुत बड़ी बात है! स्वीकृति, आज्ञाकारिता और सुनने के अलावा, मनुष्य और परमेश्वर के बीच जो सबसे अधिक देखा जाता है, वह है लोगों का परमेश्वर के बारे में धारणा रखना। इसे बिलकुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर लोगों के पास इन धारणाओं को सुलझाने का सही तरीका और मार्ग नहीं है, तो परमेश्वर का अनुसरण करना उनके लिए बहुत कठिन होगा, वे कई चक्कर लगाएँगे, और जैसे ही वे असावधान होंगे, वे बखूबी परमेश्वर के प्रति अवज्ञा और शत्रुता के मार्ग पर कदम रख सकते हैं। और जब वे उस मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनके लिए सब खत्म हो जाता है—क्या तुम सोचते हो कि उनके पास अभी भी मौका हो सकता है? इसका कोई आसान समाधान नहीं है; उनके पास कोई मौका नहीं रहता। और इसलिए, इससे पहले कि परमेश्वर इस बात से इनकार करे कि तुम उसकी रचना हो, तुम्हें सीखना चाहिए कि परमेश्वर का प्राणी कैसे बनें। यह मत कोशिश करो और जानो कि सृष्टिकर्ता का अध्ययन कैसे करें, या इसका सत्यापन और पुष्टि कैसे करें कि सृष्टिकर्ता वह परमेश्वर है जिस पर तुम विश्वास करते हो—यह तुम्हारा दायित्व नहीं है, यह तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है। लोगों को रोजाना अपने दिल में यह चिंतन करना और सोचना चाहिए कि परमेश्वर का एक अच्छा प्राणी कैसे बनें, न कि यह कैसे साबित करें कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है या नहीं, वह परमेश्वर है या नहीं, परमेश्वर जब कुछ करता है तो सही करता है या नहीं—तुम्हें इसका अध्ययन नहीं करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (16)' से उद्धृत

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