56. धारणाओं और कल्‍पनाओं से निपटने के सिद्धान्‍त

(1) इसे स्‍थापित करना आवश्‍यक है कि एकमात्र परमेश्‍वर ही सत्‍य है, सत्‍य का उद्गम उसके वचनों में है, और मनुष्‍य की धारणाएँ और कल्‍पनाएँ कितनी ही अच्‍छी क्‍यों न हों, वे खोखले मतों के सिवा कुछ भी नहीं होती;

(2) मानवीय धारणाएँ और कल्‍पनाएँ परमेश्‍वर के वचनों के अनुरूप कतई नहीं हैं, और वे सत्‍य के सार से असंगत हैं। जो व्‍यक्ति उनके मुताबिक़ जीवन जीता है उसे बचाया नहीं जा सकता;

(3) सत्‍य धारणाओं का अकेला अपराजेय प्रतिद्वन्‍द्वी है। व्‍यक्ति को परमेश्‍वर के वचनों को अधिक-से-अधिक पढ़ना चाहिए और सत्‍य की तलाश करनी चाहिए; केवल इसी तरह व्‍यक्ति मानवीय धारणाओं और कल्‍पनाओं से पूरी तरह उबर सकता है;

(4) परमेश्‍वर के वचनों का अभ्‍यास करना और उन्‍हें अनुभव करना, और सत्‍य की समझ विकसित करना तथा परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान हासिल करना आवश्‍यक है। केवल इसी तरह व्‍यक्ति मानवीय धारणाओं और कल्‍पना से पूरी तरह छुटकारा पा सकता है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, और सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ-साथ विद्यमान हैं। वे लोग जो सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं कभी भी जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। मार्गदर्शन, समर्थन, और पोषण के बिना, तुम केवल अक्षर, सिद्धांत, और सबसे बढ़कर, मृत्यु ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन साथ-साथ विद्यमान हैं। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं खोज पाते हो, तो तुम जीवन की पौष्टिकता प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकते हो, तो तुममें निश्चित ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा, संपूर्णता में तुम्हारा शरीर तुम्हारी देह—दुर्गंध से भरी तुम्हारी देह—के सिवा कुछ न होगा। यह जान लो कि किताबों की बातें जीवन नहीं मानी जाती हैं, इतिहास के अभिलेख सत्य नहीं माने जा सकते हैं, और अतीत के नियम वर्तमान में परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों के वृतांत का काम नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर पृथ्वी पर आकर और मनुष्य के बीच रहकर जो अभिव्यक्त करता है, केवल वही सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छा, और उसका कार्य करने का वर्तमान तरीक़ा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

सत्य के उपयोग से लोगों की अवधारणाओं को दूर किया जाना चाहिए; उन्हें केवल एक मानव-निर्मित समाधान से अलग नहीं रख सकते-यह इतना आसान नहीं है। लोगों में धार्मिक मामलों के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि वे अवधारणाओं या विधर्मी और बेतुकी चीजों से चिपके हुए हैं, जिन्हें दर-किनार नहीं कर पाते। इसका कारण क्या है? इसका कारण है उनका शैतानी भ्रष्ट स्वभाव। लोगों की अवधारणाएँ बड़ी हों या छोटी, गंभीर हों या न हों, यदि उनका स्वभाव भ्रष्ट नहीं है, तो इन अवधारणाओं को दूर करना आसान है। आखिर, अवधारणा केवल सोचने का एक तरीका ही तो है। लेकिन लोगों के भ्रष्ट स्वभावों के कारण, जैसे कठोरता, दुष्टता और अहंकार, अवधारणाएं एक जोड़ बन जाती हैं जो लोगों को परमेश्वर का विरोध करने, गलत व्याख्या करने, यहां तक कि परमेश्वर की आलोचना करने का कारण बनती हैं। वे ऐसा कह नहीं सकते, लेकिन उनके व्यवहार से पता चलता है कि वे विरोध करते हैं और तुम्हारे दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करते। भ्रष्ट स्वभाव के अधीन होने से, वे अपनी अवधारणाओं से चिपके रहते हैं—ऐसा उनके स्वभाव के कारण होता है। इसलिए, जैसे-जैसे अवधारणाएँ दूर होती जाती हैं, वैसे-वैसे लोगों का भ्रष्ट स्वभाव भी दूर होता जाता है। यदि लोगों का भ्रष्ट स्वभाव दूर हो जाता है, तो उनके कई अपरिपक्व, बचकाने विचार—यहां तक कि जो अवधारणाएँ पहले ही आकार ले चुकी हैं—उनके लिए कोई मुद्दा नहीं रहतीं; वे केवल विचार होती हैं, उनका तुम्हारे कर्तव्य या परमेश्वर के प्रति तुम्हारी आज्ञाकारिता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अवधारणाएँ और भ्रष्ट स्वभाव आपस में जुड़े हुए होते हैं। कभी-कभी कोई अवधारणा तुम्हारे दिल में होती है, लेकिन यह तुम्हारे क्रियाकलापों को निर्देशित नहीं करती। जब यह तुम्हारे तात्कालिक हितों में बाधा पैदा नहीं करती, तो तुम इसे अनदेखा कर देते हो। हालांकि, इसे अनदेखा करने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी अवधारणा में कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, जब कुछ ऐसा होता है जो तुम्हारी अवधारणाओं से टकराता है, तो तुम एक खास रवैये से चिपक रहते हो, एक ऐसा रवैया जिस पर तुम्हारा स्वभाव हावी रहता है। यह स्वभाव कठोरता हो सकता है, अहंकार हो सकता है और क्रूरता हो सकता है; तुम तुरंत परमेश्वर से कहते हो, “मेरे नज़रिए की कई बार अकादमिक रूप से अभिपुष्टि की जा चुकी है। हजारों वर्षों से लोगों ने ऐसे ही विचार रखे हैं, तो मैं क्यों न रखूँ? यदि तुम सही नहीं हो, तो अभी भी कैसे कह सकते हो कि यह सत्य है और सबसे ऊपर है? मेरा दृष्टिकोण पूरी मानवजाति में सर्वोच्च है!” एक अवधारणा के कारण तुम ऐसे बड़बोलेपन का व्यवहार कर सकते हो। इसका क्या कारण है? ऐसा भ्रष्ट स्वभाव के कारण होता है। अवधारणाओं और लोगों के भ्रष्ट स्वभावों के बीच बहुत गहरा संबंध है और उनकी अवधारणाओं को दूर करना ज़रूरी है। एक बार जब लोगों की परमेश्वर में विश्वास की अवधारणाओं को दूर कर दिया जाता है, तो उनके लिए परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना आसान हो जाता है और वे अपने कर्तव्य को अधिक सुचारू रूप से निभाते हैं, वे दर-किनार नहीं किए जाते, वे कोई गड़बड़ी या बाधा उत्पन्न नहीं करते, वे ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे परमेश्वर को शर्मिंदगी उठानी पड़े।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

तुम लोगों ने इतने वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, हालाँकि तुम थोड़े-बहुत सत्य समझते हो, तुम सबके अंदर तुम्हारी अपनी व्याख्याएं, विश्वास और कल्पनाएं हैं—वे सभी परमेश्वर के इरादों और सत्य का उल्लंघन करते हैं और विरोधाभासी हैं। ये चीज़ें लोगों की अवधारणाएँ हैं। ब-कुछ जो सत्य के विपरीत है, वह मनुष्य की अवधारणाओं और कल्पनाओं से जुड़ा है। तो मनुष्य की अवधारणाएँ कैसे बनती हैं? इसके कई अलग-अलग कारण हैं। आंशिक रूप से यह ज्ञान का प्रसार और शिक्षा है; इसी तरह, पारंपरिक संस्कृति, सामाजिक रुझानों और कुछ पारिवारिक शिक्षा का भी प्रभाव है। कुल मिलाकर, शैतान के दुष्ट समाज से आदमी प्रभावित और प्रेरित हो गया है; यही उसकी अवधारणाओं का मूल कारण है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई प्रगति होती रहती है, कुछ ऐसा कार्य है जो नए कार्य के सामने आने पर अप्रचलित और पुराना हो जाता है। ये विभिन्न प्रकार के नए और पुराने कार्य परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं; हर अगला कदम पिछले कदम का अनुसरण करता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें निस्संदेह समाप्त कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, लंबे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभवों और शिक्षाओं के साथ मिलकर, मनुष्य के दिमाग में अनेक तरह और रूपों की धारणाएं बना दी हैं। मनुष्य द्वारा इस प्रकार की धारणाएं बनाए जाने में और भी अधिक सकारात्मक भूमिका इस बात की रही है कि प्राचीन समय के पारंपरिक सिद्धांतों का वर्षों से विस्तार हुआ है, जबकि परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास में, विभिन्न धारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण लोगों में परमेश्वर के बारे में सभी प्रकार की धारणात्मक समझ निरंतर उत्पन्न और विकसित होती रही है, जिससे कई ऐसे धार्मिक लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, उसके शत्रु बन गए हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक धारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और वह कभी भी सिद्धांत नहीं बनता है, बल्कि निरंतर बदलता रहता है और उसका कम या ज्यादा नवीकरण होता रहता है। इस तरह कार्य करना स्वयं परमेश्वर के निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर के कार्य का निहित नियम भी है, और उन उपायों में से एक है जिनके माध्यम से परमेश्वर अपना प्रबंधन निष्पादित करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य बदल नहीं पाएगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा, और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परंतु वास्तव में ये निश्चित अवधियों में होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर में विश्वास करता है, वह बिल्कुल भिन्न है। वह पुराने, परिचित धर्म सिद्धांतों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और वे जितने पुराने होते हैं, उसे उतने ही प्रिय लगते हैं। मनुष्य का मूर्ख दिमाग, जो पत्थर के समान अपरिवर्तनशील है, परमेश्वर के इतने सारे अकल्पनीय नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? हमेशा नया बने रहने वाले और कभी पुराना न पड़ने वाले परमेश्वर से मनुष्य घृणा करता है; वह हमेशा ही केवल उस पुराने परमेश्वर को पसंद करता है जिसके दाँत लंबे और बाल सफेद हैं, और जो अपनी जगह से चिपका रहता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी पसंद है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, एक ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छह हजार सालों से नया कार्य करता आ रहा है। तो वे किसी भी इलाज से परे हैं। हो सकता है कि यह मनुष्य के हठ के कारण या किसी भी मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों की अनुल्लंघनीयता के कारण हो—परंतु वे पुरुष और महिला पादरी अभी भी फटी-पुरानी किताबों और दस्तावेजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को पूरा करने में इस तरह लगा रहता है मानो उसके साथ कोई हो ही नहीं। भले ही ये विरोधाभास परमेश्वर और मनुष्य को शत्रु बनाते हैं, और इनका कोई समाधान भी नहीं है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, मानो वे होकर भी नहीं हैं। हालांकि मनुष्य तब भी अपनी आस्थाओं और धारणाओं से चिपका रहता है, और उन्हें कभी छोड़ता नहीं है। फिर भी, एक बात स्वतःस्पष्ट है : भले ही मनुष्य अपने रुख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर के कदम हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं और वह अपना रुख परिवेश के अनुसार हमेशा बदलता रहता है। अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने पराजित दुश्मनों का सबसे बड़ा शत्रु है, और वह पूरी मानवजाति का हिमायती भी है, समान रूप से पराजित और अपराजित दोनों का। परमेश्वर के साथ कौन प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की धारणाएं परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं, क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्य के दौरान ही उत्पन्न हुई हैं। जो भी हो, परमेश्वर इस कारण से मनुष्य को क्षमा नहीं कर देता, इसके साथ ही, वह अपने कार्य के बाहर के कार्य के खेप-दर-खेप "परमेश्वर के लिए" जैसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह मनुष्य की धारणाओं और पुरानी, धार्मिक आस्थाओं से बेहद नाराज है, और उसका इरादा उस तिथि को स्वीकार तक करने का नहीं है जब ये धारणाएं सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये धारणाएं उसके कार्य के कारण पैदा हुई हैं, क्योंकि मनुष्य की धारणाएं मनुष्यों द्वारा ही फैलाई जाती हैं; उनका स्रोत मनुष्य की सोच और दिमाग है—परमेश्वर नहीं, बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा यही रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिन बातों को वह मनुष्य को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वे युगों और कालों में विभाजित हैं, न कि अनंत और स्थिर हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह परमेश्वर ही है जो मनुष्य को जीवित और नया बनने के योग्य बनाता है, न कि शैतान जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम लोग अभी भी यह नहीं समझते हो? तुममें परमेश्वर के बारे में धारणाएं हैं और तुम उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नही हो, क्योंकि तुम संकीर्ण दिमाग के हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य के भीतर अत्यंत कम समझने योग्य है, और न ही इसलिए कि परमेश्वर का कार्य मानवीय इच्छाओं के अनुरूप नहीं है; ऐसा इसलिए भी नहीं है कि परमेश्वर अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा बेपरवाह रहता है। तुम अपनी धारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ पाते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की अत्यधिक कमी है, और क्योंकि तुममें परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी की थोड़ी सी भी समानता नहीं है; ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है; सारे कष्ट और दुर्भाग्य मनुष्य ने ही पैदा किए हैं। परमेश्वर की सोच हमेशा अच्छी होती है : वह तुम्हें धारणाएँ बनाने देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी बदल जाओ और नए होते जाओ। फिर भी तुम नहीं जानते कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, और तुम हमेशा परख या विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजें मुश्किल बना रहा है, बल्कि तुममें परमेश्वर के लिए आदर नहीं है, और तुम्हारी अवज्ञा बहुत ज्यादा है। एक अदना-सा सृजित प्राणी पूर्व में परमेश्वर द्वारा प्रदत्त किसी चीज के एक महत्त्वहीन-से हिस्से को लेकर और पलटकर उसी से परमेश्वर पर प्रहार करने का साहस करता है—क्या यह मनुष्य द्वारा अवज्ञा नहीं है? यह कहना उचित होगा कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और वह अपनी व्यर्थ की, बदबूदार, सड़ी-गली, अलंकृत भाषा के साथ, अपनी इच्छानुसार प्रदर्शन करने में तो और भी अयोग्य है—उन घिसी-पिटी धारणाओं का तो कहना ही क्या। क्या वे और भी बेकार नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर के आज के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं' से उद्धृत

तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध इसलिए करते हो, या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का इसलिए उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लेते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से अत्यंत अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेमतलब बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; न कि अपनी सनक में उसकी आलोचना करने के द्वारा मनुष्य पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान पाया है। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सही होता जाता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का विरोध करने की संभावना रहती है। तुम लोगों की धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह "पूँजी" है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और तुम जितना अधिक भ्रष्ट, तुच्छ और निम्न होगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार न किया जाए, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं होगे, और सदैव उससे दूर रहोगे।

अपनी पुरानी धारणाओं को एक तरफ रखकर ही तुम नए ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो, फिर भी पुराना ज्ञान आवश्यक नहीं कि पुरानी धारणाएँ हो। मनुष्य द्वारा कल्पना की गई बातों को "धारणाएँ" कहते हैं जो वास्तविकताओं के साथ मेल नहीं खाती हैं। यदि पुराना ज्ञान पुराने युग में पहले से ही पुराना हो गया हो, और मनुष्य को नए कार्य में प्रवेश करने से रोक देता हो, तो इस प्रकार का ज्ञान भी एक धारणा है। यदि मनुष्य इस प्रकार के ज्ञान के संबंध में सही दृष्टिकोण अपनाने में समर्थ हो, और, पुरानी और नई बातों को जोड़कर विभिन्न पहलुओं से परमेश्वर को जान सकता हो, तो पुराना ज्ञान मनुष्य के लिए सहायक बन जाता है और वह आधार बन जाता है जिसके द्वारा मनुष्य नए युग में प्रवेश करता है। ... मनुष्य सोचता है कि उसकी धारणाएँ सही हैं और बिना गलतियों की हैं, और सोचता है कि ये धारणाएँ परमेश्वर की ओर से आती हैं। आज, जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य देखता है, वह उन धारणाओं को खुला छोड़ देता है जो कई सालों से बनती रही हैं। अतीत की कल्पनाएँ और विचार इस चरण के कार्य में अवरोध बन गए हैं और मनुष्य के लिए इस प्रकार की धारणाओं को छोड़ना और इस प्रकार के विचारों का खंडन करना कठिन हो गया है। इस कदम-दर-कदम कार्य को लेकर ऐसे बहुत-से लोगों की धारणाएँ, जिन्होंने आज तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, अत्यंत हानिकारक हो गई हैं और इन लोगों ने देहधारी परमेश्वर के प्रति धीरे-धीरे एक हठी शत्रुता विकसित कर ली है। इस घृणा का स्रोत मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं में निहित है। मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ आज के कार्य की शत्रु बन गई हैं, वह कार्य जो मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता। ऐसा इसीलिए हुआ है क्योंकि तथ्य मनुष्य को उसकी कल्पनाशीलता को खुली छूट देने की अनुमति नहीं देते, और इसके साथ ही, वे मनुष्य द्वारा आसानी से खंडित नहीं किए जा सकते, और मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ तथ्यों के अस्तित्व को मिटा नहीं सकतीं, और साथ ही, क्योंकि मनुष्य तथ्यों की सटीकता और सच्चाई पर विचार नहीं करता है, और केवल एक ही तरह सोचते हुए अपनी धारणाओं को खुला छोड़ देता है, और अपनी खुद की कल्पनाओं को काम में लाता है। इसे केवल मनुष्यों की धारणाओं का दोष ही कहा जा सकता है, इसे परमेश्वर के कार्य का दोष नहीं कहा जा सकता। मनुष्य जो चाहे कल्पना कर सकता है, परंतु वह परमेश्वर के कार्य के किसी भी चरण या इसके छोटे से भी अंश के बारे में मुक्त भाव से विवाद नहीं कर सकता है; परमेश्वर के कार्य का तथ्य मनुष्य द्वारा अनुल्लंघनीय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर जब देहधारण कर इंसानों के बीच काम करने आता है, तो सभी उसे देखते और उसके वचनों को सुनते हैं, और सभी लोग उन कर्मों को देखते हैं जो परमेश्वर देह रूप में करता है। उस क्षण, इंसान की तमाम धारणाएँ साबुन के झाग बन जाती हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखा है, यदि वे अपनी इच्छा से उसका आज्ञापालन करेंगे, तो उनका तिरस्कार नहीं किया जाएगा, जबकि जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग मसीह-विरोधी और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं, मगर खुशी से उसकी आज्ञा मानते हैं, वे निंदित नहीं किए जाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की नीयत और क्रियाकलापों के आधार पर उसे दंडित करता है, उसके विचारों और मत के आधार पर कभी नहीं। यदि वह विचारों और मत के आधार इंसान को दंडित करता, तो कोई भी परमेश्वर के रोषपूर्ण हाथों से बच कर भाग नहीं पाता। जो लोग जानबूझकर देहधारी परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, वे उसकी अवज्ञा करने के कारण दण्ड पाएँगे। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, उनका विरोध परमेश्वर के प्रति उनकी धारणाओं से उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के कार्य में व्यवधान पैदा करते हैं। ये लोग जानते-बूझते परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं और उसे नष्ट करते हैं। परमेश्वर के बारे में न केवल उनकी धारणाएँ होती हैं, बल्कि वे उन कामों में भी लिप्त रहते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं, और यही कारण है कि इस तरह के लोगों की निंदा की जाएगी। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालने में लिप्त नहीं होते, उनकी पापियों के समान निंदा नहीं की जाएगी, क्योंकि वे अपनी इच्छा से आज्ञापालन कर पाते हैं और विघ्न एवं व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त नहीं होते। ऐसे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जाएगी। लेकिन, जब कोई कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद भी परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ मन में रखता है और देहधारी परमेश्वर के कार्य को समझने में असमर्थ रहता है, और अनेक वर्षों के अनुभव के बावजूद, वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और उसे जान नहीं पाता, और अगर कितने भी सालों तक उसके कार्य का अनुभव करने के बाद भी वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और फिर भो उसे जान नहीं पाता तब वह भले ही व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त न हो, लेकिन उसका हृदय परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है, और अगर ये धारणाएँ स्पष्ट न भी हों तो, ऐसे लोग किसी भी प्रकार से परमेश्वर के कार्य के उपयोग लायक नहीं होते। वे सुसमाचार का उपदेश देने या परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग किसी काम के नहीं होते और मंदबुद्धि होते हैं। क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते और परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं का परित्याग करने में एकदम अक्षम होते हैं, इसलिए वे निंदित किए जाते हैं। ऐसा कहा जा सकता है : नौसिखिए विश्वासियों के लिये परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखना या परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना सामान्य बात है, परंतु जिसने वर्षों परमेश्वर में विश्वास किया है और परमेश्वर के कार्य का बहुत अनुभव किया है, उसका ऐसी धारणाएँ रखे रहना, सामान्य बात नहीं है, और उसे परमेश्वर का ज्ञान न होना तो बिल्कुल भी सामान्य नहीं है। ऐसे लोगों की निंदा करना सामान्य स्थिति नहीं है। ऐसे असामान्य लोग एकदम कचरा हैं; ये ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और जिन्होंने व्यर्थ में ही परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाया होता है। ऐसे सभी लोग अंत में मिटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

आज मैं यह सब-कुछ तुम से इसलिए कह रहा हूँ ताकि तुम्हें पता चले और यह ज्ञान तुम्हें एक सटीक और नई समझ प्राप्त करने की ओर ले जाए; मैं यह इसलिए भी कह रहा हूँ ताकि तुम लोगों के भीतर बसी पुरानी अवधारणाएं और समझने के पुराने तरीके मिट जाएं और तुम एक नया ज्ञान प्राप्त कर सको। अगर तुम सच में मेरे वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफी बदलाव आएगा। यदि तुम एक आज्ञाकारी हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे-पिओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर पाओ, तो तुम्हारी पुरानी मानसिकता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई बन जाए, तो तुम्हारा अभ्यास भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह तुम्हारी सेवा अधिक से अधिक लक्ष्य पर होगी और अधिक से अधिक परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर पाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक अवधारणाओं को बदल सको, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह परिणाम, और इससे कुछ भी कम नहीं, तब होता है जब परमेश्वर मनुष्य पर विजय प्राप्त कर लेता है; लोगों में यह परिवर्तन होने लगता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (3)' से उद्धृत

शायद लोगों की अवधारणाओं का उनके खाने-सोने पर, उनके सामान्य जीवन पर कोई प्रभाव न पड़ता हो, लेकिन ये चीज़ें लोगों के दिमाग और विचारों में मौजूद रहती हैं, ये छाया की तरह लोगों से चिपककर हर समय उनका पीछा करती हैं। अगर तुम इन्हें निरंतर न हटाते रहो, तो ये तुम्हारे व्यवहार और सोच को लगातार नियंत्रित करेंगी, तुम्हारे निर्णय को नियंत्रित करेंगी, तुम्हारे परमेश्वर-संबंधी ज्ञान को नियंत्रित करेंगी और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंधों को नियंत्रित करती रहेंगी। अवधारणा एक बड़ी समस्या है। परमेश्वर के बारे में लोगों की अवधारणाओं का होना उनके और परमेश्वर के बीच में दीवार होने जैसा है, जो उन्हें परमेश्वर का वास्तविक चेहरा देखने से रोकती है, जो उन्हें परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और सच्चे सार को देखने से रोकती है—क्योंकि लोग अपनी अवधारणाओं में और कल्पनाओं में रहते हैं, वे अपनी अवधारणाओं का उपयोग यह निर्धारित करने के लिए करते हैं कि परमेश्वर सही है या गलत और परमेश्वर जो कुछ भी करता है उसे मापने, उसकी निंदा करने और परमेश्वर के हर कार्य को जाँचने के लिए करते हैं। ऐसा करके लोग किस तरह की अवस्था में डूब जाते हैं? क्या लोग अपनी अवधारणाओं में रहकर परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते हैं? क्या वे परमेश्वर में सच्चा विश्वास रख सकते हैं? नहीं रख सकते। यदि वे थोड़ा-बहुत समर्पण करते भी हैं, तो वह भी उनकी अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार ही होता है। जैसे ही कोई अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार समर्पण करता है, तो वह समर्पण उनकी निजी चीजों से दूषित हो जाता है जो शैतान और बाहरी दुनिया का अंग होती हैं और जो सत्य के विपरीत होती हैं। परमेश्वर को लेकर लोगों की अवधारणाएँ एक गंभीर समस्या है; मनुष्य और परमेश्वर के बीच के इस प्रमुख मुद्दे को तत्काल सुलझाने की आवश्यकता है। हर कोई परमेश्वर के सामने अवधारणाएँ लेकर आता है, परमेश्वर के बारे में हर तरह के संदेह लेकर आता है। तो यह भी कहा जा सकता है कि परमेश्वर लोगों को इतना कुछ प्रदान करता है, उनके लिए व्यवस्था और आयोजन करता है, उसके बावजूद लोग उसके सामने अनगिनत गलतफहमियाँ लेकर आते हैं। और फिर परमेश्वर के साथ उनका किस तरह का रिश्ता बनता है? लोग लगातार परमेश्वर को गलत समझते हैं, उस पर संदेह करते हैं और उसके वचनों एवं कार्य को मापने के लिए अपने मानकों से तय करते हैं कि परमेश्वर सही है या गलत। यह कैसा व्यवहार है? वे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं, उसका विरोध कर रहे हैं, तिरस्कार कर रहे हैं, उसकी निंदा कर रहे हैं, आलोचना कर रहे हैं, स्पर्धा कर रहे हैं—और अधिक गंभीर मामलों में, परमेश्वर से "द्वंद्व युद्ध" कर रहे हैं। सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि लोग अपनी अवधारणाओं के कारण सच्चे स्वयं परमेश्वर को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, सत्य का पालन नहीं कर पा रहे हैं, लोग परमेश्वर के अस्तित्व को ही नकार रहे हैं और जिस परमेश्वर का वे अनुसरण करते हैं, उसको त्याग रहे हैं। यह एक भयावह समस्या है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा मनुष्य का उद्धार केवल खोखली बातें नहीं हैं। वह ये सत्य इसलिए व्यक्त करता है ताकि भ्रष्ट इंसान की उन चीज़ों को दूर किया जा सके जो सत्य के विपरीत हैं—उसकी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, फलसफे, पारंपरिक संस्कृति, इत्यादि—और इन चीजों का विश्लेषण करके, मनुष्य को समझाया जा सके कि सकारात्मक चीजें कौन-सी हैं और नकारात्मक चीजें कौन-सी हैं, कौन सी चीजें परमेश्वर से आती हैं, कौन सी चीजें शैतान से आती हैं, सत्य क्या है, शैतान के फलसफे और तर्क क्या हैं। जब लोग इन चीजों को साफ तौर पर देख पाएँगे, तो वे सहज ही जीवन का सही मार्ग चुनेंगे, वे सत्य का अभ्यास कर पाएँगे, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार चल पाएँगे और नकारात्मक चीजों को पहचान पाएँगे। यही इंसान से परमेश्वर अपेक्षा रखता है और इसी मानक से वह लोगों को पूर्ण करता है और बचाता है। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर मनुष्य की अवधारणाओं का विश्लेषण करता है, लेकिन मेरे अंदर तो कोई अवधारणा नहीं है। जिन लोगों में अवधारणा होती है, वे आमतौर पर बहुत धूर्त और शातिर होते हैं, या फिर धर्मशास्त्री और पाखंडी फरीसी होते हैं। मैं वैसा नहीं हूँ।" यहां समस्या क्या है? वे खुद ही अपने आपको नहीं जानते। उनके साथ कैसी भी संगति करो, वे उसे खुद पर लागू नहीं कर पाते, उन्हें लगता है कि वे ऐसे हैं ही नहीं। यह अज्ञानता है, उन्हें आध्यात्मिक चीजों की कोई समझ नहीं है। क्या तुम लोग इस तरह सोच पाते हो? आज ज्यादातर लोग ऐसा नहीं सोचते। उन्होंने अनेक उपदेश सुने हैं, वे समझते हैं कि हर किसी के अंदर ऐसी भ्रष्टता और अवधारणाएं हैं जो निष्क्रिय और नकारात्मक हैं, उनका विश्लेषण करने में कुछ भी शर्मनाक नहीं है; इसके अलावा, उनका विश्लेषण करने पर, वे मानते हैं कि इससे दूसरों को विवेक विकसित करने में मदद मिलेगी और वे स्वयं भी विकसित होकर सत्य को अधिक तेज़ी से समझने में सक्षम होंगे। यही कारण है कि वे सभी लोग खुलकर अपना विश्लेषण कर पाते हैं। खैर, उस मामले में, अवधारणाओं का विश्लेषण करने का उद्देश्य क्या है? इनका उद्देश्य है अवधारणाओं को दर-किनार करना, मनुष्य और परमेश्वर के बीच की गलतफहमियों को दूर करना और फिर लोगों को इस योग्य बनाना कि वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर ध्यान केंद्रित कर सकें, उन्हें उद्धार के मार्ग पर कैसे प्रवेश करने का ज्ञान हो सके और वे जान सकें कि सत्य का अभ्यास करने के लिए क्या करना चाहिए। अंतत:, इस तरह लगातार अभ्यास करने से, इच्छित प्रभाव प्राप्त होता है : एक तरफ तो लोग परमेश्वर की इच्छा को समझकर उसके प्रति समर्पित हो पाएँगे और दूसरी ओर, उन्हें दुष्ट अवधारणाओं, कल्पनाओं और ज्ञान से उत्पन्न होने वाली नकारात्मक चीजों को नकारने तथा उनका विरोध करने की छूट होगी। जब कभी किसी धार्मिक बुद्धिजीवी, धर्मशास्त्री या किसी धार्मिक पादरी या एल्डर से तुम्हारा सामना होगा, तो तुम बातचीत शुरू होते ही उन्हें पहचान जाओगे और सत्य के ज़रिए तुम उनकी असंख्य अवधारणाओं, कल्पनाओं, पाखंड और भ्रांतियों का खंडन कर पाओगे। इससे पता चलता है कि तुम नकारात्मक चीजों की पहचान कर सकते हो, तुम थोड़ा-बहुत सत्य समझ गए हो, तुम्हारा एक विशिष्ट आध्यात्मिक कद है और तुम इन धार्मिक अगुआओं और हस्तियों से सामना होने पर घबराते नहीं हो। वे जिस ज्ञान, विद्वत्ता और फलसफे की बातें करते हैं, यहां तक कि उनकी सारी विचारधारा और सिद्धांत—अपुष्ट होते है, क्योंकि तुम धर्म के शब्दों और सिद्धांतों, अवधारणाओं और कल्पनाओं को पहचान चुके हो। अब तुम्हें धर्म की चीज़ें धोखा नहीं दे सकतीं। लेकिन तुम लोग अभी तक वहां नहीं पहुँचे हो। जब तुम्हारा सामना इन धार्मिक धोखेबाजों, फरीसियों या किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो थोड़ी-बहुत हैसियत पा चुका है, तो तुम लोग भयभीत हो जाते हो; यह जानते हुए भी कि वे जो कह रहे हैं वह गलत है, उनकी बातें अवधारणाओं और कल्पनाओं से निर्मित हैं, ज्ञान से पैदा हुई हैं, पर तुम लोगों को पता नहीं होता कि उसका खंडन कैसे करना है, उसका विश्लेषण कहाँ से शुरू करना है या उन लोगों को किन शब्दों से उजागर करना है। क्या इससे साबित नहीं होता कि तुमने अभी भी सत्य को समझा नहीं है? इसलिए तुम लोगों को सत्य से युक्त होकर अपना विश्लेषण करना सीखना चाहिए। जब सत्य समझ लोगे, तो तुम लोगों को पहचान पाओगे, लेकिन यदि तुम सत्य नहीं समझोगे, तो लोगों को नहीं पहचान पाओगे। लोगों और चीजों को समझने के लिए, तुम्हें सत्य की समझ होनी चाहिए; सत्य को आधारशिला बनाए बिना, अपना जीवन बनाए बिना, तुम किसी भी चीज़ की गहराई में नहीं जा पाओगे।

जब लोग विभिन्न अवधारणाओं और कल्पनाओं के मसले को सुलझा लेते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के वचनों का ज्ञान और अनुभव प्राप्त हो जाता है, साथ ही वे परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में भी प्रवेश कर चुके होते हैं। परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने की प्रक्रिया में, एक-एक करके, लोगों में उत्पन्न होने वाली विभिन्न अवधारणाएँ और कल्पनाएँ दूर हो जाती हैं, और परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के सार के बारे में लोगों के परमेश्वर-संबंधी ज्ञान में और लोगों के प्रति परमेश्वर की जो विभिन्न प्रवृत्तियाँ हैं, उनमें परिवर्तन आ जाता है। यह परिवर्तन कैसे लाया जाता है? यह तब लाया जाता है जब लोग अपनी विभिन्न अवधारणाओं और कल्पनाओं को एक तरफ रख देते हैं, जब वे ज्ञान, फलसफों, पारंपरिक संस्कृति या बाहरी दुनिया से आए विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को एक तरफ रखकर, परमेश्वर से आए और सत्य से जुड़े विभिन्न दृष्टिकोणों को स्वीकार करते हैं। इसलिए, जब लोग परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में भी प्रवेश कर लेते हैं और सत्य का उपयोग करके प्रश्नों को समझने और उनके बारे में सोचने लगते हैं एवं सत्य के उपयोग से समस्याओं को हल कर पाते हैं; अवधारणाओं को दूर कर लेने से लोगों के जीवन और उनके अस्तित्व में यही परिवर्तन आते हैं। जब लोगों में इस तरह के बदलाव आ जाते हैं, तो परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता एक सृजित प्राणी और स्रष्टा का बन जाता है। इस स्तर पर संबंधों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, कोई प्रलोभन नहीं होता और विद्रोह भी बहुत कम होता है; लोग परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक आज्ञाकारी, समझदार, श्रद्धावान, निष्ठावान एवं ईमानदार हो जाते हैं और वास्तव में परमेश्वर का भय मानने लगते हैं। लेकिन लोगों की अवधारणाओं को दूर करना एक बहुत ही पीड़ादायक प्रक्रिया है। लोगों को अपने दैहिक-सुखों को नकारना होता है, उन्हें अपनी अवधारणाओं को एक तरफ रखना होता है, उन चीजों को दरकिनार करना होता है जिन्हें वे सही मानते हैं, उन चीजों को दरकिनार करना होता है जिनसे वे चिपके रहते हैं, उन चीजों को अलग रखना होता है जिन्हें वे सही मानते हैं, जिनका उन्होंने आजीवन अनुसरण किया है और जिन चीजों के लिए वे आजीवन तरसते रहे हैं। इसका मतलब यह है कि लोगों को अपने सुखों का त्याग कर देना चाहिए, ज्ञान, फलसफों को दर-किनार कर देना चाहिए—यहां तक कि शैतान की दुनिया से सीखी गयी जीवन-शैली को भी छोड़ देना चाहिए और उसके स्थान पर एक ऐसी जीवन-शैली अपनानी चाहिए जिसके आधार और अस्तित्व का मूल सत्य हो। इस तरह, लोगों को बहुत से कष्ट सहने चाहिए। ज़रूरी नहीं कि इस तरह के कष्ट कोई शारीरिक रोग या दैनिक जीवन की कठिनाइयाँ ही हों, बल्कि ये तुम्हारे दिल में विभिन्न चीजों और इंसानों के बारे में हर तरह के दृष्टिकोण में हुए परिवर्तन से आ सकते हैं, या ये परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के विभिन्न पहलुओं में हुए बदलाव से भी आ सकते हैं, जो दुनिया, मानव-अस्तित्व, मानवजाति और परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान और दृष्टिकोण तक को उलटकर रख देते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

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