123. परमेश्वर में अपनी आस्था में विवेक-बुद्धि से कार्य करने के सिद्धांत

(1) विवेक-बुद्धि और छल के बीच के सार-भूत अंतर को जानना आवश्यक है। विवेकी होने का लक्ष्य अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना और परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना होता है। यह एक सकारात्मक बात होती है।

(2) जो लोग दुष्ट शैतान के होते हैं, उनके खिलाफ विवेकपूर्ण तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि ऐसा न हो कि दुष्ट लोग लाभ उठा लें, अपनी अनुकूल स्थिति का गलत फायदा उठाएँ, और परमेश्वर के घर के काम में विघ्न और बाधा डालें।

(3) ईमानदारी का अनुसरण करना मानवीय होने का सिद्धांत है और यह परमेश्वर को प्रसन्न करता है, फिर भी शैतान के लोगों से निपटने के लिए व्यक्ति को विवेक-बुद्धि पर जोर देना चाहिए, क्योंकि शैतान अत्यधिक दुष्ट होता है।

(4) सुसमाचार का प्रचार करते समय, व्यक्ति को उन लोगों की खोज करनी चाहिए जो सत्य स्वीकार कर सकते हैं, और कभी भी इसका प्रचार शैतान के लोगों के बीच नहीं करना चाहिए, जो सत्य से घृणा करते हैं। यह पूरी तरह से सत्य-सिद्धांत के अनुरूप है।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

"देखो, मैं तुम्हें भेड़ों के समान भेड़ियों के बीच में भेजता हूँ, इसलिये साँपों के समान बुद्धिमान और कबूतरों के समान भोले बनो। परन्तु लोगों से सावधान रहो, क्योंकि वे तुम्हें महासभाओं में सौंपेंगे, और अपनी पंचायतों में तुम्हें कोड़े मारेंगे। तुम मेरे लिये हाकिमों और राजाओं के सामने उन पर, और अन्यजातियों पर गवाह होने के लिए पहुँचाए जाओगे। ... जब वे तुम्हें एक नगर में सताएँ, तो दूसरे को भाग जाना" (मत्ती 10:16-23)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

एक व्यक्ति को हर एक पहलू में बुद्धि का प्रयोग करना होगा और मेरे सिद्ध मार्गों पर चलने के लिये बुद्धि का प्रयोग करना होग। ऐसे लोग जो मेरे वचनों के दायरे में आचरण करते हैं वे सबसे बुद्धिमान हैं और ऐसे लोग जो मेरे वचनों के अनुसार आचरण करते हैं वे सबसे अधिक आज्ञाकारी हैं। जो कुछ मैं कहता हूँ वह होता है, और तुमको मेरे साथ बहस या तर्क करने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ मैं कहता हूँ वह तुमको ध्यान में रखकर कहता हूँ (इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं सख्त हूँ या कोमल)। यदि तुम आज्ञाकारी होने पर ध्यान केन्द्रित करते हो तो ठीक है, और यह सच्ची बुद्धि का मार्ग है (और परमेश्वर के न्याय को अपने ऊपर आ पड़ने से रोकने का मार्ग है)।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 49' से उद्धृत

तुम में मेरी हिम्मत होनी चाहिए, जब उन रिश्तेदारों का सामना करने की बात आए जो विश्वास नहीं करते, तो तुम्हारे पास सिद्धांत होने चाहिए। लेकिन तुम्हें मेरी खातिर किसी भी अन्धकार की शक्ति से हार नहीं माननी चाहिए। पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर भरोसा रखो; शैतान के किसी भी षडयंत्र को काबिज़ न होने दो। अपने हृदय को मेरे सम्मुख रखने हेतु पूरा प्रयास करो, मैं तुम्हें आराम दूँगा, तुम्हें शान्ति और आनंद प्रदान करूँगा। दूसरों के सामने एक विशेष तरह का होने का प्रयास मत करो; क्या मुझे संतुष्ट करना अधिक मूल्य और महत्व नहीं रखता? मुझे संतुष्ट करने से क्या तुम और भी अनंत और जीवनपर्यंत शान्ति या आनंद से नहीं भर जाओगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 10' से उद्धृत

जब तुम्हें पता चलता है कि कोई मसीह-विरोधी है, तो मैं तुम्हें बताता हूँ, अगर तुम्हें लगे कि उनके पास बहुत शक्ति है और अगर तुम उन्हें उजागर करोगे, तो तुम परिष्कृत किए जा सकते हो, अलग-थलग किए जा सकते हो, या तुम्हारी परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें जब्त की जा सकती हैं, तो उनके साथ सीधे मुकाबला मत करो। तुम्हें अपनी पुस्तकें सुरक्षित रखते हुए और कलीसिया के साथ अपन संपर्क न तोड़ते हुए, तुरंत उन्हें उजागर करने, उनकी रिपोर्ट करने और उन्हें त्यागने के तरीकों के बारे में सोचना चाहिए। उनका सीधा सामना मत करो। तुम्हारा उनसे तर्क करना बेकार होगा, तुम्हारा उन्हें प्रेम के माध्यम से सुधारने का प्रयास करना बेकार होगा, और तुम्हारा उनसे सत्य के बारे में संगति करना बेकार होगा। तुम उन्हें बदल नहीं सकते। चूँकि तुम उन्हें बदल नहीं सकते, इसलिए उनके पश्चात्ताप करने की उम्मीद में उनसे किसी व्यक्तिगत बातचीत या तर्क करने का प्रयास करने से बचना तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा। इसके बजाय, उन्हें इस तरह से उजागर करो और उनकी इस तरह से रिपोर्ट करो कि उन्हें इसका पता न चले। उनसे अपने वरिष्ठों को निपटने दो, या अधिक लोगों को उन्हें उजागर करने, उनकी रिपोर्ट करने और उन्हें त्यागने के लिए प्रेरित करो, और इस तरह कलीसिया को उन्हें अलग करने दो। क्या यह इस काम को करने का एक अच्छा तरीका नहीं है? अगर तुम किसी मसीह-विरोधी को पहचान लेते हो, और वह तुम्हारे आंतरिक विचारों को बाहर निकलवाकर यह देखने की कोशिश करता है कि क्या तुमने उसे पहचान लिया है, तो तुम क्या करोगे? तुम्हें दुष्ट शैतान की चालबाजी को समझना चाहिए; तुम्हें उसके जाल में नहीं फँसना चाहिए या उस गड्ढे में नहीं पड़ना चाहिए, जो उसने तुम्हारे लिए खोदा है। दुष्ट शैतान से सामना होने पर तुम्हें बुद्धिमान होना चाहिए। तुम्हें उनसे सच-सच नहीं बोलना चाहिए। जिनसे तुम सच बोल सकते हो, वे परमेश्वर और तुम्हारे सच्चे भाई-बहन हैं, इसलिए तुम कभी शैतान, दानवों या मसीह-विरोधियों को सच नहीं बता सकते। केवल परमेश्वर ही यह जानने के योग्य है कि तुम अपने दिल में क्या सोचते हो; केवल परमेश्वर ही तुम्हारे दिल की संप्रभुता और जाँच के योग्य है। कोई भी तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करने या तुम्हारे दिल की जाँच करने के योग्य नहीं है, दुष्ट शैतान तो बिलकुल भी नहीं। इसलिए, अगर दुष्ट शैतान तुम्हारे सच्चे शब्द निकलवाने का प्रयास करे, तो उत्तर देने से इनकार करने के लिए तुम्हें "नहीं" कहने का, उसे यह न बताने का कि तुम क्या सोच रहे हो, अधिकार है। यह तुम्हारा अधिकार है। अगर तुम कहते हो, "तुम शैतान—मुझसे बातें जानने की कोशिश तो करो, मैं तुम्हें सच नहीं बताऊँगा; मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा। मैं तुम्हारी रिपोर्ट करूँगा, इसमें कौन-सी बड़ी बात है? अगर तुम मुझे परेशान करने का साहस करोगे, तो मैं तुम्हारी रिपोर्ट करूँगा। अगर तुम मुझे परेशान करोगे, तो परमेश्वर तुम्हें शाप देगा और दंडित करेगा," क्या यह चलेगा? (नहीं।) बाइबल कहती है, "साँपों के समान बुद्धिमान और कबूतरों के समान भोले बनो" (मत्ती 10:16)। ऐसे समय में, तुम्हें साँपों के समान चतुर होना चाहिए, बुद्धिमान होना चाहिए। हमें केवल परमेश्वर को ही अपने हृदय की जाँच करने देनी चाहिए, और हमें केवल उसे ही उस पर कब्जा करने देना चाहिए। हमें अपना हृदय केवल परमेश्वर को ही देना चाहिए; केवल वह ही हमारे दिलों को पाने के योग्य है—दुष्ट शैतान नहीं! इसलिए, मसीह-विरोधी यह जानने के अयोग्य हैं कि हम कैसे या क्या सोचते हैं, वे तुम्हारी थाह लेने के लिए तुम्हारे भीतर की बातें निकलवाने की कोशिश करते हैं। उनका उद्देश्य तुम्हें नियंत्रित करना है। तुम्हें इसे स्पष्ट रूप से देखना चाहिए। इसलिए किसी मसीह-विरोधी से सच-सच मत बोलो। तुम्हें उन्हें उजागर करने, उन्हें त्यागने और उन्हें उनके पद से गिराने के लिए अपने और अधिक भाई-बहनों के साथ आने का रास्ता खोजना होगा। उन्हें कभी हावी न होने दो। उन्हें कलीसिया से अलग कर दो और परमेश्वर के घर में गड़बड़ी करने या शक्ति हासिल और इस्तेमाल करने का और मौका मत दो।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे परमेश्वर के घर को अपना निजी क्षेत्र मानते हैं' से उद्धृत

जिस समय यीशु ने यहूदिया में कार्य किया था, तब उसने खुलकर ऐसा किया, परंतु अब, मैं तुम लोगों के बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अविश्वासी लोग इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। तुम लोगों के बीच मेरा कार्य बाहर के लोगों के लिए बंद है। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल तुम लोग ही जानते हो, और कोई नहीं। यह समस्त कार्य तुम लोगों के बीच ही किया जाता है और केवल तुम लोगों के लिए ही प्रकट किया जाता है; अविश्वासियों में से कोई भी इसे नहीं जानता, क्योंकि अभी समय नहीं आया है। यहाँ ये लोग ताड़ना सहने के बाद पूर्ण बनाए जाने के समीप हैं, परंतु बाहर के लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते। यह कार्य बहुत अधिक छिपा हुआ है! उनके लिए परमेश्वर का देह बन जाना छिपा हुआ है, परंतु जो इस धारा में हैं, उनके लिए कहा जा सकता है कि वह खुला है। यद्यपि परमेश्वर में सब-कुछ खुला है, सब-कुछ प्रकट है और सब-कुछ मुक्त है, लेकिन यह केवल उनके लिए सही है, जो उसमें विश्वास करते हैं; जहाँ तक शेष लोगों का, अविश्वासियों का संबंध है, उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं करवाया जाता। वर्तमान में तुम्हारे बीच और चीन में जो कार्य किया जा रहा है, वह एकदम छिपाया हुआ है, ताकि उन्हें इसके बारे में पता न चले। यदि उन्हें इस कार्य का पता चल गया, तो वे सिवाय उसकी निंदा और उत्पीड़न के, कुछ नहीं करेंगे। वे उसमें विश्वास नहीं करेंगे। बड़े लाल अजगर के देश में, इस सबसे अधिक पिछड़े इलाके में, कार्य करना कोई आसान बात नहीं है। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो इसे जारी रखना असंभव होता। कार्य का यह चरण इस स्थान में किया ही नहीं जा सकता। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे आगे बढ़ने दे सकते थे? क्या यह कार्य को और अधिक जोखिम में नहीं डाल देता? यदि इस कार्य को छिपाया नहीं जाता, बल्कि यीशु के समय के समान ही किया जाता, जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दुष्टात्माओं द्वारा "पकड़" नहीं लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बरदाश्त कर पाते? यदि मुझे अब मनुष्य को उपदेश और व्याख्यान देने के लिए उपासना-गृहों में प्रवेश करना होता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? और यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य कैसे जारी रह पाता? चिह्न और चमत्कार खुले तौर पर बिलकुल भी अभिव्यक्त न करने का कारण अपने को छिपाना ही है। इसलिए, मेरा कार्य अविश्वासियों द्वारा देखा, खोजा या जाना नहीं जा सकता। यदि कार्य के इस चरण को अनुग्रह के युग में यीशु के तरीके से ही किया जाता, तो यह उतना सुस्थिर नहीं हो सकता था, जितना अब है। इसलिए, इस तरह गुप्त रूप से कार्य करना तुम लोगों के और समग्र कार्य के लाभ के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

धोखेबाज़ लोगों द्वारा धोखे का व्यवहार करना अपनी प्रकृति को प्रकट करना है। परमेश्वर बुद्धिमत्ता का सदुपयोग करने वाले ईमानदार लोग चाहता है और यह एक कार्यगत आवश्यकता भी है; इसके अतिरिक्त, बुद्धिमत्तापूर्ण होना कर्तव्यों के निर्वहन के लिए भी आवश्यक है। अगर एक ईमानदार व्यक्ति मूर्खतापूर्ण रूप से अज्ञानी है, तो वह परमेश्वर द्वारा उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि बिना बुद्धिमत्ता के वह अपने कार्य में अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता। बुद्धिमत्ता क्या है? यह परमेश्वर की इच्छा पर चलने के लिए हर संभव तरीके और साधन को प्रयोग करने में सक्षम होना और सत्य को अभ्यास में लाना है। किसी भी मामले में, जिसमें परमेश्वर की इच्छा पर चलना और उस कार्य को पूरा करना शामिल हो जो कि परमेश्वर ने हमें सौंपा है, चाहे हम कोई भी तरीके क्यों न अपनाएँ, जब तक हम अच्छे परिणाम प्राप्त करते हैं, यह दिखाता है कि हमारे पास बुद्धिमत्ता है। जो लोग चीजों को करने में विभिन्न तरीकों और शैलियों का प्रयोग करते हैं, उनमें बुद्धिमत्ता होती है। चूँकि बुद्धिमत्ता एक सकारात्मक चीज़ है और इसे उचित लक्ष्यों को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है, परमेश्वर इसके प्रयोग की सराहना करता है। हालाँकि, धोखा एक नकारात्मक चीज़ है और एक ऐसी युक्ति है जिसे शैतान के लोग अपने प्रतिक्रियावादी लक्ष्यों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रयोग करते हैं। हालाँकि कई बार बाहर से, बुद्धिमत्ता और धोखा, दोनों ही समान तरीकों को प्रयोग करते प्रतीत हो सकते हैं, पर चूँकि दोनों के महत्व और दोनों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्यों में भिन्नता है, इस प्रकार उनकी प्रकृति अलग है। धोखेबाज़ लोग व्यक्तिगत, घिनौने लक्ष्यों को पाने के लिए सभी प्रकार की विभिन्न युक्तियाँ अपनाते हैं—इसे बुद्धिमानी नहीं, बल्कि सिर्फ़ कपट या धूर्तता ही कहा जा सकता है। परमेश्वर के लोग शत्रु को पराजित करने, परमेश्वर के कार्य को कायम रखने और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में सक्षम होने के लिए बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हैं। यह पूरी तरह से सकारात्मक है और यही सच्ची बुद्धिमत्ता है। बुद्धिमत्ता को प्रयोग में लाना सही और उचित है। अगर कोई कहता है कि यह कपटपूर्ण है तो यह सकारात्मक को कलंकित करना और सही और गलत को पलटना है; यह मूर्ख और अज्ञानी लोगों का विचार भी है, जिनमें विवेक की कमी है। किसी मुद्दे को देखते समय तुम्हें उसके सार पर अवश्य गौर करना चाहिए, उसके स्रोत का जायजा लेना चाहिए और तभी किसी उचित निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। तुम केवल बाहरी रूप से राय नहीं बना सकते और बकवास नहीं कर सकते।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

लोगों के साथ समझदारी से पेश आओ। कुछ लोग कहते हैं : "क्या भाई-बहनों के साथ निभाने के लिए बुद्धि की जरूरत होती है?" हाँ, होती है, क्योंकि बुद्धि का उपयोग करने से तुम्हारे भाई-बहनों को और भी बड़े लाभ मिलते हैं। कुछ लोग पूछेंगे : "क्या भाई-बहनों के साथ बुद्धिमान होना चालाक होना नहीं है?" बुद्धिमानी धोखा नहीं है। बल्कि, बुद्धिमानी और धोखा पूर्णत: विपरीत हैं। बुद्धि का उपयोग करने का अर्थ है छोटे आध्यात्मिक कद के भाई-बहनों से बात करने और काम करने के कुछ तरीकों पर ध्यान देना, ताकि उन्हें, तुम जो कहते और करते हो, उसे स्वीकार न कर पाने से बचाया जा सके। अगर छोटे आध्यात्मिक कद वाले लोगों के प्रति, विशेष रूप से उनके प्रति जो सत्य को नहीं समझते और कई भ्रष्ट स्वभाव रखते हैं, तुम्हारा दृष्टिकोण बहुत सरल और खुला है, और तुम उन्हें सब-कुछ बता देते हो, तो यह कभी-कभी उनके लिए ऐसी जानकारी हासिल करना आसान बना सकता है, जिसे तुम्हारे विरुद्ध इस्तेमाल किया जा सकता है या जिससे वे तुम्हारा इस्तेमाल कर सकते हैं। यह अच्छा नहीं है। इसलिए तुम्हें कमोबेश कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए और कुछ विधियाँ इस्तेमाल करनी चाहिए। लेकिन लोगों से सतर्क रहने का मतलब उनकी मदद न करना या उनके प्रति प्रेम न होना नहीं है। इसका मतलब बस उनसे कुछ ऐसी चीजों के बारे में, जो परमेश्वर के परिवार के महत्वपूर्ण कार्य को छूती हैं, बात न करना और उनके साथ केवल सत्य के बारे में सहभागिता करना है। अगर उन्हें जीवन में आध्यात्मिक सहायता की और सत्य प्रदान किए जाने की आवश्यकता है, तो हमें इस संबंध में उन्हें संतुष्ट करने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार सब-कुछ करना होगा। लेकिन अगर वे परमेश्वर के घर के बारे में इधर-उधर की बातें पूछते हैं, या नेताओं और कार्यकर्ताओं की स्थितियों के बारे में पूछते हैं, तो उन्हें बताने की जरूरत नहीं है। अगर तुम उन्हें बताओगे, तो उनके द्वारा इस जानकारी को प्रकट कर दिए जाने की संभावना है, जिससे परमेश्वर के घर के काम को नुकसान पहुँचेगा। दूसरे शब्दों में, अगर यह कोई ऐसी बात हो, जिसे उन्हें नहीं जानना चाहिए या कोई ऐसी बात, जिसे जानने की उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है, तो उन्हें इसके बारे में न बताएँ। अगर यह कोई ऐसी बात हो, जिसे उन्हें जानना चाहिए, तो व्यावहारिक रूप से और बिना किसी दुराव के उन्हें इसके बारे में बताने के लिए तुम वह सब करो, जो कर सकते हो। तो वे कौन-सी बातें हैं, जो उन्हें जाननी चाहिए? उन्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर में विश्वास करते हुए सत्य का अनुसरण कैसे करें; उन्हें कौन-से सत्य समझने और प्राप्त करने चाहिए; उन्हें किन कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और विभिन्न लोगों के लिए कौन-से कर्तव्य उपयुक्त हैं; अपने कर्तव्य कैसे पूरे करें; सामान्य मानवता को कैसे जिएँ; और कलीसियाई जीवन कैसे व्यतीत करें। ये सभी बातें लोगों को पता होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के घर के नियम और सिद्धांत, कलीसिया का कार्य और अपने भाई-बहनों की स्थितियाँ न तो किसी अविश्वासी पर प्रकट करनी चाहिए और न ही अपने परिवार के उन सदस्यों पर, जो विश्वास नहीं करते; यह भी ऐसी बात है, जो लोगों को जाननी चाहिए। ये वे सिद्धांत हैं, जिनका पालन हमें बुद्धि का उपयोग करते समय करना चाहिए। उदाहरण के लिए, अपने नेताओं के नाम और पते ऐसी चीजें हैं, जिन पर चर्चा नहीं की जानी चाहिए। अगर तुम इन चीजों के बारे में बात करते हो, तो पता नहीं, यह जानकारी कब अविश्वासियों के कानों में पड़ जाए, और अगर फिर यह बात किसी गुप्त सेवा के खलनायक के पास चली जाए, तो यह बहुत कष्टप्रद हो सकती है। तुम्हें इन चीजों के बारे में बुद्धिमान होना चाहिए। यही कारण है कि मैं कहता हूँ, बुद्धिमान होना बहुत जरूरी है। इसके अलावा, जब तुम अपने अनुभव प्रकट करते हो और उनके बारे में सहभागिता करते हो, तो तुम्हें कुछ निजी जानकारी किसी को नहीं बतानी चाहिए। तुम्हें अपने भाई-बहनों के आध्यात्मिक कद पर विचार करना है; तुम्हारे द्वारा उन्हें कुछ बताए जाने के बाद, अगर वे धर्मनिष्ठ नहीं हैं, तो वे तुम्हारे द्वारा कही गई बातों का मजाक उड़ा सकते हैं और इस बारे में गपशप कर सकते हैं, और यह कष्टप्रद होगा और तुम्हारी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाएगा। इस प्रकार, सरल और खुले तौर पर संवाद करने के लिए भी बुद्धि की आवश्यकता होती है।

— "जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

सुसमाचार को प्रचारित करने का उद्देश्य उन सभी लोगों को, जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं और जो उसके सम्मुख सच्चे मार्ग को स्वीकार करने के इच्छुक हैं, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के लिए, उसके कार्य को अनुभव करने के लिए, उद्धार प्राप्त करने के लिए और उसके राज्य में प्रवेश के लिए लेकर आना है। यह सुसमाचार को प्रचारित करने का उद्देश्य और प्रयोजन है। कोई संदेह नहीं कि इंजीलवाद के सिद्धांत और तरीके, सुसमाचार को प्रचारित करने के उद्देश्यों और उसके प्रयोजन के आधार पर निर्धारित होते हैं। अगर लोगों द्वारा अभ्यास किए जाने वाले सिद्धांत और तरीके इंजीलवाद के उद्देश्य और प्रभाव को प्राप्त नहीं कर पाते तो यह साबित करता है कि ऐसे सिद्धांत और तरीके गलत हैं और यहाँ कुछ भटकाव है। अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए, सुसमाचार को प्रचारित करते समय, लोगों को बुद्धिमत्ता और कुछ तकनीकों का प्रयोग करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि बुराई और अंधकार वाले इस वर्तमान संसार में, धार्मिक स्वतंत्रता वाले देशों में भी, सभी धार्मिक समुदाय मसीह-विरोधियों और दुष्टात्माओं द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हैं और वे परमेश्वर के कार्य की निंदा कर रहे हैं और उसका विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा सभी तरह की शैतानी शासन व्यवस्थाएँ परमेश्वर को रोकने और उसके कार्य को नष्ट करने की भरसक कोशिशें कर रही हैं और उसके कार्य के खिलाफ़ कड़ी कार्यवाही की कोशिश कर रही है। इसलिए, परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करने और पूरे संसार में उसके राज्य का सुसमाचार फैलाने के लिए चुस्त तकनीकें अपनाने की ज़रूरत है; केवल इसी तरीके से लोगों के उद्धार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। यह इंजीलवाद को अभ्यास में लाने का सिद्धांत है। शैतानी ताकतों द्वारा उत्पीड़न, दमन और पीछा किए जाने के कारण, सुसमाचारों को प्रचारित करना आसान नहीं है, यह देखते हुए कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को खुद की रक्षा करते हुए लोगों को प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल करना है। अगर बुद्धिमत्तापूर्ण तरीकों का प्रयोग नहीं किया जाता है तो किसी के भी असफल होने की आशंका है; तब यह बहुत संभव है कि वे न केवल किसी का भी सहयोग पाने में असमर्थ रहेंगे, बल्कि इसके बजाय उन्हें परमेश्वर का विरोध कर रही बुरी ताकतों द्वारा बेचा जा सकता है या बड़े लाल अजगर द्वारा पकड़ा जा सकता है। सीखे जा सकने वाले ऐसे बहुत-से सबक हैं। इसलिए सुसमाचार को प्रचारित करते समय, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बुद्धिमत्ता पर आधारित तकनीकों को प्रयोग में लाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कुछ लोगों के पास सुसमाचार को प्रचारित करने में सिद्धांत या बुद्धिमत्ता नहीं होती, बल्कि वे ज़्यादा प्रत्यक्ष तरीकों का प्रयोग करते हैं, एकदम नियमानुसार चलते हैं—तय है कि ऐसा अभ्यास परिणाम प्राप्त करने में असफल ही रहेगा। माहौल चाहे जैसा हो, लोग आगे बढ़कर सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं जब तक वे यह सुनिश्चित कर सकें कि वे दूसरों का सहयोग प्राप्त कर लेंगे और स्वयं शैतान द्वारा नहीं पकड़े जाएँगे।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

बड़े लाल अजगर द्वारा पूछताछ किए जाने के दौरान, कोई भी गोपनीय बात बताने के बजाय मृत्यु का वरण बेहतर होगा। यह बुद्धिमत्ता की पराकाष्ठा है। सत्य का अभ्यास करना और ईमानदार रहना, ये परमेश्वर और अपने भाइयों और बहनों के सम्मुख की जाने वाली चीज़ें हैं; लोग शैतान और दुष्टात्माओं को सत्य बताने के लिए कतई बाध्य नहीं हैं। शैतान के साथ व्यवहार का इकलौता तरीका उससे नफ़रत करना, उसे शापित करना और उसे मना करना है। यह ईसाइयों का अटल रुख है। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु ने कहा था, "इसलिये साँपों के समान बुद्धिमान और कबूतरों के समान भोले बनो" (मत्ती 10:16)। ये वचन लोगों को शैतान के साथ निपटते हुए बुद्धिमान होने और उसे सत्य नहीं बताने के लिए कहते हैं। सबसे मूर्खतापूर्ण कार्य शैतान को सत्य बताना और उसे जानकारी देना है; जिसका अर्थ है, खुद को उसके फंदे में डालना और अपने विनाश को न्योता देना। साफ़ और सीधी बात यह है कि यह अज्ञानतावश अपना समूल नाश है। तो बात जब शैतान की हो तो तुम्हें चुस्त होना चाहिए; अगर तुम ऐसे नहीं हो तो आशंका है कि तुम प्रलोभनों में डूब जाओगे। बड़े लाल अजगर द्वारा पूछताछ किए जाने पर यह स्वीकार न करना कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, महज़ मानवीय कमजोरी है; परमेश्वर तुम्हारी निंदा नहीं करेगा। वह तुम्हारी ऐसे व्यक्ति के रूप में निंदा नहीं करेगा जो उससे झूठ बोलता है और उसे नकारता है, कलीसिया तो तुम्हारी निंदा और भी नहीं कर सकता; वह फिर भी तुम्हारा स्वागत करेगा और तुमसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करेगा। लेकिन, यदि तुम बड़े लाल अजगर को कलीसिया से जुड़ी बातें बताओगे—विशेष रूप से अगर तुम अपने भाइयों और बहनों, कलीसिया के अगुआओं और कार्यकर्ताओं या उन स्थानों को बेच डालोगे जहाँ भेंटों को रखा जाता है, तो तुम एक यहूदा हो जिसने परमेश्वर से मुँह फेर लिया है। परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा और कलीसिया तुम्हें हमेशा के लिए निष्कासित कर देगा। तुम्हें परिणामों को लेकर स्पष्ट होना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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