123. परमेश्वर में अपनी आस्था में विवेक-बुद्धि से कार्य करने के सिद्धांत

(1) विवेक-बुद्धि और छल के बीच के सार-भूत अंतर को जानना आवश्यक है। विवेकी होने का लक्ष्य अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना और परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना होता है। यह एक सकारात्मक बात होती है;

(2) उन लोगों के खिलाफ़ जो दुष्ट शैतान के होते हैं, विवेकपूर्ण तरीकों को नियोजित किया जाना चाहिए ताकि ऐसा न हो कि दुष्ट लोग लाभ उठा लें, अपनी अनुकूलता का गलत फ़ायदा उठाएँ, और परमेश्वर के घर के काम में विघ्न और बाधा डालें;

(3) ईमानदारी का अनुसरण करना मानवीय होने का सिद्धांत है, और यह परमेश्वर को प्रसन्न करता है, फिर भी शैतान के लोगों से निपटने के लिए व्यक्ति को विवेक-बुद्धि पर ज़ोर देना चाहिए, क्योंकि शैतान अत्यधिक दुष्ट होता है;

(4) सुसमाचार का प्रचार करते समय, व्यक्ति को उन लोगों की खोज करनी चाहिए जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, और कभी भी इसका प्रचार शैतान के लोगों के प्रति, जो सत्य से घृणा करते हैं, नहीं करना चाहिए। यह पूरी तरह से सत्य के सिद्धांत के अनुरूप है।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"देखो, मैं तुम्हें भेड़ों के समान भेड़ियों के बीच में भेजता हूँ, इसलिये साँपों के समान बुद्धिमान और कबूतरों के समान भोले बनो। परन्तु लोगों से सावधान रहो, क्योंकि वे तुम्हें महासभाओं में सौंपेंगे, और अपनी पंचायतों में तुम्हें कोड़े मारेंगे। तुम मेरे लिये हाकिमों और राजाओं के सामने उन पर, और अन्यजातियों पर गवाह होने के लिए पहुँचाए जाओगे। ... जब वे तुम्हें एक नगर में सताएँ, तो दूसरे को भाग जाना" (मत्ती 10:16-23)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

एक व्यक्ति को हर एक पहलू में बुद्धि का प्रयोग करना होगा और मेरे सिद्ध मार्गों पर चलने के लिये बुद्धि का प्रयोग करना होग। ऐसे लोग जो मेरे वचनों के दायरे में आचरण करते हैं वे सबसे बुद्धिमान हैं और ऐसे लोग जो मेरे वचनों के अनुसार आचरण करते हैं वे सबसे अधिक आज्ञाकारी हैं। जो कुछ मैं कहता हूँ वह होता है, और तुमको मेरे साथ बहस या तर्क करने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ मैं कहता हूँ वह तुमको ध्यान में रखकर कहता हूँ (इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं सख्त हूँ या कोमल)। यदि तुम आज्ञाकारी होने पर ध्यान केन्द्रित करते हो तो ठीक है, और यह सच्ची बुद्धि का मार्ग है (और परमेश्वर के न्याय को अपने ऊपर आ पड़ने से रोकने का मार्ग है)।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 49' से उद्धृत

तुम में मेरी हिम्मत होनी चाहिए, जब उन रिश्तेदारों का सामना करने की बात आए जो विश्वास नहीं करते, तो तुम्हारे पास सिद्धांत होने चाहिए। लेकिन तुम्हें मेरी खातिर किसी भी अन्धकार की शक्ति से हार नहीं माननी चाहिए। पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर भरोसा रखो; शैतान के किसी भी षडयंत्र को काबिज़ न होने दो। अपने हृदय को मेरे सम्मुख रखने हेतु पूरा प्रयास करो, मैं तुम्हें आराम दूँगा, तुम्हें शान्ति और आनंद प्रदान करूँगा। दूसरों के सामने एक विशेष तरह का होने का प्रयास मत करो; क्या मुझे संतुष्ट करना अधिक मूल्य और महत्व नहीं रखता? मुझे संतुष्ट करने से क्या तुम और भी अनंत और जीवनपर्यंत शान्ति या आनंद से नहीं भर जाओगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 10' से उद्धृत

जिस समय यीशु ने यहूदिया में कार्य किया था, तब उसने खुलकर ऐसा किया, परंतु अब, मैं तुम लोगों के बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अविश्वासी लोग इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। तुम लोगों के बीच मेरा कार्य बाहर के लोगों के लिए बंद है। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल तुम लोग ही जानते हो, और कोई नहीं। यह समस्त कार्य तुम लोगों के बीच ही किया जाता है और केवल तुम लोगों के लिए ही प्रकट किया जाता है; अविश्वासियों में से कोई भी इसे नहीं जानता, क्योंकि अभी समय नहीं आया है। यहाँ ये लोग ताड़ना सहने के बाद पूर्ण बनाए जाने के समीप हैं, परंतु बाहर के लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते। यह कार्य बहुत अधिक छिपा हुआ है! उनके लिए परमेश्वर का देह बन जाना छिपा हुआ है, परंतु जो इस धारा में हैं, उनके लिए कहा जा सकता है कि वह खुला है। यद्यपि परमेश्वर में सब-कुछ खुला है, सब-कुछ प्रकट है और सब-कुछ मुक्त है, लेकिन यह केवल उनके लिए सही है, जो उसमें विश्वास करते हैं; जहाँ तक शेष लोगों का, अविश्वासियों का संबंध है, उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं करवाया जाता। वर्तमान में तुम्हारे बीच और चीन में जो कार्य किया जा रहा है, वह एकदम छिपाया हुआ है, ताकि उन्हें इसके बारे में पता न चले। यदि उन्हें इस कार्य का पता चल गया, तो वे सिवाय उसकी निंदा और उत्पीड़न के, कुछ नहीं करेंगे। वे उसमें विश्वास नहीं करेंगे। बड़े लाल अजगर के देश में, इस सबसे अधिक पिछड़े इलाके में, कार्य करना कोई आसान बात नहीं है। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो इसे जारी रखना असंभव होता। कार्य का यह चरण इस स्थान में किया ही नहीं जा सकता। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे आगे बढ़ने दे सकते थे? क्या यह कार्य को और अधिक जोखिम में नहीं डाल देता? यदि इस कार्य को छिपाया नहीं जाता, बल्कि यीशु के समय के समान ही किया जाता, जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दुष्टात्माओं द्वारा "बंदी" नहीं बना लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बरदाश्त कर पाते? यदि मुझे अब मनुष्य को उपदेश और व्याख्यान देने के लिए उपासना-गृहों में प्रवेश करना होता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? और यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य कैसे जारी रह पाता? चिह्न और चमत्कार खुले तौर पर बिलकुल भी अभिव्यक्त न करने का कारण अपने को छिपाना ही है। इसलिए, मेरा कार्य अविश्वासियों द्वारा देखा, खोजा या जाना नहीं जा सकता। यदि कार्य के इस चरण को अनुग्रह के युग में यीशु के तरीके से ही किया जाता, तो यह उतना सुस्थिर नहीं हो सकता था, जितना अब है। इसलिए, इस तरह गुप्त रूप से कार्य करना तुम लोगों के और समग्र कार्य के लाभ के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

धोखेबाज़ लोगों द्वारा धोखे का व्यवहार करना अपनी प्रकृति को प्रकट करना है। परमेश्वर बुद्धिमत्ता का सदुपयोग करने वाले ईमानदार लोग चाहता है और यह एक कार्यगत आवश्यकता भी है; इसके अतिरिक्त, बुद्धिमत्तापूर्ण होना कर्तव्यों के निर्वहन के लिए भी आवश्यक है। अगर एक ईमानदार व्यक्ति मूर्खतापूर्ण रूप से अज्ञानी है, तो वह परमेश्वर द्वारा उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि बिना बुद्धिमत्ता के वह अपने कार्य में अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता। बुद्धिमत्ता क्या है? यह परमेश्वर की इच्छा पर चलने के लिए हर संभव तरीके और साधन को प्रयोग करने में सक्षम होना और सत्य को अभ्यास में लाना है। किसी भी मामले में, जिसमें परमेश्वर की इच्छा पर चलना और उस कार्य को पूरा करना शामिल हो जो कि परमेश्वर ने हमें सौंपा है, चाहे हम कोई भी तरीके क्यों न अपनाएँ, जब तक हम अच्छे परिणाम प्राप्त करते हैं, यह दिखाता है कि हमारे पास बुद्धिमत्ता है। जो लोग चीजों को करने में विभिन्न तरीकों और शैलियों का प्रयोग करते हैं, उनमें बुद्धिमत्ता होती है। चूँकि बुद्धिमत्ता एक सकारात्मक चीज़ है और इसे उचित लक्ष्यों को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है, परमेश्वर इसके प्रयोग की सराहना करता है। हालाँकि, धोखा एक नकारात्मक चीज़ है और एक ऐसी युक्ति है जिसे शैतान के लोग अपने प्रतिक्रियावादी लक्ष्यों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रयोग करते हैं। हालाँकि कई बार बाहर से, बुद्धिमत्ता और धोखा, दोनों ही समान तरीकों को प्रयोग करते प्रतीत हो सकते हैं, पर चूँकि दोनों के महत्व और दोनों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्यों में भिन्नता है, इस प्रकार उनकी प्रकृति अलग है। धोखेबाज़ लोग व्यक्तिगत, घिनौने लक्ष्यों को पाने के लिए सभी प्रकार की विभिन्न युक्तियाँ अपनाते हैं—इसे बुद्धिमानी नहीं, बल्कि सिर्फ़ कपट या धूर्तता ही कहा जा सकता है। परमेश्वर के लोग शत्रु को पराजित करने, परमेश्वर के कार्य को कायम रखने और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में सक्षम होने के लिए बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हैं। यह पूरी तरह से सकारात्मक है और यही सच्ची बुद्धिमत्ता है। बुद्धिमत्ता को प्रयोग में लाना सही और उचित है। अगर कोई कहता है कि यह कपटपूर्ण है तो यह सकारात्मक को कलंकित करना और सही और गलत को पलटना है; यह मूर्ख और अज्ञानी लोगों का विचार भी है, जिनमें विवेक की कमी है। किसी मुद्दे को देखते समय तुम्हें उसके सार पर अवश्य गौर करना चाहिए, उसके स्रोत का जायजा लेना चाहिए और तभी किसी उचित निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। तुम केवल बाहरी रूप से राय नहीं बना सकते और बकवास नहीं कर सकते।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

चौथा अभिलक्षण है व्यवहार में बुद्धिमत्ता का होना। कुछ लोग कहते हैं: "क्या भाइयों और बहनों के साथ मेल-जोल के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है?" हाँ, होती है, क्योंकि बुद्धि का उपयोग करना तुम्हारे भाइयों और बहनों के लिए और भी अधिक लाभदायक होता है। कुछ लोग पूछेंगेः "क्या भाइयों और बहनों के साथ बुद्धि का उपयोग करना चालाक होना नहीं है?" बुद्धिमानी चालाकी नहीं है, बल्कि, यह चालाकी के ठीक विपरीत है। बुद्धि का उपयोग करने का अर्थ है तब भाइयों और बहनों से बातचीत करने के अपने तरीके पर ध्यान देना जब उनकी कद-काठी छोटी हो, ऐसा न हो कि तुम जो कहते हो वे उसे स्वीकार करने में असमर्थ हों। साथ ही, छोटी कद-काठी वालोंके लिए, खासकर जिनके पास सत्य नहीं करते हैऔर जो कुछ भ्रष्टता को प्रकट करते हैं और जिनके कुछ भ्रष्ट स्वभाव हैं, यदि तुम बहुत ही साधारण और निष्कपट हो और उन्हें सब कुछ बता देते हो, तो तुम्हारे विरुद्ध बातें खोजना या तुम्हारा फायदा उठाना उनके लिए आसान हो सकता है। इसलिए बोलते समय तुम्हें कमोबेश सावधानियाँ अवश्य रखनी चाहिए और तुम्हारे पास कुछ तकनीकें अवश्य होनी चाहिए। हालाँकि, लोगों के प्रति सचेत रहने का अर्थ उनकी सहायता नहीं करना या उनके प्रति प्रेम नहीं होना नहीं है, इसका सिर्फ इतना ही अर्थ है कि उन्हें तुरंत परमेश्वर के घर के बारे में कुछ आवश्यक बातों को नहीं बताना है, और उनके साथ बस सत्य संवादित करना है। यदि उन्हें जीवन में आध्यात्मिक सहायता की ज़रूरत है, अगर उन्हें सत्य के पोषण की आवश्यकता होती है, तो हमें इस संबंध में उन्हें संतुष्ट करने के लिए अपनी क्षमता के अंतर्गत सब कुछ करना है। किन्तु यदि वे परमेश्वर के घर के बारे में इधर-उधर की पूछताछ कर रहे हैं, या अगुवों और कार्यकर्ताओं के बारे में इधर-उधर की पूछताछ कर रहे हैं, तो उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम उन्हें बताते हो, तो वे इस जानकारी को गलत हाथों में दे सकते हैं और इससे परमेश्वर के घर का कार्य प्रभावित होगा। दूसरे शब्दों में, यदि यह कुछ ऐसा है जो उन्हें नहीं जानना चाहिए या कुछ ऐसा है जिसके बारे में उन्हें जानने की आवश्यकता नहीं है, तो उन्हें इसके बारे में कुछ भी मत जानने दो। यदि यह कुछ ऐसा है जो उन्हें जानना चाहिए, तो इसके बारे में उन्हें, वस्तुतः और बिना रोक के, बताने के लिए तुम वह सब करो जो तुम कर सकते हो। तो वे कौन सी बातें हैं जो उन्हें जाननी चाहिए? लोगों को सत्य के अनुसरण को जानना चाहिए: किन सत्यों से उन्हें सुसज्जित होना चाहिए, सत्य के किन पहलुओं को उन्हें समझना चाहिए, कौन से कर्तव्य उन्हें पूरे करने चाहिए, कौन से कर्तव्य पूरा करना उनके लिए उचित होगा, उन्हें उन कर्तव्यों को किस प्रकार से पूरा करना चाहिए, उचितमानवता को कैसे जीना है, कलीसिया का जीवन किस प्रकार से जीना है—इन सभी बातों को लोगों को जानना चाहिए। दूसरी ओर, परमेश्वर के घर के नियम और सिद्धांत, कलीसिया के कार्य, और तुम्हारे भाइयों और बहनों की स्थितियों को बाहरी लोगों या तुम्हारे परिवार के गैर-विश्वासियों के लिए प्रकट नहीं किया जा सकता है। यही वह सिद्धांत है जिसे हमें तब अवश्य पालन करना चाहिए जब हम बुद्धि का उपयोग करते हैं। उदारहण के लिए, तुम्हें अपने अगुवों के नाम और पते के बारे में कभी बात नहीं करनी चाहिए। यदि तुम इन चीजों के बारे में बात करते हो, तो तुम्हें नहीं पता कि कब ये जानकारियाँ अविश्वासियों के कानों में पड़ जाएंगी, और चीजें तब एक बड़ी समस्या बन जाती हैं यदि ये बातें तब कुछ दुष्ट जासूसों या गुप्त एजेंटों तक पहुँच जाती हैं। इन सबके के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है, यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि बुद्धि का होना अत्यंत आवश्यक है। इसके अलावा, जब तुम साधारण और निष्कपट होते हो, तो कुछ व्यक्तिगत बातें ऐसी हैं जिन्हें तुम किसी को भी यूँ ही नहीं बता सकते। यह देखने के लिए तुम्हें अपने भाई और बहनों की कद-काठी का आँकलन करना होगा कि क्या, तुम्हारे उन्हें बताने के बाद तुम जो कहते हो वे उसके बारे में बुरा कह सकते हैं और मज़ाक बना सकते हैं, तुम्हारी बातों के फैल जाने के बाद तुम्हारे लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं जो तुम्हारी ईमानदारी को नुकसान पहुंचा सकती है। इसी लिए साधारण और निष्कपट होने के लिए भी बुद्धि की आवश्यकता है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

सुसमाचार को प्रचारित करने का उद्देश्य उन सभी लोगों को, जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं और जो उसके सम्मुख सच्चे मार्ग को स्वीकार करने के इच्छुक हैं, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के लिए, उसके कार्य को अनुभव करने के लिए, उद्धार प्राप्त करने के लिए और उसके राज्य में प्रवेश के लिए लेकर आना है। यह सुसमाचार को प्रचारित करने का उद्देश्य और प्रयोजन है। कोई संदेह नहीं कि इंजीलवाद के सिद्धांत और तरीके, सुसमाचार को प्रचारित करने के उद्देश्यों और उसके प्रयोजन के आधार पर निर्धारित होते हैं। अगर लोगों द्वारा अभ्यास किए जाने वाले सिद्धांत और तरीके इंजीलवाद के उद्देश्य और प्रभाव को प्राप्त नहीं कर पाते तो यह साबित करता है कि ऐसे सिद्धांत और तरीके गलत हैं और यहाँ कुछ भटकाव है। अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए, सुसमाचार को प्रचारित करते समय, लोगों को बुद्धिमत्ता और कुछ तकनीकों का प्रयोग करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि बुराई और अंधकार वाले इस वर्तमान संसार में, धार्मिक स्वतंत्रता वाले देशों में भी, सभी धार्मिक समुदाय मसीह-विरोधियों और दुष्टात्माओं द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हैं और वे परमेश्वर के कार्य की निंदा कर रहे हैं और उसका विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा सभी तरह की शैतानी शासन व्यवस्थाएँ परमेश्वर को रोकने और उसके कार्य को नष्ट करने की भरसक कोशिशें कर रही हैं और उसके कार्य के खिलाफ़ कड़ी कार्यवाही की कोशिश कर रही है। इसलिए, परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करने और पूरे संसार में उसके राज्य का सुसमाचार फैलाने के लिए चुस्त तकनीकें अपनाने की ज़रूरत है; केवल इसी तरीके से लोगों के उद्धार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। यह इंजीलवाद को अभ्यास में लाने का सिद्धांत है। शैतानी ताकतों द्वारा उत्पीड़न, दमन और पीछा किए जाने के कारण, सुसमाचारों को प्रचारित करना आसान नहीं है, यह देखते हुए कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को खुद की रक्षा करते हुए लोगों को प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल करना है। अगर बुद्धिमत्तापूर्ण तरीकों का प्रयोग नहीं किया जाता है तो किसी के भी असफल होने की आशंका है; तब यह बहुत संभव है कि वे न केवल किसी का भी सहयोग पाने में असमर्थ रहेंगे, बल्कि इसके बजाय उन्हें परमेश्वर का विरोध कर रही बुरी ताकतों द्वारा बेचा जा सकता है या बड़े लाल अजगर द्वारा पकड़ा जा सकता है। सीखे जा सकने वाले ऐसे बहुत-से सबक हैं। इसलिए सुसमाचार को प्रचारित करते समय, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बुद्धिमत्ता पर आधारित तकनीकों को प्रयोग में लाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कुछ लोगों के पास सुसमाचार को प्रचारित करने में सिद्धांत या बुद्धिमत्ता नहीं होती, बल्कि वे ज़्यादा प्रत्यक्ष तरीकों का प्रयोग करते हैं, एकदम नियमानुसार चलते हैं—तय है कि ऐसा अभ्यास परिणाम प्राप्त करने में असफल ही रहेगा। माहौल चाहे जैसा हो, लोग आगे बढ़कर सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं जब तक वे यह सुनिश्चित कर सकें कि वे दूसरों का सहयोग प्राप्त कर लेंगे और स्वयं शैतान द्वारा नहीं पकड़े जाएँगे।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

बड़े लाल अजगर द्वारा पूछताछ किए जाने के दौरान, कोई भी गोपनीय बात बताने के बजाय मृत्यु का वरण बेहतर होगा। यह बुद्धिमत्ता की पराकाष्ठा है। सत्य का अभ्यास करना और ईमानदार रहना, ये परमेश्वर और अपने भाइयों और बहनों के सम्मुख की जाने वाली चीज़ें हैं; लोग शैतान और दुष्टात्माओं को सत्य बताने के लिए कतई बाध्य नहीं हैं। शैतान के साथ व्यवहार का इकलौता तरीका उससे नफ़रत करना, उसे शापित करना और उसे मना करना है। यह ईसाइयों का अटल रुख है। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु ने कहा था, "इसलिये साँपों के समान बुद्धिमान और कबूतरों के समान भोले बनो" (मत्ती 10:16). ये वचन लोगों को शैतान के साथ निपटते हुए बुद्धिमान होने और उसे सत्य नहीं बताने के लिए कहते हैं। सबसे मूर्खतापूर्ण कार्य शैतान को सत्य बताना और उसे जानकारी देना है; जिसका अर्थ है, खुद को उसके फंदे में डालना और अपने विनाश को न्योता देना। साफ़ और सीधी बात यह है कि यह अज्ञानतावश अपना समूल नाश है। तो बात जब शैतान की हो तो तुम्हें चुस्त होना चाहिए; अगर तुम ऐसे नहीं हो तो आशंका है कि तुम प्रलोभनों में डूब जाओगे। बड़े लाल अजगर द्वारा पूछताछ किए जाने पर यह स्वीकार न करना कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, महज़ मानवीय कमजोरी है; परमेश्वर तुम्हारी निंदा नहीं करेगा। वह तुम्हारी ऐसे व्यक्ति के रूप में निंदा नहीं करेगा जो उससे झूठ बोलता है और उसे नकारता है, कलीसिया तो तुम्हारी निंदा और भी नहीं कर सकता; वह फिर भी तुम्हारा स्वागत करेगा और तुमसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करेगा। लेकिन, यदि तुम बड़े लाल अजगर को कलीसिया से जुड़ी बातें बताओगे—विशेष रूप से अगर तुम अपने भाइयों और बहनों, कलीसिया के अगुआओं और कार्यकर्ताओं या उन स्थानों को बेच डालोगे जहाँ भेंटों को रखा जाता है, तो तुम एक यहूदा हो जिसने परमेश्वर से मुँह फेर लिया है। परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा और कलीसिया तुम्हें हमेशा के लिए निष्कासित कर देगा। तुम्हें परिणामों को लेकर स्पष्ट होना चाहिए।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

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