29. काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार करने के सिद्धांत

(1) काटे-छाँटे और निपटाए जाने को स्वीकार करना परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के प्रति समर्पित होना है, जिसका अर्थ है सत्य के प्रति समर्पित होना। यदि कोई काट-छाँट और निपटारे को स्वीकार कर सकता है, तो वह सच्चा पश्चाताप करने में सक्षम होता है;

(2) काटे-छाँटे और निपटाए जाने पर व्यक्ति को परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, उसे इसको स्वीकार कर इसके प्रति समर्पण करना चाहिए, चाहे यह तथ्यों के साथ कम या ज्यादा मेल खाता हो। यह स्वयं को जानने का सबसे अच्छा अवसर होता है;

(3) समस्त काट-छाँट और निपटारा तथ्यों के आगमन के माध्यम से न्याय और ताड़ना है; यह परमेश्वर का विशेष प्रेम है। व्यक्ति को इसे स्वीकार करना और इसके प्रति समर्पण करना होगा, और वह निश्चित रूप से इससे लाभान्वित होगा;

(4) काटे-छाँटे और निपटाए जाना जीवन-प्रवेश में सबसे बड़ा सबक होता है। व्यक्ति को आत्म-चिंतन में संलग्न होना चाहिए, अपने अहम् को त्यागना चाहिए, सत्य का अभ्यास करना चाहिए और परमेश्वर के प्रति समर्पित रहना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है। अगर तुम इन सत्यों को महत्वपूर्ण नहीं समझते, अगर तुम सिवाय इसके कुछ नहीं समझते कि इनसे कैसे बचा जाए, या किस तरह कोई ऐसा नया तरीका ढूँढ़ा जाए जिनमें ये शामिल न हों, तो मैं कहूँगा कि तुम घोर पापी हो। अगर तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है, फिर भी तुम सत्य को या परमेश्वर की इच्छा को नहीं खोजते, न ही उस मार्ग से प्यार करते हो, जो परमेश्वर के निकट लाता है, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है, और यह कि तुम एक कठपुतली और ग़द्दार हो, जो महान श्वेत सिंहासन से भागता है। परमेश्वर ऐसे किसी भी विद्रोही को नहीं छोड़ेगा, जो उसकी आँखों के नीचे से बचकर भागता है। ऐसे मनुष्य और भी अधिक कठोर दंड पाएँगे। जो लोग न्याय किए जाने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आते हैं, और इसके अलावा शुद्ध किए जा चुके हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे। बेशक, यह कुछ ऐसा है, जो भविष्य से संबंधित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो तो तुम्हें अवश्य परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए, सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने सभी कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हें उन बातों को अवश्य समझना चाहिए जिनका तुम्हें अनुभव करना चाहिए। यदि तुम केवल व्यवहार किए जाने, अनुशासित किए जाने और न्याय का ही अनुभव करते हो, यदि तुम केवल परमेश्वर का आनन्द लेने में ही समर्थ हो, परन्तु जब परमेश्वर तुम्हें अनुशासित कर रहा हो या तुम्हारे साथ निपट रहा हो तब तुम उसका अनुभव करने में असमर्थ हो, तो यह स्वीकार्य नहीं है। शायद शुद्धिकरण के इस उदाहरण में तुम अपनी स्थिति बनाए रखने में समर्थ हो, तब भी यह पर्याप्त नहीं है, तुम्हें अवश्य आगे बढ़ते रहना चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने का पाठ कभी रुकता नहीं है, और इसका कोई अंत नहीं है। लोग परमेश्वर पर विश्वास करने की बात को बहुत ही साधारण समझते हैं, परन्तु एक बार जब उन्हें कुछ व्यवहारिक अनुभव प्राप्त हो जाता है, तो उन्हें एहसास होता है कि परमेश्वर पर विश्वास करना, उतना आसान नहीं है जितना लोग कल्पना करते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो मनुष्य को कष्ट होता है। जितना अधिक मनुष्य का शुद्धिकरण होगा, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना अधिक विशाल होगा, और परमेश्वर की शक्ति उसमें उतनी ही अधिक प्रकट होगी। इसके विपरीत, मनुष्य का शुद्धिकरण जितना कम होता है, उतना ही कम परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम होता है, और परमेश्वर की उतनी ही कम शक्ति उस में प्रकट होगी। एक व्यक्ति का शुद्धिकरण एवं दर्द जितना ज़्यादा होता है तथा जितनी अधिक यातना वो सहता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होगा एवं परमेश्वर में उसका विश्वास उतना ही अधिक सच्चा होगा, और परमेश्वर के विषय में उसका ज्ञान भी उतना ही अधिक गहन होगा। तुम अपने अनुभवों में देखोगे कि जो शुद्धि पाते हुए अत्यधिक दर्द सहते हैं, जिनके साथ काफी निपटारा तथा अनुशासन का व्यवहार किया जाता है, और तुम देखोगे कि यही लोग हैं जिनके पास परमेश्वर के प्रति गहरा प्रेम होता है, और उनके पास परमेश्वर का अधिक गहन एवं तीक्ष्ण ज्ञान होता है। ऐसे लोग जिन्होंने निपटारा किए जाने का अनुभव नहीं किया है, जिनके पास केवल सतही ज्ञान होता है, और जो केवल यह कह सकते हैं: "परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह प्रदान करता है ताकि वे परमेश्वर में आनन्दित हो सकें।" यदि लोगों ने निपटारा किए जाने का अनुभव किया है और अनुशासित किए गए हैं, तो वे परमेश्वर के विषय में सच्चे ज्ञान के बारे में बोलने में समर्थ हैं। अतः मनुष्य में परमेश्वर का कार्य जितना ज़्यादा अद्भुत होता है, उतना ही ज़्यादा यह मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अभेद्य होता है और यह तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक तुम्हें जीतने और तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ होता है, और तुम्हें परिपूर्ण बना पाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

लोग अपना स्वभाव स्वयं परिवर्तित नहीं कर सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, पीड़ा और शोधन से गुजरना होगा, या उसके वचनों द्वारा निपटाया, अनुशासित किया जाना और काँटा-छाँटा जाना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता और आज्ञाकारिता प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल उसके वचनों के संपर्क में आने से, उनके न्याय, अनुशासन और निपटारे से, वे कभी लापरवाह नहीं होंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्यों का पालन करने में सक्षम होते हैं, भले ही यह मनुष्य की धारणाओं से परे हो, वे इन धारणाओं को नज़रअंदाज करके अपनी इच्छा से पालन कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के परिवेशों का उपयोग करता है, और मनुष्य को अनावृत करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है; एक ओर वह मनुष्य के साथ निपटता है, दूसरी ओर मनुष्य को अनावृत करता है, और तीसरी ओर वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित "रहस्यों" को खोदकर और उजागर करते हुए, और मनुष्य की अनेक अवस्थाएँ प्रकट करके वह उसे उसकी प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर मनुष्य को अनेक विधियों से पूर्ण बनाता है—प्रकाशन द्वारा, मनुष्य के साथ व्यवहार करके, मनुष्य के शुद्धिकरण द्वारा, और ताड़ना द्वारा—जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें एक निश्चित प्रकार की अनुभूति देता है, एक एहसास जिसके कारण तुम अपना आंतरिक आनंद खो देते हो और परमेश्वर की उपस्थिति को खो देते हो, कुछ इस तरह कि तुम अंधकार में डूब जाते हो। यह एक प्रकार का शुद्धिकरण है। जब कभी भी तुम कुछ करते हो तो गड़बड़ हो जाती है या तुम्हारे सामने कोई अवरोध आ जाता है। यह परमेश्वर का अनुशासन है। कभी, अगर तुम कुछ ऐसा करो जो अनाज्ञाकारी और परमेश्वर के प्रति विद्रोही हो, तो हो सकता है कि दूसरों को इसके बारे में पता न चले, लेकिन परमेश्वर जानता है। वह तुम्हें बचकर जाने नहीं देगा, और वह तुम्हें अनुशासित करेगा। पवित्र आत्मा का काम बहुत ही विस्तृत है। वह लोगों के हर वचन और कार्य को, उनकी हर क्रिया और हरकत को, और उनकी हर सोच और विचार को ध्यानपूर्वक देखता है, ताकि लोग इन चीज़ों के बारे में आंतरिक जागरूकता पा सकें। तुम एक बार कुछ करते हो और वह गड़बड़ हो जाता है, तुम फिर से कुछ करते हो और यह तब भी गड़बड़ हो जाता है, और धीरे-धीरे तुम पवित्र आत्मा के काम को समझ जाओगे। कई बार अनुशासित किए जाने के द्वारा, तुम्हें पता चल जाएगा कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने के लिए क्या किया जाए और उसकी इच्छा के अनुरूप क्या नहीं है। अंत में, तुम्हारे भीतर से पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का सटीक उत्तर प्राप्त हो जाएगा। कभी-कभी तुम विद्रोही हो जाओगे और तुम्हें भीतर से परमेश्वर द्वारा डाँटा जाएगा। यह सब परमेश्वर के अनुशासन से आता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन को सँजो कर नहीं रखते हो, यदि तुम उनके काम को महत्वहीन समझते हो, तो वह तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा। तुम परमेश्वर के वचनों को जितनी अधिक गंभीरता से लेते हो, उतना ही अधिक वह तुम्हें रोशन करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर हर एक व्यक्ति में कार्य करता है, और इससे फर्क नहीं पड़ता है कि उसकी विधि क्या है, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, चीज़ों या मामलों का प्रयोग करता है, या उसकी बातों का लहजा कैसा है, परमेश्वर का केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है : तुम्हें बचाना। तुम्हें बचाने से पहले, उसे तुम्हें रूपांतरित करना है, तो तुम थोड़ी-सी पीड़ा कैसे नहीं सह सकते? तुम्हें पीड़ा तो सहनी होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हैं। कभी-कभी परमेश्वर तुम्हारे आसपास के लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, ताकि तुम खुद को जान सको या फिर सीधे तुम्हारे साथ निपटा जा सके, तुम्हारी काट-छाँट करके तुम्हें उजागर किया जा सके। ऑपरेशन की मेज़ पर पड़े किसी व्यक्ति की तरह—अच्छे परिणाम के लिए तुम्हें कुछ दर्द तो सहना होगा। यदि जब भी तुम्हारी काट-छाँट होती है और तुमसे निपटा जाता है और जब भी वह लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, इससे तुम्हारी भावनाएँ जागती हैं और तुम्हारे अंदर जोश पैदा होता है, तो यह सही है, तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा और तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यदि, हर बार काटे-छांटे जाने, निपटारा किए जाने, और हर बार परमेश्वर द्वारा तुम्हारे परिवेश को ऊपर उठाये जाने पर तुम्हें थोड़ी-भी पीड़ा या असुविधा महसूस नहीं होती और कुछ भी महसूस नहीं होता, यदि तुम परमेश्वर के सामने उसकी इच्छा की तलाश नहीं करते, न प्रार्थना करते हो, न ही सत्य की खोज करते हो, तब तुम वास्तव में बहुत संवेदनहीन हो! यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक संवेदनहीन है, और कभी भी आध्यात्मिक रूप से सचेत नहीं रहता, तो परमेश्वर के पास उस पर कार्य करने का कोई रास्ता नहीं होगा। परमेश्वर कहेगा, "यह व्यक्ति ज़्यादा ही संवेदनहीन है, और बहुत गहराई से भ्रष्ट किया गया है। मैंने जो कुछ कार्य किए हैं, जो कुछ प्रयास किए हैं, उन्हें देखो; मैंने उस पर बहुत कार्य किया है, फिर भी मैं अभी तक उसके दिल को प्रेरित नहीं कर पाया हूँ, न ही मैं उसकी आत्मा को जगा पाया हूँ। यह व्यक्ति परेशानी में पड़ेगा; इसे बचाना आसान न होगा।" यदि परमेश्वर तुम्हारे लिए विशेष परिवेशों, लोगों, चीज़ों और वस्तुओं की व्यवस्था करता है, यदि वह तुम्हारी काट-छाँट और तुम्हारे साथ व्यवहार करता है और यदि तुम इससे सबक सीखते हो, यदि तुमने परमेश्वर के सामने आना सीख लिया है, तुमने सत्य की तलाश करना सीख लिया है, अनजाने में, प्रबुद्ध और रोशन हुए हो और तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है, यदि तुमने इन परिवेशों में बदलाव का अनुभव किया है, पुरस्कार प्राप्त किए हैं और प्रगति की है, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा की थोड़ी-सी समझ प्राप्त करना शुरू कर देते हो और शिकायत करना बंद कर देते हो, तो इन सबका मतलब यह होगा कि तुम इन परिवेशों के परीक्षण के बीच में अडिग रहे हो, और तुमने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। इस तरह से तुमने इस कठिन परीक्षा को पार कर लिया होगा। इम्तिहान में खरे उतरने वालों को परमेश्‍वर किस नज़र से देखेगा? परमेश्‍वर कहेगा कि उनका हृदय सच्‍चा है, कि वे इस तरह के कष्‍ट सहन कर सकते हैं और गहराई में, वे सत्‍य से प्रेम करते हैं और सत्‍य को चाहते हैं। अगर परमेश्‍वर का तुम्‍हारे बारे में ऐसा आकलन है, तो क्‍या तुम कद-काठी वाले नहीं हो? फिर क्‍या तुम में जीवन नहीं है? और यह जीवन कैसे प्राप्‍त हुआ है? यह परमेश्‍वर द्वारा प्रदत्त है; यह परमेश्‍वर का तुम तक भोजन का पात्र लाना और उसे तुम्हारे मुँह से लगाना है; फिर, जब तुम खा चुकते हो, तुम संतुष्‍ट महसूस करते हो और मज़बूती से खड़े हो सकते हो। इसी तरह से तुमको चीज़ों को समझना चाहिए; परमेश्‍वर के पास से आने वाली हर चीज़ के प्रति आज्ञाकारी होने का यही तरीका है। तुम्‍हारे पास इसी प्रकार की मनोदशा और इसी प्रकार का रवैया होना चाहिए, और तुम्‍हें सत्‍य की खोज करना सीखना चाहिए। तुम्‍हें अपनी परेशानियों के लिए हमेशा बा‍हरी कारण नहीं खोजने चाहिए और न ही दूसरों को दोष देना चाहिए, और तुम्‍हें परमेश्‍वर की मंशा को समझना चाहिए। बाहर से, ऐसा लग सकता है कि कुछ लोगों की तुम्‍हारे बारे में धारणाएं हैं या पूर्वाग्रह हैं, लेकिन तुम्‍हें इस रूप में चीज़ों को नहीं देखना चाहिए। अगर तुम त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण से चीज़ों को देखोगे, तो तुम केवल दूसरों के साथ तर्क कर सकोगे, और तुम कुछ भी प्राप्‍त नहीं कर सकोगे। तुम्‍हें चीज़ों को वस्‍तुगत और न्‍यायसंगत ढंग से देखना चाहिए; इस तरह, तुम सत्‍य को खोज सकोगे और परमेश्‍वर की मंशा को समझ सकोगे। जब तुम्‍हारे दृष्टिकोण और मनोदशा का परिशोधन हो जाएगा, तब तुम सत्‍य को प्राप्‍त कर सकोगे। आगे नहीं बढ़ने का क्‍या संभावित कारण हो सकता है? तुम प्रतिरोध क्‍यों करते हो? अगर तुम प्रतिरोध नहीं करोगे, तब तुम सत्‍य को प्राप्‍त कर लोगे। अगर तुम प्रतिरोध करोगे तब तुम कुछ भी प्राप्‍त नहीं कर सकोगे, और तुम परमेश्‍वर को भी चोट पहुंचाओगे और उसे निराश करोगे? परमेश्‍वर कैसे निराश होता है? इसका मतलब है कि तुम स्वयं परमेश्‍वर द्वारा तुम तक लाए भोजन के पात्र को दूर हटा रहे हो, उस भोजन के पात्र को जिसे उसने खुद अपने मुँह से तुम्‍हें खिलाया है। तुम उसे नहीं चाहते, और तुम कहते हो: "मैं इसे नहीं खाउंगा। मुझे भूख नहीं है। मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है!" परमेश्‍वर इस तरह का कार्य न करने के लिए तुम्‍हें समझाने की बार-बार कोशिश करता है, लेकिन तुम फिर भी खाना नहीं चाहते, और इसके बजाय भूखे रहना चाहते हो। तुम सोचते हो कि तुम्‍हारा पेट भरा है, जबकि वास्‍तव में तुम्‍हारे पास कुछ भी नहीं है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

चाहे लोग ऐसी स्थिति में हों जिसके कारण वे गलतियाँ करते हैं, या ऐसी स्थिति में जिसके कारण वे गलतियाँ नहीं करते, आमतौर पर वे अपने हृदय की गहराइयों में एक तरह की कठोरता और विद्रोह पाले रखते हैं। इतना ही नहीं, उनके भीतर एक तरह की मानवोचित तार्किक विचारधारा विद्यमान रहती है, जो कहती है, "जब तक मेरे कार्य और इरादे सही हैं, तुम्हें मुझसे निपटना नहीं चाहिए, और समर्पित न होना मेरे लिए ठीक है।" वे इस बात का जिक्र नहीं करते कि उन्होंने जो किया है, वह सत्य से मेल खाता है या नहीं या इसके क्या परिणाम होंगे। वे मानते हैं, "जब तक मेरे पास अच्छा हृदय है और मेरे दुर्भावनापूर्ण इरादे नहीं हैं, तुम्हें मुझे स्वीकार करना चाहिए।" यह मानवोचित तार्किकता है, या नहीं? यह मानवोचित तार्किकता है, और इसमें कोई समर्पण नहीं है। तुम अपनी तार्किकता को सत्य मानते हो और सत्य को फालतू मानते हो। तुम सोचते हो कि जो तुम्हारी अपनी तार्किकता के अनुरूप है, केवल वही सत्य है, और जो तुम्हारी तार्किकता के अनुरूप नहीं है, वह सत्य नहीं है। जो कोई इस ढंग से सोचता है, वह सबसे बेतुका, अभिमानी और आत्मतुष्ट है। किस प्रकार की स्थितियाँ समर्पण सिखाने में लोगों को संकल्प करने में मदद कर सकती हैं? समर्पण प्राप्त करने के लिए क्या उन्हें किसी स्तर की तर्कसंगतता की आवश्यकता है? चाहे हमने किसी मामले में सही किया हो या गलत, जब तक परमेश्वर असंतुष्ट है, हमें परमेश्वर को सुनना चाहिए और परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल मानक के रूप में करना चाहिए। यह तर्कसंगत होगा, है न? इसी तरह की समझ मनुष्यों के पास होनी चाहिए; यह पहली चीज़ है जिससे उन्हें स्वयं को लैस करना चाहिए। हमें इस पर विचार नहीं करना चाहिए कि हमने कितने कष्टों का सामना किया है, हमारे इरादे और उद्देश्य क्या थे, या उस समय हमारी वजहें क्या थीं। चूँकि परमेश्वर संतुष्ट नहीं है और हम परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं, और यह देखते हुए कि परमेश्वर सत्य है, हमें परमेश्वर की बात सुननी चाहिए और उसके साथ तक-वितर्क या बहस करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगर तुममें ऐसी तर्कसंगतता है, तो तुम समर्पण कर पाओगे; अर्थात, अपनी परिस्थितियों पर ध्यान दिए बगैर तुम न तो परमेश्वर को विरुद्ध विद्रोह करते हो, न ही उसकी तुमसे जो अपेक्षाएँ हैं, उन्हें अस्वीकृत करते हो, और अगर तुम यह विश्लेषण नहीं करते कि उसकी अपेक्षाएँ सही हैं या गलत,तो तुम्हारी कठोरता और विद्रोह की मानवीय स्थिति और अपने मामले की सफ़ाई देने की तुम्हारी प्रवृत्ति का समाधान हो जाएगा। क्या ये स्थितियाँ हर किसी में विद्यमान नहीं होतीं? ये स्थितियाँ अकसर लोगों में उभरती हैं और वे सोचते हैं, "जब तक मेरा तरीका मेरे तार्किक चिंतन से मेल खाता है, तब तक तुम्हारा तरीका सही नहीं होना चाहिए, इसलिए तुम्हारी आज्ञा न मानना मेरे लिए उचित और न्यायसंगत है।" यह लोगों की आम स्थिति है, लेकिन अगर तुम इस प्रकार की तर्कसंगता से लैस हो, तो तुम इस प्रकार की स्थिति को अंशत: प्रभावी ढंग से सुलझा सकोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ' से उद्धृत

पहली बार कलीसिया में आने और अपने कर्तव्यों के निर्वहन से पहले और निपटे जाने एवं काट-छाँट किए जाने से पहले हर कोई अहंकारी होता है, वह चाहता है कि हर काम में उसी की राय अंतिम हो। ऐसे लोग सोचते हैं : "अब चूँकि मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, तो मुझे कलीसिया में हर तरह का अधिकार और स्वतंत्रता है, इसलिए मैं जैसा चाहूँ, कर सकता हूँ।" लेकिन जब उनका निपटारा और काट-छाँट हो जाती है और वे अनुशासित कर दिए जाते हैं, और एक बार जब उनके साथ सत्य की संगति में उन्हें सत्य समझा दिया जाता है और वे उपदेश सुन लेते हैं, तो उसके बाद वे इस तरह का व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करते। दरअसल, वे पूरी तरह से स्थिर नहीं होते; वे इस बारे में थोड़ा-बहुत ही जानते हैं कि चीजें कैसे काम करती हैं और उनमें अधिक समझ नहीं होती। जब दूसरे लोग ऐसी बातें कहते हैं जो अनिवार्य होती हैं, तो वे अपनी यथार्थता स्वीकार कर सकते हैं, हालाँकि वे उन चीजों को अच्छी तरह से नहीं समझ पाते, तो भी वे उन्हें स्वीकार कर सकते हैं। तो क्या वे पहले से कहीं अधिक स्थिर नहीं हो जाते? उनका इन चीजों को स्वीकार कर पाना दर्शाता है कि उनके व्यवहार में कुछ बदलाव आया है। ये बदलाव कैसे आया? वे परमेश्वर के वचनों के उपदेश, प्रेरणा और आश्वासन से उन्नत हुए हैं। कभी-कभी ऐसे लोगों को कुछ अनुशासन, निपटारे और काट-छाँट के साथ-साथ सिद्धांतों पर कुछ संगति की आवश्यकता होती है, जिनके ज़रिए उन्हें यह बताया जाता है कि किसी कार्य को एक विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए, अन्य तरीके से नहीं। "सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। वह ठीक हमारे सामने है। इस पर आपत्ति करने की हिम्मत कौन करेगा?" उन्हें आश्चर्यचकित होता है। परमेश्वर के घर में, परमेश्वर महान होता है, सत्य महान होता है और सत्य का ही बोलबाला होता है; इस सैद्धांतिक आधार ने कुछ लोगों को झिंझोड़ कर जगा दिया है और उन्हें समझाया है कि परमेश्वर में आस्था रखना क्या होता है। मान लो कोई व्यक्ति मूलत: क्रूर और लम्पट है, पूरी तरह से स्वच्छंद है, वह नियमों से पूरी तरह अनभिज्ञ है, परमेश्वर में आस्था से अनजान है, परमेश्वर के घर से अनजान है और परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्यों के निर्वहन के सिद्धांतों से अनजान है : जब ऐसा कोई व्यक्ति, जो कुछ नहीं जानता, परमेश्वर के घर में नेक इरादों से, उत्साह के साथ, बड़ी आशा-आकांक्षाओं साथ आता है और परमेश्वर के वचनों से प्रेरित होता है, उपदेश ग्रहण करता है, सिंचन और पोषण प्राप्त करता है, उसका निपटारा होता है और बार-बार उसकी काट-छाँट होती है, उसे ताड़ना दी जाती है, अनुशासित किया जाता है, उसका परीक्षण होता है और उसका शोधन किया जाता है, तो फिर धीरे-धीरे उस व्यक्ति की मानवीयता में कुछ परिवर्तन होंगे। वे परिवर्तन क्या हैं? वह इंसानी आचरण के कुछ सिद्धांतों को समझने लगता है और उसे पता चलता है कि पहले उसमें मानवीयता की कमी थी; वह क्रूर, अहंकारी और अतिविश्वासी था; उसकी बातचीत और काम में सिद्धांतों का अभाव था और सत्य की खोज करना नहीं जानता था; उसने सोचा था कि परमेश्वर में विश्वास रखना एक साधारण-सी बात है कि जो कुछ परमेश्वर कहता है, वह करना है और जहाँ-कहीं जाने के लिए वह कहता है, वहाँ जाना है, और यह सब पाशविक शक्ति से करना; ऐसे व्यक्ति को लगता था कि यही परमेश्वर के प्रति वफादारी और प्यार है। अब वह व्यक्ति उन सभी चीजों को नकारता करता है और जानता है कि वह शैतानी व्यवहार है, और परमेश्वर के विश्वासियों को उसके वचनों पर ध्यान देकर सत्य को महान मानकर उसका सम्मान करना चाहिए और सभी चीजों में उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पित होना चाहिए। संक्षेप में, सिद्धांत रूप में और अपने दिल की गहराई में, सभी लोग समझ गए हैं, उन्होंने स्वीकार कर लिया है और मान्यता दे दी है कि ये वचन सही हैं–ये सत्य हैं, सकारात्मक चीजों की वास्तविकता हैं–चाहे इन वचनों ने उनके दिल में कितनी ही गहरी पैठ बना ली हो और चाहे इन वचनों ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई हो। बाद में, अनुशासन और ताड़ना के अमूर्त स्तर से गुजरकर, उनकी चेतना में सच्चे विश्वास का परिमाण उदित होता है। परमेश्वर की उनकी शुरुआती अस्पष्ट कल्पनाओं से लेकर अब जो उनकी भावना है—कि कोई परमेश्वर है और वह काफी वास्तविक है—एक बार जब लोगों को परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में ये भावनाएँ दिखती हैं, तो फिर उनके विचार और दृष्टिकोण, चीजों को देखने का उनका तरीका और नैतिक मानक, साथ ही उनके सोचने का तरीका धीरे-धीरे बदलना शुरू हो जाते हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से उद्धृत

क्या किसी चीज़ को समझते ही, तुम उस पर अमल कर सकते हो? तुम उस पर तुरंत अमल नहीं कर सकते। तुम्हारी समझ के बावजूद, लोग तुम्हारी काट-छाँट और निपटारा करते हैं, और परिवेश तुम्हें सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करने के लिए मजबूर करते हैं। कभी-कभी, लोग इसे झेलने को तैयार नहीं होते और कहते हैं, "मैं इसे उस तरह से क्यों नहीं कर सकता? क्या मुझे इसको इसी तरह से करना होगा?" दूसरों का कहना है, "यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हें इसे इसी तरह करना चाहिए। इसे इस तरह से करना सत्य के अनुसार है।" जब लोग एक निश्चित बिंदु तक पहुंचकर कुछ परीक्षणों का अनुभव कर लेते हैं और परमेश्वर की इच्छा और कुछ सत्यों को समझ जाते हैं, तब वे थोड़े खुश होकर सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। शुरू में लोग सत्य पर अमल करने को तैयार नहीं होते। उदाहरण के तौर पर, पूरे समर्पण भाव से कर्तव्यों के निर्वहन को ही लो। तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्यों को पूरा करने और परमेश्वर के प्रति वफादार होने की कुछ समझ है, और तुम उससे जुड़े सत्यों को समझते भी हो, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित कब होगे? नाम और कर्म में तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कब करोगे? इसमें प्रक्रिया की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम्हें कई कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है; शायद कुछ लोग तुम्हारे साथ निपटें, कुछ तुम्हारी आलोचना करें। सबकी आँखें तुम पर टिकी होंगी, तब तुम्हें एहसास होगा कि तुम गलत हो, तुम्हीं ने अच्छा काम नहीं किया, कर्तव्यों के निर्वहन में समर्पण की कमी को बर्दाश्त नहीं किया जाता, तुम लापरवाह या अन्यमनस्क नहीं हो सकते। पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता है और जब तुम भूल करते हो, तो वह तुम्हें फटकारता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम अपने बारे में कुछ बातें समझोगे और जानोगे कि तुम बहुत अपवित्र हो, तुम्हारे अंदर निजी इरादे भरे पड़े हैं, और अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय तुम्हारे अंदर बहुत सारी अनियंत्रित इच्छाएँ हैं। जब तुम इन चीज़ों के सार को समझ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के समक्ष आकर, उससे प्रार्थना करके सच्चा प्रायश्चित कर सकते हो; इस तरह तुम अशुद्धियों से मुक्त हो सकते हो। यदि इस तरह अपनी व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने के लिए तुम अक्सर सत्य की खोज करोगे, तो तुम आस्था के सही मार्ग पर कदम बढ़ा सकोगे। किसी इंसान का भ्रष्ट स्वभाव जितना शुद्ध किया जाएगा, उसका जीवन स्वभाव उतना ही रूपांतरित होगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

कुछ लोग काट-छाँट किए जाने और निपटे जाने के बाद निष्क्रिय हो जाते हैं; वे अपना कर्तव्य निभाने के लिए सारी ऊर्जा गँवा देते हैं, और अंत में अपनी वफ़ादारी को भी गँवा देते हैं। ऐसा क्यों होता है? यह आंशिक तौर पर लोगों का उनके कृत्यों के सार के प्रति जागरूकता की कमी के कारण होता है, और इसके कारण वे काट-छाँट और निपटारे के प्रति समर्पित होने में असमर्थ हो जाते हैं। यह उनकी प्रकृति से तय होता है जो अहंकारी और दंभी है और जिसमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है। यह आंशिक तौर पर इसलिए भी होता है कि वे यह नहीं समझते कि काट-छाँट किए जाने और निपटे जाने का क्या महत्व है। लोग यह मानते हैं कि काट-छांट और निपटारा किए जाने का अर्थ है कि उनके परिणाम निर्धारित कर कर दिये गए हैं। परिणामस्वरूप, वे गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि यदि उनके पास परमेश्वर के प्रति कुछ वफ़ादारी होगी, तो उनके साथ निपटा नहीं जाना चाहिए या उनकी काट-छाँट नहीं की जानी चाहिए; और यदि उनके साथ निपटा जाता है, तो यह परमेश्वर के प्रेम और उसकी धार्मिकता का संकेत नहीं है। ऐसी गलतफहमी के कारण कई लोग परमेश्वर से "वफ़ादारी" न करने का साहस करते हैं। वास्तव में, जब सब हो जाता है तो यह इसलिए होता है क्योंकि वे बहुत अधिक कपटी हैं; वे कठिनाई सहना नहीं चाहते हैं। वे बस आसान तरीके से आशीषों को प्राप्त करना चाहते हैं। लोग परमेश्वर की धार्मिकता के बारे में नहीं जानते हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने कोई धार्मिक चीज़ नहीं की है या वह कुछ धार्मिक नहीं कर् रहा है; बात मात्र इतनी ही है कि लोग कभी भी विश्वास नहीं करते हैं कि परमेश्वर जो करता है वह धार्मिक है। मानव की दृष्टि में, यदि परमेश्वर का कार्य उनकी मानवीय कामनाओं के अनुसार नहीं है या यदि यह उन्हें जिसकी अपेक्षा थी, उसके अनुसार नहीं है, तो परमेश्वर अवश्य धार्मिक नहीं हो सकता। लेकिन, लोग कभी यह नहीं जानते हैं कि उनके कृत्य अनुचित हैं और सत्य के अनुरूप नहीं हैं, न ही उन्हें यह समझ आता है कि उनके कार्य परमेश्वर का विरोध करते हैं। यदि परमेश्वर कभी भी लोगों के अपराधों के कारण उन पर कार्य न करे या उनमें सुधार न करे और कभी भी उनकी गलतियों के लिए उलाहना न दे, परन्तु हमेशा शान्त रहे, उन्हें कभी भी उकसाए नहीं, कभी भी उन्हें नाराज़ न करे और कभी भी उनके दागों को प्रकट न करे, बल्कि उन्हें खाने-पीने और उसके साथ अच्छा समय बिताने दे, तो लोग कभी भी यह शिकायत नहीं करेंगे कि परमेश्वर धर्मी नहीं है। वे पाखंडपूर्ण ढंग से कहेंगे कि वह कभी भी धर्मी रहा ही नहीं। इसलिए, लोग अभी भी विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर परिवर्तन के अनुसार उनका प्रदर्शन चाहता है। यदि लोग ऐसा करते रहेंगे तो परमेश्वर कैसे उन्हें आराम देने का आश्वासन दे सकता है? यदि परमेश्वर लोगों के प्रति थोड़ा सा ही उलाहना भरा होता, तो वे कभी भी विश्वास नहीं कर सकते थे कि वह उनके परिवर्तन के अनुसार प्रदर्शन देखता है। वे विश्वास करना बंद कर देंगे कि वह धर्मी है और परिवर्तित होने की उनकी इच्छा भी समाप्त हो जाएगी। यदि लोग इसी प्रकार की परिस्थितियों में जीते रहेंगे, तो वे स्वयं के ही विचारों से धोखा खाएंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोगों के प्रदर्शन के आधार पर परमेश्वर द्वारा उनके परिणाम निर्धारण के निहितार्थ' से उद्धृत

कुछ लोगों का मानना है कि परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव कर लेने, और उसके द्वारा निपटाए जाने और काट-छाँट किये जाने के बाद, या एक बार जब उनके असली रंग सामने आ जाते हैं, तो इसका मतलब यह होता है कि उनके अंज़ाम पत्थर की लकीर हो जाते हैं। अधिकांश लोग इसके परे नहीं देख पाते हैं; वे इस पर अटक जाते हैं और वे आगे बढ़ना नहीं जानते। आमतौर पर, जब उनसे निपटना और उनकी काट-छाँट करना बाक़ी हो और उन्हें कोई झटका न लगा हो, तो उन्हें लगता है कि उन्हें सत्य का अनुसरण करना चाहिए और अपने विश्वास में उन्हें परमेश्वर की इच्छा पूरी करनी चाहिए। बहरहाल, जैसे ही वे थोड़ा झटका खाते हैं या कोई मुश्किलें पैदा होती हैं, उनकी विश्वासघाती प्रकृति सामने आ जाती है। यह देखना घृणास्पद होता है। बाद में, वे भी इसे घृणास्पद महसूस करते हैं, और अंततः अपने स्वयं के अंत को परिसीमित करते हुए कहते हैं, "मेरा खेल खत्म हो गया है! अगर मैं ऐसे काम भी कर सकता हूँ, तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा काम तमाम हो गया है? परमेश्वर मुझे कभी नहीं बचाएगा।“ कई लोग इस स्थिति में होते हैं। यह भी ​​कहा जा सकता है कि हर कोई ऐसा ही होता है। लोग इस प्रकार खुद को परिसीमित क्यों करते हैं? यह साबित करता है कि वे अभी भी मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर के इरादे को नहीं समझते हैं। सिर्फ एक बार निपटाए जाने पर तुम सत्य का अनुसरण करने से बहुत पीछे हट जाते हो; सिर्फ एक छोटी-सी भूल तुम्हें अपना कर्तव्य पूरा करने से रोक लेती है; यहाँ तक ​​कि बस एक छोटा-सा परिदृश्य भी तुम्हें अटका सकता है। ऐसा लगता है जैसे लोग केवल तभी उत्साही होते हैं जब उन्हें लगता है कि वे निष्कलंक और निर्दोष हों, लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि वे अत्यधिक भ्रष्ट हैं, तो उनके पास सत्य का अनुसरण करने का दिल नहीं होता है। बहुत से लोगों ने हताशा और नकारात्मकता के शब्द बोले हैं, जैसे कि, "निश्चित रूप से मेरे लिए यह खेल खत्म हो गया है;मेरे बचाए जाने का कोई तरीका नहीं है। यहाँ तक ​​कि अगर परमेश्वर मुझे माफ़ कर दे, तो भी मैं खुद को माफ़ नहीं कर सकता; मैं कभी नहीं बदल सकता।” लोग परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं, जिससे पता चलता है कि वे अभी भी उसके कार्य को नहीं जानते हैं। वास्तव में, अपनी सामान्य प्रविष्टि के दौरान, इंसान कभी-कभी कुछ भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करते हैं, उनके काम दोषपूर्ण होते हैं, वे कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेते हैं, उनकी कोई निष्ठा नहीं होती है, और वे लापरवाह और असावधान होते हैं—और यह सब बहुत स्वाभाविक है; ये एक अपरिहार्य ढाँचे का हिस्सा हैं। ऐसी बातों को उजागर किए बिना, उन्हें भ्रष्ट इंसान कैसे कहा जा सकता है? यदि मानव जाति भ्रष्ट नहीं होती, तो परमेश्वर के उद्धार के कार्य का कोई महत्व नहीं होगा। वर्तमान में, स्थिति यह है कि लोगों में सत्य का अभाव है; वे वास्तव में खुद को नहीं जानते हैं और उनकी स्थितियाँ उनके लिए स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए उन्हें उजागर करने और प्रकाश में डालने की आवश्यकता है। प्रबोधन तभी होगा जब लोगों को उजागर किया जाएगा, क्योंकि वे सभी सुन्न और मंद-बुद्धि हैं, और जब तक इस तरह का काम नहीं किया जाता है, वे नहीं बदलेंगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'समझना ही होगा कि लोगों की प्रकृतियों में समानताएँ भी हैं और भिन्नताएँ भी' से उद्धृत

असफल होना और कई बार नीचे गिरना कोई बुरी बात नहीं है; न ही उजागर किया जाना कोई बुरी बात है। चाहे तुम्हारा निपटारा किया गया हो, तुम्हें काटा-छाँटा गया हो या उजागर किया गया हो, तुम्हें हर समय यह याद रखना चाहिए : उजागर होने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारी निंदा की जा रही है। उजागर किया जाना अच्छी बात है; यह स्वयं को जानने का सबसे अच्छा अवसर है। यह तुम्हारे जीवन अनुभव को गति दे सकता है। इसके बिना, तुम्हारे पास न तो अवसर होगा, न ही परिस्थिति, और न ही अपनी भ्रष्टता के सत्य की समझ तक पहुँचने में सक्षम होने के लिए कोई प्रासंगिक आधार होगा। यदि तुम्हें अपने अंदर की चीज़ों के बारे में पता चल जाये, तुम्हारे भीतर छिपी उन गहरी बातों के हर पहलू का भी पता चल जाये, जिन्हें पहचानना मुश्किल है और जिनका पता लगाना कठिन है, तो यह अच्छी बात है। स्वयं को सही मायने में जानने में सक्षम होना, तुम्हारे लिए अपने तरीकों में बदलाव कर एक नया व्यक्ति बनने का सबसे अच्छा मौका है; तुम्हारे लिए यह नया जीवन पाने का सबसे अच्छा अवसर है। एक बार जब तुम सच में खुद को जान लोगे, तो तुम यह देख पाओगे कि जब सत्य किसी का जीवन बन जाता है, तो यह निश्चय ही अनमोल होता है, तुममें सत्य की प्यास जगेगी और तुम वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यह कितनी बड़ी बात है! यदि तुम इस अवसर को थाम सको और ईमानदारी से मनन कर सको, तो कभी भी असफल होने या नीचे गिरने पर स्वयं के बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हो, तब तुम नकारात्मकता और कमज़ोरी में भी फिर से खड़े हो सकोगे। एक बार जब तुम इस सीमा को लांघ लोगे, तो फिर तुम एक बड़ा कदम उठा सकोगे और सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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