165. परमेश्वर द्वारा मानव जाति को यथासंभव अधिकतम बचा लेने के सिद्धांत

(1) मानवजाति भ्रष्टता के कीचड़ में इतनी गहराई से धंस गई है कि थोड़ी-सी भी ग़लत धारणा या ग़लतफ़हमी उन्हें परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने को उद्यत कर देती है। फिर भी, जब तक आशा की एक भी किरण होती है, तब तक परमेश्वर उन्हें त्यागता नहीं है;

(2) जब तक कोई स्वयं को जान सकता है, और जब तक वह वास्तव में पश्चाताप और परिवर्तन कर सकता है, तब तक परमेश्वर उसके पिछले अपराधों को याद नहीं करेगा, चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हों;

(3) उस समय की अवधि में जब परमेश्वर अपने कार्यों को करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है, वह किसी पर सज़ा को आसानी से नहीं ले आता है, बल्कि जब तक हो सके वह सहनशील रहता है। वह लोगों को पश्चाताप करने के अवसर देता है;

(4) जिन्हें परमेश्वर बचाता है वे अच्छे लोग होते हैं जो वास्तव में उसमें विश्वास करते हैं। वह मसीह-विरोधियों, दुष्ट लोगों, गंदे राक्षसों और बुरी आत्माओं से घृणा करता और उन्हें शाप देता है। जो लोग परमेश्वर से घृणा करते हैं, वे अवश्य ही नष्ट होंगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य उसे परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में सक्षम बनाना है, और ऐसा उनका उद्धार करने के लिए किया जाता है। इसलिए, मनुष्य का उद्धार करते समय, परमेश्वर उसे दंड देने का काम नहीं करता। मनुष्य के उद्धार के समय परमेश्वर न तो बुरे को दंडित करता है, न अच्छे को पुरस्कृत करता है, और न ही वह विभिन्न प्रकार के लोगों की मंज़िल प्रकट करता है। बल्कि, अपने कार्य के अंतिम चरण के पूरा होने के बाद ही वह बुरे को दंडित और अच्छे को पुरस्कृत करने का काम करेगा, और केवल तभी वह सभी प्रकार के लोगों के अंत को भी प्रकट करेगा। दंडित केवल वही लोग किए जाएँगे, जिन्हें बचाया जाना संभव नहीं है, जबकि बचाया केवल उन्हीं लोगों को जाएगा, जिन्होंने परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय उसका उद्धार प्राप्त कर लिया है। जब परमेश्वर द्वारा उद्धार का कार्य किया जा रहा होगा, उस समय यथासंभव हर उस व्यक्ति को बचा लिया जाएगा, जिसे बचाया जा सकता है, और उनमें से किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। जो लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार के दौरान अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला पाएँगे—और वे भी, जो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो पाएँगे—वे दंड के भागी होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—लोगों के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोल देगा, जिन्हें वे नहीं समझते, ताकि वे परमेश्वर की इच्छा और स्वयं से परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ सकें, और अपने अंदर परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की पूर्वापेक्षाएँ पैदा करके अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकें। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है, अगर लोग थोड़े विद्रोही हो जाएँ, तो वह उन्हें दंडित नहीं करता; क्योंकि यह उद्धार के कार्य का समय है। यदि विद्रोही ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा; हर व्यक्ति दंडित होकर रसातल में जा गिरेगा। मनुष्य का न्याय करने वाले वचनों का उद्देश्य उन्हें स्वयं को जानने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने देना है; यह उन्हें इस तरह के न्याय से दंडित करना नहीं है। वचनों के कार्य के दौरान बहुत-से लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी विद्रोहशीलता और अवहेलना, और साथ ही अपनी अवज्ञा भी उजागर करेंगे। फिर भी, वह उन्हें दंडित नहीं करेगा, बल्कि केवल उन लोगों को अलग कर देगा, जो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। वह उनकी देह शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनकी देह का अंत कर देगा। शेष लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने का अनुसरण और अनुभव करना जारी रखेंगे। यदि अनुसरण करते समय भी ये लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने को स्वीकार नहीं करते, और ज़्यादा पतित हो जाते हैं, तो वे उद्धार पाने के अपने अवसर से वंचित हो जाएँगे। वचनों द्वारा जीते जाने के लिए प्रस्तुत प्रत्येक व्यक्ति के पास उद्धार के लिए पर्याप्त अवसर होगा; उद्धार के समय परमेश्वर इन लोगों के प्रति परम उदारता दिखाएगा। दूसरे शब्दों में, उनके प्रति परम सहनशीलता दिखाई जाएगी। अगर लोग गलत रास्ता छोड़ दें और पश्चात्ताप करें, तो परमेश्वर उन्हें उद्धार प्राप्त करने का अवसर देगा। जब मनुष्य पहली बार परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, तो वह उन्हें मृत्युदंड नहीं देना चाहता; बल्कि, वह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें दर-किनार कर देता है। कुछ लोगों को दंडित करने में परमेश्वर थोड़ा धीमा इसलिए चलता है क्योंकि वह हर उस व्यक्ति को बचाना चाहता है, जिसे बचाया जा सकता है। वह केवल वचनों से लोगों का न्याय करता है, उन्हें प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, वह उन्हें मारने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता। मनुष्य को उद्धार दिलाने के लिए वचनों का प्रयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्त्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं: “मेरा स्वभाव अच्छा नहीं है, कुदरत को जो करना है करे!” क्या आप देह त्याग नहीं कर पाते? क्या आपके पास दिल और दिमाग नहीं है? आप प्रतिदिन प्रार्थना कैसे करते हैं? “देह, बाहर आ जाओ! कुदरत को जो करना है करे, परमेश्वर ने इसे पूर्वनिर्धारित कर दिया है; मुझे कुछ करने की आवश्यकता नहीं।” क्या यही आपकी प्रार्थना है? नहीं! तो फिर आप परमेश्वर के संग कार्य क्यों नहीं करते? जिन कुछ लोगों ने थोड़ा आज्ञा का उल्लंघन किया है, वे अनुमान लगायेंगे: क्या परमेश्वर मुझे समाप्त कर देंगे? इस बार परमेश्वर लोगों को समाप्त करने नहीं, बल्कि यथासम्भव उनकी रक्षा करने आये हैं। गलतियां किससे नहीं होतीं? यदि सभी को समाप्त कर दिया जायेगा तो फिर इसे उद्धार कैसे कहेंगे? कुछ आज्ञालंघन जान-बूझकर किये जाते हैं और कुछ अनजाने में हो जाते हैं। अनजाने में हुये मामलों में, पहचानने के बाद आप उन्हें बदल सकते हैं, तो क्या परमेश्वर बदलने से पहले ही आपको समाप्त कर देंगे? क्या ऐसे ही परमेश्वर लोगों की रक्षा करते हैं? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है! इससे कोई अंतर नहीं पडता कि आज्ञा का उल्लंघन अनजाने में हुआ है कि विद्रोही स्वभाव के कारण, केवल इतना याद रखें: शीघ्रता करें और वास्तविकता को पहचानें! आगे बढने का प्रयास करें; हालात कुछ भी हों, आप आगे बढने का प्रयास करें। परमेश्वर लोगों की रक्षा करने के कार्य में लगे हैं और वह जिनकी रक्षा करना चाहते हैं उन्हें अंधाधुंध तरीके से कैसे मार देंगे? आपके अंदर चाहे कितना भी परिवर्तन आया हो, अंत में अगर परमेश्वर ने आपको समाप्त भी कर दिया तो उनका वह निर्णय धर्मितापूर्ण होगा; जब वह समय आयेगा तो वह आपको समझने का अवसर देंगे। लेकिन इस समय आपका दायित्व है कि आगे बढ़ने का प्रयास करें, रूपांतरण की कोशिश में लग जायें और परमेश्वर को संतुष्ट करने की कामना करें; आपको केवल परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही अपना दायित्व निभाते रहने की चिंता करनी चाहिये। और इसमें कोई दोष नहीं है! अंतत:, परमेश्वर आपके साथ जैसा चाहें बर्ताव करें, वह हमेशा न्यायसंगत ही होता है; आपको इस पर न तो संदेह करना चाहिये और न ही इसकी चिंता करनी चाहिये; भले ही परमेश्वर की धर्मिता अभी आपकी समझ से बाहर हो, लेकिन वह दिन आयेगा जब आप पूरी तरह से आश्वस्त हो जायेंगे। परमेश्वर किसी सरकारी अधिकारी या राक्षसों के सम्राट की तरह बिल्कुल नहीं है! यदि आप गौर से इस पहलू को समझने की कोशिश करेंगे तो आप दृढ़ता से विश्वास करने लगेंगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों की रक्षा करना और उनके स्वभाव को रूपांतरित करना है। चूंकि यह लोगों के स्वभाव के रूपांतरण का कार्य है, यदि लोग अपने स्वभाव को प्रकट नहीं करेंगे, तो कुछ नहीं किया जा सकता और फिर परिणाम भी कुछ नहीं निकलेगा। लेकिन एक बार अपना स्वभाव प्रकट करने के बाद, पुरानी आदतें जारी रखना कष्टकर होगा, यह प्रबंधन आदेश की अवमानना होगी और परमेश्वर इससे अप्रसन्न होंगे। परमेश्वर अलग-अलग स्तर के दंड का विधान करेंगे और आपको आज्ञा के उल्लंघन की कीमत चुकानी होगी। कभी-कभी आप अनजाने में भ्रष्ट आचरण करने लगते हैं, तो परमेश्वर आपको आगाह करते हैं, आपको सुधारते हैं, आपसे व्यवहार करते हैं; अगर आप अच्छा करते हैं तो परमेश्वर आपको उत्तरदायी नहीं ठहरायेंगे। यह रूपांतरण की सामान्य प्रक्रिया है; इस प्रक्रिया में उद्धार का कार्य सही मायनों में अभिव्यक्त होता है। यही कुंजी है! मिसाल के तौर पर स्त्री और पुरुष के बीच की सीमायें; आज आप आवेग में किसी स्त्री का हाथ पकड़ लेते हैं, लेकिन जब लौटते हैं तो सोचते हैं: क्या मेरा यह व्यवहार अनैतिक नहीं है? क्या यह पाप नहीं है? स्त्री और पुरुष के बीच सीमायें नहीं रख पाना क्या परमेश्वर की अवमानना नहीं है? मैं ऐसी हरकत कैसे कर सकता हूं? तब आप परमेश्वर के समक्ष आते हैं और प्रार्थना करते हैं: “हे परमेश्वर मैंने फिर से पाप किया है; यह चीज़ सत्य के अनुरूप नहीं है और मुझे इस भ्रष्ट देह से घृणा है।” बाद में आप संकल्प करते हैं कि आप उन्हें स्पर्श नहीं करेंगे या उनके निकट नहीं जायेंगे। क्या यह रूपांतरण नहीं है? यदि इस प्रकार से आपका रूपांतरण होता है, तो क्या उनका हाथ पकड़ने के लिये परमेश्वर तब भी आपकी भर्त्सना करेंगे? यदि आपने उनका हाथ पकड़ा और आपको ऐसा करना उचित नहीं लगा, और आपने अपने पाप को परमेश्वर के समक्ष स्वीकार नहीं किया, यह सोचकर कि यह कोई लज्जाजनक कार्य नहीं है, और आपने स्वयं से घृणा नहीं की, सतर्क नहीं रहे, या संकल्प नहीं किया, तो उसके बाद आप न केवल उनका हाथ पकड़ेंगे बल्कि आप उन्हें आलिंगनबद्ध कर लेंगे! यह चीज़ें अधिक गम्भीर रूप धारण करती जायेंगी और पाप की ओर धकेलती चली जायेंगी, और ऐसा करते रहने पर, परमेश्वर आपके पापों के लिये आपकी भर्त्सना करेंगे; आप पाप पर पाप करते चले जायेंगे जिसका कोई इलाज नहीं है। यदि आप अनायास ही अपने भ्रष्ट स्वभाव को थोड़ा-सा भी सच्चे मन से प्रकट कर दें, यदि आप पश्चाताप कर सकें, तो परमेश्वर आपकी भर्त्सना नहीं करेंगे और तब भी आपकी रक्षा सम्भव है। परमेश्वर लोगों की रक्षा करना चाहते हैं, और यह असम्भव है कि लोगों का मिज़ाज थोड़ी मात्रा में भी प्रकट न हो; मगर आपको पश्चाताप और तेज़ी से बदलाव की ओर ध्यान देना चाहिये। क्या इससे परमेश्वर की इच्छा को तृप्ति नहीं मिलेगी? कुछ लोगों को इस पर विश्वास नहीं होता और वे परमेश्वर के प्रति सदा एक एहतियात बरतने की प्रवृत्ति बना लेते हैं; ऐसा व्यक्ति कभी न कभी कष्ट उठायेगा।

यह पहले कहा गया है: अतीत की घटनाओं को कलम से खारिज किया जा सकता है; अतीत का स्थान भविष्य ले सकता है; परमेश्वर में असीम सहिष्णुता है। लेकिन इन वचनों में सिद्धांत निहित हैं; ऐसा नहीं है कि अंतत: आप कितना भी बडा पाप करें, परमेश्वर उसे एक ही झटके में नष्ट कर देंगे; परमेश्वर के सभी कार्य सिद्धांतों पर चलते हैं। अतीत में इस प्रकार का प्रबंधनकारी आदेश था: यदि किसी ने परमेश्वर का नाम स्वीकारने से पहले कोई पाप किया है, तो उसे जुड़ने दें; यदि वह प्रवेश करने के बाद भी उस पाप को करता है उसके साथ विशेष प्रकार से पेश आयें; यदि वह उस पाप को बार-बार करता है तो उसे निष्कासित कर दें। परमेश्वर ने लोगों को सदा ही अपने कार्यों में यथासंभव क्षमा किया है; इस दृष्टिकोण से यह देखा जा सकता है कि यह वास्तव में लोगों की रक्षा का कार्य है। लेकिन इस अंतिम अवस्था में यदि आप कोई अक्षम्य पाप करते हैं, तो आपका सुधार या परिवर्तन संभव नहीं है। लोगों का स्वभाव बदलने और उनकी रक्षा करने की परमेश्वर की अपनी एक प्रक्रिया है। लोग जब एक प्रक्रिया के तहत अपने स्वभाव को प्रकट करेंगे तो परमेश्वर उनका रूपांतरण करेंगे; जब लोग निरंतर अपने स्वभाव को प्रकट करते हैं और रूपांतरित करते हैं, तो परमेश्वर को उद्धार का अपना लक्ष्य हासिल होता है। कुछ लोग सोचते हैं: चूंकि यह मेरा मिज़ाज है, तो मैं इसे यथासंभव प्रकट कर दूंगा! बाद में इसे पहचानकर, सत्य को ग्रहण कर लूंगा। क्या यह प्रक्रिया आवश्यक है? यदि आप वास्तव में सत्य का पालन करने वाले व्यक्ति हैं, और आपको लगता है कि आपके साथ भी वही समस्यायें हैं जो अन्य लोगों के साथ हैं, तब आप उन कार्यों को न करने का भरसक प्रयास करेंगे। क्या यह अप्रत्यक्ष रूप से रूपांतरण नहीं है? कभी-कभी आप उस कार्य को उसी प्रकार से करने की सोचते हैं, लेकिन उसे करने से पहले आप सतर्क हो जाते हैं और छोड़ देते हैं। तो क्या यह उद्धार की ओर अग्रसर नहीं करेगा? हर सत्य के पालन की एक प्रक्रिया है; आपके लिये पूर्णता असम्भव है और जब आप सत्य का पालन आरंभ करें और आपके विचारों में खोट न हो, यह संभव नहीं। अभी भी ऐसी अनेक बातें है जिनके लिये आप पूरी तरह से अपने विचारों पर भरोसा करोगे, लेकिन व्यवहार में आने और सुधरने पर, आप आखिरकार पूर्णत: परमेश्वर की आकांक्षाओं और वचनों के अनुसार कार्य करने लगेंगे। यही परिवर्तन और रूपांतरण।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

अनुग्रह के युग में, यह कहा गया था कि परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को बचाया जाए और वह नहीं चाहता कि किसी को भी विनाश का सामना करना पड़े। मानव जाति, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया था, उसे बचाने के प्रति परमेश्वर का ऐसा रवैया और ऐसी भावना है। यह परमेश्वर की इच्छा है, लेकिन वास्तव में, बहुत से लोग परमेश्वर के अनुग्रह को स्वीकार नहीं करते; वे शैतान के हैं और उनको बचाया नहीं जाएगा। ये शब्द संपूर्ण मानव जाति के प्रति ईश्वर के रवैये को दर्शाते हैं: उसका प्रेम असीमित है, यह अतुलनीय रूप से विशाल है, यह शक्तिशाली है। लेकिन जो लोग सत्य से घृणा करते हैं, उनको वह मुक्त रूप से अपना प्रेम और उद्धार देने का अनिच्छुक है, न ही वह ऐसा कभी करेगा। यही परमेश्वर का रवैया है। सत्य से घृणा करना किसके तुल्य है? क्या यह खुद को परमेश्वर के खिलाफ स्थापित करना है? क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना है? क्या यह परमेश्वर को खुले तौर पर यह बताने के समान है, "तुझे जो भी कहना है उसे सुनने में मुझे कोई आनंद नहीं आता। अगर मुझे यह पसंद नहीं है, तो यह सत्य नहीं है, और मैं इसे सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करूँगा। यह केवल तभी सत्य होगा जब मैं इसे स्वीकार करूंगा और इसे पसंद करूंगा।" जब तुम्हारा सत्य के प्रति यह रवैया हो, तो क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के प्रति खुले तौर पर शत्रुता रखते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बचाएगा? नहीं। यही बात परमेश्वर के क्रोध का कारण है। सत्य से घृणा करने वाले लोगों का सार परमेश्वर से शत्रुता का सार है। परमेश्वर इस सार वाले लोगों को आम लोग नहीं मानता; वह उन्हें दुश्मन मानता है, राक्षस मानता है, और उनको कभी नहीं बचाएगा। यह परमेश्वर के कोप की अभिव्यक्ति है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

परमेश्वर ने मनुष्य से घृणा की थी क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक गंभीर हद तक भ्रष्टता एवं अवज्ञा से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण और अपने सिद्धांतों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की और यहाँ तक कि वह मानवजाति के छुटकारे के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरंतर जीवित रह सकें। लेकिन, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरंतर परमेश्वर की अवज्ञा करता रहा और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इनकार किया; अर्थात् उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इनकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की या कैसे उनको सहन किया, मनुष्य ने न तो इसे समझा, न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य के प्रति अधिकतम सहनशील बना रहा था, इस इंतज़ार में कि मनुष्य ढर्रा बदलेगा। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात, परमेश्वर ने बिना किसी हिचकिचाहट के वह किया, जो उसे करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी जब परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनाई, तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत तक, एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया मनुष्य को ढर्रा बदलने योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी और यह वह आख़िरी मौका था, जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं प्रोत्साहन देने का कार्य किया था। चाहे परमेश्वर का हृदय कितनी भी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और भरपूर दया को जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा हो। यह वास्तविक, स्‍पर्शगम्‍य एवं प्रशंसनीय है, न कि जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता या झूठी छवियाँ नहीं बनाता कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना मनभावन है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग कभी नहीं करता। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या ये आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या ये संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिंदु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ : इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए खोखले शब्द मात्र है? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही है? नहीं! निश्चित रूप से नहीं! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं के हर विवरण को हर उस समय व्यावहारिक अभिव्यक्ति मिलती है, जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है और प्रत्येक व्यक्ति में पूर्ण एवं प्रतिबिंबित होते हैं। चाहे तुमने इसे पहले महसूस किया हो या नहीं, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति की हर संभव तरीके से देखभाल कर रहा है, वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने और प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

अतीत में, कुछ लोगों को कुछ बुरी चीजों के लिए निष्कासित कर दिया गया है और कलीसिया ने उन्हें खारिज कर दिया है। वे वर्षों भटकते हैं, और फिर वे वापस आते हैं। यह अच्छा है कि वे पूरी तरह से भाग नहीं गए हैं; चूंकि वे पूरी तरह से भाग नहीं गए हैं, उनके पास मौका और बचाए जाने की आशा है। यदि वे दूर भाग जाते और विश्वास नहीं करते, और अविश्वासियों की तरह बन गए होते, तो पूरी तरह से उनका काम तमाम हो जाता। अगर वे वापस मुड़ सकते हैं, तो उनके लिए आशा है। यह दुर्लभ और अनमोल है। चाहे परमेश्वर लोगों के साथ कैसे भी काम करें और चाहे लोगों के साथ कैसा भी व्यवहार करें, लोगों से घृणा करें, या लोगों को नापसंद करें, अगर कोई ऐसा समय आता है, जब लोग फिर से बदल सकते हैं, तो मुझे विशेष चैन मिलेगा; इसका मतलब यह है कि लोगों के मन में अभी भी उस हद तक तो परमेश्वर हैं, मानव ने विवेक पूरी तरह से नहीं खोया है, पूरी तरह से मानवता नहीं खोई है, अभी भी वे परमेश्वर में विश्वास करने का इरादा रखते हैं, और कबूल कर परमेश्वर तक लौटने का इरादा रखते हैं। चाहे कोई भी भाग जाएँ, यदि वे वापस आते हैं, और यह परिवार अभी भी उनके दिलों में है, तो मैं थोड़ा भावुक होकर कुछ सांत्वना पाऊँगा; हालांकि, जो लोग कभी वापस नहीं लौटते हैं, वे दयनीय हैं। यदि वे वापस आकर परमेश्वर पर नेकी से विश्वास करना शुरू कर सकते हैं, तो मेरा दिल विशेष रूप से संतुष्टि से भर जाएगा। वे वापस आने में सक्षम थे, और ऐसा लगता है जैसे वे मुझे भूले नहीं हैं और वापस आ गए हैं। उनके पास ऐसे दिल और मन हैं। उस समय जब हम मिलेंगे, मैं द्रवित हो जाऊँगा; जब आप छोड़ गए थे, आप निश्चित रूप से नकारात्मक थे और आपकी स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन अब आप लौट आये हैं, जो साबित करता है कि आप अभी भी परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। हालांकि, यह अभी भी अज्ञात है कि क्या आप आगे बढ़ना जारी रखने में सक्षम हैं, क्योंकि लोग बहुत तेज़ी से बदलते हैं। अनुग्रह के युग में, यीशु में लोगों के लिए रहम और अनुग्रह थे। यदि एक सौ में से एक भेड़ खो जाए, तो वे निन्यानबे को छोड़कर एक को खोजेंगे। यह मुहावरा एक यांत्रिक अभ्यास का वर्णन नहीं करता है, यह एक नियम नहीं है, लेकिन यह दर्शाता है मानव जाति के प्रति परमेश्वर के मंसूबे, मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर का तत्काल इरादा, और मानव जाति के लिए परमेश्वर का गहरा प्रेम। यह एक प्रथा नहीं है, लेकिन यह उनका स्वभाव है और उनकी मानसिकता है। इसलिए, कुछ लोग एक साल या आधे साल के लिए छोड़ देते हैं, या उनके पास कई कमजोरियाँ और कई गलत धारणाएँ होती हैं। इसके बाद, यदि वे वास्तविकता के प्रति जाग उठते हैं और समझ प्राप्त करने में सक्षम होते हैं, तो वे लौट आते हैं और सही रास्ते पर वापस आ जाते हैं, तो मुझे विशेष रूप से शान्ति होगी और इसमें खुशी होगी। आज के इस संसार और विषयासक्ति तथा बुराई के युग में खड़े रहने के लिए सक्षम हो पाना, परमेश्वर को स्वीकार करने में सक्षम हो पाना, और सही रास्ते पर वापस लौट आने में सक्षम होना ऐसी चीजें हैं जो वास्तव में चैन प्रदान करती हैं और रोमांचक हैं। यदि आप बच्चों को पालते-पोसते हैं, चाहे वे आपकी अपनी संतान हों या न हों, तो आपको कैसा लगेगा अगर उन्होंने आपको स्वीकार नहीं किया और भाग गए हों? क्या आपका दिल उनको त्याग देने से हमेशा इनकार नहीं करेगा और क्या आप हमेशा नहीं सोचेंगे: मेरा बेटा कब वापस आएगा? मैं उसे देखना चाहता हूँ। मैंने हमेशा उसे मेरे पुत्र के रूप में रखा है; मैंने उसे बड़ा किया और उससे प्यार किया है। आपने हमेशा इस तरह से सोचा है और उस आने वाले दिन का इंतज़ार किया है। हर किसी की ऐसी ही मानसिकता है। आजकल लोगों का कद छोटा है, लेकिन एक दिन वे समझ जाएंगे, बशर्ते ऐसा न हो कि विश्वास करने का उनका कोई इरादा ही न हो और उन्हें परमेश्वर के रूप में ही न मानें।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर से लगातार माँगते रहने वाले लोग सबसे कम विवेकी होते हैं' से उद्धृत

तुम लोगों के दिल में कौन सी अवधारणाएँ हैं जो तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित करती हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ ऐसा होता है जो तुम्हारी पसंद के अनुसार नहीं होता, तो स्वाभाविक रूप से ये अवधारणाएँ प्रकट होती हैं और इनके कारण तुम परमेश्वर से शिकायत करते हो, बहस करते हो और उससे स्पर्धा करते हो। उनकी वजह से परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंधों में तेजी से बदलाव आता है : तुम अचानक परमेश्वर के प्रति प्रेम के भाव से, उसके प्रति वफादार रहने के भाव से, उसके प्रति आजीवन समर्पित रहने के भाव से, जो भाव तुम्हारा शुरू में था, हटने लगते हो, अब तुम उसके प्रति वफादार नहीं रहना चाहते, अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करना चाहते, परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर पछताते हो, इस मार्ग को चुनकर पछताते हो, यहां तक कि परमेश्वर द्वारा चुन लिए जाने पर भी शिकायत करते हो। परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंधों में अचानक आए इतने बड़े बदलाव के लिए कौन सी अवधारणाएँ जिम्मेदार हैं? (जब परमेश्वर मेरी परीक्षा लेने के लिए एक स्थिति की व्यवस्था करता है, और मुझे लगता है कि हो सकता है इसका कोई परिणाम न निकले, तो मैं परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ बना लेता हूं। मुझे लगता है अगर मैं अपने विश्वास में परमेश्वर का त्याग न करूँ, तो वह मुझे छोड़ेगा नहीं।) यह एक तरह की अवधारणा है। क्या तुम लोगों में अक्सर ऐसी अवधारणाएँ होती हैं? परमेश्वर द्वारा त्याग दिए जाने को लेकर तुम लोगों की क्या समझ है? यह मानना कि यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहता और वह तुम्हें नहीं बचाएगा, यह एक प्रकार की अवधारणा है। तो ऐसी अवधारणा कैसे आती है? यह तुम्हारी कल्पना से आती है या इसका कोई आधार है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हें कोई परिणाम नहीं देगा? क्या यह बात खुद परमेश्वर ने तुम्हें बतायी है? इस तरह के विचार तुम्हारे द्वारा निरूपित किए गए हैं, है न? अब तुम समझ गए कि यह एक अवधारणा है; अब अहम सवाल यह है कि इस समस्या को कैसे सुलझाया जाए। सबसे सरल तरीका यह है : चूंकि तुम जानते हो कि यह एक अवधारणा है, इसलिए तुम्हें इसे एक तरफ रखकर सत्य की तलाश करनी चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर को तुमसे क्या अपेक्षा है। जब तुम्हारी अवधारणाएँ परमेश्वर की अपेक्षाओं से विपरीत होती हैं और तुम जानने के बावजूद उनसे चिपके रहते हो, तो तुम्हें जीवन में प्रवेश नहीं मिलेगा; तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। इसके अलावा, लोग अपने अंत और गंतव्य और अपने कर्तव्य के समायोजन के प्रति तथा कर्तव्य से हटा दिए जाने के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। कुछ लोग अक्सर ऐसी चीजों के बारे में गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं, वे सोचते हैं कि जैसे ही वे अपने कर्तव्य से हटा दिए जाएँगे, और जब उनकी कोई हैसियत नहीं होगी या फिर परमेश्वर कहेगा कि वह उन्हें पसंद नहीं करता या अब उसे उनकी ज़रूरत नहीं है, तो यह उनका अंत होगा। वे लोग इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने का कोई मतलब नहीं है और उनका मानना है कि चूंकि उनका अंत अटल है और परमेश्वर को भी उनकी ज़रूरत नहीं है, इसलिए जीने का कोई अर्थ नहीं है। ऐसे विचार सुनकर, अन्य लोगों को वे तर्कसंगत और सम्मानजनक प्रतीत होते हैं-लेकिन असल में, यह कैसी मानसिकता है? यह परमेश्वर के प्रति विद्रोह है, यह पराजय है। उनकी पराजय का सार क्या है? यह इसकी अज्ञानता है कि परमेश्वर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। क्या परमेश्वर जानता है कि लोग निराश क्यों होजाते हैं? परमेश्वर ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है? कुछ लोगों का कहना है, “परमेश्वर ने मनुष्य के लिए इतना श्रमसाध्य मूल्य चुकाया है, उसने हर व्यक्ति में बहुत काम किया है और बहुत प्रयास किए हैं; परमेश्वर के लिए किसी व्यक्ति को चुनना और बचाना आसान नहीं है। अगर ऐसा व्यक्ति निराश हो जाएगा, तो परमेश्वर बहुत आहत होगा और हर दिन यही उम्मीद करेगा कि वह व्यक्ति उससे बाहर निकल आएगा।” यह अर्थ सतही स्तर पर है, लेकिन वास्तव में यह भी इंसान की ही अवधारणा है। परमेश्वर ऐसे लोगों के प्रति एक निश्चित रवैया अपनाता है: यदि तुम निराशा हो जाते हो और आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करते, तो वह कहता है कि अगर तुम वहीं रहना चाहते हो जहां हो, तो वहीं रहो; वह तुम पर दबाव नहीं डालेगा। यदि तुम कहते हो, "मैं अभी भी एक सृष्टिकर्ता का कर्तव्य निभाना चाहता हूं, मैं परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार अभ्यास करने और उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए सब-कुछ कर सकता हूं। मैं अपनी शक्ति और क्षमताओं के अनुसार सब-कुछ करूंगा; मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं का त्याग नहीं करूँगा,” परमेश्वर कहता है कि यदि तुम इस तरह से जीने को तैयार हो, तो अनुसरण करते रहो, लेकिन परमेश्वर जैसा कहता है, वैसा करते रहो; परमेश्वर की अपेक्षाओं और सिद्धांतों के मानक नहीं बदलते। इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका मतलब है कि लोग ही अपना त्याग कर सकते हैं; परमेश्वर कभी किसी का त्याग नहीं करता। यदि कोई अंतत: उद्धार पाकर परमेश्वर को निहारता है, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाकर परमेश्वर के सामने आ सकता है, तो ऐसा असफल होने पर या एक ही बार में उसकी काट-छाँट होने पर हासिल नहीं किया जा सकता या एक ही बार उसका न्याय करने और ताड़ना देने पर हासिल नहीं किया जा सकता। पतरस को पूर्ण बनाने से पहले, उसका सैकड़ों बार शोधन किया गया था। जो लोग सेवा प्रदान करने के बाद अंत तक बने रहते हैं, उनमें से ऐसा एक भी नहीं होगा जिसने अंत तक बने रहने से पहले आठ या दस बार ही परीक्षणों और शुद्धिकरण का अनुभव किया हो। क्या यह परमेश्वर का प्रेम नहीं है? यह मनुष्य के प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के एक वचन के कारण, लोग अक्सर सोच लेते हैं कि परमेश्वर उनके बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंच गया है और उसने उन्हें त्याग दिया है—और इसके परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते। वास्तव में, तुम्हें समझ ही नहीं है कि त्यागना क्या होता है; तुम्हारा अपने देह-सुखों का त्याग करना ही असली त्याग है। कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें जिन वचनों से परिभाषित करता है, वे मात्र गुस्से में बोले गए होते हैं; वह न तो तुम्हारे बारे में कोई निष्कर्ष निकाल रहा होता है और न ही तुम्हारी निंदा कर रहा होता है, यह उसकी अंतिम सजा तो बिल्कुल नहीं होती। वह तुम्हारा अंतिम गंतव्य निर्धारित नहीं कर रहा है। ये मात्र ऐसे वचन होते हैं जो तुम्हारा न्याय करते हैं और तुमसे निपटते हैं। ये तुम्हारे लिए परमेश्वर की उत्कट आशाओं की बात करते हैं, ये तुम्हें याद दिलाने और चेतावनी देने वाले वचन हैं और ये परमेश्वर के हृदय से निकले वचन होते हैं। फिर भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो निर्णय के इन वचनों के कारण पतित होकर परमेश्वर को त्याग देते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो थोड़े समय के लिए कमजोर पड़ जाते हैं और परमेश्वर के सामने आ कर कहते हैं, “ऐसा नहीं चलेगा। मुझे आगे बढ़ते रहना चाहिए और जैसा परमेश्वर कहे वैसा करना चाहिए। यदि लोग सृष्टिकर्ता को छोड़ देते हैं, तो उनका जीवन जीने लायक नहीं रह जाता है। एक सृजित प्राणी की सार्थकता को जीने के लिए, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करते रहना चाहिए।” तो वे परमेश्वर का अनुसरण कैसे कर सकते हैं? उनका अनुसरण वैसा नहीं होना चाहिए, जैसा पहले था। पहले वे अपने कर्तव्य में निष्ठावान नहीं थे। वे काट-छाँट और निपटे जाने को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। थोड़ा कष्ट सहते ही शिकायत करने लगते थे। तुम्हें अब उस मार्ग पर नहीं चलना चाहिए, तुम्हें दूसरे साधनों से अनुसरण करना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के कहे अनुसार चलना चाहिए। अगर परमेश्वर कहता है कि तुम गलत हो, तो तुम्हें अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचकर, परमेश्वर के खिलाफ खड़े नहीं हो जाना चाहिए; तुम्हें समर्पित होकर स्वीकार कर लेना चाहिए कि तुम गलत हो। क्या यह अभ्यास का मार्ग नहीं है? जब लोगों के पास अभ्यास का मार्ग होता है, तो क्या वे भटककर परमेश्वर से दूर चले जाते हैं? कभी-कभी ऐसा भी होता है जब लोग मानते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया है—लेकिन वास्तव में, परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ा नहीं है, वह सिर्फ तुमसे घृणा करता है और तुम पर ध्यान नहीं देना चाहता। लेकिन उसने सच में तुम्हें छोड़ा नहीं है। ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य का निर्वहन करने का प्रयास करते हैं, लेकिन उनके सार और उनमें प्रकट होने वाली विभिन्न चीजों के कारण, परमेश्वर वास्तव में उनका त्याग कर देता है; वे वास्तव में चुने नहीं गए थे, बल्कि उन्होंने कुछ समय के लिए सेवा प्रदान की थी। जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें परमेश्वर अनुशासित करने, ताड़ना देने और उनका न्याय करने की पूरी कोशिश करता है; वह उन लोगों से पेश आने के ऐसे विभिन्न तरीके आजमाता है जो मनुष्य की अवधारणाओं से मेल नहीं खाते। कुछ लोग समझ नहीं पाते और सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें निशाना बनाकर आहत कर रहा है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर के सामने जीने की कोई गरिमा नहीं है, वे परमेश्वर को किसी भी तरह से और दुखी नहीं करना चाहते और परमेश्वर को छोड़ने का दायित्व खुद पर ले लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनके जीने का तरीका समझदारी भरा है, इसलिए वे परमेश्वर को छोड़ने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं—लेकिन वास्तव में, परमेश्वर ने उन्हें छोड़ा नहीं था। ऐसे लोगों में परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई भाव नहीं होता। वे लोग कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील होते हैं, परमेश्वर का उद्धार छोड़ने के लिए इस हद तक चले जाते हैं। क्या उनके अंदर वास्तव में विवेक होता है? कभी-कभी परमेश्वर लोगों को छोड़ देता है, उन्हें दर-किनार कर देता है ताकि वे आत्म-चिंतन कर सकें, लेकिन परमेश्वर ने उन्हें वास्तव में नहीं छोड़ा नहीं होता है; वह उन्हें केवल पश्चाताप करने का अवसर दे रहा है, उनका सचमुच त्याग नहीं कर रहा है। परमेश्वर सही मायने में केवल मसीह-विरोधियों और दुष्टों का ही त्याग करता है जो अनेक बुरे कामों में लिप्त रहते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “मैं पवित्र आत्मा के कार्य से वंचित महसूस करता हूँ और मैं लंबे समय से पवित्र आत्मा के प्रबोधन से भी वंचित हूँ। क्या परमेश्वर ने मुझे छोड़ दिया है? यह एक गलत धारणा है। तुम कहते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ दिया है, वह तुम्हें नहीं बचाएगा, तो क्या उसने तुम्हारा अंत तय कर दिया है? कई बार ऐसा होता जब तुम पवित्र आत्मा के कार्य को महसूस नहीं कर पाते, लेकिन क्या परमेश्वर ने तुम्हें अपने वचन पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया है? तुम्हारे अंदर सामान्य मानवीय विचार हैं और तुम्हारे लिए उद्धार का मार्ग बंद नहीं किया गया है, इसलिए तुम दुःखी क्यों होते हो? लोग अच्छी अवस्था में नहीं हैं, और वे इसे सुधारने के लिए सत्य की खोज भी नहीं करते, बल्कि हर समय परमेश्वर को ही दोष देते रहते हैं, वे कहते, "परमेश्वर, तुझे मेरी आवश्यकता नहीं है, इसलिए मुझे भी तेरी आवश्यकता नहीं है।" यह अनुचित है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता हूँ मानो कि परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया हो, या परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं बस हर एक व्यक्ति को बिना किसी ग़लतफ़हमी या बोझके, केवल सत्य की खोज करने और परमेश्वर को समझने की खोज करने के मार्ग पर अटल इच्छा के साथ दृढ़ता से आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ। चाहे तुमने कोई भी ग़लतियाँ क्यों न की हो, चाहे तुम कितनी दूर तक भटक क्यों न गए हो या तुमने कितने गंभीर अपराध क्यों न किए हों, इन्हें अपना बोझ या अतिरिक्त सामान मत बनने दो जिन्हें तुम्हें परमेश्वर को समझने की अपनी खोज में ढोना पड़ता है। निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। हर वक्त, परमेश्वर मनुष्य के उद्धार को अपने हृदय में रखता है; यह कभी नहीं बदलता है। यह परमेश्वर के सार का सबसे अधिक मूल्यवान हिस्सा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

हमें संकल्प लेना चाहिए कि हमारी परिस्थितियाँ चाहे जितनी गंभीर हों, चाहे जिस प्रकार की कठिनाई हम पर टूटें, हम चाहे जितने कमज़ोर हों, या जितने नकारात्मक हों, हमें न तो स्वभावगत परिवर्तन में, और न ही परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों में अपना विश्वास खोना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य से एक वादा किया था, और यह वादा प्राप्त करने का संकल्प और लगन मनुष्य के पास होनी ही चाहिए। परमेश्वर कायरों को पसंद नहीं करता है, परमेश्वर संकल्पवान लोगों को पसंद करता है। हो सकता है कि तुमने बहुत भ्रष्टता प्रकट की हो, तुम कई कुटिल राहों पर चले हो, या कई उल्लंघन किए हों, या पहले परमेश्वर की अवज्ञा की हो; वैकल्पिक रूप से, हो सकता है कुछ लोगों के दिलों में परमेश्वर के प्रति निंदा, या शिकायतें, या अवज्ञा हो—लेकिन परमेश्वर इन चीज़ों को नहीं देखता है, परमेश्वर केवल यह देखता है कि क्या वे किसी दिन बदलेंगे या नहीं। बाइबल में, अपव्ययी पुत्र की वापसी के बारे में एक कहानी है। प्रभु यीशु ने ऐसी एक नीतिकथा क्यों सुनाई? मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की इच्छा सच्ची और खरी है। वह लोगों को पश्चाताप करने के अवसर और बदलने के अवसर देता है। इस प्रक्रिया के दौरान, वह लोगों को समझता है और उसे उनकी कमज़ोरियों और उनकी भ्रष्टता के विस्तार का गहरा ज्ञान होता है। वह जानता है कि वे लड़खड़ाएँगे और गिरेंगे। यह वैसा ही है जब बच्चे चलना सीखते हैं : तुम्हारा शरीर चाहे जितना भी मज़बूत हो, ऐसे समय होंगे जब तुम लड़खड़ा जाते हो, और ऐसे भी समय होंगे जब तुम ठोकर खाकर गिर जाते हो। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को वैसे ही समझता है जैसे माँ अपने बच्चे को समझती है। वह प्रत्येक व्यक्ति की कठिनाइयाँ समझता है, वह प्रत्येक व्यक्ति की कमज़ोरियाँ समझता है, और वह प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताएँ भी समझता है; इतना ही नहीं, वह समझता है कि स्वभावगत परिवर्तन में प्रवेश करने की प्रक्रिया में लोग कैसी समस्याओं का सामना करेंगे, वे किस प्रकार की कमज़ोरियों का नुक़सान उठाएँगे, किस प्रकार की विफलताएँ आएँगी—ऐसा कुछ नहीं है जो परमेश्वर इससे बेहतर समझता हो। इस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के अंतर्तम हृदय को सूक्ष्मता से देखता है। तुम चाहे जितने कमज़ोर हो, जब तक तुम परमेश्वर का नाम त्यागते नहीं हो, जब तक तुम परमेश्वर को छोड़कर नहीं जाते हो, और जब तक तुम उसके मार्ग से भटकते नहीं हो, तब तक स्वभावगत परिवर्तन प्राप्त करने का अवसर सदैव तुम्हारे पास होगा। हमारे पास स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने का अवसर होने का अर्थ यह है कि हमारे पास बचे रहने की आशा है, और हमारे पास बचे रहने की आशा होने का अर्थ यह है कि हमारे पास परमेश्वर के उद्धार की आशा है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या होते हैं स्वभाव में परिवर्तन, और स्वभाव में परिवर्तनों का मार्ग' से उद्धृत

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