165. परमेश्वर द्वारा मानव जाति को यथासंभव अधिकतम बचा लेने के सिद्धांत

(1) मानवजाति भ्रष्टता के कीचड़ में इतनी गहराई से धंस गई है कि थोड़ी-सी भी ग़लत धारणा या ग़लतफ़हमी उन्हें परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने को उद्यत कर देती है। फिर भी, जब तक आशा की एक भी किरण होती है, तब तक परमेश्वर उन्हें त्यागता नहीं है।

(2) जब तक कोई स्वयं को जान सकता है, और जब तक वह वास्तव में पश्चाताप और परिवर्तन कर सकता है, तब तक परमेश्वर उसके पिछले अपराधों को याद नहीं करेगा, चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हों।

(3) उस समय की अवधि में जब परमेश्वर अपने कार्यों को करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है, वह किसी पर सज़ा को आसानी से नहीं ले आता है, बल्कि जब तक हो सके वह सहनशील रहता है। वह लोगों को पश्चाताप करने के अवसर देता है।

(4) जिन्हें परमेश्वर बचाता है वे अच्छे लोग होते हैं जो वास्तव में उसमें विश्वास करते हैं। वह मसीह-विरोधियों, दुष्ट लोगों, गंदे राक्षसों और बुरी आत्माओं से घृणा करता और उन्हें शाप देता है। जो लोग परमेश्वर से घृणा करते हैं, वे अवश्य ही नष्ट होंगे।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य उसे परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में सक्षम बनाना है, और ऐसा उनका उद्धार करने के लिए किया जाता है। इसलिए, मनुष्य का उद्धार करते समय, परमेश्वर उसे दंड देने का काम नहीं करता। मनुष्य के उद्धार के समय परमेश्वर न तो बुरे को दंडित करता है, न अच्छे को पुरस्कृत करता है, और न ही वह विभिन्न प्रकार के लोगों की मंज़िल प्रकट करता है। बल्कि, अपने कार्य के अंतिम चरण के पूरा होने के बाद ही वह बुरे को दंडित और अच्छे को पुरस्कृत करने का काम करेगा, और केवल तभी वह सभी प्रकार के लोगों के अंत को भी प्रकट करेगा। दंडित केवल वही लोग किए जाएँगे, जिन्हें बचाया जाना संभव नहीं है, जबकि बचाया केवल उन्हीं लोगों को जाएगा, जिन्होंने परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय उसका उद्धार प्राप्त कर लिया है। जब परमेश्वर द्वारा उद्धार का कार्य किया जा रहा होगा, उस समय यथासंभव हर उस व्यक्ति को बचा लिया जाएगा, जिसे बचाया जा सकता है, और उनमें से किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। जो लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार के दौरान अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला पाएँगे—और वे भी, जो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो पाएँगे—वे दंड के भागी होंगे। कार्य का यह चरण—वचनों का कार्य—लोगों के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोल देगा, जिन्हें वे नहीं समझते, ताकि वे परमेश्वर की इच्छा और स्वयं से परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ सकें, और अपने अंदर परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने की पूर्वापेक्षाएँ पैदा करके अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकें। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करता है, अगर लोग थोड़े विद्रोही हो जाएँ, तो वह उन्हें दंडित नहीं करता; क्योंकि यह उद्धार के कार्य का समय है। यदि विद्रोही ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा; हर व्यक्ति दंडित होकर रसातल में जा गिरेगा। मनुष्य का न्याय करने वाले वचनों का उद्देश्य उन्हें स्वयं को जानने और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने देना है; यह उन्हें इस तरह के न्याय से दंडित करना नहीं है। वचनों के कार्य के दौरान बहुत-से लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी विद्रोहशीलता और अवहेलना, और साथ ही अपनी अवज्ञा भी उजागर करेंगे। फिर भी, वह उन्हें दंडित नहीं करेगा, बल्कि केवल उन लोगों को अलग कर देगा, जो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। वह उनकी देह शैतान को दे देगा, और कुछ मामलों में, उनकी देह का अंत कर देगा। शेष लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने का अनुसरण और अनुभव करना जारी रखेंगे। यदि अनुसरण करते समय भी ये लोग निपटे जाने और काट-छाँट किए जाने को स्वीकार नहीं करते, और ज़्यादा पतित हो जाते हैं, तो वे उद्धार पाने के अपने अवसर से वंचित हो जाएँगे। वचनों द्वारा जीते जाने के लिए प्रस्तुत प्रत्येक व्यक्ति के पास उद्धार के लिए पर्याप्त अवसर होगा; उद्धार के समय परमेश्वर इन लोगों के प्रति परम उदारता दिखाएगा। दूसरे शब्दों में, उनके प्रति परम सहनशीलता दिखाई जाएगी। अगर लोग गलत रास्ता छोड़ दें और पश्चात्ताप करें, तो परमेश्वर उन्हें उद्धार प्राप्त करने का अवसर देगा। जब मनुष्य पहली बार परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, तो वह उन्हें मृत्युदंड नहीं देना चाहता; बल्कि, वह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करता है। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें दर-किनार कर देता है। कुछ लोगों को दंडित करने में परमेश्वर थोड़ा धीमा इसलिए चलता है क्योंकि वह हर उस व्यक्ति को बचाना चाहता है, जिसे बचाया जा सकता है। वह केवल वचनों से लोगों का न्याय करता है, उन्हें प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, वह उन्हें मारने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करता। मनुष्य को उद्धार दिलाने के लिए वचनों का प्रयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्त्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से उद्धृत

कुछ लोग कहते हैं : "मेरी प्रकृति अच्छी नहीं है, इसलिए मैं प्रकृति को अपना काम करने दूँगा! अगर मैं अपनी खोज में सफल नहीं हो पाता, तो इस बारे में कुछ नहीं किया जा सकता।" ऐसे लोग बेहद नकारात्मक होते हैं, यहाँ तक कि उन्होंने खुद से उम्मीद ही छोड़ दी है। इन लोगों को छुटकारा नहीं दिलाया जा सकता। क्या तुमने प्रयास किए हैं? अगर सच में तुमने प्रयास किए हैं, और तुम कष्ट सहने को तैयार हो, तो तुम दैहिक सुख क्यों नहीं त्याग सकते? क्या तुम दिल और दिमाग वाले व्यक्ति नहीं हो? तुम प्रतिदिन कैसे प्रार्थना करते हो? क्या तुम सत्य की खोज और परमेश्वर पर भरोसा नहीं कर सकते? तुम्हारे लिए प्रकृति को अपना काम करने देने का अर्थ है निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करना; तुम सक्रिय रूप से परमेश्वर के साथ कार्य करने का प्रयास नहीं करते। प्रकृति को अपना काम करने देना यह कहने के समान है, "मेरे कुछ भी करने का कोई लाभ नहीं है; सब-कुछ परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है।" क्या यह सचमुच परमेश्वर की इच्छा है? अगर नहीं, तो तुम परमेश्वर के साथ काम क्यों नहीं करते? छोटा-मोटा अपराध कर देने वाले कुछ लोग सोचते हैं : "क्या परमेश्वर ने मुझे उजागर कर दिया है और मुझे निकाल दिया है? क्या वह मुझे मार डालेगा?" इस बार परमेश्वर लोगों को मारने नहीं, बल्कि यथासम्भव उन्हें आया है। गलतियां किससे नहीं होतीं? अगर सभी को मार दिया जाए, तो फिर यह "उद्धार" कैसे होगा? कुछ अपराध जान-बूझकर किये जाते हैं, जबकि कुछ अनजाने में हो जाते हैं। अनजाने में हुये अपराधों को पहचानकर, तुम बदल सकते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हारे बदलने से पहले ही तुम्हें समाप्त कर देगा? क्या उस तरह से परमेश्वर लोगों को बचा सकता है? वह इस तरह काम नहीं करता! चाहे तुमसे अपराध अनजाने में हुआ हो या विद्रोही प्रकृति के कारण, तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि एक बार अपराध हो जाने पर, तुम्हें शीघ्रता करनी है, और वास्तविकता को पहचानकर आगे बढ़ना है; हालात कुछ भी हों, तुम्हें आगे बढ़ने का प्रयास करना है। परमेश्वर उद्धार का कार्य कर रहा है और वह जिन्हें बचाना चाहता है, उन्हें यूँ ही नहीं मार देगा। तुम चाहे किसी भी स्तर तक बदल पाने की स्थिति में हो, अगर अंत में परमेश्वर तुम्हें मार भी देता है, तो निश्चय ही उसका ऐसा करना धर्मितापूर्ण होगा; और जब समय आयेगा तो वह तुम्हें समझा देगा। इस समय तुम्हें सत्य के लिए प्रयास करना चाहिए, जीवन प्रवेश पर ध्यान देना चाहिए और सही तरीके से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए। इसमें कोई दोष नहीं है! अंतत:, परमेश्वर तुम्हारे साथ जैसा चाहे बर्ताव करे, वह हमेशा न्यायसंगत ही होता है; इस पर तुम्हें न तो संदेह करना चाहिये और न ही इसकी चिंता करनी चाहिये; भले ही इस समय तुम परमेश्वर की धार्मिकता न समझ पाओ, लेकिन वह दिन आयेगा जब तुम आश्वस्त हो जाओगे। परमेश्वर अपना कार्य प्रकाश में और न्यायसंगत ढंग से करता है; वह स्पष्ट रूप से सब कुछ ज्ञात करवाता है। अगर तुम लोग इस विषय पर ध्यान से चिंतन करो, तो तुम इस निष्कर्ष पर पहुँचोगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों को बचाना और उनके स्वभाव बदलना है। चूँकि उसका कार्य लोगों के स्वभाव बदलना है, इसलिए अगर लोग अपनी भ्रष्टता प्रकट न करें, तो कुछ नहीं किया जा सकता, और कुछ प्राप्त नहीं होगा। अपनी भ्रष्टता प्रकट करने के बाद अगर लोग जरा-भी पश्चात्ताप नहीं करते, और वैसा ही करते रहते हैं जैसा करते रहे हैं, तो वे परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाएंगे। परमेश्वर लोगों से विभिन्न मात्राओं में प्रतिशोध लेगा, और वे अपने अपराधों की कीमत चुकाएंगे। कभी-कभी तुम अनजाने ही स्वच्छंद हो जाते हो, और परमेश्वर तुम्हें इसका संकेत देता है, तुम्हारी काट-छाँट करता है, और तुमसे निपटता है। अगर तुम बदलकर बेहतर हो जाते हो, तो परमेश्वर तुम्हें जवाबदेह नहीं ठहराएगा। यह स्वभाव-परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया है, और उद्धार के कार्य का वास्तविक महत्व इस प्रक्रिया में प्रकट होता है। यह कुंजी है! उदाहरण के लिए, पुरुषों और महिलाओं के बीच की सीमाओं को लो : आज तुम आवेग में आकर किसी का हाथ पकड़ लेते हो, लेकिन घर लौटने के बाद तुम सोचते हो : "क्या यह अनैतिक व्यवहार नहीं था? क्या यह पाप नहीं था? क्या स्त्री और पुरुष के बीच की सीमाओं को तोड़ना परमेश्वर का अपमान नहीं है? मैंने ऐसा काम कैसे कर दिया?" इसे समझने के बाद तुम जल्दी से परमेश्वर के सामने जाते हो और प्रार्थना करते हो : "हे परमेश्वर! मैंने फिर से पाप किया है। मेरा ऐसा करना सत्य के विरुद्ध है, और मैं अपनी भ्रष्ट देह से घृणा करता हूँ।" तुम भविष्य में ऐसे मामले आने पर उनसे दूर रहने, और दूसरे व्यक्ति की उँगली छूने से भी बचने का संकल्प लेते हो। क्या यह बदलाव नहीं है? अगर तुम इस तरह से बदल जाते हो, तो क्या परमेश्वर फिर भी किसी का हाथ पकड़ने के लिए तुम्हारी निंदा करेगा? अगर तुम किसी का हाथ पकड़ते हो और महसूस करते हो कि ऐसा करना गलत था, फिर भी यह सोचकर परमेश्वर के सामने अपना पाप स्वीकार नहीं करते कि यह शर्मनाक बात नहीं है, और तुम खुद से घृणा नहीं करते, सतर्क नहीं होते या देह-सुख त्यागने का संकल्प नहीं करते, तो भविष्य में तुम किसी का केवल हाथ ही नहीं पकड़ोगे—तुम आलिंगन करोगे! मामला और भी गंभीर होता जाएगा, और तुमसे पाप करवाएगा, जिसके लिए परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा। तुम बार-बार पाप करोगे, और तुम बचाए नहीं जा सकोगे। अगर अनजाने में तुम थोड़ा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो, और बाद में वास्तव में पश्चात्ताप कर सकते हो, देह-सुख त्याग सकते हो, और सत्य को अभ्यास में ला सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारी निंदा नहीं करेगा, और तुम्हें अभी भी बचाया जा सकता है। परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए कार्य करता है, और लोगों की प्रकृति कुछ हद तक प्रकट होना अवश्यंभावी है; लेकिन तुम्हें समय पर पश्चात्ताप करने और बदलने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। क्या इससे परमेश्वर की इच्छा पूरी नहीं होगी? कुछ लोग ऐसा नहीं मानते और हमेशा परमेश्वर को सावधानी से देखते हैं। ऐसे लोग देर-सबेर भुगतेंगे।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, अतीत की घटनाएँ एक झटके में साफ की जा सकती हैं; अतीत के स्थान पर भविष्य को लाया जा सकता है; परमेश्वर की सहनशीलता समुद्र के समान असीम है। लेकिन इन वचनों में सिद्धांत भी निहित हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे द्वारा किए गए किसी भी पाप को मिटा देगा, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। परमेश्वर के समस्त कार्य के सिद्धांत हैं। इस मुद्दे को हल करने के लिए अतीत में एक प्रशासनिक आदेश दिया गया था—व्यक्ति द्वारा परमेश्वर का नाम स्वीकार करने से पहले किए गए सभी पापों को परमेश्वर माफ और क्षमा कर देता है, और जो लोग कलीसिया में प्रवेश करने के बाद भी पाप करते रहते हैं, उनका समाधान करने की एक प्रणाली है : जो कोई छोटा-मोटा पाप करता है, उसे पश्चात्ताप करने का मौका दिया जाता है, जबकि बार-बार पाप करने वालों को निष्कासित कर दिया जाता है। परमेश्वर ने हमेशा अपने कार्य में लोगों को यथासंभव अधिकतम सीमा तक सहन किया है, और इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य वास्तव में लोगों को बचाने का कार्य है। लेकिन अगर कार्य के इस अंतिम चरण में तुम अभी भी अक्षम्य पाप करते हो, तो तुम्हें वास्तव में बचाया नहीं जा सकता, और तुम बदल नहीं सकते। लोगों के स्वभाव शुद्ध करने और बदलने के लिए परमेश्वर के पास एक प्रक्रिया है। लोगों की भ्रष्ट प्रकृति की सतत अभिव्यक्ति और बदलाव की प्रक्रिया में परमेश्वर अपना उद्धार का लक्ष्य प्राप्त करता है। कुछ लोग सोचते हैं : "चूंकि यह मेरी प्रकृति है, इसलिए मैं इसे जितना संभव होगा, उजागर करूँगा, और इसके उजागर होने के बाद मैं इसे जानूँगा और सत्य को अभ्यास में लाऊँगा।" क्या यह प्रक्रिया आवश्यक है? अगर तुम वास्तव में सत्य को अभ्यास में लाने वाले व्यक्ति हो, और दूसरों के विभिन्न संघर्ष खुद में देखते हो, तो तुम खुद में उन्हीं व्यवहारों से बचने का कार्य करोगे। क्या यह अप्रत्यक्ष बदलाव नहीं है? कभी-कभी तुम्हारे मन में कुछ करने का विचार आता है, लेकिन इससे पहले कि तुम उसे करो, तुम्हें लगता है कि यह गलत है, और तुम उसे छोड़ देते हो। क्या इसका परिणाम तुम्हारा उद्धार नहीं है? प्रत्येक सत्य का अभ्यास एक प्रक्रिया है। जब व्यक्ति ने अपना अभ्यास शुरू ही किया होता है, तो गलतियों से मुक्ति और सटीकता उसी तरह से असंभव है, जैसे किसी अभ्यास का व्यक्ति की इच्छा से अदूषित होना। ऐसे कई मामले होते हैं, जिनसे तुम पूरी तरह से अपनी इच्छा के अनुसार निपटते हो, लेकिन निपटे और काट-छाँट किए जाने के बाद तुम अंततः पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा और वचनों के अनुसार अभ्यास करने लगोगे। यह बदलाव है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये' से उद्धृत

अनुग्रह के युग में, यह कहा गया था कि परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को बचाया जाए और वह नहीं चाहता कि किसी को भी विनाश का सामना करना पड़े। मानव जाति, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया था, उसे बचाने के प्रति परमेश्वर का ऐसा रवैया और ऐसी भावना है। यह परमेश्वर की इच्छा है, लेकिन वास्तव में, बहुत से लोग परमेश्वर का उद्धार स्वीकार नहीं करते; वे शैतान के हैं और उनको बचाया नहीं जाएगा। ये शब्द संपूर्ण मानव जाति के प्रति ईश्वर के रवैये को दर्शाते हैं: उसका प्रेम असीमित है, यह अतुलनीय रूप से विशाल है, यह शक्तिशाली है। लेकिन जो लोग सत्य से घृणा करते हैं, उनको वह मुक्त रूप से अपना प्रेम और उद्धार देने का अनिच्छुक है, न ही वह ऐसा कभी करेगा। यही परमेश्वर का रवैया है। सत्य से घृणा करना किसके तुल्य है? क्या यह खुद को परमेश्वर के खिलाफ स्थापित करना है? क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना है? क्या यह परमेश्वर को खुले तौर पर यह बताने के समान है, "तुझे जो भी कहना है उसे सुनने में मुझे कोई आनंद नहीं आता। अगर मुझे यह पसंद नहीं है, तो यह सत्य नहीं है, और मैं इसे सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करूँगा। यह केवल तभी सत्य होगा जब मैं इसे स्वीकार करूंगा और इसे पसंद करूंगा।" जब तुम्हारा सत्य के प्रति यह रवैया हो, तो क्या यह खुले तौर पर परमेश्वर से शत्रुता करना नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के प्रति खुले तौर पर शत्रुता रखते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बचाएगा? नहीं। यही बात परमेश्वर के क्रोध का कारण है। सत्य से घृणा करने वाले लोगों का सार परमेश्वर से शत्रुता का सार है। परमेश्वर इस सार वाले लोगों को आम लोग नहीं मानता; वह उन्हें दुश्मन मानता है, राक्षस मानता है, और उनको कभी नहीं बचाएगा। यह परमेश्वर के कोप की अभिव्यक्ति है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्‍य को उचित ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य की समझ अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है' से उद्धृत

परमेश्वर ने मनुष्य से घृणा की थी क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक गंभीर हद तक भ्रष्टता एवं अवज्ञा से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण और अपने सिद्धांतों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की और यहाँ तक कि वह मानवजाति के छुटकारे के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरंतर जीवित रह सकें। लेकिन, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरंतर परमेश्वर की अवज्ञा करता रहा और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इनकार किया; अर्थात् उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इनकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की या कैसे उनको सहन किया, मनुष्य ने न तो इसे समझा, न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य के प्रति अधिकतम सहनशील बना रहा था, इस इंतज़ार में कि मनुष्य ढर्रा बदलेगा। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात, परमेश्वर ने बिना किसी हिचकिचाहट के वह किया, जो उसे करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी जब परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनाई, तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत तक, एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया मनुष्य को ढर्रा बदलने योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी और यह वह आख़िरी मौका था, जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं प्रोत्साहन देने का कार्य किया था। चाहे परमेश्वर का हृदय कितनी भी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और भरपूर दया को जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा हो। यह वास्तविक, स्‍पर्शगम्‍य एवं प्रशंसनीय है, न कि जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता या झूठी छवियाँ नहीं बनाता कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना मनभावन है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग कभी नहीं करता। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या ये आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या ये संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिंदु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ : इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए खोखले शब्द मात्र है? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही है? नहीं! निश्चित रूप से नहीं! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं के हर विवरण को हर उस समय व्यावहारिक अभिव्यक्ति मिलती है, जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है और प्रत्येक व्यक्ति में पूर्ण एवं प्रतिबिंबित होते हैं। चाहे तुमने इसे पहले महसूस किया हो या नहीं, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति की हर संभव तरीके से देखभाल कर रहा है, वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने और प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

अतीत में, कुछ लोगों को बुरे कामों के लिए कलीसिया से निष्कासित किया जा चुका है, और उनके भाई और बहनों ने उन्हें ठुकरा दिया है। कुछ वर्ष इधर-उधर भटकने के बाद अब वे वापस आ गए हैं। यह अच्छी बात है कि उन्होंने परमेश्वर को पूरी तरह नहीं छोड़ा; इससे उन्हें बचाए जाने का अवसर और आशा मिलती है। अगर वे भाग खड़े होते और विश्वास करना छोड़ देते, अविश्वासियों जैसे बन जाते, तो वे पूरी तरह खत्म हो जाते। अगर वे अपने-आपको बदल सकते हैं, तो उनके लिए अब भी उम्मीद है; यह एक दुर्लभ और अनमोल बात है। चाहे परमेश्वर कैसा भी कदम उठाए, और चाहे वह लोगों के साथ कैसा भी व्यवहार करे, या उनसे घृणा करे या उन्हें नापसंद करे, अगर कोई ऐसा दिन आता है कि लोग खुद को बदल सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी; क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि लोगों के मन में अभी भी परमेश्वर के लिए थोड़ा-सा स्थान तो है, कि उन्होंने अपनी मानवीय समझ या अपनी मानवता पूरी तरह से नहीं खोई है, कि वे अभी भी परमेश्वर में विश्वास करना चाहते हैं, और उसके अस्तित्व को स्वीकार करके उसके सम्मुख लौटने का कम-से-कम थोड़ा-बहुत इरादा रखते हैं। चाहे कोई परमेश्वर को छोडकर चला गया हो, यदि वे वापस आते हैं, और परिवार के सदस्य की तरह महसूस करते हैं, तो मैं थोड़ा भावुक होकर कुछ सांत्वना पाऊँगा। लेकिन अगर वे कभी वापस नहीं लौटते, तो मैं इसे दयनीय समझूँगा। यदि वे वापस आकर परमेश्वर पर ईमानदारी से विश्वास करना शुरू कर सकते हैं, तो मेरा दिल विशेष रूप से संतुष्टि से भर जाएगा। जब तुम दूर चले गए, तो तुम निश्चित रूप से काफी नकारात्मक थे, और तुम खराब अवस्था में थे; पर अगर तुम अब वापस आ सकते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम्हें अभी भी परमेश्वर में आस्था है। लेकिन, तुम इसी तरह आगे भी चलते रह सकते हो या नहीं, यह अज्ञात है, क्योंकि लोग बहुत जल्दी बदल जाते हैं। अनुग्रह के युग में, यीशु में लोगों के लिए रहम और अनुग्रह था। यदि सौ में से एक भेड़ खो जाए, तो वह निन्यानबे को छोड़कर एक को खोजता था। यह पंक्ति किसी यांत्रिक विधि को नहीं दर्शाती है, न ही यह कोई नियम है, बल्कि यह मानव जाति के उद्धार को लेकर परमेश्वर के गहरे इरादे, और मानव जाति के लिए परमेश्वर के गहरे प्रेम को दर्शाता है। यह कोई काम करने का तरीका नहीं है, बल्कि यह उसका स्वभाव है और उसकी मानसिकता है। इसलिए, कुछ लोग छह महीने या साल भर के लिए चले जाते हैं, या बहुत-सी कमजोरियों या गलत धारणाओं के शिकार हैं, और फिर भी बाद में वास्तविकता के प्रति जागृत होने, ज्ञान प्राप्त करने, अपने-आपको बदलने और सही मार्ग पर लौटने की उनकी क्षमता मुझे खासतौर से सुकून देती है, और मुझे यह थोड़ा-सा आनंद देती है। आज के इस मौज-मस्ती और वैभवता के संसार में, और बुराई के इस युग में दृढ़ता से खड़े रहने के लिए सक्षम हो पाना, परमेश्वर को स्वीकार करने में सक्षम हो पाना, और सही रास्ते पर वापस लौट पाने में सक्षम हो पाना ऐसी चीजें हैं जो खुशी और रोमांच प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए बच्चों का पालन-पोषण करने को लो : चाहे तुम्हारे प्रति उनका व्यवहार संतानोचित हो या न हो, अगर वे तुम्हारा कोई संज्ञान लिए बिना घर छोड़कर चले जाएँ और कभी न लौटें, तो तुम्हें कैसा महसूस होगा? अपने दिल की गहराई में तुम तब भी उनकी चिंता करते रहोगे, और तुम हमेशा यह सोचोगे, "मेरा बेटा कब लौटेगा? मैं उसे देखना चाहता हूँ। आखिर वह मेरा बेटा है, और मैंने उसे यूं ही नहीं पाला-पोसा और प्यार किया।" तुम हमेशा इसी तरह सोचते रहे हो; तुम हमेशा उस दिन की बाट जोहते रहे हो। इस मामले में हर कोई इसी तरह महसूस करता है। आजकल लोगों की आध्यात्मिक कद-काठी बहुत छोटी है, पर वह दिन आएगा जब वे परमेश्वर की इच्छा को समझ जाएंगे, सिवा ऐसी स्थिति के कि उनमें विश्वास करने की रत्ती भर भी चाह न हो, और वे यह स्वीकार ही न करें कि वह परमेश्वर है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर से लगातार माँगते रहने वाले लोग सबसे कम विवेकशील होते हैं' से उद्धृत

लोग अपने अंत और गंतव्य और अपने कर्तव्य के समायोजन के प्रति तथा कर्तव्य से हटा दिए जाने के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। कुछ लोग अक्सर ऐसी चीजों के बारे में गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं, वे सोचते हैं कि जैसे ही वे अपने कर्तव्य से हटा दिए जाएँगे, और जब उनकी कोई हैसियत नहीं होगी या फिर परमेश्वर कहेगा कि वह उन्हें पसंद नहीं करता या अब उसे उनकी ज़रूरत नहीं है, तो यह उनका अंत होगा। वे लोग इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने का कोई मतलब नहीं है और उनका मानना है कि चूंकि उनका अंत अटल है और परमेश्वर को भी उनकी ज़रूरत नहीं है, इसलिए जीने का कोई अर्थ नहीं है। ऐसे विचार सुनकर, अन्य लोगों को वे तर्कसंगत और सम्मानजनक प्रतीत होते हैं-लेकिन असल में, यह कैसी मानसिकता है? यह परमेश्वर के प्रति विद्रोह है, यह पराजय है। उनकी पराजय का सार क्या है? यह इसकी अज्ञानता है कि परमेश्वर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। क्या परमेश्वर जानता है कि लोग निराश क्यों होजाते हैं? परमेश्वर ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है? कुछ लोगों का कहना है, "परमेश्वर ने मनुष्य के लिए इतना श्रमसाध्य मूल्य चुकाया है, उसने हर व्यक्ति में बहुत काम किया है और बहुत प्रयास किए हैं; परमेश्वर के लिए किसी व्यक्ति को चुनना और बचाना आसान नहीं है। अगर ऐसा व्यक्ति निराश हो जाएगा, तो परमेश्वर बहुत आहत होगा और हर दिन यही उम्मीद करेगा कि वह व्यक्ति उससे बाहर निकल आएगा।" यह अर्थ सतही स्तर पर है, लेकिन वास्तव में यह भी इंसान की ही अवधारणा है। परमेश्वर ऐसे लोगों के प्रति एक निश्चित रवैया अपनाता है: यदि तुम निराशा हो जाते हो और आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करते, तो वह कहता है कि अगर तुम वहीं रहना चाहते हो जहां हो, तो वहीं रहो; वह तुम पर दबाव नहीं डालेगा। यदि तुम कहते हो, "मैं अभी भी एक सृष्टिकर्ता का कर्तव्य निभाना चाहता हूं, मैं परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार अभ्यास करने और उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए सब-कुछ कर सकता हूं। मैं अपनी शक्ति और क्षमताओं के अनुसार सब-कुछ करूंगा; मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं का त्याग नहीं करूँगा," परमेश्वर कहता है कि यदि तुम इस तरह से जीने को तैयार हो, तो अनुसरण करते रहो, लेकिन परमेश्वर जैसा कहता है, वैसा करते रहो; परमेश्वर की अपेक्षाओं और सिद्धांतों के मानक नहीं बदलते। इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका मतलब है कि लोग ही अपना त्याग कर सकते हैं; परमेश्वर कभी किसी का त्याग नहीं करता। यदि कोई अंतत: उद्धार पाकर परमेश्वर को निहारता है, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाकर परमेश्वर के सामने आ सकता है, तो ऐसा असफल होने पर या एक ही बार में उसकी काट-छाँट होने पर हासिल नहीं किया जा सकता या एक ही बार उसका न्याय करने और ताड़ना देने पर हासिल नहीं किया जा सकता। पतरस को पूर्ण बनाने से पहले, उसका सैकड़ों बार शोधन किया गया था। जो लोग सेवा प्रदान करने के बाद अंत तक बने रहते हैं, उनमें से ऐसा एक भी नहीं होगा जिसने अंत तक बने रहने से पहले आठ या दस बार ही परीक्षणों और शुद्धिकरण का अनुभव किया हो। क्या यह परमेश्वर का प्रेम नहीं है? यह मनुष्य के प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के एक वचन के कारण, लोग अक्सर सोच लेते हैं कि परमेश्वर उनके बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंच गया है और उसने उन्हें त्याग दिया है—और इसके परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते। वास्तव में, तुम्हें समझ ही नहीं है कि त्यागना क्या होता है; तुम्हारा अपने देह-सुखों का त्याग करना ही असली त्याग है। कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें जिन वचनों से परिभाषित करता है, वे मात्र गुस्से में बोले गए होते हैं; वह न तो तुम्हारे बारे में कोई निष्कर्ष निकाल रहा होता है और न ही तुम्हारी निंदा कर रहा होता है, यह उसकी अंतिम सजा तो बिल्कुल नहीं होती। वह तुम्हारा अंतिम गंतव्य निर्धारित नहीं कर रहा है। ये मात्र ऐसे वचन होते हैं जो तुम्हारा न्याय करते हैं और तुमसे निपटते हैं। ये तुम्हारे लिए परमेश्वर की उत्कट आशाओं की बात करते हैं, ये तुम्हें याद दिलाने और चेतावनी देने वाले वचन होते हैं और ये परमेश्वर के हृदय से निकले वचन होते हैं। फिर भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो न्याय के इन वचनों के कारण पतित होकर परमेश्वर को त्याग देते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो थोड़े समय के लिए कमजोर पड़ जाते हैं और परमेश्वर के सामने आ कर कहते हैं, "ऐसा नहीं चलेगा। मुझे आगे बढ़ते रहना चाहिए और जैसा परमेश्वर कहे वैसा करना चाहिए। यदि लोग सृष्टिकर्ता को छोड़ देते हैं, तो उनका जीवन जीने लायक नहीं रह जाता है। एक सृजित प्राणी की सार्थकता को जीने के लिए, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करते रहना चाहिए।" तो वे परमेश्वर का अनुसरण कैसे कर सकते हैं? उनका अनुसरण वैसा नहीं होना चाहिए, जैसा पहले था। पहले वे अपने कर्तव्य में निष्ठावान नहीं थे। वे काट-छाँट और निपटे जाने को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, थोड़ा कष्ट सहते ही शिकायत करने लगते थे। तुम्हें अब उस मार्ग पर नहीं चलना चाहिए, तुम्हें दूसरे साधनों से अनुसरण करना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के कहे अनुसार चलना चाहिए। अगर परमेश्वर कहता है कि तुम गलत हो, तो तुम्हें अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचकर, परमेश्वर के खिलाफ खड़े नहीं हो जाना चाहिए; तुम्हें समर्पित होकर स्वीकार कर लेना चाहिए कि तुम गलत हो। क्या यह अभ्यास का मार्ग नहीं है? जब लोगों के पास अभ्यास का मार्ग होता है, तो क्या वे भटककर परमेश्वर से दूर चले जाते हैं? कभी-कभी ऐसा भी होता है जब लोग मानते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया है—लेकिन वास्तव में, परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ा नहीं है, वह सिर्फ तुमसे घृणा करता है और तुम पर ध्यान नहीं देना चाहता। लेकिन उसने सच में तुम्हें छोड़ा नहीं है। ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य का निर्वहन करने का प्रयास करते हैं, लेकिन उनके सार और उनमें प्रकट होने वाली विभिन्न चीजों के कारण, परमेश्वर वास्तव में उनका त्याग कर देता है; वे वास्तव में चुने नहीं गए थे, बल्कि उन्होंने कुछ समय के लिए सेवा प्रदान की थी। जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें परमेश्वर अनुशासित करने, ताड़ना देने और उनका न्याय करने की पूरी कोशिश करता है; वह उन लोगों से पेश आने के ऐसे विभिन्न तरीके आजमाता है जो मनुष्य की अवधारणाओं से मेल नहीं खाते। कुछ लोग समझ नहीं पाते और सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें निशाना बनाकर आहत कर रहा है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर के सामने जीने की कोई गरिमा नहीं है, वे परमेश्वर को किसी भी तरह से और दुखी नहीं करना चाहते और परमेश्वर को छोड़ने का दायित्व खुद पर ले लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनके जीने का तरीका समझदारी भरा है, इसलिए वे परमेश्वर को छोड़ने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं—लेकिन वास्तव में, परमेश्वर ने उन्हें छोड़ा नहीं था। ऐसे लोगों में परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई भाव नहीं होता। वे लोग कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील होते हैं, परमेश्वर का उद्धार छोड़ने के लिए इस हद तक चले जाते हैं। क्या उनके अंदर वास्तव में विवेक होता है? कभी-कभी परमेश्वर लोगों को छोड़ देता है, उन्हें दर-किनार कर देता है ताकि वे आत्म-चिंतन कर सकें, लेकिन परमेश्वर ने उन्हें वास्तव में नहीं छोड़ा नहीं होता है; वह उन्हें केवल पश्चाताप करने का अवसर दे रहा है, उनका सचमुच त्याग नहीं कर रहा है। परमेश्वर सही मायने में केवल मसीह-विरोधियों और दुष्टों का ही त्याग करता है जो अनेक बुरे कामों में लिप्त रहते हैं। कुछ लोग कहते हैं, "मैं पवित्र आत्मा के कार्य से वंचित महसूस करता हूँ और मैं लंबे समय से पवित्र आत्मा के प्रबोधन से भी वंचित हूँ। क्या परमेश्वर ने मुझे छोड़ दिया है?" यह एक गलत धारणा है। तुम कहते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ दिया है, वह तुम्हें नहीं बचाएगा, तो क्या उसने तुम्हारा अंत तय कर दिया है? कई बार ऐसा होता जब तुम पवित्र आत्मा के कार्य को महसूस नहीं कर पाते, लेकिन क्या परमेश्वर ने तुम्हें अपने वचन पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया है? तुम्हारे अंदर सामान्य मानवीय विचार हैं और तुम्हारे लिए उद्धार का मार्ग बंद नहीं किया गया है, इसलिए तुम दुःखी क्यों होते हो? लोग अच्छी अवस्था में नहीं हैं, और वे इसे सुधारने के लिए सत्य की खोज भी नहीं करते, बल्कि हर समय परमेश्वर को ही दोष देते रहते हैं, वे कहते, "परमेश्वर, तुझे मेरी आवश्यकता नहीं है, इसलिए मुझे भी तेरी आवश्यकता नहीं है।" यह अनुचित है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (1)' से उद्धृत

मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता हूँ मानो कि परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया हो, या परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं बस हर एक व्यक्ति को बिना किसी ग़लतफ़हमी या बोझके, केवल सत्य की खोज करने और परमेश्वर को समझने की खोज करने के मार्ग पर अटल इच्छा के साथ दृढ़ता से आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ। चाहे तुमने कोई भी ग़लतियाँ क्यों न की हो, चाहे तुम कितनी दूर तक भटक क्यों न गए हो या तुमने कितने गंभीर अपराध क्यों न किए हों, इन्हें अपना बोझ या अतिरिक्त सामान मत बनने दो जिन्हें तुम्हें परमेश्वर को समझने की अपनी खोज में ढोना पड़ता है। निरन्तर आगे बढ़ते जाओ। हर वक्त, परमेश्वर मनुष्य के उद्धार को अपने हृदय में रखता है; यह कभी नहीं बदलता है। यह परमेश्वर के सार का सबसे अधिक मूल्यवान हिस्सा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

हमें संकल्प लेना चाहिए कि हमारी परिस्थितियाँ चाहे जितनी गंभीर हों, चाहे जिस प्रकार की कठिनाई हम पर टूटें, हम चाहे जितने कमज़ोर हों, या जितने नकारात्मक हों, हमें न तो स्वभावगत परिवर्तन में, और न ही परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों में अपना विश्वास खोना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य से एक वादा किया था, और यह वादा प्राप्त करने का संकल्प और लगन मनुष्य के पास होनी ही चाहिए। परमेश्वर कायरों को पसंद नहीं करता है, परमेश्वर संकल्पवान लोगों को पसंद करता है। हो सकता है कि तुमने बहुत भ्रष्टता प्रकट की हो, तुम कई कुटिल राहों पर चले हो, या कई उल्लंघन किए हों, या पहले परमेश्वर की अवज्ञा की हो; वैकल्पिक रूप से, हो सकता है कुछ लोगों के दिलों में परमेश्वर के प्रति निंदा, या शिकायतें, या अवज्ञा हो—लेकिन परमेश्वर इन चीज़ों को नहीं देखता है, परमेश्वर केवल यह देखता है कि क्या वे किसी दिन बदलेंगे या नहीं। बाइबल में, अपव्ययी पुत्र की वापसी के बारे में एक कहानी है। प्रभु यीशु ने ऐसी एक नीतिकथा क्यों सुनाई? मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की इच्छा सच्ची और खरी है। वह लोगों को पश्चाताप करने के अवसर और बदलने के अवसर देता है। इस प्रक्रिया के दौरान, वह लोगों को समझता है और उसे उनकी कमज़ोरियों और उनकी भ्रष्टता के विस्तार का गहरा ज्ञान होता है। वह जानता है कि वे लड़खड़ाएँगे और गिरेंगे। यह वैसा ही है जब बच्चे चलना सीखते हैं : तुम्हारा शरीर चाहे जितना भी मज़बूत हो, ऐसे समय होंगे जब तुम लड़खड़ा जाते हो, और ऐसे भी समय होंगे जब तुम ठोकर खाकर गिर जाते हो। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को वैसे ही समझता है जैसे माँ अपने बच्चे को समझती है। वह प्रत्येक व्यक्ति की कठिनाइयाँ समझता है, वह प्रत्येक व्यक्ति की कमज़ोरियाँ समझता है, और वह प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताएँ भी समझता है; इतना ही नहीं, वह समझता है कि स्वभावगत परिवर्तन में प्रवेश करने की प्रक्रिया में लोग कैसी समस्याओं का सामना करेंगे, वे किस प्रकार की कमज़ोरियों का नुक़सान उठाएँगे, किस प्रकार की विफलताएँ आएँगी—परमेश्वर को इसकी पूर्ण समझ है। इस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के अंतर्तम हृदय को सूक्ष्मता से देखता है। तुम चाहे जितने कमज़ोर हो, जब तक तुम परमेश्वर का नाम त्यागते नहीं हो, जब तक तुम परमेश्वर को छोड़कर नहीं जाते हो, और जब तक तुम उसके मार्ग से भटकते नहीं हो, तब तक स्वभावगत परिवर्तन प्राप्त करने का अवसर सदैव तुम्हारे पास होगा। हमारे पास स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने का अवसर होने का अर्थ यह है कि हमारे पास बचे रहने की आशा है, और हमारे पास बचे रहने की आशा होने का अर्थ यह है कि हमारे पास परमेश्वर के उद्धार की आशा है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या होते हैं स्वभाव में परिवर्तन, और स्वभाव में परिवर्तनों का मार्ग' से उद्धृत

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