42. परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाने के सिद्धांत

(1) परमेश्वर केवल उन लोगों को पूर्ण बनाता है जो परमेश्वर के प्रति हार्दिक प्रेम के साथ, निष्ठापूर्वक सत्य से प्रेम और उसका अनुसरण करते हैं। जो अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम नहीं करता, उसे कभी भी पूर्ण नहीं किया सकता।

(2) परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से व्यक्त अपने धार्मिक स्वभाव के द्वारा लोगों को पूर्ण करता है, और उन वचनों में, मनुष्य को स्वयं को जानने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे सच्चे पश्चाताप और परिवर्तन का उदय होता है।

(3) परमेश्वर लोगों को न्याय और ताड़ना, काट-छाँट और निपटारे, तथा परीक्षण और शोधन के माध्यम से पूर्ण बनाता है जिससे मनुष्य परमेश्वर के ज्ञान तक ले जाया जाता है और उसके स्वभाव में एक परिवर्तन लाया जाता है।

(4) परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, ईमानदारी से स्वयं को खपाओ, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की पूरी कोशिश करो, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के द्वारा सत्य का अनुसरण करो।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर अब एक विशेष लोगों के समूह को प्राप्त करना चाहता है, ऐसा समूह जिसमें वे लोग शामिल हैं जो उसके साथ सहयोग करने का प्रयास करते हैं, जो उसके कार्य का पालन कर सकते हैं, जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर द्वारा बोले हुए वचन सत्य हैं, जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को अपने अभ्यास में ला सकते हैं; ये वे लोग हैं जिनके हृदयों में सच्ची समझ है, ये वे लोग हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है, और वे निःसंदेह पूर्णता के पथ पर चलने में समर्थ होंगे। जिन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ के बिना हैं, जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हैं, जो उसके वचनों पर कोई ध्यान नहीं देते, और जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं है। जो देहधारी परमेश्वर पर संदेह करते हैं, उसके बारे में हमेशा अनिश्चित रहते हैं, उसके वचनों को कभी भी गंभीरता से नहीं लेते हैं, और हमेशा उसे धोखा देते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और शैतान के संबंधी हैं; ऐसे लोगों को परिपूर्ण बनाने का कोई तरीका नहीं है।

यदि तू पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो पहले तुझ पर परमेश्वर द्वारा कृपा की जानी चाहिए, क्योंकि वह उन्हें पूर्ण बनाता है, जिन पर वह कृपा करता है, जो उसके हृदय के अनुसार होते हैं। यदि तू परमेश्वर के हृदय के अनुसार होना चाहता है, तो तेरे पास ऐसा हृदय अवश्य होना चाहिए जो उसके कार्यों का पालन करता हो, तुझे सत्य का अनुसरण करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए, और तुझे सभी बातों में परमेश्वर की छानबीन को अवश्य स्वीकार करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

परमेश्वर उसमें कार्य करता है जो परमेश्वर के वचनों को संजोते और उसका अनुसरण करते हैं। जितना तू परमेश्वर के वचनों को संजोयेगा, उतना ही उसका आत्मा तुझमें कार्य करेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जितना ज्यादा संजोता है, उसका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का मौका उतना ही ज्यादा होता है। परमेश्वर उसे पूर्ण बनाता है, जो वास्तव में उससे प्यार करता है। वह उसको पूर्ण बनाता है, जिसका हृदय उसके सम्मुख शांत रहता है। परमेश्वर के सभी कार्य को संजोना, उसकी प्रबुद्धता को संजोना, परमेश्वर की उपस्थिति को संजोना, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को संजोना, इस बात को संजोना कि कैसे परमेश्वर के वचन तेरे जीवन की वास्तविकता बन जाते हैं और तेरे जीवन की आपूर्ति करते हैं—यह सब परमेश्वर के दिल के सबसे अनुरूप है। यदि तू परमेश्वर के कार्य को संजोता है, अर्थात यदि उसने तुझ पर जो सारे कार्य किए हैं, तू उसे संजोता है, तो वह तुझे आशीष देगा और जो कुछ तेरा है उसे बहुगुणित करेगा। यदि तू परमेश्वर के वचनों को नहीं संजोता है, तो परमेश्वर तुझ पर कार्य नहीं करेगा, बल्कि वह केवल तेरे विश्वास के लिए ज़रा-सा अनुग्रह देगा, या तुझे कुछ धन की आशीष या तेरे परिवार के लिए थोड़ी सुरक्षा देगा। परमेश्वर के वचनों को अपनी वास्तविकता बनाने, उसे संतुष्ट करने और उसके दिल के अनुसार होने के लिए तुझे कडा प्रयास करना चाहिए; तुझे केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने का ही प्रयास नहीं करना चाहिए। विश्वासियों के लिए परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने, पूर्णता पाने, और परमेश्वर की इच्छा पर चलनेवालों में से एक बनने की अपेक्षा कुछ भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। यह वो लक्ष्य है जिसे पूरा करने का तुझे प्रयास करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

आज, परमेश्वर ने आधिकारिक रूप से इंसान को पूर्ण करने का कार्य आरंभ कर दिया है। पूर्ण बनाए जाने के लिए, लोगों को उसके वचनों के प्रकाशन, न्याय और ताड़ना से गुज़रना होगा, उन्हें उसके वचनों के परीक्षणों और शुद्धिकरण का अनुभव करना होगा (जैसे सेवाकर्ताओं के परीक्षण), और उन्हें मृत्यु के परीक्षणों को सहन करने योग्य बनना होगा। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षणों के मध्य, जो लोग सचमुच परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं, वही अपने दिल की गहराइयों से परमेश्वर की स्तुति कर पाते हैं, पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाते हैं और स्वयं का त्याग कर पाते हैं, इस तरह वे लोग परमेश्वर को सच्चे, पूरे और शुद्ध हृदय से प्रेम करते हैं; ऐसा व्यक्ति पूर्ण होता है, और ठीक यही काम परमेश्वर करना चाहता है, और इसी काम को वह करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के चरणों के विषय में' से उद्धृत

अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का उपयोग मुख्यत: मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है। वह मनुष्य का दमन करने या उन्हें कायल करने के लिए संकेतों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता; यह परमेश्वर के सामर्थ्य को स्पष्ट नहीं कर सकता। यदि परमेश्वर केवल संकेत और चमत्कार दिखाता, तो परमेश्वर की वास्तविकता स्पष्ट करना असंभव होता, और इस तरह मनुष्य को पूर्ण बनाना भी असंभव होता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों से मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, अपितु उसे सींचने और उसकी चरवाही करने के लिए वचन का उपयोग करता है, जिसके बाद मनुष्य की पूर्ण आज्ञाकारिता हासिल होती है और मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है। यही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और बोले जाने वाले वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए संकेत एवं चमत्कार दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता—वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों और कार्य की कई भिन्न विधियों का उपयोग करता है। चाहे वह शुद्धिकरण, व्यवहार, काँट-छाँट या वचनों का पोषण हो, मनुष्य को पूर्ण बनाने और उसे परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का और अधिक ज्ञान देने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलता है। ... मैं पहले कह चुका हूँ कि पूर्व से विजेताओं का एक समूह प्राप्त किया जा रहा है, ऐसे विजेताओं का, जो भारी क्लेश के बीच से आते हैं। इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका अर्थ है कि केवल इन प्राप्त किए गए लोगों ने ही न्याय और ताड़ना, और व्यवहार और काँट-छाँट, और सभी प्रकार के शुद्धिकरण से गुजरने के बाद वास्तव में आज्ञापालन किया। इन लोगों का विश्वास अस्पष्ट और अमूर्त नहीं, बल्कि वास्तविक है। उन्होंने कोई संकेत और चमत्कार, या अचंभे नहीं देखे हैं; वे गूढ़ शाब्दिक अर्थों और सिद्धांतों या गहन अंर्तदृष्टियों की बात नहीं करते; इसके बजाय उनके पास वास्तविकता और परमेश्वर के वचन और परमेश्वर की वास्तविकता का सच्चा ज्ञान है। क्या ऐसा समूह परमेश्वर के सामर्थ्य को स्पष्ट करने में अधिक सक्षम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? यह उसके धार्मिक स्वभाव द्वारा पूरी होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल हैं, और वह मनुष्य को प्राथमिक रूप से न्याय द्वारा पूर्ण बनाता है। कुछ लोग नहीं समझते और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। वे कहते हैं, "यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे पूर्ण बनाया जा सकता है?" ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञा को शापित करता है और वह मनुष्य के पापों का न्याय करता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय द्वारा वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है। मनुष्य की देह पापमय और शैतान की है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना की पात्र है। इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों से उसका सामना और हर प्रकार का शोधन परम आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावी हो सकता है।

परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों से यह देखा जा सकता है कि उसने मनुष्य की देह को पहले ही दोषी ठहरा दिया है। क्या ये वचन फिर शाप के वचन नहीं हैं? परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन मनुष्य के असली रंग को प्रकट करते हैं, और ऐसे प्रकाशनों द्वारा उसका न्याय किया जाता है, और जब वह देखता है कि वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ है, तो वह अपने भीतर शोक और ग्लानि अनुभव करता है, वह महसूस करता है कि वह परमेश्वर का बहुत ऋणी है, और परमेश्वर की इच्छा के लिए अपर्याप्त है। ऐसा समय भी होता है जब पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से अनुशासित करता है, और यह अनुशासन परमेश्वर के न्याय से आता है; ऐसा समय भी होता है जब परमेश्वर तुम्हारा तिरस्कार करता है और अपना चेहरा तुमसे छुपा लेता है, जब वह कोई ध्यान नहीं देता, और तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करता, और तुम्हें शुद्ध करने के लिए बिना आवाज के तुम्हें ताड़ना देता है। मनुष्य में परमेश्वर का कार्य प्राथमिक रूप से अपने धार्मिक स्वभाव को स्पष्ट करने के लिए होता है। मनुष्य अंततः कैसी गवाही परमेश्वर के बारे में देता है? वह गवाही देता है कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है, उसके स्वभाव में धार्मिकता, क्रोध, ताड़ना और न्याय शामिल हैं; मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की गवाही देता है। परमेश्वर अपने न्याय का प्रयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है, वह मनुष्य से प्रेम करता रहा है और उसे बचाता रहा है—परंतु उसके प्रेम में कितना कुछ शामिल है? उसमें न्याय, भव्यता, क्रोध, और शाप है। यद्यपि आतीत में परमेश्वर ने मनुष्य को शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को अथाह कुण्ड में नहीं फेंका था, बल्कि उसने उस माध्यम का प्रयोग मनुष्य के विश्वास को शुद्ध करने के लिए किया था; उसने मनुष्य को मार नहीं डाला था, बल्कि उसने मनुष्य को पूर्ण बनाने का कार्य किया था। देह का सार वह है जो शैतान का है—परमेश्वर ने इसे बिलकुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर द्वारा कार्यान्वित वास्तविकताएँ उसके वचनों के अनुसार पूरी नहीं हुई हैं। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम कर सको, ताकि तुम देह के सार को जान सको; वह तुम्हें इसलिए ताड़ना देता है कि तुम जागृत हो जाओ, तुम अपने भीतर की कमियों को जान सको और मनुष्य की संपूर्ण अयोग्यता को जान लो। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसकी भव्यता और क्रोध—ये सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए हैं। वह सब जो परमेश्वर आज करता है, और अपना धार्मिक स्वभाव जिसे वह तुम लोगों के भीतर स्पष्ट करता है—यह सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए है। परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण जितना बड़ा होता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की यातना उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है, वे परमेश्वर के समक्ष अधिक शांत रह सकते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध और अधिक निकटता का हो जाता है, और वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को और अच्छी तरह से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शुद्धिकरण से होकर गुजरना होगा; केवल इस प्रक्रिया से गुजरने और इस कदम पर निर्भर रहने के माध्यम से ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे। शुद्धिकरण वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शुद्धिकरण और कड़वे परीक्षण ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं। कठिनाई के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच में शुद्धिकरण के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शुद्धिकरण किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और कि तुम उन अनेक समस्याओं पर काबू पाने में असमर्थ हो, जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञा कितनी बड़ी है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच जान पाते हैं; और परीक्षण लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

यदि तुम पर कई चीजें आ पड़ती हैं जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, परन्तु फिर भी तुम उन्हें एक ओर करने और इन चीज़ों से परमेश्वर के कार्यों का ज्ञान पाने में समर्थ हो, और शुद्धिकरण के बीच तुम परमेश्वर के प्रति प्यार से भरा अपना हृदय प्रकट करते हो, तो यह गवाह होना है। यदि तुम्हारा घर शांतिपूर्ण है, तुम देह के आराम का आनंद लेते हो, कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं करता है, और कलीसिया में तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारा आज्ञापालन करते हैं, तो क्या तुम परमेश्वर के लिए प्यार से भरा अपना हृदय प्रदर्शित कर सकते हो? क्या यह परिस्थिति तुम्हारा शुद्धिकरण कर सकती है? यह केवल शुद्धिकरण के माध्यम से है कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्यार दर्शाया जा सकता है, और केवल तुम्हारी धारणाओं के विपरीत घटित होने वाली चीज़ों के माध्यम से ही तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो। कई नकारात्मक और विपरीत चीज़ों की सेवा और शैतान के तमाम प्रकटीकरणों—उसके कामों, आरोपों और उसकी बाधाओं और धोखों के माध्यम से परमेश्वर तुम्हें शैतान का भयानक चेहरा साफ़-साफ़ दिखाता है और इस प्रकार शैतान को पहचानने की तुम्हारी क्षमता को पूर्ण बनाता है, ताकि तुम शैतान से नफ़रत करो और उसे त्याग दो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

पवित्र आत्मा के पास प्रत्येक व्यक्ति में चलने के लिए एक मार्ग है, और वह प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण होने का अवसर प्रदान करता है। तुम्हारी नकारात्मकता के माध्यम से तुम्हें तुम्हारी भ्रष्टता ज्ञात करवाई जाती है, और फिर नकारात्मकता को फेंककर तुम्हें अभ्यास करने का मार्ग मिल जाएगा; इन्हीं सब तरीकों से तुम पूर्ण किए जाते हो। इसके अतिरिक्त, निरंतर मार्गदर्शन और अपने भीतर कुछ सकारात्मक चीज़ों की रोशनी के द्वारा तुम अपना कार्य अग्रसक्रियता से पूरा करोगे, तुम्हारी अंतर्दृष्टि विकसित होगी और तुम विवेक प्राप्त करोगे। जब तुम्हारी स्थितियाँ अच्छी होती हैं, तुम परमेश्वर के वचन पढ़ने के विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और परमेश्वर से प्रार्थना करने के भी विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और जो उपदेश तुम सुनते हो, उसे अपनी अवस्था के साथ जोड़ सकते हो। ऐसे समय परमेश्वर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध और रोशन करता है, और तुम्हें सकारात्मक पहलू वाली कुछ चीज़ों का एहसास कराता है। इसी तरह से तुम सकारात्मक पहलू में पूर्ण किए जाते हो। नकारात्मक स्थितियों में तुम दुर्बल और निष्क्रिय होते हो; तुम्हें महसूस होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, फिर भी परमेश्वर तुम्हें रोशन करता है और अभ्यास करने के लिए मार्ग खोजने में तुम्हारी सहायता करता है। इससे बाहर आना नकारात्मक पहलू में पूर्णता प्राप्त करना है। परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में पूर्ण बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि तुम अनुभव करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए कोशिश करते हो या नहीं। यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के लिए कोशिश करते हो, तो नकारात्मक पहलू तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, बल्कि तुम्हारे लिए अधिक वास्तविक चीज़ें ला सकता है, और तुम्हें यह जानने में और अधिक सक्षम सकता है कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, अपनी वास्तविक स्थिति को समझने में अधिक सक्षम बना सकता है, और यह देखने में भी कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है, और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षण अनुभव नहीं करते, तो तुम नहीं जानते, और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से बेहतर हो। इस सबके द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले आया था, वह सब परमेश्वर द्वारा किया गया था और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षणों में प्रवेश तुम्हें प्रेम या विश्वास से रहित बना देता है, तुममें प्रार्थना की कमी होती है और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और इसे जाने बिना ही तुम इसके मध्य स्वयं को जान लेते हो। परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के परिवेशों का उपयोग करता है, और मनुष्य को अनावृत करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है; एक ओर वह मनुष्य के साथ निपटता है, दूसरी ओर मनुष्य को अनावृत करता है, और तीसरी ओर वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित "रहस्यों" को खोदकर और उजागर करते हुए, और मनुष्य की अनेक अवस्थाएँ प्रकट करके वह उसे उसकी प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर मनुष्य को अनेक विधियों से पूर्ण बनाता है—प्रकाशन द्वारा, मनुष्य के साथ व्यवहार करके, मनुष्य के शुद्धिकरण द्वारा, और ताड़ना द्वारा—जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण किए जाने का एक नियम है, जो यह है कि वह तुम्हारी आत्मा को मुक्ति पाने और तुम्हें इस योग्य बनाने में मदद करते हुए, कि तुम उसे प्रेम करने में अधिक सक्षम हो सको, तुम्हारे किसी वांछनीय भाग का प्रयोग करके तुम्हें प्रबुद्ध करता है, जिससे तुम्हारे पास अभ्यास करने के लिए एक मार्ग हो और तुम समस्त नकारात्मक अवस्थाओं से खुद को अलग कर सको। इस तरह से तुम शैतान के भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकने में सक्षम हो जाते हो। तुम सरल और उदार हो, और स्वयं को जानने और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें आशीष देगा, अतः जब तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो, तो वह तुम्हें दोगुना प्रबुद्ध करता है, स्वयं को और अधिक जानने में तुम्हारी सहायता करता है, स्वयं के लिए पश्चात्ताप करने के और अधिक इच्छुक होने और उन चीज़ों का अभ्यास करने के योग्य बनाता है, जिनका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए। केवल इसी तरह से तुम्हारा हृदय शांत और सहज हो सकता है। जो व्यक्ति साधारणतः परमेश्वर को जानने पर ध्यान देता है, स्वयं को जानने पर ध्यान देता है, अपने अभ्यास पर ध्यान देता है, वह निरंतर परमेश्वर का कार्य, और साथ ही परमेश्वर का मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्राप्त करने के भी योग्य होगा। एक नकारात्मक अवस्था में होने पर भी ऐसा व्यक्ति चीज़ों को उलट देने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह ऐसा अंत:करण की कार्रवाई के कारण करे या परमेश्वर के वचन से प्राप्त प्रबुद्धता के कारण। व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन हमेशा तभी प्राप्त होता है, जब वह अपनी वास्तविक अवस्था और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य को जानता है। जो व्यक्ति स्वयं को जानने और खोलने का इच्छुक होता है, वही सत्य का निर्वाह करने में सक्षम होगा। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, और जो व्यक्ति परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, उसमें परमेश्वर के बारे में समझ होती है, भले ही वह समझ गहरी हो या उथली, अल्प हो या प्रचुर। यह परमेश्वर की धार्मिकता है, और इसे ही लोग प्राप्त करते हैं; यह उनका अपना लाभ है। जिस व्यक्ति के पास परमेश्वर का ज्ञान है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास एक आधार है, जिसके पास दर्शन है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के देह के बारे में निश्चित होता है, और परमेश्वर के वचन और उसके कार्य के बारे में भी निश्चित होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करे या बोले, या अन्य लोग कैसे भी बाधा उत्पन्न करें, वह अपनी बात पर अडिग रह सकता है, और परमेश्वर के लिए गवाह बन सकता है। व्यक्ति जितना अधिक इस प्रकार का होता है, वह उस सत्य का उतना ही अधिक निर्वाह कर सकता है, जिसे वह समझता है। चूँकि वह हमेशा परमेश्वर के वचन का अभ्यास करता है, इसलिए वह परमेश्वर के बारे में और अधिक समझ प्राप्त कर लेता है और परमेश्वर के लिए हमेशा गवाह बने रहने का दृढ़ निश्चय रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर बुरी आत्माओं के कार्य के एक हिस्से का उपयोग मानव-जाति के एक हिस्से को पूर्ण बनाने के लिए करने का इरादा रखता है, ताकि ये लोग हैवानों के अन्यायपूर्ण कार्यों को पूरी तरह देखने में सक्षम हो सकें, और पूरी मानव-जाति वास्तव में अपने "पूर्वजों" को जान सकें। केवल इसी तरह से, न केवल शैतान के वंशजों को बल्कि शैतान के पूर्वजों को भी त्यागकर, मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र हो सकते हैं। बड़े लाल अजगर को पूरी तरह से हराने के पीछे यह परमेश्वर का मूल इरादा है, ताकि सभी मनुष्य बड़े लाल अजगर का असली स्वरूप जान लें, उसका मुखौटा पूरी तरह से नोचकर उसका वास्तविक रूप देख सकें। परमेश्वर यही प्राप्त करना चाहता है, और यही पृथ्वी पर उसके द्वारा किए गए समस्त कार्य का अंतिम लक्ष्य है; और यही वह सभी मनुष्यों में संपन्न करना चाहता है। इसे परमेश्वर के प्रयोजन के लिए सभी चीजों को जुटाने के रूप में जाना जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 41' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाने के चरण के दौरान यह असंभव है कि लोगों की संख्या बढ़ती रहेगी—वह केवल कम होगी। केवल इन्हीं शुद्धिकरणों के माध्यम से लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। निपटा जाना, अनुशासित किया जाना, परीक्षण किया जाना, ताड़ना दिया जाना, श्राप दिया जाना—क्या तुम यह सब सहन कर सकते हो? जब तुम किसी ऐसी कलीसिया को देखते हो, जो विशेष रूप से अच्छी स्थिति में है, जिसमें बहनें और भाई सभी महान ऊर्जा के साथ खोज करते हैं, तो तुम स्वयं को उत्साहित महसूस करते हो। जब वह दिन आता है कि वे सब चले गए होते हैं, उनमें से कुछ अब और विश्वास नहीं करते, कुछ व्यवसाय करने या विवाह करने के लिए चले गए होते हैं और कुछ धर्म में शामिल हो गए होते हैं, तब भी क्या तुम मजबूती से खड़े रह पाओगे? क्या तुम अंदर से अप्रभावित रह पाओगे? परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाना इतनी आसान बात नहीं है! वह लोगों को शुद्ध करने के लिए कई चीजों का उपयोग करता है। लोग इन्हें तरीकों के रूप में देखते हैं, लेकिन परमेश्वर के मूल इरादे में ये तरीके बिलकुल भी नहीं हैं, बल्कि तथ्य हैं। अंत में, जब वह लोगों को एक निश्चित बिंदु तक शुद्ध कर लेगा और उनमें कोई शिकायतें नहीं रहेंगी, तो उसके कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा। पवित्र आत्मा का महान कार्य तुम्हें पूर्ण बनाना है, और जब वह कार्य नहीं करता और स्वयं को छिपाता है, तो यह और भी ज्यादा तुम्हें पूर्ण बनाने के उद्देश्य से होता है, और विशेष रूप से इस तरह यह देखा जा सकता है कि क्या लोगों में परमेश्वर के लिए प्यार है, क्या उनका परमेश्वर में सच्चा विश्वास है। जब परमेश्वर स्पष्ट रूप से बोलता है, तो तुम्हें खोज करने की कोई आवश्यकता नहीं होती; केवल जब वह छिपा होता है, तभी तुम्हें खोजने और अपना रास्ता महसूस करने की आवश्यकता होती है। तुम्हें एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने में सक्षम होना चाहिए, और चाहे तुम्हारा भावी परिणाम और तुम्हारी मंजिल कुछ भी हो, तुम्हें अपने आजीवन ज्ञान और परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण कर पाने में सक्षम होना चाहिए, और चाहे परमेश्वर तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार करे, तुम्हें शिकायत करने से बचने में सक्षम होना चाहिए। लोगों के भीतर पवित्र आत्मा के कार्य करने की एक शर्त है। उनमें प्यास होनी चाहिए और उन्हें खोज करनी चाहिए तथा उन्हें परमेश्वर के कार्यकलापों के बारे में आधे-अधूरे मन वाले या संशययुक्त नहीं होना चाहिए, और उन्हें हर समय अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होना चाहिए; केवल इसी तरह से वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मानवजाति से जो अपेक्षित है, वह है आसाधारण आत्मविश्वास और खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आना—केवल अनुभव के माध्यम से ही लोग यह पता कर सकते हैं कि परमेश्वर कितना प्यारा है और पवित्र आत्मा लोगों में कैसे कार्य करता है। यदि तुम अनुभव नहीं करते, यदि तुम उसके माध्यम से अपना रास्ता महसूस नहीं करते, यदि तुम तलाश नहीं करते, तो तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। तुम्हें अपने अनुभवों के माध्यम से अपना रास्ता महसूस करना चाहिए, और केवल अपने अनुभवों के माध्यम से ही तुम परमेश्वर के कार्यों को देख सकते हो और यह पहचान सकते हो कि वह कितना चमत्कारी और अथाह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए' से उद्धृत

उन सभी लोगों के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है, जो पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं, इसलिए हर किसी को शांत हो जाना चाहिए : भविष्य में तुम सभी मंज़िल में प्रवेश करोगे। किंतु यदि तुम पूर्ण बनाए जाने की इच्छा नहीं रखते, और अद्भुत क्षेत्र में प्रवेश करना नहीं चाहते, तो यह तुम्हारी अपनी समस्या है। वे सभी, जो पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं, वे सभी जो आज्ञापालन करते हैं, और वे सभी जो वफ़ादारी से अपना कार्य करते हैं—ऐसे सभी लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। आज, वे सभी जो वफादारी से अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति वफ़ादार नहीं हैं, वे सभी जो परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते, विशेष रूप से वे जिन्होंने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर ली है किंतु उसे अभ्यास में नहीं लाते—ऐसे सभी लोग पूर्ण बनाए जाने में असमर्थ हैं। उन सभी को पूर्ण बनाया जा सकता है, जो वफ़ादार होने और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की इच्छा रखते हैं, भले ही वे थोड़े अज्ञानी हों; उन सभी को पूर्ण बनाया जा सकता है, जो खोज करने की इच्छा रखते हैं। इस बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम इस दिशा में खोज करने के इच्छुक हो, तो तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। मैं तुम लोगों में से किसी को भी छोड़ने या निष्कासित करने का इच्छुक नहीं हूँ, किंतु यदि मनुष्य अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करता, तो वह केवल अपने आप को बरबाद कर रहा है; वह मैं नहीं हूँ जो तुम्हें निष्कासित करता है, बल्कि वह तुम स्वयं हो। यदि तुम स्वयं अच्छा करने का प्रयत्न नहीं करते—यदि तुम आलसी हो, या अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, या वफादार नहीं हो, या सत्य की खोज नहीं करते, और हमेशा जैसा चाहते हो वैसा ही करते हो, यदि तुम लापरवाही से व्यवहार करते हो, अपनी प्रसिद्धि और सौभाग्य के लिए लड़ते हो, और विपरीत लिंग के साथ अपने व्यवहार में बेईमान हो, तो तुम अपने पापों के बोझ को स्वयं वहन करोगे; तुम किसी की भी दया के योग्य नहीं हो। मेरा इरादा तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, और कम से कम तुम लोगों पर विजय पाना है, ताकि कार्य के इस चरण को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। यह मायने नहीं रखता कि मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या निम्न क्षमता वाला—यह सब तथ्य है। मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम्हें छोड़ने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिलकुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का एक अवसर है : बशर्ते तुम तैयार हो, बशर्ते तुम खोज करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे, और तुममें से किसी एक को भी त्यागा नहीं जाएगा। यदि तुम निम्न क्षमता वाले हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निम्न क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च क्षमता वाले हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निरक्षरता के अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इस तथ्य के अनुसार होंगी कि तुम साक्षर हो; यदि तुम बुज़ुर्ग हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम आतिथ्य प्रदान करने में सक्षम हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इस क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम आतिथ्य प्रदान नहीं कर सकते और केवल कुछ निश्चित कार्य ही कर सकते हो, चाहे वह सुसमाचार फैलाने का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों में शामिल होने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी, जो तुम करते हो। वफ़ादार होना, बिल्कुल अंत तक आज्ञापालन करना, और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने की कोशिश करना—यह तुम्हें अवश्य करना चाहिए, और इन तीन चीज़ों से बेहतर कोई अभ्यास नहीं है। अंततः, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इन तीन चीज़ों को प्राप्त करे, और यदि वह इन्हें प्राप्त कर सकता है, तो उसे पूर्ण बनाया जाएगा। किंतु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सच में खोज करनी होगी, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा, और इसके संबंध में निष्क्रिय नहीं होना होगा। मैं कह चुका हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर है, और प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण बनाए जाने में सक्षम है, और यह सत्य है, किंतु तुम अपनी खोज में बेहतर होने की कोशिश नहीं करते। यदि तुम ये तीनों मापदंड प्राप्त नहीं करते, तो अंत में तुम्हें अवश्य निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि हर कोई उस स्तर तक पहुँचे, मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक के पास पवित्र आत्मा का कार्य और प्रबुद्धता हो, और वह बिलकुल अंत तक आज्ञापालन करने में समर्थ हो, क्योंकि यही वह कर्तव्य है, जिसे तुम लोगों में से प्रत्येक को करना चाहिए। जब तुम सभी लोगों ने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया होगा, तो तुम सभी लोगों को पूर्ण बनाया जा चुका होगा, तुम लोगों के पास ज़बरदस्त गवाही भी होगी। जिन लोगों के पास गवाही है, वे सभी ऐसे लोग हैं, जो शैतान के ऊपर विजयी हुए हैं और जिन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा प्राप्त कर ली है, और वे ऐसे लोग हैं, जो उस अद्भुत मंज़िल में जीने के लिए बने रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

जिन लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाने का इरादा रखता है, वे सब उसके आशीष और उसकी विरासत प्राप्त करेंगे। अर्थात्, वे वही ग्रहण करते हैं जो परमेश्वर के पास है और वह जो है, ताकि यह वह बन जाए जो उनके भीतर है; उनमें परमेश्वर के सारे वचन गढ़े हुए हैं; परमेश्वर जो है, तुम लोग उसे ठीक जैसा है वैसा लेने और इस प्रकार सत्य को जीवन में उतारने में सक्षम हो। ऐसे ही व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया और प्राप्त किया जाता है। केवल इसी प्रकार का मनुष्य परमेश्वर द्वारा दिए जाने वाले आशीष पाने योग्य है :

1. परमेश्वर के संपूर्ण प्रेम को पाना।

2. सभी बातों में परमेश्वर की इच्छानुसार चलना।

3. परमेश्वर के मार्गदर्शन को पाना, परमेश्वर के प्रकाश में जीवन व्यतीत करना और परमेश्वर का प्रबोधन प्राप्त करना।

4. पृथ्वी पर परमेश्वर को प्रिय लगने वाली छवि जीना; परमेश्वर से सच्चा प्रेम करना जैसा कि पतरस ने किया, जिसे परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ा दिया गया और जो परमेश्वर के प्रेम के प्रतिदान में मरने के लिए तैयार हो गया; पतरस के समान महिमा प्राप्त करना।

5. पृथ्वी पर सभी का प्रिय, सम्मानित और प्रशंसित बनना।

6. मृत्यु और पाताल के सारे बंधनों पर काबू पाना, शैतान को कार्य करने का कोई अवसर न देना, परमेश्वर के अधीन रहना, एक ताज़ा और जीवंत आत्मा के भीतर रहना, और हारा-थका नहीं रहना।

7. जीवन भर हर समय उत्साह और उमंग की एक अवर्णनीय भावना रखना, मानो परमेश्वर की महिमा के दिन का आगमन देख लिया हो।

8. परमेश्वर के साथ महिमा को जीतना और परमेश्वर के प्रिय संतों जैसा चेहरा रखना।

9. वह बनना जो पृथ्वी पर परमेश्वर को प्रिय है, अर्थात्, परमेश्वर का प्रिय पुत्र।

10. स्वरूप बदलना और परमेश्वर के साथ तीसरे स्वर्ग में आरोहण करना तथा देह के पार जाना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रतिज्ञाएँ उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं' से उद्धृत

पिछला: 41. परमेश्वर के साथ संगतता प्राप्त करने के सिद्धांत

अगला: 43. पूर्ण किए जाने की तलाश के सिद्धांत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

1समझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग, सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें