648 इंसान की राहें तय कर दी हैं परमेश्वर ने

I

उस राह पर परमेश्वर हमारी रहनुमाई करता है,

जो जा नहीं सकती ऊपर की तरफ कभी सीधे।

वह गड्ढों से भरी टेढ़ी राह है।

हमसे परमेश्वर यह कहता है

जितना पथरीला होगा रास्ता,

उसके लिए हमारे दिल के

प्रेम को दिखाएगा वो उतना ही ज़्यादा।

पर हम में से कोई खोल नहीं सकता,

इस तरह का रास्ता, इस तरह का रास्ता।

मैं दूसरों की तरह नहीं बनना चाहता,

ना ही उनकी राह पर मैं चलना चाहता।

अपना समर्पण पूरा करने की ख़ातिर,

जो राह चुनता हूँ मैं चलता हूँ उसके आखिर तक।

कोई इंसान किसी की मदद नहीं कर सकता,

ईश्वर ने पहले से निर्धारित किया है,

कि कितनी पीड़ा सहनी है हर एक को,

कि कितनी दूर तक जाना है उसे,

कि कितनी दूर तक जाना है उसे।


II

अपने अनुभव में बहुत-सी राहों पर चल चुका हूँ मैं।

वे रास्ते जिन पर मैं चला जोखिम भरे, पथरीले थे।

बहुत है व्यथा सही मैंने,

कभी दुखी भी हो जाता था,

मगर था विश्वास कि

ईश्वर ने दिखायी है यह राह मुझे।

इस राह पर चलने के दर्द को सह कर,

चलता जाता हूँ मैं, चलता जाता हूँ मैं।

मैं दूसरों की तरह नहीं बनना चाहता,

ना ही उनकी राह पर मैं चलना चाहता।

अपना समर्पण पूरा करने की ख़ातिर,

जो राह चुनता हूँ मैं चलता हूँ उसके आखिर तक।

कोई इंसान किसी की मदद नहीं कर सकता,

ईश्वर ने पहले से निर्धारित किया है,

कि कितनी पीड़ा सहनी है हर एक को,

कि कितनी दूर तक जाना है उसे,

कि कितनी दूर तक जाना है उसे।


III

यही परमेश्वर ने पहले से निर्धारित किया है।

इसी वजह से बच नहीं सकता कोई इससे।

मैं कोई आशीष नहीं मांगता उससे,

मैं नहीं मांगता उससे।

परमेश्वर से बस मैं इतना चाहता हूँ,

जिस राह पर वह चाहे मैं चलूँ,

चल सकूँ उस राह पे,

चल सकूँ उस राह पे।

मैं दूसरों की तरह नहीं बनना चाहता,

ना ही उनकी राह पर मैं चलना चाहता।

अपना समर्पण पूरा करने की ख़ातिर,

जो राह चुनता हूँ मैं चलता हूँ उसके आखिर तक।

कोई इंसान किसी की मदद नहीं कर सकता,

ईश्वर ने पहले से निर्धारित किया है,

कि कितनी पीड़ा सहनी है हर एक को,

कि कितनी दूर तक जाना है उसे,

कि कितनी दूर तक जाना है उसे।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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