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36. उत्पीड़न और कठिनाइयों ने मुझे बढ़ने में मदद की

बाइतुओ डेझोउ सिटी, शैंडॉन्ग प्रदेश

पहले, मैं सिर्फ इतना जानती थी कि परमेश्वर की बुद्धि का अभ्यास शैतान के आधार पर किया जाता था, कि परमेश्वर एक बुद्धिमान परमेश्वर है और कि शैतान सिद्धांत में हमेशा ही परमेश्वर का पराजित शत्रु होगा, लेकिन मुझे वास्तविक अनुभव के आधार पर इसके बारे में कोई समझ या ज्ञान नहीं थी। बाद में, केवल परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित वातावरण के भीतर ही, मुझे सत्य के इस पहलू का कुछ वास्तविक अनुभव प्राप्त हुआ।

एक दोपहर, मैं एक धर्मसभा में थी, तभी अचानक जिला अगुआ का साझेदार तेजी से दौड़ते हुए मेरे पास आया और कहा, “बड़ा लाल अजगर तुम्हारी मां को ले गया है। कुछ समय तक घर मत जाओ। कलीसिया तुम्हारे लिए एक मेजबान परिवार की व्यवस्था कर देगा।” यह समाचार मुझ पर आकाशीय बिजली की तरह गिरा और इसने मुझे इतना ज्यादा अचंभित कर दिया कि मैं अचानक ही स्तब्ध हो गई: क्या? बड़ा लाल अजगर मेरी मां को ले गया है? लाल बड़ा अजगर उन्हें कैसी यातनाएं देगा? क्या वह इसे सहन कर पाएंगी? संभवत: मैं दोबारा अपनी मां को न देख पाऊं। मुझे क्या करना चाहिए, इन बातों को सोचकर, मेरे दिल को बहुत कष्ट हुआ और मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी। इस धर्मसभ के समाप्त होने के बाद, मुझे मेरे लिए व्यवस्थित मेजबान परिवार के पास ले जाया गया और, मेरे स्थापित हो जाने के बाद, मेरे विचार पुन: मेरी मां की ओर लौट आए। घर में, मैं अपनी मां के सबसे नजदीक थी। भले ही, मेरा अविश्वासी पिता मुझ पर परमेश्वर का त्याग करने पर जोर देने की कोशिश करता था, मेरी बड़ी बहन परमेश्वर में मेरे विश्वास की वजह से मुझे नजरअंदाज करती थी और मेरे अन्य सभी रिश्तेदारों ने भी मेरा त्याग कर दिया था, फिर भी मुझे कभी भी अकेला महसूस नहीं हुआ, क्योंकि तब भी मेरे पास मेरी मां थी जो परमेश्वर में विश्वास करती थी। आध्यात्मिक या शारीरिक तौर पर, मेरी मां ने हमेशा ही मेरा ख्याल रखा था, मुझ पर स्नेह लुटाया था, और अक्सर ही मेरी मदद की थी। जब भी मुझे कोई समस्या होती थी तो मैं हमेशा ही उस बारे में उससे बात कर सकती थी; तुम कह सकते हो कि वह मेरा सहारा थी। फिर भी अब, वह एकमात्र व्यक्ति जिस पर मैं निर्भर रह सकती थी, उसे भी बड़ा लाल अजगर ले गया था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे अचानक ही मैं अनाथ हो गई थी, यह जाने बिना कि मार्ग में आगे कैसे चला जाए, न ही यह जानती थी कि अगर मुझे ​कठिनाई हो तो मैं किसके पास जाऊं। अगले कुछ दिनों तक, मैं पूरे दिन रोती रहती थी, लगातार दर्द में रहती थी और बहुत निराश महसूस करती थी। चूंकि मैं खुद को मुक्त करने में असक्षम, इस स्थिति में जी रही थी, तब परमेश्वर ने अंदर से मेरा मार्गदर्शन किया: “शैतान को तुम्हें मूर्ख बनाने की अनुमति देते हुए, अंधकार में हमेशा जीने की इच्छा रखने वाली तुम होती कौन हो? और क्या तुम वाकई परमेश्वर को उसके कार्य में समझना और रोशनी में जीना नहीं चाहती हो?” परमेश्वर के मार्गदर्शन ने मुझे मेरे दर्द से जगाया। मैंने सोचा, यही सही है। क्या मैं वाकई शैतान को मुझे मूर्ख बनाने की अनुमति देते हुए, अंधकार में हमेशा इसी तरह से जीने वाली हूं? नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती! यह स्थिति जो मेरे सामने आ गई है, उसमें निश्चित तौर पर परमेश्वर की अच्छाई होनी चाहिए। इसके बाद, मैं प्रार्थना करने और परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए कई बार परमेश्वर के समक्ष गई, परमेश्वर से मुझे प्रबुद्ध करने के लिए कहा ताकि मैं उसकी इच्छा को समझ सकूं।

कुछ समय बाद, मैंने पाया कि मैंने उस सत्य में थोड़ा प्रवेश करना शुरू कर दिया था जिसे मैं पहले नहीं समझती थी या जिसे अभ्यास में लाने में मैं पहले सक्षम नहीं थी। मैं घर में बिगाड़ दिया गया था, और खाने, कपड़े और मजे करने में मेरा ज्यादातर समय बर्बाद होता था। मेरा शरीर कुछ भी गलत नहीं भुगत सकता था और थोड़ी सी भी कठिनाई नहीं सह सकता था। मेरे घर छोड़ने और मेजबान परिवार के साथ रहने के कुछ दिन बाद, मैं अब अपनी इच्छानुसार कुछ भी नहीं कर पाती थी, मैं अपने आनंद के अनुसार कुछ नहीं करती थी जैसा कि मैं घर में किया करती थी। धीरे-धीरे, मेरी लाड़-प्यार वाली प्रकृति और बुरी आदतें कम हो गई, और मैंने जाना कि जीवन में खाना और कपड़े पाने के लिए संतुष्ट होना होगा। मुझे शरीर के सार में एक परख भी मिली, दोबारा कभी इस शरीर की संतुष्टि का अनुसरण नहीं करना, और मैंने जाना कि परमेश्वर को संतुष्ट करना वह सबसे महत्वपूर्ण काम है जो एक रचना कर सकती है। इससे पहले, जब मेरी मां घर पर थी, मेरे जीवन में चाहे जो भी शारीरिक दिक्कतें या समस्या हो, मैं हमेशा उस पर निर्भर रहती थी और उन्हें हल करने के लिए उनकी मदद लेती थी। जब मैं समस्याओं में फंसती थी, तो मैं परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करती थी, सत्य का अनुसरण नहीं करती थी, न ही परमेश्वर के साथ मेरा सामान्य संबंध था। मेरी मां को पकड़कर ले जाने के बाद, मेरे पास ऐसा कोई नहीं था, कठिनाइयां आने पर जिस पर मैं निर्भर रह सकूं। परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के ज्यादा से ज्यादा वचनों को खाने और पीने, अक्सर ही उसकी इच्छा का अनुसरण करने के लिए, मैंने केवल परमेश्वर के समक्ष ही जा सकती थी। धीरे-धीरे, मेरे दिल में अपनी मां के लिए जो स्थान था वह छोटा होता गया, जबकि मेरे दिल में परमेश्वर का स्थान बड़ा होता गया। मैं मानती थी कि जब भी मुझे जरूरत होगी तब परमेश्वर मेरी मदद कर सकता है, कि मैं परमेश्वर को एक भी पल के लिए नहीं छोड़ सकती हूं। इससे भी बढ़कर, मैंने अपनी समस्याओं को हल करने के लिए प्रार्थना पर भरोसा करना और सत्य के अपने अनुसरण पर भरोसा करना भी सीख लिया था, और मैंने शांति, स्थिरता और निर्भरता की उस भावना को जाना था जो मेरे साथ परमेश्वर के होने से आती है। जब मैं घर में रहती थी, तो भले ही मैं वह जानती थी कि विश्वासी और अविश्वासी दो ऐसे प्रकार के लोग हैं, जो एक-दूसरे के साथ असंगत थे, फिर भी मैं जानती थी कि केवल मेरे माता-पिता और मेरी बड़ी बहनें ही मेरा परिवार थी, और मैंने हमेशा ही कलीसिया के अपने भाइयों और बहनों को बाहरी व्यक्तियों की तरह देखा था, हमेश ही हमारे बीच कुछ दूरी महसूस की थी। मुझे मेरे घर से बाहर “निकालने” के लिए, परमेश्वर के इस वातावरण का प्रयोग करने के बाद, मैं सुबह से रात तक अपने मेजबान परिवार में अपने भाइयों और बहनों के साथ मिलकर थी, और मेरे प्रति उनकी चिंता और परवाह, उनके सहिष्णुता और समझ को महसूस करती थी। हम समान भाषा बोलते थे, समान आकांक्षाएं साझा करते थे और जीवन में एक-दूसरे की मदद करते थे; अपने दिल से, मुझे महसूस होता था कि यह ही मेरा एकमात्र सच्चा परिवार है, कि कलीसिया में मेरे भाई और बहनें ही मेरे पिता, मां और भाई-बहन हैं। मेरे और कलीसिया में मेरे भाइयों और बहनों के बीच अब कोई भी मनमुटाव नहीं रह गया था, न कोई दूरी, और मैंने एक बड़े परिवार से आने वाले उत्साह का अनुभव लिया था। अपने भाइयों और बहनों के साथ इस वातावरण के माध्यम से, मैंने यह भी जाना कि कैसे हम जीवन में एक-दूसरे से प्रेम कर सकते हैं, एक-दूसरे को माफ और एक-दूसरे का सहयोग कर सकते हैं। इस तरह से मेरी सामान्य मानवता फिर से हासिल हो गई। जब मैं घर पर रहती थी और धर्मसभाओं और धर्मोपदेशों पर निर्भर रहती थी, तब यही ऐसा सत्य था जिसे मैं अभ्यास में नहीं ला पाई थी। बड़े लाल अजगर द्वारा मेरी मां को ले जाने और मेरे जबरदस्ती घर छोड़ने के बाद, इन असाधारण और मेरे लिए अनजान परिस्थितियों में, परमेश्वर ने इस सच्चाई को मेरे भीतर गढ़ा और धीरे-धीरे इसे लेकर मेरी समझ को गहरा किया। इस सत्य में मेरे प्रवेश करने के बाद, मेरा दिल जो परमेश्वर को प्रेम और संतुष्ट करने की कोशिश करता था, वह और भी ज्यादा मजबूत हो गया और परमेश्वर के लिए अपनी पूरी जिंदगी जीने की मेरी इच्छा भी और ज्यादा दृढ़ हो गई। वह व्यक्ति जो मैं पहले हुआ करती थी - जो परमेश्वर में विश्वास करती थी लेकिन उसका कोई उद्देश्य नहीं थी, जो कोई समस्या आने पर कमजोर हो जाया करती थी - उसमें काफी बदलाव आ गया था। परमेश्वर ने मुझे जो प्रदान किया था, वह वाकई मेरी सोच से ज्यादा था, और मेरा दिल उसके प्रति आभार और प्रशंसा से भर गया था।

एक दिन, अपनी आध्यात्मिक प्रार्थनाओं के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े जो कहते हैं: “यह सब कार्य करते हुये, उसने शैतान के द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मनुष्य जाति को उसके बड़े उद्धार को प्राप्त करने का अवसर दिया, परंतु साथ ही साथ उसने उन पर अपनी बुद्धि सर्वसामर्थीपन और अधिकार को भी प्रदर्शित किया, और अंत में वह मानवजाति पर अपना धार्मिकतायुक्त स्वभाव प्रकट करेगा, दुष्टों को दण्ड देगा, और भले लोगों को पुरस्कार देगा। वह आज के दिन तक शैतान के साथ युद्ध करता आया है और कभी भी पराजित नहीं हुआ। क्योंकि वह एक बुद्धिमान परमेश्वर है, और उसकी बुद्धि शैतान के षडयंत्रों के आधार पर क्रियान्वित होती है। … वह अब भी अपने कार्य को उसी वास्तविकता के तरीके से सम्पन्न करता है, साथ ही, जब वह अपने कार्य को करता है, वह अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमान के गुण को भी प्रकट करता है। … ” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “आपको जानना चाहिये कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई” से) परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को अचानक प्रकाशित किया, और मैं अंदर गहराई से आह प्रकट करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी: परमेश्वर वास्तव में एक बुद्धिमान ईश्वर है! परमेश्वर के कर्म वास्तव में अद्भुत और अप्रत्याशित हैं! यह स्थिति मेरे साथ घटित हुई और, देखने में, ऐसा लगता है कि मानो बड़ा लाल अजगर मेरी मां को ले गया है, मेरे एकमात्र सहारे को ले गया, उसने मेरा घर जाना कठिन बना दिया, परमेश्वर में मेरे विश्वास को बाधित करने और मुझे बंदी बनाने, या अपने प्रभाव से मुझे कमजोर करने या मुझे डराकर त्याग कराने के लिए इसका प्रयोग करने हेतु बेफायदा ही इसे आजमाया। लेकिन परमेश्वर की बुद्धि का अभ्यास शैतान के षडयंत्रों के आधार किया जाता है, और परमेश्वर ने इसका प्रयोग गहरे प्रभाव के लिए किया। उसने मुझे मेरे सुखद स्थान से उछाल दिया और, इस वातावरण के माध्यम से, मेरी इच्छा को शांत किया, यातना सहने की मेरी इच्छा को पूर्ण किया, स्वतंत्र रूप से जीने हेतु क्षमता रखने के लिए मुझे प्रशिक्षित किया, मुझे सिखाया कि सामान्य मानवता के साथ कैसे जियें और कैसे एक यथार्थ व्यक्ति बने; यह सत्य ऐसा कुछ था जो ​मैं सहजता और आराम के इस वातावरण में किसी भी तरह से नहीं समझने, हासिल करने वाली थी। इस माहौल के माध्यम से, परमेश्वर ने मेरे अंदर अपना सत्य गढ़ा, और यह भी कि वह जीवन में क्या है, ताकि न केवल मैं बड़े लाल अजगर के उत्पीड़न की वजह से हिम्मत न छोड़ू, बल्कि इसके विपरीत, मुझे यह सत्य भी मिला जो परमेश्वर ने मुझे प्रदान किया था और मुझे परमेश्वर के उद्धार के अंदर ले जाया गया था। इसके अलावा, बड़े लाल अजगर के उत्पीड़न के माध्यम से, मैंने ज्यादा स्पष्ट रूप से उसका निर्दयी, क्रूर चेहरा और उसकी सुधार विरोधी प्रकृति देखी। अपने दिल से, मैं इससे और भी विमुख हो गई, परमेश्वर का प्रेम तलाशने वाला मेरा दिल और भी ज्यादा मजबूत हो गया था।

मैं परमेश्वर को धन्यवाद करती हूं! इस अनुभव से, मुझे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और साम्राज्य की कुछ व्यावहारिक समझ मिली, और इस तथ्य का कुछ व्यावहारिक अनुभव मिला कि पमरेश्वर की बुद्धि का अभ्यास शैतान के षडयंत्रों के आधार पर किया जाता है। मैं समझ गई कि घटित होने वाली हर चीज जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होती है, वह परमेश्वर का बुद्धिमान कर्म है। शैतान अपने षडयंत्रों को चाहे जितना भी लागू कर दे, परमेश्वर हमेशा ही बुद्धिमान परमेश्वर होगा, और शैतान हमेशा ही परमेश्वर का पराजित शत्रु रहेगा। इसे समझकर, परमेश्वर का पालन करने की मेरी इच्छा और भी दृढ़ हो गई, और मैं आगे के मार्ग के लिए निष्ठा से भर गई!

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