16. परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से, मैंने अंधेरी ताकतों के दमन पर काबू पा लिया है

वांग ली, झेजियांग प्रांत

बचपन से ही माँ के साथ-साथ मैं भी प्रभु यीशु में आस्था रखती थी; जिन दिनों मैं प्रभु यीशु का अनुसरण करती थी, मैं अक्सर उसके प्रेम से द्रवित हो जाती थी। मुझे महसूस होता था कि वो हमें इतना ज़्यादा प्रेम करता है कि हमें छुटकारा दिलाने के लिए वो सूली पर चढ़ गया और अपने खून की एक-एक बूंद बहा दी। उन दिनों, कलीसिया के भाई-बहन एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे, और आपस में सहयोग करते थे, लेकिन दुर्भाग्य से प्रभु में हमारी आस्था को सीसीपी के उत्पीड़न और दमन का शिकार होना पड़ा। सीसीपी सरकार ईसाई धर्म और कैथोलिक धर्म को "शी जियाओ" मानती है और गृह कलीसियाओं में आयोजित सभाओं पर उसने "गैर-कानूनी सभाओं" का ठप्पा लगा दिया है। पुलिस अक्सर हमारे सभा-स्थलों पर छापे मारा करती थी, और यह हिदायत देती थी कि सभाएँ आयोजित करने से पहले हमें सरकार की अनुमति लेनी आवश्यक है, वरना हम पर जुर्माना लगाया जाएगा और गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जाएगा। एक बार, मेरी माँ को और पाँच-छह भाइयों को गिरफ्तार करके उनसे पूरे दिन पूछताछ की गयी। अंत में, पुलिस जाँच से इस बात की पुष्टि हो गयी कि ये लोग महज़ साधारण ईसाई हैं, और उन्हें रिहा कर दिया गया। लेकिन उस दिन से, सरकारी छापों से बचने के लिए हम लोग गुप्त रूप से मिलने लगे; मगर इन तमाम बातों के बावजूद, हमारी आस्था में कमी नहीं आयी। 1998 के उत्तरार्द्ध में, मेरी एक संबंधी ने मुझे बताया कि प्रभु यीशु अंत के दिनों में देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट आया है। इस संबंधी ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत से वचन भी पढ़कर सुनाए, जिन्हें सुनकर मैं रोमाँचित हो गयी। मुझे यकीन हो गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के कथन हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटकर आया प्रभु यीशु है। यह सोचकर ही कि मैं इसी जन्म में प्रभु से सचमुच मिल पाऊँगी, मैं इतनी भावुक हो गयी कि बता नहीं सकती, और मेरी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उसके बाद से, मैं परमेश्वर के वचनों को हर दिन बड़े चाव से पढ़ने-सुनने लगी। उन वचनों से मुझे बहुत से सत्य और रहस्य समझ में आए—इस प्रकार मेरी प्यासी आत्मा को सिंचन और पोषण मिला। पवित्र आत्मा द्वारा हमारे लिए लाए गये महान कार्य का आनंद और सुख लेते हुए, मैं और मेरे पति, दोनों प्रभु से पुनर्मिलन के आनंद और खुशी में मग्न हो गये। हम लोग भाई-बहनों के साथ मिलकर परमेश्वर की स्तुति में प्राय: भजन गाना सीखते और नाचते, और परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करने के लिए अक्सर मिलते। मेरी आत्मा तरोताज़ा और ऊर्जावान हो जाती, और मेरी आँखों के सामने एक सुंदर दृश्य साकार हो जाता जैसे धरती पर राज्य प्रकट हो गया हो और हर कोई आनंद मना रहा है। लेकिन यह बात मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि जब हम अटूट आस्था के साथ परमेश्वर का अनुसरण करके सही मार्ग पर चल रहे हैं, तो सीसीपी सरकार हमें क्रूर यातना देनी शुरू कर देगी ...

28 अक्टूबर, 2002 में, मैं और बहुत-सी बहनें एक सभा कर रही थीं। सभा के दौरान, मैं एक बहन के साथ किसी काम से बाहर गयी, अभी हम लोग थोड़ी दूर ही पहुँचे थे कि पीछे से बहन की आवाज़ आयी, "आप लोग मुझे गिरफ्तार क्यों कर रहे हैं?" इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, सादी वर्दी में एक पुलिस अधिकार मेरे पास आया और मुझे गिरफ्त में लेते हुए बोला, "आपको मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलना होगा!" और मुझे पुलिस की गाड़ी में बैठा लिया। हमें पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जैसे ही मैं गाड़ी से उतरी तो मैंने देखा कि छह दूसरी बहनों को भी जो सभा में थीं, गिरफ्तार करके यहाँ ले आया गया है। पुलिस ने हमारे कपड़े उतरवाए और हमें तलाशी देने को कहा। मेरे पास दो पेजर थे, जिनसे उनको पता चल गया कि मैं कलीसिया की अगुवा हूँ, इस तरह, मुझे अहम मानकर पहले मुझसे पूछताछ शुरू की गयी। एक पुलिसवाला मुझ पर चिल्लाया, "तूने कब से सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखनी शुरू की? इसका उपदेश तुझे किसने दिया? तू किससे मिली? कलीसिया में तेरा ओहदा क्या है?" इतनी कठोरता से पूछे गये सवालों के कारण मैं घबरा गयी, मुझे समझ में नहीं आया कि मैं इससे निपटूँ कैसे। मैं तो बस परमेश्वर से मन ही मन प्रार्थना ही कर सकती थी कि हे परमेश्वर, मेरी रक्षा कर ताकि मैं तुझे धोखा न दूँ। प्रार्थना करने के बाद, मैंने अपने आपको संभाला और खामोश रहने का फैसला किया। यह देखकर कि मैं कुछ बोल नहीं रही हूँ, पुलिसवाला उखड़ गया और मेरे सिर पर ज़ोर से मारा। तुरंत मेरा सिर घूम गया, मुझे चक्कर आ गए, और मेरे कान बजने लगे। फिर वे लोग मेरे सामने एक बहन को लेकर आये और हमें एक-दूसरे को पहचानने को कहा। यह देखकर कि हम लोग उनकी बात मानने वाले नहीं हैं, तो वे लोग क्रोधित हो गए और मुझे मेरे कॉटन-पैड वाले जूते उतारकर एकदम ठंडी फर्श पर नंगे पैर खड़े होने को कहा गया। फिर उन्होंने मुझे दीवार के सहारे एकदम सीधा खड़ा होने को कहा, अगर मेरा शरीर ज़रा-सा भी इधर-उधर होता, तो वो ज़ोर से लात मारते। उस वक्त मेरा शरीर लड़खड़ा रहा था; तापमान गिरता जा रहा था और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। मुझे इतनी ठंड लग रही थी कि मेरा पूरा शरीर काँप रहा था, और मेरे दाँत लगातार किटकिटा रहे थे। पुलिसवाला कमरे में चक्कर लगा रहा था, उसने मेज़ पर ज़ोर से हाथ मारा और मुझे धमकाते हुए बोला, "हम लम्बे समय से तेरा पीछा कर रहे हैं। आज तेरी ज़बान खुलवाने के हमारे पास बहुत सारे तरीके हैं, और अगर तूने ज़बान नहीं खोली, तो हम तुझे कड़ाकेदार ठंड में मरने के लिए छोड़ देंगे, या तुझे भूखा मार देंगे, या पीट-पीटकर मार डालेंगे! देखते हैं तू कब तक झेलती है!" उसकी ये बातें सुनकर मैं थोड़ी डर गयी, इसलिए मैंने मन ही मन परमेश्वर को पुकारा: "हे परमेश्वर! मैं यहूदा बनकर तुझे धोखा नहीं देना चाहती। प्लीज़ मेरी रक्षा कर और शैतान से लड़ने के लिए मुझे हौसला और आस्था दे, ताकि मैं तेरी गवाही दे सकूँ।" प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया जो कहते हैं: "उसका स्वभाव अधिकार और उन सब का प्रतीक है जो धर्मी, सुन्दर, और अच्छा है। इस के अतिरिक्त, यह इस का भी प्रतीक है कि परमेश्वर को अंधकार और शत्रु के बल के द्वारा दबाया या उस पर आक्रमण नहीं किया जा सकता है,[क] साथ ही इस बात का प्रतीक भी है कि उसे किसी भी सृजे गए प्राणी के द्वारा ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती है (और उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं है)[ख]" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है")। मैंने सोचा, "हाँ, परमेश्वर के वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है, उसके अधिकार और सामर्थ्य को कोई भी शत्रु-शक्ति या अंधेरी ताकत ध्वस्त नहीं कर सकती। सीसीपी के गुर्गे चाहे जितने भी क्रूर हों, लेकिन उन सबकी डोर परमेश्वर के हाथों में है, अगर मैं परमेश्वर पर भरोसा करके, उसके साथ सहयोग करूँगी, तो मैं यकीनन उन लोगों पर काबू पा लूँगी।" परमेश्वर के वचनों से साफ़ तौर पर मार्गदर्शन मिलने के बाद, अचानक मैंने अपनी आस्था और हौसला पा लिया, उसके बाद मुझे ठंड महसूस नहीं हुई। मुझे तीन घंटे तक वहाँ खड़ा रखने के बाद, पुलिसवाले मुझे पुलिस की गाड़ी में नज़रबंदी गृह ले गये।

मेरे नज़रबंदी गृह आने के अगले दिन दोपहर को, एक महिला और एक पुरुष पुलिस अधिकारी मुझसे पूछताछ करने आए। उन्होंने मेरे होमटाउन वाले लहजे में मेरा नाम पुकारा, और ऐसा दिखाने की कोशिश की जैसे वो मेरे पक्ष हों। पुरुष ने अपना परिचय पब्लिक सेक्युरिटी ब्यूरो के धार्मिक विभाग के चीफ के तौर पर दिया, "स्टेशन के पुलिस अधिकारियों ने आपके बारे में पहले ही जानकारी हासिल कर ली है। दरअसल, आपने जो किया है, वो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, हम आपको घर ले जाने के लिए खास तौर से आए हैं। अगर आप हमें वहाँ पहुँचकर सब-कुछ बता देंगी, तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी।" मुझे समझ में नहीं आया कि ये लोग मेरे साथ क्या चाल चल रहे हैं, लेकिन जब उसने यह बात कही तो मेरे दिल में उम्मीद की एक किरण जगी। मैंने मन ही मन सोचा: "जिस जगह से मैं आती हूँ, वहाँ के स्थानीय लोग बहुत अच्छे हैं, इसलिए अगर मैं इन्हें कुछ न भी बताऊँ, तो भी शायद मुझे छोड़ दें।" लेकिन हुआ मेरी उम्मीद से बिल्कुल उल्टा, जब हम लोग मेरे होमटाउन की तरफ बढ़ रहे थे, तो पुलिस ने अपनी असली पाशविक प्रकृति उजागर की और मुझ पर दबाव डाला कि मैं उन्हें अपने घर की चाबी दे दूँ। मुझे पता था कि वो लोग मेरे घर की तलाशी लेना चाहते हैं, और मुझे परमेश्वर की तमाम पुस्तकों और भाई-बहनों के नामों की सूची का ख्याल आ रहा था जो मेरे घर में रखी हुई थीं। इसलिए मैंने मन ही मन परमेश्वर से पूरे दिल से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! तू घर में रखी परमेश्वर की पुस्तकों को और नामों की सूची को बचा ले, ताकि ये चीज़ें शैतान के हाथों में न पड़ें...।" मैंने उन्हें चाबियाँ देने से इंकार कर दिया। पुलिसवालों ने मेरी बिल्डिंग के पास ले जाकर गाड़ी रोक दी, मुझे गाड़ी में ही बंद किया और खुद मेरे अपार्टमेंट में जा घुसे। मैं गाड़ी में बैठी-बैठी लगातार परमेश्वर से प्रार्थना कर रही थी, हर गुज़रता हुआ पल मेरे लिए एक यातना था। काफी देर के बाद पुलिस वापस आयी और गुस्से में बोली, "तू वाकई बेवकूफ है, पता है क्यों? तेरे घर में एक भी पुस्तक नहीं है, और फिर भी तू उन कलीसिया के लोगों को बचाने के लिए जी-जान लगा रही है?" उनकी यह बात सुनकर, मेरे बेचैन दिल को आखिरकार राहत मिली, मैंने तहेदिल से परमेश्वर को उसकी सुरक्षा के लिए धन्यवाद दिया। यह तो मुझे बाद में पता चला कि पुलिस को मेरे घर से कोई पुस्तकें नहीं मिलीं, वे वहाँ से सिर्फ 4,000 नकद युआन, एक मोबाइल फोन, मेरे और मेरे घरवालों के सारे फोटो अपने साथ ले गये। यह तो अच्छा हुआ कि पुलिस की छापेमारी के वक्त वहाँ पर मेरी छोटी बेटी मौजूद थी, जैसे ही पुलिस वहाँ से गयी, उसने वहाँ पर बची हुई परमेश्वर के वचनों की सारी पुस्तकें और आस्था सामग्री तुरंत कलीसिया में ले जाकर दे दीं। अगले दिन पुलिस फिर वहाँ तलाशी लेने के लिए गयी, लेकिन एक बार फिर खाली हाथ लौटी।

शाम होते ही, पुलिसवाले मुझे मेरे स्थानीय पुलिस स्टेशन में ले गए और फिर वही सवाल करने लगे जो उन्होंने मुझसे पहले पूछे थे। यह देखकर कि मैं अभी भी अपनी ज़बान नहीं खोल रही हूँ, उन्होंने मुझे मनाने के लिए थ्री-सेल्फ कलीसिया की किसी पादरी को बुलाया। उसने कहा, "अगर तुम थ्री-सेल्फ कलीसिया की ईसाई नहीं हो, तो फिर तुम झूठे मार्ग पर चल रही हो।" मैंने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया, और मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना करती रही कि मेरे दिल की रक्षा करे। वो जितना ज़्यादा बोलती, उतने ही ज़्यादा बकवास उसके दावे होते, और फिर तो वो परमेश्वर को गाली देने और उसकी निंदा करने में पूरी तरह से जुट गयी। मैंने भड़कर, उसका मुँहतोड़ जवाब दिया, "पादरी, आप मनमाने ढंग से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा किए जा रही हैं, लेकिन क्या प्रकाशित-वाक्य की पुस्तक में साफ तौर पर नहीं लिखा है 'जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है' (प्रकाशितवाक्य 1:8)? आप अंधाधुंध तरीके से परमेश्वर की निंदा किए जा रही हैं, क्या आपको पवित्र आत्मा के नाराज़ होने का डर नहीं लगता? प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, 'परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा' (मत्ती 12:32)। क्या आपको डर नहीं लगता?" पादरी की ज़बान तालु से चिपक गयी। ऐसी झिड़की के बाद उसके पास वहाँ से जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मैंने मन ही मन परमेश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने इस अड़चन से पार पाने में मेरा मार्गदर्शन किया। जब उन्होंने देखा कि उनकी चाल कामयाब नहीं हुई, तो पुलिसवालों ने मुझे कागज़ पर कुछ लिखने के लिए कहा। मुझे समझ में नहीं आया कि वे मुझे ऐसा करने के लिए क्यों कह रहे हैं, मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की; तब मुझे एहसास हुआ कि यह शैतान की कोई धूर्त चाल है, मैंने यह कहकर लिखने से मना कर दिया कि मुझे लिखना नहीं आता। मुझे बाद में दो पुलिस अधिकारियों की आपसी बातचीत से पता चला कि वो मुझसे इसलिए लिखवा रहे थे ताकि वे लोग मेरी लिखावट का मिलान उन नोटबुक्स से कर सकें जो उन्हें हमारे सभा-स्थल से मिली थीं और फिर उसके आधार पर मेरे खिलाफ आरोप-पत्र बना सकें। इससे मुझे यह पता चल गया कि इन अधिकारियों की औकात सीसीपी सरकार द्वारा प्रशिक्षित ऐसे आवारा कुत्तों और प्यादों से ज़्यादा कुछ नहीं है जो निष्ठावान लोगों को यातना देने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे और कोई भी कपटपूर्ण हथकंडा अपना सकते थे—ये लोग सचमुच बहुत ही घातक, कपटी, दुष्ट और घिनौने हैं! एक बार मैं इन आवारा कुत्तों के नीच चेहरे देख चुकी थी जो परमेश्वर में विश्वास रखने वालों को यातना देते हैं, मैंने मन ही मन एक संकल्प किया: मैं शैतान के आगे कभी नहीं झुकूँगी या घुटने नहीं टेकूँगी!

आधी रात तक वो लोग मुझसे सवाल-जवाब करते रहे, लेकिन धार्मिक अनुभाग का मुखिया मुझसे कुछ भी उगलवा नहीं सका। अचानक उसने अपना खूँखार जानवर वाला रूप दिखाया और गुस्से से मुझ पर चिल्लाया, "कमीनी, मुझे रात ग्यारह बजे तक यह काम खत्म करना था। लेकिन तू ऐसी सिरदर्द है कि मुझे यहीं रुकना पड़ेगा, अगर मैंने तुझे तड़पाया नहीं तो हालात पूरी तरह से तेरी समझ में नहीं आएँगे!" यह कहते हुए, उसने मेरा दायाँ हाथ खींचा और मेज़ पर रखकर उसे ज़ोर से दबा दिया। उसने पाँच-छह सेंटीमीटर मोटा एक डंडा उठाया और मेरी कलाई पर ज़ोर से मारा। पहली ही चोट से मेरी कलाई की बड़ी नसें फूलने लगीं, और फिर आसपास की बाकी नसें भी फूलने लग गयीं। मैं ज़ोर से चिल्लाई और मैंने अपना हाथ खींचने की कोशिश की, लेकिन उसने कसकर पकड़ रखा था। चोट करते समय वह चीखा, "यह तेरे न लिखने की सज़ा है! यह तेरे ज़बान न खोलने की सज़ा! मैं तेरी वो हालत कर दूँगा कि तू कभी कुछ लिखने लायक ही न रहेगी! वह पाँच-छह मिनट तक ऐसे ही मेरी कलाई पर डंडे का प्रहार करता रहा। तब तक मेरा हाथ नारंगी की तरह फूल गया था, जैसे ही उसने मारना बंद किया, मैंने तेज़ी से अपना हाथ कमर के पीछे कर लिया। लेकिन वो दुष्ट पुलिसवाला पीछे गया, मेरे हाथों को पकड़ा और उन पर बुरी तरह से वार करने लगा क्योंकि वो हवा में लटक गए थे, और चिल्लाकर बोला, इन्हीं हाथों से तू अपने परमेश्वर के काम करती है न? मैं इन्हें तोड़कर रखा दूँगा, लूला कर दूँगा, तब हम देखेंगे कि तू कैसे कोई काम करती है! तब हम देखेंगे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों को तेरी ज़रूरत है क्या!" उसकी यह बात सुनकर मुझे इस दुष्ट पुलिसवालों के गिरोह से नफरत हो गयी। ये लोग इतने विकृत ढंग से बर्ताव करते हैं और स्वर्ग के विरुद्ध काम करते हैं; ये लोगों को सिर्फ सीसीपी सरकार का गुलाम बनने की अनुमति देते हैं और उनसे जी-तोड़ मेहनत करवाते हैं, लेकिन ये लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने या उसकी आराधना करने की अनुमति नहीं देते। परमेश्वर से जबरन धोखा करवाने की कोशिश में, मुझे क्रूर यातनाएँ देने को लेकर उस पुलिसवाले के अंदर किसी तरह की कोई आशंका नहीं थी—ये लोग वाकई इंसान की शक्ल में जानवर और दुष्टात्माएँ हैं, ये लोग बेहद दुष्ट और प्रतिक्रियावादी हैं! उस तरह से उस पुलिसवाले ने मुझे तीन बार पीटा; मार खा-खाकर मेरे हाथों में नील पड़ गयी, मेरी कलाइयाँ और मेरे हाथों का पिछला हिस्से इतने सूज गये कि लगता था जैसे अभी फट जाएँगे—दर्द बर्दाश्त से बाहर था। जब मैं भयंकर पीड़ा से कराह रही थी, तो परमेश्वर के वचनों के भजनों की कुछ पँक्तियाँ मेरे दिमाग में आ गयीं: "इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास")। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल में हलचल मचा दी, और मैंने सोचा: "यह बात सही है। परमेश्वर हमें बचाने के लिए बिना थके दिन-रात काम करता है। वह हम पर निगाह रखता और हमेशा हमारे साथ रहता है, वह हम पर असीम प्रेम और करुणा बरसाता है। अब, जबकि शैतान परमेश्वर को धोखा देने और भाई-बहनों का सौदा करने के लिए मुझ पर दबाव डाल रहा है, तो परमेश्वर उत्सुकता से उम्मीद कर रहा है कि मैं उसकी पक्की और शानदार गवाही दूँगी। मैं उसे संभवत: नीचा कैसे दिखा सकती हूँ या आहत कैसे कर सकती हूँ?" यह सोचकर, मैं अपने आँसू पी गयी और स्वयं को डरपोक या कायर नहीं, मज़बूत बनने के लिए कहा। सीसीपी सरकार इसलिए इतनी क्रूरता से मुझे यातना या नुकसान नहीं पहुँचा रही थी क्योंकि वह मुझसे व्यक्तिगत तौर पर घृणा करती है, बल्कि अपने परमेश्वर-विरोधी, परमेश्वर से घृणा करने वाले सार के कारण ऐसा कर रही थी। मेरे साथ उस तरह से बर्ताव करने के पीछे इसका लक्ष्य था मुझसे परमेश्वर को धोखा दिलवाना और उसे नकारना, मुझसे अपने नियंत्रण को स्वीकार करवाना और हमेशा के लिए मुझे अपना गुलाम बनाना। लेकिन मैं जानती थी कि मैं उसके आगे कभी नहीं झुक सकती, बल्कि मुझे परमेश्वर के साथ खड़ा रहना है और शैतान को शर्मिंदा करना है। मैंने मन ही मन उस भजन को बार-बार गाया, धीरे-धीरे मैंने अपनी आत्मा को मबज़ूत होते हुए पाया। मुझे पीटने के बाद, उस दुष्ट पुलिसवाने ने कुछ पुलिसवालों को आदेश दिया कि मुझ पर नज़र रखें, और उन लोगों ने मुझे रात भर जगा कर रखा। अगर वे लोग मुझे ज़रा भी पलक झपकते देखते, तो मुझ पर चिल्लाते या लात मारते। लेकिन मैं तो पूरी तरह से परमेश्वर के प्रेम में डूबी हुई थी, इसलिए मैंने उनके आगे हार नहीं मानी।

अगले दिन, धर्म अनुभाग का मुखिया मुझसे सवाल-जवाब करने फिर से आया। जब उसने देखा कि मैं ज़बान नहीं खोल रही हूँ, तो उसने एक डंडा उठाया और मेरी जाँघों पर मारा। कई बार मार खाने के बाद, मेरी टाँगें इतनी सूज गयीं कि अपनी सूजी हुई टाँगों के आसपास मुझे पैंट कसी हुई महसूस होने लगी। एक दूसरा पुलिसवाला एक तरफ खड़ा मुझ पर तंज़ कस रहा था, "जिस परमेश्वर में तू विश्वास रखती है, अगर वो इतना ही महान है, तो अब आकर हमारे उत्पीड़न से तुझे बचाता क्यों नहीं?" उसने परमेश्वर को गाली देने और उसकी निंदा करने वाली और भी कई बातें कहीं। मैं आहत हुई और मुझे गुस्सा आ गया, मैंने मन ही मन उसकी ईश-निंदा का जवाब दिया: "दुष्टात्माओं के झुंडो, परमेश्वर तुम्हारे कुकर्मों के हिसाब से तुमसे प्रतिशोध लेगा! अब वक्त आ गया है कि परमेश्वर तुम्हें उजागर करे और तुम्हारे कुकर्मों के तथ्यों को इकट्ठा करे!" फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों पर विचार किया: "दिल में हज़ारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, पापमयता की सहस्राब्दियाँ दिल पर अंकित हैं—यह कैसे घृणा को प्रेरित नहीं करेगा? परमेश्वर का बदला लो, अपने शत्रु को पूरी तरह समाप्त कर दो, उसे अब अनियंत्रित ढंग से फैलने की अनुमति न दो, और उसे अपनी इच्छानुसार परेशानी पैदा मत करने दो! यही समय है: मनुष्य अपनी सभी शक्तियों को लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित किया है, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे को तोड़ सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अनुमति दे कि वे अपने दर्द से उठें और इस दुष्ट प्राचीन शैतान को अपनी पीठ दिखाएं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)")। परमेश्वर के वचनों से, मैंने उसकी तात्कालिक इच्छा और उत्कट पुकार को अनुभव किया और इस बात को समझा कि परमेश्वर सीसीपी सरकार का सर्वनाश करने वाला है। हालाँकि उस समय मैं सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न का शिकार हो रही थी, लेकिन परमेश्वर अपनी बुद्धि का प्रयोग शैतान की धूर्त साज़िशों के आधार पर करता है, और मेरे साथ जो कुछ हो रहा था, परमेश्वर उसका इस्तेमाल कर रहा था, ताकि मैं उसके शैतानी सार को साफ तौर पर देख सकूँ, शायद मैं अच्छाई और बुराई को पहचान सकूँ। इस तरह, मेरे भीतर सच्चा प्रेम और सच्ची घृणा उभर सके; फिर मैं सीसीपी सरकार को हमेशा के लिये त्याग सकूँ और उसे नकार सकूँ और अपने दिल को परमेश्वर की ओर मोड़ सकूँ, जिससे कि मैं परमेश्वर की गवाही देकर शैतान को शर्मिंदा कर सकूँ। परमेश्वर की इच्छा को समझ लेने के बाद, मेरे अंदर एक ज़बर्दस्त शक्ति का संचार हुआ। मैंने निश्चय कर लिया कि मैं परमेश्वर के प्रति निष्ठावान रहूँगी और शैतान को शर्मिंदा करूँगी। हालाँकि मैं लगातार क्रूर उत्पीड़न का शिकार हो रही थी, मेरा पूरा शरीर कमज़ोर हो चुका था, मेरे पैर दर्द बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे, लेकिन परमेश्वर की शक्ति पर भरोसा करके, मैंने अभी तक ज़बान नहीं खोली थी (बाद में मुझे पता चला कि मार खा-खाकर मेरे पैरों में नील पड़ गयी थी, आज भी मेरे दाएँ पैर की माँसपेशियों में दम नहीं है)। आखिरकार, धर्म अनुभाग का मुखिया झुंझलाकर तेज़ी से बाहर निकल गया।

तीसरे दिन, दुष्ट पुलिसवालों ने मुझसे फिर सवाल-जवाब किए और मुझे पीटा, वे तभी रुके जब उन्होंने अपनी सारी भड़ास निकाल ली और पीट-पीटकर थक गए। उसके बाद, मेरे पास एक महिला पुलिस अधिकार आयी, और झूठी सहानुभूति दिखाने लगी, "हमारे यहाँ पहले एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की विश्वासी आ चुकी है। उसने हमें कुछ नहीं बताया और उसे 10 साल के लिए जेल भेज दिया गया। चुप रहने से बताओ तुम्हें क्या हासिल हो रहा है? इस जगह पर तुम्हारे 10 साल खराब हो जाएँगे, और जब बाहर निकलोगी तो परमेश्वर को भी तुम्हारी ज़रूरत नहीं होगी, और तब तुम्हें पछताने का अवसर भी नहीं मिलेगा...।" उसने कई तरह से मुझे फुसलाने की कोशिश की ताकि मैं ज़बान खोल दूँ, लेकिन मैं मन ही मन परमेश्वर से मेरी रक्षा करने की प्रार्थना करती रही ताकि मैं शैतान के धूर्त षडयंत्रों का शिकार न हो जाऊँ। प्रार्थना के बाद, भजन का एक अंश मेरे दिमाग में कौंध गया: "मैं स्वयं परमेश्वर के पीछे जाने और उसका अनुसरण करने के लिए तत्पर हूँ। अब परमेश्वर मुझे त्याग देना चाहता है लेकिन मैं अभी भी उसका अनुसरण करना चाहता हूं। वह मुझे चाहे या ना चाहे, मैं तब भी उससे प्रेम करता रहूंगा, और अंत में मुझे उसे प्राप्त करना होगा। मैं अपना हृदय परमेश्वर को अर्पण करता हूं, और चाहे वह कुछ भी करे, मैं अपने पूरे जीवन उसका अनुसरण करूंगा। चाहे कुछ भी हो, मुझे परमेश्वर से प्रेम करना होगा और उसे प्राप्त करना होगा; मैं तब तक आराम नहीं करूंगा जब तक मैं उसे प्राप्त नहीं कर लेता हूँ" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "मैं परमेश्वर को प्रेम करने को दृढ़-संकल्पित हूँ")। मैंने सोचा, "हाँ, मैं अब परमेश्वर में आस्था रखती हूँ और परमेश्वर का ही अनुसरण करना चाहती हूँ क्योंकि मैं यही करना चाहती हूँ। इससे मुझे अंतर नहीं पड़ता कि परमेश्वर मुझे चाहता है या नहीं—उसके बावजूद मैं आखिरी साँस तक परमेश्वर का अनुसरण करूँगी!" परमेश्वर के वचनों ने मुझे एक स्पष्टता दी और मुझे एहसास हुआ कि शैतान यह सब इसलिए कर रहा है ताकि मेरे और परमेश्वर के बीच एक विवाद पैदा हो जाए, ताकि मेरा जोश ठंडा हो जाए, मैं परमेश्वर को नकार दूँ, और अंत में यहूदा की तरह परमेश्वर को धोखा दे दूँ। तो, शैतान को हराने और शैतान पर परमेश्वर की विजय की गवाही देने का एकमात्र तरीका यही था कि मैं परमेश्वर में अपनी आस्था बनाए रखूँ और उसके प्रति निष्ठावान रहूँ। मैंने सोचा: "मैं जेल भेजी जाऊँ या नहीं, और मेरी परिणति क्या होगी, यह सब परमेश्वर के हाथों में है। हालाँकि मेरे जीवन की व्यवस्था और आयोजन का निर्धारण परमेश्वर करता है, मेरी इस मामले में कोई राय नहीं है, और मुझे पूरा यकीन है कि परमेश्वर जो भी करता है मुझे बचाने के लिए ही करता है। हालाँकि जेल में मुझे शायद कोई देह-सुख न मिले, लेकिन मुझे आध्यात्मिक संतोष मिलेगा। इसके अलावा, परमेश्वर के पक्ष में जेल जाना मेरे लिए सम्मान की बात है, जबकि अगर मैंने परमेश्वर को धोखा दे दिया, तो मैं सारी गरिमा और निष्ठा गँवा दूँगी, और मेरी अंतरात्मा को फिर कभी सुकून नहीं मिलेगा।" इसलिए मैंने मन ही मन संकल्प किया: अगर मुझे जेल भी भेज दिया जाता है, तो भी मैं परमेश्वर के प्रति अंत तक निष्ठावान बनी रहूँगी; मैं परमेश्वर को अपना सच्चा प्रेम समर्पित करती हूँ ताकि शैतान को हमेशा के लिए अपमानित कर हराया जा सके। दुष्ट पुलिसवालों ने मुझ पर अच्छे और बुरे दोनों तरह के पुलिसवालों को आज़मा कर देख लिया, उन्होंने लगातार दिन-रात तीन दिनों तक मेरा क्रूर उत्पीड़न किया, लेकिन उन्हें मुझसे कोई सुराग नहीं मिला। अब उनके पास एक ही विकल्प बचा था, मुझे मारें-पीटें और ले जाकर नज़रबंदी गृह में बंद कर दें। जैसे ही उन्होंने मुझे बंद किया, एक पुलिसवाले ने बहुत ही विद्वेषपूर्ण ढंग से कहा, "तू साँस ले ले, हम फिर तुझसे पूछताछ करेंगे!"

पाँच दिनों के बाद, दुष्ट पुलिस मुझसे पूछताछ के लिए फिर से आई, लेकिन इस बार उन्होंने मुझे तोड़ने के लिए बारी-बारी से पूछताछ की। उन्होंने मुझे धातु की ठंडी कुर्सी पर बैठने का आदेश दिया और मेरे हाथों को उससे बाँध दिया। उन्होंने मेरे सीने के आगे धातु की एक छड़ी लगा दी ताकि मैं हिल न सकूँ, मेरे पैर ज़मीन से ऊपर लटक रहे थे। ऐसा उन्होंने इसलिए किया ताकि मैं अपनी माँसपेशियों को हिला-डुला न सकूँ, तुरंत ही मेरे हाथ-पाँव सुन्न हो गए। दुष्ट पुलिसवाला मुझसे बोला, "इस कुर्सी से हमने आज तक जिसको भी बाँधा है, उसने हमारे सामने सब-कुछ उगल दिया। अगर तूने एक दिन में ज़बान नहीं खोली, तो तुझे दो दिनों तक बाँधकर रखा जाएगा। अगर तू दो दिनों में नहीं बोली, तो फिर तीन दिनों तक। मुझे तुझसे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस इतना बता दे कि तेरी कलीसिया में कौन-कौन अगुवा हैं?" मुझे शक्ति देने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद, मैं बस एक ही विचार पर कायम रही: मुझे किसी के साथ द्रोह नहीं करना है! वो लोग मुझसे लगातार पूछताछ करते रहे, उन्होंने मुझे कुछ भी खाने को नहीं दिया, पानी तक नहीं पूछा, न ही उन्होंने मुझे बाथरूम जाने दिया। उस शाम, मुझे जगाए रखने के लिए, उन्होंने मेरा एक हाथ कुर्सी से बाँधे रखा, लेकिन मुझे कुर्सी की बगल में खड़ा रखकर पूछताछ करते रहे। मैं थक गयी थी और मुझे भूख लग रही थी, मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया था। मैं अपने दम पर खड़ी नहीं रह पा रही थी, किसी तरह कुर्सी का सहारा लेकर कुर्सी पर झुककर खड़ी थी। लेकिन जैसे ही मैं कुर्सी पर झुकती या झपकी लेने की सोचती भी, तो पुलिसवाला बाँस का लम्बा-सा डंडा मेरी ओर लहराते हुए मेरे चेहरे पर मारता, सारी रात उन्होंने मुझे एक बार भी आँखें बंद नहीं करने दीं। ऐसा दो दिनों तक चलता रहा, मैं इतनी कमज़ोर हो गयी थी कि मैं लंगड़ाने लगी, सूखकर काँटा हो गयी। मुझे कुछ पता नहीं था कि ये लोग मुझे इस अवस्था में और कब तक रखेंगे; मुझे लगने लगा था कि मैं ये सब और ज़्यादा नहीं झेल पाऊँगी, मैं परमेश्वर को धोखा देकर यहूदा बन जाऊँगी, इसलिए मैंने बार-बार परमेश्वर को पुकारा: "हे परमेश्वर! मेरा शरीर बहुत ही कमज़ोर हो गया है और मेरा आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा है। मुझे यहूदा बनने से बचा ले।" जब मैं तीव्रता से परमेश्वर को पुकार रही थी, तो एक दुष्ट पुलिसवाले ने परमेश्वर के वचनों की एक पुस्तक निकाली और पढ़ने लगा: "मैं उन लोगों पर और अधिक दया नहीं करूँगा जिन्होंने गहरी पीड़ा के दिनों में मुझ पर रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई है, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी ही दूर तक है। साथ ही साथ, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं है जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, ऐसे लोगों के साथ संबद्ध होना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। यही मेरा स्वभाव है, इस बात की परवाह किए बिना कि व्यक्ति कौन हो सकता है। मुझे तुम लोगों को अवश्य बता देना चाहिए कि: जो कोई भी मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई भी मेरे प्रति निष्ठावान रहा है वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो")। प्रकाश ने मेरे दिल को भर दिया—क्या परमेश्वर मुझे रास्ता नहीं दिखा रहा था? मैंने देखा कि परमेश्वर सचमुच उम्मीदों से भरा था, मेरे लिए चिंतित था, और मुझे मज़बूती देने के लिए, उसने शैतानों के इस घरोंदे में मुझे परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाने के लिए एक दुष्ट पुलिसवाले का इस्तेमाल किया था। इसके ज़रिए, परमेश्वर मुझे साफ तौर पर बता रहा था कि जो लोग कठिनाइयों में भी उसके प्रति निष्ठावान बने रहते हैं, उन्हें वह प्रेम करता है और आशीष देता है, उनसे वह नफरत करता है और नकार देता है जो कमज़ोर पड़कर उसे धोखा देते हैं। मैं उसके प्रेम और करुणा को देखते हुए, उसकी उम्मीदों पर खरी कैसे न उतरती? जब दुष्ट पुलिसवाले ने पढ़ना समाप्त किया, तो उसने मुझसे पूछा, "क्या तू परमेश्वर की इन्हीं बातों का अनुसरण करती है? मतलब, चुप रहना?" मैंने कोई उत्तर नहीं दिया और उसे लगा कि मैंने उसकी बात को सुना ही नहीं, इसलिए उसने उस अंश को कई बार पढ़ा, और बार-बार वही सवाल पूछता रहा। मैंने देखा कि परमेश्वर कितना बुद्धिमान और सर्वशक्तिमान है: वह दुष्ट पुलिसवाला परमेश्वर के वचनों को जितना ज़्यादा पढ़ता, वे वचन मेरे दिल पर उतने ही ज़्यादा नक्श होते गये, और मेरी आस्था उतनी ही ज़्यादा मज़बूत होती गयी। मैंने संकल्प कर लिया कि चाहे ये शैतान मुझसे अपराध स्वीकार करवाने की कितनी भी कोशिश करें, लेकिन मैं कभी यहूदा नहीं बनूँगी!

तीसरे दिन, दुष्ट पुलिस ने मुझे सीढ़ियों पर चढ़ाया-उतारा, पूछताछ के लिए मुझे एक कमरे से दूसरे कमरे में ले गये, ताकि मेरी बची-खुची शक्ति भी जाती रहे। जब तक कि मेरा शरीर जर्जर न हो गया, मेरे पाँव काँपने न लगे, और मेरे लिए सीढ़ियाँ चढ़ना नामुमकिन न हो गया, तब तक यह उत्पीड़न चलता रहा। लेकिन परमेश्वर के वचनों द्वारा प्राप्त आस्था और शक्ति के बल पर, मैंने ज़बान नहीं खोली। रात होने तक वे लोग मुझसे से पूछताछ करते रहे, लेकिन मैंने मुँह नहीं खोला, इसलिए उन्होंने मुझे धमकी दी, "अगर तू ज़बान नहीं खोलेगी, तो भी हम तुझे अपराधी सिद्ध कर देंगे। हम तुझे फँसा देंगे!" उनकी यह बात सुनकर मैं डर गयी और मैंने सोचा: "और किस तरह से ये लोग मुझे यातना दे सकते हैं? अब मैं टूट चुकी हूँ और ज़्यादा नहीं झेल सकती...।" तब मैंने परमेश्वर को पुकारा: "हे परमेश्वर! मेरी मदद कर। अब मैं सचमुच और नहीं सह सकती। मेरी रक्षा और मार्गदर्शन कर ताकि मैं जान सकूँ कि तेरे साथ कैसे सहयोग करना है।" इस प्रार्थना के बाद मैंने अपने अंदर शक्ति महसूस की, उसके बाद मैंने उतना दर्द महसूस नहीं किया। इस तरह, इतने पीड़ादायी और मुश्किल पलों में, निरंतर प्रार्थना से, परमेश्वर ने मुझे टिके रहने के लिए आस्था और शक्ति प्रदान की।

चौथे दिन सुबह-सुबह, यह देखकर कि तीन दिनों की पूछताछ का कोई नतीजा नहीं निकला, दुष्ट पुलिसवालों ने मेरी हथकड़ियाँ खोल दीं और मुझे ज़मीन पर पटक दिया। उन्होंने मुझे उठने की मनाही कर दी और घुटनों के बल बैठने के लिए कहा। मैं पहले ही घुटनों के बल बैठी थी, इस बात का फायदा उठाते हुए, मैंने परमेश्वर से मन ही मन प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! मैं जानती हूँ कि पिछले कई दिनों के उत्पीड़न, पूछताछ और मुझसे अपराध स्वीकार करवाने की कोशिशों में तूने ही मेरी रक्षा की है, तेरे प्रेम और करुणा के लिए धन्यवाद देने की खातिर मेरे पास शब्द नहीं हैं। हे परमेश्वर! हालाँकि मुझे नहीं पता कि दुष्ट पुलिसवाले आगे चलकर मुझे किस तरह से यातना देंगे, लेकिन चाहे कुछ भी हो जाए, मैं तुझे कभी धोखा नहीं दूँगी, न ही मैं कभी अपने भाई-बहनों का सौदा करूँगी। मेरी बस यही विनती है कि तू मुझे आस्था और शक्ति दे और मुझे मज़बूती से खड़ा रख।" जैसे ही मेरी प्रार्थना समाप्त हुई, मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे अंदर शक्ति का संचार हो रहा है, मैं अच्छी तरह से समझ गयी कि परमेश्वर ने मुझे अपने प्रेम-पाश में बाँध लिया है। ये शैतान अब मुझे जैसे चाहें सताएँ, मैं जानती थी कि इस पर काबू पाने के लिए परमेश्वर मुझे राह दिखाएगा। कुछ समय के बाद, शायद दुष्ट पुलिसवालों को यह अंदाज़ा हो गया कि मैं परमेश्वर से प्रार्थना कर रही हूँ, वे गुस्से में बड़बड़ाने लगे, चिल्लाने और मुझे गालियाँ देने लगे। उनमें से एक ने एक अखबार उठाकर उसका गोल डंडा जैसा बनाया और बड़ी बेरहमी से मेरी कनपटी पर दे मारा। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया और मैं बेहोश होकर फर्श पर गिर पड़ी। मुझे होश में लाने के लिए उन्होंने मेरे ऊपर ठंडा पानी डाला, उसी अवस्था में मैंने एक दुष्ट पुलिसवाले की आवाज़ सुनी जो धमकी भरे लहजे में मुझसे कह रहा था, "जो कुछ जानती है अगर वो सब तूने नहीं बताया, तो मैं मार-मारकर तेरी जान ले लूँगा या तुझे अपाहिज बनाकर छोड़ूँगा! वैसे भी अगर मैं तुझे मार भी दूँगा, तो किसी को पता नहीं चलेगा, तेरे भाई-बहनों में से किसी की भी यहाँ आने की हिम्मत नहीं होगी।" मैंने एक दूसरे पुलिसवाले की आवाज़ भी सुनी, "अब जाने भी दो। अगर ऐसे ही मारते रहे, तो ये मर जाएगी। इस केस में कोई दम नहीं है।" यह बात सुनकर मुझे थोड़ी राहत मिली, मैं जानती थी कि परमेश्वर मेरी कमज़ोरी के प्रति समझदारी दिखा रहा था, एक बार फिर से उसने मेरे लिए रास्ता खोल दिया था। लेकिन दुष्ट पुलिसवाले अभी भी हार मानने को तैयार नहीं थे, मेरी ज़बान खुलवाने के लिए वे लोग मेरी छोटी बहन और मेरे बेटे को ले आए। उन दोनों में से कोई भी परमेश्वर का विश्वासी नहीं था। जब मेरी बहन ने मेरी काली पड़ चुकी आँखें, सूजे हुए और ज़ख्मी हाथ देखे, तो मुझसे यह कहने के बजाय कि मैं पुलिस को सब-कुछ बता दूँ, उसने रोते हुए कहा, "ली, मुझे यकीन है तुम कुछ गलत नहीं कर सकती। अपनी बात पर अटल रहो।" मेरी बहन को मेरा हौसला बढ़ाते हुए देखकर, पुलिसवाला मेरे बेटे की ओर मुड़कर बोला, "अपनी माँ से बात करो और कहो कि वो हमसे सहयोग करे, उसके बाद वो घर जाकर तुम्हारी देखभाल कर सकती है।" मेरे बेटे ने मेरी ओर देखा और पुलिसवाले की बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जाते-जाते वो मेरे पास आया और अचानक बोला, "मॉम, मेरी चिंता मत करना। आप अपना ख्याल रखो, मैं अपना ख्याल रख लूँगा।" यह देखकर कि मेरा बेटा कितना समझदार और अक्लमंद हो गया है, मैं इतनी भावुक हो गयी कि बता नहीं सकती, मैं बस ज़ोर से गर्दन हिलाती रही और जब पुलिसवाले उन दोनों को कमरे बाहर ले जा रहे थे, तो मैं चीखकर रो पड़ी। इस घटना से मैंने एक बार फिर परमेश्वर के प्रेम और देखभाल की अनुभूति की। परमेश्वर मेरी कमज़ोरी को समझ रहा था, क्योंकि पिछले कई दिनों से मैं अपने बेटे को लेकर सबसे ज़्यादा परेशान थी। मुझे इस बात की चिंता थी कि मेरे बगैर वो अपनी देखभाल नहीं कर पाएगा। इससे भी ज़्यादा चिंता वाली बात यह थी कि वो अभी छोटा था, कहीं ऐसा न हो कि जब वो पुलिस स्टेशन में आए, तो ये लोग उसका दिमाग घुमा दें और वो इस बात को लेकर मुझसे नफरत करने लगे कि मैं परमेश्वर में आस्था रखती हूँ। बल्कि मेरी उम्मीद के विपरीत, उसने दुष्ट पुलिसवालों की निंदाजनक और ज़हरीली बातें सुनने के बजाय, मुझे ढ़ाढ़स बँधाया। तब मैंने देखा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सचमुच कितना अद्भुत है! दरअसल परमेश्वर ही इंसान के दिल और आत्मा का आयोजन करता है। मेरे बेटे और बहन के जाने के बाद, दुष्ट पुलिसवाले ने एक बार फिर मुझे धमकी दी, "अगर तूने अभी भी कुछ नहीं बताया न, तो तू मान या न मान, हम तुझे और कई दिनों तक दिन-रात सताएँगे। और उसके बाद भी तू नहीं बोली, तो भी हम तुझे तीन से पाँच साल तक के लिए जेल में डाल सकते हैं...।" परमेश्वर के कई कर्मों का अनुभव कर लेने के बाद, मेरे अंदर परमेश्वर के प्रति पूरी आस्था थी, इसलिए मैंने पूरे निश्चय और दृढ़ता से कहा, "बुरे से बुरा यही होगा न कि तुम्हारे हाथों मेरी मौत हो जाएगी! तुम मेरे तन को यातना दे सकते हो, लेकिन मेरे मन को नहीं झुका सकते। मेरे शरीर की मौत भी हो गयी, तो भी मेरी आत्मा परमेश्वर के पास रहेगी।" मेरी दृढ़ता देखकर, उन दुष्ट पुलिसवालों के पास पूछताछ बंद करके मुझे वापस मेरी कोठरी में ले जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। शैतान को बुरी तरह हारकर शमिंदा होते देख, मेरी खुशी का ठिकाना न रहा, और मैं इस बात को अच्छी तरह समझ गयी कि हर चीज़ पर परमेश्वर का ही प्रभुत्व है और जीवन-मृत्यु पूरी तरह से उसी के हाथों में है। हालाँकि कई दिनों तक मुझे खाने-पीने से वंचित रखा गया था और मेरा शरीर बिल्कुल जर्जर हो गया था, लेकिन फिर भी परमेश्वर का प्रेम मेरे साथ था। उसके वचन निरंतर मुझे आस्था और शक्ति दे रहे थे, जिसके कारण मैं शैतान की उस चाल को नाकाम कर पायी जिसका इस्तेमाल करके वो बारी-बारी से पुलिसवालों के ज़रिए मुझे थका-थकाकर मुझसे अपराध स्वीकार करवाना चाहता था। इससे मैं सचमुच समझ पायी कि परमेश्वर की जीवन-शक्ति कितनी अलौकिक और महान है—परमेश्वर हमें जो शक्ति देता है, वह कभी समाप्त नहीं होती और शरीर उसमें कोई बाधा नहीं बनता।

कुछ दिन बाद, सीसीपी सरकार ने सार्वजनिक जीवन को बाधित करने के आरोप गढ़कर, मुझे तीन साल की सश्रम पुनर्शिक्षा की सज़ा दे दी, पुलिसवाले मुझे श्रमिक शिविर में ले गये। मैंने वहाँ अमानवीय जीवन जिया, सुबह से लेकर शाम तक काम किया। मार खा-खाकर मेरे हाथ ज़ख्मी हो चुके थे, सज़ा के पहले छह महीने तक मेरे हाथों के पिछले हिस्से की माँसपेशियाँ इतनी सख्त रहीं कि मैं अपने कपड़े भी नहीं धो पाती थी। जब भी बारिश होती, तो नसों में ठीक से रक्त-संचार न होने के कारण मेरी बाज़ुएँ दर्द करतीं और सूज जातीं। उसके बावजूद, जेल के सुरक्षाकर्मी मुझे इस बात के लिए मजबूर करते कि मैं हर रोज़ अपने कोटे से ज़्यादा काम करूँ, वरना मेरी सज़ा बढ़ा दी जाएगी। इसके अलावा, वो लोग परमेश्वर के विश्वासियों पर कड़ी नज़र रखते थे; जब हम लोग खाना खाते, कपड़े धोते, यहाँ तक कि टॉयलेट भी जाते, तो कोई न कोई हम पर नज़र रखता था...। शारीरिक पीड़ा, काम का बोझ, और मनोवैज्ञानिक यातना, ये सब मिलकर मुझे भयंकर कष्ट पहुँचाते थे। मुझे लगा इस जगह पर तीन साल बहुत ज़्यादा होंगे, शायद मैं न झेल पाऊँ। अपने दुखों से छुटकारा पाने के लिए कितनी ही बार मेरे मन में आत्महत्या का विचार आया। जब दर्द असहनीय हो गया, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, तुझे तो पता है कि मेरा शरीर कितना कमज़ोर है। इस समय मैं बहुत कष्ट झेल रही हुँ, मुझसे यह कष्ट अब और बर्दाश्त नहीं होता। मैं अब मरना चाहती हूँ। प्लीज़ मुझे प्रकाशित कर और राह दिखा, मुझे इच्छाशक्ति दे, और मुझे टिके रहने की आस्था दे...।" परमेश्वर ने मुझ पर करुणा दिखायी, जिससे मुझे परमेश्वर के वचनों के इस भजन का ख्याल आया: "इस समय, परमेश्वर इस तरह का कार्य करने के लिए देहधारी बना है, उस कार्य को पूरा करने के लिए जो उसने अभी पूर्ण नहीं किया है, इस युग को समाप्ति की तरफ़ ले जाने के लिए, इस युग का न्याय करने के लिए, दुख के समुन्दर की दुनिया से अत्यंत पापियों को बचाने के लिए और पूरी तरह उन्हें बदलने के लिए। मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। ... लेकिन समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से 'नरक' और 'अधोलोक' में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण मनुष्य के जीवन के लिए है")। जैसे ही मैंने इन वचनों पर विचार किया, तो परमेश्वर के प्रेम से मेरा हृदय प्रेरित हुआ और उसमें सुधार आया। मैंने इस बात पर विचार किया कि बुरी तरह से भ्रष्ट हो चुके इंसान को बचाने की खातिर, किस तरह परमेश्वर ने उच्चतम स्तर से उतरकर, निम्नतम स्तर पर देहधारण किया, और अपना कार्य करने के लिए शैतान की माँद, चीन में प्रकट होने का खतरा उठाया। उसने इंसान की खातिर भयंकर यातना, दुख, उत्पीड़न और मुश्किलें झेली हैं, फिर भी परमेश्वर स्वयं को चुपचाप खपा रहा है, न कोई शिकायत करता है और न ही पश्चाताप करता है। परमेश्वर यह सब कार्य इसलिए करता है ताकि वह लोगों के एक ऐसे समूह को हासिल कर सके जो उसकि इच्छा को समझता हो, जो अपना चेहरा इंसाफ की ओर रखे, जो न कभी समर्पण करे और न हार माने। मैंने स्वयं को उस स्थिति में पाया क्योंकि परमेश्वर इसका इस्तेमाल मेरी इच्छा को मज़बूत करने, परमेश्वर के प्रति मेरी आस्था और आज्ञाकारिता को पूर्ण बनाने के लिए करना चाहता था; उसने ये हालात इसलिए पैदा किए ताकि मैं सत्य को समझ सकूँ और उसमें प्रवेश कर सकूँ। परमेश्वर ने जो पीड़ा और अपमान सहा है उसके आगे मेरे थोड़े से कष्ट तो इस लायक भी नहीं हैं कि उनकी चर्चा भी की जाए। अगर मैं जेल में इतने से कष्ट भी न झेल पाऊँ, तो परमेश्वर ने मेरी खातिर जो श्रमसाध्य प्रयास किए हैं, क्या मैं अपने आपको उनके काबिल सिद्ध कर पाऊँगी? इसके अलावा, जब मैं पहली बार गिरफ्तार हुई, तब दुष्ट पुलिसवालों ने मुझ पर जो क्रूर अत्याचार किए, उस समय परमेश्वर के मार्गदर्शन से ही मैं उन पर काबू पा सकी थी। परमेश्वर ने बहुत पहले मुझे अपने अद्भुत कर्म दिखा दिये थे, तो क्या मेरी आस्था और गहरी नहीं होनी चाहिए और क्या मुझे परमेश्वर की सुंदर गवाही नहीं देनी चाहिए? यह सोचकर, मेरी शक्ति लौट आयी, और मैंने मसीह का अनुकरण करने का मन बना लिया: चाहे कितने भी दुख और तकलीफें आएँ, मैं दृढ़ता से जीवन जीती रहूँगी। उसके बाद, जब भी मुझे लगा कि श्रमिक शिविर में जीना असह्य हो रहा है, तो मैं भजन गाती, और जब भी मैं ऐसा करती, तो परमेश्वर के वचन मेरे अंदर असीम आस्था और शक्ति भर देते, और मुझे झेलते रहने की प्रेरणा मिल जाती। उस समय, श्रमिक शिविर में कलीसिया के और भी बहुत से भाई-बहनों को कैद किया हुआ था। परमेश्वर की दी हुई बुद्धि के भरोसे, जब भी हमें अवसर मिलता, हम लोग परमेश्वर के वचनों पर नोट्स लिखकर एक-दूसरे को देते या कुछ वचनों पर सहभागिता करते—हम लोग एक-दूसरे को समर्थन देते और हौसला बढ़ाते। इस सच्चाई के बावजूद कि हम सब लोग सीसीपी सरकार की माँद में कैद थे, उन ऊँची दीवारों में कैद होकर, बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कटे हुए थे, यही वजह थी कि हम लोग परमेश्वर के हर एक वचन को और भी संजो रहे थे, परमेश्वर ने हमें जो प्रेरणा दी थी, अपने दिल में उसका और भी अधिक संग्रह कर रहे थे, और यही कारण था की हमारे दिल परस्पर गहराई से जुड़ गए थे।

29 अक्टूबर, 2005 को, मेरी सज़ा पूरी हो गयी और आखिरकार मुझे रिहा कर दिया गया। लेकिन जेल से रिहा होने के बाद भी, मुझे अपनी आज़ादी हासिल नहीं हुई थी। मेरी निगरानी करने के लिए पुलिस हमेशा लोगों को भेजती रहती, और वो लोग मुझे हर महीने पुलिस स्टेशन में हाज़िर होने का हुक्म देते। हालाँकि मैं अपने घर में थी, लेकिन फिर भी मुझे लगता था जैसे मैं अभी भी किसी अदृश्य जेल में हूँ। मुझे सीसीपी के मुखबिरों से सावधान रहना पड़ता था। अपने घर में रहते हुए भी, मुझे परमेश्वर के वचन पढ़ते समय, बहुत ज़्यादा सतर्क रहना पड़ता था, इस बात का डर बना रहता था कि पता नहीं कब पुलिस धावा बोल दे। इसके अलावा, चूँकि मेरी बहुत ज़्यादा निगरानी हो रही थी, इसलिए मैं किसी भी तरह से न तो अपने भाई-बहनों से मिल पा रही थी और न ही कलीसियाई जीवन जी पा रही थी। यह मेरे लिए बहुत ही पीड़ादायक था, एक-एक दिन एक-एक साल के बराबर लगता था। अंतत:, मैं इस तरह निगरानी किए जाने और दबाव में रहने के जीवन को, कलीसिया और भाई-बहनों से दूर रहने की ज़िंदगी को बर्दाश्त नहीं कर पायी। इस तरह, मैंने अपना होमटाउन छोड़ दिया और नयी नौकरी ढूँढ़ ली। आखिरकार मैं एक बार फिर से कलीसिया से सम्पर्क करके कलीसियाई जीवन जीना शुरू कर पायी।

सीसीपी सरकार के हाथों उत्पीड़न सहकर, मैंने पूरी तरह से और साफ तौर पर इसके पाखंडी और शैतानी सार को देखा जो प्रशंसा पाने के लिए आम जनता को धोखा देती है, मुझे यकीन हो गया कि यह स्वर्ग के खिलाफ ईश-निंदा करने और परमेश्वर का विरोध करने वाली दुष्टात्माओं के गिरोह के अलावा कुछ नहीं है। दरअसल सीसीपी सरकार हैवान की अवतार, शैतान का मूर्त रूप है; मेरे अंदर इसके लिए बहुत गहरी नफरत है और मैं इसकी कट्टर शत्रु होने की शपथ लेती हूँ। इन विपदाओं के दौरान, मैं परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता, संप्रभुता और अद्भुत कर्मों को भी अच्छी तरह से समझ पायी, मैंने परमेश्वर के वचनों के अधिकार और शक्ति का भी अनुभव किया, और मैंने सचमुच परमेश्वर के प्रेम और उसके महान उद्धार को भी महसूस किया: जब मैं खतरे में थी, तो यह परमेश्वर ही था जो निरंतर मेरे साथ रहा, और अपने वचनों से मुझे प्रबुद्ध और प्रकाशित करता रहा, आस्था और शक्ति देता रहा, एक के बाद एक होने वाले क्रूर अत्याचारों पर काबू पाने में मेरा मार्गदर्शन करता रहा और तीन सालों की लम्बी, अंधेरी कैद को भोगने में मेरी मदद करता रहा। परमेश्वर के उद्धार को पाकर, मैं कृतज्ञता से अभिभूत हूँ, मेरी आस्था दोगुनी हो गयी है, मैंने संकल्प किया है: आगे आने वाले जीवन में, मुझे चाहे जैसी भी मुश्किलों का सामना करना पड़े, मैं तमाम अंधकार के प्रभाव को दूर करने के लिए हमेशा परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और अगुवाई पर निर्भर रहूँगी, और आखिरी साँस तक दृढ़ता से परमेश्वर का अनुसरण करूँगी!

फुटनोट:

क. मूल पाठ में लिखा है "यह असमर्थ होने का प्रतीक है"।

ख. मूल पाठ में लिखा है "साथ ही अपमान के अयोग्य (और अपमान सहन न करने) होने का भी प्रतीक है"।

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