मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 30. केवल सत्य की खोज करके ही आप अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं

केवल सत्य की खोज करके ही आप अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं: यह ऐसी चीज है जिसे आपको जरूर समझना चाहिए और पूरी तरह से समझना चाहिए। अगर आप सत्य को पर्याप्त ढंग से नहीं समझते हैं, तो आप आसानी से ठोकर खाएँगे और पथभ्रष्ट हो जाएँगे। जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करने के लिए आपको प्रत्येक चीज में सत्य को अवश्य खोजना चाहिए। भले ही कोई भी समस्या उत्पन्न हो जाए, आपको उसका सामना इस तरह से करने का प्रयास करना चाहिए जो सत्य के अनुरूप हो, क्योंकि अगर आप उसका सामना किसी ऐसे तरीके से करते हैं जो पूर्ण रूप से पवित्र नहीं हो, तो आप सत्य के विरुद्ध जा रहे होते हैं। आप जो कुछ भी करें, आपको हमेशा उसके मूल्य पर विचार करना चाहिए। आप उन चीजों को कर सकते हैं जिनका अर्थ हो और आपको उन चीजों को अवश्य नहीं करना चाहिए जिनका कोई अर्थ नहीं हो। उन चीजों के संदर्भ में जिन्हें आप या तो कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं, अगर उन्हें छोड़ा जा सकता है, तो उन्हें छोड़ दें। या यदि आप इन चीजों को कुछ समय तक करते हैं और फिर उन्हें छोड़ देना चाहिए, तब तेजी से निर्णय लेकर, उन्हें तुरंत छोड़ दें। यही वह सिद्धांत है जिसका पालन आपको कुछ भी करते समय करना चाहिए। कुछ लोगो यह प्रश्न उठाते हैं: “सत्य की तलाश करना और उसे अभ्यास में लाना इतना कठिन क्यों है? यह धारा के विपरीत नाव खेने जैसा है; अगर आप आगे खेना बंद कर देते हैं तब आप बह कर पीछे चले जाते हैं। बुरे कर्म करना, या ऐसी चीजें करना जिसका कोई अर्थ न हो क्यों नाव में बहाव के साथ बहने की तरह है? यह वास्तव में बहुत आसानी से हो जाता है। यह सब किस बारे में है?” ऐसा इसलिए क्योंकि मनुष्य की प्रकृति परमेश्वर को धोखा देने की है और क्योंकि यह प्रतिक्रियावादी शक्ति है जिसने मनुष्य के भीतर मुख्य भूमिका ले ली है। एक प्रकृति जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करती है वह अवश्य ही ऐसी चीज़ें कर सकती है जो परमेश्वर को धोखा देती हों, और उसके लिए सकारात्मक चीज़ें करना निस्सन्देह कठिन होता है। यह पूरी तरह से उस प्रकृति के गुण द्वारा निर्धारित होता है। जब आप वास्तव में सत्य को समझने लगते हैं और अपने अंतर्मन से सत्य को प्रेम करने लगते हैं, तब आप उन चीज़ों को करने के लिए बेहतर रूप से तैयार होते हैं जो सत्य के अनुरूप हों, और आप ऊर्जावान हो जाते हैं। यह सामान्य हो जाता है, उस हद तक जहाँ आप इसे सरलता और प्रसन्नता से कर सकते हैं, और आप महसूस करते हैं कि कुछ भी नकारात्मक करने में बहुत श्रम की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा इसलिए क्योंकि आपके पास सत्य है और इसने आपके हृदय में मुख्य भूमिका ग्रहण कर ली है। यदि आप मनुष्य के जीवन के सत्य के बारे में वास्तव में समझते हैं, यदि आप यह सत्य समझते हैं कि किस प्रकार का इंसान बनें, कैसे निष्कपट और सरल व्यक्ति, एक ईमानदार व्यक्ति बनें, ऐसा व्यक्ति कैसे बनें जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उनकी सेवा करता हो, फिर दोबारा आप ऐसे बुरे काम कभी नहीं कर सकते हैं जो परमेश्वर की उपेक्षा करें या मसीह विरोधी या नकली चरवाहे की भूमिका कभी नहीं निभा सकते हैं। भले ही किसी ने आपको बहकाया होता, आप फिर भी ऐसा नहीं कर सकते थे; भले ही उन्होंने आपको मजबूर किया होता, फिर भी आप उस तरह से कार्य नहीं कर सकते थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि आपके भीतर सत्य है, आप बुराई से घृणा करने, नकारात्मक चीजों के लिए विरक्ति महसूस करने में सक्षम हैं, और इन चीजों को करने में आपको कठिनाई होगी, क्योंकि आपका स्वभाव परिवर्तित हो गया है। यदि आपके भीतर वास्तव में सत्य है, तो आप जिस मार्ग पर चलेंगे वह स्वभाविक रूप से सही मार्ग ही होगा। सत्य के बिना, बुरा करना आसान होता है और आप स्वयं की सहायता करने में सक्षम नहीं होंगे। उदाहरण के लिए, यदि आपके अंदर उद्दंडता और अहंकार है, तो परमेश्वर की उपेक्षा नहीं करना असंभव होगा, बल्कि आपसे उसकी उपेक्षा करवाई जाएगी। आप ऐसा जानबूझ कर नहीं करेंगे; आप ऐसा अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करेंगे। आपकी उद्दंडता और अहंकार के कारण आप परमेश्वर को नीची निगाह से देखेंगे, यह आपको परमेश्वर ऐसा दिखाएगा जैसे उनका कोई महत्व ही न हो, यह आपसे स्वयं की प्रशंसा करवाएगा, यह आपसे निरंतर आपको दिखावे में रखवाएगा और अंततः यह आपको परमेश्वर के स्थान पर बैठाएगा और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएगा। अंत में आप आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की अवधारणाएँ बनाएँगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं! उनके बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपने स्वभाव की समस्या को हल करना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या को मौलिक रूप से हल करना संभव नहीं है। जब आप में परमेश्वर की कुछ समझ हो जाए, जब आप मनुष्य के भ्रष्टाचार को देख सकते हों तथा उद्दंडता और अहंकार की पहचान कर सकते हों जो कि घृणित और बदसूरत है, तब फिर आप निराश, व्यथित और परेशान महसूस करेंगे। आप परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कुछ चीजें जागरुकता के साथ कर पाएँगे और ऐसा करके संतुष्टि महसूस करेंगे। आप परमेश्वर के लिए जागरुकता के साथगवाही दे पाएँगे और ऐसा करके आनंद महसूस करेंगे। आप जागरुकता के साथ अपने आप को उजाकर करेंगे और अपनी स्वयं की कुरूपता को उजागार करेंगे, और ऐसा करके आप स्वयं के भीतर अच्छा महसूस करेंगे और आपकी मनोस्थिति बेहतर हो जाएगी। इसलिए अपने स्वभाव में बदलाव लाने के प्रयास में पहला कदम परमेश्वर के वचन को समझना है और सत्य में प्रवेश करना है। केवल सत्य को समझने के द्वारा ही आपमें विवेक आ सकता है; केवल विवेक के साथ ही आप चीज़ों को पूरी तरह से समझ सकते हैं; चीज़ों को पूरी तरह से समझ लेने के बाद ही आप शरीर त्याग सकते हैं और, उत्तरोत्तर, आप परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर चलने लगेंगे। इसका संबंध इस बात से है कि सत्य की तलाश करते मनुष्य समय कितना दृढ़ है। यदि किसी के पास सही संकल्प है, तो वे लोग छह महीने या एक साल बाद सही मार्ग में प्रवेश करना आरंभ कर देंगे, वे तीन या पाँच सालों के भीतर परिणाम देखेंगे, और वे महसूस करेंगे कि वे जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि आप परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन सत्य की तलाश नहीं करते हैं, तब आप 10 वर्षों तक विश्वास कर सकते हैं लेकिन किसी परिवर्तन का अनुभव नहीं करेंगे, और अंत में कहेंगे, “परमेश्वर में विश्वास करना ऐसा ही है, इसका कोई महान अर्थ नहीं है; यह बहुत हद तक दुनिया में मेरे पहले के जीवन जैसा ही है। जीने में कोई दिलचस्पी नहीं है।” यह वास्तव में दर्शाता है कि सत्य के बिना, जीवन खाली है। आप सिद्धांत के कुछ शब्द बोलने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन आप फिर भी असहज और अनिश्चित महसूस करेंगे। यदि आप में परमेश्वर के बारे में कुछ समझ हो, यदि आप जानते हैं कि अर्थपूर्ण जीवन कैसे जीना है, यदि आप ऐसा कुछ कर सकते हैं जिससे परमेश्वर संतुष्ट हों, तब आप महसूस करेंगे कि यह वास्तविक जीवन है, कि केवल इस तरह से जीने से आपके जीवन का कोई अर्थ होता है, कि परमेश्वर को थोड़ा संतुष्ट कर पाने में सक्षम होने और तृप्त महसूस करने के लिए मनुष्य को इसी प्रकार से जीवन अवश्य जीना चाहिए। यदि आप जागरुकता के साथ परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, जागरुकता के साथ सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, जागरुकता के साथ स्वयं का त्याग कर सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारी और विचारशील बन सकते हैं; यदि आप ये सभी चीज़ें जागरुकता के साथ कर पाते हैं तब यह सत्य को सटीक रूप से अभ्यास में लाना है, सत्य को असल में अभ्यास में लाने लाना है और यह आपकी कल्पना तथा सिद्धांतों और नियमों के अनुपालन पर आपके पिछले भरोसे की तरह नहीं है। वास्तव में, जब आप सत्य को नहीं समझते हैं तो कोई भी चीज करना सर्वाधिक थकाने वाला होता है, सिद्धांतों और नियमों का अनुपालन सर्वाधिक थकाने वाला होता है, कोई लक्ष्य नहीं होना और चीज़ों को आँख बंद करके करना सर्वाधिक थकाने वाला होता है। केवल सत्य के साथ ही आप स्वतंत्र हो सकते हैं—यह कोई झूठ नहीं है—और सत्य के साथ आप चीज़ों को आसानी से और प्रसन्नता के साथ कर सकते हैं। ऐसे लोग जिनके पास इस प्रकार की अवस्था होती है उनके पास सत्य होता है, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने स्वभावों को बदल दिया है।

प्रवेश करने के प्रयास की प्रक्रिया के दौरान, अवश्य हर मामले की जाँच-पड़ताल की जानी चाहिए तथा परमेश्वर के वचन से तुलना की जानी चाहिए और सत्य से तुलना की जानी चाहिए; यह जानने के लिए उन पर पूरी तरह से विचार किया जाना चाहिए कि उन्हें इस तरह से कैसे करें जो कि पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा अनुरूप हो। तब आपके स्वमत से उत्पन्न होने वाली चीज़ों को छोड़ा जा सकता है। आप जान जाएँगे कि चीज़ों को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कैसे करें और फिर जाएँगे और उन्हें करेंगे, मानो सब कुछ अपने स्वाभाविक क्रम में हो रहा हो, और यह बेहद आसान महसूस होगा। जिन लोगों में सत्य होता है वे चीज़ों को ऐसे ही करते हैं। तब आप दूसरे लोगों को वास्तव में दिखा सकते हैं कि आपने सचमुच अपने स्वभाव को बदल दिया है, दूसरे लोग देखेंगे कि आपने निश्चित रूप से अच्छे कर्म किए हैं, और कि आप चीज़ों को सैद्धांतिक तरीके से करते हैं, और सभी चीज़ें सही ढंग से करते हैं। वे देखेंगे कि यह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य को समझता है, जिसमें निस्संदेह कुछ मानवीय समरूपता है और, निश्चित रूप से, परमेश्वर के वचन से उसे परिणाम हासिल हुए हैं। किसी व्यक्ति द्वारा वास्तव में सत्य को समझ लेने के बाद, फिर वह अपनी स्वयं की अवस्था को समझ सकता है, सभी जटिल मामलों को पूरी तरह समझ सकता है और जानता है कि उसे चीज़ों को सही ढंग से कैसे करना चाहिए। यदि आप सत्य को नहीं समझते हैं, तो आप अपनी स्वयं की अवस्था को समझने में सक्षम नहीं होंगे। आप स्वयं के खिलाफ विद्रोह करना चाहेंगे लेकिन यह नहीं जानेंगे कि इसे कैसे करना है या आप किसके खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं; आप अपना स्वमत त्यागना चाहेंगे लेकिन यदि आप सोचते हैं कि आपका स्वमत सत्य के अनुकूल है, तब आप उसे कैसे त्याग सकते हैं? आप शायद यह भी सोच सकते हैं कि यह पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया गया है और इसलिए चाहे कुछ हो जाए इसका त्याग नहीं करेंगे। इसलिए, जब किसी के पास कोई सत्य नहीं होता है, उनके लिए यह सोचना बहुत आसान होता है कि उनके स्वमत से उत्पन्न होने वाली चीजें, साथ ही साथ मनुष्य की अपवित्रता, मनुष्य के नेक इरादे, मनुष्य का अंधा प्रेम और मनुष्य का आचरण, सब सही हैं, कि वे सत्य के अनुरूप हैं—फिर आप उनके खिलाफ विद्रोह कैसे कर सकते हैं? यदि आप सत्य को नहीं समझते हैं, न ही जानते हैं कि सत्य को अभ्यास में लाना क्या होता है, यदि आपकी आँखों के सामने अंधकार छाया हुआ है और आपको पता नहीं है कि किस ओर मुड़ना है ताकि केवल वे ही चीज़ें कर सकें जो आपके अनुसार सही हैं, तब आप कुछ ऐसा करेंगे जो पथभ्रष्ट या गलत होगा, कुछ जो नियमों का पालन करेगा, कुछ जो उत्साह के कारण उत्पन्न होगा और कुछ ऐसा होगा जो शैतान से उत्पन्न हुए होगा और जो आगे बाधाएँ उत्पन्न करेगा। जिन लोगों में सत्य नहीं होता है वे चीज़ों को ऐसे ही करते हैं: थोड़ा बाएँ, फिर थोड़ा दाएँ, एक मिनट सही फिर अगले ही पल भटक जाना, जिसमें सटीकता बिल्कुल नहीं होती है। जिनके पास सत्य नहीं होता है वे सभी चीज़ों को गलत ढंग से देखते हैं, इसलिए वे मामलों को उचित ढंग से कैसे प्रबंधित कर सकते हैं? वे किसी समस्या का समाधान कैसे कर सकते हैं? परमेश्वर के वचन को समझना कोई आसान काम नहीं है, और सत्य जिसे लोग समझ पाने में सक्षम हैं उसकी भी सीमाएँ हैं। इसके अलावा, लोग जीवन भर परमेश्वर पर विश्वास कर सकते हैं, फिर भी परमेश्वर के वचन की उनकी समझ सीमित ही होगी। यहाँ तक कि जो अपेक्षाकृत अनुभवी हैं वे भी ज्यादा से ज्यादा ऐसी चीजें करने से बच सकते हैं जो स्पष्ट रूप से परमेश्वर उपेक्षा करती हों, उन चीज़ों से बच सकते हैं जो स्पष्ट रूप से बुरी हैं, और उन चीज़ों से बच सकते हैं जो किसी का भला नहीं करती हैं। उनके लिए ऐसी अवस्था में पहुँचना संभव नहीं है जिसमें खुद उनके स्वयं के स्वमत का कोई मिश्रण न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों को सामान्य विचार आते हैं, लोगों के कुछ विचार परमेश्वर के वचन के अनुरूप होते हैं और समझ के एक ऐसे पहलू के अंतर्गत आते हैं जिन्हें स्वमत के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। लेकिन कुंजी स्वमत की उन चीजों को जानना है जो परमेश्वर के वचन के विरुद्ध होते हैं, सत्य के विरुद्ध होते हैं और पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त प्रबुद्धता के विरुद्ध होते हैं। इसलिए आपको परमेश्वर के वचन को समझने के लिए प्रयास करना चाहिए और केवल सत्य को समझ करके ही आप विवेकशील बन सकते हैं।

अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने के प्रयास में, आपको स्वयं की समझ के ऐसे निश्चित चरण पर अवश्य पहुँचना चाहिए जिससे आप अपनी प्रकृति के भीतर मौजूद विषों का पता लगा सकते हैं। आपको अवश्य पता होना चाहिए कि परमेश्वर की उपेक्षा करना क्या होता है और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह क्या होता है, तथा यह पता होना चाहिए कि सभी मामलों में चीजों को सत्य के अनुरूप कैसे करें। आपको परमेश्वर की इच्छा और मनुष्य से उनकी अपेक्षाओं को भी कुछ हद तक अवश्य समझना चाहिए। परमेश्वर के सामने आपमें विवेक और तर्क अवश्य होना चाहिए, और डींगें नहीं मारनी चाहिए या परमेश्वर को धोखा नहीं देना चाहिए। यह आपके स्वभाव में परिवर्तन के बराबर है। जिन्होंने अपने स्वभावों में परिवर्तन लाया है उनके पास परमेश्वर से डरने वाला हृदय है। परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने की संभावना उनमें कम होती है और वे ऐसे काम कम करते हैं जिनसे परमेश्वर की उपेक्षा होती है। उनके द्वारा अपने कर्तव्यों को करते हुए परमेश्वर को हमेशा उनके लिए चिंतित होने की जरूरत नहीं होती है और पवित्र आत्मा को हमेशा उन्हें अनुशासित करने के कार्य की जरूरत नहीं पड़ती हैं। वे परमेश्वर की आज्ञा मूल रूप से मान सकते हैं और चीजों पर उनके विचारों में सत्य मौजूद होता है—यह परमेश्वर की अनुरूपता में होने के बराबर है। मान लीजिए किसी ने आपको कोई काम सौंपा, ऐसा काम जिसे करने के लिए आपको किसी से प्रबंधित होने की जरूरत नहीं है। आप इस कार्य को बस परमेश्वर के वचन के अनुसार और प्रार्थना के माध्यम से पूरा करते हैं और, इस कार्य के दौरान, आप अहंकारी और दंभी होने लायक नहीं होते हैं, ऐसा कोई काम करने में सक्षम नहीं होते हैं जिससे परमेश्वर की उपेक्षा हो, किसी दूसरे व्यक्ति को रोकने में सक्षम नहीं होते हैं और सहानुभूति के साथ दूसरों की सहायता करने में सक्षम होते हैं। आप सहभागिता के अपने अनुभव दूसरों को धैर्यपूर्वक दे सकते हैं ताकि हर कोई प्रावधान प्राप्त कर सके, लाभ प्राप्त कर सके, और परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश कर सके। इसके अतिरिक्त, इस कार्य के दौरान आप स्वयं की हैसियत या हितों को नहीं तलाशते हैं, अपने लिए ऐसा कुछ नहीं लेते हैं जो आपने अर्जित न किया हो, अपने लिए नहीं बोलते हैं, और आपके साथ कोई कैसा भी व्यवहार करता है इसकी परवाह किए बिना आप उन सभी के साथ उचित व्यवहार करते हैं। फिर आप अपेक्षाकृत एक अच्छी महत्ता वाले बन जाएँगे। यह किसी के लिए कोई साधारण बात नहीं है कि वह कोई कार्य ले और सभी लोगों को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता के अधीन ले आए। कई लोग हैं जिनके पास उत्तम गुण हैं लेकिन वे गिरते हैं और नष्ट हो जाते हैं। सत्य के बिना लोगों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं किया जा सकता है, तब तो और भी कम अगर उन्होंने अपने स्वभावों को बदला न हो। अभी आपकी महत्ता क्या है? आपको उस व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए जो आपकी चापलूसी करता हो? आपको उस व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए जो आपके लिए राय रखता हो, या जो आपको आलोचनात्म दृष्टि से देखता हो? क्या आप अपनी भावनाओं पर भरोसा किए बगैर सही लोगों को बढ़ावा देने और चुन पाने में सक्षम हैं? क्या आप लोग अपनी अभी की महत्ता के साथ इन चीज़ों को वास्तव में करने में सक्षम हैं? अगर यदि अधिकांश लोग आपके कार्य को अच्छा और उपयुक्त मानते हैं, तब यह ठीक है, और आप उपयोग किए जाने लायक हैं। अगर आपने किसी जगह कई वर्षों तक कार्य किया है और अधिकांश लोग आपके बारे में खराब सोचते हैं, तब यह दर्शाता है कि आप योग्य नहीं हैं और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लायक नहीं हैं। अगर आपके पास सत्य नहीं है तो आपके लिए उस चरण तक पहुँचना संभव नहीं होगा जहाँ आप परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने के लायक होते हैं।

जीवन की तलाश में, आपको दो बुनिदायी बातों पर ध्यान देना चाहिए: 1) परमेश्वर के वचन में सत्य को समझना, और 2) परमेश्वर के वचन में स्वयं को समझना। ये दो चीज़ें सबसे मौलिक हैं। परमेश्वर के वचन के बाहर न कोई जीवन है और न ही कोई सत्य। अगर आप परमेश्वर के वचन में सत्य की तलाश नहीं करते हैं, तब आप उसे तलाशने कहाँ जा सकते हैं? दुनिया में सत्य है कहाँ? क्या दुनिया में प्रकाशित सभी पुस्तकें दुष्ट शैतान के सिद्धांत नहीं हैं? बताने के लिए उनमें कोई सत्य कहाँ है? परमेश्वर के वचन में सत्य को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों में परमेश्वर को उनके वचन में समझना, उनके वचन में मानव जीवन को समझना और उनके वचन में सत्य के सभी पहलुओं को समझना शामिल है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के वचन में स्वयं की सही समझ होना और मानव के अस्तित्व के अर्थ का पता लगाना…. सभी सत्य परमेश्वर के वचन में हैं। आप सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जब तक यह परमेश्वर के वचन के माध्यम से न किया गया हो। प्रमुख परिणाम जिस पर आपको अवश्य पहुँचना चाहिए वह यह जानना है कि परमेश्वर के वचन की वास्तविक समझ क्या है। परमेश्वर के वचन की वास्तविक समझ के साथ आप सत्य को समझ सकते हैं: यह सबसे मौलिक चीज़ है। कुछ लोग कार्य करते हैं और धर्मोपदेश का प्रचार करते हैं तथा, यद्यपि सतही तौर पर ऐसा लगता है जैसे वे परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता कर रहे हैं, तथापि वे जो कह रहे हैं वह सब परमेश्वर के वचन का शाब्दिक अर्थ है, जिसमें वचन का सार पूरी तरह से अव्यक्त छूट जाता है। उनके उपदेश किसी भाषा पाठ्य पुस्तक से पढ़ाने की तरह होते हैं, आइटम दर आइटम, पहलू दर पहलू व्यवस्थित, और जब वे समाप्त करते हैं तब सभी लोग उनका स्तुति गान करते हैं, कहते हैं: “ओह, यह उपदेशक बहुत व्यावहारिक है। उन्होंने कितनी अच्छी तरह और कितने विस्तार से उपदेश दिया।” उपदेश समाप्त कर लेने के बाद, वे अन्य लोगों से कहते हैं कि जो उपदेश दिया गया उसे एक साथ रख लें और इसे हर एक को वितरित कर दें। ऐसा करके, वे दूसरों को धोखा देते हैं और वे जो उपदेश देते हैं वे सब भ्रांतियाँ हैं। सतह पर, ऐसा लगता है मानो कि वे केवल परमेश्वर के वचन का उपदेश दे रहे हैं और उनके शब्द सत्य के अनुरूप हैं। लेकिन अगर आप अधिक ध्यान से देखें, आप देखेंगे कि वे केवल सिद्धांत के शब्द हैं और बस झूठे तर्क हैं। उनके शब्दों में कुछ कल्पनाएँ, अवधारणाएँ भी शामिल होती हैं और कुछ ऐसे शब्द होते हैं जो परमेश्वर का चित्रण करते हैं। क्या इस तरह से उपदेश देना परमेश्वर के कार्य को बाधित नहीं करता है? यह सेवा करने का ऐसा तरीका है जो परमेश्वर की उपेक्षा करता है। एक बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति को अपने भाषण की सीमा निर्धारित अवश्य करनी चाहिए — भाषण के किन पहलुओं को उन्हें कहना चाहिए और कौन उनके कर्तव्यों से संबद्ध हैं, और भाषण के कौन से पहलू केवल परमेश्वर द्वारा बोले जा सकता हैं। मनुष्य को परमेश्वर के स्थान में अवश्य नहीं खड़ा होना और बोलना चाहिए। परमेश्वर कैसे कार्य करते हैं, इसकी कोई थाह नहीं ले सकता है, तब कोई परमेश्वर को कैसे परिभाषित कर सकता है? मनुष्य में परमेश्वर को परिभाषित करने की योग्यता और भी कम होती है और कुछ भी अनुचित न हो जाए इससे बचने के लिए इसे अवश्य समझ लेना चाहिए। एक तर्क वाले व्यक्ति के रूप में, आपको अवश्य अपना स्थान पता होना चाहिए, कहने वाली सही चीज़ें पता होनी चाहिए और, यद्यपि आपको कोई चीज़ पता चल गई हो, आपको पता है कि ऐसा कुछ नहीं कहना है जो आपको नहीं कहना चाहिए। भले ही परमेश्वर ने पूर्व में आपको कुछ कहा हो, आप उसे दूसरों के सामने नहीं दोहराएँ; उसे कहने से लाभ होगा? क्या यह अहंकार नहीं होगा कि आप बस बातें करके हमेशा अपने पड़ोसी से बेहतर होने की कामना करें? अगर आप परमेश्वर के मामलों को नहीं समझते हैं तब आप उन्हें नहीं समझते हैं। समझने का या सभी कुछ जानने का ढोंग न करें। यह बहुत अप्रिय है! आप यह दिखाने के लिए कि आप सब कुछ समझते हैं और प्रसिद्धि पाने के लिए हमेशा परमेश्वर के स्थान पर खड़े होना चाहते हैं। आपकी इच्छा परमेश्वर के लिए अधिक बोलने और अधिक करने की भी होती है। हर किसी में यह महत्वाकांक्षा होती है और यह कुछ ऐसा है जो बहुत शर्मनाक है। अब विदेशी सही मार्ग की तलाश में आ रहे हैं, तो आपको परमेश्वर के लिए गवाही कैसे देनी चाहिए? अगर आपके पास कोई कारण नहीं है, आप अहंकारी और दंभी हैं और आँख बंद करके काम करते हैं, तो क्या आप परमेश्वर की उपेक्षा नहीं कर रहे हैं और उनके विरुद्ध ईशनिन्दा नहीं कर रहे हैं? क्या यह आप अपना कर्तव्य कर रहे हैं? यह परमेश्वर के लिए और भी कम गवाही देना है। वास्तव में आप अपनी शैतान की छवि को प्रकट कर रहे हैं। जो वास्तव में जीत लिए गए हैं उन्हें अवश्य सीखना चाहिए कि कैसे ईमानदारी के साथ बोलें और कुछ वास्तविक गवाही दें। अपने जीवन के अनुभव को साझा करना किसी भी चीज से बेहतर है। बड़े सिद्धांतों के बारे में डींगें मारना और बातें करना — इसका फायदा क्या है? परमेश्वर के कार्य का कई वर्षों का अनुभव ले कर, मनुष्य का व्यवहार अभी भी अच्छा नहीं हुआ है, और मनुष्य अपनी पहचान के अनुसार, परमेश्वर के लिए गवाही देने के योग्य नहीं है। अविवेकी और अहंकारी, मनुष्य फिर भी परमेश्वर के लिए गवाही देने की इच्छा रखता है। क्या आप वाकई परमेश्वर को शर्मिंदा और उनकी ईशनिंदा नहीं कर रहे हैं? आप परमेश्वर को नहीं समझते हैं। इसके अलावा, आपका स्वभाव अभी भी परमेश्वर की उपेक्षा करता है। तो क्या आपकी गवाही देने में यह घृणा की झलक नहीं है? क्या यह कुछ बदबूदार नहीं है? इसलिए मनुष्य परमेश्वर के लिए गवाही देने योग्य नहीं है। अगर कोई कहता है: “क्या आप चीन की मुख्य भूमि में परमेश्वर के कार्य की हमारे लिए गवाही दे सकते हैं?” तो आप कहते हैं: “मैंने परमेश्वर के कार्य का कई वर्षों तक अनुभव किया है, इसलिए मुझे लगता है कि हम लोग परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हैं।” क्या यह समस्या नहीं है? एक बार फिर यह अनुचित है! मनुष्य परमेश्वर के लिए गवाही देने योग्य नहीं है। आपको बस यह कहना चाहिए: “हम लोग परमेश्वर के लिए गवाही देने योग्य नहीं है। फिर भी परमेश्वर ने हमें बचाया है और हम पर अनुग्रह किया है। हमें कुछ अनुग्रह मिलाहै और हमने परमेश्वर के कुछ कार्यों का अनुभव किया है, इसलिए हम सहभागिता में शामिल हो सकते हैं, लेकिन हम परमेश्वर की गवाही देने पर वाकई विचार नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर के लिए गवाही देने पर बोलते हुए, हम योग्य नहीं हैं; हम केवल अपने अनुभव बता सकते हैं।” आपके लिए यह सहभागिता करना ठीक है कि आपने परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाने का स्वयं कैसे अनुभव किया, आप उस समय कितने भ्रष्ट थे, आप कितने अहंकारी थे, जीत लिए जाने के बाद अंत में किस तरह का परिणाम आया, और अंत में आपके पास किस तरह का संकल्प था। वास्तव में, गवाही देने के इसी तरीके के पालन की अपेक्षा परमेश्वर मनुष्य से करते हैं, और यह तरीका परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुरूप है। अगर आप कहते हैं कि आप परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहते हैं और उस स्थिति पर पहुँचना चाहते हैं जहाँ से आप परमेश्वर की गवाही दे सकें, तब यह बहुत बड़ी गलती होगी — आपके पास तर्क नहीं है और आप अहंकारी हैं! आपको बस यह कह सकते हैं: “हम कुछ अनुभवों के बारे में बात करेंगे लेकिन हम परमेश्वर की गवाही देने के बारे में वाकई नहीं सोच सकते हैं। मैं पहले कुछ सहभागिता करूँगा। परमेश्वर ने चीन में देह धारण क्यों किया था? आप लोग संभवतः पूरी तरह नहीं समझते हैं। हमने इसे परमेश्वर के काम से समझा है। हम चीनी लोग शैतान द्वारा बहुत भीतर तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं, और हम उस स्थान पर हैं जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे हुए पड़ा हुआ है। हम लोग शैतान द्वारा इतने गहराई तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं, हमारी मानवता में बहुत कमी हो गई है, हममे सबसे कम ईमानदारी है और हम इंसान बिल्कुल नहीं लगते हैं। परमेश्वर द्वारा बाकी दूसरे सभी देशों और क्षेत्रों से चुने गए लोगों की तुलना में, हम सबसे तुच्छ हैं। इसलिए हमलोग परमेश्वर के लिए गवाही देने में अत्यधिक लज्जित हैं। हम केवल अपने निजी अनुभवों के लिए ही थोड़ी गवाही दे सकते हैं। हम सबसे अपवित्र और सबसे भ्रष्ट लोग हैं, और हमें परमेश्वर की महान उद्धार में लाया गया है और हमें परमेश्वर का महान प्रेम प्राप्त हुआ है, इसलिए हमें अपने व्यक्तिगत अनुभवों की गवाही अवश्य देनी चाहिए, और हम परमेश्वर के अनुग्रह को दबा नहीं सकते हैं।”