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XVI. हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए कि परमेश्वर वास्तव में त्रिविध परमेश्वर है, या एक ही सच्चा परमेश्वर है

3. एक मात्र सच्चे परमेश्वर को "त्रिदेव या त्रिविध परमेश्वर" के रूप में वर्णित करना, परमेश्वर की अवहेलना और निंदा करना है।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मैं बताता हूँ कि वास्तव में, ब्रह्माण्ड में कहीं भी त्रित्व का अस्तित्व नहीं है। परमेश्वर के न पिता हैं और न पुत्र, पिता और पुत्र के द्वारा संयुक्त तौर पर उपयोग किया जाने वाले एक साधन: पवित्र-आत्मा, की परिकल्पना तो बिल्कुल नहीं है। यह सब बड़ा भ्रम है और संसार में इसका कोई अस्तित्व नहीं है! परन्तु इस प्रकार के भ्रम का अपना मूल है और यह पूरी तरह से बिना आधार के नहीं है, क्योंकि तुम लोगों की बुद्धि बहुत ही साधारण नहीं है और विचार बिना तर्क के नहीं हैं। बल्कि, वे काफी उपयुक्त और प्रवीण हैं, इतने कि किसी शैतान के द्वारा भी अभेद्य हैं। अफसोस यह है कि ये विचार बिल्कुल भ्रामक हैं और इनका अस्तित्व नहीं है! तुम लोगों ने वास्तविक सत्य को देखा ही नहीं है; तुम लोग केवल अनुमान और धारणाएं बना रहे हो, फिर धोखेबाज़ी से दूसरों का विश्वास प्राप्त करने या बुद्धिहीन या तर्कहीन लोगों पर प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए इन सब को कहानी में पिरो रहे हो, ताकि वे तुम्हारी महान और प्रसिद्ध "विशेषज्ञ शिक्षाओं" पर विश्वास करें। क्या यह सच है? क्या जीवन का यह तरीका है जो मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए? यह सब बकवास है! एक शब्द भी उचित नहीं है! इतने सालों में, परमेश्वर तुम लोगों के द्वारा इस प्रकार से विभाजित किया गया है, प्रत्येक पीढ़ी द्वारा इसे इतनी सूक्ष्मता से विभाजित किया गया हैकि एक परमेश्वर को बिल्कुल तीन भागों में बांट दिया गया है। और अब मनुष्य के लिए यह पूरी तरह से असम्भव है कि इन तीनों को फिर से एक परमेश्वर बना दिया जाए, क्योंकि तुम लोगों ने उसे बहुत ही सूक्ष्मता से बांट दिया है! यदि मेरा कार्य सही समय पर शुरु ना हो गया होता तो, कहना कठिन है कि तुम इस तरह ढिठाई से कब तक चलते रहते! इस प्रकार से परमेश्वर को विभाजित करते रहने से, वह अब तक कैसे तुम्हारा परमेश्वर बना रह सकता है? क्या तुम लोग अब भी परमेश्वर को पहचान सकते हो? क्या तुम अभी भी उसके पास वापस आओगे? यदि मैं थोड़ा और बाद में आता, तो हो सकता है कि तुम लोग "पिता और पुत्र", यहोवा और यीशु को इस्राएल वापस भेज चुके होते और दावा करते कि तुम स्वयं ही परमेश्वर का एक भाग हो। भाग्यवश, अब ये अंत के दिन हैं। अंत में, वह दिन आ गया है जिसकी मैंने बहुत प्रतीक्षा की है, और मेरे अपने हाथों से इस चरण के कार्य को पूर्ण करने के बाद ही तुम लोगों द्वारा स्वयं परमेश्वर को बांटने का कार्य रूका है। यदि यह नहीं होता, तो तुम लोग और भी अधिक आगे बढ़ जाते, यहां तक कि सभी शैतानों को अपने मध्य में आराधना के लिए वेदी पर रख दिया होता। यह तुम सबकी चालाकी है! परमेश्वर को बांटने के तुम्हारे तरीके! क्या तुम सब अभी भी ऐसा ही करोगे? मैं तुमसे पूछता हूं: कितने परमेश्वर हैं? कौन सा परमेश्वर तुम लोगों के लिए उद्धार लाएगा? पहला परमेश्वर, दूसरा या फिर तीसरा जिससे तुम सब हमेशा प्रार्थना करते हो? उनमें से तुम लोग हमेशा किस पर विश्वास करते हो? पिता पर, या फिर पुत्र पर? या फिर आत्मा पर? मुझे बताओ कि तुम लोग किस पर विश्वास करते हो। हालांकि तुम्हारे हर शब्द में परमेश्वर पर विश्वास दिखता है, लेकिन जिस पर वास्तव में तुम लोग विश्वास करते हो वो तुम्हारा मष्तिष्क है। तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं! फिर भी तुम सबके दिमाग में इस प्रकार के कई "त्रित्व" हैं! क्या तुम इस बात से सहमत नहीं हो?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या त्रित्व का अस्तित्व है?" से

मनुष्य का मानना है कि यहोवा यीशु का पिता है, लेकिन यह वास्तव में यीशु ने स्वीकार नहीं किया था, जिसने कहा: "हम पिता और पुत्र के रूप में कभी भी अलग नहीं थे; मैं और स्वर्ग में पिता एक हैं। पिता मुझ में है और मैं पिता में हूं; जब मनुष्य पुत्र को देखता है, तो वह स्वर्गीय पिता को देखता है।" यह सब कहे जाने के बाद, पिता हो या पुत्र हो, वे एक आत्मा हैं, अलग-अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं हैं। एक बार जब मनुष्य समझाने की कोशिश करता है, तो अलग-अलग व्यक्तियों के विचार के साथ मामला जटिल हो जाता है, साथ ही पिता, पुत्र और आत्मा के बीच का संबंध भी। जब मनुष्य अलग-अलग व्यक्तियों के बारे में बोलता है, तो क्या यह परमेश्वर को मूर्तरूप नहीं देता? मनुष्य व्यक्तियों को पहले, दूसरे और तीसरे के रूप में स्थान भी देता है; ये सभी बस मनुष्य की अवधारणा हैं, संदर्भ के योग्य नहीं हैं, और बिल्कुल अवास्तविक है!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या त्रित्व का अस्तित्व है?" से

परमेश्वर को जानना एक ऐसा क्षेत्र है जिसको लोग बहुत कम जानते हैं। वे अक्सर परमेश्वर पर कथन, उक्ति, और वचन थोपते हैं जो उससे संबंधित नहीं होते, ऐसा यह विश्वास करते हुए कि ये शब्द परमेश्वर के ज्ञान की सबसे मुख्य परिभाषा है। उन्हें पता नहीं कि ये बातें, जो लोगों की कल्पनाओं से आती हैं, उनके अपने तर्क, और अपनी बुद्धि, परमेश्वर के सार-तत्व से उनका ज़रा भी सम्बन्ध नहीं होता। और इसलिए, मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि परमेश्वर द्वारा इच्छित लोगों के ज्ञान में, परमेश्वर मात्र यह नहीं कहता कि तुम परमेश्वर और उसके वचनों को पहचानो बल्कि यह कि परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान सच्चा हो। यदि तुम एक वाक्य भी बोल सको, या थोडे-बहुत भी जागरुक हो, तो यह थोड़ी-बहुत जागरुकता सही और सच्ची है, और स्वयं परमेश्वर के सार-तत्व के अनुकूल है। क्योंकि परमेश्वर लोगों की अवास्तविक और चेतना-शून्य प्रशंसा और सराहना से घृणा करता है। और तो और, जब लोग उससे हवा समझकर पेश आते हैं तो वह इससे घृणा करता है। जब परमेश्वर से जुड़े विषय पर लोग हल्केपन से पेश आते हैं, जैसा चाहे और बेझिझक, जैसा ठीक लगे बोलते हैं तो वह इससे घृणा करता है; इसके अलावा, वह उनसे भी नफरत करता है जो यह कहते हैं कि वे परमेश्वर को जानते हैं, और परमेश्वर के ज्ञान के बारे में डींगे मारते हैं, परमेश्वर के बारे में बिना किसी रुकावट या विचार किए बोलते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर स्वयं, अद्वितीय X" से

कार्य के तीन चरण मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को और उद्धार के कार्य में परमेश्वर के स्वभाव को अवश्य जानना चाहिए, और इस तथ्य के बिना, परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान केवल खोखले शब्द हैं, सैद्धांतिक बातों का शानदार दिखावा मात्र से अधिक नहीं हैं। इस प्रकार का ज्ञान मनुष्य को न तो यकीन दिला सकता है और न ही उस पर जीत दिला सकता है, इस प्रकार का ज्ञान वास्तविकता से बाहर की बात है और सत्य नहीं है। यह बहुत ही भरपूर मात्रा में, और कानों के लिए सुखद हो सकता है, परन्तु यदि यह परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव से विपरीत है, तो परमेश्वर तुम्हें नहीं छोड़ेगा। न केवल वह तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा नहीं करेगा बल्कि तुम्हारे पापी होने और उसकी निंदा करने के कारण तुम से अपना प्रतिशोध लेगा। परमेश्वर को जानने के वचन हल्के में नहीं बोले जाते हैं। यद्यपि तुम चिकनी-चुपड़ी बातें बोलने वाले और वाक्पटु हो सकते हो, और तुम्हारे वचन मृतकों में जीवन डाल सकते हों, और जीवित को मृत कर सकते हों, तब भी जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है तो तुम्हारी अज्ञानता सामने आती है। परमेश्वर कोई ऐसा नहीं है जिसका तुम जल्दबाज़ी में आँकलन कर सकते हो या जिसकी लापरवाही से प्रशंसा कर सकते हो या जिसे उदासीनता से कलंकित कर सकते हो। तुम किसी की भी और सभी की प्रशंसा करते हो, फिर भी परमेश्वर की शुचिता और अनुग्रह का वर्णन करने के लिए तुम सही शब्दों को बोलने में संघर्ष करते हो-और यही सभी हारने वालों द्वारा सीखा जाता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

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