1. स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों को बनाने वाला सच्चा परमेश्वर एक है या तीन

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर ही एकमात्र है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ों को चलाता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, जो कुछ है वही उसे चलाता है, जो कुछ है उस सब पर वही शासन करता है और जो कुछ है उस सब का वही भरण-पोषण करता है। यह परमेश्वर की प्रतिष्ठा और यही उसकी पहचान है। सभी चीजों के लिए और जो कुछ भी है उस सब के लिए, परमेश्वर की असली पहचान, सृजनकर्ता, और सम्पूर्ण सृष्टि के शासक की है। परमेश्वर की ऐसी पहचान है और वह सभी चीज़ों में अद्वितीय है। परमेश्वर का कोई भी प्राणी—चाहे वह मनुष्य के बीच हो या आध्यात्मिक दुनिया में हो—परमेश्वर की पहचान और प्रतिष्ठा का का रूप लेने या उसका स्थान लेने के लिए किसी भी साधन या बहाने का उपयोग नहीं कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ों में वही एक है जो इस पहचान, सामर्थ्य, अधिकार, और सृष्टि पर शासन करने की क्षमता से सम्पन्न है: हमारा अद्वितीय परमेश्वर स्वयं। वह सभी चीज़ों के बीच रहता और चलता है; वह सभी चीज़ों से ऊपर, सर्वोच्च स्थान तक उठ सकता है। वह मनुष्य बनकर, जो मांस और लहू के हैं, उनमें से एक बन कर, लोगों के साथ आमने-सामने होकर और उनके सुख—दुःख बाँट कर, अपने आप को विनम्र बना सकता है, जबकि वहीं दूसरी तरफ, जो कुछ भी है वह सब को नियंत्रित करता है, और जो कुछ भी है उस का भाग्य और उसे किस दिशा में जाना है यह तय करता है। इसके अलावा, वह संपूर्ण मानवजाति के भाग्य और मानवजाति की दिशा का पथप्रदर्शन करता है। इस तरह के परमेश्वर की सभी जीवित प्राणियों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए, उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए और उसे जानना चाहिए। इस प्रकार, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम मानवजाति में से किस समूह या किस प्रकार सम्बन्धित हो, परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर का आदर करना, उसके शासन को स्वीकार करना, और अपने भाग्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी जीवित प्राणी के लिए एकमात्र विकल्प—आवश्यक विकल्प—है। परमेश्वर की अद्वितीयता में, लोग देखते हैं कि उसका अधिकार, उसका धार्मिक स्वभाव, उसका सार, और वे साधन जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, सभी अद्वितीय हैं; यह अद्वितीयता, स्वयं परमेश्वर की असली पहचान को निर्धारित करती है, और यह उसकी प्रतिष्ठा को भी निर्धारित करती है। इसलिए, सभी प्राणियों के बीच, यदि आध्यात्मिक दुनिया में या मनुष्यों के बीच कोई जीवित प्राणी परमेश्वर की जगह खड़ा होने की इच्छा करता है, तो सफलता वैसे ही असंभव होगी, जैसे कि परमेश्वर का रूप धरने का कोई प्रयास। यह तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

परमेश्वर की प्रबंधन योजना छह हजार वर्षों तक फैली है और उसके कार्य में अंतर के आधार पर तीन युगों में विभाजित है: पहला युग पुराने नियम का व्यवस्था का युग है; दूसरा अनुग्रह का युग है; और तीसरा वह है जो कि अंत के दिनों का है—राज्य का युग। प्रत्येक युग में एक अलग पहचान का प्रतिनिधित्व किया जाता है। यह केवल कार्य में अंतर यानी कार्य की आवश्यकताओं के कारण है। व्यवस्था के युग के दौरान कार्य का पहला चरण इस्राएल में क्रियान्वित किया गया था और छुटकारे के कार्य के समापन का दूसरा चरण यहूदिया में क्रियान्वित किया गया था। छुटकारे के कार्य के लिए पवित्र आत्मा के गर्भधारण से और एकमात्र पुत्र के रूप में यीशु का जन्म हुआ। यह सब कार्य की आवश्यकताओं के कारण था। अंत के दिनों में, परमेश्वर अपने कार्य को अन्यजाति राष्ट्रों में विस्तारित करना और वहाँ के लोगों पर विजय प्राप्त करना चाहता है ताकि उनके बीच उसका नाम महान हो। वह सभी सत्य को समझने और उसमें प्रवेश करने में मनुष्य का मार्गदर्शन करना चाहता है। यह सब कार्य एक आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। हालाँकि वह अलग-अलग दृष्टिकोण से ऐसा कर सकता है तो भी, कार्य की प्रकृति और सिद्धांत एक समान रहते हैं। एक बार जब तुम उन कार्यों के सिद्धांतों और प्रकृति को देखते हो, जो उन्होंने क्रियान्वित किया है, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि यह सब एक आत्मा द्वारा किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?' से उद्धृत

यदि त्रित्व की इस अवधारणा के अनुसार काम के तीन चरणों का मूल्यांकन किया जाना है, तो तीन परमेश्वर होने चाहिए क्योंकि प्रत्येक द्वारा क्रियान्वित कार्य एकसमान नहीं हैं। यदि तुम लोगों में से कोई भी कहता है कि त्रित्व वास्तव में है, तो समझाओ कि तीन व्यक्तियों में यह एक परमेश्वर क्या है। पवित्र पिता क्या है? पुत्र क्या है? पवित्र आत्मा क्या है? क्या यहोवा पवित्र पिता है? क्या यीशु पुत्र है? फिर पवित्र आत्मा का क्या? क्या पिता एक आत्मा नहीं है? पुत्र का सार भी क्या एक आत्मा नहीं है? क्या यीशु का कार्य पवित्र आत्मा का कार्य नहीं था? एक समय आत्मा द्वारा क्रियान्वित यहोवा का कार्य क्या यीशु के कार्य के समान नहीं था? परमेश्वर में कितने आत्माएं हो सकते हैं? तुम्हारे स्पष्टीकरण के अनुसार, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के तीन व्यक्ति एक हैं; यदि ऐसा है, तो तीन आत्माएं हैं, लेकिन तीन आत्माओं का अर्थ है कि तीन परमेश्वर हैं। इसका मतलब है कि कोई भी एक सच्चा परमेश्वर नहीं है; इस प्रकार के परमेश्वर में अभी भी परमेश्वर का निहित सार कैसे हो सकता है? यदि तुम मानते हो कि केवल एक ही परमेश्वर है, तो उसका एक पुत्र कैसे हो सकता है और वह पिता कैसे हो सकता है? क्या ये सब केवल तुम्हारी धारणाएं नहीं हैं? केवल एक परमेश्वर है, इस परमेश्वर में केवल एक ही व्यक्ति है, और परमेश्वर का केवल एक आत्मा है, वैसा ही जैसा बाइबल में लिखा गया है कि "केवल एक पवित्र आत्मा और केवल एक परमेश्वर है।" जिस पिता और पुत्र के बारे में तुम बोलते हो, वे चाहे अस्तित्व में हों, कुल मिलाकर परमेश्वर एक ही है और पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का सार, जिसे तुम लोग मानते हो, पवित्र आत्मा का सार है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर एक आत्मा है लेकिन वह देहधारण करने और मनुष्यों के बीच रहने के साथ-साथ सभी चीजों से ऊँचा होने में सक्षम है। उसका आत्मा समस्त-समावेशी और सर्वव्यापी है। वह एक ही समय पर देह में हो सकता है और पूरे विश्व में और उसके ऊपर हो सकता है। चूंकि सभी लोग कहते हैं कि परमेश्वर एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, फिर एक ही परमेश्वर है, जो किसी की इच्छा से विभाजित नहीं होता! परमेश्वर केवल एक आत्मा है और केवल एक ही व्यक्ति है; और वह परमेश्वर का आत्मा है। यदि जैसा तुम कहते हो, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, तो क्या वे तीन परमेश्वर नहीं हैं? पवित्र आत्मा एक तत्व है, पुत्र दूसरा है, और पिता एक और है। उनके व्यक्तित्व अलग हैं और उनके सार अलग हैं, तो वे एक इकलौते परमेश्वर का हिस्सा कैसे हो सकते हैं? पवित्र आत्मा एक आत्मा है; यह मनुष्य के लिए समझना आसान है। यदि ऐसा है तो, पिता और भी अधिक एक आत्मा है। वह पृथ्वी पर कभी नहीं उतरा और कभी भी देह नहीं बना है; वह मनुष्यों के दिल में यहोवा परमेश्वर है और निश्चित रूप से वह भी एक आत्मा है। तो उसके और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह पिता और पुत्र के बीच का संबंध है? या यह पवित्र आत्मा और पिता के आत्मा के बीच का रिश्ता है? क्या प्रत्येक आत्मा का सार एकसमान है? या पवित्र आत्मा पिता का एक साधन है? इसे कैसे समझाया जा सकता है? और फिर पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह दो आत्माओं का संबंध है या एक मनुष्य और आत्मा के बीच का संबंध है? ये सभी ऐसे मामले हैं, जिनकी कोई व्याख्या नहीं हो सकती! यदि वे सभी एक आत्मा हैं, तो तीन व्यक्तियों की कोई बात नहीं हो सकती, क्योंकि वे एक आत्मा के अधीन हैं। यदि वे अलग-अलग व्यक्ति होते, तो उनकी आत्माओं की शक्ति भिन्न होती और बस वे एक ही आत्मा नहीं हो सकते थे। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह अवधारणा सबसे बेतुकी है! यह परमेश्वर को खंडित करती है और प्रत्येक को एक ओहदा और आत्मा देकर उसे तीन व्यक्तियों में विभाजित करती है; तो कैसे वह अब भी एक आत्मा और एक परमेश्वर हो सकता है? मुझे बताओ कि क्या स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें पिता, पुत्र या पवित्र आत्मा द्वारा बनाई गई थीं? कुछ कहते हैं कि उन्होंने यह सब मिलकर बनाया। फिर किसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया? क्या यह पवित्र आत्मा था, पुत्र था या पिता? कुछ कहते हैं कि वह पुत्र था, जिसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया था। तो फिर सार में पुत्र कौन है? क्या वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण नहीं है? एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से देहधारी स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाता है। क्या तुम्हें पता नहीं कि यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के गर्भधारण से हुआ था? उसके भीतर पवित्र आत्मा है; तुम कुछ भी कहो, वह अभी भी स्वर्ग में परमेश्वर के साथ एकसार है, क्योंकि वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण है। पुत्र का यह विचार केवल असत्य है। यह एक आत्मा है जो सभी कार्य क्रियान्वित करता है; केवल परमेश्वर स्वयं, यानी परमेश्वर का आत्मा अपना कार्य क्रियान्वित करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?' से उद्धृत

यह अधिकांश लोगों को उत्पत्ति में परमेश्वर के वचनों की याद दिला सकता है: "हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ।" यह देखते हुए कि परमेश्वर कहता है, "हम" मनुष्य को "अपनी" छवि में बनाएँ, तो "हम" इंगित करता है दो या अधिक; चूंकि उसने "हम" कहा, तो फिर सिर्फ़ एक ही परमेश्वर नहीं है। इस तरह, मनुष्य ने अलग व्यक्तियों के अमूर्त पर सोचना शुरू कर दिया, और इन वचनों से पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का विचार उभरा। तो फिर पिता कैसा है? पुत्र कैसा है? और पवित्र आत्मा कैसा है? क्या संभवत: यह हो सकता है कि आज की मानवजाति ऐसी छवि में बनाई गई थी, जो तीनों से मिलकर बनती है? तो मनुष्य की छवि क्या पिता की तरह है, या पुत्र की तरह या पवित्र आत्मा की तरह है? मनुष्य परमेश्वर के किस व्यक्ति की छवि है? मनुष्य का यह विचार बिल्कुल ग़लत और बेतुका है! यह केवल एक परमेश्वर को कई परमेश्वरों में विभाजित कर सकता है। जिस समय मूसा ने उत्पत्ति ग्रंथ लिखा था, उस समय तक दुनिया की सृष्टि के बाद मानवजाति का सृजन हो चुका था। बिल्कुल शुरुआत में, जब दुनिया शुरू हुई, तो मूसा मौजूद नहीं था। और मूसा ने बहुत बाद में बाइबल लिखी तो वह यह कैसे जान सकता था कि स्वर्ग में परमेश्वर ने क्या बोला? उसे ज़रा भी भान नहीं था कि परमेश्वर ने कैसे दुनिया बनाई। बाइबिल के पुराने नियम में, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का उल्लेख नहीं है, केवल एक ही सच्चे परमेश्वर यहोवा का है, जो इस्राएल में अपने कार्य को क्रियान्वित कर रहा है। जैसे युग बदलता है, उसके अनुसार उसे अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं हो सकता कि प्रत्येक नाम एक अलग व्यक्ति का हवाला देता है। यदि ऐसा होता तो क्या परमेश्वर में असंख्य व्यक्ति न होते? पुराने नियम में जो लिखा है, वह यहोवा का कार्य है, व्यवस्था के युग की शुरुआत के लिए स्वयं परमेश्वर के कार्य का एक चरण है। यह परमेश्वर का कार्य था और जैसा उसने कहा, वैसा हुआ और जैसी उसने आज्ञा दी, वैसे स्थिर रहा। यहोवा ने कभी नहीं कहा कि वह पिता है जो कार्य क्रियान्वित करने आया है, न ही उसने कभी पुत्र के मानवजाति के छुटकारे के लिए आने की भविष्यवाणी की। जब यीशु के समय की बात आई, तो केवल यह कहा गया कि परमेश्वर समस्त मानवजाति को छुड़ाने के लिए देह बन गया था, न कि यह कि पुत्र आया था। चूंकि युग एक जैसे नहीं होते और जो कार्य परमेश्वर स्वयं करता है, वह भी अलग होता है, उसे अपने कार्य को अलग-अलग क्षेत्रों में क्रियान्वित करना होता है। इस तरह, वह पहचान भी अलग होती है, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का मानना है कि यहोवा यीशु का पिता है, लेकिन यह वास्तव में यीशु ने स्वीकार नहीं किया था, जिसने कहा: "हम पिता और पुत्र के रूप में कभी अलग नहीं थे; मैं और स्वर्ग में पिता एक हैं। पिता मुझ में है और मैं पिता में हूँ; जब मनुष्य पुत्र को देखता है, तो वे स्वर्गिक पिता को देख रहे हैं।" जब यह सब कहा जा चुका है, पिता हो या पुत्र, वे एक आत्मा हैं, अलग-अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं हैं। जब मनुष्य समझाने की कोशिश करता है, तो अलग-अलग व्यक्तियों के विचार के साथ ही मामला जटिल हो जाता है, साथ ही पिता, पुत्र और आत्मा के बीच का संबंध भी। जब मनुष्य अलग-अलग व्यक्तियों की बात करता है, तो क्या यह परमेश्वर को मूर्तरूप नहीं देता? यहां तक कि मनुष्य व्यक्तियों को पहले, दूसरे और तीसरे के रूप में स्थान भी देता है; ये सभी बस मनुष्य की कल्पनाएं हैं, संदर्भ के योग्य नहीं हैं और पूरी तरह अवास्तविक हैं! यदि तुमने उससे पूछा: "कितने परमेश्वर हैं?" वह कहेगा कि परमेश्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व है: एक सच्चा परमेश्वर। यदि तुमने फिर पूछा: "पिता कौन है?" वह कहेगा: "पिता स्वर्ग में परमेश्वर का आत्मा है; वह सबका प्रभारी है और स्वर्ग का स्वामी है।" "तो क्या यहोवा आत्मा है?" वह कहेगा: "हाँ!" यदि तुमने फिर उससे पूछा, "पुत्र कौन है?" तो वह कहेगा कि निश्चित रूप से यीशु पुत्र है। "तो यीशु की कहानी क्या है? वह कहाँ से आया था?" वह कहेगा: "यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा मरियम के गर्भधारण करने से हुआ था।" तो क्या उसका सार भी आत्मा नहीं है? क्या उसका कार्य भी पवित्र आत्मा का प्रतिनिधित्व नहीं करता? यहोवा आत्मा है और उसी तरह यीशु का सार भी है। अब अंत के दिनों में, यह कहना अनावश्यक है कि अभी भी आत्मा कार्य कर रहा है; वे अलग-अलग व्यक्ति कैसे हो सकते हैं? क्या यह महज़ परमेश्वर का आत्मा नहीं जो आत्मा के कार्य को अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों से क्रियान्वित कर रहा है? ऐसे तो, व्यक्तियों के बीच कोई अंतर नहीं है। यीशु पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था और सुनिश्चित रूप से, उसका कार्य बिल्कुल पवित्र आत्मा के जैसा था। यहोवा द्वारा क्रियान्वित किए गए कार्य के पहले चरण में, वह न तो देह बना और न मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। तो मनुष्य ने कभी उसके प्रकटन को नहीं देखा। कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वह कितना बड़ा और कितना ऊँचा था, वह फिर भी आत्मा था, स्वयं परमेश्वर जिसने पहले मनुष्य को बनाया था। अर्थात, वह परमेश्वर का आत्मा था। जब वह बादलों में से मनुष्य से बात करता था, वह केवल एक आत्मा था। किसी ने भी उसके प्रकटन को नहीं देखा; केवल अनुग्रह के युग में जब परमेश्वर का आत्मा देह में आया और यहूदिया में देहधारी हुआ, तो मनुष्य ने पहली बार एक यहूदी के रूप में देहधारण की छवि देखी। यहोवा की भावना को महसूस नहीं किया जा सकता था। हालांकि, वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था, अर्थात स्वयं यहोवा के आत्मा के गर्भ में आया था, और यीशु का जन्म तब भी परमेश्वर के आत्मा के मूर्तरूप में हुआ था। मनुष्य ने जो सबसे पहले देखा वह यह था कि पवित्र आत्मा यीशु पर एक कबूतर की तरह उतर रहा है; यह यीशु के लिए विशेष आत्मा नहीं था, बल्कि पवित्र आत्मा था। तो क्या यीशु का आत्मा पवित्र आत्मा से अलग हो सकता है? अगर यीशु यीशु है, पुत्र है, और पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है, तो वे एक कैसे हो सकते हैं? यदि ऐसा है तो कार्य क्रियान्वित नहीं किया जा सकता। यीशु के भीतर का आत्मा, स्वर्ग में आत्मा और यहोवा का आत्मा सब एक हैं। इसे पवित्र आत्मा, परमेश्वर का आत्मा, सात गुना सशक्त आत्मा और सर्वसमावेशी आत्मा कहा जा सकता है। परमेश्वर का आत्मा बहुत से कार्य क्रियान्वित कर सकता है। वह दुनिया को बनाने और पृथ्वी को बाढ़ द्वारा नष्ट करने में सक्षम है; वह सारी मानव जाति को छुटकारा दिला सकता है और इसके अलावा वह सारी मानवजाति को जीत और नष्ट कर सकता है। यह सारा कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा क्रियान्वित किया गया है और उसके स्थान पर परमेश्वर के किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता था। उसके आत्मा को यहोवा और यीशु के नाम से, साथ ही सर्वशक्तिमान के नाम से भी बुलाया जा सकता है। वह प्रभु और मसीह है। वह मनुष्य का पुत्र भी बन सकता है। वह स्वर्ग में भी है और पृथ्वी पर भी है; वह ब्रह्मांडों के ऊपर और बहुलता के बीच में है। वह स्वर्ग और पृथ्वी का एकमात्र स्वामी है! सृष्टि के समय से अब तक, यह कार्य स्वयं परमेश्वर के आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया गया है। यह कार्य स्वर्ग में हो या देह में, सब कुछ उसकी आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। सभी प्राणी, चाहे स्वर्ग में हों या पृथ्वी पर, उसकी सर्वशक्तिमान हथेली में हैं; यह सब स्वयं परमेश्वर का कार्य है और उसके स्थान पर किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। स्वर्ग में वह आत्मा है, लेकिन स्वयं परमेश्वर भी है; मनुष्यों के बीच वह देह है, पर स्वयं परमेश्वर बना रहता है। यद्यपि उसे सैकड़ों-हज़ारों नामों से बुलाया जा सकता है, तो भी वह स्वयं है और सारा कार्य उसके आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसके क्रूसीकरण के माध्यम से सारी मानव जाति का छुटकारा उसके आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य था और वैसे ही अंत के दिनों के दौरान सभी देशों और सभी भूभागों के लिए उसकी घोषणा भी। हर समय, परमेश्वर को केवल सर्वशक्तिमान और एक सच्चा परमेश्वर, सभी समावेशी स्वयं परमेश्वर कहा जा सकता है। अलग-अलग व्यक्ति अस्तित्व में नहीं हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का यह विचार तो बिल्कुल नहीं है! स्वर्ग में और पृथ्वी पर केवल एक ही परमेश्वर है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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