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61. ईमानदार व्यक्ति होना आसान नहीं है

बहन ज़िक्सिन वुहान शहर, हुबेई प्रांत

परमेश्वर के वचन को खाने एवं पीने और प्रचार को सुनने के जरिए, मैं एक ईमानदार व्यक्ति होने के महत्व को समझने लगी थी और इस प्रकार मैं ने एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया। कुछ समय पश्चात्, मैं ने पाया कि मैं ने एक ईमानदार व्यक्ति होने में कुछ प्रवेश पा लिया था। उदाहरण के लिए: प्रार्थना करते समय या किसी के साथ बातचीत करते हुए, मैं सत्य बोलने और उसे हृदय से बोलने में सक्षम होती; मैं अपने कर्तव्य के निर्वहन को भी गम्भीरता से ले सकती थी, और जब मैं ने भ्रष्टता को प्रकट किया तो मैं स्वयं अन्य लोगों से खुलकर बात कर सकती थी। इस कारण से, मैं ने सोचा कि एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास करना काफी सरल था, और उतना कठिन तो बिलकुल भी नहीं था जितना इसे परमेश्वर के वचनों के द्वारा बनाया गया था: "बहुत से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की अपेक्षा नरक के लिए दण्डित किए जाएँगे।" यह तब तक नहीं हुआ जब तक मैं अनुभव के माध्यम से इस बात की सराहना करने में सक्षम नहीं हुई कि वास्तव में भ्रष्ट मनुष्य के लिए यह आसान नहीं है कि ईमानदार व्यक्ति बन जाए। परमेश्वर के वचन वास्तव में बिलकुल सही हैं और पूरी तरह से बढ़ाचढ़ा कर कहे गए नहीं हैं।

एक दिन जब मैं लेखों का सम्पादन कर रही थी, तो मैं ने देखा कि किसी जिले की सम्पादक टीम की एक बहन मुझ से बेहतर थी, इसकी परवाह किए बगैर कि बात लेखों को लिखने की थी या सम्पादन की। तब मैं ने सोचा: मुझे उन लेखों के प्रति कठोर होना पड़ेगा जिन्हें उसने सम्पादित किया था, अगर ऐसा हो कि अगुवे देखें कि वह मेरी तुलना में लेखों को बेहतर ढंग से सम्पादित करती है और उसकी पदोन्नति कर दें, तो यह मेरे अपने पद को जोखिम में डाल देगा। इस इरादे के दिखाई देने के पश्चात्, मैं ने भीतर दोषी महसूस किया। जाँच एवं विश्लेषण करने के पश्चात्, मैं ने पहचाना कि यह प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष का एक प्रदर्शन था, असली प्रतिभा के प्रति ईर्ष्यालू होना था, और ऐसे लोगों को दरकिनार करना था जो मुझ से अलग थे। एक सभा के दौरान, मैं मूल रूप से चाहती थी कि खुलकर अपनी भ्रष्टता की घोषणा करूं, परन्तु फिर मैं ने सोचा: यदि मैं अपने स्वयं के बुरे इरादों को बताती हूँ, तो मेरे साथी और उस मेजबान परिवार की बहन मुझे किस प्रकार देखते? क्या वे कहते कि मेरा दिल अत्यंत दुर्भावनापूर्ण है और मेरा स्वभाव बहुत ही बुरा है? इसे भूल जाओ, इसे न कहना की बेहतर है। यह बस एक विचार था, और यह वैसा नहीं है जैसा मैं ने इसे वास्तव में किसी तरह अंजाम दिया था। और ठीक उसके समान ही, अपने असली अंधेरे पहलू को छिपाते हुए, जब मैं ने देखा कि कोई और लेखों को बेहतर ढंग से सम्पादित करता है तो मैं ने महज अकस्मात् ही जिक्र किया कि मैं बहुत घबरा रही थी कि मेरा स्थान किसी और को दे दिया जाएगा। इसके पश्चात्, वह आरोप जो मेरे हृदय में था काफी बढ़ गया। अतः मैं ने परमेश्वर के समक्ष प्रण लिया कि ऐसा केवल एक ही बार होगा, और यह कि अगली बार मैं निश्चित रूप से ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास करूंगी।

कुछ दिनों के पश्चात्, जब मैं इन्टरनेट पर चैट (बात) कर रही थी, तब मैं ने मेजबान परिवार की उस बहन को यह कहते हुए सुना कि दोनों बहनें कितनी अच्छी थीं जो उसके घर में रहती थीं (मैं उन्हें जानती थी), परन्तु इसके विषय में कभी एक शब्द भी नहीं कहा कि मैं अच्छी थी या नहीं, जिसने मुझे अत्यंत दुखी कर दिया। उसे मेरे विषय में ऊँचा सोचने हेतु बाध्य करने के लिए, तब मैं ने उन दोनों बहनों की खामियों को एक एक करके सूचीबद्ध किया, यह संकेत करते हुए कि वे मेरे समान अच्छी नहीं थीं। यह कहने के पश्चात्, मुझे यह भी एहसास हुआ कि जो कुछ मैं ने कहा वह उचित नहीं था, और यह कि मेरा इरादा एवं उद्देश्य दूसरों को नीचे करना और अपने आपको ऊपर करना था। परन्तु मैं इतनी लज्जित थी उनके साथ खुलकर बात नहीं कर सकती थी, इसलिए मैं ने मेजबान परिवार की बहन से कहा: "जब मैं ने आपको उन दोनों बहनों की प्रशंसा करते हुए सुना, तो मुझे लगा कि आपके हृदय में कुछ मूर्तियां (आदर्श व्यक्ति) हैं, और इसलिए मुझे उनकी छवि को थोड़ा बहुत नुकसान पहुँचाना होगा जिससे आप आगे से लोगों की ओर न देखें।" जैसे ही मेरी आवाज़ शांत हुई, वह बहन जिसके साथ मुझे भागीदार बनाया गया था उसने कहा: "यह इस पर निर्भर करता है कि आपके पास कोई गूढ़ उद्देश्य हैं या नहीं। यदि ऐसा है, तो यह अत्यंत विश्वासघाती है। यदि नहीं, तो ऐसा कहा जा सकता कि यह केवल भ्रष्टता का प्रकाशन है।" उसे यह कहते हुए सुनकर, मैं अति भयभीत हो गई कि उन पर मेरा बुरा प्रभाव पड़ेगा, अतः मैं ने जल्दी से अपनी बात समझाने की कोशिश की; "मेरे पास कोई गूढ़ उद्देश्य नहीं थे। यह बस इतना है कि मैं ने इसे सही तरीके से नहीं बताया था।" इस दिखावटी तर्क के पश्चात्, मैं भीतर से अत्यंत परेशान हो गई, और जब मैं ने प्रार्थना की तो मैं ने विशेष रूप से दोषी महसूस किया: तुम बहुत चालाक हो। तुम गोलमोल तरीके से बोलती हो, झूठ गढ़ती हो, और सच्चाई को ढांपती हो, हमेशा अपने बुरे इरादों एवं अहंकारी महत्वाकांक्षाओं को छिपाती हो और उनका संचय करती हो। क्या यह परमेश्वर को धोखा देना नहीं है? इसके बावजूद, मैं ने तब भी पश्चाताप नहीं किया और सिर्फ परमेश्वर से भीख मांगी कि मुझे क्षमा कर दे। परन्तु परमेश्वर का स्वभाव अनुल्लंघनीय है, और परमेश्वर का अनुशासन जल्द ही मुझ पर उतरेगा।

अगले दिन, मुझे अचानक तेज बुखार हो गया, और मेरे शरीर का हर एक जोड़ दुखने लगा। मैं ने शुरुआत में सोचा कि रात में सोते हुए मुझे ठंड लग गई और यह कि यदि मैं कुछ दवा ले लूँ तो मैं बेहतर हो जाऊँगी। परन्तु कौन जानता था कि दवा लेने से कोई मदद नहीं होती, और दो दिन पश्चात् मैं बिस्तर से भी बाहर नहीं निकल सकी। इसके अतिरिक्त, मेरी जीभ सूज गई और कड़ी हो गई, और मेरा गला भी दर्द में सूज गया, इतनी बुरी रीति से दर्द कर रहा था कि मैं बोल नहीं सकती थी। थूक निगलना ही काफी कठिन था, खाना खाने की तो बात ही छोड़ दीजिए। इस अचानक आई बीमारी के सामने, मैं भयभीत हो गई, और अपने हृदय में बार बार परमेश्वर से प्रार्थना की। उस घड़ी, एक स्पष्ट एहसास अचानक ही मेरे भीतर आ गया: तुझे किसने झूठ बोलने दिया? यदि तू झूठ बोलती है तो तुझे अनुशासित करना पड़ेगा। इस रीति से, तेरी जुबान कोई पाप नहीं करेगी। केवल तभी मैं ने एहसास किया कि परमेश्वर का अनुशासन मुझ पर आया है। मैं ने जल्दी से अपने दिल में परमेश्वर से क्षमा मांगी: "ओह परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि मैं गलत थी। कृपया मुझे क्षमा कर दें। इस बार मैं निश्चित रूप से खुलकर बात करूंगी।" प्रार्थना करने के पश्चात्, मैं ने ध्यान दिया कि मेरे गले का दर्द काफी अच्छा हो गया था। फिर भी, जब मेरी साथी और मेजबान परिवार की बहन मुझ से यह पूछने के लिए आए कि मैं अचानक क्यों बीमार हो गई, तो मैं शुरुआत में सम्पूर्ण सच्चाई को बाहर निकालना चाहती थी, परन्तु फिर सोचा: "जब एक बार मैं खुलकर बात करती हूँ, तो ऐसी बहुत सी बातें जिन्हें मैं ने पहले कहा था उनका खण्डन किया जाएगा। क्या वे कहेंगे कि मैं बहुत चालाक हूँ? भविष्य में हम कैसे मिलकर रहेंगे?" इन बातों को सोचने के पश्चात्, मुझ में अब भी सत्य को प्रकट करने का साहस नहीं था, और मैं ने बस अकस्मात् ही कहा कि मैं बीमार हो गई क्योंकि मुझे घर की याद आ रही थी। जब वे चले गए, तो मेरे हृदय की बेचैनी काटनेवाली धार (ब्लेड) के समान महसूस हुई। मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मेरी धोखाधड़ी अब इतनी आसानी से एवं न चाहते हुए भी आ सकती थी। मैं बिस्तर में लेट गई, अपने सीने में जकड़न और साँस लेने में कठिनाई महसूस करते हुए, जैसे कि मैं मरने ही वाली थी। मैं भयभीत थी कि मेरा दम घुट जाएगा, अतः सब कुछ के बावजूद मैं ने कमरे का दरवाजे खोलने के लिए अपने आपको घसीटा और हवा को प्रवाहित होने दिया। कौन जानता था कि जैसे ही मैं दरवाजे पर आई, मैं ने संसार को गोल गोल घूमते हुए महसूस किया। जब पैरों ने कमज़ोरी महसूस की तो मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और मेरा पूरा शरीर से ठंडे पसीने से भर गया। उस संवेग के बहाव में आकर, मैं दरवाजे की चौखट पर झुक गई। इस क्षण में, परमेश्वर के वचन की एक पंक्ति मेरे हृदय में चमकी "मैं लोगों को इस तरह से धोखा कैसे देने दे सकता हूं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "कितना नीच है तुम्हारा चरित्र!" से)। परमेश्वर के प्रतापी एवं क्रोधपूर्ण वचनों के सामने, मैं ने परमेश्वर के क्रोध को मेरी ओर महसूस किया, और मेरा हृदय भय से कांपने से स्वयं को रोक नहीं सका। परमेश्वर का स्वभाव अनुल्लंघनीय है, परन्तु मेरी स्वयं की प्रतिष्ठा, हैसियत और घमण्ड की खातिर, मैं ने बार बार अपने प्रण के साथ धोखा किया, और ढिठाई से परमेश्वर को धोखा दिया। परमेश्वर मुझे उस से ऐसा व्यवहार करने की अनुमति कैसे दे सकता था? मैं जोर जोर से हांफी और लगातार अपने हृदय में परमेश्वर से कहती रही: "इस बार मैं निश्चित रूप से खुलकर बात करूंगी, मैं निश्चित रूप से खुलकर बात करूंगी…" परमेश्वर के अनुशासन एवं दण्ड के अधीन, मेरे पास आखिरकार उन बहनों के सामने समूची कहानी को प्रकट करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था।

यह केवल इस अनुभव के माध्यम से ही हुआ कि मैं ने आखिरकार परमेश्वर के वचनों को समझा कि "बहुत से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की अपेक्षा नरक के लिए दण्डित किए जाएँगे।" जो वास्तव में सही हैं और उनका निशाना मेरे जैसे चालाक लोगों की ओर है। चूँकि मेरा चालाक स्वभाव मेरे भीतर गहराई से जड़ पकड़े हुए था और मेरा जीवन बन चुका था, इसलिए मेरे लिए एक ईमानदार व्यक्ति होना आसमान में चढ़ने की अपेक्षा कहीं अधिक कठिन था। मैं सोचा करती थी कि एक ईमानदार व्यक्ति होना आसान था, परन्तु वह इसलिए था क्योंकि मेरा अभ्यास उन चीज़ों को बिलकुल भी शामिल नहीं करता था जो मेरे आत्मा की गहराई में थीं और यह महज सतह पर किया गया बस कोई आचरण था जिसे उस पूर्व शर्त के अंतर्गत किया गया था कि निजी हितों को प्रभावित नहीं किया जाएगा। यदि आज इसने मेरे अति आवश्यक हितों पर असर डाला होता या भविष्य की मेरी संभावनाओं एवं नियति, मेरी हैसियत एवं चेहरे को प्रभावित किया होता, तो मेरा पुराना स्वभाव स्वयं को प्रकट करता और मैं एक ईमानदार व्यक्ति होने में सक्षम नहीं होती। उस सत्य के साथ जो मेरे सामने था, मैं ने गहराई से सराहना करना शुरू कर दिया कि एक ईमानदार व्यक्ति होना वास्तव में आसान नहीं है। विशेषकर मेरे जैसे चालाक व्यक्ति के लिए, सभी बहानों को छोड़े बिना और परमेश्वर के अनुशासन एवं दण्ड के बिना मैं कभी भी एक ईमानदार इंसान नहीं हो सकती थी। अब से, मैं ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करूंगी, परमेश्वर के सभी वचनों को स्वीकार करूंगी, अपने स्वयं के चालाक स्वभाव को और भी अधिक गहराई से समझूंगी, और सभी बहानों को छोड़ दूंगी और एक ईमानदार इंसान बनूंगी, ताकि मैं एक मानव प्राणी के सच्चे रूप को जी सकूं।

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