5. परमेश्वर के साथ कोई एक सामान्य सम्बन्ध कैसे स्थापित कर सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

लोग अपने हृदय से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; परमेश्वर के वचनों से जुड़ने के लिए वे अपने हृदय का उपयोग करते हैं और इस प्रकार वे परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाते हैं। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना चाहिए। अपने हृदय को उसके सामने शांत करने और अपने पूरे हृदय को उस पर उँड़ेलने के बाद ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन विकसित करने में सक्षम होगे। यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते और यदि उनका हृदय उसमें नहीं है और वे उसके दायित्व को अपना दायित्व नहीं मानते, तो जो कुछ भी वे करते हैं, वह परमेश्वर को धोखा देने का कार्य है, जो धार्मिक व्यक्तियों का ठेठ व्यवहार है, और वे परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथउचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

आज पवित्र आत्मा के वचन पवित्र आत्मा के कार्य का गतिविज्ञान हैं और इसके दौरान पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य का निरंतर प्रबोधन, पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति है। और आज पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति क्या है? यह आज परमेश्वर के कार्य और एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में दर्ज होने में लोगों का नेतृत्व करना है। ...

सबसे पहले, तुम्हें अपने दिल को परमेश्वर के वचनों में उड़ेल देना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के अतीत के वचनों का अनुसरण नहीं करना चाहिए, और न तो उनका अध्ययन करना चाहिए और न ही आज के वचनों से उनकी तुलना करनी चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें पूरी तरह से परमेश्वर के वर्तमान वचनों में अपना दिल उड़ेल देना चाहिए। अगर ऐसे लोग हैं जो अभी भी अतीत काल के परमेश्वर के वचन, आध्यात्मिक किताबें, या प्रचार-प्रसार के अन्य विवरणों को पढ़ना चाहते हैं, जो आज पवित्र आत्मा के वचनों का पालन नहीं करते हैं, तो वे सभी लोगों में सबसे अधिक मूर्ख हैं; परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है। यदि तुम आज पवित्र आत्मा का प्रकाश स्वीकार करने के लिए तैयार हो, तो फिर अपने दिल को आज परमेश्वर की उक्तियों में उड़ेल दो। यह पहली चीज़ है जो तुम्हें हासिल करनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो औरउसके चरण-चिन्हों का अनुसरण करो' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध रखने के मुद्दे का समाधान करना आवश्यक है। परमेश्वर के साथ उचित संबंध रखे बिना परमेश्वर में विश्वास रखने का महत्त्व खो जाता है। परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करना परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रहने वाले हृदय के साथ पूर्णतया संभव है। परमेश्वर के साथ उचित संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना, स्वयं के बारे में योजनाएँ न बनाना, और सभी चीजों में पहले परमेश्वर के परिवार के हितों का ध्यान रखना; इसका अर्थ है परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। अगर तुम परमेश्वर की इच्छा स्वयं पर प्रकट होने की प्रतीक्षा करते हो, तो फिर इस पर अमल करो, तुम्हारा अमल करना सामयिक होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध उचित होगा। सब-कुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर निर्मित होता है। परमेश्वर के वचनों को खाओ-पियो, फिर परमेश्वर की आवश्यकताओं को अभ्यास में लाओ, अपने विचार सही करो, और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला या कलीसिया में विघ्न डालने वाला कोई काम मत करो। ऐसा कोई काम मत करो, जो तुम्हारे भाई-बहनों के जीवन को लाभ न पहुँचाए; ऐसी कोई बात मत कहो, जो दूसरों के लिए सहायक न हो, और कोई निंदनीय कार्य न करो। अपने हर कार्य में न्यायसंगत और सम्माननीय रहो और सुनिश्चित करो कि तुम्हारा हर कार्य परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य हो। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर हो सकती है, फिर भी तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ का लालच न करते हुए परमेश्वर के परिवार के हित पहले रखने और न्यायपूर्वक कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम इस तरह से कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित होगा।

अपने हर कार्य में तुम्हें यह जाँचना चाहिए कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित है। यह न्यूनतम मापदंड है। अपने इरादों पर ग़ौर करो, और अगर तुम यह पाओ कि गलत इरादे पैदा हो गए हैं, तो उनसे मुँह मोड़ लो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करो; इस तरह तुम एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के समक्ष सही है, जो दर्शाएगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जो कुछ भी करते या कहते हो, उसमें अपने हृदय को सही रखने और अपने कार्यों में नेक होने में सक्षम बनो, और अपनी भावनाओं से संचालित मत होओ, न अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करो। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को आचरण करना चाहिए। छोटी-छोटी बातें व्यक्ति के इरादे और आध्यात्मिक कद प्रकट कर सकती हैं, और इसलिए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए लोगों को पहले अपने इरादे और परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारना चाहिए। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो; केवल तभी तुममें परमेश्वर का व्यवहार, काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपना वांछित प्रभाव हासिल कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि यदि मनुष्य अपने हृदय में परमेश्वर को रखने में सक्षम हैं और वे व्यक्तिगत लाभ नहीं खोजते या अपनी संभावनाओं पर विचार नहीं करते (देह-सुख के अर्थ में), बल्कि जीवन में प्रवेश करने का बोझ उठाने के बजाय सत्य का अनुसरण करने की पूरी कोशिश करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं—अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो जिन लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सही होंगे, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध उचित हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करते समय, हमें कहाँ से शुरू करना चाहिए? परमेश्वर से प्रार्थना करते समय दिल से बात करना सबसे महत्वपूर्ण बात है। उदाहरण के लिए, प्रार्थना में तुम कहते हो, "हे परमेश्वर, मैं देखता हूँ कि मेरे कई भाई-बहन तेरे लिए खुद को समर्पित करते हैं, लेकिन मेरी हैसियत बहुत छोटी है। मैं अपनी आजीविका, अपने भविष्य के बारे में सोचता हूँ और सोचता हूँ कि क्या मेरा शरीर भविष्य में कठिनाइयों का सामना कर पाएगा। मैं सब कुछ नहीं त्याग सकता। मैं वाकई तेरे कर्ज में हूँ। उनके पास इतना बड़ा कद कैसे हो सकता है? हम समान प्रकार के परिवारों से आते हैं। मगर वे खुद को परमेश्वर के लिए पूरे समय खपा सकते हैं, मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता? मुझमें सत्य की बहुत कमी है। मैं हमेशा अपने शारीरिक इच्छाओं की चिंता करता हूँ। मेरे पास पर्याप्त आस्था नहीं है। हे परमेश्वर, मैं चाहता हूँ कि तू मुझे प्रबुद्ध करे, मुझे रोशन करे, मुझे वास्तव में तुझ पर विश्वास करने और तेरे लिए जल्द से जल्द खुद को खपाने में सक्षम बना।" यह दिल से बात करना है। यदि तुम हर दिन, दिल से, इस तरह परमेश्वर के साथ संवाद करते हो, तो उसे पता चलेगा कि तुम ईमानदार हो और उसे मूर्ख बनाने या चिकनी चुपड़ी बातों में फंसाने और उसे धोखा देने की कोशिश नहीं कर रहे हो। तब पवित्र आत्मा अपना कार्य करेगा। परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करने का यही अर्थ है। हम रचनाएं हैं, और वह सृष्टिकर्ता है। रचना जब अपने सृष्टिकर्ता के सामने खड़ी हो तो उसके पास क्या-क्या होना चाहिए? उसके पास सच्ची आज्ञाकारिता, स्वीकृति, विश्वास और आराधना होनी चाहिए। हमें अपने दिल पूरी तरह से परमेश्वर को दे देना चाहिए। उन्हें उसे अगुवाई करने, शासन करने और योजना बनाने देना चाहिए। इस तरह प्रार्थना करना और तलाश करना सही है। परमेश्वर के साथ उचित संबंध स्थापित करने का यही अर्थ है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

परमेश्वर के साथ उचित सम्बन्ध कैसे स्थापित करें? बहुत से सिद्धांत इसमें शामिल हैं। पहला यह है कि तुम्हें परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि में विश्वास करना होगा, तुम्हें विश्वास करना होगा कि परमेश्वर के सभी वचनों को पूरा किया जाएगा। यही आधार है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं करते हो, तो यह नहीं चलेगा, क्योंकि इससे वास्तविक विश्वास की कमी दिखाई देती है; परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास करने में विफलता वास्तविक विश्वास की कमी दर्शाती है। दूसरा, तुम्हें अपना दिल परमेश्वर को देना होगा और परमेश्वर को सभी चीजों में अधिकार लेने देना होगा। तीसरा, तुम्हें परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार करना होगा, और यह महत्वपूर्ण है। यदि तुम अपनी प्रार्थनाओं और सहभागिता, अपने कार्यों और शब्दों के बारे में परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम परमेश्वर के साथ सच्ची सहभागिता कैसे कर सकते हो? क्या तुम उसे बता सकते हो कि तुम्हारे दिल में क्या है? जब तुम बोलते हो, तो तुम केवल अपने लिए प्रार्थना करते हो; जब तुम बोलते हो, तो तुम जो कहते हो वह झूठ के साथ मिश्रित होता है, बुरे इरादे रखता है, और दिखावे और झूठ से भरा हुआ है। यदि तुम परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार नहीं करते हो, तो क्या तुम इन चीज़ों को पहचान सकते हो? एक बार जब तुम परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार कर लेते हो, तो जब तुम गलत बातें कहते हो, निरर्थक शब्दों को कहने के बाद, वादे करने के बाद, तुम तुरंत सोचते हो, "अरे, क्या मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे रहा हूँ? यह परमेश्वर से झूठ बोलने जैसा क्यों लगता है?" यही परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार करना है, और इसी कारण से यह इतना महत्वपूर्ण है। चौथा, तुम्हें सभी चीजों में सत्य तलाशना सीखना होगा। शैतान के दर्शन पर भरोसा न करो, और तुम्हें लाभ होता है या नहीं, इस पर आधारित चीजें मत करो। तुम्हें सत्य का अर्थ निकालते हुए, सत्य की तलाश करनी चाहिए, फिर तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए। व्यक्तिगत लाभों या नुकसानों की परवाह किये बिना, तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए और सत्य कहना चाहिए, साथ ही एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए। नुकसान उठाना एक तरह का आशीर्वाद है; जब तुम नुकसान उठाते हो, तो तुम्हें परमेश्वर का और अधिक आशीष मिलता है। अब्राहम का कई बार फायदा उठाया गया, और लोगों से अपने संवाद के दौरान वह हमेशा समझौता किया करता था। यहाँ तक कि उसके सेवकों ने भी शिकायत की, "आप इतने कमज़ोर क्यों हैं? आइए उनसे लड़ें!" उस समय अब्राहम ने क्या सोचा? "हम उनके साथ नहीं लड़ेंगे। सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है, और थोड़ा सा नुकसान उठाने में कुछ भी बुरा नहीं है।" नतीजतन, परमेश्वर ने अब्राहम को और भी आशीष दिया। क्या यदि सत्य का अभ्यास करने के कारण, तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ के विषय में नुकसान भुगतना पड़ा है, और तुम परमेश्वर को दोष नहीं देते हो, तो परमेश्वर तुम्हें आशीष देगा। पाँचवाँ, तुमको सभी चीजों में सत्य का पालन करना सीखना होगा, यह भी महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति सत्य के अनुसार चीजें कहता है उसकी पहचान के बावजूद, चाहे जो व्यक्ति ऐसा कहता है उसके हमारे साथ अच्छे रिश्ते हों या न हों, और चाहे हम उसके साथ कैसे भी व्यवहार करते हों, जब तक उसकी बातें सत्य के अनुसार है, हमें उसका पालन करना चाहिए और वह जो कहता है उसे स्वीकार करना चाहिए। यह क्या दर्शाता है? यह दिखाता है कि मनुष्य के पास ऐसा दिल है जो परमेश्वर का सम्मान करता है। यदि कोई व्यक्ति सत्य के अनुसार बात करने वाले तीन-चार साल के बच्चे का पालन कर सकता है, तो क्या यह व्यक्ति किसी भी तरह से घमंडी है? क्या यह कोई ऐसा है जो अहंकारी है? वह बदल गया है, उसका स्वभाव बदल गया है। ... छठा, अपने कर्तव्यों को पूरा करने में परमेश्वर के प्रति वफादार रहो। सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों को कभी न भूलो। यदि तुम अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाओगे। यदि मनुष्य अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करता है, तो वह कचरा है, और वह शैतान से संबंधित है। यदि तुम परमेश्वर के सामने अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर के लोगों में से एक हो, क्योंकि यही वह पहचान है। यदि तुमने अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से पूरा कर लिया है, तो तुम एक योग्य प्राणी हो; यदि तुम अपने कर्तव्यों को पूरा करने में असफल रहे, तो तुम एक योग्य प्राणी नहीं हो, और तुम्हें परमेश्वर की मंजूरी नहीं मिलेगी। इसलिए, यदि तुम अपने कर्तव्यों को पूरा करने में परमेश्वर के प्रति वफादार हो, यदि तुम फिर परमेश्वर के संपर्क में आते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें आशीष नहीं दे सकता? क्या परमेश्वर तुम्हारे साथ नहीं हो सकता? सातवाँ, सभी चीजों में परमेश्वर के पक्ष में रहो, परमेश्वर के साथ दिल और मन से एक होकर रहो। अगर तुम्हारे माता-पिता कुछ ऐसा कहते हैं जो सत्य के अनुसार नहीं है, जो परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है और परमेश्वर का विरोध करता है, तो तुम्हें परमेश्वर के पक्ष में खड़े होने में सक्षम होना चाहिए, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ तर्क-वितर्क करना चाहिए, उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए, उनकी बातों को मानने से इनकार कर देना चाहिए। क्या यह गवाही देना नहीं है? क्या यह शैतान को शर्मिंदा कर सकता है? (हाँ, कर सकता है।) ... यदि मनुष्य इन सात सिद्धांतों का पालन कर सकता है, तो वह परमेश्वर की मंजूरी प्राप्त कर सकता है और तभी परमेश्वर के साथ उसका रिश्ता पूरी तरह से सामान्य होगा। ये सात सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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