13. युवावस्था के शिखर-काल में कारावास

चेंग्ज़ी, हेबेई प्रांत

हर कोई कहता है कि हमारे यौवन-काल का मुख्य भाग जीवन का सबसे शानदार और सबसे निर्मल समय होता है। शायद कई लोगों के लिए, वे वर्ष खूबसूरत यादों से भरे होते हैं, लेकिन जिस बात की मैंने कभी उम्मीद भी नहीं की थी वह थी कि मैंने अपनी युवावस्था का शिखर-काल जेल में व्यतीत किया था। इसके लिए तुम मेरी ओर अजीब तरीके से देख सकते हो, लेकिन मुझे इसका अफ़सोस नहीं है। यद्यपि सलाखों के पीछे का वह समय कड़वाहट और आँसुओं से भरा था, किन्तु यह मेरे जीवन का सबसे मूल्यवान उपहार था, और मुझे इससे बहुत कुछ प्राप्त हुआ।

मेरा जन्म एक खुशहाल परिवार में हुआ था, और मैंने बचपन से अपनी माँ के साथ यीशु की आराधना की है। जब मैं पंद्रह वर्ष की थी, तो मैं और मेरे परिवार ने इस बात से आश्वस्त होकर कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर यीशु का फिर से आना है, खुशी से अंतके दिनों के उसके कार्य को स्वीकार कर लिया था।

अप्रैल 2002 में एक दिन, जब मैं सत्रह वर्ष की थी, तो मैं और मेरी एक बहन अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए किसी जगह पर थे। सुबह तड़के 1:00 बजे, जब हम अपने मेजबान के घर पर गहरी नींद में सोये हुए थे तभी अचानक दरवाजे पर हुई कुछ ज़ोरदार, आग्रहपूर्ण दस्तक से हम लोग जाग उठे। हमने बाहर किसी को चिल्लाते हुए सुना, "दरवाज़ा खोलो! दरवाज़ा खोलो"! जैसे ही उस बहन ने जो हमारी मेजबान थी, दरवाज़ा खोला, कुछ पुलिस अधिकारी अचानक अंदर घुस गए और आक्रामक रूप से बोले, "हम लोक सुरक्षा ब्यूरो से हैं"। "लोक सुरक्षा ब्यूरो" इन तीन शब्दों को सुनकरमैं तुरंत घबरा गई। क्या परमेश्वर में हमारे विश्वास के कारण वे हमें गिरफ्तार करने के लिए यहाँ आए थे? मैंने कुछ भाइयों और बहनों को उनके विश्वास के कारण गिरफ्तार किए जाने, और सताए जाने के बारे में सुना था; कहीं ऐसा तो नहीं कि यही अब मेरे साथ भी होने जा रहा था? बस तभी मेरा हृदय बेतहाशा धक्-धक्, धक्-धक् कर धड़कने लगा और अपनी घबराहट में मुझे नहीं पता था कि अब क्या करना चाहिए। इसलिए मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की, "परमेश्वर, मैं तुझसे मेरे साथ रहने की विनती करती हूँ। मुझे विश्वास और साहस दे। चाहे कुछ भी हो, मैं हमेशा तेरे लिए गवाही देने को तैयार रहूँगी। मैं तुझसे यह भी याचना करती हूँ कि मुझे अपनी बुद्धि दे और मुझे वे वचन प्रदान कर जो मुझे बोलने चाहिए, ताकि मैं तेरे साथ विश्वासघात न करूँ और न ही अपने भाइयों और बहनों को बेचूँ।" प्रार्थना करने के बाद, मेरा हृदय धीरे-धीरे शांत हो गया। मैंने उन चार या पाँच पुलिस वालों को डाकुओं की तरह कमरे की तलाशी लेते हुए, बिस्तरों में, प्रत्येक अलमारी में, संदूकों में, और यहाँ तक कि बिस्तर के नीचे रखी हर चीज़ में भी तब तक खोज-बीन करते हुए देखा जब तक कि उन्होंने परमेश्वर के कथनों की कुछ पुस्तकें और साथ ही भजनों की कुछ सी.डी. नहीं जुटा ली। उनके अगुआ ने मुझसे भावहीन स्वर में कहा, "इन चीजों का तुम्हारे पास होना सबूत है कि तुम परमेश्वर में विश्वास करती हो। हमारे साथ आओ और तुम एक बयान दे सकती हो।" भयभीत होकर, मैंने कहा, "अगर कुछ कहना है, तो मैं इसे अभी यहीं कह सकती हूँ; मैं तुम्हारे साथ नहीं जाना चाहती।" वह फ़ौरन मुस्कुराया और उसने कहा, "डरो मत; आओ, बस एक बयान देने के लिए हम थोड़ी-सी यात्रा करेंगे। मैं तुम्हें बहुत जल्द यहाँ वापस ले आऊँगा।" उसकी बात का भरोसा कर, मैं उनके साथ गई और पुलिस कार में बैठ गई।

यह मेरे मन में कभी नहीं आया था कि वह छोटी-सी यात्रा मेरे जेल-जीवन की शुरूआत होगी।

जैसे ही हमने पुलिस स्टेशन के प्रांगण में प्रवेश किया, उन दुष्ट पुलिसकर्मियों ने वाहन से बाहर निकलने के लिए मुझ पर चिल्लाना शुरू कर दिया। उनके चेहरे की अभिव्यक्तियाँ बहुत जल्दी बदल गईं थीं, और अचानक वे जो पहले थे, उससे अब पूरी तरह से अलग लग रहे थे। जब हम कार्यालय में पहुँचे, तो हमारे पीछे कई हट्टे-कट्टे अधिकारी आए और मेरे दाएँ-बाएँ खड़े हो गए। मुझ पर उनका ज़ोर सुरक्षित हो जाने के बाद, दुष्ट पुलिस गिरोह का अगुआ मुझ पर चिल्लाया, "तेरा नाम क्या है? तू कहाँ से आई है? तुम लोग कुल कितने हो?" मैंने अभी अपना मुँह खोला ही था और जवाब देने के बीच में ही थी कि वह मुझ पर झपट पड़ा और मेरे चेहरे पर दो तमाचे जड़ दिए—चटाक, चटाक! मैं भौंचक्की रहकर चुप हो गई। मैंने मन ही मन सोचा, कि उसने मुझे क्यों मारा? मैंने अभी जवाब देना पूरा भी नहीं किया था। वे इतने रूखे और असभ्य क्यों हो रहे थे, जनता की पुलिस की मैंने जो कल्पना की थी, उससे वे बिल्कुल अलग क्यों हैं? इसके बाद, वह मुझसे पूछता गया कि मैं कितने साल की हूँ, और जब मैंने ईमानदारी से जवाब दिया कि मैं सत्रह वर्ष की हूँ, तो उसने फिर से मुझे मुँह पर चटाक, चटाक थप्पड़ मारे और झूठ बोलने के लिए मुझे डाँटा। उसके बाद, चाहे मैंने जो भी कहा, उसने इस तरह अंधाधुंध मेरे चेहरे पर तमाचों पर तमाचे जड़ दिए कि अब मुझे तारे नज़र आने लगे, मेरा सिर चकराने लगा, मेरे कानों में एक आवाज़ "वेंग, वेंग" सी बजने लगी, और मेरा चेहरा दर्द से जल उठा। तब जाकर अंततः मेरी समझ में आया कि: ये दुष्ट पुलिस वाले मुझे किसी भी पूछताछ के लिए लेकर नहीं आये हैं; वे तो बस मुझ से ज़बरन आत्म-समर्पण करवाने के लिए हिंसा का उपयोग करना चाहते है। मुझे अपने भाई-बहनों का कहा याद आया कि इन दुष्ट पुलिसकर्मियों के साथ तर्क करने की कोशिश काम नहीं करती है, बल्कि इससे परेशानी अंतहीन हो जाती है। अब, खुद अपने लिए यह अनुभव करने के बाद से, मैंने एक शब्द भी नहीं बोला, चाहे उन्होंने कुछ भी कहा हो। जब उन्होंने देखा कि मैं बात नहीं करूँगी, तो वे मुझ पर चिल्ला उठे, "तू कुतिया की बच्ची! मैं तुझे सोचने के लिए कुछ चीज़ देता हूँ! अन्यथा तू हमें सच नहीं बताएगी!" जैसे ही यह कहा गया, उनमें से एक ने मेरी छाती में दो बार घूँसे मारे, जिससे मैं फर्श पर धम से गिर पड़ी। फिर उसने मुझे दो बार ज़ोरों से लातें मारीं, और मुझे फर्श से वापस खींचा और चिल्लाकर मुझे घुटने टेकने के लिए कहा। मैंने इसका पालन नहीं किया, तो उसने मेरे घुटनों में कई बार लात मारी। तीव्र दर्द की एक लहर ने जो मेरे ऊपर छाने लगी थी, मुझे फर्श पर धड़ाम से घुटने टेकने के लिए मज़बूर कर दिया। उसने मुझे बालों से पकड़ा और बलपूर्वक नीचे खींच लिया, और फिर झटके से मेरे सिर को पीछे खींच कर, मुझे ऊपर देखने के लिए मज़बूर किया। उसने मेरे चेहरे पर कुछ और बार वार करते हुए मुझे गाली दी, और मेरी एकमात्र सुध यह रही कि दुनिया गोल-गोल घूम रही थी। मैं तुरंत फर्श पर गिर पड़ी। बस तभी, दुष्ट पुलिस के प्रमुख की नज़र अचानक मेरी कलाई की घड़ी पर पड़ी। इसे लालच से घूरते हुए, वह चिल्लाया, "तूने ये क्या पहन रखा है?" तुरंत, एक पुलिसकर्मी ने मेरी कलाई पकड़ी और जबरदस्ती घड़ी को खींच लिया, फिर उसे अपने "उस्ताद" को दे दिया। ऐसा ओछा व्यवहार देखकर मेरे भीतर उनके प्रति नफ़रत भर गई। उसके बाद, जब उन्होंने मुझ से और सवाल पूछे, तो मैंने बस उनकी ओर चुपचाप घूरा, और इससे वे और भी अधिक भड़क गए। एक दुष्ट पुलिसवाले ने मुझे कॉलर से पकड़ लिया जैसे कि वह किसी छोटी सी मुर्गी को उठा रहा हो, और मुझे फर्श से ऊपर उठाकर मुझ पर गरजा, "ओह, तू महान व्यक्ति है, है ना? मैं तुझे बताऊँगा कि कब चुप रहना है।" यह कहते ही, उसने कुछ और बार उग्रता से मारा, और एक बार फिर मैं फर्श पर लुढ़क गई। तब तक मेरे पूरे शरीर में असहनीय रूप से दर्द होने लगा था, और मुझ में संघर्ष करने की अब और ताक़त नहीं बची थी। मैं बस अपनी आँखें मूँद कर फर्श पर लेट गई, और हिली-डुली नहीं। अपने हृदय में, मैंने तत्काल परमेश्वर से प्रार्थना की: "परमेश्वर, मुझे नहीं पता कि दुष्ट पुलिस का यह गिरोह मेरे खिलाफ और कौन से अत्याचार करने जा रहा है। तू तो जानता है कि मैं कद-काठी में छोटी हूँ, और कि मैं शारीरिक रूप से कमज़ोर हूँ। मुझे बचा लेने के लिए मैं तुझसे विनती करती हूँ। यहूदा बनने और तेरे साथ विश्वासघात करने के बजाय मैं मर जाना पसंद करुँगी।" "तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान")। अपनी प्रार्थना ख़त्म करने के बाद, परमेश्वर ने मुझे आस्था और शक्ति से भर दिया। यहूदा बनकर परमेश्वर से विश्वासघात करने और अपने भाई-बहनों से धोखा करने से पहले तो मैं मर जाना पसंद करूंगी। मैं मजबूती से परमेश्वर के लिए गवाही दूंगी। ठीक तभी, मैंने अपने बगल में किसी को यह कहते हुए सुना कि, "वह अब क्यों नहीं हिल-डुल रही है? क्या वह मर गई है?" उसके बाद, किसी ने जानबूझकर मेरे हाथ पर अपना पैर रखा और इसे कसकर दबाते हुए क्रूरता से चिल्लाया, "उठ, हम तुझे कहीं और ले जाने वाले हैं। अगर वहाँ पहुँच कर भी तूने कोई बात नहीं की तो तुझे वह मिलेगा जो तेरे लिए आ रहा है"! क्योंकि परमेश्वर ने मेरे विश्वास और मेरी ताक़त को बढा दिया था, इसलिए मैं उनकी धमकी से बिलकुल भी डरी नहीं थी। अपने हृदय में, मैं शैतान के खिलाफ़ लड़ने के लिए तैयार थी।

बाद में, मुझे काउंटी लोक सुरक्षा ब्यूरो में ले जाया गया। जब हम पूछताछ के कमरे में पहुँचे, तो उन दुष्ट पुलिसकर्मियों और उनके अनुगामियों के अगुआ ने मुझे घेर लिया और मेरे सामने आगे-पीछे घुमते हुए, बार-बार मुझसे सवाल किये और मेरी कलीसिया के अगुआओं और मेरे भाई-बहनों को बेच देने के लिए मुझ पर दबाव डालने की कोशिश की। जब उन्होंने देखा कि मैं अभी भी उन जवाबों को नहीं दे रही थी जो वे सुनना चाहते थे, तो उनमें से तीन ने मेरे चेहरे पर बारी-बारी से थप्पड़ जड़ दिए। मुझे नहीं पता कि मुझे कितनी बार मारा गया था; जो कुछ मैं सुन सकती थी वह केवल मेरे चेहरे पर पड़ने वाली चटाक, चटाक की आवाज़ें थीं, एक आवाज़ जो उस रात के सन्नाटे में विशेषरूप से गूँज रही थी। जब उनके हाथ थक गए, तो दुष्ट पुलिस ने मुझे किताबों से मारा। उन्होंने मुझे अंततः तब तक मारा जब तक मैं अब और दर्द भी महसूस नहीं कर सकती थी; मेरे चेहरे पर सूजन आ गई थी और वह सुन्न महसूस हो गया था। आखिरकार, यह देखकर कि उन्हें मेरे मुँह से कोई भी मूल्यवान जानकारी नहीं मिल रही है, पापी पुलिस ने एक फोन बुक निकाली और खुद से प्रसन्न होकर वे बोले, "हमें यह तेरे थैले में मिली है। भले ही तू हमें कुछ भी नहीं बताएगी, तब भी हमारे पास एक और चाल है"! अचानक, मुझे बेहद चिंता महसूस हुई: अगर मेरे किसी भाई या बहन ने फ़ोन पर जवाब दे दिया, तो इससे उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता था। यह उन्हें कलीसिया से भी जोड़ सकता था, और परिणाम विनाशकारी हो सकते थे। ठीक तभी, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया: "सर्वशक्तिमान परमेश्वर सभी चीज़ों और घटनाओं पर हावी है! जब तक हमारे दिल आशा से हर वक्त उसकी ओर देखते हैं और हम आत्मा में प्रवेश करते हैं और उसके साथ सहयोग करते हैं, तब तक वह हमें उन सभी चीज़ों को दिखाएगा जिन्हें हम चाहते हैं और उसकी इच्छा का हमारे सामने प्रकट होना निश्चित है; तब हमारे दिल आनंद और शांति में होंगे, और पूर्ण स्पष्टता के साथ स्थिर होंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "अध्याय 7")। मैंने सोचा, "यह सही है, सभी चीज़ें और घटनाएं परमेश्वर के हाथों आयोजित और व्यवस्थित होती हैं। यहाँ तक कि एक फोन कॉल भी लगेगा या नहीं, इसका फैसला पूरी तरह से परमेश्वर पर है। मैं परमेश्वर से आशा रखने, उस पर भरोसा करने और उसके आयोजनों को समर्पित होने को तैयार हूँ।" इसलिए मैंने बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना की, इन भाइयों और बहनों की सुरक्षा के लिए उससे विनती की। परिणामस्वरूप, जब उन्होंने उन फोन नंबरों को एक-एक करके मिलाया तो कुछ में घंटी तो बजी लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया, जबकि अन्य नंबर बिल्कुल नहीं लग सके। अंत में, निराशा में कोसते हुए, दुष्ट पुलिस ने फोन बुक को मेज पर फेंक दिया और प्रयास करना बंद कर दिया। यह वास्तव में परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता का, और उनके चमत्कारिक कार्यों का एक उदाहरण था; मैं परमेश्वर को धन्यवाद दिए और उसके प्रति प्रशंसा व्यक्त किए बिना नहीं रह सकी।

फिर भी, उन्होंने हार नहीं मानी, और कलीसिया के मामलों के बारे में मुझसे पूछताछ करते रहे। मैंने जबाब नहीं दिया। उद्विग्न और उत्तेजित होकर, मुझे पीड़ा देने की कोशिश में वे एक और भी अधिक घृणित चाल लेकर आगे आए: एक दुष्ट पुलिसवाले ने ज़बरन मुझे फर्श पर उकडूँ बिठाया और मुझे मेरे कंधों के बल मेरी बाहों को बाहर की ओर सीधेरखना पड़ा और मुझे बिलकुल भी हिलने की अनुमति नहीं थी। अधिक समय नहीं हुआ था कि मेरी टाँगें थरथराने लगी, मैं अपनी बाहों को बाहर की ओर सीधा अब और नहीं रख सकी, और मेरे शरीर ने बिना मेरे चाहे ही पीछे की ओर सहारे के साथ खड़े होना शुरू कर दिया। पुलिसकर्मी ने लोहे की एक छड़ ली और जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देखता है, उस तरह मुझे घूरने लगा। जैसे ही मैं खड़ी होने लगती, वह क्रूरता से मेरे पैरों पर मारता, जिससे मुझे इतना दर्द होता था कि मैं लगभग अपने घुटनों पर वापस गिर जाती थी। अगले आधे घंटे में, जब भी मेरी टाँगें या बाँहें जरा सा भी हिलाती, तो वह तुरंत मुझे छड़ से मार करता था। मुझे नहीं पता कि उसने मुझे कितनी बार मारा था। इतनी लंबी अवधि के लिए उकडूँ बैठने के कारण, मेरी दोनों टाँगें बेहद सूज गई थीं और उनमें असहनीय रूप से पीड़ा महसूस होती थी, मानो कि वे टूट गई हों। जैसे-जैसे समय बीता, मेरे पैर और भी अधिक काँप रहे थे और मेरे दाँत लगातार किटकिटा रहे थे। बस तभी ऐसा लगा कि मेरी ताकत जवाब देने जा रही है और मैं बेहोश हो सकती हूँ। हालाँकि, बगल में खड़ी दुष्ट पुलिस सिर्फ मेरा मज़ाक बना रही थी, लगातार मुझे ताने मार रही थी और व्यंगपूर्वक मेरी हँसी उड़ा रही थी, जैसे लोग क्रूरतापूर्वक किसी बंदर को खेल दिखाने के लिए मज़बूर कर रहे हों। जितना अधिक मैं उनके बदसूरत, घृणास्पद चेहरों को देखती, उतनी ही अधिक इन दुष्ट पुलिसकर्मियों से मुझे नफ़रत महसूस होती थी। मैं अचानक खड़ी हो गयी और उनसे ऊँची आवाज़ में बोली, "मैं अब और उकड़ूँ नहीं बैठूँगी। आगे बढ़ो और मुझे मौत की सजा दे दो! आज मेरे पास खोने को कुछ नहीं है! मैं अब मरने से भी नहीं डरती हूँ, तो मैं तुमसे क्यों डरूँ? तुम लोग इतने बड़े आदमी हो, फिर भी तुम बस मेरे जैसी एक छोटी सी लड़की को धौंस देना ही जानते हो!" मुझे आश्चर्य हुआ जब मेरे यह कहने के बाद, दुष्ट पुलिस के गिरोह ने कुछ और गालियाँ बकीं और फिर मुझसे पूछताछ करनी बंद कर दी। उस समय मुझे बहुत उत्साहित महसूस हुआ, और मेरी समझ में आ गया कि सभी चीज़ों और घटनाओं का आयोजन परमेश्वर के हाथों में ही है: एक बार जब मैंने अपने हृदय से डर को निकाल फेंका, तो मेरा परिवेश तदनुसार बदल गया। अपने हृदय की गहराई में मैंने सचमुच परमेश्वर के वचनों के महत्व का अनुभव किया: "'राजा का मन नालियों के जल के समान यहोवा के हाथ में रहता है, जिधर वह चाहता उधर उसको मोड़ देता है'; तो फिर इन मामूली आदमियों का क्या होगा?" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के बारे में जान कर ही आप सच्चा विश्वास रख सकते हैं")। मैं समझ गई थी कि आज, परमेश्वर ने शैतान के उत्पीड़न को मुझ पर आने दिया है, यह सब जान-बूझकर मुझे पीड़ा देने के लिए नहीं है; बल्कि इसका उपयोग मुझे परमेश्वर के वचनों की सामर्थ्य का एहसास कराने, शैतान के अंधेरे प्रभाव के नियंत्रण से दूर जाने में मेरी अगुआई करने, और इसके अलावा विपदा में होने के समय मुझे परमेश्वर पर भरोसा करना और परमेश्वर की प्रशंसा करना सिखाने के लिए किया है।

दुष्ट पुलिस के इस गिरोह ने मुझे रात के अधिकांश भाग में यातनाएँ दी थी; जब तक वे रुकते, तब तक सुबह हो जाती थी। उन्होंने मुझ से मेरा नाम हस्ताक्षर करवाया और कहा कि वे मुझे हिरासत में रखने जा रहे हैं। उसके बाद, एक बुज़ुर्ग पुलिसकर्मी ने, दयालुता का नाटक करते हुए मुझसे कहा, "मिस, देखो; तुम बहुत छोटी हो—खिलते यौवन में हो—इसलिए बेहतर होगा कि तुम शीघ्रता करो और तुम जो भी जानती हो, वह बता दो। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं तुम्हें उनसे रिहा करवा दूँगा। यदि तुम्हें कोई परेशानी हो, तो मुझे बताने में संकोच मत करो। देखो; तुम्हारा चेहरा पाव रोटी की तरह फूल गया है। क्या तुम पर्याप्त पीड़ा नहीं उठा चुकी हो?" "परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालों को क्यों आज़माना?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)")। उसे इस तरह से बोलते हुए सुनकर, मैं समझ गयी वह मुझे किसी तरह से अपराध स्वीकारने के लिए फुसला रहा था। मुझे कुछ वह भी याद आया जो मेरे भाइयों और बहनों ने सभाओं के दौरान कहा था: जो वे चाहते हैं उसे प्राप्त करने के लिए दुष्ट पुलिस इनाम और सजा दोनों का उपयोग करेगी और तुम्हें धोखा देने के लिए सभी तरह की चालें चलेगी। इस बारे में सोचकर, मैंने उस बुज़ुर्ग पुलिसकर्मी को जवाब दिया, "ऐसा नाटक मत करो मानो कि तुम एक अच्छे इंसान हो; तुम सभी एक ही समूह के हिस्से हो। तुम मुझसे क्या कबूल करवाना चाहते हो? तुम जो कुछ भी कर रहे हो उसे धमकी दे कर कबूल करवाना कहा जाता है। यह अवैध सजा है!" इसे सुनकर उसने निर्दोष होने का दिखावा किया और दलील देने लगा, "लेकिन मैंने तुम्हें एक बार भी नहीं मारा है। ये तो वे लोग हैं जिन्होंने तुम्हें मारा था।" मैं परमेश्वर के मार्गदर्शन और सुरक्षा के लिए आभारी थी, जिसने मुझे शैतान के प्रलोभन पर एक बार फिर से विजयी होने दिया।

काउंटी लोक सुरक्षा ब्यूरो छोड़ने के बाद, मुझे उनके द्वारा सीधे हिरासत केंद्र में बंद कर दिया गया। जैसे ही हम सामने के द्वार से भीतर गए, मैंने देखा कि यह स्थान बहुत ऊँची दीवारों से घिरा हुआ था, जिनके ऊपर विद्युतीकृत कुण्डलित काँटों वाले तार लगे थे, और चार कोनों में से प्रत्येक में एक संतरी-मीनार जैसी बनी हुई थी। उनमें सशस्त्र पुलिसकर्मी पहरेदार बनकर खड़े थे। यह सब बहुत भयावह और डरावना महसूस हुआ। लौह द्वार के बाद लौह द्वार से गुज़रते हुए, मैं कोठरी पर पहुँची। जब मैंने सोने के लिए बने हुए बर्फ-से ठन्डे चबूतरे पर रखी हुई, सन के कपड़े से ढकी रजाइयों को देखा, जो कि काली और गंदी दोनों ही थीं, और उनसे आने वाली सनसनाती बदबू को सूँघा, तो मैं घृणा की एक लहर महसूस किए बिना न रह सकी, जिसके ठीक बाद एक उदासी की लहर छा गई। मैंने मन ही मन सोचा: लोग यहाँ कैसे रह सकते हैं? यह तो एक सूअरों-के-बाड़े से ज्यादा कुछ नहीं है। भोजन के समय, प्रत्येक कैदी को केवल एक छोटी उबली हुई पाव रोटी दी जाती थी जो खट्टी और आधी कच्ची होती थी। भले ही मैंने पूरे दिन नहीं खाया था, इस भोजन को देखकर वास्तव में मेरी भूख ही मिट गई। उसके अलावा, पुलिस द्वारा की गई पिटाई से मेरा चेहरा बहुत सूज गया था और ऐसा महसूस होता था मानो कि इसे टेप से लपेट दिया गया हो। खाने की तो बात ही छोड़ो, सिर्फ बात ने के लिए अपना मुँह खोलने में भी पीड़ा होती थी। इन परिस्थितियों में, मैं बहुत निराशाजनक मनोदशा में थी और मैंने बहुत अन्याय किया गया महसूस किया था। इस विचार ने कि मुझे वास्तव में यहाँ रहना होगा और इस तरह की अमानवीय स्थिति को सहन करना होगा, मुझे इतना भावुक बना दिया कि बरबस ही मेरे कुछ आँसू निकल कए। तभी मुझे परमेश्वर के वचन याद आये: "यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारे विचारों से मेल नहीं रखती और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को अलग कर लो, ये ही तुम्हारी परीक्षाएँ हैं। परमेश्वर की इच्छा को प्रकट किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य के लिए एक धर्मी परीक्षा, प्रत्येक के लिए एक बहुत बड़ी परीक्षा होती है—क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से समझ सकते हो?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मात्र सत्य का अभ्यास करना ही वास्तविकता रखना है")। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मैं परमेश्वर की इच्छा समझ गयी। उसने मुझे इस परिवेश में डाला था, और वह मेरी परीक्षा ले रहा था कि मैं उसके लिए गवाही दे सकती हूँ या नहीं। इस अमंगल, अंधकारमय समय में, क्या मैं परमेश्वर द्वारा उठाए जाने के लिए भाग्यशाली नहीं हूँ ताकि मैं उसका अनुसरण कर सकूँ, तब फिर यह कहने की कोई बात ही नहीं रही कि मैं किस तरह की स्थिति में हूँ, या फिर मैं अभी भी जिंदा रहूँगी या नहीं। मेरा इस छोटी-सी पीड़ा से ही मुझे अन्याय किया जाना और दुःखी महसूस करना, और इसे स्वीकार करने के लिए तैयार न होना, इस बात को दर्शाता था कि मुझमें वास्तव में विवेक की और तर्कसंगतता की कमी थी। इसे समझते हुए, मैंने अन्याय किया गया महसूस करना बंद कर दिया, और मुझे अपने भीतर कठिनाई का सामना करने की कुछ इच्छा-शक्ति मिली।

आधा महीना बीत गया, और उन दुष्ट पुलिसकर्मियों का मुखिया फिर से मुझसे पूछताछ करने आया। मुझे स्थिर और शांतचित्त देखकर, और यह देखकर कि मुझे बिल्कुल भी डर नहीं था, वह मेरा नाम लेकर चिल्लाया, "मुझे सच-सच बता: इससे पहले तुझे और कहाँ गिरफ्तार किया गया था? निश्चित है कि यह तेरा पहली बार अन्दर आना नहीं है; वर्ना तू इतनी स्थिर और परिपक्व कैसे हो सकती है, जैसे कि तुझे जरा सा भी कोई भय न हो?" जब मैंने उसे यह कहते हुए सुना, मैं अपने हृदय में परमेश्वर का धन्यवाद और उसकी प्रशंसा किए बिना न रह सकी। परमेश्वर ने मुझे सुरक्षित रखा था और मुझे साहस दिया था, इस प्रकार मुझे इन दुष्ट पुलिसकर्मियों का पूरी निर्भयता से सामना करने की अनुमति दे रहा था। ठीक तभी, मेरे हृदय के भीतर से आक्रोश उमड़ पड़ा: लोगों को उनकी धार्मिक मान्यताओं के कारण यातना देकर, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें अकारण गिरफ्तार कर, धमका कर और चोट पहुँचाकर तुम अपने अधिकार का दुरूपयोग कर रहे हो। तुम्हारा कार्य वैधता और स्वर्ग के नियम दोनों के खिलाफ़ हैं। मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, और सही रास्ते पर चल रही हूँ; मैंने कानून नहीं तोड़ा है। मुझे तुमसे क्यों डरना चाहिए? मैं तुम्हारे गिरोह की बुरी ताक़तों के सामने परास्त नहीं होऊँगी। फिर मैंने मुँहतोड़ जवाब दिया, "क्या तुम्हें लगता है कि हर अन्य जगह इतनी उबाऊ थी कि मैं वास्तव में यहाँ आना चाहूँगी? तुमने मेरे साथ अन्याय किया है और मुझे यहाँ-वहाँ धकेला है। धमकी दे कर मुझसे कोई बात कबूल करवाने या झूठे आरोप लगाने की तुम्हारी कोई भी आगे की कोशिशें व्यर्थ जाएँगी। इसे सुन कर, दुष्ट पुलिस का मुखिया अब इतना आग-बबूला हो गया कि मानो उसके कानों से धुआँ निकलने ही वाला प्रतीत होता था। वह चिल्लाया, "तू हमें कुछ भी न बताने के लिए बुरी तरह से जिद्दी है। तू बात नहीं करेगी, है ना? मैं तुझे तीन साल की सजा देने जा रहा हूँ, और फिर हम देखेंगे कि तू सच बताएगी या नहीं। मैं तुझे जिद्दी बने रहने की चुनौती देता हूँ!" लेकिन तब मैंने इतना क्रोधित महसूस किया कि मेरा गुस्सा फूट सकता था। मैंने ऊँची आवाज़ में जवाब दिया, "मैं अभी जवान हूँ; तीन साल मेरे लिए क्या हैं? पलक झपकते ही मैं जेल से बाहर हो जाऊँगी।" अपने क्रोध में, वह दुष्ट पुलिस अफसर तेजी से खड़ा हुआ और अपने अनुचरों पर गुर्राया, "मैं अब इसे छोड़ कर जा रहा हूँ; आगे अब तुम ही इससे पूछताछ करो।" वह दरवाज़ा पटक कर चला गया। जो कुछ हुआ था उसे देखकर, उन दो पुलिसकर्मियों ने मुझ से और सवाल नहीं किए; उन्होंने मेरे हस्ताक्षर करने के लिए एक बयान लिखना समाप्त किया और फिर बाहर चले गए। दुष्ट पुलिस की हार को देखने ने मुझे बहुत खुश कर दिया। अपने हृदय में मैंने शैतान पर परमेश्वर की विजय की प्रशंसा की।

पूछताछ के दूसरे दौर के दौरान, उन्होंने अपनी चालें बदल दीं। जैसे ही वे दरवाजे से भीतर आए, उन्होंने मेरे बारे में चिंतित होने का नाटक किया: "तुम इतने लंबे समय से यहाँ हो। तुम्हारे परिवार के सदस्यों में से कोई भी तुम्हें देखने क्यों नहीं आया है? उन्होंने अवश्य तुम्हारा ख़याल करना छोड़ दिया होगा। यह कैसा रहेगा कि तुम खुद उन्हें फ़ोन कर लो और उन्हें यहाँ तुमसे मिलने के लिए आने को कहो?" यह सुनकर मुझे असहनीय उदासी महसूस हुई। मुझे संदेह हुआ: क्या सचमुच मेरे माता-पिता ने मेरे बारे में चिंता करनी छोड़ दी है? आधा महीना पहले ही हो चुका है, और निश्चित रूप से वे मुझे गिरफ्तार किए जाने के बारे में जानते हैं; उनके पास ऐसा हृदय कैसे हो सकता है कि वे मुझे यहाँ पीड़ित होने दें और मुझे देखने भी न आएँ? जितना अधिक मैं इस बारे में सोचती थी, उतना ही अधिक मैं खुद को अकेली और असहाय महसूस करती थी। मुझे घर की याद आती थी और मैं अपने माता-पिता की बेहद कमी महसूस कर रही थी, और जेल से आजाद होने की मेरी इच्छा अधिकाधिक तीव्र हो रही थी। बिना चाहे ही, मेरी आँखें आँसुओं से भर गईं, लेकिन मैं दुष्ट पुलिस के इस गिरोह के सामने रोना नहीं चाहती थी। चुपचाप, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: परमेश्वर, अभी मैं बहुत दुःखी और पीड़ित महसूस कर रही हूँ, और मैं बहुत असहाय हूँ। मैं तुझसे प्रार्थना करती हूँ कि मेरे आँसुओं को गिरने से रोक ले, क्योंकि मैं शैतान को मेरी कमज़ोरी नहीं देखने देना चाहती हूँ। हालाँकि, अभी मैं तेरे इरादे को समझ नहीं पा रही हूँ। मुझे प्रबुद्ध करने और मेरे मार्गदर्शन के लिए मैं तुझसे अनुनय करती हूँ। प्रार्थना करने के बाद, एक विचार अचानक मेरे दिमाग में कोंध गया: यह तो शैतान की चाल थी; इन पुलिसकर्मियों ने फूट डालने की कोशिश की थी, उन्होंने मेरे माता-पिता के बारे में मेरे विचारों को विकृत करने और उनके प्रति नफ़रत जगाने की कोशिश की थी, उनका अंतिम उद्देश्य इस झटके को सहन करने की मेरी असमर्थता का वे फायदा उठाना था ताकि मैं परमेश्वर को अपनी पीठ दिखा दूँ। इसके अलावा, मुझे अपने परिवार के लोगों से संपर्क कराने की कोशिश कुछ पैसा कमाने के अपने गुप्त अभिप्राय को पूरा करने के लिए उनसे कुछ फिरौती मँगवाने की चाल हो सकती है, या इससे वे यह पता लगा लें कि मेरे परिवार के सभी सदस्य भी परमेश्वर में विश्वास करते हैं और वे उन्हें गिरफ्तार करने के लिए इस अवसर का उपयोग करना चाहते थे। ये दुष्ट पुलिसकर्मी षड़यंत्रों से भरे हुए हैं। यदि परमेश्वर से प्रबुद्धता नहीं मिलती, तो मैंने घर पर फोन कर लिया होता। तब क्या मैं अप्रत्यक्ष रूप से यहूदा न बन गयी होती? इसलिए, मैंने चुपके से शैतान के लिए घोषणा की: नीच शैतान, मैं बस तुझे तेरी धोखाधड़ी में कामयाब नहीं होने दूँगी। अब से, चाहे मुझ पर आशीष पड़ें या अभिशाप, मैं उन्हें अकेले ही सहन करूँगी; मैं अपने परिवार के सदस्यों को शामिल करने से इनकार करती हूँ, और अपने माता-पिता के विश्वास या उनकी कर्तव्य-परायणता को प्रभावित नहीं करुँगी। साथ ही, मैंने चुपचाप परमेश्वर से मेरे माता-पिता को मेरे पास आने से रोकने की प्रार्थना की, ताकि कहीं ऐसा न हो कि वे इन दुष्ट पुलिसकर्मियों के जाल में फँस जाएँ। तब मैंने विरक्त भाव से कहा, "मुझे नहीं पता कि मेरे परिवार के सदस्य मुझसे मिलने क्यों नहीं आए हैं। तुम मेरे साथ अब चाहे जैसा भी व्यवहार करो, मुझे बिल्कुल भी कोई फर्क नहीं पड़ता है।" दुष्ट पुलिस के पास अब और कोई चालें नहीं बची थीं। उसके बाद, उन्होंने मुझसे दोबारा कोई पूछताछ नहीं की।

एक महीना बीत गया। एक दिन, मेरे चाचा (या मामा) अचानक मुझसे मिलने आए, और बोले कि वे कुछ दिनों के बाद मुझे रिहा करवाने की कोशिश के बीच में हैं। जब मैं मुलाकात कक्ष से बाहर निकली, तो मैं बहुत खुश थी। मैंने सोचा कि मैं आखिरकार दिन की रोशनी, साथ ही साथ अपने भाइयों, बहनों और प्रियजनों को भी देख सकूँगी। तो मैंने दिवास्वप्न देखने शुरू कर दिए और मेरे चाचा (या मामा) की मुझे लेने आने की प्रतीक्षा करने लगी; हर दिन, मैं संतरियों की इस आवाज़ के लिए अपने कान खुले रखती कि अब मेरी रिहाई का समय आ गया है। निश्चित रूप से, एक सप्ताह बाद, एक संतरी मुझे बुलाने आया तो था। जब मैं खुशी से मुलाकात कक्ष में पहुँची तो ऐसा लग रहा था कि मेरा हृदय मेरी पसलियों के पिंजरे से बाहर निकल कर धड़ने वाला है। हालाँकि, जब मैंने अपने चाचा (या मामा) को देखा, तो उसने अपना सिर नीचे लटका दिया। काफी समय बाद उसने एक निराशाजनक स्वर में कहा, "उन्होंने पहले ही तुम्हारे मामले को अंतिम रूप दे दिया है। तुम्हें तीन साल की सजा सुना दी गई है।" जब मैंने यह सुना, तो मैं अवाक् रह गई। मेरा मन पूरी तरह से भावशून्य हो गया। मैंने आँसुओं को रोका, और एक भी आँसू बाहर नहीं निकला। ऐसा लगा कि मेरे चाचा (या मामा) ने उसके बाद जो कुछ भी कहा, मैं उसे सुन ही नहीं सकी। मैं एक बेहोशी की सी हालत में मुलाकात कक्ष से लड़खड़ाते हुए बाहर निकली, मेरे पैरों को लग रहा था कि वे सीसे से भरे हुए हैं, और प्रत्येक कदम पहले से ज़्यादा भारी था। मुझे कुछ भी याद नहीं है कि मैं अपनी कोठरी तक कैसे आई। जब मैं वहाँ पहुँची, तो मैं जम-सी गई थी, पूरी तरह से लकुवाग्रस्त हो गई थी। मैंने मन ही मन सोचा, पिछले एक महीने या उससे कुछ अधिक समय में इस अमानवीय जीवन का प्रत्येक दिन एक वर्ष की तरह लम्बा महसूस हुआ था; मैं ऐसे तीन वर्षों को कैसे गुजार पाऊँगी? जितना अधिक मैं इस पर विचार करती, मेरा दर्द उतना ही बढ़ जाता, और मेरा भविष्य उतना ही अधिक अस्पष्ट और अज्ञेय महसूस होने लगता। अपने आँसुओं को अब रोक पाने में असमर्थ होकर, मैं फूट-फूट कर रो पड़ी। अपने हृदय में, हालाँकि, मुझे कोई संदेह नहीं था कि कोई भी मेरी अब और सहायता नहीं कर सकता है; मैं केवल परमेश्वर पर भरोसा कर सकती थी। मेरे दुःख में, मैं फिर से परमेश्वर के सामने आ गई थी। मैंने खुलकर उससे कहा, "परमेश्वर, मुझे पता है कि सभी चीजें और सभी घटनाएँ तेरे हाथों में हैं, लेकिन अभी मेरा हृदय पूरी तरह से खाली महसूस हो रहा है। मुझे लगता है कि मैं अब टूटने वाली हूँ; मुझे लगता है कि जेल में तीन साल तक पीड़ा सहना मेरे लिए बहुत मुश्किल होने जा रहा है। परमेश्वर, मैं तुझसे विनती करती हूँ कि तू मुझे अपनी इच्छा प्रकट कर, और मैं विनती करती हूँ की तू मेरे विश्वास और ताकत को बढ़ा ताकि मैं तेरे सामने पूरी तरह से समर्पण कर सकूँ और मुझ पर जो पड़ा है, उसे साहसपूर्वक स्वीकार कर सकूँ।" ठीक तभी, मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा: "सब लोगों के लिए शोधन कष्टदायी होता है, और इसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु फिर भी, परमेश्वर शोधन के समय में ही मनुष्य के समक्ष अपने धर्मी स्वभाव को स्पष्ट करता है, और मनुष्य के लिए अपनी मांगों को सार्वजनिक करता है, और अधिक प्रबुद्धता के साथ-साथ और अधिक वास्तविक कांट-छांट और व्यवहार को भी प्रदान करता है; तथ्यों और सत्यों के बीच की तुलना के द्वारा वह स्वयं के बारे में और सत्य के बारे में मनुष्य को और अधिक ज्ञान प्रदान करता है, और मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा के विषय में अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर के प्रति सच्चे और शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने देता है। शोधन का कार्य करने में परमेश्वर के लक्ष्य ये हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम कर सकता है")। "इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो")। परमेश्वर से प्रबुद्धता और उसके मार्गदर्शन के कारण, मैंने खुद पर चिंतन करना शुरू किया, और धीरे-धीरे अपनी कमियों को ढूँढा। मैंने देखा कि परमेश्वर के प्रति मेरे प्यार में मिलावट थी, और मैंने अभी तक परमेश्वर के सामने अपना पूर्ण समर्पण नहीं किया था। जब से मुझे गिरफ्तार किया गया था, और उन दुष्ट पुलिसकर्मियों के खिलाफ अपने संघर्ष के दौरान, मैंने बहादुरी और निर्भयता दिखायी थी, और मैंने उन यातना-सत्रों में एक भी आँसू नहीं बहाया था, लेकिन यह मेरी वास्तविक कद-काठी नहीं थी। यह समस्त विश्वास और साहस मुझे परमेश्वर के वचनों द्वारा दिया गया था जिसने मुझे शैतान के प्रलोभन पर और समय-समय पर हुए उसके हमलों पर विजय पाने में सक्षम बनाया था। मैंने यह भी देखा कि दुष्ट पुलिस का सार मेरे लिए अगोचर था। मैं सोचती थी कि सीसीपी पुलिस कानून की पाबंद है, और यह कि एक नाबालिग़ के रूप में मुझे कभी सजा नहीं दी जाएगी, या ज्यादा से ज्यादा कुछ महीनों तक के लिए मुझे बंद कर दिया जाएगा। मैं सोचती थी कि मुझे कुछ ही और दर्द तथा कठिनाई और सहनी पड़ेगी और इसे ज़रा-सा और लंबे समय तक सहना पड़ेगा, और फिर यह गुज़र जाएगा; ऐसा मुझे कभी नहीं लगता था कि मुझे वास्तव में यहाँ, इस अमानवीय जीवन को जीते हुए, तीन साल व्यतीत करने पड़ सकते हैं। बस उस समय, मैं पीड़ा को सहते रहना या परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित नहीं होना चाहती थी। यह मेरे कल्पित परिणाम से अलग था, और यह बस मेरी सच्ची कद-काठी को उजागर करने के लिए घटित हुआ था। केवल तभी मुझे एहसास हुआ था कि परमेश्वर वास्तव में लोगों के दिलों में गहराई तक झाँकता है, और शैतान के षड़यंत्रों के आधार पर ही उसकी बुद्धि वास्तव में उपयोग में लायी जाती है। शैतान इस जेल की सजा के माध्यम से मुझे पीड़ित करना और मुझे पूरी तरह से तोड़ देना चाहता था, लेकिन परमेश्वर ने मुझे मेरी कमियों को खोजने और मेरी अपर्याप्तताओं को पहचानने देने के लिए इस अवसर का उपयोग किया था, जिससे मेरे वास्तविक समर्पण में वृद्धि हुई थी और मेरा जीवन और तेजी से प्रगति कर सका था। परमेश्वर से प्रबुद्धता ने मुझे मेरी कठिन परिस्थिति से बाहर निकलने में निर्देशित किया और मुझे अनंत सामर्थ्य दी। मेरा हृदय अचानक उज्ज्वल और पूर्ण महसूस हुआ, और परमेश्वर के अच्छे इरादे मेरी समझ में आ गए और मैंने अब और दुःखी महसूस नहीं किया। मैंने बिना एक भी शिकायत के परमेश्वर को सब कुछ आयोजित करने देते हुए, और उस दिन से आगे जो कुछ भी हो उसका शांति से सामना करने का, पतरस के उदाहरण का पालन करने का संकल्प लिया।

दो महीने बाद, मुझे एक श्रम शिविर में ले जाया गया। जब मुझे मेरे फैसले के कागजात प्राप्त हुए और मैंने उन पर हस्ताक्षर किए, तो मुझे पता चला कि तीन साल की सजा एक वर्ष में बदल दी गई थी। अपने हृदय में मैंने बार-बार परमेश्वर को धन्यवाद दिया और उसकी स्तुति की। यह सब परमेश्वर के आयोजन का परिणाम था, और इसमें मैं अपने लिए उसके विशाल प्रेम और उसकी सुरक्षा को देख सकती थी।

श्रम शिविर में, मैंने दुष्ट पुलिस का एक अधिक कुत्सित तथा अधिक क्रूर पक्ष देखा। सुबह बहुत जल्दी हम उठकर काम पर जाते थे, और हम पर हर दिन काम करने के लिए गंभीरता से अतिभार डाला जाता था। हमें हर दिन बहुत लंबे समय तक श्रम करना पड़ता था, और कभी-कभी तो कई दिनों तक दिन-रात लगातार काम करना पड़ता था। कुछ क़ैदी बीमार पड़ जाते थे और उन्हें ड्रिप (आईवी) लगाने की आवश्यकता पड़ती थी, और तब उनके ड्रिप की गति तीव्रतम निशान तक कर दी जाती थी ताकि जैसे ही यह समाप्त हो जाए, वे जल्दी से कार्यशाला में वापस आकर काम में लग जाएँ। इसका नतीज़ा यह हुआ कि अधिकांश क़ैदियों को बाद में कुछ बीमारियाँ हो गईं जिसका उपचार बहुत मुश्किल था। कुछ लोग, क्योंकि वे धीमे-धीमे कार्य करते थे, बार-बार संतरियों से गालियाँ खाते थे; उनकी अश्लील भाषा मात्र अकल्पनीय होती थी। काम करते समय कुछ लोग नियमों का उल्लंघन करते थे, इसलिए उन्हें दंडित किया जाता था। उदाहरण के लिए, उन्हें रस्सी पर रखा जाता था, जिसका मतलब था कि उन्हें जमीन पर घुटने के बल बैठना पड़ता था और उनके हाथों को उनकी पीठ के पीछे बाँध दिया जाता था, और उनकी बाहों को बल पूर्वक दर्दनाक ढंग से गर्दन के स्तर तक ऊपर उठा दिया जाता था। अन्य लोगों को कुत्तों की तरह लोहे की जंजीर से पेड़ के साथ से बाँध दिया जाता था, और एक चाबुक से निर्दयतापूर्वक पीटा जाता था। कुछ लोग, जो इस अमानवीय यातना को सहन करने में असमर्थ होते थे, खुद को भूखा रख कर मारने का प्रयत्न करते थे, किन्तु परिणाम केवल यह होता था कि दुष्ट संतरी उनके दोनों टखनों और कलाइयों पर बेड़ियाँ डालकर और फिर उनके शरीर को कसकर नीचे दबा कर, उनके अंदर नलियों द्वारा तरल पदार्थों ठूँस देते थे। वे डरते थे कि वो क़ैदी मर सकते हैं, यह इसलिए नहीं था कि वे जीवन को प्यारा समझते थे, बल्कि इसलिए था कि उन्हें चिंता थी कि वे कहीं इतने सस्ते उपलब्ध कराए गए श्रमिकों को न खो दें। जेल के संतरियों द्वारा किए गए बुरे कर्म वास्तव में गिनती में बहुत अधिक थे, और वैसी ही विकट रूप से हिंसक और खूनी, वे घटनाएँ थीं जो घटित होती थीं। इन सब ने मुझे बहुत स्पष्ट रूप से दिखा दिया कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार शैतान का मूर्त रूप थी जो आध्यात्मिक दुनिया में थी; यह सभी शैतानों में से दुष्टतम थी और इसके शासन के तहत जेल पृथ्वी पर नरक थे—सिर्फ नाम से ही नहीं, बल्कि हक़ीक़त में। जिस कार्यालय में मुझसे पूछताछ की गई थी उसकी दीवार पर लिखे कुछ वचन जिन्होंने मेरा ध्यान आकर्षित किया था मुझे याद हैं: "इच्छानुसार लोगों को पीटना और उन्हें अवैध दंड के अधीन करना निषिद्ध है, और यातना के माध्यम से ज़ुर्म कबूल करवाना तो और भी निषिद्ध है।" बहरहाल, वास्तविकता में, उनके काम इस निर्देश के स्पष्ट रूप से विरोध में थे। उन्होंने मुझे, एक लड़की को जो अभी वयस्क भी नहीं थी, निर्दयतापूर्वक पीटा था, और मुझे अवैध दंड़ के अधीन किया था; और इससे भी अधिक, उन्होंने मुझे केवल परमेश्वर में मेरे विश्वास की वजह से सजा सुनाई थी। इस सब ने मुझे स्पष्ट रूप से यह दिखा दिया था कि सीसीपी सरकार लोगों को झाँसा देने के लिए चालों का इस्तेमाल करती है जबकि ढोंग करती कि सब कुछ ठीक है। यह ठीक वैसा ही था जैसा कि परमेश्वर ने कहा था: "सभी मनुष्यों के शरीर को शैतान कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखें निकाल देता है, और उसके होंठों को मज़बूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक तबाही मचाई है, और आज भी वह तबाही मचा रहा है और इस भूतिया शहर पर करीब से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो...। प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)")। दुष्ट पुलिसकर्मियों के उत्पीड़न का अनुभव करने के बाद, परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के इस अंश से मैं पूरी तरह से आश्वस्त हो गई थी, और अब मुझे इसका कुछ वास्तविक ज्ञान और अनुभव हो गया था: सीसीपी सरकार वास्तव में एक शैतानी सेना है जो परमेश्वर से नफरत करती है, उसका विरोध करती है, दुष्टता और हिंसा की वकालत करती है। शैतानी शासन के दमन में जीना इंसानों के नर्क में रहने से कोई भिन्न नहीं है। इसके अलावा, श्रम शिविर में, मैंने स्वयं अपनी आँखों से सभी प्रकार के लोगों की कुरूपता को देख लिया था: चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले उन अवसरवादी साँपों के घिनौने चेहरे जिन्हें उनके मुखियाओं का अनुग्रह प्राप्त था, विनाशकारी अति उग्र रूप से हिंसक लोगों के वे बुरे चेहरे जो कमज़ोर लोगों को धौंस दिखाते थे, इत्यादि। मेरी बात करें तो, जिसने समाज में अभी तक पैर भी नहीं रखा था, जेल के जीवन के इस वर्ष के दौरान, मैंने अंततः स्पष्ट रूप से मानव जाति की भ्रष्टता को देख लिया था। मैंने लोगों के दिलों के विश्वासघात को देख लिया था, और यह महसूस किया था कि मानव संसार कितना अधिक भयावह हो सकता है। मैंने सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफ़ेद, सही और ग़लत, अच्छे और बुरे, तथा महान और घृणास्पद के बीच अंतर करना भी सीख लिया था; मैंने स्पष्ट रूप से देख लिया था कि शैतान कुरूप, दुष्ट तथा क्रूर है, और केवल परमेश्वर ही पवित्रता और धार्मिकता का प्रतीक है। केवल परमेश्वर ही सौंदर्य और भलाई का प्रतीक है; केवल परमेश्वर ही प्रेम और उद्धार है। परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा में, वह अविस्मरणीय वर्ष मेरे लिए बहुत जल्दी बीत गया।

अब, इस पर झाँकने पर, यद्यपि जेल के जीवन के उस एक वर्ष के दौरान मैं कुछ शारीरिक पीड़ा से गुज़री थी, किन्तु परमेश्वर ने मेरी अगुआई और मार्गदर्शन करने के लिए अपने वचनों का उपयोग किया था, इस तरह मेरा जीवन परिपक्व बना दिया था। मैं परमेश्वर से इस पूर्वनियति के लिए आभारी हूँ। मैं जीवन के इस सही मार्ग पर कदम रखने में सक्षम रही, यही परमेश्वर द्वारा मुझे प्रदान किया गया सबसे बड़ा अनुग्रह और आशीष था। मैं अपने शेष पूरे जीवन उसका अनुसरण और उसकी आराधना करूँगी!

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