अध्याय 15. अतिवाद से हटकर एक उत्तरजीवी होने दिशा में बढ़ना

1. लोगों का अतिवाद की ओर जाना

आप सभी हाल में क्या चाहते रहे हैं ? क्या यह स्वभाव का परिवर्तन और परमेश्वर के लिए गवाह बनना है? नहीं, ऐसा नहीं रहा है ! मैं कई लोगों को पुराने शैतान को शर्मिंदा करने की खातिर फिर से परमेश्वर के लिए मरने की चाह करते देखता हूँ। क्या आप सत्य को जीकर पूरा करने की योजना बनाने और स्वभाव के परिवर्तन चाहने की जगह केवल दंडित होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, परमेश्वर के प्रेम के बदले में? “विश्वासघात (1)” और “विश्वासघात (2)” पढ़ने के बाद लोगों की मरने की योजना थी। उन सभी का मानना ​​था कि परमेश्वर के कार्य का अंतिम उद्देश्य शैतान को अपमानित करने की खातिर, लोगों का मर जाना ही था। लोगों ने इसलिए खुद के लिए कुछ भी हासिल करने की उम्मीद नहीं की, और एक सकारात्मक तरीके से उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया, न ही उनमें कष्ट उठाने के लिए इच्छा-शक्ति थी। ऐसी खोज क्या अतिवाद की ओर बढ़ना नहीं है? परमेश्वर के कार्य और उनके वचनों का उद्देश्य यह है कि लोग सत्य में, और अपने स्वभाव के परिवर्तन में, गहरा प्रवेश करें। उद्देश्य यह नहीं है कि लोग मर जाएँ, और यह कि जब लोगों का असली रंग सामने आ जाये तो उन्हें दण्डित किया जाए। उद्देश्य तो केवल यह है कि सभी लोग कुछ महत्वपूर्ण सवालों पर कुछ अधिक चिंतन करें, ताकि वे और अधिक स्पष्ट रूप से अपनी हालत को देख सकें, और परमेश्वर की मांग को समझ लेने के बाद अधिक तेजी से प्रवेश करें। अगर सभी लोगों को मरना और दंडित होना है, तो परमेश्वर का कार्य किसके लिए होगा? और लोगों को बचाने का परिणाम क्या होगा? अगर परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों का मर जाना ही होता, तो क्या किसी को भी स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए कोई निश्चय होगा? क्या यह लोगों को एक बंद गली में ले जाने के समान न होगा? उस समय सब लोगों की सोच होगी: “मुझे वैसे भी दंडित किया जाएगा, तो बस, मैं किसी तरह काम चला लूँ -किसी और बात के लिए चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं है, मैं चाहे जो भी करूँ, मुझे तो मरना और दण्डित होना ही है, सच को चाहने से क्या लाभ होगा?” इस तरह उन्हें समुचित निश्चय नहीं होगा। लोगों को कई कठिनाइयाँ होंगी, चाहे एक सकारात्मक पक्ष से उनका नेतृत्व किया जा रहा हो। लोग स्वभाव के परिवर्तन की आशा तो करें पर फिर भी किसी तरह बस मर जाएँ, इस तरह (की सोच) से एक भी व्यक्ति को नहीं बचाया जा सकता, क्योंकि यह अपने आप में एक विरोधाभास है। परमेश्वर के लिए साक्षी या गवाह बनना एक नकारात्मक पक्ष से संभव नहीं, इसे सकारात्मक तरीके से करना होगा। केवल इसी तरह लोगों को बल मिलेगा। चूंकि लोगों का (मानसिक) कद या उनकी क्षमता काफी कम है, वे सकारात्मक पक्ष से कैसे प्रवेश करें, इसे ठीक से देख नहीं पाते। नकारात्मक पक्ष की और अधिक परिकल्पना करने पर वे सही मार्ग क्या है, इस विषय में चकरा जायेंगे और हार मान लेंगे। यदि आप कहें, “अगर हमें बाद में दण्डित होना ही है, तो हम अभी किस तरह का अभ्यास करें, हम कैसे परमेश्वर से प्रेम करें?” - तो क्या लोगों के साथ इससे कोई बात बनेगी? और आगे यदि आप कहें,“परमेश्वर के अच्छे साक्षी बनो,” हर कोई मंद भाव से कहेगा, “अगर आप कहते हैं तो यही सही!” इस तरह के वार्तालाप से यही होगा कि लोग दंड पाने की प्रतीक्षा में ही रहेंगे। परमेश्वर से प्रेम करने, सत्य का अभ्यास करने या परमेश्वर का साक्षी बनने की कोई न सोचेगा। क्या एक ऐसी मानव जाति को बचाया जा सकेगा?

2. लोगों की खोज यह होनी चाहिए कि कैसे एक उत्तरजीवी बनें

शुरुआत में, लोगों का यह समूह राज करना और ताकत का प्रदर्शन करना चाहता था। अंत में, जब परमेश्वर अपने कार्य को करने आये और उन्होंने कहा कि सभी लोग केवल सेवा करने के लिए थे, वे यहाँ आ छिपे, बाहर आने को तैयार नहीं। यहां तक ​​कि अगर आशीर्वाद भी दिए जाएँ, तो वे उन्हें पाना नहीं चाहते। वे विश्वास ही नहीं करते कि वे परमेश्वर के लोग बन सकते हैं। जब उनसे कहा गया कि वे सेवा-कर्ता नहीं, तब भी उन्हें विश्वास नहीं हुआ। क्या ये दो चरम सीमाएँ नहीं ? लोग हमेशा अति पर जाना चाहते हैं। चलो, जो गुजर गया, उसे फिर सामने न लायें। हम कह सकते हैं कि यह केवल स्वभाव के परिवर्तन के लिए आवश्यक मार्ग है, आगे इस बारे में पूछताछ करने की कोई जरूरत नहीं। अब आप सभी लोगों को विचार करना चाहिए: मेरे लिए सबसे मौलिक योजना क्या होनी चाहिये? परमेश्वर का ऋण चुकाने के लिए सबसे अच्छा तरीका क्या है? अब मैं एक तरीके की ओर आप सब का निर्देशन करूँगा, एक ऐसे तरीके की ओर जो आप सभी के अनुसरण के लिए एक सुनिश्चित पथ देगा। यह तरीका है: एक उत्तरजीवी होने की तलाश। क्या स्थान, क्या स्थिति बाद में होगी यह न सोचो, केवल अभी आपको क्या करना है उसी की परवाह करो, जीवित रहने के लिए। यही है वह जिसकी लोगों को तलाश होनी चाहिए, और यह उचित भी है। यह एक असंयत, अतिव्ययी इच्छा नहीं है, क्योंकि जो मानव जीवित बचे रहेंगे वे निश्चय ही अच्छे लोग होंगे। वे निश्चित रूप से परमेश्वर के लिए अच्छे गवाह बनेंगे, और निश्चित रूप से उनकी (परमेश्वर की) इच्छा पूरी करेंगे। इसलिए जीवित रहने की चाह एक असाधारण या असंयत इच्छा नहीं है, बल्कि यही है वह जिसकी लोगों को तलाश होनी चाहिए। यह बात लोगों को बचाने से सम्बन्धित परमेश्वर के कार्य से, मेल खाती है। यदि आप दण्डित होने की तैयारी कर रहे हैं, तो आप निश्चित ही एक बुरे व्यक्ति हैं। एक बुरा व्यक्ति कैसे परमेश्वर का गवाह बनेगा? जो लोग दंड पाते हैं, वे सभी वे लोग हैं जो परमेश्वर से प्रेम नहीं करते। जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे नर्क में कैसे जायेंगे? जो नरक में जायेंगे और दण्डित होंगे, उनके लिए परमेश्वर के गवाह बनने की बात क्या एक फ़िज़ूल की बकवाद न होगी? अगर सभी लोगों को नरक में जाना है, तो परमेश्वर का कार्य निरर्थक हो जायेगा। अगर सभी लोगों को मरना ही है, परमेश्वर का कार्य और भी निरर्थक हो जायेगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का “परिणाम” या “उत्पादन” ही मर जायेगा। यह कितना बड़ा मज़ाक होगा! क्या यह सच नहीं कि यह प्रकल्पना या अवधारणा ही टिकने के योग्य नहीं? क्या यह एक बड़ा विरोधाभास नहीं? अतः आप सभी को एक बुनियादी, मुमकिन योजना बनानी होगी, बाद में जीवित रहने की, चाहे एक सेवा-कर्ता की तरह, परमेश्वर के लोगों में से एक बन कर, परमेश्वर के एक पुत्र की तरह, या एक ऊँची हैसियत वाले व्यक्ति की तरह। आपको केवल इतना ही सोचना है कि आप को क्या करना है, ताकि परमेश्वर की स्वीकृति लेकर आप बचे रहें, क्योंकि परमेश्वर चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग बचे रहें। क्या इससे आप लोगों की तलाश आसान नहीं बन जाती? आप सभी से ऐसी तलाश करवा कर, मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूँ कि तब आप सब को यह चिंता न होगी कि मरने के बाद परमेश्वर के गवाह कैसे बनें! अंत में, आप सभी को यह समझना है: एक सामान्य खोज कोई असंयत इच्छा नहीं। परमेश्वर में विश्वास करते समय, लोगों को असंयत इच्छा नहीं होनी चाहिए। उनकी इच्छाएँ केवल सामान्य होनी चाहिए।

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