12. "सब कुछ पीछे छोड़कर परमेश्वर का अनुसरण करो" इसका क्या मतलब है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तुम अपना हृदय और शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके सामने रख सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो। शरीर के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए। तुम परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत के रूप में, नींव के रूप में ले सकते हो। इस तरह, तुम्हारे इरादे और तुम्हारे दृष्टिकोण सब सही जगह पर होंगे, और तुम ऐसे व्यक्ति होओगे जो परमेश्‍वर के सामने उसकी प्रशंसा प्राप्त करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं,वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

तू परमेश्वर में विश्वास करता है और परमेश्वर का अनुसरण करता है, और इस प्रकार तुझे अपने ह्रदय में परमेश्वर से प्रेम करना होगा। तुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर फेंकना होगा, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना होगा, और परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य को निभाना होगा। चूँकि तू परमेश्वर पर विश्वास करता है और परमेश्वर का अनुसरण करता है, तुझे हर एक चीज़ को उसके लिए अर्पण करना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या मांग नहीं करनी चाहिए, और तुझे परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति को हासिल करना चाहिए। चूँकि तुझे सृजा गया था, तो तुझे उस प्रभु की आज्ञा का पालन करना चाहिए जिसने तुझे सृजा था, क्योंकि तू स्वाभाविक रूप से स्वयं के ऊपर प्रभुता नहीं रखता है, और तेरे पास अपनी नियति को नियन्त्रित करने की योग्यता नहीं है। चूँकि तू ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर में विश्वास करता है, तो तुझे पवित्रता एवं बदलाव की खोज करनी चाहिए। चूँकि तू परमेश्वर का एक प्राणी है, तो तुझे अपने कर्तव्य से चिपके रहना चाहिए, और अपने स्थान को बनाए रखना चाहिए, और तुझे अपने कर्तव्य की हद को पार नहीं करना होगा। यह तुझे विवश करने के लिए नहीं है, या सिद्धान्तों के माध्यम से तुझे दबाने के लिए नहीं है, परन्तु ऐसा पथ है जिसके माध्यम से तू अपने कर्तव्य को निभा सकता है, और जिसे हासिल किया जा सकता है—और हासिल किया जाना चाहिए—उन सभी लोगों के द्वारा जो धार्मिकता को अंजाम देते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलताउस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

9. तुम्हारे विचार कलीसिया के कार्य के बारे में होने चाहिए। तुम्हें अपनी स्वयं की शारीरिक इच्छाओं की उपेक्षा कर देनी चाहिए, पारिवारिक मामलों के बारे में निर्णायक होना चाहिए, स्वयं को पूरे हृदय से परमेश्वर के काम के लिए समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के काम को पहले स्थान पर और अपने जीवन को दूसरे स्थान पर रखना चाहिए। यह एक सन्त की शालीनता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर केचयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए' से उद्धृत

तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक ज़िन्दगी के लिए तुझे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुझे अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुझे उन सब चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ख़ूबसूरत और अच्छा है, और तुझे अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज़्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तू एक ऐसा घिनौना जीवन जीता है, किसी उद्देश्य के लिए प्रयास नहीं करता है, तो क्या तू अपने जीवन को बर्बाद नहीं करता है? ऐसे जीवन से तू क्या हासिल कर पाएगा? तुझे एक सत्य के लिए देह के सारे सुख विलासों को छोड़ देना चाहिए, थोड़े से सुख विलास के लिए सारे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए। ऐसे लोगों के पास कोई सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वह उन सभी से यह अपेक्षा करता है: परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग दो। अनुग्रह के युग से लेकर राज्य के युग तक, ऐसे बहुत सारे लोग हुए हैं जिन्होंने परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग दिया था। केवल वे ही लोग संत कहलाने के योग्य हैं, जो राज्य के युग के दौरान परमेश्वर की प्रजा हैं। सब कुछ त्याग देने और परमेश्वर का अनुसरण करने का क्या अर्थ है? यह परमेश्वर को अपना पूरा हृदय, अपना समस्त अस्तित्व अर्पित करना, और अपने आप को परमेश्वर के कार्य में पूरी तरह से डुबो देना और खुद को परमेश्वर के लिए व्यय कर देना है। परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग देने का यही सही अर्थ है। ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि जिन लोगों ने अपना स्वयं का कोई परिवार आरंभ नहीं किया है और जिनके पास चिंता करने के लिए कुछ नहीं है केवल वे ही सब कुछ त्याग सकते हैं, जबकि जिनके पास परिवार है, जिनके पास माता-पिता, जीवन-साथी और बच्चे हैं, वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। यह दृष्टिकोण ग़लत है। सबसे पहले, लोगों को यह जानना होगा कि लोगों से परमेश्वर की माँगें निष्पक्ष और उचित हैं। वह यह माँग नहीं करता है कि लोग अपने माता-पिता, जीवन-साथी और बच्चों का त्याग कर दें। बल्कि वह अनुरोध करता है कि लोग अपने हृदयों को अर्पित करें और किसी भी व्यक्ति, घटना, या चीज़ द्वारा लाचार हुए बिना अपने कर्तव्य को पूर्णता से करें। यह सब कुछ त्यागने और परमेश्वर का अनुसरण करने के बराबर ही है। परमेश्वर लोगों को उन चीज़ों को करने के लिए बाध्य नहीं करता है जिन्हें करने के लिए वे तैयार नहीं हैं। किसी व्यक्ति के लिए यह पर्याप्त होगा कि वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना पूरा प्रयास करे। यह स्वाभाविक है कि व्यक्ति कुछ ऐसी चीज़ों को अलग करे, जिन्हें अलग किया जाना चाहिए। अगर, फिलहाल, कोई किसी चीज़ को नहीं त्याग सकता है, तो इतना ही आवश्यक है कि बस वह उस चीज़ के द्वारा लाचार न हो। अगर हृदय अभी भी लाचार है और वह अपना कर्तव्य पूरी तरह से नहीं कर सकता है, तो यह सब कुछ त्यागना नहीं गिना जाता है। परमेश्वर के प्रति निष्ठा का मुद्दा सब कुछ त्यागने के अभ्यास के भीतर निहित है। यदि तुम वास्तव में एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान है, तो अपने हृदय के भीतर अपने परिवार, जीवन-साथी या बच्चों से लाचार किए जाने से बच पाओगे। कई भाइयों और बहनों के पारिवारिक बंधन हैं, लेकिन उनके हृदय उनके परिवारों द्वारा लाचार नहीं होते हैं, और वे अपने कर्तव्यों को बहुत अच्छी तरह से निभाते हैं। यद्यपि, कभी-कभार वे परिवार की देख-भाल करने के लिए चले जाते हैं, फिर भी वे इसे अपने कर्तव्यों के साथ बिल्कुल भी हस्तक्षेप नहीं करने देते हैं। क्या तुम कह सकते हो कि उन्होंने परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ नहीं त्यागा है? परिवार का होना वास्तव में एक कठिनाई है—इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है। हालाँकि, अगर उनका हृदय परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हो सकता है, तो वे पारिवारिक सभी उलझनों को दूर रख सकेंगे। यद्यपि देह कुछ कठिनाई से गुज़रता है, मगर उनके जीवन के विकास के लिए परमेश्वर से महान आशीष होते है। और जो लोग देह-सुख से चिपके रहते हैं, उन्हें क्या मिलता है? अंततः वे कुछ भी प्राप्त नहीं करते हैं। और देह की कठिनाइयों से किसी को कैसे निपटना चाहिए? यह कहा जा सकता है कि देह की कितनी भी कठिनाई एक अच्छी बात है। अगर परमेश्वर संतुष्ट है, तो व्यक्ति की आत्मा हर्षित हो सकती है। सब की सबसे बड़ी पीड़ा देह के सुखों से चिपके रह कर परमेश्वर को ठेस पहुँचाना है। वे सभी लोग जो परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय करने हेतु सब कुछ त्याग देते हैं तृप्त होंगे क्योंकि उन्होंने उचित रूप से एक मनुष्य के कर्तव्य को किया है और परमेश्वर को संतुष्ट किया है। इसके अलावा, परमेश्वर द्वारा उनकी सराहना की जाएगी, क्योंकि परमेश्वर उन सभी लोगों को महान आशीषें देता है जो निष्ठापूर्वक अपने को उसके लिए व्यय करते हैं। जो लोग परिवार और देह के सुखों से चिपके रहते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ नहीं त्याग सकते हैं, वे सभी ऐसे लोग हैं जो दुष्ट शैतान के प्रति निष्ठावान हैं। वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा बचाये नहीं जा सकते हैं, और विशेष रूप से उनके पास परमेश्वर का आशीष तो नहीं होगा।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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