3. परमेश्वर मानवजाति पर अपना धार्मिक स्वभाव कैसे व्यक्त करता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर के द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, और न ही वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने, और परमेश्वर की ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपान्तरण परमेश्वर के कई भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में इस तरह के बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसका अनुसरण करने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपान्तरण यह दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है, और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह, और एक ऐसा व्यक्ति बन गया है जो परमेश्वर के समान विचारों को साझा करने वाला है। आज, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है, और वह अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं, और उस समस्त कार्य की जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है गवाही दे। जो लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही परिशुद्ध और वास्तविक होती है, और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँटसे गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का उपयोग करता है जिन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और इसी तरह वह अपने लिए गवाही देने हेतु उन लोगों का भी उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है, और जिन्होंने इस तरह उसकेआशीषों को प्राप्त कर लिया है। उसे अपने मुँह से उसकी स्तुति करने के लिए मनुष्य की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जो उसके द्वारा बचाए नहीं गए हैं। केवल वे लोग ही जो परमेश्वर को जानते हैं, और केवल वे लोग ही जिनके स्वभाव को रूपान्तरित कर दिया गया है उसकी गवाही देने के योग्य हैं। परमेश्वर अपने नाम को मनुष्य को जानबूझकर शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर ने सबसे पिछड़े और मलिन स्थान पर देहधारण किया, और केवल इसी तरह से परमेश्वर अपने पवित्र और धार्मिक स्वभाव की समग्रता को साफ तौर पर दिखा सकता है। और उसका धार्मिक स्वभाव किसके ज़रिये दिखाया जाता है? वह तब दिखाया जाता है, जब वह मनुष्य के पापों का न्याय करता है, जब वह शैतान का न्याय करता है, जब वह पाप से घृणा करता है, और जब वह उन शत्रुओं से नफरत करता है जो उसका विरोध और उससे विद्रोह करते हैं। मेरे आज के वचन मनुष्य के पापों का न्याय करने के लिए, मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए और मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शाप देने के लिए हैं। मनुष्य की कुटिलता और छल, उसके शब्द और कर्म—जो भी परमेश्वर की इच्छा के विपरीत हैं, उनका न्याय होना चाहिए, और मनुष्य की अवज्ञाकारिता की पाप के रूप में निंदा होनी चाहिए। उसके वचन न्याय के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमते हैं; वह मनुष्य की अधार्मिकता के न्याय का, मनुष्य की विद्रोहशीलता की निंदा का, मनुष्य के कुरूप चेहरों के खुलासे का इस्तेमाल अपने धार्मिक स्वभाव को अभिव्यक्त करने के लिए करता है। पवित्रता उसके धार्मिक स्वभाव का निरूपण है, और दरअसल, परमेश्वर की पवित्रता वास्तव में उसका धार्मिक स्वभाव है। तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव आज के वचनों के प्रसंग हैं—मैं उनका इस्तेमाल बोलने, न्याय करने और विजय-कार्य संपन्न करने के लिए करता हूँ। मात्र यही असली कार्य है, और मात्र यही परमेश्वर की पवित्रता को जगमगाता है। अगर तुममें भ्रष्ट स्वभाव का कोई निशान नहीं है, तो परमेश्वर तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, न ही वह तुम्हें अपना धार्मिक स्वभाव दिखाएगा। चूँकि तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट है, इसलिए परमेश्वर तुम्हें छोड़ेगा नहीं, और इसी के ज़रिये उसकी पवित्रता दिखाई जाती है। अगर परमेश्वर देखता कि मनुष्य की मलिनता और विद्रोहशीलता बहुत भयंकर हैं, लेकिन वह न तो बोलता, न तुम्हारा न्याय करता, न तुम्हारी अधार्मिकता के लिए तुम्हें ताड़ना देता, तो इससे यह साबित हो जाता कि वह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसे पाप से कोई घृणा न होती; वह मनुष्य जितना ही मलिन होता। आज मैं तुम्हारी मलिनता के कारण ही तुम्हारा न्याय कर रहा हूँ, और तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के कारण ही तुम्हें ताड़ना दे रहा हूँ। मैं तुम लोगों के सामने अपने सामर्थ्य की अकड़ नहीं दिखा रहा या जानबूझकर तुम लोगों का दमन नहीं कर रहा; मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि इस मलिन धरती पर पैदा हुए तुम लोग मलिनता से बुरी तरह दूषित हो गए हो। तुम लोगों ने अपनी निष्ठा और मानवीयता खो दी है और तुम दुनिया की सबसे मलिन जगह पर पैदा हुए सूअर की तरह बन गए हो, और यही वजह है कि मैं तुम लोगों का न्याय करता हूँ और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता हूँ। ठीक इसी न्याय की वजह से तुम लोग यह देख पाए हो कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है, और कि परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है; ठीक अपनी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से ही वह तुम लोगों का न्याय करता है और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता है। चूँकि वह मनुष्य की विद्रोहशीलता देखकर अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट कर सकता है, और चूँकि मनुष्य की मलिनता देखकर वह अपनी पवित्रता प्रकट कर सकता है, अत: यह यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो पवित्र और प्राचीन है, और फिर भी मलिनता की धरती पर रहता है। ... जब लोगों के भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होते हैं, तो लोगों का न्याय करने के लिए परमेश्वर बोलता है, और केवल तभी लोग देखते हैं कि वह पवित्र है। जब वह मनुष्य के पापों के कारण उनका न्याय करता है और उन्हें ताड़ना देता है, मनुष्य के पापों को उजागर करता है, तो कोई भी मनुष्य या चीज़ इस न्याय से बच नहीं सकती; जो कुछ भी मलिन है, वह उसका न्याय करता है, और केवल इसी तरह से उसके स्वभाव को धार्मिक कहा जा सकता है। अगर इससे अलग कुछ होता, तो यह कैसे कहा जा सकता कि तुम लोग नाम और तथ्य दोनों से विषमता हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है' से उद्धृत

आज तुम्हारे ज्ञान की क्या सीमा है? तुम्हारे विचार, तुम्हारा चिंतन, तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारे शब्द और कर्म—क्या ये सभी अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता के लिए विषमता के तुल्य नहीं हैं? क्या तुम्हारी अभिव्यक्तियाँ मनुष्य के उस भ्रष्ट स्वभाव का प्रकटीकरण नहीं है जिसे परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किया गया है? तुम्हारे विचार और राय, तुम्हारी अभिप्रेरणाएँ, और जो भ्रष्टता तुममें प्रकट होती है, वह सभी परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और साथ ही उसकी पवित्रता को दर्शाते हैं। परमेश्वर भी मलिनता की धरती पर ही पैदा हुआ था, फिर भी वह मलिनता से बेदाग रहा। वह उसी गंदी दुनिया में रहता है, जिसमें तुम रहते हो, पर उसमें विवेक और दृष्टिबोध है, वह गंदगी से घृणा करता है। तुम शायद अपने शब्दों और कर्मों में कुछ भी गंदगी न ढूँढ़ पाओ, लेकिन वह ढूँढ़ सकता है और तुम्हें बता सकता है। तुम्हारी वे पुरानी बातें—तुम्हारे अंदर संवर्धन का अभाव, अंतर्दृष्टि, बोध और जीने के तुम्हारे पिछड़े तरीके—वे सब आज के प्रकाशन से प्रकाश में लाए जा चुके हैं; केवल परमेश्वर के धरती पर आकर इस तरह काम करने से ही लोग उसकी पवित्रता और धार्मिक स्वभाव का अवलोकन करते हैं। वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है, जिससे तुम समझ हासिल कर पाते हो; कभी-कभी तुम्हारी हैवानी प्रकृति अभिव्यक्त हो जाती है, और वह उसकी ओर तुम्हारा ध्यान दिलाता है। वह मनुष्य के सार को अच्छी तरह से जानता है। वह तुम्हारे बीच रहता है, वही खाना खाता है जो तुम खाते हो और वह उसी परिवेश में रहता है—लेकिन फिर भी, वह तुमसे ज़्यादा जानता है; वह तुम्हें उजागर कर सकता है और मानवता के भ्रष्ट सार को साफ देख सकता है। उसे मनुष्य के जीने के फलसफों और कुटिलता और छल से ज्यादा किसी चीज़ से घृणा नहीं है। उसे लोगों की देह-सुख की अंत:क्रियाओं से विशेष रूप से घृणा है। वह मनुष्य के जीने के फलसफों से शायद परिचित न हो, लेकिन वह उन भ्रष्ट स्वभावों को साफ देख और उजागर कर सकता है जिसे लोग प्रकट करते हैं। वह इन चीज़ों के ज़रिये बोलने और मनुष्य को सिखाने का कार्य करता है, वह इन चीज़ों का इस्तेमाल लोगों का न्याय करने और अपने धार्मिक और पवित्र स्वभाव को अभिव्यक्त करने के लिए करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है' से उद्धृत

अपमान के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता उसका विशिष्ट सार है; परमेश्वर का क्रोध उसका विशिष्ट स्वभाव है; परमेश्वर का प्रताप उसका विशिष्ट सार है। परमेश्वर के क्रोध के पीछे का सिद्धान्त उस पहचान और स्थिति को दर्शाता है जिसे सिर्फ उसने धारण किया है। यह जिक्र करने की आवश्यकता नहीं है कि यह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के सार का एक प्रतीक भी है। परमेश्वर का स्वभाव उसका स्वयं का अंतर्निहित सार है। यह समय के गुज़रने के साथ बिल्कुल भी नहीं बदलता है, और जब कभी स्थान परिवर्तित होता है तब भी यह नहीं बदलता है। उसका अंतर्निहित स्वभाव उसका स्वाभाविक सार है। वह चाहे जिस किसी पर भी अपना कार्य क्‍यों न करे, न तो उसका सार बदलता है और न ही उसका धर्मी स्वभाव। जब कोई परमेश्‍वर को क्रोधित करता है, तो जिसे वह आगे भेजता है वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है; इस समय उसके क्रोध के पीछे का सिद्धान्त नहीं बदलता है, और न ही उसकी अद्वितीय पहचान और हैसियत बदलती है। अपने सार में परिवर्तन के कारण या स्वभाव के अलग-अलग सारों को उत्पन्न करने के कारण वह क्रोधित नहीं होता है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उसके विरुद्ध मनुष्य का विरोध उसके स्वभाव को ठेस पहुंचाता है। मनुष्य का परमेश्वर को स्पष्ट रूप से ललकारना परमेश्वर की अपनी पहचान और हैसियत के लिए एक गम्भीर चुनौती है। परमेश्वर की नज़र में, जब मनुष्य उसे चुनौती देता है, तब मनुष्य उससे मुकाबला कर रहा है और उसके क्रोध की परीक्षा ले रहा है। जब मुनष्य परमेश्वर का विरोध करता है, जब मनुष्य परमेश्वर से मुकाबला करता है, जब मनुष्य लगातार उसके क्रोध की परीक्षा लेता है—यह वही समय है जब उसका पाप अनियंत्रित हो जाता है—तब परमेश्वर का क्रोध स्वाभाविक रूप से अपने आपको प्रकट एवं प्रस्तुत करेगा। इसलिए, परमेश्वर के क्रोध का प्रकटीकरण संकेत करता है कि समस्त बुरी ताकतें अस्तित्व में नहीं रहेंगी; यह संकेत करता है कि सभी उपद्रवी शक्तियों को नष्ट किया जाएगा। यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की अद्वितीयता है, और यह परमेश्वर के क्रोध की अद्वितीयता है। जब परमेश्वर की गरिमा और पवित्रता को चुनौती दी जाती है, जब मनुष्य के द्वारा धर्मी ताकतों को रोका जाता है और मनुष्य द्वारा इसकी अनदेखी की जाती है, तब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजेगा। परमेश्वर के सार के कारण, पृथ्वी की वे सारी ताकतें जो परमेश्वर का मुकाबला करती हैं, उसका विरोध करती हैं और उसके साथ संघर्ष करती हैं वे बुरी, भ्रष्ट और अधर्मी हैं; वे शैतान की ओर से आती हैं और उसी की हैं। क्योंकि परमेश्वर धर्मी है, प्रकाश और दोषरहित पवित्रता से संबंधित है, इसलिए समस्त चीज़ें जो बुरी, भ्रष्ट और शैतान की हैं वे परमेश्वर के क्रोध के प्रकट होने के साथ ही विलुप्त हो जाएंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

हालाँकि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य से छिपा हुआ और अज्ञात है, फ़िर भी यह किसी अपराध को नहीं सहता है

सभी मूर्ख और अबोध मनुष्यों के प्रति परमेश्वर का व्यवहार मुख्य रूप से दया और सहनशीलता पर आधारित है। दूसरी ओर, उसका क्रोध समय और चीज़ों के अति विशाल पैमाने में छिपा हुआ है; मनुष्य इससे अनजान है। परिणामस्वरूप, यह मनुष्य के लिए कठिन है कि वह परमेश्वर को उसका स्वयं का क्रोध प्रदर्शित करते हुए देखे, और साथ ही उसके क्रोध को समझना भी कठिन है। इसलिए, मनुष्य परमेश्वर के क्रोध को हल्के में लेता है। जब मनुष्य परमेश्वर के अंतिम कार्य और मनुष्य की क्षमा और उसके प्रति सहिष्णु होने के चरण को सामने पाते हैं—अर्थात्, जब परमेश्वर की दया और चेतावनी की अंतिम घटना उनके पास पहुँचती है—यदि वे तब भी परमेश्वर का विरोध करने के लिए उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करते हैं और पश्चाताप करने, अपने मार्गों को सुधारने या उसकी दया को स्वीकार करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं, तो परमेश्वर आगे से उन्‍हें अपनी सहनशीलता और धैर्य प्रदान नहीं करेगा। इसके विपरीत, यह वह समय है जब परमेश्वर अपनी दया को वापस ले लेगा। इसके पश्चात्, वह बस अपने क्रोध को व्‍यक्‍त करेगा। वह अलग-अलग तरीकों से अपने क्रोध को प्रकट कर सकता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे वह लोगों को दण्ड देने और नष्ट करने के लिए अलग अलग पद्धतियों का इस्तेमाल करता है।

सदोम नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा आग का इस्तेमाल करना मानवता और किसी जीव को सम्पूर्ण रीति से विनाश करने के लिए उसकी तीव्रतम पद्धति है। सदोम के लोगों को जलाना उनकी शारीरिक देहों को नष्ट करने से कहीं अधिक था; इसने पूरी तरह से उनकी आत्माओं, उनके प्राणों और उनके शरीरों को नष्ट कर दिया, यह भी सुनिश्चित किया कि इस नगर के भीतर के लोग, न तो भौतिक संसार में अस्तित्व में रहेंगे न ही उस संसार में रहेंगे जो मनुष्य के लिए अदृश्य है। यह एक तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध को दर्शाता और प्रकट करता है। इस तरह का प्रकाशन और प्रदर्शन परमेश्वर के क्रोध के आवश्यक सार का एक पहलू है, बिल्कुल वैसे ही जैसे यह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आवश्यक सार भी है। जब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजता है, तो वह दया या करुणा प्रकट करना बन्द कर देता है, वह कोई सहनशीलता या धैर्य प्रदर्शित नहीं करता है; तब कोई ऐसा व्यक्ति, वस्तु या कारण नहीं है जो उसे निरन्तर धीरज धरने, फ़िर से दया करने, और एक बार फ़िर से अपनी सहनशीलता को प्रकट करने के लिए रज़ामंद कर सके। इन चीज़ों के बदले में, निसंकोच, परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को व्‍यक्‍त करेगा, जो कुछ वह चाहता है उसे करेगा, और वह इन चीज़ों को अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुरूप शीघ्रता से और साफ़-सुथरे तरीके से करेगा। यह वह तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को प्रकट करता है, जिसे मनुष्य को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए, और साथ ही यह उसके धर्मी स्वभाव के एक पहलू की अभिव्यक्ति भी है। जब लोग परमेश्वर को मनुष्य के प्रति चिंता करते और प्रेम दिखाते हुए देखते हैं, तो वे उसके क्रोध को भाँपने में, उसके प्रताप को देखने में या गुनाह के प्रति उसकी असहनशीलता को अनुभव करने में असमर्थ होते हैं। इन चीज़ों ने हमेशा से यह विश्वास करने में लोगों की अगुवाई की है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव केवल दया, सहनशीलता और प्रेम है। फिर भी, जब कोई परमेश्वर को किसी नगर का विनाश करते हुए या मनुष्य से घृणा करते हुए देखता है, तो मनुष्य के विनाश में उसका क्रोध और प्रताप लोगों को उसके धर्मी स्वभाव के अन्य पक्ष की झलक देखने देता है। यह गुनाह के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता है। परमेश्वर का स्वभाव जो किसी गुनाह को सहन नहीं करता वह किसी भी सृजित या असृजित प्राणी की कल्पना से परे है, कोई भी उसके साथ दखलंदाज़ी करने या उसको प्रभावित करने में सक्षम नहीं है; उससे भी बढ़कर, इसका भेष धारण या अनुकरण नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर के स्वभाव का यह पहलू ऐसा है जिसे मनुष्य को बहुत अच्छे से जानना चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही इस प्रकार का स्वभाव है, और केवल स्वयं परमेश्वर ही इस प्रकार के स्वभाव को धारण करता है। परमेश्वर इस प्रकार के धर्मी स्वभाव को धारण करता है क्योंकि वह दुष्टता, अंधकार, विद्रोहीपन और शैतान के बुरे कार्यों जैसे कि—मानवजाति को भ्रष्ट करना और निगल जाना—से घृणा करता है क्योंकि वह अपने पवित्र और बेदाग सार के कारण अपने विरुद्ध पाप के सारे कार्यों से घृणा करता है। यह इसलिए है क्योंकि वह किसी भी सृजित या असृजित प्राणी द्वारा खुला विरोध या स्वयं से मुकाबला सहन नहीं करेगा। यहाँ तक कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसके प्रति उसने किसी समय दया दिखाई थी या जिसका चुनाव किया था, वह व्‍यक्ति भी उसके स्वभाव को ललकार या उसके धीरज और सहनशीलता के सिद्धान्त का उल्‍लंघन भर कर दे तो वह थोड़ी सी भी दया या संकोच के बिना अपने धर्मी स्वभाव को जारी और प्रकट करेगा—ऐसा धर्मी स्वभाव जो अपमान बर्दाश्त नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर नीनवे के लोगों से बहुत क्रोधित था, उसके बावजूद भी, ज्यों ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, त्यों ही उसका हृदय धीरे-धीरे कोमल होता गया, और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। जब उसने उनके लिए घोषणा की कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा—अपने पापों के निमित्त उनके अंगीकार और पश्चाताप के कुछ समय पहले—परमेश्वर तब भी उन से क्रोधित था। जब एक बार उन्होंने पश्चाताप के कई कार्य किये, तो नीनवे के लोगों के निमित्त परमेश्वर का क्रोध धीरे-धीरे उनके लिए दया और सहनशीलता में रूपान्तरित हो गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दोनों पहलुओं के प्रकाशन का एक साथ मिलने के विषय में कोई विरोधाभास नहीं है। किसी व्यक्ति को विरोधाभास की इस कमी को कैसे समझना और जानना चाहिए? नीनवे के लोगों के पश्चाताप के साथ परमेश्वर ने एक के बाद एक इन दोनों एकदम विपरीत सारों को प्रकट और प्रकाशित किया, जिसने लोगों को परमेश्वर के सार की यथार्थता और उसके उल्लंघन न किए जा सकने वाले गुण को देखने दिया। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपने रवैये का उपयोग किया: ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को बर्दाश्त नहीं करता है, या वह उन पर दया करना नहीं चाहता है; यह ऐसा है कि वे कभी कभार ही परमेश्वर के प्रति सच्चा पश्चाताप करते हैं, और ऐसा कभी कभार ही होता है कि लोग सचमुच में अपने कुमार्ग से फिरते हैं और अपने हाथों के उपद्रव को त्यागते हैं। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित हो जाता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सचमुच में पश्चाताप करने में समर्थ होगा, और वह मनुष्य के सच्चे पश्चाताप को देखना चाहता है, इस दशा में वह उदारता से मनुष्य पर अपनी दया और सहनशीलता बरसाता रहेगा। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का बुरा चालचलन परमेश्वर के क्रोध को उनके ऊपर लाता है, जबकि परमेश्वर की दया और करुणा को उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो परमेश्वर को ध्यान से सुनते हैं और सचमुच में उसके सम्मुख सच्चा पश्चाताप करते हैं, और इसे उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो अपने कुमार्ग से फिर जाते हैं और अपने हाथों के उपद्रव का त्याग कर देते हैं। नीनवे के लोगों प्रति अपने व्यवहार में परमेश्वर के रवैये को बिल्कुल साफ़-साफ़ प्रकाशित किया गया है: परमेश्वर की दया और सहनशीलता को प्राप्त करना बिल्कुल भी कठिन नहीं है; वह एक व्यक्ति से सच्चे पश्चाताप की अपेक्षा करता है। जब तक लोग अपने कुमार्गों से दूर रहते हैं और अपने हाथों के उपद्रव को त्याग देते हैं, तब तक परमेश्वर उनके प्रति अपने हृदय और अपने रवैये को बदलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता तो वास्तव में विद्यमान है, किन्तु जब वह अपने कोप को उन्मुक्त करता है तो परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता मनुष्य को परमेश्वर का वह पहलू भी दिखाती है जो किसी अपमान को नहीं सहती है। जब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरी तरह से मानने में सक्षम होता है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता है, तो परमेश्वर मनुष्य के प्रति अपनी करुणा से भरपूर होता है; जब मनुष्य भ्रष्टता, उसके प्रति घृणा और शत्रुता से भर जाता है, तो परमेश्वर बहुत अधिक क्रोधित होता है। और वह किस हद तक अत्यंत क्रोधित होता है? उसका कोप तब तक बना रहेगा जब तक कि वह मनुष्य के प्रतिरोध और दुष्ट कर्मों को फिर कभी नहीं देखता है, जब तक वे उसकी नज़रों के सामने से दूर नहीं हो जाते हैं। केवल तभी परमेश्वर का क्रोध गायब होगा। दूसरे शब्दों में, भले ही वह व्यक्ति कोई भी क्यों न हो, यदि उसका हृदय परमेश्वर से दूर हो गया है, और कभी वापस नहीं लौटने के लिए, परमेश्वर से फिर गया है, तो फिर इसकी परवाह किए बिना कि किस प्रकार, सभी प्रकटनों के लिए या अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं के संदर्भ में, वो अपने शरीर में या अपनी सोच में परमेश्वर की आराधना करने, उसका अनुसरण करने और उसकी आज्ञा मानने की इच्छा करता है, जैसे ही उसका हृदय परमेश्वर से फिरेगा, परमेश्वर का कोप बिना रूके उन्मुक्त हो जाएगा। यह ऐसे होगा कि जब मनुष्य को पर्याप्त अवसर देने के बाद, परमेश्वर अपने कोप को गंभीरता से उन्मुक्त कर देगा, तो एक बार उसके उन्मुक्त हो जाने के बाद इसे वापस लेने का कोई मार्ग नहीं होगा, और वह ऐसे मनुष्य के प्रति फिर कभी भी करुणाशील और सहिष्णु नहीं होगा। यह परमेश्वर के स्वभाव का एक पक्ष है जो किसी अपमान को सहन नहीं करता है। ... वह उन चीज़ों के प्रति सहिष्णु और करुणाशील है जो उदार, सुन्दर और भली हैं; जो चीज़ें बुरी, पापमय और दुष्ट हैं, उनके प्रति वह गहनता से कुपित होता है, कुछ इस तरह कि उसका कोप रुकता नहीं है। ये परमेश्वर के स्वभाव के दो प्रमुख और अति महत्वपूर्ण पहलू: अतिशय करुणा और अत्यंत कोप हैं और, इसके अतिरिक्त, इन्हें आरम्भ से लेकर अंत तक परमेश्वर के द्वारा प्रकट किया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

लोग कहते हैं कि परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है, और यह कि जब तक मनुष्य अंत तक उसके पीछे पीछे चलता रहेगा, वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे अधिक धर्मी है। यदि मनुष्य बिलकुल अंत तक उसके पीछे पीछे चलता है, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है? मैं सभी मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और अपने धर्मी स्वभाव से सभी मनुष्यों का न्याय करता हूँ, फिर भी जो अपेक्षाएं मैं मनुष्य से करता हूँ उसके लिए कुछ यथोचित स्थितियाँ होती हैं, और जिसकी अपेक्षा मैं करता हूँ उसे सभी मनुष्यों के द्वारा, चाहे वे जो कोई भी हों, अवश्य ही पूरा किया जाना चाहिए। मैं इसकी परवाह नहीं करता हूँ कि तेरी योग्यताएँ कितनी व्यापक और आदरणीय हैं; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तू मेरे मार्ग में चलता है कि नहीं, और सत्य के लिए तुझमें प्रेम और प्यास है कि नहीं। यदि तुझमें सत्य की कमी है, और उसके बजाय तू मेरे नाम को लज्जित करता है, और मेरे मार्ग के अनुसार कार्य नहीं करता है, और किसी बात की परवाह या चिंता किए बगैर बस नाम के लिए अनुसरण करता है, तो उस समय मैं तुझे मार कर नीचे गिरा दूँगा और तेरी बुराई के लिए तुझे दण्ड दूँगा, तब तेरे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तू ऐसा कह सकता है कि परमेश्वर धर्मी नहीं है? आज, यदि तूने उन वचनों का पालन किया है जिन्हें मैंने कहा है, तो तू ऐसा इंसान है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। तू कहता है कि तूने हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करते हुए दुख उठाया है, कि तूने हमेशा हर परिस्थितियों में उसका अनुसरण किया है, और तूने उसके साथ अपना अच्छा और खराब समय बिताया है, किन्तु तूने परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार जीवन नहीं बिताया है; तू सिर्फ हर दिन परमेश्वर के पीछे पीछे भागना और उसके लिए स्वयं को व्यय करना चाहता है, और तूने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन बिताने के बारे में नहीं सोचा है। तू यह भी कहता है, "किसी भी सूरत में, मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर धर्मी है। मैंने उसके लिए दुख उठाया है, मैं उसके लिए यहाँ वहाँ भागते रहता हूँ, और मैंने उसके लिए अपने आपको समर्पित किया है, और मैंने कड़ी मेहनत की है इसके बावजूद मेरी कद्र नहीं हुई है; वह निश्चय ही मुझे स्मरण रखता है।" यह सच है कि परमेश्वर धर्मी है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है: इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और इसे शरीर, या मानवीय सौदों के द्वारा कलंकित नहीं किया जा सकता है। वे सभी जो विद्रोही हैं और विरोध में हैं, और जो उसके मार्ग की सम्मति में नहीं हैं, उन्हें दण्डित किया जाएगा; किसी को भी क्षमा नहीं किया गया है, और किसी को भी बख्शा नहीं गया है! कुछ लोग कहते हैं, "आज मैं तुम्हारे लिए यहाँ वहाँ भागता हूँ; जब अंत आता है, तो क्या तू मुझे थोड़ी सी आशीष दे सकता है?" अतः मैं तुझसे पूछता हूँ, "क्या तूने मेरे वचनों का पालन किया है?" वह धार्मिकता जिसकी तू बात करता है वह एक सौदे पर आधारित है। तू केवल यह सोचता है कि मैं धर्मी हूँ, और सभी मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और वे सब जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे उन्हें निश्चित रूप से बचा लिया जाएगा और वे मेरी आशीषों को प्राप्त करेंगे। "वे सब जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं निश्चित है कि उन्हें बचा लिया जाएगा" मेरे इन वचनों में एक भीतरी अर्थ है: वे जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह ग्रहण कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो, मेरे द्वारा विजय पा लिए जाने के बाद, सत्य को खोजते हैं और उन्हें सिद्ध बनाया जाता है। तूने कैसी स्थितियाँ हासिल की हैं? तू बिलकुल अंत तक सिर्फ मेरा अनुसरण करने में कामयाब हुआ है, किन्तु तूने और क्या किया है? क्या तूने मेरे वचनों का पालन किया है? तूने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तेरा कोई इरादा नहीं है। तूने बस सबसे सरल और आसान पथ को ढूँढ़ लिया, और अपने आपको सौभाग्यशाली मानकर उसका अनुसरण किया है। तेरे जैसे इंसान के लिए मेरा धर्मी स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, यह एक प्रकार से सच्चा प्रतिफल है, और यह बुरा काम करनेवालों के लिए उचित दण्ड है; वे सभी जो मेरे मार्ग पर नहीं चलते हैं उन्हें निश्चय ही दण्ड दिया जाएगा, भले ही वे अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। जब यह धर्मी स्वभाव मनुष्य की सज़ा में प्रकट होता है, तो मनुष्य भौंचक्का हो जाता है, और अफसोस करता है कि परमेश्वर का अनुसरण करते हुए, वह उसके मार्ग पर नहीं चला। "उस समय, परमेश्वर का अनुसरण करते हुए मैंने केवल थोड़ा सा दुख उठाया, किन्तु मैं परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चला। इसके लिए क्या बहाने बनाये जा सकते हैं? ताड़ना दिए जाने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है!" फिर भी वह अपने मन में सोच रहा है, "किसी न किसी प्रकार से, मैं ने बिलकुल अंत तक अनुसरण किया है, अतः भले ही तू मुझे ताड़ना दे, फिर भी यह कठोर ताड़ना नहीं हो सकती है, और इस ताड़ना को बलपूर्वक लागू करने के बाद भी तू मुझे चाहेगा। मैं जानता हूँ कि तू धर्मी है, और तू हमेशा मेरे साथ इस प्रकार से व्यवहार नहीं करेगा। इतना सब होते हुए भी, मैं उनके समान नहीं हूँ जिन्हें मिटा दिया जाएगा; वे जो मिटा दिए जायेंगे, भारी ताड़ना प्राप्त करेंगे, जबकि मेरी ताड़ना हल्की होगी।" परमेश्वर का स्वभाव वैसा नहीं है जैसा तू कहता है। ऐसा नहीं है कि वे जो पापों का अंगीकार करने में अच्छे होते हैं उनके साथ कोमलता के साथ व्यवहार किया जाता है। धार्मिकता ही पवित्रता है, और वह एक ऐसा स्वभाव है जो मनुष्य के अपराध को सहन नहीं कर सकता है, और वह सब कुछ जो अशुद्ध है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है वह परमेश्वर की घृणा का पात्र है। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव व्यवस्था नहीं, प्रशासनिक आज्ञा है: यह राज्य के भीतर एक प्रशासनिक आज्ञा है, और यह प्रशासनिक आज्ञा उस व्यक्ति के लिए धर्मी दण्ड है जिसके पास सत्य नहीं है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, और उसके उद्धार की कोई गंजाइश नहीं है। क्योंकि जब प्रत्येक मनुष्य को प्रकृति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा, तो अच्छे मनुष्य को पुरस्कार दिया जाएगा और बुरे मनुष्य को दण्ड दिया जाएगा। इसी समय मनुष्य की नियति को स्पष्ट किया जाएगा, यह वह समय है जब उद्धार का कार्य समाप्त हो जाएगा, जिसके बाद मनुष्य के उद्धार का कार्य और नहीं किया जाएगा, और उनमें से हर एक को कठोर दंड दिया जाएगा जो बुराई करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की नसीहत देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहे जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर की घृणा के शिकार हो जाएँगे और नकार दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप संख्या में बहुत अधिक और ज्यादा संगीन हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। ऐसे लोग, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं, अधिक कठोर दंड प्राप्त करेंगे, जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। ऐसा उनका उचित प्रतिशोध है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी अभिलेख-पुस्तकों में लिखता है; और फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, और उन अशुद्ध आत्माओं को इच्छानुसार उनके संपूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुन: देहधारण न कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी न देख सकें। वे पाखंडी, जो किसी समय सेवा करते हैं, किंतु अंत तक वफ़ादार बने रहने में असमर्थ रहते हैं, परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपने सामर्थ्य का कुछ भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे, किंतु उसके साथ बेमन से व्यवहार करने के लिए परिस्थिति द्वारा मजबूर किए जाते हैं, वे परमेश्वर के लोगों की सेवा करने वालों में गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की एक छोटी-सी संख्या ही जीवित बचेगी, जबकि बड़ी संख्या उन लोगों के साथ नष्ट हो जाएगी, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंतत: परमेश्वर उन सभी को, जिनका मन परमेश्वर के समान है, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। वे परमेश्वर के कार्य के परिणाम होंगे। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे—तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; जो मार्ग तुम लोग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी शख्स का इंतज़ार नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

पिछला: 2. परमेश्वर के स्वभाव और सार को कैसे जानें

अगला: 4. परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के प्रकट होने के तरीके

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।

संबंधित सामग्री

7. एक धोखेबाज व्यक्ति क्या है? धोखेबाज़ लोगों को क्यों नहीं बचाया जा सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम्हारे पास एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें