3. अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य किस तरह मानवजाति को शुद्ध करता और बचाता है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)।

"मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

वर्तमान देहधारण में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से ताड़ना और न्याय के द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इस नींव पर निर्माण करते हुए वह मनुष्य तक अधिक सत्य पहुँचाता है और उसे अभ्यास करने के और अधिक तरीके बताता है और ऐसा करके मनुष्य को जीतने और उसे उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने का अपना उद्देश्य हासिल करता है। यही वह चीज़ है, जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे निहित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना, मनुष्य की प्रकृति के सार और भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना, और धार्मिक अवधारणाओं, सामन्ती सोच, पुरानी सोच के साथ ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना था। यह सब कुछ परमेश्वर के वचनों के माध्यम से अवश्य सामने लाया जाना और साफ किया जाना चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर वचनों का उपयोग करता है, न कि चिह्नों और चमत्कारों का। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ित करने और पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में, मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और सुन्दरता को देख ले, और परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाए, ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को निहार ले।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। मनुष्य को वचनन्याय और ताड़ना के माध्यम से परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाता है; शुद्ध करने, न्याय करने और खुलासा करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, अवधारणाओं, प्रयोजनों, और व्यक्तिगत आशाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है। कुछ लोग नहीं समझते, और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को सिद्ध बना सकता है। वे कहते हैं, "यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे सिद्ध बनाया जा सकता है?" ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शापित करता है, और वह मनुष्य के पापों को न्याय देता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय के द्वारा वह मनुष्य को शरीर के सार का गहरा ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आज्ञाकारिता के प्रति समर्पित होता है। मनुष्य का शरीर पाप का है, और शैतान का है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है—और इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों का उस पर पड़ना आवश्यक है और हर प्रकार का शोधन होना आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

लोगों की कौन सी आंतरिक स्थिति पर ये सभी परीक्षण लक्षित हैं? ये लोगों के विद्रोही स्वभाव पर लक्षित हैं जो परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम है। बहुत कुछ है जो लोगों के भीतर अशुद्ध है, और बहुत कुछ है जो पाखंडपूर्ण है, और इसलिए उन्हें शुद्ध बनाने के लिए परमेश्वर उन्हें परीक्षणों के आधीन करता है। ...

यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते हो, तो तुम परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से गिर जाओगे, क्योंकि तुम इस बात से अनजान हो कि कैसे परमेश्वर लोगों को सिद्ध बनाता है, और किन उपायों से वह उन्हें सिद्ध बनाता है, और जब परमेश्वर के परीक्षण तुम्हारे ऊपर आएँगे और वे तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाएँगे, तो तुम अडिग रहने में असमर्थ होगे। परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसका सम्पूर्ण स्वभाव है, और जब परमेश्वर का सम्पूर्ण स्वभाव लोगों को दिखाया जाता है, तो यह उनकी देह पर क्या लाता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव लोगों को दिखाया जाता है, तो उनकी देह अपरिहार्य रूप से अत्यधिक पीड़ा भुगतेगी। यदि तुम इस पीड़ा को नहीं भुगतते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के द्वारा सिद्ध नहीं बनाया जा सकता है, न ही तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अर्पित कर पाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें सिद्ध बनाता है, तो वह तुम्हें निश्चित रूप से अपना सम्पूर्ण स्वभाव दिखाएगा। सृष्टि की रचना के बाद से आज तक, परमेश्वर ने अपने सम्पूर्ण स्वभाव को मनुष्य को कभी नहीं दिखाया है—किन्तु अंत के दिनों के दौरान वह इसे लोगों के इस समूह के लिए प्रकट करता है जिसे उसने पूर्वनियत किया और चुना है, और लोगों को सिद्ध बनाने के द्वारा वह अपने स्वभाव को प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह लोगों के एक समूह को सिद्ध बनाता है। लोगों के लिए परमेश्वर का ऐसा ही प्रेम सच्चा प्रेम है। परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करने के लिए लोगों को अत्यधिक पीड़ा सहना और एक ऊँची क़ीमत चुकाना आवश्यक है। केवल इसके बाद ही वे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए जाएँगे और परमेश्वर को अपना सच्चा प्रेम वापस चुका पाएँगे और केवल तभी परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा को पूरा करना चाहते हैं, और अपना सच्चा प्रेम पूरी तरह से परमेश्वर को दे देते हैं, तो उन्हें अवश्य, मृत्यु से भी बदतर कष्ट सहने के लिए, अत्यधिक पीड़ा और परिस्थितियों की कई यंत्रणाओं का अनुभव करना होगा, अंततः उन्हें परमेश्वर को अपना सच्चा हृदय वापस देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर से सचमुच प्रेम करता है या नहीं, यह कठिनाई और शुद्धिकरण के दौरान प्रकट होता है। परमेश्वर लोगों के प्रेम को शुद्ध करता है, और यह भी केवल कठिनाई और शुद्धिकरण के बीच ही प्राप्त किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के वातावरण का प्रयोग करता है, और मनुष्य को अनावृत करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है, एक ओर वह मनुष्य के साथ निपटता है और दूसरी ओर मनुष्य को अनावृत करता है, और एक अन्य बात में वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित "रहस्यों" को खोदकर और ज़ाहिर करते हुए, मनुष्य की अनेक अवस्थाएँ दिखा करके उसकी प्रकृति को प्रकट करता है। परमेश्वर अनेक विधियों जैसे कि प्रकाशन, व्यवहार करने, शुद्धिकरण, और ताड़ना के द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाता है, जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के द्वारा जीता जाना मार्शल आर्ट की प्रतिस्पर्धा के समान है।

परमेश्वर का प्रत्येक वचन हमारे मर्मस्थल पर चोट करता है, और हमें एक टीस देता और भयभीत कर देता है। वह हमारी कल्पनाओं को और हमारे भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करता है। हम जो कुछ कहते और करते हैं से लेकर हमारे प्रत्येक विचार और सोच तक, हमारा स्वभाव और सार उसके वचनों के द्वारा प्रकट होता है, भय और कँपन की स्थिति में हम कहीं मुँह छिपाने लायक नहीं रहते। वह एक-एक करके, हमें हमारे कार्यों, लक्ष्यों, इरादों और भ्रष्ट स्वभाव के बारे में बताता है, जो हम ख़ुद भी कभी नहीं जान पाए थे और हमें एहसास कराता है कि हमारी अधम अपूर्णता पूरी तरह से उजागर हो गई है, यहाँ तक कि हम उसके द्वारा जीत लिये गये हैं। परमेश्वर अपने प्रति हमारे विरोध के लिए हमारा न्याय करता है, अपनी ईशनिंदा और तिरस्कार के लिये हमें ताड़ना देता है, और हमें यह एहसास कराता है कि हमारे अंदर उद्धार पाने का एक भी गुण नहीं है, और हम ही जीते-जागते शैतान हैं। हमारी आशाएँ चूर-चूर हो जाती हैं, अब हम उससे अविवेकपूर्ण माँगें करने या कोई उम्मीद लगाने का साहस नहीं करते हैं, यहाँ तक कि रातोंरात हमारे स्वप्न गायब हो जाते हैं। यह ऐसा तथ्य है जिसकी हममें से न तो कोई कल्पना कर सकता है और न ही कोई स्वीकार कर सकता है। पल भर में, हम अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं, और हमें समझ में नहीं आता कि हम आगे कैसे बढ़ें, या अपने विश्वास को जारी कैसे रखें। ऐसा लगता है कि हमारा विश्वास जहाँ था वहीं वापस लौट गया है, या कि हम कभी प्रभु यीशु से कभी मिले ही नहीं या उसे जानते ही नहीं। हमारी आँखों के सामने हर बात हमें हक्का-बक्का कर देती है, और हमें अनिर्णय की स्थिति में डाल देती है। फिर हम बेचैन हो जाते हैं, हतोत्साहित हो जाते हैं, और हमारे अंदर भयंकर क्रोध और अपमान पैदा हो जाता है। हम उसे बाहर निकालने का प्रयास करते हैं, कोई तरीका ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं, और, उससे भी अधिक, हम अपने उद्धारकर्ता यीशु की प्रतीक्षा करना जारी रखने का प्रयास करते हैं ताकि उसके सामने हम अपने दिल की बात कह सकें। यद्यपि ऐसे अवसर भी आते हैं जब हम बाहर से संतुलित दिखाई देते हैं, न तो घमंडी, न ही विनम्र, तब भी अपने हृदयों में हम नाकामी की ऐसी भावना से व्यथित हो जाते हैं जैसे पहले कभी नहीं हुए। यद्यपि कभी-कभी हम बाहरी तौर पर असामान्य रूप से शांत दिखाई दे सकते हैं, किंतु भीतर हम तूफ़ानी समुद्र की जैसी यातना का अनुभव करते हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें हमारी सभी आशाओँ और स्वप्नों से वंचित कर दिया है, और हमारी अनावश्यक इच्छाओं से रहित कर दिया है, हम यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि वह हमारा उद्धारकर्ता है और हमारा उद्धार करने में सक्षम हैं। उसके न्याय एवं ताड़ना ने हमारे और उसके बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है और कोई उसे पार करने को तैयार नहीं है। उसके न्याय और ताड़ना के कारण पहली बार हमने इतना अधिक नुकसान और अपमान झेला है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें वास्तव में परमेश्वर के आदर और मनुष्य के अपराध की असहष्णुता को पहचानना सिखाया है, जिसकी तुलना में हम बहुत अधम और अशुद्ध हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने पहली बार हमें अनुभव कराया है कि हम कितने अभिमानी और आडंबरपूर्ण हैं, और कैसे मनुष्य कभी परमेश्वर की बराबरी नहीं कर सकता, और उसके समान नहीं बन सकता है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे भीतर यह उत्कंठा उत्पन्न की है कि हम ऐसे भ्रष्ट स्वभाव में अब और न रहें, और हमारे भीतर ऐसे स्वभाव तथा सार से जितना जल्दी हो सके छुटकारा पाने की, और आगे उसके द्वारा तिरस्कृत और उसके लिए घृणित न होने की इच्छा उत्पन्न की है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें ख़ुशी-ख़ुशी उसके वचनों का आज्ञापालन करने लायक बनाया है, और इस लायक बनाया है कि हम उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के विरुद्ध विद्रोह न करें। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें एक बार फिर जीवित रहने की इच्छा दी है, और उसे हमारे उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने की प्रसन्नता दी है...। हम विजय के कार्य से बाहर निकल गए हैं, नरक से बाहर आ गए हैं, मृत्यु की छाया की घाटी से बाहर आ गए हैं...। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें, लोगों के इस समूह को जीत लिया है! उसने शैतान पर विजय पाई है, और अपने सभी शत्रुओं को पराजित कर दिया है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना' से उद्धृत

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