237 अब मैं जाग गई हूँ

1 प्रभु में उन तमाम वर्षों की अपनी आस्था में, मुझे लगता था कि उद्धार बहुत सरल है। मुझे लगता था कि अगर तुम अपनी ज़बान से प्रभु को स्वीकार करते हो और अपने दिल में उसके प्रति आस्था रखते हो, तो तुम्हारे पापों को माफ़ कर दिया जाएगा। मैंने केवल मेहनत करने पर ध्यान केंद्रित किया लेकिन कभी भी प्रभु के वचनों का अभ्यास नहीं किया। मुझे लगता था कि मैं तो प्रभु को प्रेम करने वालों में हूँ और उसके प्रति निष्ठावान हूँ। मैं अक्सर प्रभु के सामने अपने पापों को स्वीकार करती लेकिन मैंने खुद को कभी नहीं जाना। सभाओं में मैं बाइबल का ज्ञान बघारती, लेकिन ख़ुद मुझे प्रभु का कोई ज्ञान नहीं था। मुश्किलों और परीक्षण में, मैंने प्रभु को गलत समझा और उसे दोषी ठहराया। मैं बहुत विद्रोही और विरोध करने वाली इंसान थी, फिर भी मानती थी कि मुझे स्वर्ग के राज्य में आरोहित किया जा सकता है।

2 सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के वचनों के ज़रिये आख़िरकार मैं जाग गई हूँ। मेरे अच्छे प्रतीत होने वाले व्यवहार का मतलब यह नहीं है कि मेरा स्वभाव बदल गया है। सिद्धांत के बारे में बात करने का अर्थ सत्य को समझना या वास्तविकता का होना नहीं है। परमेश्वर के ज्ञान के अभाव में, मेरे अंदर अभी भी सत्य और जीवन की कमी है। अपने विश्वास में मैं अभी भी परमेश्वर के साथ सौदेबाज़ी करती हूँ, उसका विरोध करती हूँ, उसे धोखा देने की कोशिश कर रही हूँ। मैं पाखंडी फ़रीसियों से अलग कैसे हूँ? अगर परमेश्वर के न्याय का उद्धार न होता, तो मैं नष्ट होने के लिए अभिशप्त हो जाती। परमेश्वर का न्याय और ताड़ना प्राप्त करना एक विशेष उपकार है।

3 परमेश्वर के न्याय से मैंने जान लिया है कि मेरी प्रकृति बहुत ही स्वार्थी और नीच है। मैं पश्चाताप से भरी परमेश्वर के सामने साष्टाँग दंडवत करती हूँ। न्याय को स्वीकार करके, मैं शुद्ध हो गई हूँ और मैंने उद्धार प्राप्त कर लिया है। मैंने देख लिया है कि परमेश्वर का न्याय उद्धार है, प्रेम है। मैं न्याय और ताड़ना से, परीक्षण और शुद्धिकरण से और अधिक गुज़रना चाहती हूँ। मैं सत्य का अनुसरण करने के लिए हर चीज़ का त्याग करके, परमेश्वर का भय मानने वाली और बुराई से दूर रहने वाली इंसान बनना चाहती हूँ। परमेश्वर का धार्मिक और पवित्र स्वभाव इंसान की स्तुति के योग्य है। मैं अनंत काल तक परमेश्वर की स्तुति और आराधना करना चाहती हूँ!

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