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14. प्रकटनों पर मानव प्रकृति का निर्णय ​नहीं किया जा सकता है

यांग रुई युसी सिटी, शांग्जी प्रांत

एक दिन, अचानक मुझे पता चला कि मेरे पिता को कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया था। मैं उस समय बिल्कुल अचंभित थी और इसे समझ नहीं पाई थी। मेरे दिल में, मेरा पिता दुनिया के सबसे महान आदमी थे। भले ही उनका गुस्सा बहुत बुरा है, फिर भी वह हम बहनों की देखभाल करते थे और कभी भी हमें मारते या डांटते नहीं थे। हमारे परिवार के संघर्षों के बावजूद, हम कभी भी हमें रुष्ट नहीं होने देते थे, फिर चाहे उन्हें कितनी ही पीड़ाएं क्यों न सहनी पड़े। हमारे पूरे परिवार के परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लेने के बदा, मेरे पिता अपने कर्तव्य को पूरा करने में अग्रसक्रिय हो गए थे, और अक्सर ही हमें हमारे खुद के कर्तव्यों को उचित रूप से पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे। भले ही मेरे पिता कभी—कभी थोड़े उग्र हो जाया करते थे, लेकिन जैसे ही पूरा करने के लिए कोई कर्तव्य मिलता था, तो हवा और पानी या फिर भी हद तक की कठिनाई के बाद भी, वह उसे पूरा करने का रास्ता खोज लिया करते थे। ​ऐसे अच्छे व्यक्ति को कैसे निष्कासित किया जा सकता है? अगर वह उद्धार हासिल नहीं कर सकते हैं, तो कौन कर सकता है? इस स्थिति ने मेरे दिल को अपमान और विरोध से भर गया था, क्योंकि मुझे लगा कि कलीसिया ने मेरे पिता के साथ उचित बर्ताव नहीं किया था। भले ही, मैं यह नहीं कहती थी, लेकिन मेरे दिल को शांत होने में कठिनाई हो रही थी और मैं संताप में तड़प रही थी।

कुछ दिन पहले, मैंने परमेश्वर के निम्न वचन पढ़ें: “ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में तुम्हारे इतने वर्षों से विश्वास में, तुमने कभी किसी को श्राप नहीं दिया हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी तुम्हारी मसीह के साथ संगति में, तुम सच नहीं … मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते हो; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और भयावक हो। यदि तुम खासकर अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाया, फिर भी तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो और उसके साथ शान्ति से नहीं हो, तब भले ही तुम अपने … माता और घराने की अच्छी देखभाल की हो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। यदि तुम मनुष्य के अनुरूप हो या कुछ अच्छे काम कर सकते हो तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। … क्या तुम सोचते हो कि अच्छे काम तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकते हैं?” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “क्वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं” से) परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मैं धीरे—धीरे समझ गई: यह देखने के लिए व्यक्ति धर्मी है या फिर अधर्मी, यह मत देखो कि उसका बाहरी बर्ताव अच्छा है या बुरा,या दूसरे लोगों के साथ उसका संबंध कैसा है। बल्कि, यह देखो कि परमेश्वर के साथ उसका संबंध कैया है, और क्या वे सच में परमेश्वर का अनुपालन करते हैं और उससे डरते हैं। एक व्यक्ति अंतरवैयक्तिक संबंध चाहे कितना भी अच्छा क्या न हो, अगर वे मसीहा के अनुकूल नहीं हो सकते हैं और उसके वचनों का अनुपालन नहीं कर सकते हैं, तो वे अधर्मी हैं। अपने पूर्व के पंथ में, मेरे पिता एक अगुआ थे। परमेश्वर के कार्य के इस चरण को स्वीकार करने के बाद, इस कलीसिया के भाइयों और बहनों ने उसे एक अगुआ के रूप में नहीं चुना क्योंकि उनकी प्रकृति बहुत ज्यादा अहंकारी थी। भले ही वह ऊपरी तौर पर आज्ञाकारी लगते थे और उन्हें जो भी कहा जाता था वह करते थे, लेकिन उनका छिपा हुआ मकसद एक बार फिर से अगुआ के “ताज” पर बैठने के लायक बनना था। बाद में, जब उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई, तो उन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया, कलीसिया में हमेशा ही बेहद दंभी बर्ताव किए करते थे, कभी किसी न नहीं सुनते, और चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन हमेशा जबरदस्ती लोगों को अपनी बात सुनाते। अगर ​वह किसी भी ऐसे कर्मी को देखते जो उन्हें पसंद नहीं था, तो वह उसकी आलोचना, अपमान करते और उसे नीचा दिखाते। ... क्या इस तरह का बर्ताव अधर्म नहीं है? अगर वह वाकई में अगुआ बन गए हो, तो क्या वह कलीसियों को क्षति न पहुंचाते और भाइयों एवं बहनों को नुकसान न पहुंचाते? मैं अपने पिता की प्रकृति और सार नहीं जानती थी, और हमेशा ही बाहरी तौर पर उनकी बातों और कामों से भ्रमित रहा करती थी और उनके पैत्रिक प्रेम से अंधी हो गई थी। मैं लोगों को परखने में बहुत बुरी थी। जैसा कि परमेश्वर ने कहा था: “मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है-भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे” से) परमेश्वर के वचनों के अनुसार, मेरे पिता का बर्ताव परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्था का पालन करना नहीं था, साथ ही इससे विघ्न पैदा हो रहा था। इस तरह का सार वह है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। फिर भी, मैंने बाहरी तौर पर उनके चरित्र का प्रयोग किया, जैसे कि मेरी परवाह करना और मेरा ध्यान करना, अपने कर्तव्य पूरा करने में सक्षम होना, यह परखना कि वह अच्छे व्यक्ति हैं, यह सोचना कि कलीसिया को उन्हें निष्कासित नहीं करना चाहिए था। हालांकि, बाहरी तौर पर उनके अच्छे कर्म परमेश्वर के अनुपालन करने के समान नहीं था और इसके अतिरिक्त इसे धर्मी नहीं कहा जा सकता। केवल वे जो यथार्थ रूप से परमेश्वर के आयोजन का पालन करते हैं और इच्छापूर्वक परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करते हैं, और अपने स्वभाव के बदलाव का प्रयास करते हैं, वे ही उद्धार हासिल कर सकते हैं। मेरे पिता आज जिस स्थिति में हैं, उसके लिए दोषारोपण करने के लिए उनके पास खुद उनके अलावा कोई नहीं था। इसके साथ ही, यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का प्रकाशन था।

हे परमेश्वर! मेरे आसपास के गलत दृष्टिकोण को बदलने के लिए इस वातावरण का प्रयोग करने और मुझे सच का यह पहलू देने के लिए, और मुझे तुम्हारी पवित्रता दिखाने और यह दिखाने के लिए तुम्हारा धन्यवाद कि तुम्हारे धर्मी और प्रतापी स्वभाव का विरोध किसी को भी नहीं करना चाहिए। इससे मैं यह समझ गई हूं कि मैं सच के बिना चीजों में अंतर नहीं कर सकती हूं या उनके पार नहीं देख सकती हूं। अब से, मेरे साथ चाहे कुछ भी घटित हो, मैं किसी भी व्यक्ति पर उसकी बाहरी प्रकटन के आधार पर फैसला नहीं करूंगी। मुझे सत्य का परिप्रेक्ष्य लेना है और तुम जो भी करते हो वह सबकुछ स्वीकार करना है। भले ही तुम जो चीजें करते हैं, मैं उसके परे न देख सकूं, लेकिन मैं भरोसा करूंगी कि तुम जो भी करते हो, वह सही है। मैं अब से एक व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से विश्लेषण और परीक्षण नहीं करूंगी। मैं सत्य के पक्ष में खड़ी रहूंगी, तुम्हारी गवाही देने के लिए खुद को लगातार सतर्क रखते हुए।

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