मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 19.परमेश्वर की सर्वसामर्थता और व्यावहारिकता को कैसे समझें

यह जो मनुष्य नाम का प्राणी है, यह परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम है, अतः आप इससे क्या जान सकते हैं? कुछ लोग पूछते हैं: “परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया था तो क्या परमेश्वर मनुष्य को उसे धोखा देने से नहीं रोक सकता है? मनुष्य क्यों अभी भी परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम है?” यह एक समस्या है, है कि नहीं। इस मामले में आप यहाँ पर कौन सी समस्या को देख सकते हैं? परमेश्वर के पास एक व्यावहारिक पहलू है, किन्तु उसके पास एक सर्वसामर्थी पहलू भी है।यदि मनुष्य को शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया होता, तो वे तब भी परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम होते। इस मनुष्य नाम के प्राणी की अपनी कोई इच्छा है ही नहीं: उन्हें परमेश्वर की आराधना कैसे करनी चाहिए, उन्हें शैतान का तिरस्कार कैसे करना चाहिए, और उसकी बुराई के साथ जुड़ना नहीं चाहिए। उन्हें परमेश्वर की आज्ञाओं को मानना चाहिए, परमेश्वर के पास सत्य, जीवन और मार्ग है, और परमेश्वर का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। ये चीज़ें मनुष्य के भीतर नहीं हैं, और वे चीज़ें मनुष्य के अधिकार में बिलकुल भी नहीं हैं जो शैतान के स्वभाव को समझ सकती है। आदि में, मनुष्य के भीतर कुछ भी नहीं था, इस प्रकार वे किसी भी समय और किसी भी स्थान पर परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम थे। आज के समय में तो लोग और भी सक्षम हैं, क्योंकि वे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिये गये हैं और उनके अंदर शैतानी दोष आ गये हैं। वे तो और भी अधिक आसानी से परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम है। यही वह समस्या है। इस समस्या के सम्बन्ध में आप क्या देख सकते हैं? परमेश्वर का अपना सर्वसामर्थी पहलू है, और साथ ही उसका व्यावहारिक पहलू भी है। यदि आप केवल परमेश्वर का व्यावहारिक पहलू ही देखते हैं, और आप उसकी सर्वसामर्थता को नहीं देख सकते हैं, तो आपके लिए परमेश्वर को धोखा देना और बस एक धर्मी पुरुष के रूप में उसका आदर करना आसान होगा; यदि आप परमेश्वर के उस पहलू की ओर देख रहे हैं जो सर्वसामर्थी है, किन्तु आप उसके व्यावहारिक पहलू को नहीं देख सकते हैं, तो आप आसानी से परमेश्वर की अवहेलना करेंगे। यदि आप परमेश्वर के पहलुओं में से किसी एक को भी देखने में असमर्थ हैं, तो आप बहुत आसानी से उसकी अवहेलना करेंगे। इसलिए, यह कहा जाता है: “क्या परमेश्वर को समझना संसार में सबसे कठिन काम नहीं है?” इंसान परमेश्वर को जितना अधिक समझेंगे , उतना ही अधिक वे परमेश्वर की इच्छा को और जो कुछ भी वह करता है उसके महत्व को समझेंगे। किन्तु मनुष्य परमेश्वर को समझे, उसकी वास्तविकता यह है: मनुष्य कभी भी पूरी तरह से परमेश्वर को नहीं समझ सकता है। यद्यपि परमेश्वर का एक व्यावहारिक पहलू है, फिर भी मनुष्य के लिए पूरी तरह से परमेश्वर को समझना कभी भी सम्भव नहीं है। परमेश्वर अति महान है, वह इतना अद्भुत और इतना जटिल है कि उसकी गहराई को जाना नहीं जा सकता है, जबकि मनुष्य के विचार बहुत ही सीमित है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मनुष्य परमेश्वर के सामने सर्वदा छोटे बच्चों के समान ही रहेगा। यह इस कारण से है।

परमेश्वर कुछ कहता है या कुछ कार्य करता है और लोग हमेशा ग़लत समझते हैं और सोचते हैं, “परमेश्वर ऐसे कैसे काम कर सकता है? परमेश्वर सर्वशक्तिमान है!” मनुष्य के भीतर लगातार युद्ध चलता रहता है। परमेश्वर के द्वारा संसार के दुख-भोग का अनुभव करने के सम्बन्ध में, कुछ लोग सोचते हैं: “यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है तो उसे संसार के दुखों का अनुभव करने की क्या आवश्यकता है? क्या वह पहले से ही नहीं जानता है कि संसार का दुख कैसा है? क्या परमेश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है? क्या उसे अभी भी इसका अनुभव करने की आवश्यकता है?” यह परमेश्वर के कार्य के व्यावहारिक पहलू से सम्बन्धित है। क्रूसारोहण की यातना को इसीलिये सहा गया ताकि मनुष्य को छुटकारा दिया जा सके, फिर भी मनुष्य परमेश्वर को नहीं समझता है और हमेशा यह कहते हुए परमेश्वर के विषय में कुछ अवधारणाएं बना लेता है: “सारी मानवजाति को छुड़ाने के लिए परमेश्वर को शैतान से केवल यह कहना था, ‘मैं सर्वशक्तिमान हूँ। तू मानवजाति को मेरे पास आने से रोकने की हिम्मत करता है ? तुझे उन्हें मुझे देना ही होगा।’ इन कुछ वचनों के साथ हर चीज़ का समाधान किया जा सकता था-क्या परमेश्वर के पास अधिकार नहीं था? कुल मिलाकर परमेश्वर को बस इतना कहने की आवश्यकता थी कि मानवजाति को मुक्त किया जाता है और मनुष्य के पापों को क्षमा किया जाता है, तो मनुष्य निष्पाप हो जाता। क्या इन चीज़ों का निर्णय परमेश्वर के वचनों के द्वारा नहीं लिया गया था? यदि परमेश्वर के वचनों से स्वर्ग एवं पृथ्वी और सभी वस्तुएं अस्तित्व में आ गई थीं, तो परमेश्वर इस मुद्दे को क्यों नहीं सुलझा सका? क्यों उसे स्वयं ही क्रूस पर चढ़ने की आवश्यकता पड़ी थी?” परमेश्वर का सर्वसामर्थी पहलू और उसका व्यावहारिक पहलू दोनों यहाँ पर कार्य कर रहे थे। उसके व्यावहारिक पहलू के सम्बन्ध में, देहधारी परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपने साढ़े-तैंतीस सालों में अत्यधिक दुख सहा था, और अंत में क्रूस पर लटका दिया गया जब तक कि उसका सारा लहू सूख नहीं गया। उसने बहुत ही भयानक दुख सहा किन्तु उसके बाद पुनर्जीवित हो गया। परमेश्वर का पुनरुत्थान उसकी सर्वसामर्थता का ही एक पहलू था। उसने कोई संकेत नहीं किया था, या कोई लहू नहीं बहाया था या वर्षा नहीं की थी और यह नहीं कहा था कि यह एक पापबलि है। उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया था, बल्कि उसने सम्पूर्ण मानवजाति से सम्पर्क करने के लिए व्यक्तिगत रूप में देहधारण किया था और उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था, ताकि मानवजाति इस कार्य को जान पाए। इस कार्य की वजह से, मानवजाति परमेश्वर को जान पाई कि परमेश्वर ने उसे छुटकारा दिया है और यह प्रमाण है कि परमेश्वर ने वस्तुत: मनुष्य को बचाया है।कोई भी देहधारण उस कार्य को क्रियान्वित करे या यदि आत्मा स्वयं उस कार्य को सीधे तौर पर करे, यह जरूरी है। इसका अर्थ है कि चीज़ों को इस रीति से करने से उस कार्य को बहुत ही मूल्यवान और महत्वपूर्ण बना दिया जाता है, और चीज़ों को केवल इस रीति से करने से ही मानवजाति उसके लाभों की फसल काट सकती है। यह इसलिए है क्योंकि सम्पूर्ण मानवजाति परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि शैतान के साथ युद्ध करने और उसे अपमानित करने के लिए ही मानवजाति का प्रबंधन किया गया था। और वास्तव में, क्या यह अंत में मनुष्य के लिए अच्छा नहीं है? यह इतना मूल्यवान और महत्वपूर्ण है कि मनुष्य को इसका उत्सव मनाना चाहिये। क्योंकि जिन्हें पूर्ण कर दिया गया है वे एक समूह के लोग हैं जो परमेश्वर की एक समझ के साथ क्लेश से निकलकर आए हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया गया है और जो शैतान की भ्रष्टता से होकर आए हैं; अतः इस कार्य को निश्चित रूप से इसी रीति से ही किया जाना चाहिए। परमेश्वर कार्य की प्रत्येक अवस्था में किस पद्धति को नियोजित किया जाए उसका निर्णय मानवजाति की आवश्यकताओं पर आधारित होता है। परमेश्वर का कार्य निश्चित रूप से किसी पुराने तरीके से सम्पन्न नहीं होता है। परन्तु लोगों की अपनी एक पसंद और अपनी अवधारणाएं होती है। उदाहरण के लिए, क्रूसारोहण के सम्बन्ध में, लोग सोचते हैं: “परमेश्वर को क्रूस पर चढाये जाने का हमारे साथ क्या लेना देना?” वे सोचते हैं कि कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर को क्रूस पर चढ़ना ही था। क्रूस पर चढ़ना उस समय का सबसे हृदयविदारक कष्ट , था कि नहीं? क्या आत्मा को क्रूस पर चढ़ाया जा सकता था। अगर आत्मा को क्रूस पर चढ़ाया जाता तो उसे दर्द का एहसास नहीं होता, वह परमेश्वर का प्रतिनिधि रूप नहीं हो पाता और परमेश्वर के लिए एक प्रतीक नहीं बन सकता था, और न ही वह लहू बहाने में सक्षम हो पाता। आत्मा से लहू नहीं बह सकता; केवल देह से लहू बह सकता है और उसका बहुमूल्य लहू पापबलि का प्रमाण था। उसकी देह पापमय देह की समानता में आ गई और उसने मानवजाति के बदले में कष्ट सहा था। आत्मा को क्रूस पर कीलों से जड़ा नहीं जा सकता था, अतः आत्मा मानवजाति के बदले में कष्ट नहीं सह सकती थी और मनुष्य को पापों से मुक्त नहीं कर सकती थी। यह मानवजाति के लिए किया गया था और यह परमेश्वर का व्यावहारिक पहलू है। किन्तु परमेश्वर इसे कर सकता था, वह मनुष्य से प्रेम कर सकता था, यह कुछ ऐसा था जिसे मनुष्य के द्वारा स्वयं हासिल नहीं किया जा सकता था, अतः यहां परमेश्वर की सर्वसामर्थता कार्य कर रही थी। ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह परमेश्वर है और यह कि उसके पास सर्वसामर्थता का पहलू है? परमेश्वर के प्रत्येक कार्य में उसकी सर्वसामर्थता का पहलू समाविष्ट है, और साथ ही उसमें उसकी व्यावहारिकता का पहलू भी समाविष्ट है। परमेश्वर की सर्वसामर्थता उसका सार-तत्व है, किन्तु साथ ही उसकी व्यावहारिकता भी उसके सार-तत्व के एक पहलू को साकार करती है; ये दोनों पहलू अविभाज्य हैं। परमेश्वर वास्तविकता में जिन कार्यों को क्रियान्वित करता है उन कार्यों में उसका व्यावहारिक पहलू कार्यरत है, और यह कि वह इस रीति से कार्य कर सकता है, यह उसकी सर्वसामर्थता का पहलू है। उसकी सर्वसामर्थता के पहलू के बिना आप नहीं कह सकते कि परमेश्वर वास्तविकता में कार्य करता है, कि परमेश्वर व्यावहारिक है, कि उसका व्यावहारिक पहलू कार्यरत है। आपकी व्याख्या के अनुसार, यह एक नियम बन जाता है। यह उसकी सर्वसामर्थता और उसकी व्यावहारिकता दोनों का पहलू है। जो कुछ भी परमेश्वर करता है उसमें उसकी सर्वसामर्थता और उसकी व्यावहारिकता, दोनों पहलू समाविष्ट होते हैं, और यह सब कुछ उसके सार-तत्व के आधार पर किया जाता है; यह उसके स्वभाव का एक प्रकटीकरण है, और यह उसके सार-तत्व और जो वह है उसका एक प्रकाशन है। लोग सोचते हैं कि अनुग्रह के युग में परमेश्वर दया और प्रेम है; किन्तु अभी भी उसका क्रोध बरकरार है। उसका न्याय, उसके द्वारा फरीसियों और सारे यहूदियों को कोसना-क्या यह उसका क्रोध एवं धार्मिकता नहीं है? आप नहीं कह सकते कि अनुग्रह के युग में परमेश्वर दया एवं प्रेम है, कि मूलत: उसके अंदर क्रोध नहीं है, कोई न्याय या अभिशाप वचन नहीं हैं-ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते है। उस युग में परमेश्वर का कार्य कुल मिलाकर उसके स्वभाव का एक प्रकटीकरण था। जो कुछ उसने किया जिसे मनुष्य देख सकता था वह यह साबित करने के लिए था कि वह स्वयं परमेश्वर है और यह कि वह सर्वसामर्थी है, और यह साबित करने के लिए था कि स्वयं उसके पास ही परमेश्वर का सार-तत्व है। क्या इस अवस्था के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अर्थ था कि उसके पास कोई दया या प्रेम नहीं है। अभी भी उसके पास दया एवं प्रेम है। यदि आप सिर्फ एक प्रकार की शब्दावलियों को ही इस्तेमाल करते हैं, या परमेश्वर के सार-तत्व और स्वभाव को सामान्य रूप देने के लिए एक या दो वाक्यों का ही उपयोग करते हैं, तो आप वास्तव में अज्ञानी हैं-आप परमेश्वर को नहीं जानते हैं! कुछ लोग कहेंगे: “कृपया परमेश्वर को समझने की सच्चाई के विषय में हमसे बात कीजिए। कृपया हमें इसे साफ तौर पर समझाइए।” एक व्यक्ति जो परमेश्वर को समझता है क्या कहेगा? “परमेश्वर की समझ बहुत ही गम्भीर है। इसे एक या दो वाक्यों में प्रकट नहीं किया जा सकता है, या उसके विषय में एक या दो दिनों तक बात करके नहीं समझा जा सकता है।” इसे जानने को कुछ समझ रखने के रूप में गिना जा सकता है-मनुष्य परमेश्वर को कभी भी पूरी तरह से नहीं जान सकता है। ऐसे लोग जो अहंकारी हैं और जो परमेश्वर को नहीं समझते हैं, वे कहेंगे: “हाँ वास्तव में मैं जानता हूँ कि वह किस प्रकार का परमेश्वर है: मैं परमेश्वर को जानता हूँ और उसे समझता हूँ।” कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिनका मनुष्य ने अनुभव नहीं किया है, कुछ तथ्य हैं जिन्हें उन्होंने नहीं देखा है और इस प्रकार उनके पास उनकी वास्तविक समझ नहीं हो सकती है और उनके पास उनका सच्चा एहसास नहीं हो सकता है, इन चीज़ों के अर्थ को जानना उन्हें बहुत ही अमूर्त्त लगेगा। एकमात्र चीज़ जिसे वे जो नहीं समझते हैं सुनते हैं वह एक तरह की व्याख्या है; उनके पास सैद्धांतिक समझ हो सकती है, किन्तु वास्तविक समझ नहीं हो सकती है। सिर्फ इसलिए कि आप नहीं समझते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि वे सत्य नहीं हैं। उनके लिए जिनके पास अनुभव नहीं है, यह मानो ऐसा है कि वे चीज़ें अमूर्त्त हैं और समझने में कठिन हैं, जबकि वास्तव में वे बिलकुल भी अमूर्त्त नहीं है। यदि आपके पास सच्चा अनुभव है, तो आप जानेंगे कि परमेश्वर का कोई भी वचन किस सन्दर्भ से सम्बन्धित है, और आप जानेंगे कि कोई चीज़, कोई समझ और कोई पहलू जिसके विषय में परमेश्वर बात करता है, किस स्थिति से सम्बन्धित है, और वह किसकी ओर संकेत करता है, और तब आप अपनी स्मरण-शक्ति से कुछ समझदारी का उद्धरण दे सकते हैं। यदि आप केवल वचनों को सुनते हैं, यदि आपके पास बिलकुल भी व्यावहारिक समझ नहीं है, यदि आपकी स्मरण-शक्ति में आपको कोई समझ नहीं है, तो आपके लिए उन्हें स्वीकार करना कठिन होगा और, जब एक बार आप उन्हें स्वीकार कर लेते हैं, तो आप तब भी महसूस करते हैं कि वे बस एक प्रकार की व्याख्या है। यह पूरी तरह कुछ ऐसा है जिसका अनुभव किया जाना होता है और यह एक कौशल या ज्ञान नहीं है जिसका अध्ययन किया जा सकता है। सम्पूर्ण मानवजाति का उद्धार करना, सम्पूर्ण मानवजाति को पापों से छुटकारा देना-यह परमेश्वर का सर्वसामर्थता का पहलू है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर महज खाली बैठा रहता है और कहता है कि वह सर्वशक्तिमान है। उसकी सर्वसामर्थता में वास्तविकता में किए गए कार्य शामिल होते हैं। कार्य करते हुए, परमेश्वर मनुष्य को जीत लेता है, वे उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं और वे उसकी आज्ञा मानने योग्य बन जाते हैं। यदि परमेश्वर की सर्वसामर्थता या उसकी व्यावहारिकता के विषय में, एक-दूसरे से स्वतंत्र होकर बोला जाये तो, तो मनुष्य उन्हें समझने में असमर्थ होगा : इन दोनों पहलुओं को एक ही साथ समझा जाना चाहिए। परमेश्वर वास्तविकता में कार्य करता है, वह अपने स्वयं के स्वभाव को और जो वह है, उसे प्रकट करता है। जो काम मनुष्य नहीं कर सकता है, वह कर सकता है, और यह सर्वसामर्थता के उसके पहलू से सम्बन्धित है। परमेश्वर के द्वारा स्वयं इस कार्य को करना उसका व्यावहारिक पहलू है, और ये दोनों पहलू मिलकर कार्य करते हैं। परमेश्वर जो वचन बोलता है उसमें उसकी सर्वसामर्थता का पहलू समाविष्ट है और वह अपने अधिकार को काम में लाता है, और जो वह कहता है कि वह पूरा करेगा तो उसे पूरा करता है। और अंतिम परिणाम क्या होगा, यह सबको पता है; जैसे ही वह इन वचनों को बोलता है, उसकी सर्वसामर्थता प्रकट हो जाती है। इसे मत भूलिए, परमेश्वर का सार-तत्व सर्वसामर्थी और व्यावहारिक दोनों है, और ये दोनों पहलू एक दूसरे के पूरक हैं। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह उसके स्वभाव का प्रकटीकरण और जो वह है उसका प्रकाशन है। जो वह है उसमें उसकी सर्वसामर्थता, उसकी धार्मिकता और उसका प्रताप शामिल है। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर ने योना को नीनवे शहर जाने को कहा था, और इससे साबित होता है कि परमेश्वर का एक व्यावहारिक पहलू है। परन्तु योना ने नहीं सुना और, अंत में, व्हेल मछली के पेट में तीन दिनों के लिए उसका जीवित बचे रहना परमेश्वर की सर्वसामर्थता का कार्य था। जो कुछ परमेश्वर ने योना के साथ किया था वह प्रकट करता है कि परमेश्वर सर्वसामर्थी है। प्रारम्भ से लेकर अंत तक परमेश्वर का कार्य उसके स्वयं के सार-तत्व का प्रकशन है और जो वह है उसका प्रकटीकरण है। उसके सार-तत्व के दो पहलू हैं: एक उसकी सर्वसामर्थता का पहलू है, दूसरा उसकी व्यावहारिकता का पहलू है। इन दोनों पहलुओं को आप परमेश्वर के कार्य की किसी भी अवस्था में देख सकते हैं, और आप देख सकते हैं कि ये दोनों पहलू हर चीज़ में हैं जो परमेश्वर करता है।यह परमेश्वर को समझने का एक मार्ग है।