मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 47. कसौटियों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें

मैं आपके चिंतन के लिए कुछ सवाल उठाता हूँ: पिछली बार से जब हमने कहा कि महान परीक्षणों के सात वर्ष और होंगे, चाहे यह कठिनाई के हों या आपदा के, क्या आपने उस के द्वारा परमेश्वर का इरादा खोज निकाला है? इन सात साल के परीक्षणों के प्रति लोगों की प्रतिक्रियाओं और मनोवृत्तियों में आप कैसी मानवीय प्रकृति को देख सकते हैं? यह कैसे विश्लेषित किया जाएगा? इसके बारे में सोचिये। मैं प्रत्येक संगति में मानव प्रकृति के बारे में बात करता हूँ, स्रोत पर पहुंचना, मानव प्रकृति का विश्लेषण और सार का विश्लेषण करना। यह तब आपके ऊपर निर्भर है कि आप इन विषयों की अपनी समझ के बारे में बातचीत करें।

आप लोगों को परमेश्वर के इरादे को समझने में सक्षम होना चाहिए और सात साल के परीक्षणों के माध्यम से मानव स्वभाव को अवश्य जान लेना चाहिए। वास्तव में, परमेश्वर के हर वाक्य में उनका इरादा निहित है, जिसके भीतर सत्य छिपा है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस मुद्दे पर सहभागिता की जा रही है, या क्या सच्चाई व्यक्त की जा रही है, उसमें शामिल हैं वह पथ जिस पर लोगों को चलना चाहिए, लोगों पर परमेश्वर की मांग, और खोज के लिए परमेश्वर का इरादा। परीक्षणों, प्रतिकूल परिस्थितियों और तत्पश्चात होने वाली पीडाओं की इस बात में, लोगों से परमेश्वर की मांगें और परमेश्वर का इरादा भी सम्मिलित है। लोग, यक़ीनन, उनके व्यवहार के द्वारा प्रतिक्रिया करते हैं, क्योंकि लोग काठ के बने नहीं हैं; वे जीवित हैं, और हर बात के लिए उनकी एक प्रतिक्रिया है। क्या यह योग्य है कि इसका विश्लेषण किया जाए कि लोगों की प्रतिक्रियाओं में मानवीय स्वभाव के कौन से पहलुओं का प्रतिनिधित्व होता है? क्या इसके बारे में समागम करना योग्य है? विश्लेषण लोगों को उसे स्पष्ट रूप से देखने, अपने लिए यह जानने और उनके दिल में बहुत अच्छी तरह से पता करने की अनुमति देगा, ताकि अंततः उन्हें चुनने के लिए एक सही रास्ता मिल सके। यदि कोई व्यक्ति चकराया हुआ है और परमेश्वर की मंशा नहीं जानता है, सच्चाई को नहीं समझता है, इसे और भी कम समझता है कि उन पर परमेश्वर की क्या मांगे हैं और उन्हें क्या कर्तव्य करने चाहिए, या उन्हें किस मार्ग को अपनाना चाहिए, शायद इस तरह का व्यक्ति अटल नहीं हो पाएगा। इसलिए यह जान लेना चाहिए कि बाद में विभिन्न परीक्षणों के दौरान कौन-सा रास्ता लिया जाना चाहिए।

हर बार जब भी सात साल के परीक्षणों का उल्लेख किया जाता है, ऐसे कई लोग हैं जो बहुत आकुलित और असामान्य रूप से निराश अनुभव करते हैं, और कुछ लोग शिकायत करते हैं, और काफी मिश्रित प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि लोगों को अब ऐसे परीक्षणों की आवश्यकता है, इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों और परिशोधन की आवश्यकता है। भविष्य में आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से ही लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं। सभी लोगों की यही अभिलाषा और आशा है। तथापि, मानव प्रकृति के भीतर भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में आप उत्तीर्ण नहीं होते हैं, इन पहलुओं में आपको परिष्कृत किया जाना चाहिए - यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर आपके लिए एक वातावरण बनाते है, जिससे आप अपने खुद के भ्रष्टाचार को जानने के लिए, परिष्कृत होने के लिए बाध्य हों। अंततः आप उस बिंदु पर पहुंच जाते हैं जहां आप मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देना और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करेंगे।

इसलिए यदि लोगों में कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं है, यदि उनके पास कुछ मात्रा में पीड़ा नहीं है, तो वे, देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने के लिए उनकी सोच में और उनके दिल में, सक्षम नहीं होंगे। जिन पहलुओं में आप अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हैं, जिन पहलुओं में आप अभी भी आपकी अपनी इच्छाएं रखते हैं, आपकी अपनी मांगें हैं – उन पहलुओं में ही आपको कष्ट उठाना होगा। केवल दुख में ही सबक सीखा जा सकता है, जिसका मतलब है कि सच्चाई प्राप्त करने में और परमेश्वर का इरादा समझने में सक्षम होना। वास्तव में, कई सच्चाइयों को दर्दनाक परीक्षणों के अनुभव के भीतर समझा जाता है। कोई भी नहीं कहता है कि परमेश्वर की इच्छा ज्ञात है, कि उनकी सर्वसमर्थता और उनका ज्ञान समझ लिए गए हैं, कि परमेश्वर के न्यायपरायण स्वभाव की सराहना आसानी के, या अनुकूल परिस्थितियों के, परिवेश में की जाती है। यह असंभव होगा!

परमेश्वर ने उचित परिवेश स्थापित किये हैं जिसमें वे लोगों को परिपूर्ण बनाते हैं, लेकिन यह किसी को ज्ञात नहीं कि परमेश्वर लोगों को परिष्कृत करने हेतु क्यों उनका परीक्षण करना चाहेंगे। आप सभी कहते हैं, “परमेश्वर मानवता को किस तरह प्यार करते हैं, कि वे लोगों को परिपूर्ण और परिशुद्ध करने के लिए सात साल की परीक्षाएं तैयार करेंगे! कैसे धैर्यवान! कितने दयालु हैं वे!” यह कहने की आपको कोई ज़रूरत नहीं है, हर कोई इस सिद्धांत को जानता है, लेकिन वास्तव में कोई भी वास्तविक स्थिति को नहीं समझता। परमेश्वर की सात साल की परीक्षाएँ, उनका यह सात साल का कार्य क्या हैं? बेशक, यह आवश्यक है ताकि उनका काम हो सके। आपको बचाने के अलावा भी, प्रेम है, यह ठीक है ना? जब वे आपको बचाते है, तो आप कहते हैं, “यह प्रेम है परमेश्वर का हमारे लिए, यह उनकी दया है।” अगर वे इन सात वर्षों के परीक्षणों की व्यवस्था नहीं करते, और तुरंत काम पूरा कर देते, तो क्या तब भी प्रेम न होता? अगर यह दो साल का परीक्षण होता, या एक साल का, या वह दिन तुरंत पहुंचने वाला होता, तो क्या फिर भी यह उनकी प्रेमपूर्ण दया और कृपा न होती? यह बात ऐसी नहीं जैसी कि आप कल्पना करते हैं कि: सात साल की परीक्षाओं में हमारे लिए परमेश्वर की पूर्णता है, वे हमें इतना प्रेम करते हैं; हमें समर्पण करना होगा। केवल जब कोई रास्ता नहीं होता, तभी आप यह कहते हैं। इसमें क्या निहित है? इसमें नकारात्मकता है, इसमें शिकायत होती है, और इसमें कोई विकल्प का न होना, बस हार मान लेना निहित है। परमेश्वर ने कहा कि सात साल और होंगे। तो अब सात साल होने दें। और फिर आप झटपट करते हैं और कुछ सुखद बातें कहते हैं: परमेश्वर, आप हमें प्यार करते हैं; परमेश्वर, यह हमें परिपूर्ण करने के लिए है। सात साल के परीक्षण के बिना क्या यह हमारा अंत न होता? कोई मौका नहीं होगा। कुछ लोग इसी पल आशीर्वाद पाने के लिए इंतजार नहीं कर सकते। यह एक वास्तविक लाभ होगा! ऐसे व्यक्ति को किसी और चीज की परवाह नहीं है। इस तरह का व्यक्ति एक कोड़ी भर के योग्य नहीं है। इन सात वर्षों में व्यावहारिक काम होना है। क्या यह पहले नहीं कहा गया है कि कुछ वचन एक साधन हैं, लेकिन वे सत्य भी हैं? केवल बात हो और कोई कार्यवाही नहीं, ऐसा कोई पहलू नहीं है। हर पहलू का महत्व है। इसके अलावा, जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, लगभग हर पहलू एक साधन होता है, लेकिन इस साधन का अर्थ आपको मनाना-फुसलाना नहीं है, आपको धोखा देना नहीं है। बल्कि यह वास्तविक परिस्थिति है, वस्तु स्थिति। इससे हटकर कोई दूसरा रास्ता न होगा। इन शब्दों को सुनने पर कुछ लोग सोचते हैं: यदि यह ऐसा है जैसा कि आप बताते हैं, जब ये सात साल खत्म होते हैं, तो कौन कह सकता है कि कितना समय बचा है! लोगों की प्रतिक्रियाओं से यह देखा जा सकता है कि मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि पीड़ाजनक परीक्षणों का सामना करने पर, दैहिक दर्द प्राप्त होने पर, वह भागना और इनकार करना चाहता है। कोई भी व्यक्ति सामने नहीं आता, मांग करने की पहल करते हुए: परमेश्वर, आप मुझे पीड़ा की कुछ परीक्षाएं दें, मुझे प्रतिकूल परिस्थितियाँ दें। परमेश्वर, क्या मुझे कुछ और दुख मिल सकता है? यह साबित करता है कि स्वभाव से लोग सच्चाई पसंद नहीं करते। चाहे यह परमेश्वर का इरादा है या नहीं, या लोगों के लिए कितना फायदेमंद है, चाहे यह कितना भी अच्छा हो, सभी लोग ऐसा कुछ भी स्वीकार करने से इन्कार करते हैं जो उनके शरीर में दर्द लाए या उनकी इच्छाओं से मेल न खाए। ऐसे लोग हैं जो कहते हैं: “मैं नकारात्मक नहीं हूँ। अतीत में मैंने अपना पूरा जीवन परमेश्वर को देने के लिए एक संकल्प बनाया। मैं पूरी तरह से खुश हूँ चाहे जितने साल भी और लगें, और मैं परमेश्वर की नेकदिली से सेवा करूँगा। मेरे पास कोई शिकायत नहीं है। चाहे जो भी परीक्षण सामने आता है, चाहे जो भी पीड़ा मुझे मिल रही हो, चाहे परिवार का परित्याग हो या बीमारी से कष्ट हो, मैं अंत तक पालन करूँगा।” यह कोई शिकायत का न होना भी एक तरह की नकारात्मक स्थिति है, क्योंकि हर बार जब आप के साथ कोई बात होती है, हर बार जब आपसे कुछ कहा जाता है, आप वास्तव में इसके भीतर के निहितार्थ को समझ नहीं पाते हैं। अतः यह बात “मुझे कोई प्रतिक्रिया नहीं है” जो आप कहते हैं, उदासीनता से बढ़कर कुछ और नहीं, जो एक तरीका है जब कोई रास्ता नहीं होता। इसके अलावा अन्य कुछ भी आपके लिए नहीं छोड़ा जाएगा, इसलिए आप खुद को तब भी पालन करने के लिए मजबूर करते हैं जब आप ऐसा करना नहीं चाहते। वैसे भी, कोई सात साल के परीक्षणों से पलायन करने में सफल नहीं हो सकता है। हालांकि यह आप के पलायन न करना चाहने से अलग बात है। आप पलायन करना तो चाहेंगे, पर कर नहीं पाएंगे। यह केवल मानव स्वभाव की बात है। इसके बारे में सोचें। क्या यही बात है? कुछ लोगों को लगता ​​है: जब मैंने पिछले दस सालों में इस तरह की घटना का सामना किया, तो मैंने हमेशा पालन किया, और मुझे बहुत कष्ट उठाना पड़ा, तो मुझे कुछ और वर्षों तक इसे झेल पाने में सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर के इरादे को जानने के लिए आप लोगों की खोज उलझी हुई है, और आप सब ने इसे गंभीरता से नहीं लिया है। इसलिए, अगर अंदर से आपने परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण नहीं किया हैं, तो आप ने परमेश्वर की इच्छा को धोखा दिया और उसका विरोध किया है। यद्यपि आप की यह स्थिति नहीं है और आपने यह काम नहीं किया है, ये लक्षण, आपके अंदर की ये चीजें, परमेश्वर का विरोध कर रही हैं, क्योंकि आप जो सोचते हैं और अंदर से जिसकी उम्मीद करते हैं, वह परमेश्वर की मांग बिलकुल नहीं है। इसके अलावा, परमेश्वर जो आपसे चाहते हैं और आपके लिए जो भी करते हैं उसके लिए, चाहे वह एक साधन हो या वास्तव में आपसे कही गयी कोई बात हो, आप वास्तव में अपने दिल से उनकी स्तुति नहीं कर रहे हैं।

जहाँ तक हर उस चीज़ का सवाल है जो परमेश्वर लोगों से करने के लिए कहते हैं, कोई भी ऐसी चीज़ जिसकी परमेश्वर ने लोगों के लिए उनकी आवश्यकताओं के अनुसार व्यवस्था की है, लोगों का स्वभाव इसे अस्वीकार करना है, इसे न मानना है। कोई बात नहीं कि आप अपने दृष्टिकोण की घोषणा कैसे करते हैं, या क्या आपके पास थोड़ा ज्ञान है, किसी भी मामले में, आपकी सैद्धांतिक जानकारी आपकी प्रकृति के अंदर क्या है, उसका हल नहीं कर सकती है। इसलिए मैं कहता हूं कि ज्यादातर लोग सिद्धांतों में कुछ सुखद बातें करते हैं, और इसका सामना करने के लिए कुछ सतही शब्द कहते हैं। अंततः, हालांकि, प्रार्थना में वे कहते हैं: मैंने इतने साल गुजार दिए हैं। सात वर्ष बहुत लंबे नहीं है, लेकिन यह छोटा भी नहीं। आप देखें, कि मैं कितना बूढ़ा हो रहा हूँ, मैं कितना अस्वस्थ हूँ, और मेरे पास एक अच्छा परिवार भी नहीं है। मैं आपके साथ इन वर्षों से होकर आया हूं, मैंने बिना किसी श्रेय के कड़ी मेहनत की है, मैं थका हुआ हूँ, हालांकि मैंने कड़ी मेहनत न भी की हो। यहां तक ​​कि अगर आप (परमेश्वर) इसे केवल कुछ वर्ष कम भी कर देते हैं, तो भी कृपया मेरे साथ इस एक बार दयापूर्ण व्यवहार करें! आप लोगों की कमजोरियों को जानते हैं ... इन शब्दों में प्रार्थना करते हुए, ऐसा लगता है कि इसमें थोड़ा-सा समर्पण है। वे फिर भी कहते हैं, “आप लोगों की कमजोरियों को जानते हैं”; इन शब्दों के भीतर एक और अर्थ है, जो यह कहने के बराबर है कि, आप (परमेश्वर) मनुष्य की कमजोरी को जानते हैं, तो यह इतना लंबा समय क्यों है? क्या यह लोगों के अंदर की स्थिति नहीं है? तो, आप लोगों को लगता है कि आप लोग कई चीजों को समझते हैं, पहले से ही उन्हें स्वीकार कर चुके हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि आपने सत्य को समझा है, लेकिन वास्तव में आप सब अभी भी सच्चाई का विरोध कर रहे हैं, और इस के खिलाफ जा रहे हैं। जो चीजें आप लोग करते हैं, वे सच्चाई के अनुरूप नहीं हैं। हालांकि सतह पर आप लोगों ने एक बुरा काम नहीं किया है, और कुछ भी आक्रामक नहीं कहा है, पर यह सिर्फ प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन नहीं करने तक सीमित है, परमेश्वर के स्वभाव को नाराज न करने तक ही। अपितु, आपने उनके इरादे को नहीं समझा है और आप इसे प्राप्त करने के लिए समर्पित नहीं हैं। उनका इस तरह से करना आप स्वीकार नहीं करते। आप सोचते हैं: यदि मुझे यह काम करना ही है, तो मैं समय बर्बाद न करते हुए कम से कम अवधि में इस काम को पूरा करूँगा, ताकि परमेश्वर के लोगों को बड़े लाल अजगर के द्वारा और अधिक उत्पीड़न से बचने में, बहुत-सी जन-हानि को रोकने में, मेरे दुख से बचने में मदद की जा सके। क्या लोगों का यह विचार नहीं है। अपने दिल में सभी लोगों को परमेश्वर के राज्य के आने की, और शैतान की दुनिया के शीघ्र विनाश की, आशा करते हैं। यह कितना अच्छा होगा अगर परमेश्वर का एक वचन लोगों को बदल सकता। लोगों के भीतर की सोच, उनकी असंयत इच्छाएँ वास्तव में परमेश्वर के इरादे को पूरा नहीं कर रही हैं, और वास्तव में, उनमें समर्पण का तत्व नहीं है। यह उस वचन को भी छूता है: मानव स्वभाव के अंदर जो है उसका सौ प्रतिशत विश्वासघात है। इसलिए आप लोगों की इस या उस घटना का विश्लेषण करने में, इस मुद्दे का या उस सोच या प्रतिक्रिया का विश्लेषण करने में, चाहे आप इसका नकारात्मक तरीके से सामना करते हैं, या आप शिकायत करते हैं, चाहे आप उदासीन या चुप और अवाक हों - इन सबमें प्रतिरोध है। यह सब विश्वासघात है। क्या यह विश्लेषण सही है? यदि मैं इसका विश्लेषण न करता तो कुछ ऐसे लोग होंगे जो महसूस करते हैं: मुझे एक अच्छा व्यक्ति माना जा सकता है। अगर मुझे कुछ साल पहले इस चीज का सामना करना पड़ा होता, तो मैं निश्चित रूप से शिकायत करता और संभवतः पीछे हट जाता, लेकिन अब मैं शिकायत नहीं करता हूँ। आप शिकायत नहीं करते, लेकिन क्या आपको समझ है? क्या आपकी थोड़ी-सी समझ सही समझ का गठन करती है? क्या इसमें सच्चाई है? क्या परमेश्वर के इरादे से आपकी समझदारी मेल खाती है? क्या इसे परमेश्वर की मंजूरी मिलती है? क्या आपके पास परमेश्वर को समर्पित करने का तत्व है? क्या आप परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए इच्छुक और तैयार हैं? यदि नहीं, तो आप निश्चित रूप से परमेश्वर के साथ विवाद कर रहे हैं। ऐसा हो सकता है कि आपकी मनोदशा अभी अच्छी है, और आपको बुरा नहीं लग रहा है, या इस समय आप उपयोग में लाये जा रहे हैं। अगर एक दिन आपको घर भेजा जाता है, और जब आप निराशाजनक मनोदशा के अंधेरे में होते हैं, तो आपके अंदर जो है वह प्रकट हो जाएगा। निचले कद के कुछ लोग हैं, अनुभव की एक छोटी अवधि लिए हुए, जो पलट कर भाग जाते हैं, संसार में लौट जाने को। वास्तव में, अंतिम विश्लेषण में, आपकी जो भी प्रतिक्रिया हो, आप उन वातावरणों से इन्कार कर रहे हैं जिनकी परमेश्वर ने आपके लिए व्यवस्था की है। परमेश्वर को धोखा देने की लोगों की प्रकृति हर जगह प्रकट होती है। अगर यह विश्लेषित नहीं होता, तो लोग खुद को पर्याप्त रूप से नहीं जान पाते। जब लोग किसी भी बात का सामना करते हैं, तो वे सभी परमेश्वर को धोखा देते हैं और समर्पण नहीं करते हैं। आप में से कुछ की प्रतिक्रिया अनिच्छा है, या एक शिकायत का हाव-भाव है, नकारात्मक और निम्नगामी, और आप कहते हैं: अंदर से, मनुष्य सच पसंद नहीं करता, और यह नापसंदगी धोखा देने के अलावा अन्य कुछ नहीं है। यह अभी भी पर्याप्त नहीं है यदि आप लोग केवल इस तरह से बोलते हैं, और आपने वस्तु का गहराई से विश्लेषण नहीं किया है। आप लोग कहते हैं कि सत्य से प्रेम न करना विश्वासघात है, लेकिन वास्तव में, यह इतना आसान नहीं है। आप लोगों ने इसका विश्लेषण किस तरह किया है? आप लोग स्वयं को नहीं समझते। आपको संभवतः पता नहीं कि आपकी परिस्थिति क्या है, और आप सही को गलत से अलग नहीं कर सकते हैं, आपको पता नहीं कि यह धोखा है या नहीं, और आप खुद को स्पष्ट रूप से नहीं जानते हैं कि आपने समर्पण किया है या नहीं। आप लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों का अच्छी तरह से विश्लेषण नहीं कर सकते। हर बार जब आप लोगों के सामने कोई बात आती है, तो आप सब को पता नहीं होता कि आगे कैसे बढ़ें। आखिरकार जब आप एक परिक्षण का सामना करते हैं, तो क्या आप परमेश्वर के इरादे को गहराई से समझ पाएंगे? आपको यह कैसे समझाना चाहिए? आप को किस तरह के मार्ग पर चलना चाहिए? परमेश्वर के इरादे को पूरा करने के लिए आपके पास कौन-सा बोध और कौन से तथ्य होने चाहिए? सबसे छोटे पैमाने के रूप में एक सकारात्मक दृष्टिकोण लिया जाना चाहिए। क्या आप लोगों ने इन सवालों के बारे में सोचा है?

अतीत में कुछ लोगों की धारणाएँ थी कि अवतरित (देहधारी) परमेश्वर क्या करते हैं। इसके बाद की सहभागिता से यह एक स्वयंसिद्ध तथ्य बन गया। यह स्वयंसिद्ध तथ्य (सूक्ति) इस प्रकार है: मनुष्य को इसकी पुष्टि करनी चाहिए कि परमेश्वर जो कुछ करते हैं वह सब सही है, वह सब महत्वपूर्ण है। यदि मनुष्य को यह समझ में नहीं आ रहा है तो उन्हें समर्पण करना चाहिए और विरोध नहीं। यदि मनुष्य की अपनी अवधारणाएं हैं तो वे निश्चित ही शर्मिंदा होंगी। क्या लोग इन वचनों को याद रखते हैं? हर बार जब किसी बात का सामना करना पड़ता है, तो वे स्वयं से कहते हैं: बिलकुल, कोई अवधारणाएं न रखो, कभी भी इस पर कोई निर्णय पारित न करो। परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज का कोई अर्थ है। यद्यपि हम अभी इसे समझने में असमर्थ हैं, एक दिन हम शर्मिन्दगी से ग्रस्त हो जाएंगे। वे केवल इस तरह के एक नियम का पालन करते हैं। हालांकि, इस तरह का नियम उन विश्वासियों के लिए कुछ समस्याएं हल कर सकता है जो उलझन में हैं। एक समझदार व्यक्ति के लिए इन वचनों से बहुत सारी चीजों को समझने में मदद मिलेगी, और हर बार किसी स्थिति का सामना करते वक़्त इस नियम का इस्तेमाल बहुत सारी चीज़ों को प्रकाश में ला सकता है। अगर कोई अंतर्ज्ञान नहीं है तो क्या होगा? कोई केवल नियम का पालन कर सकता है, और ऐसा करने से कोई विपत्ति पैदा न करते हुए वह सुरक्षित हो सकता है और प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन से बच सकता है! यह नियम उपयोगी है, यह बेकार नहीं है! विभिन्न स्थानों में इस नियम को हृदयांगम किया गया है! कुछ इसे नोटबुक में लिखते हैं, या इसे पुस्तक के आवरण पर लिख रखते हैं, और हर बार जब वे किताब खोलते हैं, तो इसे पढ़ते हैं, इसे बोलते हैं। जब वे प्रार्थना करते हैं तो वे इसे पढ़ते हैं! ऐसा करने से कुछ फायदे होते हैं। कुछ लोग बेतरतीब ढंग से काम करने का दुस्साहस नहीं करते हैं, और उनके दिल में थोड़ा सम्मान होता है। फिर भी कई लोगों के संबंध में, उनके पास सकारात्मक पहलू की सही समझ नहीं है, और बहुत अधिक नकारात्मक चीजें हैं। हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि आप लोग अच्छी तरह से महसूस कर रहे हैं और आप ने काम करना बंद नहीं किया है, जाहिर है आप लोगों के भीतर कई नकारात्मक चीजें हैं, और कोई सकारात्मक चीजें नहीं हैं। इस तरह की चीजों के संबंध में कलीसिया में कितनी सारी प्रतिक्रियाएं हैं! क्या आप लोगों ने अपने आप के लिए इसे सुनिश्चित करने की कोशिश की है? अगर इस तरह की बात फिर से सामने आई, तो क्या आप लोग परमेश्वर का विरोध करेंगे या परमेश्वर को धोखा देंगे? ऐसे कुछ लोग हैं जिन्हें शायद एहसास हुआ है, “मनुष्य अपनी ही प्रकृति पर पकड़ नहीं पा रहा है। मैं निश्चित रूप से अब और विरोध करने की हिम्मत नहीं करूँगा, और मुझे सावधान रहना चाहिए। मुझे हर दिन प्रार्थना करनी चाहिए!” यह एक सुनिश्चित योजना नहीं है। मैंने पाया है कि आप लोग वास्तव में शर्मिंदा महसूस करते हैं, और अक्सर कहते हैं: “ओह, मैं इस मानव स्वभाव के बारे में क्या कर सकता हूँ? मैं खुद से इसे हल नहीं कर सकता, और इस पर एक पकड़ नहीं पा सकता हूँ। सचमुच मुझे स्वयं का प्रभारी होने का अधिकार नहीं है। मुझे नहीं पता कि मैं एक दिन क्या कर सकता हूँ। मैं मरने के जैसे भयभीत हूँ। परमेश्वर पर विश्वास बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। किसी भी लापरवाही के कारण दुर्घटना हो सकती है, और यह भयानक होगा। मुझे यह भी नहीं पता कि मैं क्या हूँ, मैं खुद पर भरोसा नहीं कर सकता ...।” हालांकि, जो लोग यह अक्सर कहते हैं उनको स्वयं की कुछ समझ है, वे फिर भी सत्य को बहुत कम समझते हैं। जब भी वे किसी चीज़ से मिलते हैं, वे भ्रमित हो जाते हैं। वे परेशान हो जाते हैं, चिंतित महसूस करते हैं, और कुछ भी होने पर, उनके पास कोई रास्ता नहीं होता। इस बार आप सात साल के परीक्षणों से गुजर चुके हैं और कोई आपदा नहीं पैदा की, प्रशासनिक नियमों को नहीं तोड़ा है, लेकिन क्या आप अगले समय के बारे में सुनिश्चित होने की हिम्मत करते हैं? आप इस प्रकार की चीज से बिना किसी अड़चन के, कैसे बच सकते हैं? आप देखते हैं कि आप आसानी से परीक्षण के दौर से निकल आए, खुद को जगह-जगह में छिपाते हुए। जब तक यह खत्म नहीं हुआ तब तक एक साल या आधे साल तक आपने खुद को छिपाए रखा। मनुष्य छिप सकते हैं, लेकिन मानव प्रकृति ऐसी है जो छिपाई नहीं जा सकती। क्या एक स्वयंसिद्ध तथ्य नहीं होना चाहिए जो कि इस पर भी लागू हो? परमेश्वर के प्रत्येक परीक्षण में उनका एक अच्छा मकसद है। हर घटना का सामना करने में ऐसी सच्चाइयां होनी चाहिए जिसके सहारे आप दृढ खड़े रह सकें। अब विभिन्न परीक्षणों का जवाब देने के लिए (आप लोग) सच्चाई से लैस बनें, और आप सब बाद में आने वाले परीक्षणों के बावजूद चिंतित नहीं होंगे। आप सब को विश्वास होना चाहिए। परमेश्वर की व्यवस्था को समर्पित होना बस गलत हो ही नहीं सकता। यह पथ आगे और अधिक आशाजनक होता जाएगा। आप विभिन्न परीक्षणों के बिना कैसे परिपूर्ण हो सकते हैं? परीक्षण के बिना, कोई गवाही नहीं है। तो आप परमेश्वर को संतुष्ट कैसे कर सकते हैं? ये सभी परीक्षण आपके लिए परमेश्वर के आशीर्वाद लाएंगे। केवल अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करने से ही कोई राज्य में प्रवेश कर सकता है। याद रखें: विपत्ति, राज्य और मसीह के धैर्य में आप सभी का एक हिस्सा है।