प्रश्न 8: व्यवस्था के युग का कार्य करने के लिए परमेश्वर ने मूसा का उपयोग किया, तो अंतिम दिनों में परमेश्वर अपने न्याय के कार्य को करने के लिए लोगों का इस्तेमाल क्यों नहीं करता है, बल्कि इस कार्य को उसे खुद करने के लिए देह बनने की ज़रूरत क्यों है? और देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं, उनमें क्या ख़ास अंतर है?

उत्तर:

ऐसा क्यों है कि परमेश्वर को अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए देहधारण करने की ज़रूरत है, जिनको सत्‍य को जानने की तीव्र अभिलाषा है और जो परमेश्वर के प्रकटन की खोज करना चाहते हैं, उनको इस प्रश्‍न में अत्‍यधिक दिलचस्‍पी है। यह एक ऐसा सवाल भी है जिसका संबंध इस बात से है कि हमें स्वर्ग के राज्य में आरोहित किया जा सकता है या नहीं। इसलिए, सत्‍य के इस पहलू को समझना बहुत ज़रूरी है। ऐसा क्यों है कि परमेश्वर को अंत के दिनों में अपने न्याय के कार्य के लिए स्वयं देहधारण करना होगा, बजाय इसके कि वे अपना कार्य करने के लिए मनुष्य को इस्तेमाल करें? यह न्याय के कार्य के स्वभाव से तय होता है। क्योंकि न्याय का कार्य परमेश्वर द्वारा सत्‍य की अभिव्यक्ति है और यह मानवजाति को जीतने, शुद्ध करने और बचाने के लिए उनका जो धार्मिक स्वभाव है उसकी अभिव्यक्ति है। आइये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़ें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। चूँकि न्याय सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना है, इसलिए परमेश्वर के अभी भी मनुष्यों के बीच इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होने का सवाल ही नहीं उठता। अर्थात्, अंत के दिनों में मसीह दुनिया भर के लोगों को सिखाने के लिए और उन्हें सभी सच्चाइयों का ज्ञान कराने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

"अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से हम यह जानते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य सत्‍य के बहुत से पक्षों की अभिव्‍यक्तियों ये युक्‍त है, जिसमें परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को व्यक्त करना, सभी रहस्यों को उजागर करना, मनुष्य के परमेश्वर-विरोधी और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने वाले शैतानी स्वभाव का न्‍याय करना, मनुष्य की भ्रष्ट बातों और आचरण को प्रकट और स्पष्ट करना, और पूरी मानव जाति के लिए परमेश्वर के पवित्र और धार्मिक सार और सरल स्वभाव को प्रकट करना शामिल है। जब परमेश्वर द्वारा चुने गए व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के अनुसार न्याय की प्रक्रिया से गुज़रते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे कि वे परमेश्वर के साथ आमने-सामने होते हैं, उनके द्वारा न्‍याय किए और उजागर किए जाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य का न्‍याय करते हैं, तो वे हमें अपने धर्मी स्वभाव की अभिव्यक्ति को देखने देते हैं, मानो कि परमेश्वर के पवित्र अस्तित्व को देखा जा रहा हो, जैसे कि स्वर्ग से उतरती दिव्य रोशनी देखी जा रही है, और परमेश्वर के वचन को देखना एक तेज दो-धारी तलवार की तरह है जो हमारे दिल और आत्मा में उतरती जाती है, जिसकी वजह से हमें अवर्णनीय पीड़ा सहन करनी पड़ती है। सिर्फ इसी तरीके से हम अपने भ्रष्ट सार और अपने भ्रष्टाचार के सत्‍य को पहचान सकते हैं, इसी तरीके से हम गहरा अपमान महसूस कर, अपना चेहरा शर्म से छिपा कर, सच्चे पश्चाताप के साथ परमेश्वर के सामने दंडवत हो सकते हैं, और फिर हम सत्‍य को स्‍वीकार करने में सक्षम होंगे और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जियेंगे, अपने आपको पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से मुक्त करेंगे, और परमेश्वर द्वारा बचाये और सिद्ध किये जायेंगे। मनुष्य के न्याय, शुद्धि और उद्धार जैसे कार्य सिर्फ देहधारी परमेश्वर के द्वारा निजी तौर पर पूरे किये जा सकते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के द्वारा न्याय का अनुभव करते हुए, हम सभी यह महसूस कर चुके हैं कि कैसे मनुष्यों द्वारा, परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिक स्वभाव को अपमानित नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर के वचन का हर एक अक्षर उनकी महिमा और प्रचंड क्रोध से भरा है, प्रत्येक वचन हमारे दिलों में भीतर तक गहरी चोट करते हुए, हमारे परमेश्वर विरोधी और परमेश्वर से विश्वासघात करने वाले शैतानी स्वभाव को पूरी तरह से उजागर करता है, साथ ही यह हमारे दिलों के भीतर गहराई तक समाये भ्रष्ट स्वभाव के तत्वों को बाहर निकाल देता है जिन्हें हम स्वयं भी देख नहीं पाते हैं, जिससे हम यह पहचानने में सक्षम होते हैं कि कैसे हमारा स्वभाव और अस्तित्व अहंकार, स्व-धार्मिकता, स्वार्थ और विश्वासघात से भरा हुआ है, कैसे हम इन चीजों के अनुसार जीवन जीते हैं, जैसे कि जीवित शैतान मंडली पूरी धरती पर घूमती फिर रही है, जिसमें इंसानियत का लेशमात्र भी नामोनिशान नहीं है। परमेश्वर इसे घिनौना और निंदनीय पाते हैं। हम अफ़सोस के कारण अपमानित और ध्वस्त महसूस करते हैं। हम अपनी खुद की नीचता और बुराई देखते हैं और जानते हैं कि हम परमेश्वर के सामने रहने के लायक नहीं हैं, इसलिए हम दंडवत करते हुए, परमेश्वर द्वारा उद्धार पाने की चाह रखते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के द्वारा न्याय का अनुभव करने में, हम असल में परमेश्वर के प्रकटन के गवाह बनते हैं। हम देखते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता अदूषित है और उनकी धार्मिकता का अपमान नहीं किया जा सकता है। हम उन ईमानदार इरादों और सच्चे प्रेम को पहचानते हैं जिसके साथ परमेश्वर मानवजाति को बचाने का प्रयास करते हैं और शैतान के हाथों अपने भ्रष्टाचार के सत्‍य और वास्तविकता को समझते हैं। इस प्रकार, अपने दिलों में, हम परमेश्वर के प्रति सम्‍मान महसूस करने लगते हैं और खुशी से सत्य को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन करते हैं। इस तरह, हमारा भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है। आज जो परिवर्तन हमने प्राप्त किए हैं वह न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर के देहधारण का नतीज़ा है। तो, केवल जब परमेश्वर का देहधारण सत्‍य को प्रकट करता है, न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर के धर्मपरायण स्वभाव को और वह सब जो उनमें है और वे स्वयं हैं, को व्यक्त करता है, तभी हम सच्ची रोशनी और परमेश्‍वर के प्रकटन को देख पाते हैं, और हमें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त होने लगता है। सिर्फ इसी तरीके से हम देख सकते हैं कि केवल परमेश्वर ही हमें बचा और शुद्ध कर सकते हैं। मसीह के अलावा, कोई भी व्यक्ति अंत के दिनों में न्याय का कार्य नहीं कर सकता। आइये अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ अन्य अंश पढ़ते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर की तुलना में कोई भी अधिक उपयुक्त और योग्य नहीं है। ... यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करता है केवल तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। मनुष्य के समान सामान्य मानवता को धारण करने वाला बन कर, देह में प्रकट परमेश्वर सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यह उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसकी असाधारणता का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उस स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने के लायक नहीं हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

"आज मैं तुम्हारी मलिनता के कारण ही तुम्हारा न्याय कर रहा हूँ, और तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के कारण ही तुम्हें ताड़ना दे रहा हूँ। मैं तुम लोगों के सामने अपने सामर्थ्य की अकड़ नहीं दिखा रहा या जानबूझकर तुम लोगों का दमन नहीं कर रहा; मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि इस मलिन धरती पर पैदा हुए तुम लोग मलिनता से बुरी तरह दूषित हो गए हो। तुम लोगों ने अपनी निष्ठा और मानवीयता खो दी है और तुम दुनिया की सबसे मलिन जगह पर पैदा हुए सूअर की तरह बन गए हो, और यही वजह है कि मैं तुम लोगों का न्याय करता हूँ और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता हूँ। ठीक इसी न्याय की वजह से तुम लोग यह देख पाए हो कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है, और कि परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है; ठीक अपनी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से ही वह तुम लोगों का न्याय करता है और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता है। चूँकि वह मनुष्य की विद्रोहशीलता देखकर अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट कर सकता है, और चूँकि मनुष्य की मलिनता देखकर वह अपनी पवित्रता प्रकट कर सकता है, अत: यह यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो पवित्र और प्राचीन है, और फिर भी मलिनता की धरती पर रहता है। अगर परमेश्वर मनुष्य होता, मनुष्य के उदाहरण का अनुसरण करता और मलिन कीचड़ में मनुष्य के साथ लोट-पोट होता, तो उसके बारे में कुछ भी पवित्र नहीं होता, और उसका स्वभाव धार्मिक न होता, और इसलिए वह मनुष्य की दुष्टता का न्याय करने का हकदार न होता, न ही वह मनुष्य का न्याय करने का हकदार होता। अगर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का न्याय करता, तो क्या यह उनका स्वयं को थप्पड़ मारने जैसा नहीं होता? एक-जैसे मलिन व्यक्ति एक-दूसरे का न्याय करने के हकदार कैसे हो सकते हैं? केवल स्वयं पवित्र परमेश्वर ही पूरी मलिन मानव-जाति का न्याय करने में सक्षम है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के पापों का न्याय कैसे कर सकता है? एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के पाप कैसे देख सकता है, और वह इन पापों की निंदा करने का पात्र कैसे हो सकता है? अगर परमेश्वर मनुष्य के पापों का न्याय करने का पात्र न होता, तो वह स्वयं धार्मिक परमेश्वर कैसे हो सकता था? जब लोगों के भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होते हैं, तो लोगों का न्याय करने के लिए परमेश्वर बोलता है, और केवल तभी लोग देखते हैं कि वह पवित्र है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से हमें स्‍पष्‍ट रूप से पता चलता है कि अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य सत्‍य, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव, मनुष्य को जीतने, शुद्ध करने और सिद्ध करने के लिए परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के जरिये किया जाना चाहिए। अंत के दिनों में परमेश्वर न्याय का यह कार्य करने के लिए स्वयं प्रकट होंगे। यह कार्य एक युग के शुरू होने के और दूसरे के खत्म होने को दर्शाता है। यह कार्य परमेश्वर के देहधारण द्वारा ही किया जाना चाहिए, उनके स्‍थान पर कोई भी मनुष्य इसे पूरा नहीं कर सकता है। ऐसा क्यों है कि ज़्यादातर लोग इस बात पर विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को स्वयं देहधारण कर अपना कार्य करने के बजाय, अपने हर कार्य के लिए मनुष्य का इस्तेमाल करना चाहिए? यह अविश्वसनीय है! क्या मानवजाति वास्तव में परमेश्वर के आगमन का स्वागत करती है? ऐसा क्यों है कि हर बार बहुत से लोग यह सोचते हैं कि परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए मनुष्य का इस्तेमाल करेंगे? इसका कारण यह है कि मनुष्य अपनी अवधारणाओं के अनुसार काम करते हैं, वे ठीक वैसे ही काम करते हैं जैसा उनके विचार में काम किया जाना चाहिए। इसलिए ज़्यादातर लग आसानी से एक मनुष्य की पूजा करते हैं, उसे एक ऊँचा दर्जा देकर उसकी बातों का पालन करते हैं। लेकिन परमेश्वर के कार्य करने का तरीका कभी भी मनुष्य की सोच और कल्पना के अनुरूप नहीं होता, वे कोई भी काम उस तरह नहीं करते जैसे मनुष्य को लगता है कि करना चाहिए। इसलिए हमें परमेश्वर के साथ तालमेल बैठाने में परेशानी होती है। परमेश्वर का सार सत्य, मार्ग और जीवन है। परमेश्वर का स्वभाव पवित्र, धार्मिक और उसका अपमान नहीं किया जा सकता है। हालांकि, भ्रष्ट मनुष्य को शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया जा चुका है, और वह शैतानी स्वभाव से भरा है; उनका परमेश्वर के साथ तालमेल बिठाना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए, हमें परमेश्वर के देहधारण के कार्य को स्वीकार करना मुश्किल लगता है, हम अध्ययन और पालन करने के लिए तैयार नहीं होते हैं, इसके बजाय हम मनुष्य की पूजा करते हैं और उसके काम में आँखें मूंदकर विश्वास करते हैं, उसे इस तरह स्वीकार करने और पालन करने लगते हैं जैसे कि यह परमेश्वर का कार्य हो। यहाँ समस्या क्या है? आप कह सकते हैं कि मनुष्य को इस बात का ज़रा सा भी अंदाजा नहीं है कि परमेश्वर पर विश्वास करने और उनके कार्यों को समझने का क्या मतलब है, इसलिए, अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य देहधारण द्वारा सत्य की अभिव्यक्ति के माध्यम से किया जाना चाहिए ताकि भ्रष्ट मनुष्‍यजाति की सभी समस्याओं का समाधान किया जा सके। जहां तक कुछ लोगों के सवाल का संबंध है कि आखिर परमेश्वर अंत के दिनों में अपना न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य का इस्तेमाल क्यों नहीं करते, क्या इसके जवाब की अभी भी आवश्यकता है? मनुष्य का सार मनुष्य ही है, मनुष्य में दिव्य सार नहीं होता है, इसलिए मनुष्य सत्‍य व्यक्त करने, परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने, वह सब जो परमेश्वर में है और उनका अस्तित्‍व, उसे व्यक्त करने में अक्षम है, और वह मनुष्य जाति के उद्धार का कार्य नहीं कर सकता। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि हम सभी मनुष्यों को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, और हमारे स्‍वभाव पापी हैं, ऐसे में हमारे पास दूसरे मनुष्यों का न्‍याय करने की क्या योग्यता है? क्योंकि बुरा और भ्रष्ट मनुष्य अपने आपको ही शुद्ध करने और बचाने में अक्षम है, तो वह दूसरों को शुद्ध करने और बचाने के बारे में सोच भी कैसे सकता है? भ्रष्ट मनुष्य को सिर्फ अपमान मिलेगा क्योंकि अन्य लोग उनके न्याय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होंगे। सिर्फ परमेश्वर ही धर्मी और पवित्र हैं, और सिर्फ परमेश्वर ही सत्य, मार्ग, और जीवन हैं। इसलिए, अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य निश्चय ही उनके देहधारण द्वारा पूरा किया जाएगा। यह हकीकत है कि कोई भी मनुष्य ऐसे कार्य के लिए योग्य नहीं है।

अब, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य करने के लिए मनुष्य का इस्तेमाल क्यों किया? ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यवस्था के युग के कार्य और अंत के दिनों के न्याय के कार्य अलग-अलग प्रकृति के हैं। व्यवस्था के युग में, मनुष्य जाति भी नवजात थी, मनुष्य को शैतान के द्वारा बहुत कम भ्रष्ट किया गया था। यहोवा परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से व्‍यवस्‍था और आज्ञाओं को लागू करना था जिसका उद्देश्य प्रारंभिक मनुष्य को एक मार्गदर्शन देना था कि वह पृथ्वी पर कैसे जिये। कार्य के इस चरण का उद्देश्य मनुष्य के स्वभाव को बदलना नहीं था, इसके लिए अधिक सत्‍य व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं थी। परमेश्वर को सिर्फ इस्त्राएलियों के लिए निर्धारित व्यवस्था को समझाने के लिए मनुष्य का इस्तेमाल करने की जरूरत थी, ताकि इस्त्राएलियों को पता चल सके कि व्यवस्था का पालन कैसे करना चाहिए, यहोवा परमेश्वर की उपासना कैसे करनी चाहिए, और पृथ्वी पर एक साधारण ज़िंदगी कैसे जीनी चाहिए। ऐसा करने पर, कार्य का वह चरण पूरा हो गया था। इसलिए, व्यवस्था के युग का कार्य करने के लिए परमेश्वर ने मूसा का इस्तेमाल किया, उन्हें निजी तौर पर कार्य पूरा करने के लिए देहधारण करने की ज़रूरत नहीं थी। इसके विपरीत, अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य का उद्देश्य मानव जाति को बचाना है, जिसे शैतान ने पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया है। परमेश्वर के वचन के कुछ अंशों को जारी करना और कुछ नियमों का प्रचार करना इस मामले में पर्याप्त नहीं होगा। काफी मात्रा में सत्‍य की अभिव्‍यक्ति होनी चाहिए। परमेश्वर का निहित स्वभाव, वह सब जो परमेश्वर में है और वे स्वयं हैं, उसे पूरी तरह से व्यक्त किया जाना चाहिए, सत्य, मार्ग, और जीवन को पूरी मानवजाति के लिए खोल दिया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे कि परमेश्वर स्वयं मानव जाति के आमने-सामने आकर इन बातों को उजागर कर रहे हैं, जिससे कि वे सत्य को समझ सके और परमेश्वर को जान सके, और ऐसा करने में, वे पूरी तरह से मानव जाति को शुद्ध करते, बचाते और सिद्ध करते हैं। परमेश्वर को यह कार्य, निजी तौर पर देहधारण लेकर करना होता है, उनके अलावा कोई भी मनुष्य यह कार्य नहीं कर सकता। परमेश्वर अपने वचन के कुछ अंशों को जारी करने के लिए पैगंबरों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर पैगंबरों को परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, वह सब जो उनमें है और वे स्वयं हैं, को व्यक्त करने या संपूर्ण सत्य को व्यक्त करने की अनुमति नहीं देते, क्योंकि भ्रष्ट मानवजाति ऐसा करने के लायक नहीं है। अगर परमेश्वर ने अपने संपूर्ण स्वभाव और सत्य को व्यक्त करने के लिए मनुष्‍य का इस्तेमाल किया तो वे संभवत: परमेश्वर को अपमानित कर देंगे, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है, वह अपनी खुद की अवधारणाओं और विचारों को धोखा दे सकता है, उसके कार्यों में अशुद्धियां होंगी, जो आसानी से परमेश्वर को अपमानित करेगा और परमेश्वर के कार्य की समग्र प्रभावशीलता को प्रभावित करेगा। इसके अलावा, हम वह सब जो परमेश्वर के पास है और उनमें है, इसके लिए उसके पास जो कुछ है और वह जो है उसे लेने को तत्पर रहता है, जो सत्य के लिए उनके कार्य में मनुष्य की अशुद्धियों को समाहित कर देता है। इससे एक गलतफहमी पैदा होती है और परमेश्वर का अपमान होता है। साथ ही, अगर परमेश्वर को अपने संपूर्ण स्वभाव और सत्य को व्यक्त करने के लिए मनुष्य का इस्तेमाल करना होता, तो मनुष्य की अशुद्धियों के कारण, हम इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं होते और उनका विरोध भी कर सकते थे। परमेश्वर के साथ हमारे असंतोष की ज्वाला को हवा देते हुए, विद्रोह को भड़काते हुए, और हमें अपना खुद का स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के लिए उकसाते हुए फिर शैतान दोष निकालता और आरोप लगाने लगता। यह मनुष्य द्वारा परमेश्वर का कार्य किए जाने का अंतिम परिणाम है। ख़ास तौर पर, अंत के दिनों में अत्यधिक भ्रष्ट मनुष्‍य के परमेश्वर द्वारा उद्धार किये जाने के मामले में, मनुष्यगण परमेश्वर के देहधारी के कार्य को स्वीकार करने और उनका पालन करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते है। इसलिए अगर परमेश्वर ने इस कार्य को करने के लिए मनुष्यों का इस्तेमाल किया होता, तो लोगों द्वारा इसे स्वीकार करने और इसका पालन करने की संभावना बहुत कम होगी। क्या ये सीधे-सादे तथ्य नहीं हैं? धार्मिक जगत के एल्डर और पादरियों को देखें, क्या परमेश्वर के देहधारण के कार्य के प्रति उनका विरोध और निंदा उस विरोध से अलग है, जैसा विरोध यहूदी मुख्य पादरियों और फरीसियों ने पहले प्रभु यीशु का किया था? परमेश्वर द्वारा भ्रष्ट मनुष्य जाति का उद्धार आसान काम नहीं है। हमें यह समझना होगा कि परमेश्वर कैसे सोचते हैं!

एक ओर, अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर का न्याय का कार्य मनुष्य का न्‍याय करना, शुद्ध करना और बचाना है, दूसरी तरफ, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर अपना कार्य सत्य की अभिव्यक्ति और परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप की अभिव्यक्ति के माध्यम से करते हैं, जिससे पूरी मानवजाति को सही मायनों में परमेश्वर को जानने और समझने में मदद मिलती है, और वह देहधारी परमेश्वर के प्रकटन को देख पाने में सफल होती है। आइये अब हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के कुछ अंशों को पढ़ें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जो देह में जीवन बिताते हैं उन सभी के लिए, अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए खोज हेतु लक्ष्यों की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर को जानना परमेश्वर के वास्तविक कर्मों और वास्तविक चेहरे को देखना आवश्यक बनाता है। दोनों को सिर्फ परमेश्वर के देहधारी देह के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, और दोनों को सिर्फ साधारण और वास्तविक देह के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। इसीलिए देहधारण ज़रूरी है, और इसीलिए संपूर्ण भ्रष्ट मनुष्यजाति को इसकी आवश्यकता है। चूँकि लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे परमेश्वर को जानें, इसलिए अस्पष्ट और अलौकिक परमेश्वरों की छवियों को उनके हृदयों से दूर अवश्य हटाया जाना चाहिए, और चूँकि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करें, इसलिए उन्हें पहले अपने भ्रष्ट स्वभाव को अवश्य पहचानना चाहिए। यदि केवल मनुष्य लोगों के हृदयों से अस्पष्ट परमेश्वरों की छवियों को हटाने का कार्य करता है, तो वह उपयुक्त प्रभाव प्राप्त करने में असफल हो जाएगा। लोगों के हृदयों से अस्पष्ट परमेश्वर की छवियों को केवल वचनों से उजागर, दूर किया, या पूरी तरह से निकाला नहीं जा सकता है। ऐसा करके, अंततः गहराई से जड़ जमाई हुई इन चीज़ों को लोगों से हटाना तब भी संभव नहीं होगा। केवल इन अस्पष्ट और अलौकिक चीज़ों को व्यावहारिक परमेश्वर और परमेश्वर की सच्ची छवि से बदल कर, और लोगों को धीरे-धीरे इन्हें ज्ञात करवा कर ही, उचित प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है। ... केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना स्वयं का कार्य कर सकता है, और कोई अन्य उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता है। भले ही मनुष्य की भाषा कितनी ही समृद्ध क्यों न हो, वह परमेश्वर की वास्तविकता और साधारणता को स्पष्टता से व्यक्त करने में असमर्थ है। यदि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के बीच कार्य करे और अपनी छवि और अपने अस्तित्व को पूरी तरह से प्रकट करे, केवल तभी मनुष्य और अधिक व्यावहारिकता से परमेश्वर को जान सकता है, और केवल तभी उसे और अधिक स्पष्टता से देख सकता है। यह प्रभाव किसी भी हाड़-माँस वाले मनुष्य के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

"मनुष्य की कल्पनाएँ, आखिरकार, खोखली होती हैं, और परमेश्वर के सच्चे चेहरे का स्थान नहीं ले सकती हैं; मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के कार्य का अभिनय नहीं किया जा सकता है। स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर और उसके कार्य को केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है जो मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। यही सबसे आदर्श तरीका है जिसमें परमेश्वर मनुष्य के लिए प्रकट होता है, जिसमें मनुष्य परमेश्वर को देखता है और परमेश्वर के असली चेहरे को जानने लगता है, और इसे किसी गैर-देहधारी परमेश्वर के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

"परमेश्वर का देह में आगमन मुख्यतः इसलिए है कि मनुष्य परमेश्वर के असली कार्यों को देख सके, निराकार आत्मा को देह में साकार कर सके, और वह मनुष्य के द्वारा स्पर्श किया और देखा जा सके। इस तरह से, जिन्हें वह पूर्ण बनाता है वह उसे जी पाएँगे, उसके द्वारा प्राप्त किये जा सकेंगे, और वे उसके हृदय के अनुसार हो पाएँगे। यदि परमेश्वर केवल स्वर्ग में ही बोलता, और वास्तव में पृथ्वी पर नहीं आता, तो लोग अब भी परमेश्वर को जानने के अयोग्य होते; वे खोखले सिद्धांत का उपयोग करते हुए परमेश्वर के कार्यों का केवल उपदेश दे पाते, और उनके पास परमेश्वर के वचन वास्तविकता के रूप में नहीं होते। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्यतः उनके लिए एक प्रतिमान और आदर्श का कार्य करने के लिए आता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है। सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य व्यावहारिक रूप से परमेश्वर को स्पर्श कर सकता, जान और देख सकता है; और केवल इसी ढंग से मनुष्य सचमुच में परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है')।

"देहधारी परमेश्वर उस युग को अन्त पर लाता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मनुष्यजाति को दिखाई देती थी, और साथ ही अस्पष्ट परमेश्वर में मनुष्यजाति के विश्वास का भी समापन करता है। विशेष रूप से, अंतिम देहधारी परमेश्वर का कार्य संपूर्ण मनुष्यजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो अधिक वास्तविक, अधिक व्यावहारिक, और अधिक सुखद है। वह केवल व्यवस्था और सिद्धान्त के युग का ही अन्त नहीं करता है; बल्कि अधिक महत्वपूर्ण ढंग से, वह मनुष्यजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रकट करता है जो वास्तविक और सामान्य है, जो धार्मिक और पवित्र है, जो प्रबंधन योजना के कार्य को क्रियान्वित करता है और मनुष्यजाति के रहस्यों और मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया था और प्रबंधन कार्य को अन्त पर लाता है, और जो हज़ारों वर्षों से छिपा हुआ रहा है। वह अस्पष्टता के युग का पूर्णतः अंत करता है, वह उस युग का समापन करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर के चेहरे को खोजने की इच्छा करती थी परन्तु वह ऐसा करने में असमर्थ थी, वह उस युग का अन्त करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति शैतान की सेवा करती थी, और संपूर्ण मनुष्यजाति की एक नए युग में पूरी तरह से अगुवाई करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रकट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

देहधारण के जरिये अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य सही मायनों में सार्थक है। परमेश्वर अंत के दिनों में पृथ्वी पर देहधारण कर मनुष्यों के बीच रहते हुए मनुष्य जाति के लिए अपने वचनों को प्रकट करते हैं, उन्होंने अपनेखुद के स्वभाव और स्वरूप के बारे में जनता को बताया। परमेश्वर किससे प्रेम करते हैं और परमेश्वर किससे नफ़रत करते हैं, परमेश्वर का क्रोध किसकी ओर निर्देशित होता हैं, किसे वे सज़ा देते हैं, उनकी भावनात्मक स्थिति, मनुष्यों से उनकी मांग, मनुष्यों के लिए उनके इरादे, जीवन, मूल्यों आदि पर मनुष्य का आदर्श दृष्टिकोण, वे इन सारी बातों की जानकारी हमें देते हैं, हमें जीवन में स्पष्ट लक्ष्य रखने की अनुमति देते हैं ताकि हमें बिना किसी उद्देश्य के अनिश्चित धार्मिक खोज में जाने की जरूरत ना पड़े। जैसा कि परमेश्वर के वचन कहते हैं, "देहधारी परमेश्वर उस युग को अन्त पर लाता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मनुष्यजाति को दिखाई देती थी, और साथ ही अस्पष्ट परमेश्वर में मनुष्यजाति के विश्वास का भी समापन करता है।" जो लोग भी अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्यों और वचनों से होकर गुज़रे हैं, उन सभी का एकसमान अनुभव है: भले ही हम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुज़र चुके हैं, सभी तरह के परीक्षणों और शुद्धिकरणों का सामना किया है, और बड़े लाल अजगर के क्रूर, वहशी यातनाओं और उत्पीड़नों की पीड़ा को काफी हद तक सहन किया है, हमने परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को अपने पर आते देखा है, हमने परमेश्वर की महिमा और क्रोध तथा उनकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को जाना है, हमने उस स्वरूप को देखा है जो परमेश्वर में है और जो वे स्वयं हैं, जैसे कि हम स्वयं परमेश्वर को देख रहे हों। हालांकि हमने परमेश्वर के अध्यात्मिक शरीर को नहीं देखा है, परमेश्वर का अंतर्निहित स्वभाव, उनकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धिमत्‍ता, और वह सब जो उनके पास है और वे स्वयं हैं, उसे पूरी तरह से हमारे बीच प्रकट किया जा चुका है, जैसे कि परमेश्वर हमारे पास, हमारे आमने-सामने आए हों, जिससे हम सही मायनों में परमेश्वर को जान पाएं और हमारे पास एक ऐसा हृदय हो जो परमेश्वर का भय मानता हो, ताकि हम मृत्यु तक हमारे लिए परमेश्वर की योजनाओं का पालन कर सकें। हम सभी को महसूस होता है कि परमेश्वर के वचन और कार्य में हम एक व्यावहारिक और वास्तविक तरीके से परमेश्वर को देखते हैं और जानते हैं, हमने सभी अवधारणाओं और भ्रमों को पूरी तरह से दूर कर दिया है और हम वास्तव में परमेश्वर को जानने वाले बन गए हैं। इससे पहले, हम परमेश्वर के स्वभाव को प्रेम करने वाला और दयालु समझते थे, हमारा मानना था कि परमेश्वर में विश्वास करने से मनुष्यों को सभी पापों से क्षमा और मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के वचनों का अध्ययन करने के बाद, हम यह अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि परमेश्वर का स्वभाव न सिर्फ दयालु और प्रेम करने वाला है, बल्कि यह धर्मी, प्रतापी और क्रोधी भी है। जो कोई भी उनके स्वभाव को ठेस पहुंचाएगा उसे दंडित किया जाएगा। इसलिए, हमें परमेश्वर का आदर करना चाहिए, सत्‍य को अपनाना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना चाहिए। अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के कार्य को अनुभव करके, हम सब असल में और व्यावहारिक रूप से समझ चुके हैं कि परमेश्वर का स्वभाव पवित्र, धार्मिक है और उसका अपमान नहीं किया जा सकता है, हम परमेश्वर की दया और प्रेम को समझ चुके हैं, सच्चे रूप से परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि की प्रशंसा करने योग्य हो गए हैं, हम यह जान चुकें हैं कि कैसे परमेश्वर ने खुद को विनम्रतापूर्वक छिपाता है, हमने उनके ईमानदार इरादों, बहुत सारे प्रेम योग्‍य गुणों को जाना है, उनकी भावनात्मक स्थिति, उनकी विश्वसनीयता, उनकी सुंदरता और अच्छाई को समझा है, उनके अधिकार, संप्रभुता, उनके द्वारा हर चीज की जांच-पड़ताल आदि को महसूस किया है। परमेश्वर का स्वरूप हमारे सामने प्रकट हुआ है, मानो कि हम स्वयं परमेश्वर को देख रहे हैं, जो हमें उनको आमने-सामने जानने का मौक़ा देता है। अब हम हमारी अवधारणाओं और विचारों के आधार पर परमेश्वर पर विश्वास और उनका अनुसरण नहीं करते हैं, बल्कि परमेश्वर के लिए सच्चा सम्मान और श्रद्धा महसूस करते हैं, और सही मायनों में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं और उन पर भरोसा करते हैं। हमने यह जान लिया है कि अगर परमेश्वर ने सत्य को व्यक्त करने और न्याय का कार्य करने के लिए निजी तौर पर देहधारण नहीं किया होता, तो हम परमेश्वर को कभी भी नहीं जान पाते, और अपने आपको पापों से मुक्त करने और शुद्धता प्राप्त करने में अक्षम होते। तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप इसे कैसे देखते हैं, अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य स्वयं देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, उनके बजाय कोई भी यह कार्य नहीं कर सकता। मनुष्य की अवधारणाओं और भ्रांतियों को देखते हुए, अगर परमेश्वर को अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य का इस्तेमाल करना होता, तो वे वांछित प्रभाव प्राप्त कर पाने में सक्षम नहीं होते।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

तो चलिए एक कदम और आगे बढ़ते हुए देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं, उनके कार्य में मौलिक अंतर पर संगति करें। आइये देखते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य के इस पहलू के बारे में क्या कहते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं,

"देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तथा मसीह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धारण किया गया देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है बल्कि आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण दिव्यता दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती है। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखती है, जबकि दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य करती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है')।

"क्योंकि वह परमेश्वर के सार वाला एक मनुष्य है, वह किसी भी सृजन किए गए मानव से ऊपर है, किसी भी ऐसे मनुष्य से ऊपर है जो परमेश्वर का कार्य कर सकता है। और इसलिए, उसके समान मानवीय आवरण वाले सभी के बीच, उन सभी के बीच जो मानवता को धारण करते हैं, केवल वही देहधारी परमेश्वर स्वयं है—अन्य सभी सृजन किए गए मानव हैं। यद्यपि उन सब में मानवता है, किन्तु सृजन किए गए मानव में और कुछ नहीं केवल मानवता ही है, जबकि देहधारी परमेश्वर भिन्न हैः अपनी देह में उसमें न केवल मानवता है बल्कि इससे महत्वपूर्ण दिव्यता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार')।

"मसीह की दिव्यता सभी मनुष्यों से ऊपर है, इसलिए सभी सृजे गए प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता, अर्थात्, परमेश्वर स्वयं का स्वभाव तथा अस्तित्व है, जो उसकी पहचान निर्धारित करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है')।

"क्योंकि परमेश्वर पवित्र और शुद्ध है, तथा यथार्थ और वास्तविक है, इसलिए उसका देह पवित्रात्मा से आता है। यह निश्चित है, और संदेह से परे है। न केवल स्वयं परमेश्वर की गवाही देने में समर्थ होना, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में सक्षम होना: यह परमेश्वर के सार का एक पक्ष है। देह एक छवि के साथ पवित्रात्मा से आता है का अर्थ है कि देह जिससे आत्मा स्वयं को ढकता है, वह आवश्यक रूप से मनुष्य की देह से भिन्न है, और यह अंतर मुख्य रूप से उनकी आत्मा में निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 9')।

"जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर का सार होगा, और जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि परमेश्वर ने देह धारण की है, इसलिए वह उस कार्य को सामने लाएगा, जो वह करना चाहता है, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण की है, इसलिए वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है, और वह मनुष्य के लिए सत्य को लाने, उसे जीवन प्रदान करने और उसे मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इस में कोई संदेह नहीं। ...

"... अंतत: परमेश्वर, परमेश्वर है और मनुष्य, मनुष्य। परमेश्वर में परमेश्वर का सार है और मनुष्य में मनुष्य का सार" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने साफ़ कहा है कि देहधारी परमेश्वर परमेश्वर के आत्मा का साकार रूप हैं। हालाँकि वे सामान्य इंसान हैं, लेकिन उनका सार दिव्य है। जबकि परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं, उनका सार इंसान का है। वे सिर्फ़ इंसान ही हो सकते हैं, उनका सार दिव्य नहीं है। "मसीह का सार दिव्य है" का अर्थ उससे है जो परमेश्वर के आत्मा में है—उनका मूल स्वभाव, धार्मिकता और पवित्रता का उनका सार, जो परमेश्वर हैं, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और ज्ञान, और परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य—सब देह में साकार हुआ है। ये देह, दिव्य सार वाला देह है, असली परमेश्वर है जो धरती पर कार्य करने और इंसान को बचाने आया है। चूँकि मसीह का सार दिव्य है, उनकी भावनात्मक स्थिति, अलग-अलग लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति उनका रवैया, नज़रिया और राय, मसीह के तमाम विचार सत्य हैं, वे सब परमेश्वर के पवित्र सार और जीवन स्वभाव की अभिव्यक्ति हैं। मसीह पूरी तरह से परमेश्वर को दर्शा सकते हैं, वे सीधे परमेश्वर की वाणी, उनके स्वभाव, और जो परमेश्वर हैं, उसे व्यक्त कर सकते हैं। वह मनुष्य को सत्य, मार्ग और जीवन प्रदान कर सकते हैं, और ऐसा करना किसी इंसान के बस की बात ही नहीं। चूँकि मसीह में पूर्ण दिव्यता है, इसलिए वे किसी भी समय और स्थान पर परमेश्वर के वचनों को सीधे व्यक्त कर सकते हैं, जबकि नबी परमेश्वर के कुछ वचनों को किसी मौके पर ही व्यक्त करते हैं। मसीह सत्य व्यक्त करते हैं और नए युग में ये परमेश्वर का कार्य है। वे परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान और अनुभव के बारे में बात नहीं करते। क्योंकि मसीह में पूर्ण दिव्यता है, वे लोगों को आपूर्ति, सिंचन और चरवाही देने और मार्ग दिखाने के लिये किसी भी समय और कहीं भी सत्य व्यक्त कर सकते हैं। और चूँकि मसीह में पूर्ण दिव्यता है, वे परमेश्वर के कार्य की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं। वे इंसान के छुटकारे के लिये उसकी अगुवाई कर सकते हैं, इंसान पर विजय कर उसे बचा सकते हैं और पूरे पुराने युग को समाप्त कर सकते हैं। लेकिन परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं उनका सार इंसानी है। उनमें कोई दिव्यता नहीं होती, वे महज़ इंसान होते हैं। और इसलिए वे केवल इंसान का कार्य और फ़र्ज़ पूरा कर सकते हैं। हालाँकि उनमें पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता, प्रकाशन, कार्य और पूर्णता है, लेकिन वे ज़्यादा से ज़्यादा परमेश्वर के कार्य में सहयोग कर सकते हैं और अपना ज्ञान और अनुभव व्यक्त कर सकते हैं। हो सकता है उनके शब्द सत्य के अनुरूप हों और दूसरों को लाभ पहुँचाते रहें, लेकिन वे सत्य नहीं हैं और वे परमेश्वर के वचनों के बराबर नहीं ठहरते। भाइयो और बहनो, हमें ये बात स्पष्ट होनी चाहिए कि देहधारी परमेश्वर किसी युग का आरंभ और अंत करने का कार्य करते हैं। वे सीधे सत्य व्यक्त करके पूरी इंसानियत को राह दिखा सकते हैं। लेकिन जिन्हें परमेश्वर इस्तेमाल करते हैं या जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है वो लोग इंसानी फ़र्ज़ निभाते हुए ज़्यादा से ज़्यादा परमेश्वर के कार्य में सहयोग करते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा, वे परमेश्वर के वचन का अपना ज्ञान और अनुभव व्यक्त करते हैं, और उनका कहा सत्य के अनुरूप होता है। उन्होंने परमेश्वर के लिये चाहे कितना ही कार्य किया हो, वे चाहे कितना भी बोले हों, वे केवल परमेश्वर के वचन के अपने ज्ञान और अनुभव को ही साझा करते हैं, वे केवल परमेश्वर का गुणगान कर उनकी गवाही देते हैं। देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं या जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, उनमें मौलिक भेद यही है।

देहधारी परमेश्वर का सार दिव्य है, और इसलिए उनका कार्य और वचन इंसान के विचार, धारणा, कल्पना और तर्क से अशुद्ध नहीं होते, बल्कि देहधारी परमेश्वर अपनी सारी दिव्यता और परमेश्वर के आत्मा के मूल अर्थ को सीधे व्यक्त करते हैं। अनुग्रह के युग की तरह ही, प्रभु यीशु ने स्वर्ग के राज्य के रहस्यों का खुलासा किया, पश्चाताप का मार्ग लाए और अपनी स्नेहमयी दयालुता और करुणामय स्वभाव को व्यक्त किया, वगैरह-वगैरह। वे सारे परमेश्वर के आत्मा की सीधी अभिव्यक्ति हैं, उनके स्वभाव के और जो कुछ वे हैं, उन सभी का प्राकृतिक रहस्योद्घाटन हैं। वो सब इंसान की सोच से परे है। अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर वो सारे सत्य व्यक्त करेंगे जो इंसान को बचाएंगे और शुद्ध और पूर्ण करेंगे। वे इंसान के अपराध को सहन न करने वाले धार्मिक स्वभाव को व्यक्त करते हैं, और अपनी प्रबंधन योजना के सभी रहस्यों को उजागर करते हैं, जैसे परमेश्वर के देहधारण के रहस्य, परमेश्वर के कार्य और इंसान के कार्य में भेद, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का उद्देश्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का आंतरिक सत्य, इंसान के भ्रष्टाचार का मूल, परमेश्वर से उद्धार पाने के लिए इंसान को पाप से कैसे आज़ाद होना चाहिए, मानवजाति की नियति वगैरह-वगैरह। सर्वशक्तिमान परमेश्वर जो कुछ करते हैं वो दिव्यता की सीधी अभिव्यक्ति है, परमेश्वर के आत्मा का मूल अर्थ है, जो इंसान की सोच से परे है। देहधारी परमेश्वर का कार्य और वचन उनका व्यक्त स्वभाव ये साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि देहधारी परमेश्वर का सार दिव्य है, वे और कोई नहीं एकमात्र परमेश्वर स्वयं हैं। लेकिन परमेश्वर जिनका उपयोग करते हैं वे परमेश्वर का कार्य करने के लिये उनकी जगह नहीं ले सकते, न ही वे सीधे परमेश्वर के आत्मा की मौलिक इच्छा व्यक्त कर सकते हैं। वे केवल परमेश्वर के कार्य के आधार पर इंसानी सहयोग का कार्य कर सकते हैं, अपना ज्ञान और अनुभव साझा कर सकते हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर के वचनों के सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिये अगुवाई कर सकते हैं, परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं और उनकी सेवा कर सकते हैं। ये इंसानी फ़र्ज़ को पूरा करना है। वे वही काम करते हैं जो इंसान का दिमाग कर सकता है, इंसान जिस कार्य का अनुभव कर सकता है, वो काम जो मूल रूप से इंसान के पास है और जो वो है। क्योंकि देहधारी परमेश्वर और जिन लोगों का वो उपयोग करते हैं, उनका सार अलग होता है, उनके कार्य का स्वरूप पूरी तरह से अलग है। देहधारी परमेश्वर जिनका उपयोग करते हैं, उनसे उतने ही अलग हैं, जितने परमेश्वर इंसान से अलग हैं। एक में परमेश्वर का सार है जबकि दूसरे में इंसान का सार है। जिसमें दिव्य सार है वो परमेश्वर का कार्य सकता है, जिसमें इंसान का सार है वो सिर्फ़ इंसान का ही कार्य कर सकता है। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को ये बात समझनी चाहिए।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

"न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता।" परमेश्वर का वचन बहुत स्पष्ट है। न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, यह वो कार्य है जिसे परमेश्वर को इंसानों के बीच करना है, यह वो कार्य है जिसे स्वयं परमेश्वर द्वारा निजी तौर पर किया जाना चाहिए, यह वो कार्य है जिसे कोई भी व्यक्ति उसके स्थान पर करने में सक्षम नहीं है। कोई भी व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता है। इंसानों में से कोई भी परमेश्वर की जगह नहीं ले सकता है और इस कार्य को उसके स्थान पर नहीं कर सकता है। कोई भी उसकी जगह क्यों नहीं ले सकता? कुछ लोग कह सकते हैं: "क्या व्यवस्था के युग के दौरान मूसा का उपयोग करके परमेश्वर का कार्य नहीं किया गया था? फिर परमेश्वर कैसे न्याय का कार्य करने के लिए लोगों का उपयोग नहीं कर सकता?" क्या यहां कुछ रहस्य है? व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने इसराइलियों के लिए व्यवस्था और आज्ञाएं जारी कीं, जो कार्य मनुष्य का उपयोग करके किया जा सकता था। लेकिन मनुष्य परमेश्वर की जगह वह कार्य नहीं कर सकता और अंत के दिनों में न्याय का कार्य नहीं कर सकता, ऐसा क्यों है? यहाँ एक रहस्य है। यह रहस्य किस बारे में है? हमें साथ में पढ़ना जारी रखना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर इसके बारे में क्या कहता है। "चूँकि न्याय सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना है, इसलिए परमेश्वर के अभी भी मनुष्यों के बीच इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होने का सवाल ही नहीं उठता।" परमेश्वर ने न्याय के कार्य की परिभाषा बताई है इस कार्य की प्रकृति क्या है? परमेश्वर कहते हैं, "चूँकि न्याय सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना है।" हम इन वचनों को कैसे समझ सकते हैं? न्याय वास्तव में क्या है? परमेश्वर के वचन के आधार पर हम इसे ऐसे समझ सकते हैं: परमेश्वर का न्याय का कार्य सत्य के माध्यम से मनुष्य पर विजय पाकर पूरा किया जाता है। "सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना," हमें इन वचनों पर सावधानी से विचार करना चाहिए। मनुष्य न्याय के कार्य को करने में सक्षम क्यों नहीं है? कुछ लोग कहते हैं, मनुष्य के पास सत्य नहीं है इसलिए वह सत्य व्यक्त नहीं कर सकता। इस तरह की समझ, इस तरह की स्वीकृति बिल्कुल ठीक है। क्योंकि मनुष्य के पास सत्य नहीं है और वह सत्य से सम्पन्न नहीं है, इसलिए मनुष्य न्याय के कार्य को पूरा नहीं कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं: "परमेश्वर अपने वचन को व्यक्त करने के लिए नबियों का उपयोग करने में सक्षम है, इसलिए क्या परमेश्वर ने न्याय का कार्य करने के लिए अपने वचन व्यक्त करने के संबंध में नबियों का उपयोग किया?" नहीं। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के वचन को व्यक्त करते नबी और कभी भी, कहीं भी सत्य व्यक्त करते परमेश्वर स्वयं, दोनों अलग-अलग परिणाम उत्पन्न करेंगे, क्योंकि नबी स्वयं सत्य नहीं हैं। जब कोई ऐसा जो सत्य नहीं है परमेश्वर का वचन व्यक्त करता है, तो इसका क्या परिणाम होगा? मसीह, परमेश्वर के रूप में अपनी पहचान के माध्यम से न्याय के कार्य को पूरा करते हुए, कभी भी और कहीं भी सत्य व्यक्त कर सकता है, परमेश्वर के स्वरूप को प्रकट कर सकता है, और परमेश्वर के स्वभाव को ज्ञात करवा सकता है। हालांकि, एक नबी, जो स्वयं सत्य नहीं है और जो परमेश्वर के स्वरूप को कभी भी और कहीं भी प्रकट नहीं कर सकता है, उसके द्वारा परमेश्वर के वचन को व्यक्त करने से जो परिणाम उत्पन्न होते हैं, और परमेश्वर द्वारा सीधे सत्य व्यक्त किये जाने के परिणाम के बीच क्या अंतर है? यदि यह कुछ ऐसा है जिसे तुम पूरी तरह से समझ सकते हो, तो तुम्हें इन वचनों की सही समझ है, "न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता।" "उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता।" इसमें क्या-क्या शामिल है? अगर परमेश्वर अपने वचन को व्यक्त करने के लिए लोगों या नबियों का उपयोग करता है तो यह उचित नहीं है। ऐसा क्यों है? यह वो परिणाम क्यों प्राप्त नहीं करेगा जो परमेश्वर के स्वयं कार्य पूरा करने से उत्पन्न होता है? यदि तुम इसे पूरी तरह से समझने में सक्षम हो, तो तुम इन वचनों को स्वीकार करने में सक्षम होगे।

न्याय के कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर के वचन को व्यक्त करने के संबंध में परमेश्वर द्वारा नबियों का उपयोग करना क्यों उचित नहीं होगा? यदि कार्य इस तरह से किया जाता है तो कौन से परिणाम हासिल नहीं किए जा सकेंगे? क्या तुम इसे देख सकते हो? यदि नबियों का उपयोग परमेश्वर के वचन को व्यक्त करने के लिए किया जाता है, तो इसका परिणाम यह होगा कि लोग केवल व्यक्त किये जा रहे वचनों को थोड़ा-बहुत ही समझने में सक्षम होंगे। परन्तु जहाँ तक परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के स्वरूप, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गये सत्य को समझने की बात है, तो व्यक्ति चाहे कितना ही प्रयास क्यों ना करे, सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करना असंभव होगा। सर्वोत्तम परिणाम क्यों हासिल नहीं किया जा सकता है? अपने सार में, नबी स्वयं इन्सान हैं। चूंकि वे प्रकृति से इन्सान हैं, तो क्या वे परमेश्वर के स्वरूप को प्रकट कर सकते हैं? इसे प्रकट करने का कोई तरीका है ही नहीं। ... इस बात के आधार पर, हम देख सकते हैं कि नबी, चाहे जैसे भी परमेश्वर के वचन को व्यक्त करें, वे परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करने में सक्षम नहीं होंगे, न ही वे परमेश्वर के पूरे स्वरूप को प्रकट करने में सक्षम होंगे, क्योंकि नबी प्रकृति से इन्सान हैं, वे दिव्य नहीं हैं। मसीह के पास एक दिव्य सार है, और न्याय के कार्य को करने में वह कभी भी और कहीं भी सत्य व्यक्त कर सकता है, वह परमेश्वर के पूरे स्वरूप को प्रकट कर सकता है। मसीह में, मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव को देख पाता है, और परमेश्वर के स्वरूप को देख पाता है, वह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को देख पाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के माध्यम से हम परमेश्वर के वचन को कितना समझ पाते हैं, अंतत: हम कभी भी परमेश्वर की समझ को हासिल नहीं कर पाएंगे, और हम जो हासिल करने में सक्षम होंगे, वह बहुत ही सीमित होगा! अब तुम इसे स्पष्ट रूप से समझ गए होगे! है ना? तो अब जब परमेश्वर कहते हैं, "न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता।" तो हमें इन वचनों का मतलब समझने में सक्षम होना चाहिए, है ना? हालाँकि, धार्मिक जगत के लोग इन वचनों के मायने समझने में असमर्थ हैं, वे इन्हें नहीं समझते। वे सोचते हैं कि चूँकि व्यवस्था के युग में परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए मूसा का उपयोग कर सकता था, तो अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए भी परमेश्वर को मनुष्य का उपयोग करने में समर्थ होना चाहिए। लेकिन क्या यह परमेश्वर की मंशा से बहुत अलग नहीं है? अब हम इस बात को समझ सकते हैं। यह परमेश्वर की कृपा है। धार्मिक जगत के लोग इसे नहीं पहचान सकते; क्योंकि उन्हें अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का कोई अनुभव नहीं है। कितने सारे सत्य वे समझने में असमर्थ होंगे! उनमें कई तरह के सत्य की समझ की कमी है। उनकी तुलना में, हमने बहुत, बहुत अधिक पाया है। 'वचन देह में प्रकट होता है' इस किताब में, जो कुछ भी व्यक्त किया गया है वो सत्य है। संसार की सृष्टि से लेकर अब तक, परमेश्वर के कार्य के विभिन्न चरणों से होकर गुजरने के बाद भी जो सत्य अब तक मानवजाति द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है, वो इस किताब में है, इसमें वे सत्य भी हैं जो अब तक समझे नहीं गये हैं। लेकिन आज, चूँकि हम अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर रहे हैं, हमने इन सत्यों को पा लिया है। क्या यह परमेश्वर की कृपा नहीं है? क्या यह परमेश्वर का गहन प्रेम नहीं है?

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 7: कल रात मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा, “भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है” मुझे लगता है यह परमेश्वर के वचन का बेहतरीन, बहुत ही व्यावहारिक अंश है, और बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में कि भ्रष्ट मानवजाति को परमेश्वर के देहधारण का उद्धार क्यों मिलना चाहिए, यह सत्य का एक ऐसा पहलू है जिसे मनुष्य को अतिशीघ्र समझना चाहिए। कृपया इस पर हमारे साथ थोड़ा और संवाद करें ताकि हम सब सत्य के इस पहलू को समझ सकें।

अगला: प्रश्न 9: अनुग्रह के युग में, परमेश्वर मानवजाति की पाप-बलि के रूप में सेवा करने के लिए देह बना, और पापों से उन्हें बचा लिया। अंतिम दिनों में परमेश्वर सत्य को प्रकट करने और न्याय के अपने कार्य को करने के लिए फिर से देह बन गया है, ताकि मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध किया जा सके और बचाया जा सके। तो मानव जाति को बचाने का कार्य करने के लिए परमेश्वर को दो बार देहधारण की आवश्यकता क्यों पड़ती है? और परमेश्वर का दो बार देहधारण करने का वास्तविक महत्व क्या है?

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