प्रश्न 7: कल रात मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा, "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है" मुझे लगता है यह परमेश्वर के वचन का बेहतरीन, बहुत ही व्यावहारिक अंश है, और बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में कि भ्रष्ट मानवजाति को परमेश्वर के देहधारण का उद्धार क्यों मिलना चाहिए, यह सत्य का एक ऐसा पहलू है जिसे मनुष्य को अतिशीघ्र समझना चाहिए। कृपया इस पर हमारे साथ थोड़ा और संवाद करें ताकि हम सब सत्य के इस पहलू को समझ सकें।

उत्तर:

"भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है" परमेश्वर के वचन का यह अंश परमेश्वर के देहधारण द्वारा भ्रष्ट मानवजाति के उद्धार के अर्थ को पूरी तरह से स्पष्ट करता है। आइये हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन को पढ़ें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं,

"यह ठीक इसलिए है, क्योंकि शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है और मनुष्य ही वह प्राणी है जिसे परमेश्वर बचाना चाहता है, और इसलिए भी कि परमेश्वर को शैतान के साथ युद्ध करने और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की चरवाही करने के लिए देह धारण करनी चाहिए। केवल यही उसके कार्य के लिए लाभदायक है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना')।

"मनुष्य की देह को इतना ज़्यादा भ्रष्ट किया जा चुका है कि वह परमेश्वर का इस हद तक विरोध करती है कि वह खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध कर बैठती है और उसके अस्तित्व को ही नकारती है। यह भ्रष्ट देह बेहद अड़ियल है, देह के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने और उसे परिवर्तित करने से ज़्यादा कठिन और कुछ भी नहीं। शैतान परेशानियाँ खड़ी करने के लिए मनुष्य की देह में आता है, और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने और उसकी योजना को बाधित करने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है। इस प्रकार इंसान शैतान बनकर परमेश्वर का शत्रु हो गया है। मनुष्य को बचाने के लिए, पहले उस पर विजय पानी होगी। इसी चुनौती से निपटने के लिए परमेश्वर जो कार्य करने का इरादा रखता है, उसकी खातिर देह में आता है और शैतान के साथ युद्ध करता है। उसका उद्देश्य भ्रष्ट मनुष्य का उद्धार, शैतान की पराजय और उसका विनाश है, जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। परमेश्वर मनुष्य पर विजय पाने के अपने कार्य के माध्यम से शैतान को पराजित करता है, और साथ ही भ्रष्ट मनुष्यजाति को भी बचाता है। इस प्रकार, यह एक ऐसा कार्य है जो एक ही समय में दो लक्ष्यों को प्राप्त करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

"मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भष्ट कर दिया गया है, उसे एकदम अन्धा करके बुरी तरह से नुकसान पहुँचाया गया है। परमेश्वर देह में आकर निजी तौर पर कार्य इसलिए करता है क्योंकि उसके उद्धार का लक्ष्य हाड़-माँस का इंसान है, और इसलिए भी क्योंकि परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने के लिए शैतान भी मनुष्य की देह का उपयोग करता है। दरअसल, शैतान के साथ युद्ध इंसान पर विजय पाने का कार्य है, और साथ ही, इंसान परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है। इस तरह, देहधारी परमेश्वर का कार्य आवश्यक है। शैतान के हाथों भ्रष्ट होकर इंसान शैतान का मूर्त रूप बन गया है, परमेश्वर के हाथों हराये जाने का लक्ष्य बन गया है। इस तरह, पृथ्वी पर शैतान से युद्ध करने और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य किया जाता है। इसलिए शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर का मनुष्य बनना आवश्यक है। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा होता है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा होता है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र में अपना कार्य कर रहा होता है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर साकार करता है। जिस पर विजय पायी जाती है वो इंसान है, वो इंसान जो उसके प्रति अवज्ञाकारी है, जिसे पराजित किया जाता है वो शैतान का मूर्त रूप है (बेशक, यह भी इंसान ही है) जो उससे शत्रुता रखता है, और अंतत: जिसे बचाया जाता है वह भी इंसान ही है। इस तरह, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह ऐसा इंसान बने जिसका बाहरी आवरण एक सृजन का हो, ताकि वह शैतान से वास्तविक युद्ध कर सके, समान बाहरी आवरण धारण किए हुए अपने प्रति अवज्ञाकारी और शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाये गये इंसान पर विजय पा सके, उसे बचा सके। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का लक्ष्य मनुष्य है, और उसके उद्धार का लक्ष्य भी मनुष्य ही है, जिसे उसने बनाया है। इसलिए उसे मनुष्य बनना ही होगा, मनुष्य बनकर उसका कार्य कहीं ज़्यादा आसान हो जाता है। वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और मनुष्य को बचाने में समर्थ है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से हम यह जान पाते हैं कि परमेश्वर के देहधारण द्वारा भ्रष्ट मानवजाति को बचाए जाने का कारण यह है कि मनुष्य की देह को शैतान ने पूरी तरह से छला और भ्रष्ट कर दिया है। पूरी मानवजाति शैतान के क्षेत्र में रहती है, वे अच्छे और बुरे, सुंदरता और कुरूपता के बीच अंतर नहीं कर सकते। वे सकारात्मक और नकारात्मक के बीच अंतर नहीं बता सकते। वे शैतान के सिद्धांत, नियम और स्वभाव के अनुसार जीते हैं, वे घमंडी, आत्म-अभिमानी, लापरवाह और स्वेच्छाचारी हैं। वे सभी शैतान के प्रतिरूप हैं और परमेश्वर का विरोध करने के लिए शैतान के साथ साजिश करते हुए भ्रष्ट हो गए हैं, फिर भी वे इस बात को नहीं समझते हैं। परमेश्वर सृष्टि के रचयिता हैं, केवल परमेश्वर ही मनुष्य के सही स्वभाव को अच्छी तरह से जानते हैं कि वह किस हद तक भ्रष्ट हो गया है। और केवल परमेश्वर ही मनुष्य की शैतानी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभाव को उजागर कर उसकी काट-छांट कर सकते हैं, मनुष्य को मनुष्य की तरह रहने और काम करने का तरीका बता सकते हैं, और मानवजाति को पूरी तरह से जीतने, शुद्ध करने और बचाने का काम कर सकते हैं। परमेश्वर के अलावा, कोई भी सृजित मनुष्य, मानव के भ्रष्टाचार के सार को नहीं समझ सकता है और निश्चित रूप से मनुष्य को मनुष्य की तरह कार्य करने के तरीके का सत्य नहीं बता सकता है। इसलिए, अगर परमेश्वर पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति को शैतान के चंगुल से निकालना चाहते हैं और उसे बचाना चाहते हैं, तो यह केवल तभी हो सकता है जब परमेश्वर का देहधारण व्यक्तिगत रूप से सत्य और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है और मनुष्य को वह सारा सत्य बताता है जो उसके पास होना आवश्यक है, जिससे मनुष्य सत्य को, परमेश्वर को समझ सकता है, और शैतान के दुर्गुणों और विभिन्न अशुद्धियों को समझ सकता है, केवल तभी मनुष्य शैतान को त्याग और अस्वीकार कर सकता है और परमेश्वर के पास वापस लौट सकता है। इसके अलावा, परमेश्वर के देहधारण का कार्य सभी प्रकार के मनुष्यों को उजागर करता है। क्योंकि सारे मनुष्य घमंडी हैं और मानने से इनकार करते हैं इसलिए जब परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करने के लिए देहधारण करते हैं, तो मनुष्य सदैव अपनी अवधारणाओं के साथ प्रतिक्रिया, प्रतिरोध और यहाँ तक कि लड़ाई करता है। इस तरह, परमेश्वर का प्रतिरोध करने और धोखा देने की भ्रष्ट मानवजाति की सच्चाई पूरी तरह से उजागर हो जाती है और परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्टाचार और उनकी सही प्रकृति के आधार पर उसका न्याय करते हैं। केवल इसी तरीके से, परमेश्वर द्वारा मानवजाति के विजय, शुद्धिकरण और पूर्णता का कार्य सहजता से पूरा किया जा सकता है। परमेश्वर के वचनों के न्याय के माध्यम से, मनुष्य को धीरे-धीरे जीता और शुद्ध किया जाता है। जब मनुष्य को पूरी तरह से जीत लिया जाता है, तो वह देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने लगता है, वह परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का पालन करने लगता है और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, वह सत्य की खोज करने के लिए तैयार होता है और फिर कभी शैतान के सिद्धांत और नियमों के अनुसार नहीं जीता है। जब मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के अनुसार जीता है, तब परमेश्वर ने शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया होता है और भ्रष्ट मनुष्य शैतान के विरुद्ध उनकी जीत का अवशिष्ट बन जाता है। वास्तव में, परमेश्वर भ्रष्ट मानवजाति को शैतान के चंगुल से निकालते हैं। ऐसा प्रभाव केवल देहधारी परमेश्वर के कार्य में हो सकता है। यह मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के देहधारण की पूर्ण अनिवार्यता है, और केवल देहधारी परमेश्वर ही मानवजाति को पूरी तरह से जीत और बचा सकते हैं। परमेश्वर जिन लोगों का इस्तेमाल करते हैं, वे मानवजाति के छुटकारे और बचाव का कार्य करने में सक्षम होते हैं।

अगर भ्रष्ट मनुष्य बचाया जाना चाहता है तो, उसे सचमुच अपने न्याय और शुद्धिकरण के लिए परमेश्वर के व्यक्तिगत रूप से देहधारण की जरूरत है। मनुष्य के साथ देहधारी परमेश्वर के परस्पर संवाद के दौरान, वे मनुष्य को आमने-सामने परमेश्वर को समझने और जानने का मौक़ा देते हैं। क्योंकि असली सत्य की खोज करने वाले अंत के दिनों के मसीह के न्याय और शुद्धिकरण को स्वीकार करते हैं, वे स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की आज्ञा पालन करने में सक्षम होते हैं और अपने दिल में परमेश्वर के लिए प्रेम रखते हैं और उन्हें शैतान के कार्यक्षेत्र से पूरी तरह बचा लिया जाता है। क्या यह परमेश्वर के लिए मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने का सबसे अच्छा तरीका नहीं है? क्योंकि परमेश्वर ने देहधारण की है, हमें परमेश्वर के साथ आमने-सामने आने और उनके असली कार्य का अनुभव करने का अवसर मिला, और हमें परमेश्वर के सटीक वचन की आपूर्ति प्राप्त करने तथा सीधे उनके द्वारा मार्गदर्शित होने और सिंचित किये जाने का मौक़ा मिला ताकि हम परमेश्वर पर भरोसा करना, परमेश्वर की आज्ञा मानना और उनको सचमुच प्रेम करना शुरू कर सकें। अगर परमेश्वर ने मानवजाति के उद्धार का कार्य करने के लिए देहधारण नहीं किया होता, तो यह व्यावहारिक प्रभाव हासिल नहीं किया जा सकता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "देह में उसके कार्य के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि वह उन लोगों के लिए सटीक वचन, उपदेश और मनुष्यजाति के लिए अपनी विशिष्ट इच्छा को उन लोगों के लिए छोड़ सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं, ताकि बाद में उसके अनुयायी देह में किए गए उसके समस्त कार्य और संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा को अत्यधिक सटीकता से, ठोस तरीके से उन लोगों तक पहुँचा सकें जो इस मार्ग को स्वीकार करते हैं। मनुष्यों के बीच केवल देहधारी परमेश्वर का कार्य ही सही अर्थों में परमेश्वर के मनुष्य के साथ रहने और उसके साथ जीने के सच को पूरा करता है। केवल यही कार्य परमेश्वर के चेहरे को देखने, परमेश्वर के कार्य की गवाही देने, और परमेश्वर के व्यक्तिगत वचन को सुनने की मनुष्य की इच्छा को पूरा करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')। "भ्रष्ट मनुष्य के लिए सबसे अधिक मूल्य रखने वाला कार्य वो है जो सटीक वचन, अनुसरण के लिए स्पष्ट लक्ष्य प्रदान करे, जिसे देखा या स्पर्श किया जा सके। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होता है, और केवल वास्तविक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और दूषित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पूर्व के भ्रष्ट और पथभ्रष्ट स्वभाव से बचा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')। "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार और प्रत्यक्ष कार्य की और भी अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को इस बात की आवश्यकता है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसे समर्थन दे, उसका सिंचन और पोषण करे, उसका न्याय करे, उसे ताड़ना दे। उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह तथा बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देह में प्रकट परमेश्वर ही मनुष्य का विश्वासपात्र, उसका चरवाहा, उसकी हर वक्त मौजूद सहायता बन सकता है, और यह सब वर्तमान और अतीत दोनों के ही देहधारण की आवश्यकताएँ हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

जब परमेश्वर भ्रष्ट मानवजाति को बचाने के लिए देहधारण करते हैं, वे मानवजाति को परमेश्वर की मांगों, उनकी इच्छा, उनके स्वभाव और उनके अस्तित्‍व के बारे में स्पष्ट रूप से बताने के लिए मनुष्य की भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस तरीके से, जांच-पड़ताल और खोज करने की जरूरत के बिना, मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को स्पष्ट रूप से समझ सकता है, परमेश्वर की मांगों को और उनको पूरा किये जाने के तरीकों को जान सकता है। इस तरीके से, वह परमेश्वर की व्यावहारिक समझ और ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। जिस तरह अनुग्रह के युग में, पतरस ने प्रभु यीशु से पूछा था, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" (मत्ती 18:21)। यीशु ने पतरस से सीधे कहा था: "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक" (मत्ती 18:22)। इससे हम यह देख सकते हैं कि देहधारी प्रभु यीशु जब कभी भी और जहां कहीं भी गए, उन्होंने मनुष्य का पोषण और सहयोग दिया, जिससे मनुष्य को सबसे व्यावहारिक और स्पष्ट आपूर्ति मिली। अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर लोगों के बीच देहधारी हुए, मनुष्य की वास्तविक परिस्थिति का समाधान करने के लिए सत्य को अभिव्यक्त किया, परमेश्वर के स्वभाव और वह सब जो परमेश्वर के पास है और उनके अस्तित्‍व, को अभिव्यक्त किया, ताकि मानवजाति को सहयोग और आपूर्ति की जा सके, परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास के भीतर की सभी अशुद्धियों और दुर्गुणों की ओर ध्यान दिलाया, मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा और उनकी मांगों की जानकारी दी, जिससे मनुष्य को जीवन की सबसे व्यावहारिक और स्पष्ट आपूर्ति और पोषण मिला। उदाहरण के लिए, जब हम परमेश्वर के बारे में जाने बिना उनसे विद्रोह और उनका प्रतिरोध करते हुए जीते हैं, परमेश्वर का वचन हमें सीधे उजागर कर हमारा न्याय करता है, जिससे हम परमेश्वर के वचन में यह देख पाते हैं कि कैसे हमारी शैतानी प्रकृति परमेश्वर के विरुद्ध है। जब हम अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए परमेश्वर का अनुसरण करते हैं और ऐसा करने में आत्म-संतुष्ट होते हैं, परमेश्वर हमारी कमियों को उजागर करते हैं और हमें बताते हैं कि परमेश्वर के अनुयायियों के रूप में हमारी धारणाएं क्या होनी चाहियें। जब हम परमेश्वर के न्याय के हमारे अनुभव में परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं, परमेश्वर के वचन हमें उन सच्चे इरादों की याद दिलाते हैं जिसके जरिए परमेश्वर मानवजाति को बचाते और उसका न्याय करते हैं, परमेश्वर को लेकर हमारी गलतफहमियों को दूर करते हैं। परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों ने इस बात का गहराई से अनुभव किया कि किस तरह देहधारी परमेश्वर लगातार हमारी मदद करते हैं और आपूर्ति करते हैं ताकि हमें जांच-पड़ताल और खोज करने की जरूरत ना पड़े। परमेश्वर के सबसे व्यावहारिक पोषण और जल को प्राप्त करने के लिए, हमें बस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन को अधिक से अधिक पढ़ना चाहिए। परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त किये गए वचन के माध्यम से, हमें परमेश्वर की इच्छा, उनके स्वभाव और वह सब जो उनके पास है और उनके अस्तित्‍व, की कुछ सही समझ मिलती है और इस समझ के जरिए, हम यह जान पाते हैं कि इस तरह से खोज कैसे की जाए कि हम एक सही जीवन जी सकें और शैतान के नीचतापूर्ण कार्यों के बारे में जान सकें, साफ़ तौर पर यह देख सकें कि कैसे हमने अपने आपको शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर लिया है, और ऐसा करने में, धीरे-धीरे अपने पाप और शैतान के काले प्रभाव को ख़त्म कर सकें। इसके परिणाम स्वरूप, हमारा जीवन स्वभाव बदल जाता है और हम सही दिशा में आगे बढ़ने लगते हैं, सत्य की वास्तविकता के साथ जीने लगते हैं। परमेश्वर के देहधारण ने यह सब संभव कर दिया है।

परमेश्वर ने कार्य करने और अपना वचन अभिव्यक्त करने के लिए देहधारण किया है, जिससे मनुष्य को सबसे व्यावहारिक जीवन सामग्री और पोषण मिलता है। इस तथ्य के बावजूद कि देहधारी परमेश्वर के न्याय के कार्य के संबंध में मनुष्य की कई अवधारणाएं हैं, परमेश्वर ने मनुष्य को जीवन का मार्ग और चिरस्थायी उद्धार दिया है, और मनुष्य उनके ऊपर निर्भर हो गया है! आइये अब हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन का दूसरा अंश पढ़ें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "वह देह में जो कार्य करता है उसकी कल्पना करने या उसे मापने का कोई तरीका नहीं है, क्योंकि उसका देह हाड़-माँस के इंसान की तरह नहीं है; हालाँकि उनका बाहरी आवरण एक जैसा है, फिर भी सार एक जैसा नहीं है। उसका देह परमेश्वर के बारे में लोगों के बीच कई तरह की धारणाओं को जन्म देता है, फिर भी उसका देह मनुष्य को अधिक ज्ञान भी अर्जित करने दे सकता है, और वह किसी भी ऐसे व्यक्ति पर विजय प्राप्त कर सकता है जिसका बाहरी आवरण समान ही है। क्योंकि वह मात्र एक मनुष्य नहीं है, बल्कि मनुष्य जैसे बाहरी आवरण वाला परमेश्वर है, कोई भी पूरी तरह से उसकी गहराई को न तो माप सकता है और न ही उसे समझ सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

"देहधारी परमेश्वर के कार्य की वजह से परमेश्वर स्पर्श-गम्य देह धारण करता है, जिसे इंसान देख और छू सकता है। वह कोई निराकार पवित्रात्मा नहीं है, बल्कि एक देह है मनुष्य जिसे देख सकता है और जिससे सम्पर्क कर सकता है। लेकिन अधिकांश लोग जिन परमेश्वरों पर विश्वास करते हैं, वे निराकार देवता होते हैं, उनका कोई रूप नहीं होता। इस तरह, देहधारी परमेश्वर उनमें से अधिकांश लोगों का शत्रु बन गया है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और जो लोग परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते, उसी तरह, वे भी परमेश्वर के विरोधी बन गए हैं। ... यद्यपि अधिकांश लोग इस देह के कारण परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं, फिर भी जब वह अपना कार्य पूरा करेगा, तो जो लोग उसके विरोधी हैं वे न केवल उसके शत्रु नहीं रहेंगे, बल्कि उसके गवाह बन जाएँगे। वे ऐसे गवाह बन जाएँगे जिन्हें उसके द्वारा जीत लिया गया है, ऐसे गवाह जो उसके अनुकूल हैं और उससे अभिन्न हैं। मनुष्य के लिए देह में उसने जो कार्य किया है उसके महत्व को वह मनुष्य को ज्ञात करवाएगा, और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ के लिए इस देह के महत्व को मनुष्य जानेगा, मनुष्य के जीवन के विकास के लिए उसके वास्तविक मूल्य को जानेगा, और इसके अतिरिक्त, यह जानेगा कि यह देह जीवन का एक जीवंत स्रोत बन जाएगा जिससे अलग होने की बात को मानव सहन नहीं कर सकता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है')।

इस तथ्य के बावजूद कि परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए, अंत के दिनों में अपने देहधारण में एक साधारण मनुष्य के पुत्र का रूप लिया है, इसके बावजूद कि उन्होंने न तो कोई संकेत दिया और न ही चमत्कार किये, और ना ही उनमें कोई महामानव का गुण या विशाल डील-डौल है और वे मनुष्य की अवधारणाओं का निशाना भी बने, उनके इनकार, प्रतिरोध और अस्वीकार के बावजूद, मसीह द्वारा व्यक्त किये गए सत्य और उनके द्वारा किये जाने वाले न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के वचन की आपूर्ति दी है, और उन्हें सत्य को हासिल करने और परमेश्वर के प्रकटन को देखने में सक्षम बनाया है। हालांकि हमने परमेश्वर के असली व्यक्तित्व को नहीं देखा है, हमने उनके आंतरिक स्वभाव और उनके पवित्र सार को देखा है, जो बिल्कुल वैसा ही है मानो हमने उनके असली व्यक्तित्व को देखा हो। हमने सचमुच वास्तविकता में परमेश्वर को हमारे बीच रहते देखा है। हम सचमुच यह महसूस करते हैं कि सिंहासन के सामने हमारा स्वर्गारोहण किया गया है, हमने परमेश्वर के आमने-सामने होकर परमेश्वर के कार्य को अनुभव किया है और सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के सजीव जल की आपूर्ति का आनंद उठाया है। अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य का अनुभव करने के बाद, हम धीरे-धीरे उन सच्चे इरादों को समझ पाए हैं जिनके साथ परमेश्वर मानवजाति को बचाते हैं, और देखा है कि मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर जो कीमत चुकाते हैं और जिन यातनाओं को सहते हैं, वह सचमुच महान है। परमेश्वर हमारे लिए जो कुछ भी करते हैं वह उनके प्रेम की अभिव्यक्ति है और उसका लक्ष्य हमारा उद्धार करना है। हम हमारे पिछले विद्रोह और मूर्खता के लिए अपने आप से घृणा करते हैं और सचमुच परमेश्वर को प्रेम करने और उनकी आज्ञा मानने लगते हैं। अब तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद, हम सब यह समझ गए हैं कि हम जो बदलाव अपने आपमें देखते हैं वह पूरी तरह से देहधारी परमेश्वर के उद्धार का परिणाम है! अंत के दिनों के मसीह भ्रष्ट मानवजाति का सबसे बड़ा उद्धार हैं। वे परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर की प्रशंसा पाने का एकमात्र मार्ग हैं! आइये हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन का दूसरा अंश पढ़ें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "इस बार, परमेश्वर कार्य करने आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि एकदम साधारण देह में आया है। इसके अलावा, यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण का देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में तुम ऐसा कुछ नहीं देख सकते जो इसे दूसरों से अलग करता हो, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में पहले कभी नहीं सुना गया। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य के वचनों का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर के काम की ज़िम्मेदारी लेता है, और मनुष्यों के समझने के लिये परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव को अभिव्यक्त करता है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? क्या तुम मनुष्यजाति के गंतव्य को जानने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते हो? वह तुम्हें वो सभी अकल्पनीय रहस्य बतायेगा—वो रहस्य जो कभी कोई इंसान नहीं बता सका, और तुम्हें वो सत्य भी बतायेगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में तुम्हारे लिये द्वार है, और नये युग में तुम्हारा मार्गदर्शक है। ... अंत के दिनों में परमेश्वर के काम का उद्देश्य स्वर्ग के परमेश्वर को मनुष्यों के बीच पृथ्वी पर रहते हुए दिखाना है और मनुष्यों को इस योग्य बनाना है कि वे परमेश्वर को जानें, उसकी आज्ञा मानें, आदर करें, और परमेश्वर से प्रेम करें। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटकर आया है। यद्यपि आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर मनुष्यों के ही समान है, उसकी एक नाक और दो आँखें हैं और वह एक साधारण परमेश्वर है, अंत में परमेश्वर तुम लोगों को दिखाएगा कि अगर यह मनुष्य नहीं होता तो स्वर्ग और पृथ्वी एक अभूतपूर्व बदलाव से होकर गुज़रते; अगर यह मनुष्य नहीं होता तो, स्वर्ग मद्धिम हो जाता, पृथ्वी पर उथल-पुथल हो जाती, समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों के बीच जीती। परमेश्वर तुम लोगों को दर्शायेगा कि यदि अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को बचाने के लिए नहीं आया होता तो परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नर्क में नष्ट कर दिया होता; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सदैव ही कट्टर पापी होते, और तुम हमेशा के लिए लाश बन जाते। तुम सबको यह जानना चाहिये कि यदि यह देह नहीं होता तो समस्त मानवजाति को एक अवश्यंभावी संकट का सामना करना होता, और अंत के दिनों में मानवजाति के लिये परमेश्वर के कठोर दण्ड से बच पाना कठिन होता। यदि इस साधारण शरीर का जन्म नहीं होता तो तुम सबकी दशा ऐसी होती जिसमें तुम लोग जीने में सक्षम न होते हुए जीवन की भीख माँगते और मृत्यु के लिए प्रार्थना करते लेकिन मर न पाते; यदि यह देह नहीं होता तो तुम लोग सत्य को नहीं पा सकते थे और न ही आज परमेश्वर के सिंहासन के पास आ पाते, बल्कि तुम लोग परमेश्वर से दण्ड पाते क्योंकि तुमने जघन्य पाप किये हैं। क्या तुम सब जानते हो, यदि परमेश्वर का वापस देह में लौटा न होता, तो किसी को भी उद्धार का अवसर नहीं मिलता; और यदि इस देह का आगमन न होता, तो परमेश्वर ने बहुत पहले पुराने युग को समाप्त कर दिया होता? अब जबकि यह स्पष्ट है, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के दूसरी बार के देहधारण को नकार सकते हो? जब तुम लोग इस साधारण मनुष्य से इतने सारे लाभ प्राप्त कर सकते हो, तो तुम लोग उसे प्रसन्नतापर्वूक स्वीकार क्यों नहीं करते हो?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है')।

"जिस तथ्य तक तुम लोग आज पहुँचे हो यह इसी देह के कारण है। क्योंकि परमेश्वर इस देह में जीता है इसीलिए तुम सबके पास जीवित रहने का मौका है। यह सभी उत्तम भाग्य जो तुम सबने पाया है, वह इस साधारण मनुष्य के कारण है। न केवल इतना, बल्कि अंत में समस्त जातियाँ इस साधारण मनुष्य की उपासना करेंगी साथ ही साथ उसे धन्यवाद देंगी और इस मामूली व्यक्ति की आज्ञा का पालन करेंगी, क्योंकि उसके द्वारा लाये गए सत्य, जीवन और मार्ग ने समस्त मानवजाति को बचाया है, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच के संघर्ष को शांत किया है, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच की दूरी कम की है, और परमेश्वर और मनुष्यों के के बीच के विचारों के संपर्क का रास्ता खोला है। इसी ने परमेश्वर को और अधिक महान महिमा प्रदान की है। क्या ऐसा साधारण व्यक्ति तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह, मसीह कहलाने के योग्य नहीं है? क्या ऐसा साधारण मनुष्य, मनुष्यों के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हो सकता? क्या ऐसा व्यक्ति जिसने मानवजाति को आपदा से बचाया है, वह तुम लोगों के प्रेम और अवलंबन के योग्य नहीं हो सकता? यदि तुम लोग उसके मुख से निकले सत्य को नकारते हो, और तुम लोग अपने बीच में उसके अस्तित्व का तिरस्कार करते हो, तो तुम लोगों का अंत में क्या होगा?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है')।

"यीशु के कार्य के बिना मानवजाति सूली से उतर नहीं सकती थी, परन्तु बिना आज के देहधारण के वे लोग कभी परमेश्वर की सराहना नहीं पा सकते या नये युग में प्रवेश नहीं कर सकते जो सूली से उतर गए हैं। इस साधारण मनुष्य के आगमन के बिना, तुम लोगों को कभी भी यह अवसर नहीं मिलता या तुम लोग कभी भी इस योग्य नहीं हो सकते थे कि परमेश्वर के सच्चे मुखमंडल का दर्शन कर सको, क्योंकि तुम लोग ऐसी वस्तु हो जिसे बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। परमेश्वर के द्वितीय देहधारण के आगमन के कारण, परमेश्वर ने तुम लोगों को क्षमा कर दिया है और तुम लोगों पर दया दिखाई है। खैर, मैं अंत में इन वचनों के साथ तुम लोगों से विदा लेना चाहता हूँ : यह साधारण मनुष्य जो देहधारी परमेश्वर है, तुम लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। यही वह सबसे बड़ा काम है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच पहले ही कर दिया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है')।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 6: हम सब जानते हैं कि प्रभु यीशु परमेश्वर का देहधारण थे। अपना कार्य पूरा करने के बाद, उन्हें सूली पर लटका दिया गया और तब वे फिर से जीवित हो उठे और अपने सभी शिष्यों के समक्ष प्रकट हुए और वे अपने तेजस्वी आध्यात्मिक शरीर के साथ स्वर्ग में पहुँच गए। जैसा कि बाइबल में कहा गया है: "हे गलीली पुरुषो, तुम क्यों खड़े आकाश की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। इस प्रकार, बाइबल-संबंधी शास्‍त्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि जब प्रभु फिर से आएंगे, तो उनका पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर हमारे सामने दिखाई देगा। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण क्यों किया है? प्रभु यीशु के पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर और मनुष्य के पुत्र के रूप में उनके देहधारण के बीच क्या अंतर है?

अगला: प्रश्न 8: व्यवस्था के युग का कार्य करने के लिए परमेश्वर ने मूसा का उपयोग किया, तो अंतिम दिनों में परमेश्वर अपने न्याय के कार्य को करने के लिए लोगों का इस्तेमाल क्यों नहीं करता है, बल्कि इस कार्य को उसे खुद करने के लिए देह बनने की ज़रूरत क्यों है? और देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं, उनमें क्या ख़ास अंतर है?

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