प्रश्न 39: दो हजार वर्षों से, पूरी धार्मिक दुनिया का मानना है कि परमेश्वर एक ट्रिनिटी या रित्व है, और त्रित्व पूरे ईसाई सिद्धांत का एक उत्कृष्ट मत है। तो क्या "त्रित्व" की विवेचना सचमुच टिक पाती है? क्या त्रित्व वास्तव में मौजूद है? तुम यह क्यों कहते हो कि त्रित्व धार्मिक दुनिया का सबसे बड़ा भ्रम है?

उत्तर:

तुम सभी अपनी इस अभिपुष्टि को कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, बाइबल में दर्ज की गई बातों पर आधारित करते हो, और फिर जब तुम प्रभु यीशु को परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए देखते हो, तो यह तुम्हारे लिए और अधिक पुष्टि करता है कि प्रभु यीशु और परमेश्वर का पिता-पुत्र का रिश्ता है। पवित्र आत्मा की गवाही और प्रेरितों की गवाही और सीमांकन इसे और बढ़ाता है, और तुम तब निश्चित हो जाते हो कि परमेश्वर त्रित्व है। पूरी तरह से इस वजह से कि परमेश्वर ने छुटकारे के कार्य को करने के लिए देहधारण किया था, और साथ ही देहधारण की सच्चाई को समझने में असफल रहे लोगों से उत्पन्न हुई ग़लतफ़हमी की वजह से, दो हज़ार वर्षों तक, धर्म की दुनिया निश्चित रही है कि एक सच्चा परमेश्वर जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों को बनाया है, वह त्रित्व है। यद्यपि कई लोगों को लगता है कि त्रित्व की व्याख्या पूरी तरह से उपयुक्त नहीं है, चूँकि वे देहधारण के सत्य को नहीं जानते हैं इसलिए वे इस अवास्तविक तरीके से परमेश्वर को सीमांकित करते हैं। यदि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के आगमन की बात न होती, तो देहधारण के रहस्यों को प्रकट करना और इसका विश्लेषण करना, जो कि दुनिया के निर्माण के बाद से धर्म की दुनिया की सबसे बड़ी भ्रांति है, तो कोई भी त्रित्व की व्याख्या में त्रुटि को पहचानने में सक्षम नहीं होता। जबकि सच्चाई यह है कि जब से दुनिया का सृजन हुआ है, परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि वह एक त्रित्व है, न तो देहधारी प्रभु यीशु ने कभी ऐसा कहा, और न ही पवित्र आत्मा ने कभी यह गवाही दी है कि परमेश्वर एक त्रित्व है—यह एक मान्य तथ्य है। त्रित्व की व्याख्या देहधारी प्रभु यीशु के आने के बाद आयी, जब लोगों में परमेश्वर के बारे में ग़लत समझ पैदा हुई, जो कि देहधारण की सच्चाई को समझने में उनकी कमी से उत्पन्न हुई थी। बाइबल के भीतर, बहुत से लोग पवित्र आत्मा को प्रभु यीशु का प्रिय पुत्र होने की गवाही देते हुए देखते हैं, और वे उसे परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए देखते हैं, इसलिए परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ और कल्पनाएँ उत्पन्न होती हैं, मानो कि परमेश्वर तीन व्यक्ति थे—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। इसलिए, बहुत से लोग यह नहीं जानते हैं कि उन्हें किस परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, और न ही वे यह जानते हैं कि कौन-सा परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करता है और सभी चीजों को तय करता है। कुछ लोगों को लगता है कि एक परमेश्वर से प्रार्थना करना सही नहीं है, इसलिए वे अन्य दो को भी शामिल करना चाहते हैं; कुछ लोग सिर्फ प्रभु यीशु से प्रार्थना करने में असहज महसूस करते हैं, इसलिए वे यहोवा परमेश्वर को भी शामिल कर लेते हैं। यह लोगों को भ्रमित करता है और उनका मन बेचैन हो जाता है। उस समय के शिष्यों ने वास्तव में प्रभु यीशु से पूछा था कि परमपिता परमेश्वर के बारे में वास्तविक स्थिति क्या है, और प्रभु यीशु ने यह कह कर स्पष्ट रूप से उत्तर दिया था: "मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है। तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा? क्या तू विश्वास नहीं करता कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है?" (यूहन्ना 14:9-10), "मैं और पिता एक हैं" (यूहन्ना 10:30)। पिता और पुत्र एक हैं—एक परमेश्वर हैं—यह एक परम सत्य है, जिसमें कोई ग़लती नहीं है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि तुम लोगों में से कोई भी कहता है कि त्रित्व वास्तव में है, तो समझाओ कि तीन व्यक्तियों में यह एक परमेश्वर क्या है। पवित्र पिता क्या है? पुत्र क्या है? पवित्र आत्मा क्या है? क्या यहोवा पवित्र पिता है? क्या यीशु पुत्र है? फिर पवित्र आत्मा का क्या? क्या पिता एक आत्मा नहीं है? पुत्र का सार भी क्या एक आत्मा नहीं है? क्या यीशु का कार्य पवित्र आत्मा का कार्य नहीं था? एक समय आत्मा द्वारा क्रियान्वित यहोवा का कार्य क्या यीशु के कार्य के समान नहीं था? परमेश्वर में कितने आत्माएं हो सकते हैं? तुम्हारे स्पष्टीकरण के अनुसार, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के तीन व्यक्ति एक हैं; यदि ऐसा है, तो तीन आत्माएं हैं, लेकिन तीन आत्माओं का अर्थ है कि तीन परमेश्वर हैं। इसका मतलब है कि कोई भी एक सच्चा परमेश्वर नहीं है; इस प्रकार के परमेश्वर में अभी भी परमेश्वर का निहित सार कैसे हो सकता है? यदि तुम मानते हो कि केवल एक ही परमेश्वर है, तो उसका एक पुत्र कैसे हो सकता है और वह पिता कैसे हो सकता है? क्या ये सब केवल तुम्हारी धारणाएं नहीं हैं? केवल एक परमेश्वर है, इस परमेश्वर में केवल एक ही व्यक्ति है, और परमेश्वर का केवल एक आत्मा है, वैसा ही जैसा बाइबल में लिखा गया है कि 'केवल एक पवित्र आत्मा और केवल एक परमेश्वर है।' जिस पिता और पुत्र के बारे में तुम बोलते हो, वे चाहे अस्तित्व में हों, कुल मिलाकर परमेश्वर एक ही है और पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का सार, जिसे तुम लोग मानते हो, पवित्र आत्मा का सार है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर एक आत्मा है लेकिन वह देहधारण करने और मनुष्यों के बीच रहने के साथ-साथ सभी चीजों से ऊँचा होने में सक्षम है। उसका आत्मा समस्त-समावेशी और सर्वव्यापी है। वह एक ही समय पर देह में हो सकता है और पूरे विश्व में और उसके ऊपर हो सकता है। चूंकि सभी लोग कहते हैं कि परमेश्वर एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, फिर एक ही परमेश्वर है, जो किसी की इच्छा से विभाजित नहीं होता! परमेश्वर केवल एक आत्मा है और केवल एक ही व्यक्ति है; और वह परमेश्वर का आत्मा है। यदि जैसा तुम कहते हो, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, तो क्या वे तीन परमेश्वर नहीं हैं? पवित्र आत्मा एक तत्व है, पुत्र दूसरा है, और पिता एक और है। उनके व्यक्तित्व अलग हैं और उनके सार अलग हैं, तो वे एक इकलौते परमेश्वर का हिस्सा कैसे हो सकते हैं? पवित्र आत्मा एक आत्मा है; यह मनुष्य के लिए समझना आसान है। यदि ऐसा है तो, पिता और भी अधिक एक आत्मा है। वह पृथ्वी पर कभी नहीं उतरा और कभी भी देह नहीं बना है; वह मनुष्यों के दिल में यहोवा परमेश्वर है और निश्चित रूप से वह भी एक आत्मा है। तो उसके और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह पिता और पुत्र के बीच का संबंध है? या यह पवित्र आत्मा और पिता के आत्मा के बीच का रिश्ता है? क्या प्रत्येक आत्मा का सार एकसमान है? या पवित्र आत्मा पिता का एक साधन है? इसे कैसे समझाया जा सकता है? और फिर पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह दो आत्माओं का संबंध है या एक मनुष्य और आत्मा के बीच का संबंध है? ये सभी ऐसे मामले हैं, जिनकी कोई व्याख्या नहीं हो सकती! यदि वे सभी एक आत्मा हैं, तो तीन व्यक्तियों की कोई बात नहीं हो सकती, क्योंकि वे एक आत्मा के अधीन हैं। यदि वे अलग-अलग व्यक्ति होते, तो उनकी आत्माओं की शक्ति भिन्न होती और बस वे एक ही आत्मा नहीं हो सकते थे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?')।

"फिर भी कुछ कह सकते हैं: 'पिता पिता है; पुत्र पुत्र है; पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है और अंत में वे एक बनेंगे।' तो तुम उन्हें एक कैसे बना सकते हो? पिता और पवित्र आत्मा को एक कैसे बनाया जा सकता है? यदि वे मूल रूप से दो थे, तो चाहे वे एक साथ कैसे भी जोड़ें जाएं, क्या वे दो हिस्से नहीं बने रहेंगे? जब तुम उन्हें एक बनाने को कहते हो, तो क्या यह बस दो अलग हिस्सों को जोड़कर एक बनाना नहीं है? लेकिन क्या पूरे किए जाने से पहले वे दो भाग नहीं थे? प्रत्येक आत्मा का एक विशिष्ट सार होता है और दो आत्माएं एक नहीं बन सकतीं। आत्मा कोई भौतिक वस्तु नहीं है और भौतिक दुनिया की किसी भी अन्य वस्तु के समान नहीं है। जैसे मनुष्य इसे देखता है, पिता एक आत्मा है, बेटा दूसरा, और पवित्र आत्मा एक और, फिर तीन आत्माएं एक साथ पूरे तीन गिलास पानी की तरह मिलकर पूरा एक बनते हैं। क्या यह तीन को एक बनाना नहीं है? यह एक शुद्ध रूप से ग़लत व्याख्या है! क्या यह परमेश्वर को विभाजित करना नहीं है? पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी को एक कैसे बनाया जा सकता है? क्या वे भिन्न प्रकृति वाले तीन भाग नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?')।

"पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह अवधारणा सबसे बेतुकी है! यह परमेश्वर को खंडित करती है और प्रत्येक को एक ओहदा और आत्मा देकर उसे तीन व्यक्तियों में विभाजित करती है; तो कैसे वह अब भी एक आत्मा और एक परमेश्वर हो सकता है? मुझे बताओ कि क्या स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें पिता, पुत्र या पवित्र आत्मा द्वारा बनाई गई थीं? कुछ कहते हैं कि उन्होंने यह सब मिलकर बनाया। फिर किसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया? क्या यह पवित्र आत्मा था, पुत्र था या पिता? कुछ कहते हैं कि वह पुत्र था, जिसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया था। तो फिर सार में पुत्र कौन है? क्या वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण नहीं है? एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से देहधारी स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाता है। क्या तुम्हें पता नहीं कि यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के गर्भधारण से हुआ था? उसके भीतर पवित्र आत्मा है; तुम कुछ भी कहो, वह अभी भी स्वर्ग में परमेश्वर के साथ एकसार है, क्योंकि वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण है। पुत्र का यह विचार केवल असत्य है। यह एक आत्मा है जो सभी कार्य क्रियान्वित करता है; केवल परमेश्वर स्वयं, यानी परमेश्वर का आत्मा अपना कार्य क्रियान्वित करता है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है, जो यीशु में कार्य करता है? यदि कार्य पवित्र आत्मा (अर्थात, परमेश्वर का आत्मा) द्वारा क्रियान्वित नहीं किया गया था, तो क्या उसका कार्य स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?')।

"मैं बताता हूँ कि वास्तव में, ब्रह्मांड में कहीं भी त्रयात्मक परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है। परमेश्वर का न पिता है और न पुत्र, और इस ख्याल का तो और भी वजूद नहीं है कि पिता और पुत्र संयुक्त तौर पर पवित्र आत्मा का उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। यह सब बड़ा भ्रम है और संसार में इसका कोई अस्तित्व नहीं है! फिर भी इस प्रकार के भ्रम का अपना मूल है और यह पूरी तरह निराधार नहीं है, क्योंकि तुम लोगों के मन इतने साधारण नहीं हैं और तुम्हारे विचार तर्कहीन नहीं हैं। बल्कि, वे काफी उपयुक्त और चतुर हैं, इतने कि किसी शैतान द्वारा भी अभेद्य हैं। अफ़सोस यह कि ये विचार बिल्कुल भ्रामक हैं और बस इनका अस्तित्व नहीं है! तुम लोगों ने वास्तविक सत्य को देखा ही नहीं है; तुम लोग केवल अटकलें और कल्पनाएं लगा रहे हो, फिर धोखे से दूसरों का विश्वास प्राप्त करने या सबसे अधिक बुद्धिहीन या तर्कहीन लोगों पर प्रभाव जमाने के लिए इस सबको कहानी में पिरो रहे हो, ताकि वे तुम लोगों की महान और प्रसिद्ध 'विशेषज्ञ शिक्षाओं' पर विश्वास करें। क्या यह सच है? क्या यह जीवन का तरीका है, जो मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए? यह सब बकवास है! एक शब्द भी उचित नहीं है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?')।

"यीशु के भीतर का आत्मा, स्वर्ग में आत्मा और यहोवा का आत्मा सब एक हैं। इसे पवित्र आत्मा, परमेश्वर का आत्मा, सात गुना सशक्त आत्मा और सर्वसमावेशी आत्मा कहा जा सकता है। परमेश्वर का आत्मा बहुत से कार्य क्रियान्वित कर सकता है। वह दुनिया को बनाने और पृथ्वी को बाढ़ द्वारा नष्ट करने में सक्षम है; वह सारी मानव जाति को छुटकारा दिला सकता है और इसके अलावा वह सारी मानवजाति को जीत और नष्ट कर सकता है। यह सारा कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा क्रियान्वित किया गया है और उसके स्थान पर परमेश्वर के किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता था। उसके आत्मा को यहोवा और यीशु के नाम से, साथ ही सर्वशक्तिमान के नाम से भी बुलाया जा सकता है। वह प्रभु और मसीह है। वह मनुष्य का पुत्र भी बन सकता है। वह स्वर्ग में भी है और पृथ्वी पर भी है; वह ब्रह्मांडों के ऊपर और बहुलता के बीच में है। वह स्वर्ग और पृथ्वी का एकमात्र स्वामी है! सृष्टि के समय से अब तक, यह कार्य स्वयं परमेश्वर के आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया गया है। यह कार्य स्वर्ग में हो या देह में, सब कुछ उसकी आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। सभी प्राणी, चाहे स्वर्ग में हों या पृथ्वी पर, उसकी सर्वशक्तिमान हथेली में हैं; यह सब स्वयं परमेश्वर का कार्य है और उसके स्थान पर किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। स्वर्ग में वह आत्मा है, लेकिन स्वयं परमेश्वर भी है; मनुष्यों के बीच वह देह है, पर स्वयं परमेश्वर बना रहता है। यद्यपि उसे सैकड़ों-हज़ारों नामों से बुलाया जा सकता है, तो भी वह स्वयं है और सारा कार्य उसके आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसके क्रूसीकरण के माध्यम से सारी मानव जाति का छुटकारा उसके आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य था और वैसे ही अंत के दिनों के दौरान सभी देशों और सभी भूभागों के लिए उसकी घोषणा भी। हर समय, परमेश्वर को केवल सर्वशक्तिमान और एक सच्चा परमेश्वर, सभी समावेशी स्वयं परमेश्वर कहा जा सकता है। अलग-अलग व्यक्ति अस्तित्व में नहीं हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का यह विचार तो बिल्कुल नहीं है! स्वर्ग में और पृथ्वी पर केवल एक ही परमेश्वर है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन त्रित्व की इस भ्रांति का बहुत ही तीक्ष्णता से और स्पष्टता से विश्लेषण करते हैं: परमेश्वर ही एक सच्चा परमेश्वर है, परमेश्वर ही पवित्र आत्मा है और केवल एक ही पवित्र आत्मा है, इसलिए केवल एक ही परमेश्वर है। परमेश्वर ही पवित्र आत्मा है और पवित्र आत्मा ही परमेश्वर है; यह इसे कहने का मात्र एक अलग तरीका है। देहधारी परमेश्वर पवित्र आत्मा का देह बनना है और उसके देह का सार तब भी पवित्र आत्मा ही है। हम प्रार्थना करते समय चाहे उसे कैसे भी संबोधित क्यों न करें, परमेश्वर, पवित्र आत्मा और देहधारी परमेश्वर सभी एक परमेश्वर, एक पवित्रात्मा हैं। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे कोई नकार नहीं सकता है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर एक आत्मा है लेकिन वह देहधारण करने और मनुष्यों के बीच रहने के साथ-साथ सभी चीजों से ऊँचा होने में सक्षम है। उसका आत्मा समस्त-समावेशी और सर्वव्यापी है। वह एक ही समय पर देह में हो सकता है और पूरे विश्व में और उसके ऊपर हो सकता है। चूंकि सभी लोग कहते हैं कि परमेश्वर एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, फिर एक ही परमेश्वर है, जो किसी की इच्छा से विभाजित नहीं होता!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?')। हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि केवल एक ही परमेश्वर है, जो कि पवित्र आत्मा है। जब पवित्र आत्मा अपने आप को देह रूपी परिधान पहनाता है और मानव बन जाता है, तो फिर हम परमेश्वर को पहचानते क्यों नहीं? और हम परमेश्वर को त्रित्व के रूप में परिभाषित करते हुए, उसे एक में वापस लाने से पहले तीन में विभाजित करते हैं। यह वास्तव में कैसी बेतुकी बात है! इससे यह देखा जा सकता है कि हम मानव वास्तव में आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते हैं। सच्चाई यह है कि हम चाहे इसके बारे में कुछ भी क्यों न कहें, त्रित्व एक अंतर्विरोध है; जब कभी हम ऐसी बात सुनते हैं, तो हमें एहसास होता है कि यह उपयुक्त नहीं है, कि यह थोड़ा असहज है। हम अपने हृदय में स्पष्ट रूप से जानते हैं कि केवल एक ही परमेश्वर है, तो क्या यह परमेश्वर वास्तव में त्रित्व हो सकता है? क्या परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए त्रित्व की व्याख्या का उपयोग करना सही है? क्या यह परमेश्वर के बारे में सच्ची समझ है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्लेषण और सूझ-बूझ के माध्यम से, यह हम सभी को स्पष्ट हो जाता है कि त्रित्व की व्याख्या कितनी हास्यास्पद है, और यह निश्चित रूप से धर्म की दुनिया की सबसे बड़ी भ्रांति है। क्या यह कहना कि एक परमेश्वर तीन है उसे टुकड़ों में तराशना नही है? क्या इस बात पर हठपूर्वक ज़ोर देना ईशनिंदा नहीं है कि एक परमेश्वर, एक पवित्रात्मा, के तीन हिस्से हैं? परमेश्वर ने अंत के दिन तक दो हज़ार वर्षों तक मनुष्यजाति के साथ धैर्य का प्रयोग किया है, जब परमेश्वर एक बार फिर से उस चीज को पूरी तरह से उजागर करने और उसका विश्लेषण करने के लिए, जो उसे सबसे अधिक पीड़ा देती है—जो कि धर्म की पूरी दुनिया की सबसे बेतुकी भ्रांति है—और समस्त मनुष्यजाति को परमेश्वर पर स्पष्टता प्राप्त करने और यह समझने के लिए देह बना कि केवल एक परमेश्वर है, जो कि पवित्र आत्मा है, और यह कि पवित्र आत्मा ही एक सच्चा परमेश्वर है, जो सृष्टि का स्वामी है। यद्यपि परमेश्वर देह बन जाता है, तब भी वह एक परमेश्वर है। वह दो परमेश्वरों या दो पवित्रात्माओं में सर्वथा नहीं बदल सकता है, और यह सब पवित्र आत्मा का कार्य है। प्रभु यीशु, यहोवा परमेश्वर था, जो देह रूपी परिधान पहने हुए था; प्रभु यीशु, यहोवा परमेश्वर की अभिव्यक्ति था। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके देह का सार पवित्र आत्मा है, और पवित्र आत्मा यहोवा परमेश्वर है, तो क्या वे एक ही परमेश्वर नहीं हैं? यदि हम, मनुष्य के रूप में, इस तरह के एक साधारण तथ्य को स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रहे हैं, तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि हमें आध्यात्मिक मामलों की कोई समझ नहीं है? कोई आश्चर्य नहीं कि प्रभु यीशु ने कहा: "हे फिलिप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ, और क्या तू मुझे नहीं जानता?" (यूहन्ना 14:9)। स्पष्ट रूप से, हम भ्रष्ट मानव वास्तव में परमेश्वर को आसानी से नहीं जान सकते हैं, और यदि परमेश्वर स्वयं देहधारण के सत्य के रहस्य को प्रकट नहीं करता, तो कोई भी इसे नहीं समझ नहीं पाता। प्रभु यीशु बोलने और कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के सामने आया और इसके अलावा, यह बाइबल में दर्ज किया गया था। दो हजार वर्षों तक, किसी ने भी वास्तव में प्रभु यीशु को नहीं जाना है और यहाँ तक कि देहधारण की सच्चाई को तो बिल्कुल नहीं समझा है। यदि वे वास्तव में समझ गए होते, तो उन्होंने परमेश्वर को त्रित्व के रूप में परिभाषित नहीं किया होता। अपनी अवधारणाओं में, हम मानते हैं कि यहोवा परमेश्वर वह परमेश्वर है जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी वस्तुओं का सृजन किया है और जो सभी चीजों पर शासन करता है, कि प्रभु यीशु सभी संतों का प्रभु, मसीह, उद्धारकर्ता है, और पवित्र आत्मा प्रभु का कार्य पर होना है, इस प्रकार त्रित्व को श्रम का एक स्पष्ट विभाजन प्रदान करते हैं। त्रित्व को बनाने वाले तीनों में से प्रत्येक का अपना अधिकार क्षेत्र है—एक स्वर्ग के लिए जिम्मेदार है, एक पृथ्वी के लिए जिम्मेदार है, और पवित्र आत्मा मनुष्य में कार्य करने के लिए जिम्मेदार है। यदि हम परमेश्वर के श्रम को इस तरह से विभाजित करते हैं, तो क्या इससे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और उसकी समस्त बुद्धि को पूरी तरह से नकारा नहीं जाता है? परमेश्वर एक सर्व-समावेशी परमेश्वर है; वह सर्वसामर्थ्यवान है। यदि हम स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वसामर्थ्यवान है, तो फिर क्यों परमेश्वर को तीन में विभाजित करें? यह कि हम परमेश्वर को तीन में विभाजित करने में सक्षम हैं यह दर्शाता है कि हम परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और उसकी सर्वव्यापी प्रकृति को नहीं समझते हैं। हम यह सोचकर परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को स्वीकार नहीं करते कि वह इन सब कार्यों को करने में असमर्थ है, और इसलिए हम उसे इस तरह से विभाजित करते हैं, मानो कि परमेश्वर के लिए केवल इसी तरह से कार्य करना उचित है—यह पूरी तरह से मनुष्य की अवधारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित एक विभाजन है। परमेश्वर स्पष्ट रूप से एक परमेश्वर है, इसलिए क्या परमेश्वर को तीन हिस्सों में काटने पर जोर देना किसी ऐसे व्यक्ति का कार्य है जो परमेश्वर का आदर करता है? क्या इस तरह के व्यक्ति में कोई धर्मनिष्ठा है? क्या इस तरह का कृत्य अहंकार और दंभ से नहीं भरा है? क्या इस तरह से परमेश्वर को काटना और उसे सीमांकित करना वास्तव में उसका अनादर करना और उसके विरुद्ध ईशनिंदा करना नहीं है? हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के त्रित्व की व्याख्या के विश्लेषण और प्रकाशन से देख सकते हैं कि भ्रष्ट मनुष्यजाति का परमेश्वर को एक त्रित्व के रूप में परिभाषित करना परमेश्वर को सबसे अधिक ठेस पहुँचाता है। यह परमेश्वर को तीन टुकड़ों में काटने, फिर उसे एक में वापस जोड़ने के बराबर है। परमेश्वर ही एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, तो मनुष्यजाति को इस तरह से परमेश्वर को काटने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? इसलिए, "क्या त्रित्व का अस्तित्व है?" में परमेश्वर कहता है: "मैं बताता हूँ कि वास्तव में, ब्रह्मांड में कहीं भी त्रयात्मक परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है। परमेश्वर का न पिता है और न पुत्र, और इस ख्याल का तो और भी वजूद नहीं है कि पिता और पुत्र संयुक्त तौर पर पवित्र आत्मा का उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। यह सब बड़ा भ्रम है और संसार में इसका कोई अस्तित्व नहीं है!" "ऐसा कोई समय नहीं, जिस पर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के त्रित्व का विचार खड़ा रह सके; यह भ्रांति है, जो युगों तक शायद ही कभी समझी गई है और इसका अस्तित्व नहीं है!" (वचन देह में प्रकट होता है)। यह परमेश्वर है जो स्पष्ट रूप से समस्त ब्रह्मांड के लिए त्रित्व की भ्रांति का विश्लेषण और उसे उजागर कर रहा है। यदि, जब हम परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तब भी हम उन्हें समझ नहीं पाते हैं और हम तब भी सत्य को स्वीकार नहीं करते, तो हम परमेश्वर का अपमान कर रहे हैं और हम परमेश्वर के द्वारा दंडित किये जाने और हटाये जाने के ही लायक हैं।

— 'पटकथा-प्रश्नों के उत्तर' से उद्धृत

त्रिदेव (त्रिनिटी) शब्द किसके मुंह से आया था? क्या यह पवित्र आत्मा की गवाही से आया है या क्या यह स्वयं प्रभु यीशु द्वारा कहा गया था? या, क्या यह भ्रष्ट इंसान से मिला एक निचोड़ है? यह शब्द मनुष्यों के मुंह से आया है, इसे भ्रष्ट इंसान ने सारांशित किया है। सबसे पहले, परमेश्वर ने यह नहीं कहा था; दूसरी बात, पवित्र आत्मा ने इस तरह से प्रबुद्ध नहीं किया था; तीसरा, किसी प्रेरित ने यह नहीं कहा, इसे भ्रष्ट मानव जाति ने सारांशित किया है। इसलिए, यह अभिव्यक्ति परमेश्वर का वचन नहीं है, परमेश्वर ने इसे नहीं कहा था। हम सभी जानते हैं कि केवल एक ही परमेश्वर है। देहधारी परमेश्वर के पास दिव्य सार है। जब वह शरीर में अपना कार्य पूरा कर लेता है और आध्यात्मिक क्षेत्र में लौट जाता है, तब उसकी मूल पहचान परमेश्वर की ही होती है। परमेश्वर की मूल पहचान आत्मा है, देहधारी परमेश्वर नश्वर शरीर में आत्मा का साक्षात् स्वरूप है, जबकि सार अब भी आत्मा ही है। इसलिए, परमेश्वर केवल एक ही है। अधिकांश समय वह आत्मा के रूप में ही मनुष्यों के बीच अपना कार्य करता है। जब देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य करना ज़रूरी होता है, तब वह देह-धारण करता है, लेकिन यह केवल कुछ समय के लिए होता है। इसलिए, चाहे इसे जैसे भी कहा गया हो, परमेश्वर केवल एक ही है। परमेश्वर आत्मा है। दो देहधारणों के माध्यम से अपने कार्य को पूरा करने के बाद, वह फिर से देहधारण नहीं करेगा; परमेश्वर बाद में हमेशा के लिए आत्मा ही रहेगा। एक ही में तीन व्यक्ति—पवित्र पिता, पवित्र पुत्र, पवित्र आत्मा बिल्कुल मौजूद नहीं हैं और कहने का यह तरीका मान्य नहीं है। परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि वह एक में तीन व्यक्ति है, यहोवा परमेश्वर ने पुराने नियम में ऐसा नहीं कहा, प्रभु यीशु ने देहधारी परमेश्वर के रूप में नए नियम में यह कभी नहीं कहा, अपने बाद के कार्य में भी पवित्र आत्मा ने यह नहीं कहा था। इसलिए, यह कथन बिल्कुल भी मान्य नहीं है। प्रभु यीशु ने यह कैसे कहा? "उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो" (मत्ती 28:19)। जब लोग बपतिस्मा लेते हैं, तो वे पिता के नाम का आह्वान कर सकते हैं, पवित्र आत्मा के नाम का, और वे पुत्र के नाम का भी आह्वान कर सकते हैं, लेकिन यह निश्चित से पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नामों को एक साथ जोड़ना नहीं है, यह इसका अर्थ नहीं है। इस कथन को एक सूत्र में बदल देना, धर्म के लोगों के लिए गलत है। चूँकि उस समय बहुत से लोग प्रभु यीशु की पहचान के बारे में अनिश्चित थे, प्रभु यीशु ने उन्हें पिता के नाम का आह्वान करने की इजाज़त दी थी। लेकिन वास्तव में जब लोग निश्चित थे कि यीशु ही प्रभु था, कि वह देहधारी परमेश्वर था, वे सीधे यीशु के नाम का आह्वान कर सकते थे। उन्हें पिता के नाम का आह्वान करने की कोई ज़रूरत नहीं थी, और उनके लिए पवित्र आत्मा के नाम का आह्वान करने की तो और भी कम आवश्यकता थी। इसलिए, एक कारण है कि परमेश्वर ने उस समय उन शब्दों को कहा, क्योंकि बहुत से लोग प्रभु यीशु को स्वीकार नहीं करते थे, न ही उन्होंने प्रभु यीशु को माना था। इसलिए, उसने ऐसे शब्द कहे जो लोगों को अधिक समझ आते थे और उन्हें स्वीकार्य थे, लेकिन जब धर्म के लोग पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के तीन नामों का एक सूत्र के रूप में आह्वान करते हैं, तो वे आखिर किसके नाम पर आह्वान कर रहे हैं? मनुष्यों को ग़लतफ़हमी हुई है, एक ही नाम पर्याप्त होगा और यह यीशु के नाम का आह्वान करना है। यीशु ही पिता है, पिता और पुत्र मूल रूप से एक हैं, क्या ऐसा नहीं है? जो कोई भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नामों का आह्वान करता है, वह सार को समझ नहीं पाता, उसने प्रभु यीशु के शब्दों को ग़लत समझ लिया है; ऐसा स्पष्टीकरण सही है या नहीं? यह बिलकुल सटीक है। भ्रष्ट इंसान परमेश्वर के वचन को क्यों नहीं समझता है, और क्यों वह एक ही बार में परमेश्वर को इन तीन भागों में विभाजित कर देता है? इसका कारण यह है कि मनुष्य के पास वो संकाय नहीं हैं जिनके द्वारा सच्चाई को समझा जा सकता है। इसलिए, जब देहधारी परमेश्वर ने मानवजाति से बात की, तो कुछ कठिनाइयाँ उत्पन्न हुईं, और उन्हें यह कहना पड़ा कि मनुष्य पिता के नाम को पुकार सकता है, और कि वह पुत्र के नाम पर भी आह्वान कर सकता है, यदि वह उसे स्वीकार कर पाता है। उन लोगों के लिए भी जो असल में उसे स्वीकार नहीं कर पाते थे, यह बिल्कुल सही था अगर वे पवित्र आत्मा के नाम पर आह्वान करें। हम मनुष्य के प्रति परमेश्वर की उदारता को देख सकते हैं और हम मनुष्य की कमज़ोरी और उसके अज्ञान के लिए प्रभु यीशु की चिंता को भी समझ सकते हैं। इस संबंध में, परमेश्वर ने किसी खास व्यक्ति को संबोधित नहीं किया था और हमें परमेश्वर के अभिप्राय को समझना चाहिए।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 38: हाल के वर्षों में, धार्मिक संसार में विभिन्न मत और संप्रदाय अधिक से अधिक निराशाजनक हो गए हैं, लोगों ने अपना मूल विश्वास और प्यार खो दिया है और वे अधिक से अधिक नकारात्मक और कमज़ोर बन गए हैं। हम उत्साह का मुरझाना भी देखते हैं और हमें लगता है कि हमारे पास प्रचार करने के लिए कुछ नहीं है और हम सभी ने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है। कृपया हमें बताओ, पूरी धार्मिक दुनिया इतनी निराशाजनक क्यों है? क्या परमेश्वर वास्तव में इस दुनिया से नफरत करता है और क्या उसने इसे त्याग दिया है? हमें "प्रकाशितवाक्य" पुस्तक में धार्मिक दुनिया के प्रति परमेश्वर के शाप को कैसे समझना चाहिए?

अगला: प्रश्न 40: सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों का मसीह, सत्य को व्यक्त करता है और मानवता को शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय का अपना कार्य करता है, और फिर भी वह धार्मिक दुनिया और चीनी कम्युनिस्ट सरकार, दोनों की बेतहाशा निंदा और क्रूर कार्यवाही का मुकाबला करता है, जहां वे मसीह का तिरस्कार करने, उसकी निन्दा करने, उसे पकड़ने और नष्ट करने के लिए उनके सशस्त्र बलों और सभी मीडिया तक को जुटाते हैं। जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ, तब हेरोदेस ने सुना कि "इस्राएल का राजा" पैदा हो चुका था और उसने सभी नर बच्चों को जो बेतलेहेम में थे और दो वर्ष से कम उम्र के थे, मरवा डाला था; उसे मसीह को जीवित रहने देने की बजाय दस हजार बच्चों को गलत ढंग से मार डालना बेहतर लगा। परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने के लिए देहधारण किया है, तो धार्मिक दुनिया और नास्तिक सरकार क्यों परमेश्वर के प्रकटन और कार्य के खिलाफ अंधाधुंध तिरस्कार और निन्दा करती हैं? क्यों वे पूरे देश की ताकत को झुका देते हैं और मसीह को क्रूस पर कीलों से जड़ने के लिए कोई प्रयास बाक़ी नहीं रखते हैं? मानव जाति इतनी बुरी क्यों है, वह परमेश्वर से इतनी नफरत क्यों करती है और क्यों उसके खिलाफ खुद मोर्चा लेती है?

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