प्रश्न 37: यद्यपि पादरी और प्राचीन लोग धार्मिक दुनिया में सत्ता रखते हैं और वे ढोंगी फरीसियों के मार्ग पर चलते हैं, हम तो प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, पादरी और प्राचीन लोगों में नहीं, तो तुम यह कैसे कह सकते हो कि हम भी फरीसियों के रास्ते पर चलते हैं? क्या हम वास्तव में धर्म के भीतर रहकर परमेश्वर में विश्वास करने के द्वारा बचाए नहीं जा सकते हैं?

उत्तर:

धर्म में ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो फरीसियों में अंधा विश्वास करते हैं और उनकी आराधना और उनका अनुसरण करते हैं। इसलिए वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह फरीसियों का रास्ता है या नहीं यह बात उस बारे में सोचने पर स्पष्ट हो जाती है। आप यह कहने की हिम्मत कर रही हैं कि आप फरीसियों की आराधना कर अपने दिल में उनको बचाती हैं, मगर उनके पापों से आपका कोई सरोकार नहीं है? आप यह कहने की हिम्मत करती हैं कि आप पाखंडी फरीसियों का अनुसरण करती हैं, लेकिन उन जैसी नहीं हैं, एक ऐसी इंसान जो परमेश्वर का विरोध करे? क्या हम ऐसे आसान सवाल को भी नहीं समझ सकते हैं? आप, जैसे इंसान का अनुसरण करती हैं वैसे ही रास्ते पर चलती हैं। अगर आप फरीसियों का अनुसरण करती हैं, तो आप फरीसियों के रास्ते पर चल रही हैं। अगर आप फरीसियों के रास्ते पर चलती हैं, तो जाहिर है आप फरीसियों जैसी इंसान ही हैं। कोई इंसान जिसका अनुसरण करता है, और जिस रास्ते को चुनता है, वह सब उसके स्वभाव से जुड़ा होता है। जो भी फरीसियों का अनुसरण करता है, उसका स्वभाव और सार भी फरीसियों जैसा ही होता है। यह ऐसी सच्चाई है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता! फरीसियों का सार पाखंड है। वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परंतु सत्य से प्रेम नहीं करते या जीवन को नहीं खोजते। वे सिर्फ ऊपर स्वर्ग में एक अस्पष्ट परमेश्वर में और अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में विश्वास करते हैं, मगर देहधारी मसीह में विश्वास नहीं करते। सच तो यह है कि वे सभी अविश्वासी हैं। उनका परमेश्वर में विश्वास करना धर्मशास्त्र में शोध करना है और परमेश्वर में आस्था को शोध करने के लिए ज्ञान के एक रूप में लेना है। उनकी आजीविका बाइबल और धर्मशास्त्र पर शोध करने से चलती है। उनके दिलों में, बाइबल उनकी आजीविका है। वे मानते हैं कि बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांत को समझाने में वे जितने बेहतर होंगे, उतने ही ज़्यादा लोग उनकी आराधना करेंगे और वे और ज़्यादा दृढ़ता और ऊंचाई से मंच पर खड़े हो सकेंगे, और उनका ओहदा उतना ही ज़्यादा स्थिर होगा। ऐसा बिल्कुल इसलिए है क्योंकि फरीसी ऐसे लोग हैं जो सिर्फ अपने ओहदे और आजीविका के लिए ही जीते हैं, और ऐसे लोग हैं, जो सत्य से उकता चुके हैं और उससे घृणा करते हैं, ऐसे कि जब प्रभु यीशु देहधारी होकर कार्य करने आये तो भी वे जिद के साथ अपनी खुद की धारणाओं, कल्पनाओं और बाइबल के ज्ञान से चिपके रहे, अपने खुद के ओहदों और आजीविका को बचाने की खातिर, वे प्रभु यीशु का विरोध और निंदा करने और परमेश्वर का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से हम फरीसियों के सत्य से नफ़रत करनेवाले सार और उनके परमेश्वर-विरोध की जड़ को पूरी तरह से समझ सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "क्या तुम लोग कारण जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन-सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कोई ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग क्या कहते हो, ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इसके अलावा क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने मसीहा के नाम के साथ व्यर्थ ही चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और बेतुके नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा')। "अतीत में, जब परमेश्वर का अभी देह बनना बाकी था, तो तुम कोई धार्मिक हस्ती या कोई धर्मनिष्ठ विश्वासी रहे होगे। परमेश्वर के देह बनने के बाद ऐसे कई धर्मनिष्ठ विश्वासी अनजाने में मसीह-विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो, यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित नहीं करते या सत्य की खोज नहीं करते, बल्कि इसके बजाय तुम झूठ से ग्रस्त हो जाते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है? देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, इसलिए क्या देहधारी परमेश्वर पर विश्वास न करने वाले सभी लोग मसीह-विरोधी नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं')। यह दर्शाता है कि स्वभाव से धार्मिक फरीसी सत्य से उकता जानेवाले और उससे नफ़रत करनेवाले लोग हैं। वे सिर्फ अपनी खुद की धारणाओं और कल्पनाओं में विश्वास करते हैं। वे सिर्फ खुद अपने द्वारा शोधित और विकसित धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों में भरोसा करते हैं, लेकिन देहधारी मसीह या मसीह के द्वारा व्यक्त सत्य में विश्वास नहीं करते। वे सभी देहधारी परमेश्वर के दुश्मन हैं। वे सब देहधारी परमेश्वर द्वारा, अंत के दिनों में उजागर किये गए मसीह-विरोधी हैं! उनका अनुसरण करनेवाले लोग उन जैसे ही हैं, वे भी जिद पर अड़कर अपनी धारणाओं और कल्पनाओं तथा बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों को पकड़े रहते हैं। वे मसीह को नकारने, उनका विरोध और उनकी निंदा करने में उनका अनुसरण करते हैं, सत्य को स्वीकार करने से इनकार करते हुए और मसीह को दुश्मन मान कर! ये सच इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि स्वभाव और सार में जो भी फरीसियों का अनुसरण करता है वह भी सत्य से उकता चुका है और सत्य से नफ़रत करता है! जिस रास्ते पर वे चलते हैं, वह ठीक फरीसियों का रास्ता है। वे फरीसियों के वर्ग के ही लोग हैं और ऐसे हैं जो मसीह का विरोध करते हैं! यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे सभी समझ सकते हैं। इसे परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य ने पूरी तरह से प्रकट कर दिया है!

धर्म में, सारे लोग फरीसियों के काबू में रहकर, पूरी तरह से उनका अनुसरण करते हुए और उनकी बात मानते हुए, परमेश्वर में विश्वास करते हैं। उन्हीं की तरह वे भी सिर्फ बाइबल और धर्मशास्त्र का अध्ययन करते हैं, सिर्फ बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांत को समझने पर धयान देते हुए, और कभी भी सत्य को खोजने और प्रभु के वचनों पर अमल करने पर ध्यान न देकर। फरीसियों की तरह वे सिर्फ ऊपर स्वर्ग में एक अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन अंत के दिनों के देहधारी मसीह—सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास नहीं करते सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य चाहे जितने भी अधिकारपूर्ण और शक्तिशाली क्यों न हों, वे फिर भी जिद के साथ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से बंधे रहते हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा करने में पादरियों और एल्डर्स का अनुसरण करते हैं। यह कहना बेकार है कि ऐसे लोग फरीसियों जैसे ही हैं, और फरीसियों के परमेश्वर-विरोधी रास्ते पर चल रहे हैं! भले ही ऐसे लोग फरीसियों का अनुसरण न करें, फिर भी वे फरीसियों जैसे लोग ही हैं, और फरीसियों के वंशज ही हैं क्योंकि उनका स्वभाव और सार वही है। वे सभी अविश्वासी हैं जो सिर्फ खुद में विश्वास करते हैं, और सत्य से प्रेम नहीं करते! वे मसीह-विरोधी हैं, जो सत्य से घृणा करते हैं और मसीह का विरोध करते हैं! जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने प्रकट किया है, "ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे अप्रत्याशित रूप से शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे अनपेक्षित ढंग से शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी')। क्या यह सत्य नहीं है? जब धर्म में लोग पादरियों और एल्डर्स का अनुसरण करते हैं, तो वे सिर्फ उनको सुनते ही नहीं, बल्कि वे उनकी रक्षा करने की भी भरसक कोशिश करते हैं; जैसे ही वे किसी को धार्मिक पादरियों और एल्डर्स को बेनकाब करते हुए सुनते हैं, ये लोग बेचैनी महसूस करते हैं और पादरियों और एल्डर्स के बचाव में बाहर आ जाते हैं। इस बात में क्या समस्या है? क्या यह इस बात को साबित करने के लिए काफी नहीं है कि इन लोगों के दिलों में सिर्फ पादरी और एल्डर्स ही बसते हैं और उसमें परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है? इन लोगों के दिलों में, सभी धार्मिक पादरी और एल्डर्स परमेश्वर से ऊंचे स्थान पर हैं। इस बात में कौन-सी समस्या दिखाई पड़ती है? जन मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है तो उनके बचाव में आनेवाले लोग ज्यादा नहीं होते। ऐसे लोग ज्यादा नहीं होते जो परमेश्वर के लिए खड़े होकर उनकी गवाही देते हों! लेकिन जैसे ही धार्मिक पादरियों और एल्डर्स का फरीसी सार उजागर होता है, इतने सारे लोग बाहर क्यों आ जाते हैं जो उनकी तरफ से नाइंसाफी का शोर मचाते हैं और उनके बचाव में बोलने लगते हैं? यह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि ये लोग फरीसियों के कर्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। वे मसीह-विरोधियों के सह-अपराधी और पिछलग्गू हैं! यह एक ऐसी सच्चाई है जिसको कोई नकार नहीं सकता!

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

धर्म किस प्रकार का स्थान है? यह फरीसियों की दुनिया है, मसीह-विरोधियों का पुराना अड्डा! यह सोचना कि वहां परमेश्वर में विश्वास करके आप बचा लिये जाएंगे, सिर्फ खयाली पुलाव है! धर्म में परमेश्वर में विश्वास करने से किसी को क्यों नहीं बचाया जा सकता है? इसका मुख्य कारण यह है कि जब परमेश्वर ने अंत के दिनों में नया कार्य किया, तो परमेश्वर के नये कार्य के साथ पवित्र आत्मा का कार्य भी स्थानांतरित कर दिया गया, और इस प्रकार धार्मिक दुनिया ने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया, और वह बंजर भूमि हो गयी। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया पूरी तरह से पाखंडी फरीसियों और मसीह-विरोधियों के काबू में है, और बहुत समय से ऐसी जगह बन गयी है, जहाँ परमेश्वर का विरोध होता है। यही नहीं कि पवित्र आत्मा धर्म में कार्य नहीं कर रही है, देहधारी परमेश्वर भी कार्य करने के लिए धर्म में नहीं आते हैं। इसलिए, धर्म में परमेश्वर में विश्वास करके कोई परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का अनुभव नहीं कर सकता है। वे परमेश्वर के अंत के दिनों के वचनों का प्रसाद खा-पी नहीं सकते और उनका आनंद नहीं ले सकते, अगर लोग अभी सच्चे मार्ग की खोज और जांच-पड़ताल नहीं करते, तो वे आसानी से बंजर भूमि में गिर जाएंगे और परमेश्वर का उद्धार नहीं पा सकेंगे! जो लोग धार्मिक दुनिया की बंजर भूमि में गिर गये हैं, वे सभाओं में सिर्फ बाइबल से बंधे रहकर परमेश्वर के वर्तमान वचनों का आनंद नहीं ले पाते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य और मार्गदर्शन के बिना, जिन परमेश्वर में मनुष्य विश्वास करता है, वे अस्पष्ट होते हैं। सभाओं में उनके सारे संवाद बाइबल में पहले के परमेश्वर के कार्य के आलेखों और वचनों के बारे में होते हैं। इस प्रकार के लोग परमेश्वर के अंत के दिनों का उद्धार और परमेश्वर का वादा कैसे पा सकते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे कि जब प्रभु यीशु ने प्रार्थनाभवन के बाहर कार्य शुरू किया था। प्रार्थनाभावन एक अव्यवस्थित बंजर भूमि बन गया था, चोरों का अड्डा। प्रभु यीशु के कार्य का अनुसरण न करने के कारण, जो लोग प्रार्थनाभावन में रह गये थे, वे पुरानी व्यवस्थाओं और नियमों को पकड़े हुए थे, और स्वाभाविक रूप से उन लोगों ने प्रभु का उद्धार खो दिया था। इसी तरह से, अब अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने परमेश्वर के लोगों से शुरू करके न्याय का कार्य किया है, मानवजाति के साथ न्याय करने और उनका शुद्धिकरण करने के लिए सत्य व्यक्त किये हैं, जिससे कि मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव और प्रभाव से दूर होकर परमेश्वर का उद्धार पा सके, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण करके विजयी बनाया जा सके और सीधे उनके राज्य में आरोहित किया जा सके। यह एक सुनहरा मौका है! अगर मनुष्य सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का अनुसरण नहीं करता, तो वह उद्धार प्राप्त नहीं कर पायेगा और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पायेगा। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में से कुछ को पढ़ें। "जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मेलन कहा जा सकता है, उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में तो बिलकुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास')। "मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जो लोग जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं सदा के लिए परमेश्वर की घृणा के भागी होंगे। मसीह अंत के दिनों के दौरान राज्य में जाने के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है, और ऐसा कोई नहीं जो उससे कन्नी काटकर जा सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, और इसलिए तुम्हें उसके वचनों को स्वीकार करना और उसके मार्ग का पालन करना चाहिए। सत्य को प्राप्त करने में या जीवन का पोषण स्वीकार करने में असमर्थ रहते हुए तुम केवल आशीष प्राप्त करने के बारे में नहीं सोच सकते हो। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वह उसमें सच्चा विश्वास करने वाले सभी लोगों को जीवन प्रदान कर सके। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और उसका कार्य वह मार्ग है जिसे उन सभी लोगों को अपनाना चाहिए जो नए युग में प्रवेश करेंगे। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और इसकी बजाय उसकी भर्त्सना, निंदा, या यहाँ तक कि उसे उत्पीड़ित करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है')। इससे पता चलता है कि वे सब जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, और वे सब जो परमेश्वर के वर्तमान कार्य और वचनों का पालन नहीं करते हैं, वे सब परमेश्वर की घृणा के पात्र होते हैं। इस प्रकार, धार्मिक स्थानों में बसे हुए लोगों ने स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की कृपा को खो दिया है, और वे परमेश्वर के वास्तविक वचनों की आपूर्ति को नहीं पा सकते। वे सिर्फ अंधेरों में गिर सकते हैं और परमेश्वर के अंत के दिनों के उद्धार को खोने पर नष्ट किये जा सकते हैं, बिल्कुल अनुग्रह के युग की तरह, जब लोग व्यवस्था के युग के कार्य और नियमों को ही पकड़े हुए थे, और जाहिर तौर पर उन्होंने प्रभु यीशु के उद्धार को खो दिया था। राज्य के युग में, अगर लोग अभी भी अनुग्रह के युग के कार्य और नियमों को पकड़े रहेंगे, तो जाहिर तौर पर प्रभु उनका त्याग कर उन्हें नष्ट कर देंगे और उन्हें बचाकर स्वर्गिक राज्य में नहीं ले जाया जाएगा! यह एक ऐसा सच है जिसे कोई नहीं बदल सकता!

धर्म में रहते हुए परमेश्वर में विश्वास करना और फिर भी बचाये जाने की चाह रखना—क्या यह मन के लड्डू खाना नहीं है? एक तरफ शैतान और मसीह-विरोधियों को खुश करने की ख्वाहिश और दूसरी तरफ परमेश्वर का उद्धार पाने की चाह—क्या ऐसा संभव है? धार्मिक दुनिया पाखंडी फरीसियों के काबू में है और उस पर धार्मिक पादरियों और एल्डर्स का नियंत्रण है। असलियत यह है कि वह इन परमेश्वर-विरोधी मसीह-विरोधियों के काबू में है। यह एक प्रमाणित सच है! पादरी और एल्डर्स कार्य करते समय और उपदेश देते समय कभी भी प्रभु के वचनों को समझाने या उनकी गवाही देने पर ध्यान नहीं देते, या बाइबल में परमेश्वर के कार्य और उनके स्वभाव की गवाही नहीं देते। वे सिर्फ बाइबल में मनुष्य के कथनों को समझाने पर ध्यान देते हैं और बाइबल में मनुष्य के कथनों को परमेश्वर के वचनों का स्थान देकर परमेश्वर के वचनों को असंगत बना देते हैं, और इस तरह से लोग परमेश्वर के वचनों से दूर होकर मनुष्य के वचनों का अनुसरण करने लगते हैं। इसके साथ-साथ, वे बाइबल के पात्रों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, आदि-आदि को समझाते हुए बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांत को समझाने पर भी ध्यान देते हैं। वे ऐसी चीज़ें इसलिए समझाते हैं ताकि खुद को बढ़ा-चढ़ा कर दिखा सकें और लोगों से अपनी आराधना करवा सकें, इस तरह वे लोगों को मनुष्य का अनुसरण करने, उसकी आराधना करने और परमेश्वर का विरोध करने के रास्ते पर ले जाते हैं। खास तौर से जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों का अपना कार्य करने आते हैं, तो वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का जबरदस्त विरोध और निंदा करते हैं, और लोगों को सच्चे मार्ग को खोजने और उसकी जांच-पड़ताल करने से रोकने और बंदिश लगाने की भरसक कोशिश करते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य को स्वीकार करने से लोगों को रोकते हैं और उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति नहीं पाने देते हैं। वे सिर्फ लोगों को उनकी तरह-तरह की भ्रांतियों और वैचारिक सिद्धांतों को ही स्वीकार करने देते हैं। इसलिए, जब लोग फरीसियों और मसीह-विरोधियों द्वारा नियंत्रित धार्मिक स्थलों में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और धार्मिक फरीसियों की सीख को स्वीकार करते हैं, तो उनके विचार और नज़रिये और ग्रहण करने की उनकी क्षमता सब-कुछ उनसे प्रभावित और ग्रस्त हो जाते हैं। वे स्वाभाविक रूप से अपने अंतर्मन में काले और अधिक काले हो जाते हैं, और परमेश्वर से अलग हो जाते हैं! जब सर्वशाक्तिमान परमेश्वर, अंत के दिनों में अपना कार्य करने आते हैं, तो धार्मिक फरीसी और मसीह-विरोधी उनको अपने चंगुल में फंसाकार अपने काबू में कर लेते हैं, और इसलिए परमेश्वर के वास्तविक वचनों को सुन पाना उनके लिए संभव नहीं होता या वे परमेश्वर के सिंहासन से बहनेवाले जीवन के सजीव जल की आपूर्ति का आनंद नहीं ले पाते। इस प्रकार, वे परमेश्वर का अंत के दिनों का उद्धार नहीं पा सकेंगे। इससे भी ज़्यादा डरावनी बात यह है कि हालांकि लोग धर्म में रहकर परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परंतु वे जिनका अनुसरण करते हैं, वे मनुष्य हैं, मसीह-विरोधी हैं, और जिस रास्ते पर वे चलते हैं, वह बिल्कुल फरीसियों और मसीह-विरोधियों का ही है। जाहिर है, कुछ समय के बाद, वे भी फरीसी बन जाएंगे। तब फिर वे ऐसे लोग कैसे बन पायेंगे, जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करें और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करें? यह बिल्कुल नामुमकिन है! अब, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य से धार्मिक दुनिया के सार का पर्दाफाश हो चुका है। धार्मिक दुनिया स्वर्ग का राज्य नहीं है; यह मसीह-विरोधियों का पुराना अड्डा है। यह परमेश्वर का विरोध करनेवाला एक मजबूत गढ़ है, एक शैतानी राज्य, जो परमेश्वर का विरोध करता है! इसलिए, धर्म में रहकर परमेश्वर में विश्वास करके लोग उद्धार नहीं पा सकते। भले ही वे सत्य से प्रेम करनेवाले लोग हों, पर चूंकि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे अंत के दिनों के मसीह द्वारा व्यक्त वचनों की आपूर्ति नहीं पा सकेंगे और परमेश्वर का उद्धार भी नहीं पा सकेंगे!

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 36: धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों की धार्मिक संसार में सत्ता बनी हुई है और ज्यादातर लोग उनका पालन और अनुसरण करते हैं—यह एक सच्चाई है। तुम कहते हो कि धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, कि वे देहधारी परमेश्वर द्वारा प्रकट सत्य पर विश्वास नहीं करते और वे फरीसियों के मार्ग पर चल रहे हैं, और हम इस बात से सहमत हैं। लेकिन तुम यह क्यों कहते हो कि सारे धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग पाखंडी फरीसी हैं, कि वे सभी मसीह-विरोधी हैं जो अंतिम दिनों में देहधारी परमेश्वर के कार्य से उघाड़ दिए गए हैं, और वे अंत में विनाश में डूब जाएँगे? हम इस समय इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते। तुम अपना यह दावा कि इन लोगों को नहीं बचाया जा सकता है और उन सभी को विनाश में डूबना चाहिए, किस बात पर आधारित करते हो, इस पर कृपया सहभागिता करो।

अगला: प्रश्न 38: हाल के वर्षों में, धार्मिक संसार में विभिन्न मत और संप्रदाय अधिक से अधिक निराशाजनक हो गए हैं, लोगों ने अपना मूल विश्वास और प्यार खो दिया है और वे अधिक से अधिक नकारात्मक और कमज़ोर बन गए हैं। हम उत्साह का मुरझाना भी देखते हैं और हमें लगता है कि हमारे पास प्रचार करने के लिए कुछ नहीं है और हम सभी ने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है। कृपया हमें बताओ, पूरी धार्मिक दुनिया इतनी निराशाजनक क्यों है? क्या परमेश्वर वास्तव में इस दुनिया से नफरत करता है और क्या उसने इसे त्याग दिया है? हमें "प्रकाशितवाक्य" पुस्तक में धार्मिक दुनिया के प्रति परमेश्वर के शाप को कैसे समझना चाहिए?

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