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प्रश्न 32: फरीसियों ने अक्सर धार्मिक और करुणाशील रूप धारण कर सभाओं में लोगों से बाइबल की व्याख्या की, और वे जाहिर तौर पर कुछ भी गैरकानूनी करते हुए दिखाई नहीं देते थे। तो क्यों प्रभु यीशु ने फरीसियों को शाप दिया था? उनका ढोंग कैसे प्रकट हुआ था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग ढोंगी फरीसियों के मार्ग पर ही चलते हैं?

उत्तर:

जो लोग प्रभु में विश्वास रखते हैं जानते हैं कि प्रभु यीशु वास्तव में फरीसियों से घृणा करते थे और उन्होंने उनको शाप दिया था और उन पर सात संताप घोषित किये थे। यह प्रभु के विश्वासियों को इस बात की अनुमति देने में बहुत सार्थक है कि वे पाखंडी फरीसियों को समझें, उनके चंगुल और नियंत्रण से दूर हो जाएँ और परमेश्वर द्वारा उद्धार प्राप्त करें। वैसे, यह शर्मनाक है। कई विश्वासी फरीसियों के पाखंड के सार को नहीं समझ सकते हैं। वे यह भी नहीं समझते हैं कि प्रभु यीशु ने फरीसियों से इतनी घृणा क्यों की और उन्हें शाप क्यों दिया। आज हम इन समस्याओं के बारे में थोड़ी चर्चा करेंगे। फरीसी अक्सर आराधनालयों में दूसरों के सामने बाइबल की व्याख्या करते थे। वे अक्सर दूसरों के सामने प्रार्थना करते थे और लोगों की निंदा करने के लिए बाइबल के नियमों का उपयोग करते थे। बाहरी प्रेक्षकों को, वे बाइबल के श्रद्धालु पालक जैसे लगते थे। यदि ऐसा था, तब प्रभु ने उनसे इतनी घृणा क्यों की और उन्हें इतना शाप क्यों दिया? वास्तव में, मुख्य कारण यह है कि वे ने केवल धार्मिक अनुष्ठानों और नियमों का पालन करने की ही परवाह की थी; उन्होंने केवल बाइबल के नियमों और सिद्धांतों की व्याख्या की थी और परमेश्वर की इच्छा के बारे में किसी को नहीं बताया था, ना ही उन्होंने परमेश्वर के वचनों पर अमल करने या परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने पर ध्यान केंद्रित किया। वास्तव में, उन्होंने परमेश्वर की आज्ञाओं को नज़रअंदाज़ किया था। उन्होंने जो कुछ भी किया वह पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के विपरीत था। यही फरीसियों के पाखंड का मूलसार है। यही वो प्रमुख कारण है कि क्यों प्रभु यीशु उनसे घृणा करते थे और उनको शाप दिया था। प्रभु यीशु ने उनकी कलई खोल ने के समय ऐसा ही कुछ कहा, "तुम भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्‍वर की आज्ञा टालते हो? क्योंकि परमेश्‍वर ने कहा है, 'अपने पिता और अपनी माता का आदर करना', और 'जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।' पर तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, 'जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्‍वर को भेंट चढ़ाया जा चुका', तो वह अपने पिता का आदर न करे, इस प्रकार तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्‍वर का वचन टाल दिया। हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक ही की है: 'ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है।' 'और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं'" (मत्ती 15:3-9)। अब जबकि प्रभु यीशु ने फरीसियों की कलई खोल दी है, तो हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि हालांकि फरीसी अक्सर आराधनालयों में दूसरों के सामने बाइबल की व्याख्या करते थे, किंतु उन्होंने परमेश्वर का आदर या महिमामंडन कभी नहीं किया। उन्होंने परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन नहीं किया, और यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर की आज्ञाओं को मनुष्यों की परंपरा से बदल डाला; वे परमेश्वर की आज्ञाओं के बारे में भूल गये। वे खुले आम परमेश्वर का विरोध करते थे। क्या यह इस बात का अखंडनीय प्रमाण नहीं है कि कैसे फरीसियों ने परमेश्वर की सेवा तो की मगर उनका विरोध भी किया? वे लोग परमेश्वर के श्रापों और घृणा से ग्रस्त होने से कैसे बच सकते थे? परमेश्वर की आज्ञाओं में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "यह कि हत्या न करना।" "तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।" परंतु फरीसियों ने परमेश्वर की आज्ञाओं को नज़रअंदाज किया। वे खुले आम झूठी गवाही देते थे और परमेश्वर द्वारा भेजे गए पैगम्बरों और धार्मिक लोगों की निंदा करते थे और उन्हें मार डालते थे; उन्होंने सीधे सीधे परमेश्वर का विरोध किया। इस लिए, प्रभु यीशु ने फरीसियों की निंदा की और उन्हें यह कहते हुए शाप दिया, "हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे? इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे, और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा" (मत्ती 23:33-35)। फरीसियों ने कट्टरता से परमेश्वर का विरोध किया और उनके द्वारा भेजे गए पैगम्बरों और धर्मी लोगों को मार डाला। उन्होंने परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने और उनकी इच्छा को पूरा होने से रोकने का प्रयास किया! उन्होंने गंभीर रूप से परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित किया। तो वे उनके द्वारा श्रापित होने से कैसे बाख सकते थे?! फरीसियों ने जो कुछ किया क्या वह तथ्य था, क्यों नहीं था क्या? क्या हम फरीसियों के पाखंडी मूलसार और व्यवहार को देखने में असमर्थ हैं?

फरीसी बाहर से बड़े श्रद्धालु दिखाई देते थे, किंतु उनका सार कपटी और धूर्त था, वे दूसरों के आगे ढोंग और छल करने में निपुण थे। यदि प्रभु यीशु ने उनके समस्त दुष्ट कर्मो का कच्चा चिठ्ठा न खोला होता, जिसमें विश्वासघात करना और परमेश्वर की आज्ञाओं का परित्याग करना शामिल था, तो हम फरीसियों के पाखंड के सार को देख पाने में सक्षम न होते। अब आइए हम प्रभु यीशु द्वारा फरीसियों के पर्दाफ़ाश और निंदा पर एक और नज़र डालें। "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्‍वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो" (मत्ती 23:23-24)। "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो" (मत्ती 23:27-28)। फरीसी दूसरों के सामने अत्यंत श्रद्धालु होने का ढोंग करते थे। वे जानबूझ कर आराधनालयों में और नुक्कड़ों में प्रार्थना करते थे। उपवास रखने पर वे जान बूझ कर अपने चेहरों पर दुःख के भाव लाते थे। वे अपने लबादों की लटकनों पर पवित्र वचन लिते थे। जब वे धर्मार्थ दान देते थे, तो वे ये सुनिश्चित करते थे की दूसरे लोग उन्हें ऐसा करते हुए देखें। वे सुनिश्चित किया करते थे कि वे पुदीने, जीरे और सौंफ़ के अपने दशमांश का भुगतान करना न भूलें। उन्होंने अनेक ऐतिहासिक नियमों तक का भी पालन किया जैसे कि, "तब तक खाना न खाएँ जब तक आप अपने हाथों को अच्छी तरह से ना धो लें" इत्यादि। फरीसियों ने कई छोटी-छोटी बारीकियों पर बहुत बारीकी से ध्यान दिया। परंतु, उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्था की अपेक्षा अर्थात्, परमेश्वर से प्रेम करना, दूसरों से प्रेम करना, धार्मिक, दयालु और निष्ठावान बनना, जैसी जरूरतों का पालन नहीं किया। उन्होंने परमेश्वर की आज्ञाओं का बिल्कुल भी पालन नहीं किया। वो केवल बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्र संबंधी सिद्धांतों पर चर्चा करते थे। वे केवल धार्मिक अनुष्ठान करते थे और नियमों का पालन करते थे। यह उनके पाखंड और उस तरीके का चरम था जिससे वे लोगों को बेवकूफ बनाते थे। उनका व्यवहार हमें स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि फरीसियों ने जो कुछ भी किया वह दूसरों को धोखा देने और बाधित करने के प्रयासों का हिस्सा था। वे केवल स्वयं को स्थापित करने का प्रयास करते थे ताकि उनकी आराधना की जाए। वे केवल अपने पद और आजीविका को प्रबंधित करने और बनाए रखने को लेकर चिंतित थे। वे पाखंड और परमेश्वर का विरोध करने वाले झूठे मार्ग पर चल पड़े थे। यही वो कारण है कि परमेश्वर का उनका विरोध उनको शाप मिलने का कारण बना।

फरीसी सत्य से प्रेम नहीं करते हैं। उन्होंने कभी भी परमेश्वर के वचनों पर अमल करने या पमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने पर ध्यान नहीं दिया। वे केवल धार्मिक अनुष्ठान करने पर ध्यान देते थे और परमेश्वर का विरोध करने के मार्ग पर चलते थे। इसलिए, जब प्रभु यीशु कार्य करने और उपदेश देने आए, तो पाखंडऔर परमेश्वर के विरुद्ध शत्रुता की उनकी शैतानी प्रकृति का परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से पर्दाफ़ाश कर दिया गया। फरीसी बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि प्रभु यीशु के वचनों में अधिकार और प्रभाव है। उन्होंने न केवल प्रभु यीशु के वचनों और कार्य के सार और स्रोत को खोजने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उन्होंने प्रभु यीशु पर द्वेषपूर्ण ढंग से प्रहार किया और उन्हें अपमानित किया; वे कहते थे कि प्रभु यीशु राक्षसों को राक्षसों के राजकुमार द्वारा भगा रहे हैं; उन्होंने प्रभु यीशु के कार्य को, जो कि परमेश्वर के अधिकार और प्रभाव से पूर्ण था, पागलपन कहा। उन्होंने पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा का पाप किया, और परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित किया। फरीसियों ने न केवल स्वयं प्रभु यीशु की ईशनिंदा की और उन पर दोष लगाया, बल्कि उन्होंने प्रभु यीशु का विरोध और उनकी निंदा करने के लिए विश्वासियों को उकसाया और बहकाया। उन्होंने निष्ठावान लोगों को प्रभु द्वारा उद्धार से वंचित करवा दिया और उन्हें अपनी अंत्येष्टि -संबंधी वस्तुओं और पीड़ितों में तब्दील कर दिया। इसलिए, जब प्रभु यीशु ने उन्हें निंदित किया और शाप दिया, तो उन्होंने कहा, "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो" (मत्ती 23:13)। "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो" (मत्ती 23:15)। इसलिए, हम देख सकते हैं कि फरीसी पाखंडी थे जिन्होंने परमेश्वर का विरोध और ईश निंदा की, वे मसीह विरोधी थे जो परमेश्वर के शत्रु बनकर खड़े थे। वो दुष्टों का एक दल था जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते और उन्हें नर्क में खींच लेते थे। इसलिए प्रभु यीशु ने फरीसियोंको उनके दुष्ट आचरण के कारण "सात संताप" देकर उनकी निंदा की। यह पूरी तरह से परमेश्वर की पवित्रता और धर्मी स्वभाव को दर्शाता है और जिसे अपमानित नहीं किया जा सकता।

फरीसियों के इस पाखंडी स्वभाव के बारे में अब हम थोडा समझ पाए हैं। चलिये अब आधुनिक युग के पादरियों और एल्डर्स पर नज़र डालते हैं। वे केवल बाइबल के ज्ञान का और धार्मिक विश्वास के सिद्धांतों की व्याख्या करते हैं। वे सिर्फ़ धार्मिक अनुष्ठान करते हैं और नियमों पर चलते हैं। वे न तो परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं, और न ही उनकी आज्ञाएं मानते हैं। वो फरीसियों के जैसे ही हैं, वे ऐसे रास्ते पर चलते हैं जहां वे सेवा तो करते हैं लेकिन परमेश्वर का विरोध भी करते हैं। उसने उससे कहा, "तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख" (मत्ती 22:37-39)। जिन्हें परमेश्वर से प्यार है, उन्हें उनके वचनों का पालन भी करना चाहिये और उनकी इच्छा का ध्यान भी रखना चाहिए। अपने भाई-बहनों के जीवन के प्रति जिम्मेदार रहेना चाहिए। अब पादरियों और एल्डर्स को सूनी पड़ी कलीसियों और विश्वासियों के कम होते विश्वास और प्रेम का सामना भी करना पड़ता है। उन्हें विश्वासियों के लिए जीवन का जीवंत जल नहीं मिलता। विशेष जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य व्यक्त्त करने और लोगों को जीवन देने आते हैं, वे न तो उस पर विचार करते हैं और न स्वीकारते हैं। वे विश्वासियों को सच्ची राह खोजने से रोकते हुए उनका विरोध और निंदा करते रहते हैं। वे विश्वासियों को न तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के लोगों से सम्पर्क साधने देते हैं, और न ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ने देते हैं। और सबसे बुरी बात तो ये है कि, वे हमारे उन भाई—बहनों को शाप देते हैं या फिर उन पर हमला करते हैं जो उनके राज्य का सुसमाचार फैलाते हैं। वो पुलिस बुलाकर उन्हें गिरफ़्तार तक करवा देते हैं। क्या वे अपने हर काम से बुरा नहीं कर रहे और परमेश्वर का विरोध नहीं कर रहे हैं? वे लोग जो भी कर रहे हैं, क्या वह फरीसियों के प्रभु यीशु के विरोध और निंदा के तरीके से अलग है? अपने पदों को और आजीविका के साधनों को बचाने के लिए, पादरी और एल्डर्स विश्वासियों को परमेश्वर के अंत के दिनों के उद्धार कार्य को, स्वीकार करने से रोकते हैं। क्या वे लोगों को नर्क में नहीं घसीट रहे हैं? क्या ये वही दुष्ट सेवक नहीं हैं जिनके बारे में प्रभु यीशु ने बताया था? क्या ये आधुनिक युग के फरीसी नहीं हैं?

निश्चित रूप से पादरी और एल्डर्स न तो सच्चे विश्वासी हैं और न परमेश्वर के सेवक हैं। वे लोग निरंतर प्रभु के वचनों से विश्वासघात करते हैं, उनकी आज्ञाओं को त्याग देते हैं और उनको अपना शत्रु मान लेते हैं। प्रभु यीशु ने कहा कि जो स्वर्गिय पिता की इच्छा पूरी करेंगे केवल उन्हें ही स्वर्ग में जाने की अनुमति मिलेगी। हालांकि, पादरियों और एल्डर्स का कहना है कि चूंकि लोग आस्था से न्यायसंगत हो चुके हैं और अनुग्रह से बचा लिए गये हैं, सो वो स्वर्गीय राज्य में प्रवेश करेंगे। क्या वे प्रभु के वचनों से विश्वासघात नहीं कर रहे हैं और उनके बिल्कुल विपरीत बात नहीं कर रहे हैं? प्रभु यीशु चाहते थे कि, "परन्तु तुम्हारी बात 'हाँ' की 'हाँ,' या 'नहीं' की 'नहीं' हो" (मत्ती 5:37)। हालांकि,पादरी और एल्डर्स झूठ फैलाते हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा करते हैं। वे झूठी गवाहियां देते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करते हैं। प्रभु यीशु ने साफ़ कहा है, "जो मेरे भेजे हुए को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है" (यूहन्ना 13:20)। पादरी और एल्डर्स विश्वासियों को, उन भाई- बहनों को स्वीकार नहीं करने देते, जो राज्य के बारे में सुसमाचार का प्रचार करते हैं। जो कोई भी उन्हें स्वीकार करता है उसे कलीसिया से निकाल दिया जाता है। प्रभु यीशु चाहता है कि लोग बुद्धिमान कुंवारियां बनें, दूल्हे की आवाज़ सुनें और उसका स्वागत करने जायें। मगर, पादरी और एल्डर्स जब भी किसी को प्रभु यीशु की वापसी की गवाही देते हुए सुनते हैं तो, वे न्यायी बन जाते हैं और बिना जाँचे उसकी निंदा करते हैं। अगर पादरी और एल्डर्स वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते होते, अगर उनमें परमेश्वर का थोडा सा भी डर होता, तो फिर वे न तो इस तरह के झूठ फैलाते, और न ही कट्टरता से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा और विरोध करते। यही सच है। पादरी और एल्डर्स आधुनिक युग के फरीसी हैं। ये बात बिल्कुल सही है!

"स्क्रीनप्ले प्रश्नों के उत्तर" से

उस ज़माने में, यहूदी फरीसी अक्सर धर्मग्रंथों की व्याख्या करते थे और आराधनालयों में विश्वासियों के लिए प्रार्थना करते थे। क्या वे भी लोगों को बहुत धर्मपरायण नहीं लगते थे? तो फिर प्रभु यीशु ने यह कर कि पाखंडी फरीसियों को संताप मिले, फरीसियों को क्यों बेनकाब किया और उन्हें श्राप दिया? क्या प्रभु यीशु ने उनके साथ गलत किया? क्या लोग विश्वास नहीं करते कि प्रभु यीशु के वचन सत्य हैं? क्या लोग अभी भी शक करते हैं कि प्रभु यीशु ने गलत काम किया? यह पहचानना कि पादरी और एल्डर पाखंडी फरीसी हैं या नहीं, और मसीह-विरोधी हैं या नहीं सिर्फ यह देख कर नहीं हो सकता कि वे बाहर से लोगों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। अहम बात ये है कि वे प्रभु और सत्य के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। बाहर से वे विश्वासियों के प्रति स्नेही हो सकते हैं, लेकिन क्या उनके मन में प्रभु के लिए प्रेम है? अगर वे लोगों के प्रति बहुत प्रेमपूर्ण हैं, लेकिन प्रभु और सत्य के प्रति ऊब और नफ़रत से भरे हुए हैं, और अंत के दिनों के मसीह—सर्वशक्तिमान परमेश्वर को परखते और उनकी निंदा करते हैं, तो क्या वे पाखंडी फरीसी नहीं हैं? क्या वे मसीह-विरोधी नहीं हैं? बाहर से देखने पर वे प्रवचन देते हुए और मेहनतकश-से लगते हैं, लेकिन अगर ये ताज सजा कर पुरस्कृत होने की खातिर है, तो क्या इसका ये मतलब हो सकता है कि वे प्रभु की आज्ञा मानते हैं और उनके प्रति वफादार हैं? कोई इंसान पाखंडी है या नहीं, यह पहचानने के लिए, आपको उनके दिल में झांकना होगा और उनके इरादों को समझना होगा। चीज़ों की असलियत जानने के लिए यह सबसे अहम बात है। परमेश्वर लोगों के दिल का मुआयना करते हैं। इसलिए यह देखने के लिए कि कोई इंसान प्रभु से सच्चा प्रेम करता है या नहीं और उनकी आज्ञा मानता है या नहीं, अहम चीज़ यह देखना है कि क्या वे उनके वचन पर अमल करते हुए उससे जुड़े रहते हैं और उनके आदेशों का मान बनाये रखते हैं, और साथ ही यह देखना भी है कि क्या वे प्रभु यीशु को गौरवान्वित करते हैं और उनकी गवाही देते हैं, और क्या वे परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं। हम देखते हैं कि फरीसी अक्सर आराधनालयों में लोगों के सामने धर्मग्रंथों की व्याख्या किया करते थे, हर चीज़ के लिए बाइबल के नियमों से बंधे रहते थे, और लोगों के प्रति भी प्रेमपूर्ण थे। लेकिन असलियत में, उनके किये हर काम में परमेश्वर के वचन का पालन नहीं होता था या परमेश्वर के आदेशों का मान नहीं रखा जाता था, परंतु वह सिर्फ इसलिए किया जाता था कि लोग उसे देखें। बिलकुल जैसे कि प्रभु यीशु ने उनको बेनकाब करते वक्त कहा था: "वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं: वे अपने ताबीजों को चौड़ा करते और अपने वस्त्रों की कोरें बढ़ाते हैं" (मत्ती 23:5)। वे लंबी प्रार्थनाएँ करने के लिए जानबूझ कर आराधनालयों और सड़क की मोड़ों पर खड़े हो जाते। उपवास के दौरान वे जनबूझ कर अपने चेहरों को उदास बना लेते, ताकि लोग जन सकें कि वे उपवास कर रहे हैं। वे जानबूझ कर सड़कों पर अच्छे काम करते ताकि लोगों की नज़र उन पर पड़े। उन्होंने प्राचीन परंपराओं और धार्मिक रीति-रिवाजों को भी जारी रखा जैसे कि "अच्छी तरह से हाथ धोये बिना खाना न खायें।" लोगों को उनका साथ देने और उनकी आराधना करने की तरफ धोखे से खींचने के लिए, फरीसी खुद को छुपाने के लिए राई का पहाड़ बना लेते, और सिर्फ धार्मिक आराधना, गायन और गुणगान या कुछ प्राचीन परंपराओं से चिपके रहने के लिए ही लोगों की अगुवाई करते, लेकिन परमेश्वर के वचन पर चलने, उनके आदेशों का मान बनाये रखने, और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए लोगों की अगुवाई नहीं करते। इतना ही नहीं, उन्होंने सत्य पर चलने और परमेश्वर के आज्ञापालन और उनकी आराधना करने के लिए लोगों की अगुवाई नहीं की। उन लोगों ने सिर्फ विश्वासियों को असमंजस में डालकर धोखा देने के लिए कुछ बाहरी कारनामों का इस्तेमाल किया! जब प्रभु यीशु उपदेश देने और कार्य करने आये, धर्मपरायण होने का नाटक कर रहे इन फरीसियों ने अपने ओहदों और रोजी-रोटी को बचाने के लिए वास्तव में "बाइबल की रक्षा करने" के बहाने परमेश्वर के कानूनों और आदेशों का खुले आम त्याग कर दिया। उन लोगों ने अफवाहें रचीं, झूठी गवाहियां दीं, और प्रभु यीशु का घोर विरोध कर उनको झूठे मामलों में फंसाया, उन्होंने विश्वासियों को प्रभु यीशु का अनुसरण करने से रोकने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। अंत में, उन लोगों ने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाने के लिए सत्ताधारियों के साथ सांठ-गांठ भी कर ली! इस तरह से, फरीसियों का पाखंडी और सत्य से नफ़रत करनेवाला स्वभाव पूरी तरह से बेनकाब हो गया। इस प्रकार उनके मसीह-विरोधी सार का पूरी तरह से खुलासा हो गया। इससे पता चलता है कि फरीसियों का सार पाखंडी, बईमान, धोखेबाज और दुर्भावनापूर्ण था। वे सभी झूठे अगुआ थे, जिन्होंने परमेश्वर का मार्ग छोड़ दिया, लोगों को धोखा दिया और उन्हें पिंजड़ों में बंद कर दिया! उन्होंने देहधारी मसीह को प्रचंडता से नकारते हुए, उनकी निंदा करते हुए और उनसे नफ़रत करते हुए, धार्मिक दुनिया को परमेश्वर का विरोध करने के लिए अपने काबू में करके, विश्वासियों को धोखा देकर अपने चंगुल में फंसा लिया। ये बात यह साबित करने के लिए काफी है कि वे मसीह-विरोधी थे, जो अपना खुद का राज्य स्थापित करना चाहते थे!

अब हम फरीसियों के पाखंड के तरह-तरह के रूप देख सकते हैं, जब हम उनकी तुलना आजकल के धार्मिक पादरियों और एल्डर्स से करेंगे, तो क्या हमें पता नहीं चलेगा कि वे बिल्कुल फरीसियों जैसे ही हैं, और ये सब वैसे लोग हैं, जो प्रभु के वचन पर नहीं चलते और प्रभु के आदेशों का मान नहीं बनाये रखते, और इतना ही नहीं, वे ऐसे लोग नहीं हैं, जो प्रभु का गौरव बढ़ायें और प्रभु की गवाही दें? वे सिर्फ ऐसे लोग हैं, जो आँख बंद करके बाइबल में विश्वास करते हैं, बाइबल की आराधना करते हैं, और बाइबल को गौरवान्वित करते हैं। वे तरह-तरह के धार्मिक रीति-रिवाजों से चिपके रहते हैं, जैसे कि नियमित सेवाओं में मौजूद रहना, ऊषाकाल की प्रार्थना करना, रोटी के टुकड़े करना, पवित्र भोज प्राप्त करना, वगैरह-वगैरह। वे लोगों से सिर्फ विनम्र होने, सब्र रखने, धर्मपरायण होने, और स्नेही होने के बारे में चर्चा करने पर ही ध्यान देते हैं, लेकिन वे परमेश्वर से दिल से प्रेम नहीं करते, और इतना ही नहीं, वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं करते और उनके दिल में परमेश्वर के प्रति निष्ठा है ही नहीं। उनके कार्य और उनके उपदेशों का ज़ोर सिर्फ बाइबल के ज्ञान और धर्माशास्त्रीय सिद्धांत से चिपक कर उसकी व्याख्या करने पर ही होता है। लेकिन जब बात इस पर आती है कि, प्रभु के वचन का पालन और अनुभव कैसे करें, प्रभु के आदेशों का मान कैसे बनाये रखें और प्रभु के वचन का प्रचार कैसे करें और गवाही कैसे दें, लोग स्वर्गिक पिता की इच्छा का पालन कैसे करें, परमेश्वर से सही मायनों में प्रेम कैसे करें, उनकी आज्ञा का पालन और उनकी आराधना कैसे करें, और ऐसी सारी बातें जो प्रभु यीशु मानवजाति से चाहते हैं, उनके बारे में वे खोज नहीं करते, जांच-पड़ताल नहीं करते, और प्रभु के मकसदों को जानने की कोशिश नहीं करते, और यही नहीं, उनका पालन करने या उन्हें पूरा करने में लोगों की अगुवाई नहीं करते। हर जगह जा-जाकर बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांत पर उपदेश देने का उनका मकसद शेखी बघारना और बड़ा बनाना होता है, और लोगों के मन में अपने लिए जगह बनानी होती है, ताकि वे उन पर गर्व करें और उनकी आराधना करें। इसलिए, जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और अपना न्याय का कार्य करने आये, तो इन पादरियों और एल्डर्स ने, धार्मिक दुनिया में स्थाई सत्ता पाने, और विश्वासियों पर नियंत्रण करने और अपना खुद का राज्य बनाने की महत्वाकांक्षा की खातिर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बारे में अफवाहें गढ़कर, उन पर हमला करके और उनका तिरस्कार करके, और लोगों के सच्चे मार्ग को खोजने और उसकी जाँच-पड़ताल करने से रोकने के लिए पुरजोर कोशिश करके, प्रभु यीशु के वचन का खुले तौर पर उल्लंघन किया। मिसाल के तौर पर, प्रभु यीशु ने लोगों को बुद्धिमान कुंवारियां बनना सिखाया: जब कोई किसी को चिल्लाता हुआ सुने "देखो, दूल्हा आ रहा है!" तो उन्हें बाहर जा कर उनका स्वागत करना चाहिए। लेकिन जब पादरियों और एल्डर्स ने प्रभु यीशु के दोबारा आने की खबर सुनी, तो उन्होंने ऐसा करने के बजाय कलीसिया पर ताला लगा दिया और विश्वासियों को सच्चे मार्ग को खोजने और उसकी जाँच-पड़ताल करने से रोकने की भरसक कोशिश की! प्रभु यीशु ने कहा था, "एक दूसरे से अपने ही समान प्रेम रखना।" फिर भी, उन लोगों ने विश्वासियों को उकसाया कि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही देनेवाले भाई-बहनों को बदनाम करें और मारे-पीटें। प्रभु यीशु ने मनुष्य से झूठ न बोलने और झूठी गवाही न देने को कहा था, लेकिन पादरियों और एल्डर्स ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को बदनाम करने के लिए हर तरह की झूठी कहानियां गढ़ीं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का विरोध करने और उसको बदनाम करने और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को दाग़दार बनाने के लिए राक्षसी सीसीपी के साथ सांठ-गांठ भी की इससे हमें पता चलता है कि धार्मिक पादरियों और एल्डर्स ने जो कहा और किया है, वह प्रभु के उपदेशों का पूरा उल्लंघन है। वे बिल्कुल पाखंडी फरीसियों जैसे ही हैं। वे सब ऐसे लोग हैं, जो आँख बंद करके अगुवाई करते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं, और लोगों को धोखा देते हैं।

आइये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन का एक अंश पढ़ते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के वास्ते नहीं हैं, और तुम्हारे अन्य लक्ष्य हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रत्येक कार्यकलाप—परमेश्वर के विरोध में होंगे। तुम मृदुभाषी एवं विनम्र-व्यवहार वाले हो सकते हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति सही दिखायी दे सकती है, तुम एक ऐसा व्यक्ति दिखाई दे सकते हो जो कि आज्ञाकारी है, किन्तु जब परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रेरणाओं एवं परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारे दृष्टिकोण की बात आती है, तो जो कुछ भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में, तथा बुरा होता है। जो लोग भेड़ों के समान आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परन्तु जिनके हृदय बुरे इरादों को आश्रय देते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं, वे प्रत्यक्षत: परमेश्वर का अपमान करते हैं, और परमेश्वर उन में से एक को भी नहीं छोड़ेगा। पवित्र आत्मा उन में से प्रत्येक को प्रकट करेगा, ताकि सभी यह देख सकें कि उन में से प्रत्येक से जो पाखण्डी हैं पवित्र आत्मा के द्वारा निश्चित रूप से घृणा की जाएगी एवं उनका तिरस्कार किया जाएगा। चिंता मत करो: परमेश्वर बारी-बारी से उन में से प्रत्येक के साथ निपटेगा और उनका समाधान करेगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए" से)। ये धार्मिक पादरी और एल्डर्स बाहर से विनम्र, धैर्यवान और स्नेही दिखाई देते हैं, लेकिन उनके दिल कपट, धोखेबाजी और द्वेष से भरे हुए हैं। "सच्चे मार्ग की रक्षा करें, झुंड को बचायें" के बहाने, वे खुले तौर पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा करते हैं और विश्वासियों पर नियंत्रण करना चाहते हैं ताकि वे धार्मिक दुनिया में स्थाई सत्ता हासिल कर लेने और अपना खुद का राज्य स्थापित करने का लक्ष्य प्राप्त कर सकें। ये पाखंडी फरीसी जो सत्य और परमेश्वर से नफ़रत करते हैं, वे पक्के तौर पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य द्वारा उजागर परमेश्वर-विरोधी मसीह-विरोधी लोगों का समूह हैं। इसलिए, जो सब लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें इन लोगों के पाखंडी सार और शैतानी, मसीह-विरोधी स्वभाव को पहचानने का तरीका सीख लेना चाहिए। उन लोगों से अब आगे धोखा न खायें, असमंजस में न पड़ें, और उनके पिंजड़ों में बंद होकर उनके नियंत्रण में न फंसें। आपको सच्चे मार्ग की खोज और उसकी जाँच-पड़ताल करनी चाहिए और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करना चाहिए, और परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस आना चाहिए!

"राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से

पिछला:प्रश्न 31: बाइबल में जकर्याह की पुस्तक में, यह भविष्यवाणी की गई है: "यरूशलेम नगर के पूर्व में जैतून पहाड़ है। प्रभु उस दिन उस पहाड़ पर खड़ा होगा।…" परमेश्वर की वापसी निश्चित रूप से यहूदिया में जैतून के पहाड़ पर होगी, और फिर भी तुम गवाही देते हो कि प्रभु यीशु पहले ही वापस आ चुका है, चीन में प्रकट हुआ है और कार्यरत है। चीन एक नास्तिक देश है और यह सबसे अंधकारमय, सबसे पिछड़ा राष्ट्र है जो परमेश्वर को सबसे गंभीर रूप से नकारता है, तो प्रभु की वापसी चीन में कैसे हो सकती है? हम वास्तव में इसको समझ नहीं सकते, इसलिए कृपया हमारे लिए इसका उत्तर दो।

अगला:प्रश्न 33: उस समय, जब प्रभु यीशु अपने कार्य को करने के लिए आया था, यहूदी फरीसियों ने उसका अंधाधुंध विरोध किया, उसकी निंदा की और उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया। जब अंतिम दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए आता है, तो धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग उसकी भी अवहेलना और निंदा करते हैं, परमेश्वर को फिर एक बार क्रूस पर चढ़ाते हैं। यहूदी फरीसी, धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस तरह सच्चाई से नफरत क्यों करते हैं और क्यों इस तरह मसीह के विरुद्ध खुद को खड़ा कर देते हैं? वास्तव में उनका निहित सार क्या है?