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प्रश्न 27: बाइबल परमेश्वर के कार्य का प्रमाण है; केवल बाइबल पढ़ने के द्वारा ही प्रभु पर विश्वास करने वाले लोग यह जान सकते हैं कि परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी और सभी चीजों को बनाया और इसी से वे परमेश्वर के अद्भुत कार्यों, उसकी महानता और सर्वशक्तिमानता को देख सकते हैं। बाइबल में परमेश्वर के बहुत सारे वचन और मनुष्य के अनुभवों की बहुत सारी गवाहियाँ हैं; यह मनुष्य के जीवन के लिए प्रावधान कर सकती है और मनुष्य के लिए बहुत लाभदायक हो सकती है, इसलिए मुझे जिसकी खोज करनी है वह यह है कि क्या हम वास्तव में बाइबल पढ़ने के द्वारा अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकते हैं? क्या बाइबल के भीतर वास्तव में अनन्त जीवन का कोई मार्ग नहीं है?

बाइबल पढ़ने से हम यह समझ पाए कि परमेश्‍वर सभी चीजों का सृष्टिकर्ता है और हमने उसके चमत्कारिक कर्मों को पहचानना शुरू कर दिया। इसका कारण यह है कि बाइबल परमेश्वर के कार्य के प्रथम दो चरणों की गवाही है। यह परमेश्‍वर के वचनों और कार्य का अभिलेख है और व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य की गवाही है। इसलिए, हमारे विश्वास के लिए बाइबल बहुत महत्वपूर्ण है। इसके बारे में सोचो, यदि बाइबल नहीं होती, तो मनुष्य कैसे परमेश्‍वर और परमेश्‍वर के वचनों को समझ पाता? और किस तरह से मनुष्‍य परमेश्‍वर के कर्मों की गवाही दे पाता और परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्‍वास करना शुरू कर पाता? अगर मनुष्य बाइबल नहीं पढ़े, तो वह हर युग में परमेश्‍वर की आज्ञापालन करने वाले सभी संतों की असली गवाही का और कैसे गवाह बनेगा? इसलिए, विश्वास का अभ्यास करने के लिए बाइबल को पढ़ना आवश्यक है, और प्रभु के किसी भी विश्वासी को कभी भी बाइबिल से नहीं भटकना चाहिए। आप कह सकते हैं, जो बाइबल से भटक जाता है वह प्रभु में विश्वास नहीं कर सकता है। यह सभी युगों के संतों के अनुभवों में सत्यापित होता है। कोई भी विश्‍वास का अभ्यास करने में बाइबल को पढ़ने के मूल्य और अर्थ से इंकार करने की हिम्मत नहीं करता है। इसलिए, सभी युगों भर मे संतों और विश्वासियों ने बाइबल की पढ़ाई को एक महत्‍वपूर्ण विषय के रूप में देखा है। कुछ लोग यहाँ तक कह सकते हैं, कि बाइबल और प्रार्थना पढ़ना उतना ही जरूरी है जितना कि चलने के लिए हमारे दोनों पैर जरूरी हैं, जिसमें से एक के भी बिना हम आगे बढ़ने में विफल रहते हैं। लेकिन प्रभु यीशु ने कहा है, "धर्मग्रन्थ खोजें; क्योंकि तुम सोचते हो कि उनमें शाश्वत जीवन है: और वे वे हैं जो मेरे बारे में गवाही देते हैं। और तुम मेरे पास नहीं आओगे, कि तुम जीवन पा सको" (युहन्ना 5:39-40)। ठीक है, कुछ लोग भ्रमित हैं, उन्हें लगता है, यह देखते हुए कि बाइबल परमेश्‍वर के वचन और मनुष्यों की गवाही का एक अभिलेख है, बाइबल पढ़ने से मनुष्य को शाश्‍वत जीवन मिलना चाहिए! दरअसल, यह ऐसा मुश्किल विचार नहीं है। जब तक हम व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्‍वर के वचनों और कार्य के अंदर की कहानी और सार को और साथ ही उनके माध्यम से प्राप्त प्रभाव को समझते हैं, तब हम स्वाभाविक रूप से महसूस करेंगे कि ऐसा क्यों है कि कोई बाइबल को पढ़कर शाश्‍वत जीवन प्राप्त नहीं कर सकता है। इस युग के दौरान, यहोवा मुख्‍य तौर पर मनुष्य द्वारा पालन किए जाने के लिये व्यवस्थाओं, आज्ञाओं और अध्‍यादेशों को लागू करने बारे में चिंतित था। उनके वचन ज्यादातर मानवता के पृथ्वी पर रहने के लिए एक प्रकार के मार्गदर्शक थे, जो अभी भी अपनी शैशवावस्था में हैं। इन वचनों में मनुष्य के जीवन स्वभाव को बदलना शामिल नहीं था। इसलिए व्‍यवस्‍था के युग के दौरान परमेश्‍वर के सभी वचनों का उद्देश्य लोगों से कानूनों और आज्ञाओं का पालन करवाना था। यद्यपि ये वचन सत्‍य थे, वे बहुत अल्पविकसित सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु के वचन और कार्य छुटकारे के कार्य पर केंद्रित थे। जो वचन उन्होंने दिये वे छुटकारे के सत्‍य के बारे में थे और लोगों को सिखाया कि उन्हें अपने पापों को स्वीकार करना और पश्चाताप करना चाहिये और पाप और दुष्टता करने से दूर रहना चाहिए। इन वचनों ने प्रभु की प्रार्थना करने का उचित तरीका भी लोगों को सिखाया और माँग की कि मनुष्य को अपने समस्त हृदय और आत्मा के साथ प्रभु से प्रेम अवश्य करना चाहिए, अपने पड़ोसी को अपने जैसा प्रेम करना चाहिए सहिष्णु और धैर्यवान बनना चाहिए, और दूसरों को सत्‍तर बार, सात बार माफ कर देना चाहिए। ये सभी पश्चाताप के तरीकों में शामिल हैं। इसलिए, बाइबल पढ़ने के माध्यम से, हम केवल व्‍यवस्‍था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्‍वर के कार्य को समझ सकते हैं। हमें पता चलता है कि सभी चीजें परमेश्‍वर ने बनाई हैं और यह सीखते हैं कि पृथ्वी पर कैसे रहें और परमेश्‍वर की आराधना कैसे करें। हमें समझते हैं कि पाप क्या है, कौन परमेश्‍वर द्वारा धन्य किए गए हैं और किन्हें परमेश्‍वर ने अभिशाप दिया है। हम जान जाते हैं कि कैसे अपने पापों को स्‍वीकार करें और परमेश्‍वर से पश्चाताप करें। हम मानवता, सहनशीलता और क्षमा करना सीख जाते हैं, और जानते हैं कि हमें प्रभु का अनुसरण करने के लिये क्रॉस उठाना चाहिए। हम प्रभु यीशु की असीमित दया और करुणा स्‍वयं देखते हैं, और समझते हैं कि केवल प्रभु यीशु के सामने विश्वास में आने से ही हम उनके प्रचुर अनुग्रह और सत्‍य का आनंद ले पाएँगे। व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान बाइबल में अभिलिखित परमेश्‍वर के वचन और कार्य उस समय मानवजाति को बचाने और मानवजाति की जरूरतों की योजना के अनुसार परमेश्वर के द्वार व्‍यक्‍त किये गये सत्‍य थे। ये सत्‍य मनुष्‍य को केवल कुछ सतही अच्छे व्यवहारों को अपनाने का कारण बनने में सक्षम थे लेकिन मनुष्य के पापों की जड़ों का पूरी तरह से समाधान करने, मनुष्य के जीवन स्वभाव को बदलने, और मनुष्य को शुद्धिकरण, उद्धार, और परिपूर्णता प्राप्त करने की अनुमति देने में असमर्थ थे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के द्वारा दिए गये वचन केवल पश्चाताप का मार्ग कहे जा सकते हैं, लेकिन शाश्‍वत जीवन का मार्ग नहीं।

भाइयो और बहनो, तो शाश्‍वत जीवन का मार्ग क्या है? शाश्‍वत जीवन का मार्ग सत्य का वह मार्ग है जो मनुष्य को हमेशा के लिए जीवित रहने देता है, जिसका मतलब है, कि यह वह तरीका है जो मनुष्य को उसकी पापमयी प्रकृति के बंधनों और अवरोधों को त्‍यागने, उसके जीवन स्वभाव को बदलने की अनुमति देता है, और उसे जीवन के रूप में सत्य को प्राप्त करने, पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से मुक्त होने और मसीह के अनुकूल होने की अनुमति देता है। यह मनुष्य को जानने, आज्ञापालन करने और परमेश्‍वर का आदर करने की अनुमति देता है ताकि फिर कभी दुबारा परमेश्‍वर का विरोध या उनसे विश्‍वासघात करने का पाप ना करे। केवल वही मार्ग जो ऐसा प्रभाव प्राप्त कर सकता है, उसे ही शाश्‍वत जीवन का मार्ग कहा जा सकता है। मनुष्य, पाप के परिणामस्वरूप मरता है। अगर मनुष्य सत्य को जीवन के रूप में प्राप्त करता है और उन सभी पापों का समाधान कर लेता है जो उसे त्रस्त करते हैं, तो परमेश्‍वर उसे शाश्‍वत जीवन का आशीर्वाद देंगे। तो, केवल अंतिम दिनों में परमेश्‍वर का उद्धार प्राप्त करके हम शाश्‍वत जीवन के उस मार्ग का आनंद ले सकते हैं जो परमेश्‍वर मानवजाति को देते हैं। प्रभु यीशु ने कहा था, "मैं ही पुनरुज्जीवन, और जीवन हूँ: जो कोई भी मुझमें विश्वास करता है, चाहे उसकी मृत्यु क्यों न हो जाएं, वह जीवित रहेगा: और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है" (यूहन्ना 11:25-26)।

"स्क्रीनप्ले प्रश्नों के उत्तर" से

पिछला:प्रश्न 26: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। कृपया बताओ, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं?

अगला:प्रश्न 29: तुम यह प्रमाण देते हो कि प्रभु यीशु पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट चुका है, वह उस संपूर्ण सत्य को अभिव्यक्त करता है जो मानवता को शुद्ध बनाता और उसे बचाता है और वह परमेश्वर के परिवार से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है, तो हमें परमेश्वर की आवाज़ को कैसे पहचाननी चाहिए और हमें कैसे इस बात की पुष्टि करनी चाहिए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर वास्तव में लौटा हुआ प्रभु यीशु ही है?

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बाइबल के साथ वास्तव में कैसे पेश आना चाहिए और उसका उपयोग किस तरह से करना चाहिए कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो? बाइबल का मूलभूत मूल्य क्या है? प्रश्न 41: हमने चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक दुनिया के कई भाषण ऑनलाइन देखे हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बदनामी और झूठी निंदा करते हैं, उन पर आक्षेप और कलंक लगाते हैं (जैसे कि झाओयुआन, शेडोंग प्रांत की "5.28" वाली घटना)। हम यह भी जानते हैं कि सीसीपी लोगों से झूठ और गलत बातें कहने में, और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को धोखा देने में माहिर है, साथ ही साथ उन देशों का जिनके यह विरोध में है, अपमान करने, उन पर हमला करने और उन का न्याय करने में भी माहिर है, इसलिए सीसीपी के कहे गए किसी भी शब्द पर बिल्कुल विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों के द्वारा कही गई कई बातें सीसीपी के शब्दों से मेल खाती हैं, इसलिए हमें सीपीपी और धार्मिक दुनिया से आने वाले निन्दापूर्ण, अपमानजनक शब्दों को कैसे परखना चाहिए? अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को धार्मिक दुनिया द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने का प्रभाव और परिणाम क्या है? अंतिम दिनों में अपने न्याय के कार्य को करने के लिए परमेश्वर मनुष्य का उपयोग क्यों नहीं करता, इसके बजाय उसे देह-धारण कर, स्वयं इसे क्यों करना पड़ता है?