प्रश्न 26: धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग बाइबल में पौलुस के इन शब्दों को थामे रहते हैं: "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है" (2 तीमुथियुस 3:16), वे ऐसा विश्वास करते हैं कि बाइबल की हर बात परमेश्वर का ही वचन है, लेकिन तुम कहते हो कि बाइबल के शब्द पूरी तरह से परमेश्वर के वचन नहीं हैं, तो यह सब क्या है?

उत्तर:

सबसे पहले, हमें यह समझने की ज़रूरत है कि बाइबल कैसे और कब बनी। बाइबल की मूल किताब पुराने नियम का उल्लेख करती है। इज़राइली लोगों ने, अर्थात यहूदियों ने, केवल पुराने नियम को ही पवित्र शास्त्र कहा था। और फिर, अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने छुटकारे के कार्य का एक चरण पूरा किया। प्रभु के समय से तीन सौ से अधिक वर्षों के बाद, कलीसियाओं के तत्कालीन अगुवाओं ने मिलकर एक बैठक बुलाई। उनको लगा कि अंत के दिन करीब आ रहे थे और उन वचनों को जो प्रभु यीशु ने कहे थे, और उन धर्मपत्रों को जिन्हें शिष्यों ने लिखा था, सभी को एक साथ मिलाकर पुराने नियम की तरह एक किताब बनाकर समझाया जाना चाहिए और इसे सभी जगहों पर कलीसियाओं को भेजा जाना चाहिये। इस तरह से सारे लेख ठीक से सुरक्षित हो जाएँगे और कलीसियाओं का जीवन सही रास्ते पर लाया जा सकेगा। इसलिए, उन्होंने शोध करने के बाद प्रभु यीशु के प्रेरितों और शिष्यों के सभी लेखों को एक साथ इकट्ठा किया और आखिर में, उन्होंने लेख के सत्ताईस चयनित हिस्सों को नए नियम के आधिकारिक सिद्धांत के रूप में निर्धारित किया। बाद में उन्होंने नए नियम के आधिकारिक सिद्धांत की सत्ताईस रचनाओं और पुराने नियम को एक साथ जोड़कर बाइबल की संपूर्ण सामग्री बना दिया। यही नये और पुराने नियमों की पूरी पुस्तक की रचना का आधार है। कुछ ऐसे लोग हैं जो यह मानते हैं कि संपूर्ण पवित्र शास्त्र परमेश्वर से प्रेरित है; विशेष रूप से, पौलुस ने उस समय कहा था: "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है।" इन शब्दों के पीछे एक तथ्य है। जिस समय उन्हें बोला गया था, कोई नया नियम नहीं था क्योंकि नया नियम एक किताब नहीं बन पाया था और अभी भी बिखरे पत्रों के रूप में ही था। इस तरह की पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में, आख़िर पौलुस के शब्द किसका उल्लेख कर रहे थे? बेशक, वे पुराने नियम के संदर्भ में थे। इसलिए, 2 तीमुथियुस में पौलुस का यह कथन कि "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है।" पुराने नियम के प्रति निर्देशित किया जाता है, क्योंकि नया नियम उस समय एक पुस्तक नहीं बन पाया था, बल्कि प्रत्येक कलीसिया की निगरानी में यह दर्जनों खुले-बिखरे पत्रों के रूप में था। यह एक सच्चाई है और इसलिए पौलुस ने जो कहा वह निश्चित रूप से नए नियम को नहीं दर्शाता है। बहरहाल, अंत के दिनों के लोगों ने माना कि पौलुस द्वारा उल्लेखित "पवित्र शास्त्र" का मतलब पुराने और नए नियमों के पूरे ग्रंथ से था। यह उस समय के तथ्यों के ख़िलाफ़ और उस समय पौलुस ने जो कहा उसकी पृष्ठभूमि के विपरीत जाता है। इसलिए, यह तथ्यों के अनुरूप नहीं है और पक्षपाती और गलत विवेचनाओं के तहत आता है। इसके अलावा, अगर यह कहा जाए कि पुराना नियम परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया है, तो क्या यह समझ में आता है? "परमेश्वर की प्रेरणा से दिया जाना" क्या दर्शाता है? पुराने नियम के व्यवस्था के युग में, मूसा इस्राएलियों का अगुवा और परमेश्वर की ओर से नियुक्त एक सेवक था, अर्थात एक ऐसा व्यक्ति जो इज़राइल के लोगों को मिस्र से बाहर निकाल लाया और जिसने उन तक परमेश्वर के नियमों को पहुँचाया। व्यवस्था के युग का कार्य परमेश्वर द्वारा मूसा के माध्यम से किया गया था। मूसा को पुराने नियम की व्याख्या करने का सर्वाधिक अधिकार था और अन्य लोगों के पास यह योग्यता नहीं थी। खैर, मूसा की पाँच किताबों में, क्या उसने यह कहा था कि जो कुछ उसने लिखा, वह परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया था? पहली बात, मूसा ने यह नहीं कहा; दूसरी बात, उन सभी भविष्यवक्ताओं में से जिन्हें परमेश्वर ने पुराने नियम के युग में कार्यरत किया था, कोई भी इस तरह से बात करते हुए नहीं पाया जाता है। क्या यशायाह, दानिय्येल और यहेजकेल जैसे सबसे महान पैगंबरों में से कोई भी ये शब्द कहता है? नहीं। यह वाक्य "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है" केवल पौलुस द्वारा बाद में कहा गया था, और इसलिए इसे पूरी तरह से सबूत के रूप में नहीं लिया जा सकता है। अगर परमेश्वर ने कहा था कि सम्पूर्ण पुराना नियम परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया था, तो उसे पैगंबरों के माध्यम से यह बात कहनी चाहिए थी, लेकिन पैगंबरों के शब्दों से यह प्रकट नहीं होता है। यदि मूसा यह दृष्टिकोण ले सकता था, तो उसने ऐसा कहा होता, लेकिन मूसा ने जो कहा था, उसमें ऐसे कोई शब्द नहीं हैं। बाइबल की रचना और इसकी संरचना के संबंध में हमें इस तरह की समझ होनी चाहिए। इसे बाइबल की अंदर की कहानी कहा जा सकता है, जिससे हमें यह जानने में मदद मिलती है कि आखिरकार, बाइबल किस प्रकार बनाई गई थी, इसे किसने लिखा था और इसे किसने दर्ज किया। बाइबल में ऐसे कई दर्जन लेखक थे जिनमें एक जैसी समझ और एक ही दृष्टिकोण था। उनमें से कितनों ने कहा कि यह सब परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया है? केवल पौलुस ने कहा। पौलुस ने उस समय जो कहा कि समूचा पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया है, सैकड़ों वर्षों के बाद इसे किस तरह से समझा गया? समस्त पुराना और नया नियम परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया है। क्या ऐसी कोई भी व्याख्या अपेक्षाकृत अवास्तविक और अविश्वसनीय नहीं है?

नए नियम के सामने आने और पुराने नियम को उसके साथ जोड़े जाने के बाद, पौलुस के शब्दों को पढकर लोगों का मानना था कि पौलुस के शब्दों में संदर्भित "पवित्र शास्त्र" में पुराना नियम और नया नियम, दोनों शामिल थे। अगर पौलुस अभी भी जीवित होता, और यदि उसने अपने उत्तराधिकारियों को इस तरह का स्पष्टीकरण देते हुए सुना होता, तो वह तुरंत इसका प्रतिरोध करता, और यह घोषणा करता कि: "उस समय मैंने जो कहा वह पुराने नियम के बारे में था, इसमें नया नियम शामिल नहीं था।" इससे हटकर पौलुस का कहना और क्या होता, या इसके अलावा पतरस जैसे सभी लोग और वे सब जिन्होंने नए नियम के धर्म-पत्रों को लिखा, वे अंत के दिनों के मतों वाले लोगों को उनके द्वारा लिखित धर्म-पत्रों को परमेश्वर के वचन मानते हुए देखकर क्या कहते? क्या वे इस तथ्य को स्वीकार कर पाते? वे क्या कहते? वे कहते: "साथियों, यह एक चिंता का विषय है। तुमने एक बड़ी गलती की है और तुमने एक विधर्म किया है। हम सभी भाई हैं, हमने जो कहा है वह परमेश्वर के वचन का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। तुम इतने अंधे कैसे हो सकते हो, तुम हमारे शब्दों को परमेश्वर के वचन कैसे मान सकते हो?" वे अचंभित होते, सही है ना? पौलुस और पतरस ने प्रभु यीशु के आरोहण के तत्काल बाद अपने धर्म-पत्र नहीं लिखे थे। उनके धर्म-पत्र प्रभु यीशु के आरोहण के तीस साल बाद एक के बाद एक करके सामने आये थे और उन्होंने औपचारिक रूप से बीस या तीस साल तक प्रचार करने के बाद ही ये धर्म-पत्र लिखे थे। उनके लिखे धर्म-पत्रों को जब कलीसियाओं को भेजा गया, तो कलीसियाओं के भाई-बहनों को वे धर्म-पत्र कैसे लगे? क्या उन्होंने यह कहा होगा, "अहा, यह तो परमेश्वर की वाणी है, यह परमेश्वर का वचन है!"? क्या उन्होंने यह कहा होगा? बल्कि उन्होंने कहा होगा: "ओह, यह भाई पतरस की ओर से आया एक पत्र है, देखो, इस पत्र में उसने जो लिखा है वह वास्तव में अच्छा है, यह सचमुच शिक्षाप्रद है," "ओह, यह भाई पौलुस का एक पत्र है," "यह एक पत्र है बरनबास से", "यह एक पत्र मत्ती की ओर से आया है।" ... क्या उस समय कुछ लोगों ने इन शिष्यों के पत्रों को परमेश्वर के वचन के रूप में माना होगा? सौ प्रतिशत नहीं, वे ऐसा नहीं कर सकते थे, क्योंकि इन कुछ भाइयों, इन कुछ शिष्यों ने कभी यह नहीं कहा होगा कि वे परमेश्वर थे, और न ही उन्होंने कभी यह कहा होगा कि वे देहधारी परमेश्वर थे। उन सभी ने यह स्वीकार किया होगा कि वे प्रभु यीशु में विश्वास रखते थे, और यह कि वे प्रभु यीशु के शिष्य थे। इसलिए, उस समय की कलीसियाओं के भाइयों और बहनों ने भी उन्हें भाइयों के रूप में ही देखा था और उनके पत्रों और उन्होंने जो कुछ भी कहा होगा उन सभी बातों को उन्होंने उन भाइयों के कथनों के रूप में ही माना होगा, भाइयों के संवाद और भाइयों की गवाही के रूप में माना होगा, जो पूरी तरह से सही है और जो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से मेल खाता है। बहरहाल, आज लोग इन शिष्यों के कथनों को परमेश्वर का वचन मानते हैं, और परमेश्वर के वचन के साथ ही उनका उल्लेख करते हैं; क्या यह तत्कालीन ऐतिहासिक तथ्यों के विरुद्ध जाना नहीं है? आज लोग दिन-दहाड़े ऐतिहासिक तथ्यों के विरुद्ध जाने का, और इन लोगों के कथनों को बिना किसी भूल के एहसास के, परमेश्वर के वचन मान लेने का दुस्साहस करते हैं। अगर कोई इस तथ्य को उजागर करना भी चाहे, तो वे स्वयं का बचाव करते हैं, और अपने पक्ष में बाइबल के कथनों का हवाला देते हैं। क्या उन कथनों का कोई आधार है? वे किसका उल्लेख करते हैं? क्या तुम उन्हें समझते हो? शिष्यों के पत्रों में इस आशय के शब्द मौजूद हैं: पतरस ने उल्लेख किया कि भाई पौलुस के शब्द और पत्र परमेश्वर द्वारा, पवित्र आत्मा द्वारा प्रबोधित थे, और उनमें पवित्र आत्मा का कार्य था; क्या पतरस ने ऐसा नहीं कहा? लेकिन पतरस ने यह नहीं कहा कि पौलुस के शब्द परमेश्वर के वचन थे। पतरस ने यह नहीं कहा कि पौलुस के शब्द पवित्र आत्मा की प्रेरणा से दिए गए थे और उन्हें परमेश्वर के वचन के रूप में माना जाना चाहिए, अन्यथा तुम गलत होगे। पौलुस ने यह भी कहने का साहस नहीं किया कि उसके शब्दों को परमेश्वर ने प्रकट किया था, कि वे परमेश्वर की प्रेरणा से दिए गए थे। न तो पौलुस और न ही पतरस ने यह गवाही देने की हिम्मत की थी कि उनके स्वयं के कहे गए शब्द परमेश्वर के वचन थे, तो अंत के दिनों में विश्वासी लोग उनके शब्दों को परमेश्वर के वचन कैसे मान सकते हैं? वे क्या गलती करते हैं? क्या तुम कहोगे कि पूरी धार्मिक दुनिया के ग्रंथों के टीकाकारों ने उन्हें ठीक से समझा है या नहीं? ऐसी बड़ी बेतुकी गलती का सामना करते समय, वे इससे अनजान हैं, उन्हें इसकी कोई समझ नहीं है और वे इसे देख नहीं पाते। ये लोग खुद तो सच्चाई से रहित हैं और चीजों के सार को देख नहीं सकते हैं; परन्तु अन्य लोग आँखें मूँद कर उनकी आराधना करते हैं। परमेश्वर में लोगों का विश्वास, अंधविश्वास पर आधारित है, उनसे जो कुछ भी कहा जाता है वे उस पर विश्वास कर लेते हैं, वे अंधाधुंध तरीके से उपासना करते हैं, अवास्तविक उपमाएँ बनाते हैं, और कठोर नियमों से चिपके रहते हैं। वे किसी को सच्चाई से बात करने की अनुमति नहीं देते हैं, किसी को भी सच बोलने नहीं देते हैं। वे ऐतिहासिक तथ्यों को भी उजागर करने की अनुमति नहीं देते हैं और नतीजा यह है कि अंत के दिनों में विश्वासियों ने धोखा खाया है। विश्वासी लोग बाइबल के बारे में, बाइबल की आराधना करने के बारे में, और बाइबल को परमेश्वर के भी ऊपर रखने की दिशा में अंधविश्वासी होने लगते हैं, वे सोचते हैं कि बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती है, और सब कुछ बाइबल के अनुसार होना चाहिए। वे बाइबल के बारे में ऐसी अंधविश्वासी मान्यताएँ और श्रद्धा रखते हैं। क्या यह बेतुका व्यवहार नहीं है? बाइबल के बारे में लोग अंधविश्वास में कैसे पड़ते हैं? वे ऐसा तब करते हैं जब वे इसे ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं मानते हैं। वे सही मायनों में सच्चाई का अनुसरण नहीं करते हैं और पवित्र आत्मा के प्रबोधन और प्रकाश के अनुसार बाइबल का अनुशीलन नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय, वे आँखें मूंदकर मशहूर व्यक्तियों की पूजा करते हैं, और चाहे जो भी व्यक्ति जो कुछ भी कहे, वे सभी को सही समझते हैं, इसे स्वीकार करते हैं, और अंधाधुंध तरीके से अपना लेते हैं। क्या पौलुस त्रुटि से मुक्त था? क्या उसकी बात पूरी तरह से सटीक थी? वह भी एक इंसान था, यह कैसे संभव है कि एक इंसान में कोई भी दोष न हो? इसलिए, क्या यहाँ कोई भूल नहीं हो रही है कि अनुग्रह के युग के दौरान लोगों ने परमेश्वर के वचन के साथ शिष्यों के पत्रों को भी जोड़ दिया, और सब को परमेश्वर के वचनों के रूप में श्रेणीबद्ध कर दिया? बाइबल में मौजूद परमेश्वर के कथन परमेश्वर के वचन हैं, जबकि मनुष्य द्वारा जो कुछ कहा गया है वे मनुष्य के शब्द हैं। बाइबल में कौन-से शब्द परमेश्वर के वचन हैं? हमें उन्हें पहचानना चाहिए। वह सब कुछ जो यहोवा परमेश्वर ने स्वयं ही कहा था, जो यहोवा परमेश्वर ने मूसा को कहने के लिए निर्देशित किया था, जो यहोवा परमेश्वर ने पैगंबरों को कहने के लिए निर्देशित किया था, जो पैगंबरों को बताने के लिए कहा गया था और जो प्रभु यीशु ने खुद ही कहा, केवल वे ही परमेश्वर के वास्तविक वचन हैं। क्या तुमने पैगंबरों के शब्दों में ऐसा कुछ देखा है जो विशेष रूप से प्रतीकात्मक है? वे कहते हैं, "इस प्रकार प्रभु ने कहा," वे यह नहीं कहते हैं "इस प्रकार मैं दानिय्येल (मैं यशायाह) कहता हूँ।" यह बताता है कि वे केवल परमेश्वर के शब्दों की प्रतिलिपि बना रहे थे। "इस प्रकार प्रभु ने कहा", "प्रभु जो कहता है वो यह है," ये शब्द लोगों के लिए यह स्पष्ट करते हैं कि पैगंबरों ने परमेश्वर के मूल वचनों की प्रतिलिपि बनाई थी। इसलिए, परमेश्वर के सभी मूल वचन, जिन्हें पैगंबरों ने बताया था, परमेश्वर के सच्चे वचन हैं, जो कुछ भी स्वयं यहोवा परमेश्वर के द्वारा कहे गये वचनों के रूप में दर्ज किया गया था, वे सब परमेश्वर के सच्चे वचन हैं, जो कुछ भी प्रभु यीशु द्वारा स्वयं कहे गये वचनों रूप में शिष्यों द्वारा दर्ज किया गया था, वे सभी परमेश्वर के वचन हैं। बाइबल का केवल एक हिस्सा ही ऐसा है जिसमें परमेश्वर के सच्चे वचन दर्ज हैं और इसके अलावा, जो कुछ भी शिष्यों ने कहा था और जो कुछ भी परमेश्वर के सेवकों ने दर्ज किया, वे सब मनुष्यों की गवाहियाँ हैं। जैसे ही हम मनुष्यों की गवाही की बात करते हैं, एक समस्या उत्पन्न होती है। कभी-कभी जो वे कहते हैं, वह पूर्ण नहीं होता है, ठोस नहीं होता है, इसमें चीजों की कमी होती है; इसलिए, परमेश्वर अपने अंत के दिनों के कार्य में कहता है कि उस समय इस तरह की वास्तविकता थी, और यह बात उस समय ऐसी थी, और उसे कुछ पूरक कार्य करना पड़ा है। उदाहरण के लिए, पौलुस की परिस्थितियाँ अमुक थीं, और पतरस के हालात फलाँ-फलाँ थे इत्यादि; परमेश्वर अंत के दिनों के अपने कार्य में इन्हें पूरा करता है। इसलिए, हम यह देख सकते हैं कि जो कुछ भी मनुष्यों ने कहा है, वह वास्तविक पृष्ठभूमि के पूरी तरह अनुरूप नहीं होता है, परमेश्वर इस मुद्दे को अपने अंत के दिनों के कार्य में प्रकट करता है।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

चूँकि धर्म-पत्रों में पौलुस ने एक बार कहा था कि पूरी बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई है, धार्मिक मंडलियों ने बाद में बाइबल में लिखी गई सभी बातों को परमेश्वर की प्रेरणा, और परमेश्वर के वचनों के रूप में सीमांकित करना शुरू कर दिया। पौलुस ने जो कहा उसका कोई आधार नहीं था, क्योंकि परमेश्वर ने कभी इस तरह से बाइबल की गवाही नहीं दी थी, न ही प्रभु यीशु ने कभी यह कहा था कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई थी और इसमें पूरी तरह से परमेश्वर का ही वचन था। बाइबल के लिए पौलुस की गवाही केवल उसके अपने व्यक्तिगत ज्ञान पर आधारित थी; वह परमेश्वर की ओर से बिलकुल भी नहीं बोल रहा था। केवल पवित्र आत्मा और देहधारी परमेश्वर बाइबल की अंदर की कहानी को जानते हैं, और सृष्टि के मनुष्य इसे पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। यह एक तथ्य है। प्रभु यीशु ने केवल यह कहा कि बाइबल परमेश्वर की गवाही है; उसने यह नहीं कहा कि यह सब परमेश्वर से प्रेरित था और परमेश्वर का ही वचन था। और न ही पवित्र आत्मा ने किसी को भी बाइबल की ऐसी गवाही दी थी। इस प्रकार, पौलुस ने जो कहा था, वह आधारहीन था। वह परमेश्वर की ओर से नहीं बोल रहा था, पवित्र आत्मा की ओर से बोलने की तो बात ही दूर है। बाइबल की समस्त सामग्री, जो परमेश्वर की सेवा करने वाले लोगों द्वारा लिखी गई थी, वास्तविक घटनाओं और परमेश्वर के कार्य से संबंधित अनुभवों की गवाही का आलेख है। परमेश्वर के द्वारा इसका कोई भी अध्याय नहीं लिखा गया था; उन अध्यायों के लेखक परमेश्वर के वचन को केवल व्यक्त कर रहे थे, या पवित्र आत्मा की रोशनी से प्रबुद्ध होकर, अपने स्वयं के अनुभवों और समझ का वर्णन कर रहे थे, ताकि वे परमेश्वर के नाम और कार्य के बारे में गवाही दे सकें। यह एक तथ्य है। हालांकि प्रेरितों के लिखित विवरण और धर्म-पत्र पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किये गए थे, फिर भी वे परमेश्वर के वचन का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, क्योंकि पवित्र आत्मा प्रत्येक व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार प्रकाशित, प्रबुद्ध और मार्गदर्शित करता है, ताकि वह सत्य की समझ तक पहुँच सके और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके। यह पवित्र आत्मा के कार्य का प्रभाव है। इस प्रकार, पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा लाई गई यह प्रबुद्धता और रोशनी परमेश्वर के वचन के बराबर नहीं है; परमेश्वर के कथन परमेश्वर के जीवन-स्वभाव का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनमें उसके जीवन स्वभाव के सत्य का सार निहित होता है। परमेश्वर का कहा गया कोई भी वाक्य कभी भी मनुष्यों द्वारा पूरी तरह से अनुभव नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उसके कथन में सत्य का इतना अधिक सार निहित होता है कि इसे एक ही जीवनकाल के सीमित अनुभव के भीतर नहीं जिया जा सकता है। इस वजह से, चाहे लोग सत्य को कितना भी समझते हों या परमेश्वर को कितना ही जानते हों, वे कभी भी उसके वचन को व्यक्त करने में सक्षम नहीं होंगे। जाहिर है, पवित्र आत्मा का प्रबोधन और उसका प्रकाश मनुष्यों को केवल कुछ रोशनी और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, जिसके द्वारा सत्य को समझना होगा; चाहे अनुभवों की उनकी गवाहियाँ कितनी भी गहरी हों, इन्हें कभी भी परमेश्वर के कथनों के बराबर मानकर वर्णित नहीं किया जाना चाहिए। चूँकि मनुष्य के सार और परमेश्वर के सार में रात और दिन का फर्क है, मनुष्य कभी भी परमेश्वर के वचन को व्यक्त करने में सक्षम नहीं होगा; केवल परमेश्वर की दिव्यता के सार से संपन्न मसीह ही ऐसा कर सकता है। नबी केवल परमेश्वर के वचन को आगे प्रसारित कर सकते हैं; यहाँ तक कि जो लोग पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग में लाये जाते हैं, वे भी केवल अपने स्वयं के अनुभव और जो स्वयं ने देखा है, उनके बारे में ही बात कर सकते हैं। मनुष्य केवल अपने ही सार के अनुसार बात कर सकता है; इस तरह, उसका जीवन ही आगे उसकी गवाहियों को निर्धारित करता है। परमेश्वर के पास दिव्यता का सार है, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के वचन को अभिव्यक्त करता है; हम इंसानों में मानवता का सार है, इसलिए हम जो व्यक्त करते हैं वह स्वाभाविक रूप से हमारे अनुभवों और जो हमने देखा है, उन पर आधारित होता है। चूँकि बात ऐसी है, मनुष्य के माध्यम से प्रसारित किये गए उन हिस्सों के अलावा, जो परमेश्वर के वचन हैं, बाक़ी सब निस्संदेह मानवीय अनुभवों और समझ के विवरण हैं। अगर ये सत्य के अनुरूप हों, तो भी उन्हें परमेश्वर के वचन के तुल्य तो बिलकुल ही नहीं माना जा सकता, क्योंकि मानवता का सार परमेश्वर के सार के आसपास भी नहीं है। इसलिए, बाइबल को पढ़ते समय, हमें उन दो हिस्सों के बीच स्पष्ट भेद करना चाहिए जहाँ एक में तो परमेश्वर के वचन हैं और दूसरे में, मनुष्यों द्वारा कही गई बातें हैं। केवल इसी तरह से हम बाइबल के साथ जिम्मेदारी के साथ और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप पेश आ सकते हैं। इसके अलावा, जब धार्मिक समुदाय का दावा होता है कि बाइबल में लिखी गईं सभी बातें परमेश्वर के ही वचन हैं, यह उस समय के ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग में, पवित्र आत्मा ने कभी इस बात की गवाही नहीं दी है कि प्रेरितों द्वारा लिखित पत्र और गवाहियाँ परमेश्वर की प्रेरणा है। इतना ही नहीं, स्वयं प्रेरितों ने यह कभी नहीं कहा कि उन्होंने जो लिखा है, वह परमेश्वर की प्रेरणा से आया था; न ही उन्होंने यह दावा करने की हिम्मत की होती कि यह परमेश्वर का वास्तविक वचन था। उस समय कलीसियाओं को भेजे गए धर्म-पत्रों को सभी प्रेरित भाइयों द्वारा लिखे गए पत्रों के रूप में ही देखा गया था; किसी ने भी यह नहीं कहा था कि वे परमेश्वर से प्रेरित, परमेश्वर के ही वचन थे। तो उस समय की सच्चाई यही थी। क्या यह आज सच नहीं है? अब, अंत के दिनों में, जो लोग इस बात पर ज़ोर देते हैं कि धर्म-पत्र परमेश्वर के ही वचन हैं, वे ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ़ जा रहे हैं! व्यवस्था के युग में, परमेश्वर के सेवकों और नबियों ने न तो यह कहा था कि उनके शब्द परमेश्वर की प्रेरणा से आये थे, और न ही यह कहा कि वे परमेश्वर के वचन थे। जहाँ तक उनकी लिखी किताबों का प्रश्न है, उस समय के इस्राएलियों ने उन्हें निश्चित रूप से परमेश्वर के सेवकों या नबियों द्वारा लिखित माना होगा। परमेश्वर के उन वचनों के अलावा, जिन्हें उन्होंने बताया, शेष को परमेश्वर के कार्य के आलेख के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि इस्राएलियों ने कभी इसकी गवाही नहीं दी कि इन सेवकों या पैगंबरों द्वारा लिखित सभी किताबें परमेश्वर की प्रेरणाएँ और कथन हैं, तो उसके दो हज़ार साल बाद इंसान कैसे उस समय के ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ़ जा सकते हैं? लोग कैसे खुल्लम-खुल्ला इस बात पर ज़ोर दे सकते हैं कि मनुष्यों द्वारा लिखित बाइबल के शब्द वास्तव में परमेश्वर के वचन हैं? यह ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है! अंधविश्वास और मूर्तिपूजा, के जिस दृष्टिकोण के साथ अंत के दिनों में लोग बाइबल को देखते हैं, पूरी तरह से मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं की जादूगरी हैं; उनका परमेश्वर के वचन में बिल्कुल कोई आधार नहीं है। धार्मिक समुदाय में बाइबल का अंधा अनुपालन करने की यह प्रथा गुमराह करने वाली है, और परमेश्वर के विरुद्ध जाती है। इसी तरह मसीह-विरोधियों का दबाव लोगों को भ्रमित करता है, और उन्हें अंधविश्वास और बाइबल की झूठी उपासना की ओर भटकाता है। इसकी वजह से पहले ही बहुत संप्रदाय उत्पन्न हो गये हैं, जिससे कलीसियाई जीवन और लोगों के जीवन-प्रवेश में उथल-पुथल मच गई है और कई नकारात्मक प्रभाव पैदा हुए हैं। इस बिंदु पर, सभी लोगों को आत्म-निरीक्षण करना चाहिए, यह पहचानना चाहिए कि असल में क्या कुछ हो रहा है, और इस समस्या को हल करने के लिए और सही रास्ते से भटक जाने से बचने के लिए, सत्य की तलाश करनी चाहिए।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

धार्मिक जगत के पादरियों और एल्‍डर्स ने यह निर्धारित किया कि बाइबल में सब कुछ परमेश्‍वर के वचन हैं क्‍योंकि पौलुस ने कहा था "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है" (2 तीमुथियुस 3:16) और यह कि जब तक हम बाइबल पर अवलंबित रहते हैं, हमें स्‍वर्ग के राज्‍य में आरोहित कर दिया जाएगा। ख़ास तौर पर अंत के दिनों में, प्रभु के ज्यादातर विश्वासी अभी भी इसमें विश्वास करते हैं। मगर क्या यह नज़रिया सच्चाई और तथ्यों के अनुरूप है? क्या प्रभु यीशु ने कभी ऐसा कहा "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है"? क्या पवित्र आत्मा ने कभी इसकी गवाही दी? उन्होंने ऐसा नहीं किया। ऐसा पौलुस ने कहा था। कई विश्वासी पौलुस के इन शब्दों को अपने इस विश्वास का आधार बनाते हैं कि बाइबल का प्रत्येक वचन परमेश्वर से प्रेरित है और परमेश्वर का वचन है। क्या यह एक बहुत बड़ी गलती नहीं है? कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि मनुष्य द्वारा बोले जाने के बावजूद, जब तक यह बाइबल में दर्ज है, यह परमेश्वर का वचन है। क्या इस तरह का नज़रिया बहुत भ्रामक और बेतुका नहीं है? प्रभु में विश्वास करने वाले सभी लोगों को यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि बाइबल सिर्फ परमेश्वर की एक गवाही है और परमेश्वर के कार्य का एक दस्तावेजी रिकॉर्ड है। बाइबल की रचना परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार कार्य पर आधारित थी। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर और शैतान की बुरी शक्तियों के बीच की लड़ाई से भरा हुआ है, यही वजह है कि परमेश्वर का वचन बाइबल में दर्ज की गयी एकमात्र चीज नहीं है, क्योंकि विभिन्न लोगों और यहाँ तक कि शैतान के शब्द भी इसमें शामिल हैं। यह एक स्पष्ट तथ्‍य है। क्या यह कहना एक उचित तर्क है कि बाइबल का प्रत्येक शब्द परमेश्वर का वचन है? क्या यह सत्य को बिगाड़ना और सच में झूठ की मिलावट करना नहीं है? कैसे लोग अभी भी इस तरह की दोषपूर्ण धारणाएं विकसित कर सकते हैं? वे तथ्यों के मुताबिक़ बात क्यों नहीं कर सकते? जिस किसी ने भी बाइबल को पढ़ा है वह जानता है कि बाइबल में परमेश्वर और मूसा के बीच, परमेश्वर और अय्यूब के बीच, परमेश्वर और उनके चुने हुए लोगों के बीच, परमेश्वर और शैतान के बीच की बातचीत शामिल है। तो क्‍या ऐसे व्‍यक्ति जिससे परमेश्‍वर बात कर रहे हैं, उसके द्वारा कही गई बातें परमेश्‍वर का वचन बन जाती हैं? क्या यह बहुत बेतुका नहीं है? इसलिए, यह कहना कि "संपूर्ण धर्मशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया है और परमेश्वर का वचन है" तर्कसंगत हो ही नहीं सकता है! कुछ बेतुके लोगों ने मनमाने ढंग से इस बात पर जोर दिया कि बाइबल के मनुष्य के वचन परमेश्वर के वचन हैं। यह सच्चाई के बिलकुल विपरीत है। यह पूरी तरह से परमेश्वर को कलंकित करता है, परमेश्वर की निंदा, और परमेश्वर के स्वभाव का गंभीर रूप से अपमान करता है! परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के वचन हैं, मनुष्य के वचन, मनुष्य के वचन हैं, और शैतान की बातें, शैतान की बातें हैं। लोग उन्हें मिला क्यों देते हैं? परमेश्वर के वचन हमेशा सत्य होंगे। मनुष्य के वचन कभी भी सत्य नहीं हो सकते और ज्यादातर वचन केवल सत्य के अनुरूप हो सकते हैं। शैतान की बातें हमेशा गलत और झूठी होंगी। हज़ार बार बोले जाने पर भी, वे गलत और झूठी ही रहेंगी! बुद्धिमान लोगों को इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। केवल मूर्ख लोग गलत नज़रियों पर जोर देंगे।

इस सवाल के संबंध में, आइये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़ते हैं ताकि हम चीज़ों को बेहतर ढंग से समझ सकें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "आज, लोग यह विश्वास करते हैं कि बाइबल परमेश्वर है, और परमेश्वर बाइबल है। इस प्रकार वे यह भी विश्वास करते हैं कि बाइबल के सारे वचन सिर्फ वे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर ने कहा था, और उन सभी को परमेश्वर के द्वारा बोला गया था। वे जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं वे यह भी मानते हैं कि यद्यपि पुराने और नए नियम की छियासठ पुस्तकों को लोगों के द्वारा लिखा गया था, फिर भी उन सभी को परमेश्वर की अभिप्रेरणा के द्वारा दिया गया था, और वे पवित्र आत्मा के कथनों के लिखित दस्तावेज़ हैं। यह मनुष्य की त्रुटिपूर्ण समझ है, और यह तथ्यों से पूरी तरह मेल नहीं खाता है। वास्तव में, भविष्यवाणियों की पुस्तकों को छोड़कर, पुराने नियम का अधिकांश भाग ऐतिहासिक अभिलेख है। नए नियम के कुछ धर्मपत्र लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों से आए हैं, और कुछ पवित्र आत्मा के प्रकाशन से आए हैं; उदाहरण के लिए, पौलुस के धर्मपत्र एक मनुष्य के कार्य से आए थे, वे सभी पवित्र आत्मा के प्रकाशन के परिणामस्वरूप थे, और वे कलीसिया के लिए लिखे गए थे, और वे कलीसिया के भाइयों एवं बहनों के लिए प्रोत्साहन और उत्साह के वचन हैं। वे पवित्र आत्मा के द्वारा बोले गए वचन नहीं थे—पौलुस पवित्र आत्मा के स्थान पर बोल नहीं सकता था, और न ही वह कोई पैग़म्बर था, और उसने उन दर्शनों को तो बिलकुल नहीं देखा था जिन्हें यूहन्ना ने देखा था। उसके धर्मपत्र इफिसुस, फिलेदिलफिया, गलातिया और अन्य कलीसियाओं के लिए लिखे गये थे। और इस प्रकार, नए नियम के पौलुस के धर्मपत्र वे धर्मपत्र हैं जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था, और वे पवित्र आत्मा की अभिप्रेरणाएं नहीं हैं, न ही वे सीधे तौर पर पवित्र आत्मा के कथन हैं। ... यदि लोग धर्मपत्रों या पौलुस के वचनों को पवित्र आत्मा के कथनों के रूप में देखते हैं, और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करते हैं, तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि वे बहुत ही अधिक अविवेकी हैं। और अधिक कड़े शब्दों में कहा जाए, तो यह ईश निन्दा नहीं है तो और क्या है? एक मनुष्य परमेश्वर के बदले में कैसे बात कर सकता है? और लोग उसके धर्मपत्रों के लिखित दस्तावेज़ों और उसकी कही बातों के सामने कैसे झुक सकते हैं जैसे मानो वह कोई 'पवित्र पुस्तक' या 'स्वर्गीय पुस्तक' हो। क्या परमेश्वर के वचनों को एक मनुष्य के द्वारा सामान्य ढंग से बोला जा सकता है? एक मनुष्य परमेश्वर के बदले में कैसे बोल सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'बाइबल के विषय में (3)')।

"बाइबल की हर चीज़ परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों का लिखित दस्तावेज़ नहीं है। बाइबल सामान्यतः परमेश्वर के कार्य की पिछली दो अवस्थाओं का आलेख करती है, उसमें से एक भाग है जो पैग़म्बरों की भविष्यवाणियों का लिखित दस्तावेज़ है, और एक भाग वह अनुभव और ज्ञान है, जिन्हें युगों के दौरान उन लोगों के द्वारा लिखा गया था जिन्हें परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया गया था। मानवीय अनुभवों को मानवीय अनुमानों और ज्ञान के साथ दूषित किया गया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बाइबल की बहुत सी पुस्तकों में मानवीय धारणाएँ, मानवीय पक्षपात, और मनुष्यों की बेतुकी समझ हैं। हाँ वास्तव में, बहुत सारे वचन पवित्र आत्मा के प्रकाशन और अलौकिक ज्ञान का परिणाम हैं और वे सही समझें हैं—फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि वे पूरी तरह सत्य की सही अभिव्यक्ति हैं। कुछ निश्चित चीज़ों पर उनका दृष्टिकोण व्यक्तिगत अनुभव से प्राप्त ज्ञान, या पवित्र आत्मा के प्रकाशन से बढ़कर और कुछ नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'बाइबल के विषय में (3)')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, हम देख सकते हैं कि बाइबल पूरी तरह परमेश्वर की प्रेरणा से उत्पन्न नहीं हुई है, यह पूरी तरह परमेश्वर का वचन नहीं है। बाइबल के कौन से अंश परमेश्वर के वचन हैं और कौन से मनुष्यों के शब्द हैं, जो समझदार लोग हैं वे उसी समय बता सकते हैं। क्योंकि बाइबल के प्रत्येक ग्रन्थ में लेखक का नाम स्पष्ट रूप से बताया गया है, और यह भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि बाइबल के किन अंशों में परमेश्वर के वचन हैं। तो यह कैसे है कि बिना पलक झपकाए, लोग मनुष्य और शैतान के शब्दों को परमेश्वर का वचन मानना जारी रखते हैं? क्या यह बात करने का एक उचित तरीका है? यदि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले इस दावे पर जोर दें कि बाइबल में शामिल मनुष्यों के शब्द वास्तव में परमेश्वर के वचन हैं, आपको क्या लगता है कि परमेश्वर कैसा महसूस करेंगे? क्या यह परमेश्वर के प्रति उचित होगा? क्या यह परमेश्वर का अपयश, अनादर और ईशनिंदा नहीं है? परमेश्वर की नज़रों में मनुष्य के शब्द का वजन क्या है? हम एक क्षण के लिए सोचते क्यों नहीं हैं? मनुष्य के शब्द की परमेश्वर के वचन के साथ तुलना कैसे की जा सकती है? मनुष्य का और परमेश्वर का सार बिल्कुल अलग है, अतः निश्चित रूप से मनुष्य के शब्द और परमेश्वर के वचन भी एक-दूसरे से बहुत अधिक अलग हैं। यदि, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और उद्बोधन के माध्यम से, मनुष्य के शब्द सच्चाई के अनुरूप हो सकें, तो यह पहले से ही एक महान् उपलब्धि है। यदि मनुष्य के शब्द पवित्र आत्मा के कार्य से मार्गदर्शित नहीं हैं, तो क्या यह भ्रम और झूठ नहीं है? यदि परमेश्वर में विश्वास करने वालों को यह नहीं दिखता है, तो शायद वे बहुत मूर्ख और अज्ञानी हैं! आजकल, पूरी धार्मिक दुनिया बाइबल में लिखे मनुष्य के शब्दों को परमेश्वर के वचनों के रूप में लेती है। इससे पता चलता है कि धार्मिक दुनिया में कोई भी परमेश्वर को वास्तव में नहीं जानता है। धार्मिक दुनिया के अधिकांश अगुआ, पाखंडी फरीसी हैं। जो लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते हैं वे कभी विश्वास नहीं करेंगे कि बाइबल पूरी तरह से परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई है और पूरी तरह से परमेश्वर का वचन है। वे निश्चित रूप से आँखें बंद करके बाइबल की पूजा नहीं करेंगे और यहाँ तक कि बाइबल को परमेश्वर के रूप में भी नहीं मानेंगे। धार्मिक दुनिया में यह व्यापक रूप से माना जाता है कि बाइबल को पूर्ण रूप से परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया था और यह परमेश्वर का वचन है, और यह कि बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है। यह सम्पूर्ण धार्मिक दुनिया में सर्वाधिक बेतुकी झूठी धारणा है। अब हम इसे स्‍पष्‍ट तौर पर देख सकते हैं।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

पिछला: प्रश्न 25: तुम यह गवाही देते हो कि प्रभु यीशु पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वापस आ चुका है, कि वह पूरी सत्य को अभिव्यक्त करता है जिससे कि लोग शुद्धिकरण प्राप्त कर सकें और बचाए जा सकें, और वर्तमान में वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है, लेकिन हम इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते। यह इसलिए है क्योंकि धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का हमें बहुधा यह निर्देश है कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में अभिलेखित हैं और बाइबल के बाहर परमेश्वर का कोई और वचन या कार्य नहीं हो सकता है, और बाइबल के विरुद्ध या उससे परे जाने वाली हर बात विधर्म है। हम इस समस्या को समझ नहीं सकते हैं, तो तुम कृपया इसे हमें समझा दो।

अगला: प्रश्न 27: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं?

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